अय्यूब की पुस्तक। (The Book of Job.)



(एक सुझाव: इस पुस्तक का सम्पादन इस वर्तमान में क्रियाशील है। कृपया इस पुस्तक को सावधानी से पढ़ें।)



पहला अध्याय।


१ अज़ की भूमी में एक पुरुष था, जिसका नाम अय्यूब था; और वो पुरुष परिपूर्ण और निष्कलंक था, और एक जो ईश्वर का भय माना करता था, और बुराई से परे ही हटा रहता था।

२ और उसे पैदा हुए थे सात बेटे और तीन बेटियाँ।

३ उसकी सम्पत्ती भी सात हज़ार भेड़ें, और तीन हज़ार ऊँट, और पाँच सौ सांडों के जुए, और पाँच सौ मादा गधियाँ, और एक बहुत ही विशाल घर-बार; तो भई ये पुरुष तो पूरब के समस्त पुरुषों में से सबसे महान था।

४ और उसके बेटे अपने-अपने घरों में भोज अपने-अपने दिन भोज आयोजित किया करते थे, और भिजवाकर अपनी तीनों बहनों को उनके साथ खाने और पीने के लिया बुलवा लिया करते थे।

५ और ऐसा हुआ करता था, कि जब उनके भोज मनाने के दिवस सम्पन्न हो जाया करते थे, कि अय्यूब भिजवाकर उन्हें पुनीत किया करता था, और सुबह-सुबह शीघ्रता से उठ कर ही, जले-चढ़ावे उन सभी की संख्यानुसार ही चढ़ा दिया करता था: चूँकि कहता था, ये सम्भव हो सकता है कि मेरे बेटों ने पाप कर दिया हो, और अपने हृदयों में ईश्वर को श्राप दे दिया हो। तो इस प्रकार अय्यूब निरंतर ही करता रहता था।

६ तो भई अब एक दिन आया कि जब प्रभु के समक्ष ईश्वर के बेटे स्वयं को प्रस्तुत करने हेतु आए, और शैतान भी उन्हीं के बीच पधारा।

७ और प्रभु ने शैतान से कहा, भई कहाँ से पधारा है तू? तब शैतान ने प्रभु को उत्तर दिया और कहा, पृथ्वी पर इधर-उधर जाने से, और उस पर ऊपर-नीचे फरिने से।

८ और प्रभु ने शैतान से कहा, क्या तूने मेरे सेवक अय्यूब का विचार किया है क्या, कि भई उसके समान तो पृथ्वी पर कोई भी नहीं है, एक परिपूर्ण और निष्कलंक पुरुष, और एक जो ईश्वर का भय मानता है, और जो बुराई से परे ही हटा रहता है?

९ तब शैतान ने प्रभु को उत्तर दिया और कहा, क्या अय्यूब ठेंगे के लिए ईश्वर का भय मानता है क्या?

१० क्या आपने उसे घेरे हुए, और उसके घराने को घेरे हुए, और उसका जो सब कुछ है घेरे हुए एक बाड़ नहीं लगा दी है क्या प्रत्येक दिशा में? आपने उसके हाथों के कार्य को आशीष दे दिया है, और उसकी सम्पत्ती की भूमी में वृद्धी हो चली है।

११ लेकिन अभी ही अपना हाथ आगे बढ़ा दें, और वो सब कुछ जो उसके पास है उसे छू दें, और वो आपको आप के मूँह पर कोस देगा।

१२ और प्रभु ने शैतान से कहा, देख ले भई, वो सभी कुछ जो उसके पास है तेरे हाथ में है; बस केवल उस पर स्वयं अपना हाथ मत डालियो। तो शैतान प्रभु की उपस्थिति से बाहर निकल चला।

१३ और एक दिन था जब उसके बेटे और उसकी बेटियाँ उनके सबसे अग्रज भाई के घर में खा और अंगूर-रस पी रहे थे:

१४ और अय्यूब के पास एक दूत ने आकर कहा, जी वो साँड जोत रहे थे, और वो गधियाँ उनके आस-पास चार रही थीं:

१५ और वो शबा-वासी उन पर आ पड़े और उन्हें ले गए; जी हाँ, उन्होंने नौकरों को तलवार की धार से मार डाला है; और बस केवल मैं ही आपको बता देने के लिए बच निकला हूँ।

१६ जैसे वो अभी बोल ही रहा था, तो एक अन्य भी आ पहुँचा और उसने कहा, जी ईश्वर की अग्नी स्वर्ग में से गिर पड़ी है, और भेड़ों, और नौकरों को भस्म कर-कर उन्हें खा गई है; और बस केवल मैं ही आपको बता देने के लिए बच निकला हूँ।

१७ जैसे वो अभी बोल ही रहा था, तो एक अन्य भी आ पहुँचा और उसने कहा, जी वो कसदी तीन गुट बनाकर ऊँटों पर टूट पड़े, और उन्हें ले गए, जी हाँ, और नौकरों को तलवार की धार से मार डाला है; और बस मैं ही अकेला आपको बता देने के लिए बच निकला हूँ।

१८ जैसे वो अभी बोल ही रहा था, तो एक अन्य भी आ पहुँचा और उसने कहा, जी आपके बेटे और आपकी बेटियाँ उनके सबसे अग्रज भाई के घर में ही खा और अंगूर-रस पी रहे थे:

१९ और देखें, जँगली-क्षेत्र में से ही एक बड़ी आँधी आई, और उस घर के चारों कोने को पीट डाला, और वो उन युवकों के ऊपर गिर गया, और वो मर गए थे; और बस मैं ही अकेला आपको बता देने के लिए बच निकला हूँ।

२० तब अय्यूब उठा, और अपना चौगा फाड़ डाला, और अपने सर पर उस्तरा फेर कर, धरती पर नीचे गिर पड़ा, और आराधना करने लग गया,

२१ और कहने लगा, नग्न ही मैं अपनी माँ के गर्भ से बाहर निकला, और नग्न ही मैं वहीं वापस चला जाऊँगा: प्रभु ने दिया था, और प्रभु ने ही ले लिया है; धन्य हो प्रभु का नाम।

२२ इस सभी में अय्यूब ने पाप नहीं किया, न ही ईश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया। 



दूसरा अध्याय।


१ तो भई पुनः एक दिन था कि जब ईश्वर के बेटे स्वयं को प्रभु के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु आए, और शैतान भी उन्हीं के बीच स्वयं को प्रभु के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु पधारा।

२ और प्रभु ने शैतान से कहा, भई कहाँ से पधारा है तू? तब शैतान ने प्रभु को उत्तर दिया और कहा, पृथ्वी पर इधर-उधर जाने से, और उस पर ऊपर-नीचे फरिने से।

३ और प्रभु ने शैतान से कहा, क्या तूने मेरे सेवक अय्यूब का विचार किया है क्या, कि भई उसके समान तो पृथ्वी पर कोई भी नहीं है, एक परिपूर्ण और एक निष्कलंक पुरुष, एक जो ईश्वर का भय मानता है, और जो बुराई से परे ही हटा रहता है? और वो अभी तक भी अपनी सत्यनिष्ठा कस कर पकड़े है, भले ही तूने मुझे उसके विरुद्ध, उसका बिन कारण विनाश कर देने हेतु उत्तेजित किया।

४ और शैतान ने प्रभु को उत्तर दिया और कहा, जी खाल के बदले खाल, हाँ, जो कुछ भी किसी आदमी के पास हो वो उसे अपनी ज़िंदगी के बदले दे डालेगा।

५ बस अपने हाथ को अभी ही आगे बढ़ा दें, और उसकी हड्डी और उसके देह हो छू दें, और वो आपको आपके मूँह पर ही कोस डालेगा।

६ और प्रभु ने शैतान से कहा, देख ले भई, वो तेरे ही हाथ में है; सिवाय उसके जीवन के।

७ तो शैतान प्रभु की उपस्थिति से बाहर निकल चला, और अय्यूब पर घोर फोड़े-फ़ुँसियों से उसके पाँव के तलवे से लेकर उसके शीर्ष तक वार कर डाला।

८ और उसने अपने लिए एक ठीकरा ले लिया स्वयं को उस से खुरचने के लिए ही; और वो राखों के बीच ही नीचे बैठ गया।

९ तब उसकी पत्नी ने उस से कहा, क्या आप अभी तक भी अपनी सत्यनिष्ठा कस कर पकड़े बैठे हो? ईश्वर को कोस डालो, और मर जाओ!

१० परन्तु उसने उस से कहा, तुम तो ऐसे बोल रही हो जैसे मूर्ख औरतें ही बोलती रहती हैं। क्या भई? क्या हम ईश्वर के हाथ अच्छा ग्रहण करें, और क्या हम बुराई न ग्रहण करें क्या? इस सभी में अय्यूब ने अपने होठों से पाप नहीं किया।

११ तो अब जब अय्यूब के तीन मित्रों ने इस समस्त कष्ट के विषय में सुना जो उस पर आ पड़ा था, तो वो हर एक अपने ही स्वयं के स्थान से आ गए; एलिफ़ज वो तेमान-वंशज, और बिल्दद वो शूआ-वंशज, और ज़ोफ़र वो नमा-वासी: चूँकि उन्होंने एक साथ ही उसके साथ शोक मनाने हेतु और उसे सान्त्वना देने हेतु समय नियुक्त कर लिया था।

१२ और जब उन्होंने दूर से ही अपनी आँखें उठाईं, और उसे नहीं पहचाना, तो वो अपनी वाणी उठाकर रो पड़े; और प्रत्येक ने अपने स्वयं का ही चौगा फाड़ डाला, और धूल-मिट्टी स्वर्ग की ओर अपने ही सरों पर उछाल दी।

१३ तो वो सात दिनो और सात रातों तक धरती पर उसी के साथ ही नीचे बैठे रहे, और किसी ने भी उसके साथ एक भी शब्द नहीं बोला: चूँकि उन्होंने देखा कि उसकी शोचनीयता तो अति विशाल थी।



तीसरा अध्याय।


१ तो इसके पश्चात अय्यूब ने अपना मूँह खोल कर अपने दिन को कोसा।

२ और अय्यूब ने बोल कर कहा,

३ वो दिन नष्ट हो जाए जिस में मेरा जन्म हुआ था, और वो रात जिस में कहा गया था, भई एक नर बच्चे का गर्भ-धारण हुआ है।

४ उस दिन को अन्धकार ही बन जाने दो; ईश्वर उसकी ऊपर से पूछ-ताछ न करें, न ही उस पर उजाला चमके।

५ तम और मृत्यु की परछाई उसे कलंकित कर दें; एक मेघ उस पर बसेरा डाल दे; दिन की कालिमा को उसे आतंकित कर देने दो।

६ और जहाँ तक उस रात की बात आती है, तिमिर उसे पकड़ ले; उसे वर्ष के दिनो के साथ न जोड़ा जाए, उसे महीनों की संख्या में न आने दिया जाए।

७ लो भई, उसी रात्री को एकल ही रहने दो, उस में कोई भी हर्षित वाणी प्रवेश न करे।

८ उन्हें उसे श्रापित कर देने दो जो दिन को श्राप देते हैं, जो अपने शोक-विलाप को उठा देने के लिए तैयार हैं।

९ उसके साँझ के सितारों को तिमिर हो जाने दो; उसे उजाले की खोज करने दो, बिन पाए; न ही उसे दिन के प्रभात को देखने दो:

१० चूँकि उसने बँद नहीं किए मेरी माँ के गर्भ के द्वार, न ही मेरी आँखों से दुःख छुपाया।

११ मैं गर्भ से ही क्यों नहीं मर गया? मैंने पेट में से बाहर निकलते ही प्राण क्यों नहीं त्याग दिए?

१२ घुटनों ने मेरी आस क्यों लगाई रखी? या उन स्तनों ने कि मैं दूध पीयूँ?

१३ तो अभी मैं अचल ही रहा होता और चुप, मैं निद्रा में ही लीन रहा होता; तो मैं विश्राम लिया हुआ होता,

१४ पृथ्वी के राजाओं और परामर्शदाताओं के साथ ही, जिन्होंने अपने स्वयं के लिए उजाड़ स्थानों को निर्मित किया;

१५ अथ्वा प्रमुखों के साथ जिसके पास स्वर्ण था, जिन्होंने अपने घरों को रजत से भरा:

१६ अथ्वा एक छुपे हुए असामयिक जन्म समान ही मैं नहीं रहा होता; उन शिशुओं समान जिन्होंने उजाला कभी न देखा।

१७ वहीं वो दुष्ट विचलित करना थाम देते हैं; और वो थके-माँदे विश्राम कर लेते हैं।

१८ वहीं वो कारावासी एक साथ विश्राम करते हैं; वो उस अत्याचारी की वाणी नहीं सुनते।

१९ छोटे और बड़े वहीं होते हैं; और वो नौकर अपने मालिक से मुक्त होता है।

२० किस कारण उसे जो कष्ट भोग रहा है दिया जाता है उजाला, और आत्मा में कटुता लिए वाले को जीवन;

२१ जो मृत्यु की कामना करते रहते हैं, परन्तु वो आगमन नहीं करती; और उसके लिए खुदाई करते रहते हैं छुपे हुए धन-भण्डारों से अधिक;

२२ जो अत्याधिकता से हर्ष मनाते हैं, और प्रसन्न हो जाते हैं, जब वो कब्र को प्राप्त कर सकते हैं?

२३ किस कारण उसे जिसका पथ छुपा हुआ है दिया जाता है उजाला, और जिसे ईश्वर ने घेर कर बाड़ लगा दी है?

२४ चूँकि मेरी आह मेरे भोजन के समक्ष आती है, और मेरा दहाड़ना पानियों के समान उँडेल दिया जाता है।

२५ चूँकि वो बात मुझ पर आ पड़ी है जिसका मुझे बहुत भय था, और वो जिसका मुझे डर था आ पड़ी है मुझ पर।

२६ मैं सुरक्षित नहीं था, न ही मैं शान्त था, न ही मुझे विश्राम था; तब भी कष्ट आ पड़ा।




चौथा अध्याय।


१ तब एलिफ़ज उस तेमान-वंशज ने उत्तर दिया और कहा,

२ यदि हम तुम्हारे साथ गोष्ठी करने का यत्न करें, तो क्या तुम दुखी हो जाओगे? लेकिन कौन स्वयं को बोलने से रोक सकता है भई?

३ देखो, तुमने कईयों को निर्देश दिए हैं, और तुमने दुर्बल हाथों को सुदृढ़ किया है।

४ तुम्हारे शब्दों ने उस ठोकर खाते हुए को खड़ा किया है, और तुमने उन दुर्बल घुटनों को सशक्त किया है।

५ परन्तु अब ये तो तुम्हीं पर आ पड़ा है और तुम शिथिल हो रहे हो; वो तुम्हारा स्पर्श कर रहा है, और तुम विचलित हो रहे हो।

६ क्या यही तुम्हारा भय नहीं है, तुम्हारी विश्वसनीयता, तुम्हारी आशा, और तुम्हारे पथों की निष्कलंकता?

७ भई स्मरण में ले आओ, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, कौन निर्दोष होता हुआ नष्ट होता है? अथ्वा कहाँ नेकों को काट डाल दिया जाता है?

८ जैसा कि मैंने ही देखा है, वो जो अधर्मता जोतते हैं, और दुष्टता बोते हैं, उसी की ही फसल कटाई करते हैं।

९ ईश्वर की फूँक से ही वो नष्ट हो जाते हैं, और उनके नथुनों के श्वास से ही वो समाप्त हो जाते हैं। 

१० शेर का दहाड़ना, और उस क्रूर सिंह की वाणी, और उन युवा शेरों के दाँत टूट जाते हैं।

११ वो वृद्ध सिंह शिकार के अभाव के कारण नष्ट हो जाता है, और उस तगड़े शेर के शावक बाहर बिखर जाते हैं।

१२ अब एक बात मेरे पास गोपनीयता से लाई गई थी, और मेरे कान ने उस में से कुछ थोड़ा प्राप्त किया।

१३ रात्रि के दृश्यों से विचारों में, जब लोगों पर घोर निद्रा आ पड़ती है,

१४ मुझ पर डर आ पड़ा, और कँप-कँपी, जिसने मेरे समस्त हड्डियों को हिला दिया।

१५ तब एक प्राण मेरे चहरे के सामने से पार चलता गया; मेरे रोंगटे खड़े हो गए:

१६ वो खड़ा हो गया, परन्तु मैं उसके आकार को न पहचान पाया: एक प्रतिमा मेरे नेत्रों के समक्ष थी, चुप्पी थी, और मैंने एक वाणी सुनी,

१७ क्या मरणशील मानुष ईश्वर से अधिक न्यायशील होगा क्या? क्या कोई अपने सृजनकर्ता से अधिक विमल होगा क्या?

१८ देखो भई, उन्होंने तो अपने सेवकों पर कोई भरोसा नहीं किया; और अपने दूतों पर उन्होंने दोष लगाया: 

१९ तो कितना कम उन में जो मिट्टी के घरों में बसते हैं, जिनकी नीव धूल में ही है, जो कीड़ों के समक्ष की कुचल दिए जाते हैं?

२० सुबह से लेकर रात तक उन्हें कूटा जाता है: वो तो सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं बिना किसी की भी परवाह किए।

२१ क्या उन में जो उनकी सर्वश्रेष्ठता है विदा नहीं हो जाती क्या? वो मर जाते हैं, विद्या हीनता में ही।




पाँचवाँ अध्याय।


१ बुला लो भई, यदि कोई भी हो जो तुम्हें उत्तर दे दे; और सन्तों में से किस की ओर तुम मुड़ोगे?

