योहन का प्रथम पत्र।(John I) पहला अध्याय। १ वो जो प्रारम्भ से थे, जिन्हें हमने सुना, जिन्हें हमने अपनी आँखों से देखा, जिन पर हम ने दृष्टि टिकाई, और हमारे हाथों ने छुआ, जीवन के शब्द को ही; २ (क्योंकि वो जीवन प्रत्यक्षित कर दिए गए थे, और हम उन्हें देख चुके हैं, और साक्ष्य दे रहे हैं, और तुम्हें वही अनन्त जीवन घोषित कर रहे हैं, जो पिताश्री के साथ थे, और जो हमें प्रत्यक्षित कर दिए गए थे;) ३ वही जिन्हें हम देख और सुन चुके हैं, हम तुम्हें घोषित कर रहे हैं, ताकि तुम भी हमारे संग साहचर्य रख सको: और सच में हमारा साहचर्य पिताश्री के साथ, और उनके पुत्र यीशु मसीह के साथ है। ४ और यह बातें हम तुम्हें लिख रहे हैं, ताकि तुम्हारा हर्ष परिपूर्ण हो जाए। ५ अतः यही वो संदेश है जिसे हमने उन से सुना है, और तुम्हें घोषित कर रहे हैं, कि ईश्वर प्रकाश हैं, और उन में कतई भी अन्धकार नहीं है। ६ यदि हम कहते हैं कि हम उनके साथ साहचर्य रखते हैं, और अन्धकार में चलते हैं, तो हम झूठ बोलते हैं, और सत्य के कर्ता नहीं हैं: ७ परन्तु यदि हम प्रकाश में चलते हैं, जिस प्रकार वो प्रकाश में हैं, तो हम एक दूसरे के साथ साहचर्य रखते ह...
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पतरस का द्वितीय पत्र।(Second Peter) पहला अध्याय। १ सिमोन पतरस, यीशु मसीह का एक सेवक और अपौस्ल, उनको जिन्होंने ईश्वर और हमारे बचानेवाले यीशु मसीह की नेकी के माध्यम से, हमारे संग वही बहुमूल्य विश्वास प्राप्त कर लिया है,: २ तुम्हारे प्रति ईश्वर के, और हमारे प्रभु यीशु के ज्ञान द्वारा कृपा और शान्ति बहुगणित हो जाएँ, ३ उनकी दिव्य शक्तिनुसार ही जिसने हमें वो सभी वस्तुएँ जो जीवन और ईश्वर-भक्ति से सम्बन्धित हैं प्रदान कर दी हैं, उनके ज्ञान के माध्यम से ही जिन्होंने हमें महिमा और पुण्य के प्रति बुला लिया है: ४ जिनके द्वारा हमें अत्याधिक महान और बहुमूल्य प्रतिज्ञाएँ प्रदान कर दी गई हैं: ताकि इन्हीं के माध्यम से तुम उस दिव्य स्वभाव के भागीदार बन जाओ, उस भ्रष्टता से बच निकले हुए जो वासना द्वारा इस संसार में है। ५ और इसके अतिरिक्त, सर्व-कर्मठता रखते हुए, अपने विश्वास के प्रति पुण्य जोड़ो; और पुण्य के प्रति ज्ञान; ६ और ज्ञान के प्रति आत्म-संयम, और आत्म-संयम के प्रति धीरज; और धीरज के प्रति ईश्वर-भक्ति; ७ और ईश्वर-भक्ति के प्रति भ्रात्रीय दयालुता; और भ्रात्रीय दयालुता के प्रति प्रेम। ८ चूँकि यदि ...