२ चूँकि आक्रोश उस मूर्ख  को मार डालता है, और ईर्ष्या उस मूढ़ को।

३ मैं तो उस मूर्ख को जड़ पकड़ते हुए देखा है: परन्तु अचानक ही मैंने उसके घर को श्राप दे डाला।

४ उसकी सन्तानें तो सुरक्षा से दूर हैं, और वो तो दरवाज़े में ही कुचल दिए जाते हैं, न ही कोई भी है उन्हें बचाने वाला।

५ जिनकी फसल की कटाई वो भूखा चट कर जाता है, और वो तो उसे काँटों में से भी बाहर निकाल लेता है, और वो डकैत उनकी सम्पत्ती निगल जाता है।

६ भले ही कष्ट धूल में से प्रवृत्त नहीं होता, न ही संकट धरती में से उगता है;

७ तथापि आदमी संकट झेलने ही जन्म लेता है, जैसे चिंगारियाँ ऊपर की ओर उड़ती हैं।

८ मैं तो ईश्वर से पूछ-ताछ करूँगा, और ईश्वर को ही अपना मसला सौंपूँगा:

९ जो महान कार्य करते हैं और अगम्य; आश्चर्यजनक कार्य अनगिनत:

१० जो पृथ्वी पर वर्षा प्रदान करते हैं, और पानियों को खेतों पर भिजवाते हैं:

११ उन नीचे-वालों को ऊपर स्थित कर देने हेतु; ताकि उन शोक मनाते हुओं को सुरक्षा तक पदोन्नत कर दिया जाए।

१२ वो उन चतुर-चालाकों की युक्तियों को निराश कर देते हैं, ताकि उनके हाथ उद्यम न हो सकें।

१३ वो तो विद्वानों को उन्हीं की कपटता में ही पकड़ लेते हैं: और उस टेढ़े-मेढ़े का परामर्श शीघ्र ही विफल हो जाता है।

१४ जो दिन चढ़े अन्धेरे से भेंट करते हैं, और दोपहर के समय रात के समान टटोलते फिरते हैं।

१५ परन्तु वो उस दरिद्र को तलवार से बचा लेते हैं, उनके मूँह से ही, और और बलशालियों के हाथ से।

१६ तो वो दरिद्र आशा लिए है, और अधर्मता अपना मूँह बँद कर देती है।

१७ देखो, खुश रहता है वो बन्दा जिसका ईश्वर सुधार करते हैं: इसलिए उन सर्वबलशाली के अनुशासन से तुम घृणा मत करो:

१८ चूँकि वो पीड़ा देते हैं, और पट्टी भी लगा देते हैं: वो घायल कर देते हैं, और उनके हाथ निरोग कर देते हैं।

१९ वो तुम्हें छह कष्टों से बचा लेंगे: हाँ भई, सात में कोई बुराई तुम्हें छू नहीं पाएगी।

२० अकाल में वो तुम्हारा मृत्यु से मुक्तिभुक्तान कर देंगे: और युद्ध में तलवार की शक्ती से।

२१ तुम जीभ की लताड़ से छुपा दिए जाओगे: न ही तुम विनाश से भयभीत होगे जब वो आता है।

२२ विनाश और अकाल पर तुम हँसी उड़ाओगे: न ही तुम धरती के जानवरों से डरोगे।

२३ चूँकि तुम तो खेत के पत्थरों के साथ संगठित होगे: और खेत के जानवर तुम्हारे साथ शान्ति बनाए रखेंगे।

२४ और तुम जान लोगे कि तुम्हारा तम्बू शान्ति में है; और तुम अपने बसेरे की सुध लोगे, और पाप नहीं करोगे।

२५ तुम ये भी जान जाओगे कि तुम्हारा बीज महान होगा, और तुम्हारे वंशधर धरती की घास के समान होंगे।

२६ तुम एक भरपूर आयु में अपनी कब्र पर आओगे, जैसे अनाज का एक गंठल अपनी ऋतु में अन्दर आता है।

२७ लो भई देख लो ये, हमने ये ढूँढ निकाला है, ऐसा ही है ये; अपने ही भले के लिए सुन लो इसे, और तुम इसे जान लो।



छटा अध्याय।


१ परन्तु अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा,

२ ओह कि मेरा दुःख पूर्णता से तोल दिया जाता, और मेरी आपदा एक साथ तराज़ू के पलड़ों पर रख दी जाती!

३ कि अब वो तो सागर के रेत से भी भारी होती: इसलिए मेरे शब्द निगले जा चुके हैं।

४ चूँकि उन सर्वबलशाली के बाण मेरे ही अंदर हैं, जिनका विष मेरे प्राण को पी रहा है: ईश्वर के आतंक स्वयं को मेरे विरुद्ध व्युह में रचा रहे हैं।

५ क्या वो जँगली गधा लिए रेंकता है क्या? या वो साँड अपने चारे पर रम्भाता है क्या?

६ क्या वो जो स्वाद हीन हो बिना नमक के खाया जा सकता है क्या? या फिर एक अण्डे के सफेद में क्या कोई स्वाद होता है क्या?

७ वो जो मेरी आत्मा छूना अस्वीकार करती थी मेरे दुःख भरे भोजन समान हैं।  

८ आह कि मुझे मेरी याचना प्रदान कर दी जाए; और कि ईश्वर मुझे वो अनुदान में दे दें जिसकी मैं आस लगाए बैठा हूँ!

९ कि मुझे नष्ट कर डालने से ईश्वर प्रसन्न हो जाएँ; कि वो अपने हाथ को रिहा कर दें और मुझे काट डालें!

१० तब तथापि मैं सान्त्वनित हो जाऊँ; हाँ भई, मैं स्वयं को दुःख में कठोर बना दूँ: बख्शने मत दो उन्हें; चूँकि मैंने उन पवित्र एक के शब्द छुपाए नहीं हैं।

११ क्या है मेरी शक्ती कि मैं आशा लिए रहूँ? और क्या है मेरा अन्त, कि मैं अपने जीवन को दीर्घ करूँ?

१२ क्या मेरी शक्ती पत्थरों की शक्ती है? या फिर क्या मेरा माँस पीतल का है?

१३ क्या मेरी सहायता मुझ ही में नहीं है क्या? और क्या विद्या मुझ से सच मुच खदेड़ दी गई है क्या?

१४ उस पर जो यातनित है उसके मित्र द्वारा तरस प्रदर्शित किया जाना चाहिए; लेकिन वो तो सर्वबलशाली का भय त्याग रहा है भई!

१५ एक नदी के समान मेरे भाई-जनो ने धोखा-धड़ी से व्यवहार किया है, और नदिकाओं की धारा समान वो चलते चले जा रहे हैं;

१६ जो बरफ़ के कारण काली-काली दिखाई पड़ती हैं, और जिन में हिम छुपा रहता है:

१७ जिस समय वो गरमाती हैं, वो ओझल हो जाती हैं: जब गरम-ताप मच जाता है तो वो अपने स्थान से बुझ जाती हैं।

१८ उनके मार्ग के पथ परे हट जाते हैं; वो शून्यता में चले जाते हैं, और नष्ट हो जाते हैं। 

१९ तेमा के पथिकों ने देखा, शबा के बंजारों ने उनकी प्रतीक्षा की।

२० वो तो भौंचक्के रह गए क्योंकि उन्होंने आस लिए रखी थी; वो वहाँ पहुँच गए, और लज्जित हो गए।

२१ चूँकि अब तुम शून्य हो; तुम मेरी निराशा देख रहे हो और डरे हुए हो।

२२ क्या मैंने कहा था, भई मेरे पास ले आओ? या अपनी सम्पत्ती में से मुझे कोई बक्षीश दे दो?

२३ या उद्धार कर दो मेरा शत्रु के हाथ से? या बलशाली के हाथ से मेरा भुक्तान कर दो?

२४ सिखा दो मुझे, और मैं चुप कर जाऊँगा: और मुझे समझवा दो कि मैंने किस में त्रुटि कर डाली है।

२५ उचित शब्द कितने बलपूर्वक होते हैं! परन्तु तुम्हारा सुधारना क्या सुधारेगा?

२६ क्या तुम किसी आशाहीन के शब्दों, और बोलों को सुधारने की कल्पना कर रहे हो, जो कि वायु के समान हैं?

२७ हाँ भई, तुम तो उस पिता-हीन पर प्रबल ठहरते हो, और तुम अपने ही मित्र के लिए एक गड्ढा खोद देते हो।

२८ इसलिए अब कृपा करके मुझे देखो; चूँकि ये प्रत्यक्ष है कि यदि मैं झूठ बोल रहा हूँ।

२९ मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ लौट आओ वापस, इसे अधर्मता मत बन जाने दो; हाँ भई, पुनः वापस पाउट आओ, इसी में मेरी नेकी है।

३० क्या मेरी जीभ में अधर्मता है? क्या मेरा स्वाद बुराईयों में प्रभेद नहीं कर सकता है क्या?



सातवाँ अध्याय।


१ क्या मानव को पृथ्वी पर एक समय नियुक्त नहीं कर दिया गया है क्या? क्या उसके दिन भी एक भाड़े पर लिए हुए के दिनो जैसे नहीं हैं क्या?

२ जिस प्रकार एक नौकर तत्परता से छाया की आस लगाए रहता है, और जिस प्रकार के भाड़े-वाला अपने काम के वेतन की आस लगाए रहता है:

३ उसी प्रकार मुझे व्यर्थता के महीनों पर नियुक्ति दे दी गई है, और मुझे थका देने वाली रातें नियुक्त कर दी गई हैं।

४ जब मैं नीचे लेटता हूँ, मैं कहता हूँ, भई मैं कब उठूँगा, और रात बीत चली जाएगी? और मैं इस और उस ओर करवटें ही बदलता रहता हूँ दिन की साँझ तक।

५ मेरा देह कीड़ों और मिट्टी के रोड़ों से आवृत है; मेरी त्वचा फटी हुई है, और घृणात्मक बन चुकी है।

६ मेरे दिन जुलाहे की ढरकी से भी अधिक वेग लिए हैं, और आशाहीनता में बीतते जा रहे हैं।

७ ओ स्मरण करो कि मेरा जीवन तो वायु ही है: मेरी आँख अब औरअच्छाई नहीं देखेगी।

८ उनकी आँख जिन्होंने मुझे देखा है मुझे अब और नहीं देखेगी: आपकी ही आँखें मुझ पर टिकी हैं, और मैं नहीं हूँ।

९ जैसे वो मेघ समाप्त हो कर ओझल हो जाता है: उसी प्रकार ही वो जो कब्र में नीचे जा रहा है अब और ऊपर नहीं आएगा।

१० वो अब और अपने घर वापस नहीं लौटेगा, न ही उसका स्थान उस से अब और परिचय रखेगा।

११ इसलिए मैं अपने मूँह को नहीं थामूँगा; मैं अपने प्राण की व्यथा में बोलूँगा; मैं अपनी आत्मा की कड़वाहट में शिकायत करूँगा।

१२ क्या मैं कोई समुद्र हूँ, या कोई अजगर, कि आप मुझ पर पहरा लगा रहे हैं?

१३ जब मैं कहता हूँ, मेरी शय्या मुझे सांत्वना देगी, मेरा बिस्तर मेरी शिकायत को चैन पहुँचा देगा;

१४ तब आप मुझे सपनों से डरा देते हैं, और दृश्यों द्वारा मुझे आतंकित कर देते हैं:

१५ ताकि मेरी आत्मा घुट जाना चुन लेती है, और जीवन की अपेक्षा मृत्यु।

१६ मैं इस से घृणा करता हूँ; मैं सदैव नहीं जीता रहूँगा: अकेला छोड़ दो मुझे; चूँकि मेरे दिन व्यर्थ ही हैं। 

१७ मनुष्य क्या है कि आप उसे आवर्धित करें? और कि आप अपने मन को उस पर लगा लें?

१८ और कि आप उस से प्रत्येक प्रातः भेंट करें, और प्रत्येक पल उसे परखें?

१९ और कितने समय तक आप मुझ से विदा नहीं होंगे, न ही मुझे अकेला रहने देंगे जब तक मैं अपना थूक निगल लूँ? 

२० मैंने पाप कर दिया है; तो मेरे पास आपसे क्या करना-धरना रहा, हे मानवता के परिरक्षक? आपने मुझे अपने ही विरुद्ध एक निशाना क्यों बना दिया है, ताकि मैं अपने स्वयं के लिए ही एक बोझ बन गया हूँ?

२१ और आप मेरे अतिचार को क्षमा क्यों नहीं कर देते हैं, और मेरी अधर्मता को परे हटा देते हैं? चूँकि अब तो मैं धूल में ही सो जाऊँगा; और आप मुझे प्रातः में ढूँढेंगे, परन्तु मैं नहीं रहूँगा।



आठवाँ अध्याय।


१ तब बिल्दद उस शूआ-वंशज ने उत्तर दिया और कहा,

२ और कितने समय तक तुम ये बातें बोलते रहोगे भई? और तुम्हारे मुँह की कहनीयाँ एक प्रचण्ड वायु जैसी?

३ क्या ईश्वर न्याय-निर्धारण विकृत करते हैं क्या? या फिर क्या वो सर्वबलशाली इन्साफ़ को विकृत करते हैं क्या?

४ यदि तुम्हारी सन्तानों ने उनके विरुद्ध पाप कर दिया है, और उन्होंने उन्हें उनके अतिचार के कारण परे पटक डाला है;

५ यदि तुम वेगता से ही ईश्वर को खोजोगे, और उन सर्वबलशाली से अनुनय करोगे;

६ यदि तुम विमल और सीधे-सीधे होते; तो अवश्य ही वो तुम्हारे लिए जाग जाते, और तुम्हारी नेकी के निवास को उन्नत बना देते।

७ भले ही तुम्हारा आरम्भ सामान्य सा ही था, तथापि तुम्हारी आने वाली अंतिम स्थिति बहुत महान होगी।

८ मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि भई पूछो पिछले युग से, और उद्यत कर लो अपने आप को उनके पित्रों की खोज-बीन कर लो:

९ चूँकि हम तो बस केवल कल के ही हैं, और कुछ भी नहीं जानते है, चूँकि पृथ्वी पर हमारे दिन एक परछाई ही हैं:

१० क्या वो तुम्हें सिखाएँगे नहीं, और तुम्हें बताएँगे, और अपने मन में से बाहर शब्दों का अर्णन करेंगे?

११ क्या सरकंडे बिना दलदल के उग सकते हैं क्या? क्या नरकट बिना पानी के उग सकता है क्या?

१२ उसके अभी उसकी हरियाली में ही होते होते, उसके काटे जाने से पहले ही, वो किसी भी अन्य घास से पहले ही मुरझा जाता है।

१३ इसी प्रकार के पथ उन सभी के होते हैं जो ईश्वर को भूल जाते हैं; और उस ढोंगी की आशा नष्ट हो जाएगी:

१४ जिसकी आशा काट दी जाएगी, और जिसका भरोसा एक मकड़ी का जाल बँ जाएगा।

१५ वो अपने घर पर सहारा लेगा, परन्तु वो खड़ा नहीं रहेगा: वो उसे कस कर पकड़े रहेगा, परन्तु वो रहेगा नहीं।

१६ वो सूर्य के समक्ष हरा है, और उसकी डाली उग जाती है उसके उद्यान में।

१७ उसकी जड़ें ढेर को लपेटे हैं, और पत्थरों के स्थान को देखता है।

१८ यदि वो उसे उसके स्थान से नष्ट कर दे, तो वो उसे अस्वीकार कर देगा कहता हुआ, मैंने तो तुम्हें देखा नहीं।

१९ देखो, यही उसके पथ की खुशी है, और पृथ्वी में से बाहर अन्य उग जाएँगे।

२० देखो, ईश्वर किसी परिपूर्ण को परे नहीं पटकेंगे, न ही वो बुरा करने वालों की सहायता करेंगे:

२१ जब तक कि वो तुम्हारे मूँह को हँसी से, और तुम्हारे होटों को हर्ष से नहीं भर देते हैं।

२२ वो जो तुमसे घृणा करते हैं लज्जा से आवृत हो जाएँगे; और उस दुष्ट का बसेरा शून्य बन जाएगा।



नौवाँ अध्याय।


१ तब अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा,

२ मैं ये सच-मुच जानता हूँ: परन्तु मानुष ईश्वर के साथ न्यायोचित कैसे ठहरेगा?

३ यदि वो उनके साथ बहस करना भी चाहे, वो उन्हें हज़ार में से एक का भी उत्तर नहीं दे पाएगा।

४ वो तो हृदय में विद्वान, और शक्ती में बलशाली हैं: किसने स्वयं को उनके विरुद्ध कठोर बना दिया, और उन्नत हुआ?

५ जो पर्वतों को हटा देते हैं, और वो आभास ही कर पाते: जो उन्हें अपने क्रोध में उलट-पलट कर देते हैं।

६ जो पृथ्वी को उसके स्थान में से बाहर हिला देते हैं, और उसके स्तम्भों में कँप-कँपी मच जाती है।

७ जो सूर्य को आदेश देते हैं, और वो उगता ही नहीं है; और सितारों पर मुहरबंदी लगा देते हैं।

८ जो अकेले ही स्वर्गों को बाहर फैला देते हैं, और समुद्र की लहरों पर रौंदते हुए चलते जाते हैं।

९ जो सप्तऋषि, मृगशीर्ष, और कृतिका, और दक्षिण वाले कक्ष निर्मित करते हैं।

१० वो महान कार्य जाँच-पड़ताल के पार करते हैं; हाँ भई, और अचरज भरे कार्य अनगिनत।

११ लो भई, वो तो मेरे पास से ही जा रहे हैं, और मैं उन्हें देख नहीं रहा हूँ: वो तो चलते भी जा रहे हैं, परन्तु मैं उनका आभास नहीं कर पाता।

१२ देखो, वो ले जा रहे हैं, कौन रोक सकता है उन्हें? कौन कहेगा उनसे, क्या कर रहें आप?

१३ यदि ईश्वर अपने क्रोध को पीछे नहीं खींचेंगे, तो वो अभिमानी सहायक उनके तले झुक ही जाते हैं।

१४ तो मैं कितनी लघुता से उन्हें उत्तर दे पाऊँगा, और उनके साथ अपने शब्दों को चुनूँगा?

१५ जिन्हें, भले ही मैं नेक होता, तथापि मैं उत्तर न देता, परन्तु मैं अपने न्यायाधीष से अनुनय तो करता।

१६ यदि मैंने पुकारा होता, और उन्होंने मुझे उत्तर दे दिया होता; तब भी मैं विश्वास न करता कि उन्होंने मेरी वाणी का श्रवण कर लिया है।

१७ चूँकि वो तो मुझे एक तूफ़ान से तोड़ रहे हैं, और बिन कारण मेरे घावों को बहुगणित कर रहे हैं।

१८ वो मुझे मेरे श्वास को ले लेने की अनुमती नहीं देंगे, परन्तु वो मुझे कटुता से भरते जा रहे हैं।

१९ यदि मैं शक्ती के विषय में बोलूँ, लो भई वो तो शक्तिमान हैं: और यदि न्याय-निर्धारण के विषय में, तो मुझे दलील पेश करने के लिए कौन समय निर्धारित करेगा?

२० यदि मैं स्वयं को ही न्यायोचित बनाता हूँ, तो मेरा अपना ही मूँह मुझे दण्डनीय घोषित कर डालेगा: यदि मैं कहता हूँ, जी मैं तो परिपूर्ण हूँ, तो ये भी मुझे विकृत सिद्ध कर देगा।

२१ भले ही मैं परिपूर्ण रहा होता, तथापि मैंने अपनी ही आत्मा से परिचय न रखा होता: मैं तो अपने ही जीवन से घृणा करता।

२२ ये एक बात है, इसलिए मैंने ये कह दिया, वो तो परिपूर्ण और दुष्ट को नष्ट कर डालते हैं।

२३ यदि कोड़ा अचानक ही मार डाले, वो उस निर्दोष की परीक्षा पर हँसी उड़ाएँगे।

२४ पृथ्वी उस दुष्ट के हाथ में प्रदान कर दी गई है: वो वहाँ के न्यायाधीषों के चेहरों को ढके रखता है; यदि नहीं, तो फिर कहाँ, और कौन है वो?

२५ अब मेरे दिन तो एक धावक-दूत से भी अधिक वेग लिए हैं: वो भागते जा रहे हैं, वो कुछ भी अच्छा नहीं देख रहे हैं।

२६ वो उन वेगशील जल-यानों के समान चले जा चुके हैं: उस गरुड़ के समान जो शिकार की ओर वेग मचाता है।

२७ यदि मैं कहूँ, मैं अपनी शिकायत भूल जाऊँगा, मैं अपना दुःख छोड़ दूँगा, और स्वयं को सान्त्वनित कर दूँगा:

२८ मैं तो अपने समस्त शोकों से डरा हुआ हूँ, मैं जानता हूँ कि आप मुझे निर्दोष नहीं ठहराएँगे।

२९ यदि मैं दुष्ट ही हूँ, तो मैं फिर क्यों व्यर्थता में श्रम करता हूँ?

३० यदि मैं स्वयं को हिम के जल से धो लूँ, और अपने हाथों को इतने अति-विमल बना दूँ;

३१ तब भी आप मुझे नाले में ही डुबो डालेंगे, और मेरे अपनी ही वस्त्र मुझ से घृणा करेंगे।

३२ चूँकि वो कोई आदमी नहीं हैं, जैसा कि मैं हूँ, कि मैं उन्हें उत्तर दूँ, और हम एक साथ न्याय-निर्धारण में पहुँच जाएँ।

३३ न ही हमारे बीच कोई मध्यस्तथ है, जो हम दोनो पर अपना हाथ रख दे।

३४ उन्हें अपना लट्ठ मुझ से हटा देने दो, और उनके भय को मुझे आतंकित मत करने दो:

३५ तब मैं बोलूँगा, और उनसे भयभीत नहीं होऊँगा; परन्तु ये मेरे साथ ऐसा नहीं है।





दसवाँ अध्याय।


१ मेरी आत्मा मेरे जीवन से थक चुकी है; मैं अपनी शिकायत को अपने ही ऊपर छोड़ दूँगा; मैं अपनी आत्मा की कटुता में ही बोलूँगा।

२ मैं ईश्वर से बोलूँगा, मुझे दण्डनीय-घोषित न ठहरायें; मुझे बता दें किस कारण वश आप मेरे साथ संघर्ष कर रहे हैं!

३ क्या ये आपके लिए अच्छा है कि आप अत्याचार करें, कि आप अपने ही हाथों के कार्य से घृणा करें, और उस दुष्ट के परामर्श को उज्ज्वल कर दें?

४ क्या आपके पास दैहिक नेत्र हैं? या फिर आप वैसे देखते हैं जैसे मानुष देखता है?

५ क्या आपके दिन मानव के दिनो जैसे हैं क्या? क्या आपके वर्ष मनुष्य के दिनो समान हैं क्या,

६ कि आप मेरी अधर्मता की पूछ-ताछ कर रहे हैं, और मेरे पापों की खोज-बीन कर रहे हैं?

७ आप जानते हैं कि मैं दुष्ट नहीं हूँ; और कोई भी नहीं है जो आपके हाथ में से बचाव कर सकता है।

८ आप ही के हाथों ने मुझे बनाया है और मुझे सृजनित किया है एक साथ चारों ओर से ही; तथापि आप मुझे नष्ट कर रहे हैं।

९ स्मरण में लाएँ जी, मैं आपसे विनती करता हूँ, कि आपने ही मुझे मिट्टी के समान बनाया है; तो फिर क्या आप मुझे पुनः धूल-मिट्टी में ही वापस भेज देंगे क्या?

१० क्या आपने ही मुझे दूध के समान ही बाहर नहीं उँडेल दिया है क्या, और मुझे पनीर के समान जमा दिया है?

११ आपने मुझे त्वचा और माँस संग आवृत कर दिया है, और मुझे हड्डियों और कंडरों से क़िलेबन्द कर दिया है।

१२ आपने मुझे जीवन और अनुग्रह प्रदान कर दिए हैं, और आपके निर्देशन ने मेरे प्राण का परिरक्षण किया है।

१३ और ये बातें आपने आपने ही हृदय में छुपा ली हैं: मैं जानता हूँ कि यही आपके साथ है।

१४ यदि मैं पाप करता हूँ, तो मुझे अंकित कर देंगे, और आप मुझे मेरी अधर्मता से बरी नहीं करेंगे।

१५ यदि मैं दुष्ट हूँ, तो हाय पड़े मुझ पर; और यदि मैं नेक हूँ, मैं अपना सर ऊपर नहीं उठाऊँगा। मैं तो असमंजस से भरा हुआ हूँ; इसलिए आप देख लें मेरी पीड़ा को;

१६ चूँकि वो तो बढ़ती चली जा रही है। आप एक खूँख़ार शेर के समान मेरा शिकार कर रहे हैं: और पुनः आप मुझ पर स्वयं को आश्चर्यजनक प्रदर्शित कर रहे हैं।

१७ आप मेरे विरुद्ध अपने साक्षियों का नवीनिकरण कर रहे हैं, और मुझ पर अपने रोष को बढ़ा रहे हैं; बदलाव और युद्ध मेरे विरुद्ध हैं।

१८ किस कारण वश फिर आपने मुझे गर्भ में से बाहर निकाला? आह कि मैंने प्राण त्याग दिया होता, और किसी भी आँख ने मुझे न देखा होता!

१९ मैं तो ऐसा होता मानो कि मैं हुआ ही न होता; मैं गर्भ से ही कब्र तक ले जाया जा चुका होता।

२० क्या मेरे दिन कुछ ही नहीं हैं क्या? तो रुक जाओ और मुझे एकान्त में ही छोड़ दो, ताकि मैं थोड़ी सी ही सान्त्वना ले लूँ,

२१ मेरे चले जाने से पहले जहाँ से मैं वापस नहीं लौटूँगा, अन्धकार की ही भूमी और मृत्यु की परछाई में ही;

२२ तम की ही भूमी, स्वयं अन्धेरेपन के समान ही; और मृत्य की परछाई, व्यवस्था-हीन ही, और जहाँ प्रकाश ही अन्धेरा है।



ग्यारहवाँ अध्याय।


१ तब ज़ोफ़र उस नमा-वासी ने उत्तर दिया और कहा,

२ क्या शब्दों के जनौघ का उत्तर नहीं दिया जाना चाहिए क्या? और क्या बात- बतँगड़ से भरे आदमी को न्यायोचित ठहरा दिया जाना चाहिए क्या?

३ क्या तुम्हारे झूठ लोगों को चुप करा देंगे क्या? और जब तुम हँसी उड़ाते हो, क्या कोई भी व्यक्ति तुम्हें लज्जित नहीं करेगा क्या?

४ क्योंकि तुमने कह दिया है, मेरा सिद्धान्त तो भई विमल है, और मैं तो तुम्हारी आँखों में मलहीन हूँ।   

५ लेकिन फिर क्या! ईश्वर बोल उठें और तुम्हारे विरुद्ध अपने होटों को खोल दें;

६ और कि वो तुम्हें विद्या के रहस्य बतला दें, कि वो उसके प्रति जो है दुगुने हैं! जान लो इसलिए कि ईश्वर तुमसे उस से कम भरपाई करवा रहे हैं जिसके योग्य तुम्हारी अधर्मता है।

७ क्या खोज-बीन करने से तुम ईश्वर को ढूँढ सकते हो क्या? क्या तुम उन सर्वबलशाली को परिपूर्णता में पा सकते हो क्या?

८ वो तो स्वर्ग के समान ऊँचे हैं; तुम क्या कर सकते हो? नरक से भी गहरे; तुम क्या जान सकते हो?

९ उनका नाप पृथ्वी से भी लम्बा, और सागर से भी चौड़ा है।

१० यदि वो काट डालें, और बँद कर दें, या एक साथ एकत्रित कर दें, तो कौन थाम सकता है उन्हें?

११ चूँकि वो व्यर्थ लोगों से परिचित हैं: वो दुष्टता को भी देखते रहते हैं; तो फिर क्या वो इसका विचार नहीं करेंगे क्या?

१२ चूँकि व्यर्थ आदमी विद्वान होगा, भले ही मानुष एक जँगली गधे के बछेड़े समान ही जन्म ले।

१३ यदि तुम अपने हृदय को उद्यत कर लोगे, और उनकी ओर अपने हाथों को फैला दोगे;

१४ यदि अधर्मता तुम्हारे हाथ में हो, उसे तो बहुत दूर कर दो, और अपने तम्बुओं में दुष्टता को मत निवास करने दो।

१५ चूँकि तब तुम अपने कलंकहीन चहरे को उठा लोगे; हाँ भई, तुम सुदृढ़ बन जाओगे, और डरोगे नहीं:

१६ चूँकि तुम अपनी व्यथा भूल जाओगे, और उसका स्मरण बहते हुए पानियों समान करोगे:

१७ और तुम्हारी आयु दोपहर के दिन से भी स्पष्ट होगी; तुम उज्ज्वलित हो उठोगे, तुम सुबह के जैसे ही होगे।

१८ और तुम सुरक्षित हो जाओगे, क्योंकि आशा है; हाँ भई, तुम अपने आस-पास खुदाई कर लोगे, और तुम सुरक्षा में ही अपना विश्राम ले लोगे।

१९ और तुम नीचे लेट जाओगे, और कोई भी तुम्हें डराएगा नहीं; हाँ भई, कई तुम्हारे सामने याचना करेंगे।

२० परन्तु उस दुष्ट की आँखे विफल हो जाएँगी, और वो बच नहीं पाएँगे, और उनकी आशा प्राण त्याग देने जसी ही रह जाएगी।



बारहवाँ अध्याय।


१ और अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा,

२ निस्संदेह बल्कि तुम ही लोग हो, और विद्या तो तुम्हारे साथ ही मर जाएगी!

३ परन्तु मेरे पास तुम्हारे समान ही प्रज्ञा है; मैं तुम से निम्न नहीं हूँ: हाँ भई, कौन इन जैसी बातों का जानकार नहीं है?

४ मैं उसके जैसा हूँ जिसका पड़ौसी उसका उपहास करता है, एक जो ईश्वर को पुकारता है, और वो उसे उत्तर देते हैं: उस न्यायोचित नेक की हँसी उड़ाई जाती है।

५ वो जो अपने पैरों संग फिसल जाने के लिए तैयार है उसके विचार में एक घृणात्मक दीपक के समान है जो शान्ति में है।

६ डकैतों के ख़ैमे उन्नत हो रहे हैं, और वो जो ईश्वर को उत्तेजित कर रहे हैं सुरक्षित हैं; जिनके हाथ में ईश्वर बहुतायतता से ले आते हैं।

७ परन्तु अब जानवरों से ही पूछ लो, और वो तुम्हें सिखा देंगे; और पवन के पंछियों से ही, और वो तुम्हें बता देंगे:

८ या फिर पृथ्वी से ही बोल लो, और वो तुम्हें सिखा देगी: और समुद्र की वो मछलियाँ तुम्हें वर्णन कर देंगी।

९ कौन ये नहीं जानता कि इन सभी में प्रभु के हाथ ने ये श्रमित किया हुआ है?

१० जिनके हाथ में प्रत्येक जीवित जन्तु की आत्मा, और समस्त मानव-जाती का श्वास।

११ क्या कान शब्दों की परीक्षा नहीं लेता है क्या? और मूँह अपने भोजन को चखता है?

१२ उन श्वेत बाल वालों के साथ विद्या होती है; और लम्बे दिनो में प्रज्ञा।

१३ उनके पास विद्या और शक्ती है, उनके पास परामर्श और प्रज्ञा हैं।

१४ देखो, वो तोड़ डालते हैं, और उसका पुनः निर्माण नहीं किया जा सकता है: वो एक आदमी को बँद कर देते हैं और कोई भी रिहाई नहीं मिल सकती।

१५ देखो तो, वो पानियों को रोक कर रखते हैं, और वो सूख जाते हैं: और वो उन्हें बाहर भिजवा देते हैं, और वो पृथ्वी को उलट-पलट कर डालते हैं।

१६ उनके पास शक्ती और विद्या हैं: वो धोखा खाने वाला और वो धोखा खिलाने वाला उन्हीं के हैं।

१७ वो परामर्शदाताओं को लूटवा हुए लिए चलते हैं, और न्यायाधीषों को मूर्ख बना देते हैं।

१८ वो राजाओं के बंधनों को ढीला कर देते हैं, और उनकी कटियों पर कमर-पेटियाँ बाँध देते हैं।

१९ वो पुरोहितों को लूटवा हुए लिए चलते हैं, और बलशालियों को उलट-पलट कर डालते हैं।

२० वो उस विश्वसनीय की बोली को हटा देते हैं, और उस वृद्ध की प्रज्ञा को परे ले जाते हैं।

२१ वो अध्यक्षों पर अपमान उँडेल देते हैं, और बलशालियों के बल को दुर्बल कर देते हैं।

२२ वो गूढ़ बातों को अन्धकार में से बाहर अनावृत कर देते हैं, और उजाले में मृत्यु की परछाई को बाहर ले आते हैं।

२३ वो राष्ट्रों को बढ़ा देते हैं, और उन्हें नष्ट कर डालते हैं: वो राष्ट्रों को विस्तृत कर देते हैं, और उन्हें पुनः संकीर्ण बना देते हैं।

२४ वो पृथ्वी के लोगों के प्रमुखों के हृदयों को परे ले जाते हैं, और उन्हें एक पथ-हीन जँगली-क्षेत्र में भटकवा देते हैं।

२५ वो जने अन्धकार में बिना उजाले के टटोलते फिरते रहते हैं, और वो उन्हें मदिरा से धुत जैसा लड़खड़ा देते हैं।



तेरहवाँ अध्याय।


१ लो भई, मेरी आँख ने ये सब देख लिया है, मेरे कान ने ये सुन और समझ लिया है।

२ जो तुम जानते हो, वही मैं भी जानता हूँ: मैं तुम से निम्न नहीं हूँ।

३ अवश्य ही मैं सर्वबलशाली से बोलूँगा, और मैं ईश्वर के साथ विचार-विमर्श करने की इच्छा रखता हूँ।

४ परन्तु तुम तो झूठ की सिलाई कर देने वाले हो, तुम सभी व्यर्थ चिकित्सक हो।

५ ओ कि तुम सभी एक साथ चुप कर जाओ! और वही तुम्हारी विद्या बन जाएगी।

६ अब सुन लो मेरे विचार-विमर्श को, और श्रवण कर लो मेरे होठों की दलीलों का।

७ क्या तुम ईश्वर के लिए दुष्टता से बोलोगे क्या? और उनके लिए धोखाधड़ी से बोलोगे क्या?

८ क्या तुम उनके व्यक्तित्व का पक्ष लोगे? क्या तुम ईश्वर के लिए झगड़ोगे क्या?

९ क्या ये अच्छा है कि वो तुम्हारी छान-बीन करें? अथ्वा जिस प्रकार एक दूसरे का मज़ाक उड़ाता है, क्या तुम भी उनका मज़ाक ऐसे उड़ा रहे हो?

१० वो अवश्य ही तुम्हें सुधार देंगे, यदि तुम छुप-छुप कर लोगों के प्रति पक्षपाट करोगे।

११ क्या उनकी सर्वश्रेष्ठता तुम्हें भयभीत नहीं कर देगी क्या? और उनका आतंक तुम गिर पड़ेगा?

१२ तुम्हारे स्मारक राखों के समान हैं, तुम्हारे शरीर मिट्टी के शरीरों जैसे।

१३ चुप कर जाओ, मुझे अकेला छोड़ दो, ताकि मैं बोल सकूँ, और उसे आने दो जो कुछ मुझ पर आ पड़ेगा।

१४ किस कारण वश मैं अपने माँस को अपने दाँतों में ले रहा हूँ, और अपने जीवन को अपनी हथेली में डाल रहा हूँ?

१५ भले ही वो मुझे मार डालें, तब भी मैं उन पर भरोसा रखूँगा: परन्तु मैं उनके समक्ष अपने पथों को बनाए रखूँगा।

१६ वही मेरा बचाव भी होंगे: चूँकि उनके समक्ष कोई ढोंगी नहीं आएगा।

१७ मेरी बोली कर्मठता से सुनो, और अपने कानो से मेरी घोषणा।

१८ देखलो अब, मैंने अपने अभियोग को व्यवस्थित कर दिया है; मैं जानता हूँ कि मैं न्यायोचित ठहरा दिया जाऊँगा।

१९ वो कौन है जो मेरे साथ दलील देगा? चूँकि अभी, यदि मैं चुप कर जाऊँ, तो मैं परान त्याग दूँगा।

२० केवल दो कार्य मेरे साथ मत करना: तब मैं स्वयं को आप से नहीं छुपाऊँगा।

२१ अपने हाथ को मुझ से दूर हटा दें: और अपने आतंक को मुझे भयभीत न करने दें।

२२ तब आप पुकार लेना, और मैं उत्तर दे दूँगा: अथ्वा मुझे बोल लेने दें, और आप ही मुझे उत्तर दे दें।

२३ कितनी हैं जी मेरी अधर्मताएँ और पाप? मेरे अतिचार और मेरे पाप से मुझे परिचित करवा दें।

२४ जी किस कारण वश आप अपना चेहरा छुपा रहे हैं, और मेरी अपने शत्रु में गिनती कर रहे हैं?

२५ क्या आप एक इधर-उधर उड़ते हुए पत्ते को तोड़ डालेंगे क्या? और क्या आप सूखी घास-फूस का पीछा करेंगे क्या/

२६ चूँकि आप तो मेरे विरुद्ध कड़वी बातें लिख रहे हैं, और मुझे मेरे यौवन की अधर्मताओं पर अधिकार दे रहे हैं।

२७ आप मेरे पैरों को भी लक्कड़ में डाल रहे हैं, और तीव्रता से मेरे समस्त पथों को देख रहे हैं; आप मेरे पैरों की एड़ियों पर एक छाप छपवा रहे हैं।

२८ और वो, एक सड़ी हुई वस्तु समान समाप्त हो रहा है, कीड़ों से खा लिए गए वस्त्र के समान।




चौदहवाँ अध्याय।


१ किसी स्त्री से जन्मा मानुष बस कुछ ही दिनो का होता है, और कष्टों से भरपूर।

२ वो तो एक फूल के समान खिल जाता है, और काट दिया जाता है: वो तो एक परछाई के समान भी भाग जाता है, और स्थित नहीं रहता।

३ और क्या आप अपनी आँखें इस ऐसे एक पर खोल रहे हैं, और मुझे अपने साथ न्याय-निर्धारण में ला रहे हैं/

४ कौन किसी अस्वच्छ में से स्वच्छ बाहर निकाल सकता है? कोई भी नहीं।

५ ये देखते हुए कि उसके दिन तो निर्धारित हैं, उसके महीनो की संख्या आपके साथ है, आप उसकी सीमा रेखा नियुक्त कर चुके हैं कि वो पार नहीं का सकता;

६ मुड़ जाएँ उस से, ताकि वो विश्राम ले ले, जब तक कि वो पूर्ण न कर दे, एक भाड़े पर लिए हुए समान, अपना दिन।

७ चूँकि एक पेड़ के लिए आशा रहती है, यदि वो काट दिया जाए, कि वो पुनः उग जाए, और कि उसकी कोमल डाली समाप्त नहीं होगी।

८ भले ही उसकी जड़ पृथ्वी में जीर्ण होती चली जाए, और उसका तना धरती में मर जाए;

९ तथापी जल की गन्ध से ही वो पनप उठेगा, और एक पौधे समान डालें उभार देगा।

१० परन्तु मानुष मर रहा है, और क्षय होता चला जा रहा है: हाँ भई, पुरुष तो प्राण त्याग रहा है, और कहाँ है वो?

११ जिस प्रकार पानी समुद्र से विफल हो जाते हैं, और वो नदी क्षीण होती हुई सूख जाती है:

१२ इसी प्रकार आदमी लेट जाता है, और उठता नहीं है: जब तक कि वो स्वर्ग नहीं रहेंगे, वो जागेंगे नहीं, न ही उनकी निद्रा में से जगाए जाएँगे।  

१३ ओह कि आप मुझे कब्र में ही छुपा दें, कि आप मुझे गुप्त ही रख दें, जब तक कि आपका आक्रोश बीत नहीं जाता, कि आप मुझे एक स्थित समय नियुक्त कर दें और मुझे स्मरण में रखें!

१४ यदि मानुष मर जाए, तो क्या वो पुनः जीएगा क्या? अपने नियुक्त समय के समस्त दिनो में में प्रतीक्षा करता रहूँगा, जब तक मेरा परिवर्तन नहीं आ जाएगा।

१५ आप पुकारेंगे, और मैं आपको उत्तर दे दूँगा: आपको अपने हाथों के कार्य के प्रति लालसा होगी।

१६ क्योंकि अभी तो आप मेरे पद-चापों को गिन रहे हैं: क्या आप मेरे पाप पर पहरेदारी नहीं कर रहे हैं क्या?

१७ मेरा अतिचार एक थैले में कस कर बँद है, और आप मेरी अधर्मता को सी रहे हैं।

१८ और अवश्य ही वो गिरता हुआ पर्वत शून्यता तक ही पहुँच जाता है, और वो चट्टान उसके स्थान में से हिला दी जाती है।

१९ वो पाने उन पत्थरों को घिस डालते हैं: आप उन वस्तुओं को धो डालते हैं जो धरती ही धूल में से उग जाती हैं; और आप मानुष की आशा को नष्ट कर डालते हैं।

२० आप उसके विरुद्ध सदा के लिए प्रबल ठहरे रहते हैं, और वो चलता चला जाता है: आप उसके मुखमंडल को बदल के उसे परे भिजवा देते हैं।

२१ उसके बेटे सम्मानित होते हैं, और वो ये नहीं जानता है; और वो नीचे ले आए जाते हैं, परन्तु उसे इसका उनके विषय में आभास नहीं होता।

२२ परन्तु उस पर उसके शरीर को पीड़ा मिलेगी, और उसके भीतर उसकी आत्मा शोक मनाएगी।



पन्द्रहवाँ अध्याय।


१ तब एलिफ़ज उस तेमान-वंशज ने उत्तर दिया और कहा,

२ क्या किसी विद्वान पुरुष को व्यर्थ ज्ञान बोलना चाहिए, और अपने पेट को पूर्वी वायु से भर लेना चाहिए क्या?

३ क्या उसे अलाभकारी वार्तालाप से विचार-विमर्श करना चाहिए क्या? या उन अर्णनों से जिन से वो कोई भी भलाई नहीं कर सकता है?  

४ हाँ भई, तुम तो भय को परे पटक रहे हो, और ईश्वर के समक्ष प्रार्थना पर प्रतिरोध लगा रहे हो।

५ क्योंकि तुम्हारा मुँह तुम्हारी अधर्मता बतला रहा है, और तुम चालाकों की जीभ चुन रहे हो।

६ मैं नहीं, तुम्हारा अपना ही मूँह तुम्हें दण्डनीय-घोषित कर रहा है: हाँ भई, तुम्हारे अपने ही होंठ तुम्हारे विरुद्ध गवाही दे रहे हैं।

७ क्या तुम सबसे प्रथम व्यक्ति हो जिसने जन्म लिया था? या फिर क्या तुम पहाड़ियों से पूर्व निर्मित कर दिए गए थे क्या?

८ क्या तुमने ईश्वर के रहस्य को सुना है क्या? और क्या तुम विद्या पर अपने प्रति ही प्रतिरोध लगा रहे हो?

९ तुम क्या जानते हो, जो हम नहीं जानते? तुम क्या समझते हो जो हम में नहीं है?

१० हमारे साथ तो दोनो सफेद बाल लिए और बहुत ही वृद्ध पुरुष हैं, तुम्हारे पिता से भी बहुत वृद्ध।

११ क्या ईश्वर की सान्त्वनाएँ तुम्हारे साथ छोटी सी ही हैं क्या? क्या तुम्हारे पास कोई रहस्यमई बात है क्या?

१२ तुम्हारा हृदय तुम्हें परे क्यों हटा रहा है? और तुम किस पर अपनी आँख मार रहे हो भई,

१३ कि तुम अपने प्राण को ईश्वर के विरुद्ध मोड़ रहे हो, और ऐसे शब्दों को अपने मूँह से बाहर निकलने दे रहे हो?

१४ मानुष क्या है, कि उसे विमल होना चाहिए? और वो जो स्त्री से जन्मा हो, कि उसे नेक होना चाहिए?

१५ देखो तो, वो तो अपने सन्तों में कोई भरोसा नहीं रखते; हाँ भई, वो स्वर्ग उनकी दृष्टि में विमल नहीं हैं।

१६ तो पुरुष और कितना अधिक घृणात्मक और मलिन है भई, जो अधर्मता को पानी के समान पीता रहता है?

१७ मैं बतलाता हूँ तुम्हें, सुन लो मुझे; और वो जो मैंने देख लिया है मैं घोषित करता हूँ;

१८ किन विद्वान जनों ने अपने पित्रों से लेकर बखान किया है, और उसे छुपाया नहीं है:

१९ जिन्हें अकेले ही पृथ्वी प्रदान कर दी गई थी, और कोई भी परदेशी उनके बीच से नहीं गुज़रा था।

२० वो दुष्ट अपने समस्त दिन पीड़ा से छटपटाता रहता है, और वर्षों की गिनती उस अत्याचारक के प्रती छिपी रहती है।

२१ एक भयंकर ध्वनि उसके कानो में होती है: उन्नती में वो विनाशक उन पर आ पड़ेगा।

२२ वो विश्वास नहीं करता कि वो अन्धकार में से बाहर वापस लौट आएगा, और एक तलवार उसके लिए प्रतीक्षा में बैठी रहती है।

२३ वो रोटी के लिए बाहर भटकता रहता है, कहता हुआ, भई कहाँ है वो? वो जानता है कि अन्धकार का वो दिन उसके निकट ही उद्यत है।

२४ कष्ट और संताप उसे भयभीत कर देंगे; वो उसके विरुद्ध प्रबल ठहरेंगे, रण के लिए ही उद्यत एक राजा के समान।

२५ चूँकि वो ईश्वर के विरुद्ध ही अपना हाथ बाहर फैला रहा है, और उन सर्वबलशाली के विरुद्ध ही स्वयं को सशक्त कर रहा है।

२६ वो उन की ओर भाग पड़ता है, उनकी गर्दन पर ही, उनकी ढालों की मोटी-मोटी घुंडियों पर ही:

२७ चूँकि उसने अपने चहरे पर चर्बी चढ़ाई हुई है, और अपनी कटियों पर चर्बी का मोटापा थोप रखा है।

२८ और वो उजाड़ नगरों में निवास करता है, और उन घरों में जिन में कोई भी नहीं बसता, जो ढेर बन जाने हेतु तैयार हैं।

२९ वो धनी नहीं बनेगा, न ही उसकी सम्पत्ती बनी रहेगी, न ही वो उसकी परिपूर्णता को पृथ्वी बार लम्बा खींचेगा।

३० वो अन्धकार में से बाहर नहीं प्रस्थान करेगा; वो अग्नी-लपट उसकी डालियों को सूखा देगी, और उसके मूँह के श्वास से ही वो परे हट चला जाएगा।   

३१ उसे जो भ्रमित है व्यर्थता में भरोसा नहीं रखना चाहिए: चूँकि व्यर्थता ही उसे चुका दी जाएगी।

३२ वो उसके समय से पूर्व ही पूर्ण हो जाएगा, और उसकी डाल हरी नहीं होगी।

३३ वो अपने कच्चे अंगूर को लता के जैसे ही झाड़ डालेगा, और उस जैतून के जैसे अपने फूल को पटक डाल देगा।

३४ चूँकि उन ढ़ोंगीयों की सभा उजाड़ बन जाएगी, और अग्नी उन रिश्वत के तम्बुओं का भुख-भक्षण कर डालेगी।

३५ वो अनिष्टता का गर्भाधान करते हैं, और व्यर्थता को जन्म दे देते हैं, और उनका पेट चल-कपट तैयार करता है।



सोलहवाँ अध्याय।


१ तब अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा,

२ मैंने कई ऐसी बातें सुनी हैं: दयनीय सांत्वना दाता हो तुम सब।

३ क्या व्यर्थ शब्दों का अन्त होगा क्या? या फिर क्या भड़का रहा है तुम्हें कि तुम उत्तर दे रहे हो भई?

४ मैं भी तुम्हारे समान ही बोल सकता हूँ: यदि तुम्हारी आत्मा मेरी आत्मा के स्थान में होती, तो मैं तुम्हारे विरुद्ध अपने शब्दों का ढेर खड़ा कर देता, और अपना सर तुम्हारे प्रति हिला डालता।

५ लेकिन मैं तो तुम्हें अपने मूँह से सशक्त करता, और मेरे होठों की सांत्वना तुम्हारा दुःख घटा देती।

६ भले ही मैं बोल रहा हूँ, मेरा दुःख घटा नहीं है: और भले ही मैं रुका हुआ हूँ, क्या चैन मिला मुझे?

७ परन्तु अब तो उन्होंने मुझे थका दिया है: आपने ही मेरी समस्त संगती उजाड़ बना डाली है।

८ और आपने ही मुझे झुर्रियों से भर दिया है, जो मेरे विरुद्ध एक साक्ष्य है: और मेरी दुर्बलतता मुझ में उठती हुई मेरे चहरे के प्रती साक्ष्य दे रही है।

९ वो अपने आक्रोश में मुझे फाड़ रहा है, जो मुझ से घृणा कर रहा है: वो मुझ पर अपने दाँत पीस रहा है; मेरा शत्रु अपनी आँखें मुझ पर तेज़ कर रहा है।

१० वो मुझे अपने मूँह से ताड़ रहे हैं; उन्होंने लड़ते-झगड़ते हुए मेरे गाल पर थप्पड़ मारे हैं; उन्होंने स्वयं को एक साथ मेरे विरुद्ध एकत्रित कर लिया है।

११ ईश्वर ने मुझे ईश्वर-भक्तिहीनों को प्रदान कर दिया है, और मुझे दुष्टों के हाथों में प्रदान कर दिया है।

१२ मैं तो चैन से था, लेकिन उन्होंने मुझे तोड़ डाला है: उन्होंने मुझे मेरी गर्दन से भी पकड़ रखा है, और मुझे टुकड़ों-टुकड़ों में फोड़ डाला है, और मुझे एक अपने निशाने के लिए खड़ा कर दिया है।

१३ उनके धनुर्धारी मुझे चारों ओर से घेरे हुए हैं, वो मेरे कलेजे को काट रहे हैं, और बक्श नहीं रहे हैं; वो तो मेरे पित्त को ही धरती पर उँडेल रहे हैं!

१४ फूट पर फूट डाल कर वो मुझे फोड़ रहे हैं, वो मुझ पर एक विशालकाय-मानुष समान दौड़ रहे हैं।

१५ मैंने तो अपनी चर्म पर टाट-वस्त्र को सी लिया है, और अपने सींघ को धूल-मिट्टी में दूषित कर दिया है।

१६ मेरे चेहरा रोने-धोने से बिगड़ चुका है, और मेरी पलकों पर मृत्यु की परछाई है;

१७ मेरे हाथों में किसी अन्याय के कारण नहीं: मेरी प्रार्थना भी विमल है।

१८ हे पृथ्वी, मेरे लहू को मत ढक, और मेरी चीख-पुकार को कोई स्थान मत रखने दे।

१९ और अब ही, मेरा साक्ष्य स्वर्ग में है, और मेरा अभिलेख उच्चत्व में है।

२० मेरे मित्र हँसी उड़ा रहे हैं मेरी: परन्तु मेरी आँख ईश्वर की ओर आँसू उँडेल रहे है।

२१ हाय कि कोई ईश्वर के साथ एक आदमी के लिए दलील पेश कर दे, जैसे कि कोई अपने पड़ौसी के लिए दलील पेश करता है!

२२ कुछ ही वर्षों के आ जाने पर, मैं उस पथ पर चला जाऊँगा जहाँ से मैं वापस नहीं लौटूँगा।



सत्रहवाँ अध्याय।


१ मेरा श्वास भ्रष्ट है, मेरे दिन विलुप्त हो चुके हैं, वो क़ब्रें मेरे लिए तैयार हैं।

२ क्या मेरे साथ हँसी उड़ाने वाले नहीं हैं क्या? और क्या मेरी आँख उनके भड़काने पर नहीं लगी हुई है क्या?

३ रख दें नीचे, मुझे अपने साथ प्रतिभूति में ले आएँ; वो कौन है जो मेरे साथ हाथ मिलाएगा?

४ चूँकि आपने उनके हृदय को प्रज्ञा से छुपा दिया है: इसलिए आप उन्हें पदोन्नत नहीं करेंगे।

५ वो जो अपने मित्रों के साथ चापलूसी-चुग़लखोरी करता है, उसकी सन्तानों की आँखें ही विफल हो जाएँगी।

६ उन्होंने तो मुझे लोगों के लिए एक खिल्ली भी बना डाला है; और पहले तो मैं एक ढपली जैसा था।

७ दुःख के कारण मेरी आँख भी मन्दी हो चली है, और मेरे समस्त अँग परछाई समान ही।

८ निष्कपट पुरुष इस पर अचम्भा करेंगे, और वो निर्दोष स्वयं को उस ढोंगी के विरुद्ध सक्रीय कर उठेगा।

९ वो नेक भी अपने पथ को पकड़े रहेगा, और वो जिसके हाथ विमल हैं प्रबल ही प्रबल होता चला जाएगा।

१० परन्तु जहाँ तक तुम सब की बात आती है, वापस लौट आओ, और आ जाओ अभी ही: चूँकि मैं तुम्हारे बीच कोई भी विद्वान नहीं पा सकता हूँ।

११ मेरे दिन गुज़र चुके हैं, मेरे उद्देश्य टूट चुके हैं, मेरे हृदय के विचार ही।

१२ वो जने रात को दिन में बदल देते हैं: प्रकाश अन्धकार के कारण कम है।

१३ यदि मैं प्रतीक्षा में रहता हूँ, तो वो कब्र मेरा घर है: मैंने अपनी शय्या अन्धेरे में बना ली है।

१४ मैंने भ्रष्टता से कह दिया है, तू ही मेरा पिता है: उस कीड़े से, तो ही मेरे माता, और बहन है।

१५ और अब कहाँ हैं मेरी आशा? मेरी आशा के समबन्ध में, कौ देखेगा उसे?

१६ वो तो नीचे उस गर्त की सलाख़ों तक चले जाएँगे, जब हमारा एक साथ विश्राम धूल-मिट्टी में हो जाएगा।



अट्ठारहवाँ अध्याय।


१ तब बिल्दद उस शूआ-वंशज ने उत्तर दिया, और कहा,

२ भई और कितनी देर कि तुम अपने शब्दों को रोकोगे? पहले ही सोच लो और फिर हम बोलेंगे।

३ तुम्हारी दृष्टि में किस करण वश हमारी गिनती जानवरों समान, और ख्याति बुरी मानी जा रही है भई?

४ वो तो स्वयं को ही अपने क्रोध में फाड़ रहा है: क्या पृथ्वी का तुम्हारे लिए त्याग कर डाल दिया जाए भई? और क्या चट्टान को उसके स्थान में से बाहर हटा दिया जाए भई?

५ हाँ भई, उस दुष्ट के प्रकाश बुझा दिया जाएगा, और उसकी आग की चिंगारी नहीं चमकेगी।

६ उसके तम्बू में उजाला अंधेरा होगा, और उसका दीपक उसी के साथ ही बुझा दिया जाएगा।

७ उसकी पदचापों की शक्ती संकीर्ण कर दी जाएगी, और उसके स्वयं का ही परामर्श उसे नीचे पटक डालेगा।

८ चूँकि वो तो अपने ही पैरों द्वारा एक जाल में फैंक दिया गया है, और वो एक जंजाल पर ही चल रहा है। 

९ वो फन्दा ही उसे एड़ी से पकड़ लेगा, और वो डकैत उसके विरुद्ध प्रबल ठहर जाएगा।

१० धरती पर ही उसके लिए जाल बिछा दिया गया है, और एक पिंजरा उसके लिए पथ पर ही।

११ आतंक उसे चारों ओर से भयभीत कर डालेंगे, और उसे उसके पैरों पपर दौड़-भाग देंगे।

१२ भूख की काट उसकी शक्ती काट डालेगी और विनाश उसके साथ-साथ उद्यत रहेगा।

१३ वो उसकी चमड़ी के बल को ही खा डालेगा: मृत्यु का ही वो प्रथम-जन्मा उसकी शक्ती का भुख-भक्षण कर डालेगा।

१४ उसके भरोसा उसके तम्बू में से बाहर उखाड़ दिया जाएगा, और वो उसे आतंकों के राजा के पास तक ले आएगा।

१५ वो तो उसके तम्बू में वास करेगा, चूँकि वो तो उसका रहा ही नहीं: गन्धक उसके बसेरे पर बखेर दिया जाएगा।

१६ उसकी जड़ें नीचे सूख जाएँगी, और ऊपर उसकी डालियाँ काट दी जाएँगी।

१७ पृथ्वी पर से उसका स्मरण नष्ट हो जाएगा, और उसके पास सड़क पर कोई भी नाम नहीं होगा।

१८ उसे उजाले से अन्धकार में खदेड़ दिया जाएगा, और संसार से भगा दिया जाएगा।

१९ उसके लोगों के बीच उसके पास तो न ही बेटा होगा न ही वंशज, न ही कोई भी उसके बसेरों में बचा रहेगा।

२० वो जो उसके बाद आएँगे उसके दिन पर अचम्भा मनाएँगे, उसी प्रकार जैसे पहले जाने वाले डर मनाते जाते गए।

२१ अवश्य ही उस दुष्ट के ऐसे ही घर होते हैं, और यही उसका स्थान है जो ईश्वर को नहीं जानता।



उन्नीसवाँ अध्याय।


१ तब अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा,

२ तुम और कितनी देर तक मेरी आत्मा को व्यग्रित करते रहोगे, और मुझे शब्दों से टुकड़ों-टुकड़ों में तोड़ते रहोगे?

३ इन दस बार तुमने मुझे डाँटा है: तुम्हें लज्जा नहीं आ रही है कि तुम स्वयं को मेरे प्रति एक परदेशी बना रहे हो।

४ और यदि वास्तव में ऐसा ही हो कि मैंने त्रुटि कर डाली हो, तो मेरी त्रुटि मेरे साथ ही रह रही है।

५ यदि वास्तव में ही तुम स्वयं को मेरे विरुद्ध आवर्धित करोगे, और मेरी डाँट की मेरे ही विरुद्ध दलील दोगे:

६ तो ये जान लो अभी कि ईश्वर ने ही मुझे उलट-पलट कर डाला है, और मुझे अपने जंजाल से घेर दिया है।

७ देखो, मैं तो हिंसा झेलता हुआ चीख रहा हूँ, लेकिन मेरी सुनवाई नहीं हो रही है: मैं तो प्रबलता से चीख रहा हूँ, परन्तु कोई भी न्याय नहीं किया जा रहा है।

८ उन्होंने तो मेरे पथ पर बाड़ लगा दी है कि मैं पार नहीं जा सकता, और उन्होंने मेरे पथों पर श्यामत्व बिछा दिया है।

९ उन्होंने तो मुझ से मेरा वैभव अनावृत कर दिया है, और मेरे शीर्ष पर से वो मुकुट उतार दिया है।

१० उन्होंने तो चारों ओर से मेरा विनाश कर डाला है, और मैं तो विदा हो चला हूँ: और मेरी आशा को उन्होंने एक वृक्ष के समान परे हटा दिया है।

११ उन्होंने तो अपने आक्रोश को भी मेरे विरुद्ध सुलग दिया है, और वो मेरी गिनती अपने प्रति उनके शत्रुओं में से एक में कर रहे हैं।

१२ उनके सैन्य-दल एक साथ आ कर मेरे विरुद्ध अपना पथ खड़ा कर रहे हैं, और मेरे शिविर के चारों ओर पड़ाव डाल रहे हैं।

१३ उन्होंने तो मेरे भाई-जनो को मुझ से दूर कर दिया है, और मेरे परिचित सच-मुच ही मुझ से पृथक कर दिए गए हैं।

१४ मेरे ही कुल-वाले विफल हो गए हैं, और मेरे परिचित मित्र-गण मुझे भूल चुके हैं।

१५ वो जो मेरे घर में रहते हैं, और मेरी नौकरानियाँ, मुझे एक परदेशी गिनते हैं: मैं तो उनकी दृष्टि में एक विदेशी हूँ।

१६ मैंने अपने नौकर को पुकारा, और उसने मुझे कोई भी उत्तर नहीं दिया; मैं उस से अपने मूँह से याचना की।

१७ मेरा श्वास मेरी पत्नी को परदेशी सूझता है, भले ही मैं अपने ही देह की सन्तानों के लिए याचना करता हूँ।

१८ हाँ भई, छोटे बच्चों ने मुझ से घृणा की; मैं उठा, और वो मेरे विरुद्ध बोल पड़े।

१९ मेरे निकट वाले समस्त मित्र-गण मुझ से घृणा करते हैं: और वो जिनसे मैं प्रेम करता था मेरे विरुद्ध मुड़ गए हैं।

२० मेरी हड्डी मेरी चर्म और मेरे माँस से चिपक रही है, और मैं तो अपने दाँतों की त्वचा के साथ बच निकला हूँ!

२१ मुझ पर दया करो, मुझ पर दया करो, हे मेरे मित्रों; चूँकि ईश्वर के हाथ ने मुझे छू दिया है।

२२ तुम मेरा ईश्वर के समान अत्याचार क्यों कर रहे हो भई, और मेरे माँस से सन्तुष्ट नहीं हो?

२३ काश कि मेरे शब्दों को इसी समय ही लिख दिया गया होता! काश कि वो एक पुस्तक में अंकित कर दिए गए होते!

२४ काश कि वो एक लोहे की कलम और सीसे से चट्टान पर सदा के लिए उत्कीर्ण कर दिए गए होते!

२५ चूँकि मैं ये जानता हूँ कि मेरा मुक्ति-भुक्तान करने वाले जीते हैं, और कि वो उस अन्तिम दिन में पृथ्वी पर खड़े होंगे:

२६ और भले ही मेरी त्वचा के पश्चात कीड़े इस देह को नष्ट कर डालें, तब भी मैं अपने देह में ईश्वर का दर्शन करूँगा:

२७ जिनका मैं अपने स्वयं से ही दर्शन करूँगा, और मेरी ही आँखें देखेंगी, और कोई और नहीं; भले ही मुझ में मेरे कलेजे की खपत हो जाए।

२८ परन्तु तुम तो कहोगे, भई हम क्यों इसका अत्याचार करें, ये देखते हुए कि मुझी में ही इस मसली की जड़ पाई जाती है?

२९ तुम तलवार से डर जाओ: चूँकि आक्रोश तलवार के दण्डों को ला रही है, ताकि तुम जान जाओ कि न्याय-निर्धारण होता है।



बीसवाँ अध्याय।


१ तब ज़ोफ़र उस नमा-वासी ने उत्तर दिया और कहा,

२ इसी कारण वश मेरे विचार मुझ से उत्तर दिलवा रहे हैं, और इसके लिए मैं शीघ्रता कर रहा हूँ।

३ मैंने अपनी डाँट की रोक सुन ली है, और मेरी प्रज्ञा का प्राण मुझ से उत्तर दिलवा रहा है।

४ अतीत से क्या तुम ये जानते नहीं हो, जब से मानुष को पृथ्वी पर स्थित कर दिया गया था,

५ कि उस दुष्ट की जय-जयकार लघुतम ही होती हैं, और उस ढोंगी का हर्ष बस क्षणिक ही होता है?

६ भले ही उसके श्रेष्ठता ऊपर स्वर्गों तक सवार हो जाए, और उसका शीर्ष मेघों में पहूँच जाए;

७ तब भी वो सदा के लिए अपनी ही लीद के समान नष्ट हो जाएगा: जो उसे देख चुके होंगे कहेंगे, भई कहाँ है वो?

८ वो तो एक सपने के समान उड़न-छू हो जाएगा, और पाया नहीं जाएगा: हाँ भई, उसे तो रात के एक दृश्य समान ही भगा दिया जाएगा।

९ वो आँख भी जो उसे देख चुकी है उसे अब और नहीं देखेगी; न ही उसका स्थान उसे अब और देखेगा।

१० उसकी सन्तानें दरिद्रों को प्रसन्न करना चाहेंगी, और उसके हाथ उनकी सम्पत्तियाँ पुनः स्थापित कर देंगे।

११ उसकी हड्डियाँ उसके यौवन के पाप से भरपूर हैं, जो उसके साथ ही धूल-मिट्टी में नीचे लेट जाएँगी।

१२ भले ही दुष्टता उसके मूँह में मीठी हो, भले ही वो उसे अपनी जीभ तले छुपाता रहे;

१३ भले ही वो उसे बक्शता रहे, और उसे न त्यागे; बल्कि उसे अपने ही मूँह में अभी भी रखता रहे:

१४ तथापि उसका भोजन उसकी आँतों में मरोड़ उठता है, वो तो फनदार-विषैले नागों का पित्त ही है उसी में।

१५ उसने तो धन-धान्य नीचे निगल लिए हैं, और वो पुनः ही उनका ऊपर वमन कर डालेगा: ईश्वर ही उन्हें उसके पेट में से निष्कासित कर देंगे।

१६ वो तो फनदार-विषैले नागों के विष को चूसेगा: उस विषैले-सर्प की जीभ उसकी हत्या कर डालेगी।

१७ वो मधु और मक्खन की उन नदियों को, उन प्रलयों को, उन धाराओं को नहीं देखेगा।

१८ वो जिसके लिए उसके श्रम किया था वो उसे वापस लौटा देगा, और उसे नीचे नहीं निगलेगा: उसी की ही सम्पत्तीनुसार ही वो क्षतिपूर्ती की जाएगी, और उस में हर्ष नहीं मनाएगा।

१९ चूँकि उसने दरिद्रों पर अत्याचार किया और उनको त्याग दिया; चूँकि उसने हिंसा से एक घर लूट डाला जिसका उसने निर्माण नहीं किया था;

२० अवश्य ही वो अपने पेट में चैन का नहीं आभास करेगा, वो उस में से बचा नहीं पाएगा जिसकी वो इच्छा कर रहा था।

२१ उसके भोजन में से कुछ भी नहीं बचेगा; इसलिए कोई भी उसकी सम्पत्तियों को नहीं देखेगा।

२२ उसकी पर्याप्तता की भरपूरता में ही वो भींचा हुआ होगा: उस पर उस दुष्ट का प्रत्येक हाथ आ पड़ेगा।

२३ जब वो अपना पेट भरने ही वाला होगा, तो अपने आक्रोश के ताप को उस पर पटक डालेंगे, और उसके खाते-खाते उसे उस पर बरसा डालेंगे।

२४ वो उस लोगे के शस्त्र से भाग जाएँगे, और इस्पात का वो धनुष उसे आर-पार भेड़ डालेगा। 

२५ वो खींचा जा रहा है, और उसके देह में से बाहर निकल आ रहा है; हाँ भई, वो चमचमाती हुई तलवार उसके पित्त में से बाहर निकल रहे है: आतंक आ पड़े हैं उस पर!

२६ समस्त अंधेरा उसके गुप्त स्थानो में गुप्त रहेगा: बिन फूँकी हुई आग उसका भक्षण कर डालेगी; उसके साथ बुरी बीतेगी जो उसके तम्बू में बचा रह गया है।

२७ स्वर्ग उसकी अधर्मता को प्रत्यक्ष कर देगा; और पृथ्वी उसके विरुद्ध उठ जाएगी।

२८ उसके घर की वृद्धी विदा हो चलेगी, उनके आक्रोश के दिवस में बहती चली जाएगी।

२९ यही ईश्वर द्वारा उस दुष्ट आदमी का वो हिस्सा होगा, और ईश्वर द्वारा उसे नियुक्त वो विरासत।



इक्कीसवाँ अध्याय।


१ परन्तु अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा, 

२ मेरी बोली को कर्मठता से सुनो, और इसे तुम्हारी सान्त्वनाएँ बन जाने दो।

३ झेल लो मुझे ताकि मैं बोल लूँ; और मेरे बोल लेने के पश्चात, हँसी उड़ाते रहना।

४ जहाँ तक मेरी बात आती है, क्या मैं आदमी से शिकायत कर रहा हूँ? और यदि ये ऐसा ही होता, तो मेरा प्राण क्यों विचलित न हो भई?

५ अंकित कर लो मुझे, और अचम्भित हो जाओ, और अपने मूँह पर हाथ रख दो।

६ जब मैं स्मरण में ही लाता हूँ तो मैं डर डर जाता हूँ, और कंपन मेरे माँस को पकड़ में ले लेता है।

७ वो दुष्ट किस कारण वश जीते हैं, बूढ़े हो जाते हैं, हाँ भई शक्ती में प्रबल होते हैं?

८ उनका बीज उन्हीं के साथ उनकी की दृष्टि में स्थापित हो जाता है, और उनके वंशज उन्हीं की आँखों के सामने-सामने।

९ उनके घर भय से सुरक्षित हैं, न ही ईश्वर का लट्ठ उन पर आ पड़ा है।

१० उनका साँड गाभिन करता है, और विफल नहीं होता; उनकी गाय जनती है, और अपना बछड़ा परित्यक्त नहीं करती।

११ वो अपने छोटे नन्हों को एक झुंड के समान बाहर भेजते हैं, और उनके बच्चे नाचते हैं।

१२ वो तो ढपली और वीणा उठाते हैं, और मुरली की ध्वनि पर हर्ष मनाते हैं।

१३ वो तो धन-धान्य में अपने दिन व्यतीत करते हैं, और एक ही क्षण में कब्र में चले जाते हैं।

१४ इसलिए वो ईश्वर से कहते हैं, हमारे पास से विदा हो जाएँ; चूँकि हम तो आपके पथों के ज्ञान के इच्छुक नहीं हैं।

१५ कौन हैं वो सर्व-बलशाली कि हम उनकी सेवा करें? और हमारा क्या लाभ होगा यदि हम उनसे प्रार्थना करें?

१६ लो भई, उनकी अच्छाई उनके हाथ में नहीं है: उस दुष्ट का परामर्श मुझ से दूर है।

१७ कितनी बार उस दुष्ट का दीपक बुझाया जाता है? और कितनी बार उनका विनाश उन पर आ पड़ता है? वो अपने क्रोध में दुखों का वितरण करते हैं।

१८ वो तो वायु के समक्ष चारे के समान हैं, और उस भूसे के समान जिसे आँधी उड़ा ले जाती है।

१९ ईश्वर उनकी अधर्मता उनकी सन्तानों के लिए बिछा देते हैं: वो भुक्तान कर देंगे उसका, और वो ये जान जाएगा।

२० उनकी आँखें उसका विनाश देखेंगी, और वो उन सर्वबलशाली के आक्रोश में से पीएगा।

२१ चूँकि उसके पास क्या आनन्द होगा उसके घर में उसके पश्चात, जब उसके महीनों की संख्या बीच में ही काट दी गई है?

२२ क्या कोई भी ईश्वर को ज्ञान सिखाएगा क्या? ये देखते हुए कि वो उनका न्याय करते हैं जो ऊँचे हैं।

२३ एक तो अपनी भरपूर शक्ती में ही मार जाता है, पूर्णता से शान्ति और चैन में होता हुआ।

२४ उसके स्तन दूध से भरे हुए हैं, और उसकी हड्डियाँ मज्जा से भीगी हुई हैं।

२५ और एक और अपनी ही आत्मा की कड़वाहट में चल बसता है, और कभी भी ख़ुशी-खुशी नहीं खाता।

२६ वो एक समान ही धूल-मिट्टी में लेट जाएँगे, और वो कीड़े उन्हें ढक देंगे।

२७ देख लो भई, मैं तुम्हारे विचारों से, और उन योजनाओं से जिनकी तुम मेरे विरुद्ध अन्यायपूर्वकता से कल्पना कर रहे हो, परिचित हूँ।

२८ चूँकि तुम तो कह रहे हो, अध्यक्ष का घर कहाँ है? और उन दुष्टों के निवास स्थान कहाँ हैं?

२९ क्या तुमने उन से नहीं पूछा तो पथ पर से चलते जा रहे हैं? और क्या तुम उनके चिन्हों से परिचित नहीं हो क्या,

३० कि वो दुष्ट तो उस विनाश के दिवस पर्यत संरक्षित है? वो तो उस आक्रोश के दिवस तक आगे ले आए जाएँगे।

३१ कौन उसका पथ उसी के मूँह पर घोषित करेगा? और कौन उसे चुकाएगा जो उसने कर डाला है?

३२ तब भी वो कब्र तक ले आया जाएगा, और मक़बरे में ही रहेगा।

३३ घाटी की मिट्टी के रोड़े उसे मीठे लगेंगे, और प्रत्येक व्यक्ति उसके पीछे-पीछे खिंचता चला जाएगा, जैसे की अनगिनत उसके आगे-आगे।

३४ तो फिर तुम मुझे व्यर्थता से कैसे सान्त्वना दे रहे हो, ये देखते हुए कि तुम्हारे उत्तरों में झूठ रहता है?





बाईसवाँ अध्याय।


१ तब एलिफ़ज उस तेमान-वंशज ने उत्तर दिया और कहा,

२ क्या कोई ईश्वर के प्रति लाभकारी हो सकता है, जैसे की वो जो विद्वान है अपने स्वयं के प्रति लाभकारी हो?

३ क्या वो सर्वबलशाली कतई भी आनन्द मनाते हैं कि तुम नेक हो? या फिर क्या उन्हें कोई लाभ मिलता है कि तुम अपने पथों को परिपूर्ण बना रहे हो?

४ क्या वो तुमसे से डर कर तुम्हें सुधारेंगे क्या? क्या वो तुम्हारे साथ न्याय करने हेतु तुम्हारे साथ प्रवेश करेंगे क्या?

५ क्या तुम्हारी दुष्टता विशाल नहीं है क्या? और तुम्हारी अधर्मताएँ असीम?

६ चूँकि तुमने तो अपने भाई से यूँ ही रेहन ले लिया है, और उन नंगों पर से उनके कपड़े उतार लिए हैं।

७ तुमने उस थके-माँदे को पीने के लिए पानी नहीं दिया, और तुम ने उस भूखे से रोटी रख कर रखी।

८ परन्तु जहाँ तक उस बलशाली आदमी की बात आती है, उसी के पास थी ये धरती; और वो सम्मानित व्यक्ति उस में बसता था।

९ तुम ने तो विधवाओं को खाली हाथ परे भेज दिया, और उन निःसन्तानों की बाहें तोड़ दी गई हैं।

१० इसलिए फन्दे तुम्हारे चारों ओर हैं, और अचानक भय तुम्हें सता रहा है;

११ या अन्धेरा, कि तुम देख भी नहीं सकते; और पानियों की बहुतायत तुम्हें ढकी हुई है।

१२ क्या ईश्वर स्वर्ग की ऊँचाई में नहीं हैं क्या? और देख लो उन सितारों की ऊँचाई को, भई कितने ऊँचे हैं वो!

१३ और तुम कहते हो, ईश्वर कैसे जानते हैं? क्या वो उस काले बादल से आर-पार न्याय कर सकते हैं क्या?

१४ घने बादल उन्हें ढके हुए हैं, कि वो देख नहीं सकते; और वो स्वर्ग की परिक्रमा में चलते हैं।

१५ क्या तुमने उस पुरातन पथ को अंकित कर लिया है क्या जिसे उन दुष्ट जनों ने रौंदा था?

१६ जिन्हें असमय ही नेचे काट दिया गया था, जिनकी नीव पर एक प्रलय बह गया था:

१७ जिन्होंने ईश्वर से कहा, विदा हो लो हमारे पास से: और उनके लिए वो सर्वबलशाली क्या कर सकते हैं?

१८ तथापि उन्होंने उनके घरों को भलाई से भर दिया: लेकिन उन दुष्टों का परामर्श मुझ से दूर है।

१९ वो नेक देखते हैं उसे, और प्रसन्नता मनाते हैं: और वो निर्दोष उनके प्रति उपहास करता है।

२० जबकि हमारी सम्पत्ती काटी नहीं जाती, परन्तु उनका शेष बचा-कुचा वो अग्नी खा रही है।

२१ अब उनके साथ मेल-मिलाप कर लो, और शान्ति से रहो: तो इस प्रकार तुम्हारे पास भलाई आ जाएगी।

२२ मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि उनके मूँह से नियम ग्रहण कर लो, और उनके शब्दों को अपने हृदय में बिठा लो।

२३ यदि तुम उन सर्वबलशाली के पास वापस लौट आओगे, तो तुम्हारा निर्माण हो जाएगा, तुम अपने तम्बुओं से अधर्मता को बहुत दूर परे हटा दोगे।

२४ तब तुम सोने को धूल के समान रख लोगे, और ओफिर के सोने को नदियों के पत्थरों समान।

२५ हाँ भई, वो सर्वबलशाली तुम्हारी सुरक्षा होंगे, और तुम्हारे पास बहुतेरी चाँदी होगी।

२६ ताकि तब तुम्हारे पास उन सर्वबलशाली में तुम्हारा आनन्द होगा, और तुम अपना चेहरा ईश्वर की ओर उठाओगे।

२७ तुम उनसे अपनी प्रार्थना करोगे, और वो तुम्हें सुन लेंगे, और तुम अपने प्रण चुका दोगे।

२८ तुम किसी बात का निर्णय करोगे, और वो तुम्हारे लिए स्थापित कर दी जाएगी: और वो उजाला तुम्हारे पथों पर चमकेगा।

२९ जब लोग निराश होंगे, तब तुम कहोगे, उत्थान हो जाता है; और वो उस विनम्र व्यक्ति को बचा लेंगे।

३० वो निर्दोष के द्वीप को बचा निकाल लेंगे: और वो तुम्हारे हाथों की विमलता से बच निकलेगा।



तेईसवाँ अध्याय।


१ तब अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा,

२ यहाँ तक कि आज ही मेरी शिकायत कड़वी है: मेरी पीट मेरे कराहने से भी भारवत है।

३ ओ कि मैं जानता होता कि मैं उन्हें कहाँ ढूँढ पाता! ताकि मैं उनके आसन तक भी आ पाता!

४ मैं अपनी दलील उनके समक्ष व्यवस्थित करता, और अपने मूँह को सफ़ाईयों से भर देता।

५ मैं उन शब्दों को जानता होता जो वो मुझे उत्तर में देंगे, और समझ जाता कि वो मुझसे क्या कहेंगे।

६ क्या वो मेरे विरुद्ध अपने महा शक्ती के साथ दलील पेश करेंगे क्या? नहीं; बल्कि वो तो मुझ में शक्ती डाल देंगे।

७ वहीं वो नेक उनके साथ वाद-विवाद कर सकेगा; तो मेरा सदा के लिए अपने न्यायाधीष से उद्धार हो जाएगा।

८ देखो, मैं आगे जाता हूँ, लेकिन वो वहाँ नहीं हैं; और पीछे, लेकिन मैं उनका आभास नहीं कर पाता:

९ बाएँ हाथ पर, जहाँ वो क्रियाशील हैं, परन्तु मैं उन्हें नहीं देख सकता: वो तो स्वयं को दाहिने हाथ पर छुपा लेते हैं, कि मैं उन्हें नहीं देख सकता:

१० परन्तु वो उस पथ को जानते हैं जिसे मैं लेता हूँ: जब वो मेरी परीक्षा ले चुकेंगे, तो मैं सोने के समान खरा निकलूँगा।

११ मेरे पैर ने अपने पद-चाप पकड़े हुए हैं, उन्हीं के पथ को मैंने रखा हुआ है, और परे नहीं मुड़ा हूँ।

१२ न ही मैं उनके होटों के आदेश से पीछे हटा हूँ; मैंने तो उनके मूँह के शब्दों का सम्मान मेरे आवश्यक भोजन से भी अधिक किया है।

१३ परन्तु उन्होंने तो एक ही मन बनाया हुआ है, और कौन उन्हें मोड़ सकता है? और जो भी उनकी आत्मा चाहती है, वही वो कर देते हैं।

१४ चूँकि वही वो बात क्रियान्वित करते हैं जो मेरे लिए नियुक्त है: और ऐसी ही कई बातें उनसे सम्बंधित हैं!

१५ इसलिए ही मैं उनकी उपस्थिति से विचलित हो जाता हूँ: जब मैं विचार करता हूँ, तो मैं उनसे डर जाता हूँ।

१६ चूँकि ईश्वर मेरे हृदय को कोमल बनाते हैं, और वो सर्वबलशाली मुझे विचलित करते हैं:

१७ चूँकि मुझे अन्धकार के सामने नहीं काटा गया था, न ही उन्होंने अन्धकार को मेरे चेहरे से ढका है।


चौबीसवाँ अध्याय।


१ ये देखते हुए कि उन सर्वबलशाली से समय छिपे हुए नहीं हैं, तो फिर क्यों वो जो उन से परिचित हैं उनके दिन नहीं देख रहे हैं?

२ कुछ सीमा-चिन्हों को हटा देते हैं; वो झुण्डों को हिंसा से लूट कर और उनके चराते हैं।

३ वो उस पिता-हीन के गधे को हाँक ले जाते हैं, वो उस विधवा के गधे को रेहन के लिए ले जाते हैं।

४ वो उस ग़रीब को रस्ते पर से परे हटा देते हैं: धरती के वो दरिद्र स्वयं को एक साथ छुपा लेते हैं।

५ देखो तो, जँगली-क्षेत्र में उन जँगली गधों के समान, वो अपने काम पर निकल जाते हैं; सुबह-सुबह शिकार ढूँढते हुए: वो जँगली-क्षेत्र उनके लिए और उनके बच्चों के लिए भोजन उतपन्न करता है।

६ वो प्रत्येक अपने अनाज की खेत में फसल-कटाई करता है: और वो अंगूर-खेत से दुष्टों के बीनने का काम करते हैं।

७ वो उन नंगों को बिना कपड़ों के ही रहने देते हैं, ताकि उनके पास सर्दी में कोई ओढ़ना न हो।

८ वो तो पर्वतों की बौछारों से भीगे हुए हैं, और चट्टान से गले लगे हुए हैं आश्रय के आभाव में।

९ वो तो पिता-हीनों को स्तन पर से छीन डालते हैं, और दरिद्रों का रेहन लेते हैं।

१० वो उसे बिना कपड़ों के ही नंगा चला जाने देते हैं, और वो उस भूखे से गंठल को परे ले जाते हैं;

११ जो उनकी दीवारों के भीतर तेल बनाते हैं, और उनके अंगूर-रस के कोल्हूओं में रौंदते हैं, और प्यासे रहते हैं।

१२ लोग नगर में से कराह रहे हैं, और उस घायल की आत्मा चीख-पुकार मचा रही है: तथापी ईश्वर उन पर दोष नहीं लगा रहे हैं!

१३ वो तो उन में से हैं जो उन प्रकाश के विरुद्ध विद्रोह कर रहे हैं; वो उनके पथों की जानकारी नहीं रखते, न ही उनके पथों पर रहते रहते हैं।

१४ उजाले के उठते वो हत्यारा उस दरिद्र और ग़रीब को मार डालता है, और रात्रि में एक चोर समान बन जाता है।

१५ उस व्यभिचारी की आँख भी साँझ की प्रतीक्षा करती हैं, कहती हुई, कोई भी आँख मुझे नहीं देखेगी: और अपने चहरे का वेष बदल देता है।

१६ कालिमा में ही वो घरों को खोद डालते हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं के लिए दिन-दिन में ही अंकित कर लिया था: वो प्रकाश से परिचित नहीं हैं।

१७ चूँकि प्रातः तो उनके लिए मृत्यु की परछाई समान ही है: यदि कोई उन्हें जानता हो, वो तो मृत्यु की परछाई के आतंकों में ही हैं!

१८ वो तो जलों समान वेगशील है; धरती पर उनका भाग श्रापित है: वो उन अंगूर के खेतों के पथों नहीं देख रहा है।

१९ सूखा और गर्मी उन हिम के जलों को खा जाते हैं: वो कब्र भी उन्हें जिन्होंने पाप कर डाला है।

२० वो गर्भ उसे भूल जाएगा; वो कीड़ा उसे माधुर्य से खाएगा; उसका अब और स्मरण नहीं किया जाएगा; और दुष्टता एक पेड़ समान तोड़ दी जाएगी।

२१ वो न जनने वाली उस बाँझ के साथ बुराई करता है: और उन विधवा के साथ भलाई नहीं करता।

२२ वो तो उस बलशाली को भी अपनी शक्ती से खींच लेता है: वो उठ रहा है, और कोई भी निश्चित नहीं है  अपने जीवन से।

२३ भले ही वो उसे सुरक्षा में रहने हेतु प्रदान कर दिया गया हो, जिस पर वो टिका हुआ है; तदापि उनकी आँखें उनके पथों पर हैं।

२४ उन्हें कुछ ही समय के लिए पदोन्नत कर दिया जाता है, लेकिन वो चले जाते हैं और नीचे ले आए जाते हैं; उन्हें पथ पर से बाहर हटा दिया जाता है सभी अन्यों के समान, और वो अनाज की बालियों की चोटियों के समान काट दिए जाते हैं।

२५ और अभी ही यदि ऐसा न होता हो, तो मुझे कौन झूठा सिद्ध करेगा, और मेरे बोली को अमान्य ठहराएगा?



पच्चीसवाँ अध्याय।


१ तब बिल्दद उस शूआ-वंशज ने उत्तर दिया, और कहा,

२ अधिराज्य और भय उनके साथ हैं, वो अपने उच्च स्थानों में शान्ति बनाते हैं।

३ क्या उनकी सेनाओं की कोई गिनती है क्या? और भई किस पर उनका प्रकाश नहीं उठता है?

४ तो मानुष फिर ईश्वर के साथ कैसे न्यायोचित बनेगा? या फिर वो विमल कैसे हो सकता है जिसने एक स्त्री से जन्म लिया हो?

५ चंद्रमा को ही देख लो, और वो चमकता नहीं है; हाँ भई, वो सितारे उनकी दृष्टि में शुद्ध नहीं हैं।

६ तो फिर मानुष और कितना कम, को एक कीड़ा है? और मनुष्य का बेटा, जो एक कीड़ा है?



छब्बीसवाँ अध्याय।


१ परन्तु अय्यूब ने उत्तर दिया और कहा,

२ तुमने उस शक्ति-हीन की कैसे सहायता की? तुम उस बल-हीन भुजा का बचाव कैसे करते हो?

३ तुमने उस निर्बुद्ध को किस प्रकार से परामर्श दिया? और कैसे बहुतायतता से उस बात की घोषणा की जैसी भी वो हो?

४ किस से तुमने शब्दों का अर्णन किया? और किसका प्राण तुमसे आया?

५ वो मृत रचाए जाते हैं जलों की नीचे से, और उसके निवासी।

६ नरक उनके समक्ष नग्न है, और विनाश के पास कोई ओढ़ना नहीं है।

७ वो उत्तर को उस रिक्त स्थान पर खींच रहे हैं, और पृथ्वी को निराधार लटका  रखा है।

८ वो अपने घने बादलों में जलों को बाँध कर रखते हैं; और वो बादल उनके तले फटता नहीं है।

९ वो अपने सिंहासन के चहरे को रोक कर रखते हैं, अपने मेघ को उस पर फैला देते हैं।

१० उन्होंने उन पानियों को सीमाओं से घेर कर रखा हुआ है, जब तक वो दिन और रात समाप्त नहीं हो जाते हैं।

११ स्वर्ग के स्तम्भ थरथरा जाते हैं और उनकी डाँट पर अचम्भित हो जाते हैं।

१२ वो अपनी शक्ती से सागर को विभाजित कर देते हैं, और अपनी प्रज्ञा के माध्यम से वो उस अभिमानी पर आर-पार वार कर डालते हैं।

१३ अपने प्राण के द्वारा उन्होंने उन स्वर्गों को सजा-धजा दिया है; उनके हाथ ने उस टेड़े-मेड़े सर्प को रचाया है।

१४ लो भई, यही उनके पथों के अन्श हैं: परन्तु उसके विषय में कितना छोटा सा ही अन्श सुना जाता है? लेकिन उनकी शक्ती की गर्जन को कौन समझ सकता है?



सत्ताईसवाँ अध्याय।


१ इसके अतिरिक्त अय्यूब अपने दृष्टांत को निरन्तर रखता हुआ बोला, 

२ जैसे ईश्वर जीवंत हैं, जिन्होंने मेरा न्याय परे हटा दिया है; और वो सर्वबलशाली, जिन्होंने मेरी आत्मा को व्यग्रित कर दिया है;

३ मुझ में मेरे श्वास के, और मेरे नथुनों में ईश्वर के प्राण के रहते-रहते ही;

४ मेरे होंट दुष्टता नहीं बोलेंगे, न ही मेरी जीभ छल-कपट कहेगी।

५ ऐसा कतई न हो कि मन तुम्हें न्यायोचित ठहराऊँ: मेरे मरते दम तक मैं निष्ठा को अपने से नहीं हटाऊँगा।

६ अपनी नेकी को मैं कस कर पकड़े हूँ, और मैं उसे छोड़ूँगा नहीं: जितने समय के लू भी मैं जीयूँ मेरा हृदय मेरी निंदा नहीं करेगा।

७ मेरे शत्रु को उस दुष्ट के समान बन जाने दो, और वो जो मेरे विरुद्ध उठता है उस अनैतिक के समान ही।

८ चूँकि उस ढोंगी की क्या आशा रही, भले ही उसने लाभ कमा लिया है, जब ईश्वर उसकी आत्मा को परे हटा डालेंगे?

९ क्या वो स्वयं को उन सर्वबलशाली में आनंदित करेगा क्या? क्या वो सदैव ईश्वर को पुकारेगा क्या?

११ भई मैं तुम्हें ईश्वर के हाथ द्वारा शिक्षा प्रदान करूँगा: वो जो उन सर्वबलशाली के साथ है मैं छुपाऊँगा नहीं।

१२ देख लो, तुम सभी ने ही स्वयं उसे देख लिया है; तो फिर तुम सब इस प्रकार एक साथ ही व्यर्थ क्यों हो भई?

१३ यही ईश्वर के साथ उस दुष्ट व्यक्ति का भाग है, और अत्याचारकों की विरासत जो वो उन सर्वबलशाली से ग्रहण कर लेंगे।

१४ यदि उसकी संतानें बहुगुणित हो जाएँ, तो वो तो तलवार के लिए होंगे: और उसके वंशज रोटी से संतुष्ट नहीं होंगे।

१५ वो जो उसके शेष बचे रह जाएँगे मृत्यु में दफ़ना दिए जाएँगे: और उसकी विधवाएँ रोना-धोना नहीं मचाएँगी।

१६ भले ही वो चाँदी का धूल के समान ढेर बना लें, और वस्त्रों को मिट्टी के समान तैयार कर ले;

१७ उसे वो तैयार कर ले, परन्तु वो न्यायोचित उसे पहनेगा, और वो निर्दोष उस चाँदी का विभाजन करेगा।

१८ वो तो एक पतंगे समान ही अपने घर का निर्माण करता है, और एक कुटिया के समान जो वो रखवाला बनाता है।

१९ वो धनवान लेट जाएगा, परन्तु उसे एकत्रित नहीं किया जाएगा: वो अपनी आँखे खोलेगा, और वो नहीं रहेगा।

२० पानियों के समान ही आतंक उसे पकड़ लेंगे, एक तूफ़ान उसे रात्रि में चुरा लेता है।

२१ वो पूर्वी वायु उसे उठाकर परे ले जाती ही, और वो विदा हो जाता है: और जैसे की एक आँधी उसे उसके स्थान में से बाहर पटक डालती है।

२२ चूँकि ईश्वर उस पर ढा डालेंगे, और बक्शेंगे नहीं: वो तो उनके हाथ में से बाहर भाग ही नहीं पाएगा।

२३ लोग उस पर हथेलियों से तालियाँ बजाएँगे, और उसे उसके स्थान से सी-सी करके बाहर कर देंगे।



अट्ठाईस्वाँ अध्याय।


१ अवश्य ही चाँदी के लिए एक खदान होती है, और सोने के लिए एक स्थान जहाँ वो उसे परिशोधित करते हैं।

२ लोहा पृथ्वी में से बाहर निकाला जाता है, और पीतल पत्थर में से।

३ वह अन्धेरे की समाप्ति निश्चित करते हैं, और समस्त परिपूर्णता की छान-बीन करते हैं: श्यामतव की शिलाएँ, और मृत्यु की परछाई।

४ वो प्रलय उस निवासी से फूट पड़ता है; वही जल जिन्हें वो पाँव भूल चुका है: वो तो सूख चले हैं, वो तो लोगों से विदा हो चले हैं।

५ जहाँ तक पृथ्वी की बात आती है, उसी में से रोटी उतपन्न होती है: और उसी के नीचे उलटना-पलटना है मानो की वो अग्नी ही हो।

६ उसके पत्थर नीलम के स्थान हैं: और उसके पास स्वर्ण की धूल है।

७ एक पथ है जिस से कोई भी पंछी परिचय नहीं रखता, और जिसे गिद्ध की आँख ने नहीं देखा है:

८ शेर के शावको उस पर नहीं चले हैं, न ही वो खूँख़ार शेर उस से गुज़रता चला है।

९ वो अपना हाथ चट्टान पर रखते हैं; वह उन पर्वतों को जड़ो से उलट-पलट कर डालते हैं।

१० वो शिलाओं के बीच में से नदियों को काट देते है; और उनकी आँख उस प्रत्येक बहुमूल्य वस्तु को देखती है।

११ वो उन प्रलयों को अतिप्रवाह बन जाने से बाँध कर रखते हैं; और वो बात जो छुपी हुई है वो उजाले में ले आते हैं।

१२ परन्तु विद्या कहाँ पाई जाएगी? और प्रज्ञा का स्थान कहाँ है?

१३ मानुष उसके मूल्य को नहीं जानता; न ही वो जीते हुओं की भूमी में पाई जाती है।

१४ वो गहराई कहती है, वो तो मुझ में नहीं है; और वो सागर कहता है, वो मेरे साथ नहीं है।

१५ वो स्वर्ण से नहीं पाई जा सकती, न ही चाँदी उसके मूल्य के लिए तोली जा सकती है।

१६ उसका मूल्याँकन ओफिर के सोने से नहीं किया जा सकता है, उस बहुमूल्य गोमेद से, या नीलम से।

१७ वो सोना और वो स्फटिक उसके साथ तुल्य नहीं हो सकते: और उसकी महीन सोने के ज़ेवरों से अदली-बदली  नहीं की जा सकती है।

१८ मूँगे या मोतियों का तो ज़िक्र ही नहीं किया जाएगा: चूँकि विद्या का मोल तो माणिकों से अधिक है।

१९ इथियोपिया का पुखराज उसके तुल्य नहीं होगा, न ही उसका मोल कुन्दन के संग लगाया जाएगा।

२० तो फिर कहाँ से आती है विद्या? और कहाँ है प्रज्ञा का वो स्थान?

२१ ये देखते हुए कि वो तो सभी जीवितों से छुपी हुई है, और पवन के पंछियों से बँद की हुई है।

२२ विनाश और मृत्यु  कहते हैं, हमने तो उसकी कीर्ती को अपने कानों से सुना है।

२३ ईश्वर उसके पथ की प्रज्ञा रखते हैं, और वही उसके स्थान से परिचय रखते हैं।

२४ चूँकि वो तो पृथ्वी के अन्तिम छोरों तक देख रहे हैं, और सम्पूर्ण स्वर्ग तले देख रहे हैं;

२५ उन वायुओं के लिए तोल-भार बना देने हेतु; और वो उन पानियों को माप से ही तोलते हैं।

२६ जब उन्होंने वर्षा के लिए एक आज्ञप्ति, और गर्जन की बिजली के लिए एक पथ बनाया:

२७ तब उन्होंने उसे देखा, और उसकी घोषणा कर दी; उन्होंने उसे उद्यत किया, हाँ भई, और उसे खोज निकाला।

२८ और मानुष से उन्होंने कहा, देख ले, प्रभु के भय को, वही विद्या है; और बुराई से विदाई ले लेना ही प्रज्ञा है।



उन्नत्तीसवाँ अध्याय।


१ इसके अतिरिक्त अय्यूब अपने दृष्टान्त में जारी रहा, और कहता रहा,

२ ओ कि मैं उन बीते हुए महीनों जैसों में ही होता, उन्हीं दिनो जैसों में जब ईश्वर ने मुझे परिरक्षित रखा;

३ जब उनके दीपक मेरे शीर्ष पर उज्ज्वलित हुआ करता था, और उन्हीं के उजाले द्वारा ही मैं अन्धकार में से जाया करता था;

४ जैसे मैं अपने यौवन के दिनो में हुआ करता था, जब ईश्वर का रहस्य मेरे तम्बू पर था;

५ जब तो सर्वबलशाली मेरे साथ तभी भी थे, जब मेरी सन्तानें मेरे आस पास theeen;

६ जब मैं अपने कदमों को मक्खन से धोया करता था, और वो चट्टान मेरे लिए तेल की नदियाँ बाहर उँडेल दिया करती थीं;

७ जब मैं नगर में से आगे दरवाज़े पर जाया करता था, जब मैं अपना आसन सड़क पर तैयार किया करता था!

८ वो युवक मुझे देख कर स्वयं को छुपा लिया करते थे: और वो वृद्ध उठ कर खड़े हो जाया करते थे।

९ वो प्रमुख-गण बात-चीत पर लगाम लगा दिया करते थे, और अपने हाथ को अपने मूँह पर रख दिया करते थे।

१० वह कुलीन-गण चुप कर जाते थे, और उनकी जीभ उनके मूँह की छत से चिपक जाया करती थी।

११ जब कान मुझे सुना करता था, तो वो मुझे आशीष दिया करता था; और जब आँख मुझे देखती थी, वो मुझे साक्ष्य दिया करती थी:

१२ चूँकि मैं उन चीखते हुए दरिद्रों को बचा लिया करता था, और उस पिता-हीन को, और उसे जिसके पास कोई भी न था उसकी सहायता करने हेतु।

१३ उसका आशीर्वाद जो नष्ट होने ही वाला था मुझ पर आ पड़ा: और मैंने उस विधवा के मन को खुशी के मारे गाना गवाया।

१४ मैंने नेकी को पहन लिया, और उसने मुझे आवृत कर दिया: मेरा न्याय-निर्धारण एक लबादे और एक मुकुट के समान था।

१५ मैं उस नेत्रहीन के लिए नेत्र था, और उस लँगड़े के लिए मैं पैर था।

१६ मैं उस दरिद्र के प्रति एक पिता था: और वो कारण जिस से मैं अपरिचित था मैं ढूँढ निकालता था।

१७ और उन दुष्टों के जबड़े मैंने तोड़ डाले, और उसके दाँतों में से शिकार चूँट लिया।

१८ तब मैंने कहा, मैं तो अपने ही घौंसले में मर जाऊँगा, और मैं अपने दिनो को रेत के समान बहुगुणित कर लूँगा।

१९ मेरी जड़ उन जलों के साथ-साथ फैल गई थी, और वो ओस सारी रात मेरी डाल पर निवास कर रही थी।

२० मेरी महिमा मुझ में तरो-ताज़ा थी, और मेरा धनुष मेरे हाथ में नया कर दिया गया था।

२१ मुझे लोग सुनवाई दिया करते थे, और रुके रहते थे, और मेरे परामर्श पर शान्त रहा करते थे। 

२२ मेरे बोलों के पश्चात वो दोबारा नहीं बोला करते थे; और मेरी वक्तृता उन पर टपकती थी।

२३ और वो मेरे लिए प्रतीक्षा किया करते थे मानो कि वर्षा के लिए ही; और अपना मूँह चौड़ा खोल दिया करते थे मानो कि उन पिछली वर्षा के लिए ही।

२४ यदि मैं उन पर हँसता था, तो वो ये विश्वास नहीं करते थे; और मेरे मुखमण्डल के प्रकाश को वो पटका नहीं करते थे।

२५ मैं उनके पथ को चुनता था, और प्रमुख बैठा करता था, और सेना में एक राजा समान निवास किया करता था, शोक मनाते हुओं को सान्त्वना देने वाले उस एक के समान।



तीसवाँ अध्याय।


१ परन्तु अब वो जो मुझ से छोटे हैं मेरी खिल्ली उड़ाते हैं, जिनके पिताओं का मैंने अपने झुण्ड के कुत्तों के साथ रखना अस्वीकार कर दिया होता। 

२ हाँ भई, उनके हाथों का बल मुझे क्या लाभ प्रदान करे, जिन में बुढ़ापा नष्ट हो चुका था?

३ कमी और अकाल के कारण वो अकेले थे; उस जँगली-क्षेत्र में भाग जाते हुए बीते हुए समयों में विनष्ट और वीरान।

४ जो अपने भोजन के लिए झाड़ियों के साथ वाले सस्ते-साग की, और झाऊ की जड़ों की कटाई करते हैं।

५ वो तो लोगों के बीच में से बाहर खदेड़ दिए गए थे, वो उनके पीछे-पीछे चीख रहे थे जैसे कि किसी चोर के पीछे-पीछे;

६ घाटियों की दरारों में, धरती की गुफाओं में, और चट्टानों में बस जाने हेतु।

७ उन झाड़ियों के बीच वो रेंक रहे थे; बिच्छू-पौधों के तले ही वो एक साथ एकत्रित हो रहे थे।

८ वो तो मूर्खों की सन्तानें थे, हाँ भई, नीच लोगों के बच्चे: वो तो धरती से भी अधम थे।

९ और अब मैं उनका एक गीत हूँ, हाँ भई, मैं उनकी एक कहावत हूँ!

१० वो तो मुझ से घृणा करते हैं, वो तो मुझ से दूर भाग खड़े होते हैं, और मेरे चहरे पर थूकना नहीं छोड़ते हैं।

११ चूँकि उन्होंने मेरे रस्से को ढीला कर दिया है, और मुझे उत्पीड़ित कर दिया है, तो उन्होंने भी मेरे समक्ष वो लगाम ढीली कर दी है।

१२ मेरे दाएँ हाथ पर वो युवक उठ रहे हैं; वो मेरे पैरों को परे कर रहे हैं, और वो मेरे विरुद्ध उन्हीं के विनाश के पथ खड़े कर रहे हैं।

१३ वो मेरे पथ को बिगाड़ रहे हैं, वो मेरी विपदा को आगे अग्रसर कर रहे हैं, उनकी कोई भी सहायता नहीं कर रहा है!

१४ वो तो मुझ पर एक चौड़ी फूट के समान आ पड़े: उस उजाड़ता में ही उन्होंने स्वयं को लुढ़काया।

१५ आतंक मेरी ओर मुड़ चुके हैं: वो तो वायु के समान मेरी आत्मा का पीछा कर रहे हैं: और मेरा कल्याण एक मेघ के समान गुज़रता चला जा रहा है।

१६ और अब ही मेरी आत्मा मुझ पर बाहर उंडील दी जा रही है; यातना के दिनो ने मुझ पर अपनी पकड़ बना ली है।

१७ रात्रि के समय में मेरी हड्डियाँ मुझ में भेद डाल दी गई हैं: और मेरे कंडरे कोई विश्राम नहीं करते।

१८ मेरे रोग के भीषण बल से मेरा आवरण बदल गया है: वो मुझे बाँधे हुए है मेरे अँगरखे के गिरेबान के समान।

१९ उन्होंने तो मुझे कीचड़-दल-दल में पटक डाला है, और मैं तो धूल और राखों जैसा बन गया हूँ।

२० मैं चीख रहा हूँ आपकी ओर, और आप मुझे सुनवाई नहीं दे रहे हैं: मैं खड़ा होता हूँ, और आप मेरी परवाह नहीं करते।

२१ आप तो मेरे प्रति क्रूर बन चुके हैं: आप अपने शक्तीशाली हाथ के साथ स्वयं मेरे विरुद्ध जा रहे हैं।

२२ आप तो मुझे हवा में उठा रहे हैं; आप तो मुझे उस पर सवारी करवा रहे हैं, और मेरे पदार्थ को घोल रहे हैं।

२३ चूँकि मैं तो जानता हूँ जी कि आप मुझे मृत्यु तक ले आएँगे, और उन समस्त जीवितों के लिए नियुक्त उस घर में।

२४ तब भी वह अपने हाथ को उस कब्र तक नहीं आगे फैलाएँगे, भले ही वो उनके विनाश में चीख-पुकार मचाएँ।

२५ क्या मैंने उसके लिए रोना-धोना नहीं मचाया जो कष्ट में था? क्या मेरी आत्मा उस दरिद्र के लिए दुःख नहीं मना रही थी क्या?

२६ जब मैं अच्छाई को खोज रहा था, तो बुराई मेरे पास आ गई: और जब मैं उजाले की प्रतीक्षा में था, तो अन्धेरा आ गया।

२७ मेरी आँतें उबल उठीं, और टिकी नहीं रहीं: यातना के दिन मेरे आगे आ अज्ञे।

२८ मैं बिना सूर्य के शोक मनाता गया: मैं खड़ा हो गया, और मैं सभा में चीखा।

२९ मैं तो अजगरों के प्रति भाई हूँ, उल्लूओं का एक साथी।

३० मेरी चमड़ी मुझ पर काली है, और मेरी हड्डियाँ गर्मी से जल गई हैं।

३१ मेरी वीणा भी शोक-विलाप बन गई है, और मेरी बँसी उनकी वाणी जो रो-धो रहे हैं।



इकत्तीसवाँ अध्याय।


१ मैंने अपनी आँखों के साथ एक प्रतिज्ञा-पत्र बना लिया;  तो फिर मैं क्यों किसी कुँवारी के बारे में सोचूँ भई?

२ चूँकि ईश्वर का वो कौन सा भाग ऊपर से है? और उन सर्वबलशाली की कौन सी विरासत उच्चात्वों से?

३ क्या दुष्टों को विनाश नहीं मिलता क्या? और अधर्मता के कर्ताओं को एक विचित्र दण्ड?

४ क्या वो मेरे पथों को देख नहीं, और मेरे समस्त पद चापों की गिन नहीं रहे हैं क्या?

५ यदि मैं व्यर्थता से चला हूँ, या फिर मेरा पैर धोखाधड़ी की ओर दौड़ा हो;

६ तो मुझे एक सही तोल पर तोला जाए, ताकि ईश्वर मेरी सत्यनिष्ठा को जान लें।

७ यदि मेरा पैर पथ पर से भटक गया हो, और मेरा हृदय मेरी आँखों के पीछे-पीछे चल पड़ा हो, और यदि कोई भी कलंक मेरे हाथों के साथ चिपक गया हो;

८ तो मुझे बुआई कर लेने दो, और किसी और को खा लेने दो; हाँ भई, मेरे वंशजों को उखाड़ दिया जाने दो।

९ यदि मेरा मन किसी स्त्री द्वारा भ्रमित कर दिया गया हो, या फिर मैंने अपने पड़ौसी के द्वार पर घात लगाई हो;

१० तब मेरी पत्नी को किसी और के लिए पीस लेने देना, और औरों को उसके प्रति झुक जाने देना।

११ चूँकि ये तो एक दारुण अपराध है; हाँ भई, ये तो एक अधर्मता है न्यायाधीषों द्वारा दण्ड दे दी जाने वाली।

१२ चूँकि ये तो एक आग है विनाश तक भुख-भक्षण कर डालने वाली, और वो मेरी समस्त उन्नती को उखाड़ डालेगी।

१३ यदि मैंने अपने नौकर या अपनी नौकरानी के न्याय को धिक्कार दिया हो, जब वो मुझ से झगड़ रहे थे;

१४ तो भई मैं क्या करूँगा जब ईश्वर उठेंगे? और जब वो पूछ-ताछ करेंगे, तो मैं क्या उत्तर दूँगा उन्हें?

१५ क्या उन्होंने जिन्होंने मुझे गर्भ में निर्मित किया था उसे नहीं निर्मित किया क्या? और क्या एक ही ने हमें गर्भ में नहीं रचाया क्या?

१६ यदि मैंने दरिद्रों को उनकी इच्छा से रोक कर रखा हो, या उस विधवा की आँखों को विफल करवाया हो;

१७ या मैंने अपना निवाला अकेले ही खाया हो, और उस पिता-हीन ने उस में से न खाया हो;

१८ चूँकि मेरे युवा-काल से ही लेकर, वो मेरे ही साथ बड़ा हुआ था, मानो कि पिता के साथ ही, और मैंने उस स्त्री का अपनी ही माता के गर्भ से मार्गदर्शन किया है;

१९ यदि मैंने किसी को भी वस्त्रों के आभाव में नष्ट होते देखा हो, या कोई भी दरिद्र बिना ओढ़ने के;

२० यदि उसकी कटियों ने मुझे आशीष न दिया हो, और यदि वो मेरी भेड़ों की ऊन से न गरमाया गया हो;

२१ यदि मैंने अपना हाथ उस पिता-हीन के विरुद्ध उठाया हो, जब मैंने अपनी सहायता को दरवाज़े में देखा हो:

२२ तब मेरी भुजा को मेरी सकंधास्थि से गिर जाने देना, और मेरी भुजा को अस्थि से टूट जाने देना।

२३ चूँकि विनाश मेरे लिए ईश्वर से एक आतँक था, और उनके उच्चत्व के कारण मैं झेल न पाया।

२४ यदि मैंने स्वर्ण को अपनी आशा बना दिया हो, या उस परिशुद्ध स्वर्ण से कहा हो, तू ही मेरा भरोसा है;

२५ यदि मैंने हर्ष मनाया हो चूँकि मेरी धन-सम्पत्ती विशाल थी, और चूँकि मेरे हाथ ने बहुतायत प्राप्त कर ली थी;

२६ यदि मैं सूर्य को जब वो चमक रहा था, या चन्द्रमा अपनी विभा में चलता हुआ देख रहा था;

२७ और मेरा मन चुपके से मोहित हो गया हो, या मेरे ही मूँह ने मेरे हाथ को चूम लिया हो;

२८ यह भी न्यायाधीष द्वारा दण्डित कर देने वाली एक अधर्मता होती: चूँकि मैंने उन ईश्वर को अस्वीकार कर दिया होता जो ऊपर हैं।

२९ यदि मैंने उसके विनाश पर खुशी मनाई हो जो मुझ से घृणा किया करता था, या स्वयं को सक्रीय कर दिया हो जब बुराई ने उसे पा लिया था:

३० न ही मैंने अपने मूँह को पाप करने दिया उसकी आत्मा पर श्राप डलवाने की कामना करने से।

३१ यदि मेरे तम्बू वाले आदमियों ने न कहा होता, ओ कि हमने उसके माँस में से ले लिया होता! हम संतुष्ट नहीं हो सकते।

३२ उस परदेशी ने सड़क पर बसेरा नहीं बसाया: बल्कि मैंने अपने द्वारों को उस यात्री के लिए खोल दिए।

३३ यदि मैंने आदम के समान अपने अतिक्रमों को ढक दिया हो, अपनी ही छाती में अपने अधर्म को छुपाता हुआ: 

३४ क्या मैंने किसी विशाल जनौघ का भय माना, या परिवारों के तिरस्कार ने मुझे आतंकित किया, कि मैं चुप रहा, और द्वार के बाहर नहीं निकला?

३५ आह कि कोई मुझे सुनवाई दे दे! देखो, मेरी वाँछा है कि वो सर्वबलशाली मुझे उत्तर दे दें, और कि मेरे विरोधी ने एक पुस्तक लिख दी होती।

३६ अवश्य ही मैं उसे अपने कन्धे पर ले लेता, और उसे अपने लिए एक मुकुट के समान बाँध देता।

३७ मैं उन्हें अपने पद-चापों की संख्या गोषित कर दूँ; एक राज्यपाल समान मैं उनके निकट चला जाऊँगा।

३८ यदि मेरी भूमी मेरे विरुद्ध चीख मचाए, या फिर इसी प्रकार उसकी रेखाएँ शिकायत करें;

३९ यदि मैंने उसके फलों को बिन पैसों के खाया हो, या मैंने उनके मालिकों की मृत्यु करवा दी हो:

४० तो गेहूँ की जगह ऊँट-कटारों को उग जाने देना, और जौ की जगह गन्दे-पौधों को। अय्यूब के शब्द समाप्त होते हैं।



बत्तीसवाँ अध्याय।


१ तो ये तीन जने अय्यूब को उत्तर देने से रुक गए, चूँकि वो अपनी ही आँखों में नेक था।

२ तब राम के कुल वाले उस बज़-वाले बरेकल के बेटे एलिहू का आक्रोश सुलग उठा था: अय्यूब के विरुद्ध ही उसका आक्रोश सुलग उठा था, चूँकि उसने स्वयं को ईश्वर के बजाय न्यायोचित ठहराया था।

३ उसके तीनों मित्रों के विरुद्ध भी उसका आक्रोश सुलग उठा था, चूँकि वो निरुत्तर रह गए थे, और तथापि अय्यूब को दोषी ठहरा चुके थे।

४ अब एलिहू रुका रहा था जब तक कि अय्यूब बोल चुका था, चूकी वो उस से अधिक आयु के थे।

५ तो जब एलिहू ने देखा कि इन तीनों आदमियों के मूँह निरुत्तर रह गए थे, तब उसका आक्रोश सुलग उठा था।

६ और उस बज़-वंशज बरकेल के बेटे एलिहू ने उत्तर दिया और कहा, मैं छोटा हूँ, और तुम बहुत बूढ़े हो; इस कारण वश मैं डर रहा था, और अपनी राय प्रकट करने का साहस नहीं कर रहा था।

७ मैंने कहा, दिनो को बोलना चाहिए, और वर्षों के जनौघ को विद्या सिखानी चाहिए।

८ लेकिन मनुष्य में एक प्राण है: और उन सर्वबलशाली का श्वास इन्हें प्रज्ञा दे रहा है।

९ महान पुरुष सदा विद्वान नहीं होते: न ही वो वृद्ध न्याय-निर्धारण समझते हैं।

१० इसलिए मैंने कहा, श्रवण कर लें मेरा; मैं भी अपनी राय प्रकट कर देता हूँ।

११ देखो भई, मैं तुम्हारे शब्दों के लिए प्रतीक्षा में रहा; मैंने तुम्हारे कारणों को सुनवाई दी, जैसे-जैसे तुम खोज रहे थे कि भई क्या कहना चाहिए!

१२ हाँ भई, मैंने तुम्हें ध्यान दिया, और देखो तो, तुम में से कोई भी न था जो अय्यूब को विश्वस्त करा सका, या जो उसके शब्दों को उत्तर दे सका:

१३ कहिं तुम कहो, हमने विद्या खोज निकाली है: ईश्वर ही इसे नीचे दबा रहे हैं, मानुष नहीं।

१४ अब इसने अपने शब्दों को मेरी ओर केन्द्रित नहीं किया है: न ही मैं इसे तुम्हारी वक्तृताओं से उत्तर दूँगा।

१५ वो तो आश्चर्यचकित रह गए, उन्होंने अब और उत्तर नहीं दिया: उन्होंने बोलना छोड़ दिया।

१६ जब मैं रुका रहा, चूँकि वो बोले नहीं, बल्कि अचल खड़े रहे, और अब और उत्तर नहीं दिया;

१७ मैंने कहा, मैं भी अपना भाग उत्तर में दे दूँगा, मैं भी अपनी राय प्रकट कर दूँगा।

१८ चूँकि मैं घोषणाओं से भरा हुआ हूँ, मेरे भीतर वो प्राण मुझे रोक रहा है!

१९ देखो, मेरा उदर उस बिना मुख के अंगूर-रस के समान है; वो तो नई बोतलों के समान फूट-जाने के समान तैयार है।

२० मैं तो बोलूँगा ताकि मैं साँस भर सकूँ: मैं अपने होटों को खोलूँगा और उत्तर दूँगा।

२१ मैं प्रार्थना करता हूँ तुमसे, मुझे किसी भी व्यक्ति के प्रति पक्षपात मत करने देना, न ही मुझे मानुष को चापलूसियों वाली उपाधियाँ देने देना।

२२ चूँकि मुझे चापलूसियों वाली उपाधियाँ देना आता नहीं है; ऐसा करने में मेरे रचनाकार मुझे शीघ्रता से ही उठा ले जाएँगे।



तेंतीसवाँ अध्याय।


१ इसलिए अय्यूब, मैं प्रार्थना करता हूँ तुमसे, मेरी वक्तृताओं को सुन लो, और मेरे समस्त शब्दों का श्रवण कर लो।

२ देखो, अब मैंने अपना मूँह खोल लिया है, मेरी जीभ ने मेरे ही मूँह में बोल दिया है।

३ मेरे ही मन की सत्यनिष्ठा वाले मेरे शब्द होंगे: और मेरे होंट स्पष्टता से प्रज्ञा अर्णित करेंगे।

४ ईश्वर के प्राण ने मुझे रचाया है, और उन सर्वबलशाली के श्वास ने मुझे जीवन प्रदान कर दिया है।

५ यदि तुम मुझे उत्तर दे सकते हो, तो मेरे ही समक्ष मेरे शब्दों को व्यवस्थित कर दो, खड़े हो जाओ।

६ देखो, मैं तुम्हारी ही कामनानुसार ईश्वर के स्थान में हूँ: मैं भी तो मिट्टी में से ही निर्मित कर दिया गया हूँ।

७ देखो, मेरा आतँक तुम्हें भयभीत नहीं करेगा, न ही मेरा हाथ तुम पर भारी पड़ेगा।

८ अवश्य ही तुम मेरी सुनवाई में बोल चुके हो, और मैंने तुम्हारे शब्दों की वाणी सुन ली है,

९ भई मैं तो विमल हूँ बिना अतिक्रम के, मैं तो निर्दोष हूँ भई; न ही मुझ में अधर्मता है।

१० देखो तो, वो मेरे विरुद्ध शत्रुताएँ ढूँढ रहे हैं, वो तो मेरी गिनती अपने दुश्मन में कर रहे हैं,

११ वो तो मेरे पैरों को लक्कड़ में डाल रहे हैं, वो मेरे समस्त पथों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

१२ देख लो, इस में तुम न्यायोचित नहीं हो: मैं तुम्हें उत्तर दूँगा, कि ईश्वर मानुष से बृहत्तर हैं।

१३ तुम उनके विरुद्ध संघर्ष क्यों कर रहे हो भई? चूँकि वो तो अपने मसलों में से किसी का भी लेखा-जोखा नहीं देते।

१४ चूँकि ईश्वर तो एक बार बोल देते हैं, हाँ भई दो बार ही, तब भी उसे समझ नहीं आती।

१५ एक स्वप्न में, रात्रि के एक दृश्य में, जब लोगों पर गहरी नींद गिर पड़ती है, शय्या पर ऊँघती हुई झपकियों में ही;

१६ तब वो लोगों के कानों को खोल देते हैं, और उनके शिक्षण को पूरा बँद कर देते हैं,

१७ ताकि वो आदमी को उसके प्रयोजन से वापस खींच लें, और आदमी से अहंकार छुपा दें।

१८ वो उसकी आत्मा को उस गर्त से, और उसके जीवन को तलवार से नष्ट हो जाने से पीछे हटा कर रखते हैं।

१९ उसी के बिस्तर पर ही उसे पीड़ा से भी, और उसकी हड्डियों के जनौघ को घोर पीड़ा से ही दण्डित किया जाता है:

२० ताकि उसी का जीवन रोटी से, और उसकी आत्मा स्वादिष्ट भोजन से घृणा करते है।

२१ उसके माँस की खपत होती चली जाती है, कि वो दिखाई ही नहीं देता है; और उसकी हड्डियाँ जो दिखाई नहीं देती थीं ताड़ने लगती हैं।

२२ हाँ भई, उसकी आत्मा कब्र के निकट, और उसका जीवन उन विनाशकों के पास ही खिंचता चला जाता है। 

२३ यदि उसके साथ कोई संदेश-वाहक हो, कोई व्याख्या-कर्ता, मनुष्य को उसकी सत्यनिष्ठा बताने वाला:

२४ तब वो उसके प्रति कृपालु होते हैं, और कहते हैं, इसे नीचे गर्त में जाने से रोक दो: मुझे एक फिरौती मिल गई है।

२५ उसका शरीर एक बच्चे से भी अधिक तरो-ताज़ा होगा: वो अपने यौवन कर दिनो में वापस लौट आएगा:

२६ वो ईश्वर से प्रार्थना करेगा, और वो उसके प्रति अनुग्रह रखेंगे: और वो उनका चेहरा हर्षितता से देखेगा: चूँकि वो मानुष को अपनी नेकी प्रदान कर देंगे।

२७ वो मनुष्यों को देखते हैं, और यदि कोई भी कहता है, मैंने पाप कर दिया है, और जो सही था विकृत कर डाला है, और इस से मुझे कोई लाभ नहीं मिला;

२८ तो वो उसकी आत्मा का गर्त में जाने से उद्धार कर देंगे, और उसका जीवन वो उजाला देख लेगा।

२९ लो भई, ये सभी बातें ईश्वर मनुष्य के साथ कई-कई बार क्रियान्वित करते हैं,

३० उसकी आत्मा को गर्त में से वापस ली आने के लिए, उन सजीवितों के प्रकाश से प्रज्ज्वलित हो जाने हेतु।

३१ ध्यान दे दो, हे अय्यूब, श्रवण कर लो मेरा: चुप कर जाओ तुम, और मैं बोलता हूँ।

३२ यदि तुम्हारे पास कुछ भी हो कहने के लिए, उत्तर दे दो मुझे: बोलो, चूँकि मैं तुम्हें न्यायोचित ठहरा देने का इच्छुक हूँ।

३३ यदि नहीं, तो सुन लो मुझे: शान्त ही रहो तुम, और मैं तुम्हें विद्या सिखा दूँगा।



चौंतीसवाँ अध्याय।


१ इसके अतिरिक्त एलिहू ने उत्तर दिया और कहा,

२ ओ तुम विद्वानों, मेरे शब्दों को सुन लो; और मुझे सुनवाई दे दो, तुम जिनके पास ज्ञान है।

३ चूँकि वो कान ही शब्दों को परखता है, जैसे कि मूँह भोजन को चखता है।

४ हम अपने प्रति न्याय को चुन लें: हम अपने बीच जान लें क्या अच्छा है।

५ चूँकि अय्यूब ने कहा है, मैं तो नेक हूँ: और ईश्वर ने मेरा न्याय परे हटा दिया है।

६ क्या मैं अपने अधिकार के विरुद्ध झूठ बोलूँ? मेरा घाव तो कभी नहीं भरेगा, बिना किसी अतिक्रमण के!

७ अय्यूब के जैसा वो कौन सा आदमी है, जो निन्दा-करना पानी की तरह  पीता है?

८ जो अधर्मता के कार्यकर्ताओं के साहचर्य में जाता है, और दुष्ट लोगों के साथ चलता-फिरता है!

९ चूँकि इसने तो कह दिया है, मनुष्य को ईश्वर में स्वयं आनंद उठाने से कोई भी लाभ नहीं मिलता।

१० इसलिए सुन लो मुझे, तुम प्रज्ञावान पुरुषों: ये ईश्वर से परे है, कि वो दुष्टता करें; और उन सर्वबलशाली से, कि वो अधर्मता क्रियान्वित कर दें।  

११ क्योंकि मानुष के ही काम के बदले वो उसे भुक्तान कर देंगे, और प्रत्येक पुरुष को उसी के पथोंनुसार प्राप्ति करवा देंगे।

१२ हाँ भई, अवश्य ही ईश्वर दुष्टतानुसार नहीं करेंगे, न ही वो सर्वबलशाली न्याय-निर्धारण को विकृत करेंगे।

१३ किसने उन्हें पृथ्वी पर प्रभार प्रदान किया है? या किसने इस पूरे संसार की स्थापना की है?

१४ यदि वो अपने मन को मानुष पर लगा लें, यदि वो अपने स्वयं ही के प्रति उनके प्राण को और उसके श्वास को एकत्रित कर लें;

१५ समस्त शरीर एक साथ ही नष्ट हो जाएँगे, और मानुष पुनः धूल-मिट्टी में ही वापस लौट जाएगा।

१६ यदि अब तुम्हारे पास समझदारी हो, तो सुन लो इसे: मेरे शब्दों की वाणी का श्रवण कर लो।

१७ क्या वो जो उचितता से घृणा करता हो निर्देशन करेगा क्या? और क्या तुम उन्हें दोषी ठहराओगे जो सबसे न्यायोचित हैं?

१८ क्या किसी राजा से कहना, तुम तो दुष्ट हो, उचित है क्या? या अध्यक्षों से, तुम तो ईश्वर-भक्ति-हीन हो?

१९ तो और कितना कम उनसे जो अध्यक्षों के चेहरों का पक्षपात नहीं करते, न ही उस धनी को उस दरिद्र से अधिक मान देते हैं? चूँकि वो सभी उन्हीं के हाथों के कर्म हैं!

२० एक ही क्षण में वो मर जाएँगे, और वो लोग बीच रात में ही विचलित हो जाएँगे, और चल बसेंगे: और वो शक्तिशाली बिना किसी हाथ के ही परे हटा दिए जाएँगे।

२१ चूँकि उनकी आँखें पुरुष के पथों पर टिकी हुई हैं, और वो उसके हर कदम को देखते रहते हैं।

२२ ऐसा कोई भी श्यामतव, या मृत्यु की परछाई नहीं है, जहाँ वो अधर्मता के कार्यकर्ता स्वयं को छुपा सकें!

२३ चूँकि वो आदमी पर उचितता से अधिक नहीं लादेंगे; कि वो ईश्वर के साथ न्याय-निर्धारण में प्रवेश करे।

२४ वो टुकड़ों-टुकड़ों में उन असंख्य जनो को तोड़ डालेंगे, और उनके स्थान में औरों को स्थापित कर देंगे!

२५ इसलिए वो उनके कार्यों से परिचित हैं, और वो उन्हें रात्रि में ही उलट-पलट कर डालते हैं, ताकि वो नष्ट हो जाएँ।

२६ वो तो सरे आम औरों के देखते-देखते उन्हें दुष्ट जनो समान चपत लगा देते हैं;

२७ चूँकि वो उनके पास से वापस मुड़ लिए, और उनके किंहीं भी पथों का विचार नहीं किया:

२८ ताकि वो उस दरिद्र की चीख-पुकार को उनके पास तक पहुँच जाने देते हैं, और वो उस उत्पीड़ित की चीख-पुकार को सुन लेते हैं।

२९ जब वो चुप्पी प्रदान कर देते हैं, तो फिर कौन विपदा पैदा कर सकता है? और जब वो अपना चेहरा छुपा लेते हैं, तो कौन देख सकता है उन्हें? भले ही ये किसी राष्ट्र के विरुद्ध, या केवल मनुष्य ही के विरुद्ध कर दिया गया हो:

३० ताकि वो ढोंगी राज न करे, कहिं जन-गण फंदे में न फँस जाएँ!

३१ अवश्य ही ये ईश्वर से कह देना उचित है, जी मैंने दण्ड भुगत लिया है जी, मैं अब और अधिक अतिक्रम नहीं करूँगा जी:

३२ आप सिखा दें मुझे वो जो मैं देख नहीं रहा हूँ: यदि मैंने अधर्मता कर दी हो, मैं अब और उसे नहीं करूँगा जी।

३३ क्या ये तुम्हारे मनानुसार होना चाहिए क्या? वही इसका भुक्तान कर डालेंगे, भली ही तुम मना कर दो, या भले ही तुम चुन लो; और मैं नहीं: इसलिए बोल दो वो जो तुम जानते हो।

३४ प्रज्ञावान पुरुषों को मुझे बता देने दो, और कोई विद्वान व्यक्ति ही श्रवण कर ले मेरा।

३५ अय्यूब अज्ञानता से बोल पड़ा है, और इसके शब्द विद्या हीन ही थे।

३६ मैं तो चाहता हूँ कि दुष्ट-जनो हेतु इसके उत्तरों के कारण अय्यूब की तो अन्त तक परीक्षा ली जाए।

३७ चूँकि ये तो अपने पाप के साथ-साथ विद्रोह को जोड़ रहा है, ये तो हमारे ही बीच तालियाँ बजा रहा है, और ईश्वर के विरुद्ध अपने शब्दों को बढ़ाता जा रहा है!




पैंतीसवाँ अध्याय।


१ इसके अतिरिक्त एलिहू ने बोलकर कहा,

२ तुम क्या इसे सही सोचते हो, तुम ने कहा था, मेरी नेकी ईश्वर से अधिक है?

३ चूँकि तुमने कहा, तुम्हें क्या लाभ प्राप्त होगा? और, मुझे क्या लाभ मिलेगा, यदि मैं अपने पाप से साफ़ हो चुका हूँ?

४ मैं तुम्हें उत्तर दूँगा, और तुम्हारे साथियों को तुम्हारे साथ।

५ स्वर्गों की ओर तक लो और देख लो; और उन मेघों पर ध्यान दे लो जो तुमसे से भी ऊँचे हैं।

६ यदि तुम पाप करते हो, तो तुम उनके विरुद्ध क्या कर डालते हो? या फिर यदि तुम्हारे उल्लंघन बहुगुणित हो जाते हैं, तो तुम उनके प्रति क्या कर बैठते हो भई?

७ यदि तुम नेक हो, तो क्या दे रहे हो तुम उन्हें? या वो तुम्हारे हाथ से क्या ग्रहण कर रहे हैं?

८ तुम्हारी दुष्टता तुम्हारे ही जसे आदमी को हानि पहुँचा सकती है; और तुम्हारी नेकी मनुष्य-पुत्र को लाभ पहुँचा सकती है।

९ अत्याचारों के जनौघ के कारण ही वो उन अत्याचारितों से चीख मचवा देते हैं: वो बलशाली की भुजा के कारण ही चीख-पुकार उठाते हैं।

१० लेकिन कोई भी नहीं कहता, क्या हैं ईश्वर मुझे बनाने वाले, जो रात को गीत प्रदान करते हैं;

११ जो हमें पृथ्वी के पशुओं से अधिक शिक्षण प्रदान करते हैं, और हमें आकाश के पक्षियों से अधिक विद्वान बनाते हैं?

१२ वहीं वो रो पड़ते हैं, लेकिन कोई भी उत्तर नहीं देता, बुरे लोगों के घमण्ड के कारण।

१३ अवश्य ही ईश्वर व्यर्थता को नहीं सुनवाई देंगे, न ही वो सर्वबलशाली उसकी चिंता करेंगे।

१४ भले ही तुम कह रहे हो तुम उन्हें नहीं देखोगे, तब भी न्याय उनके समक्ष है; इसलिए तुम उन में भरोसा कर लो भई।

१५ परन्तु अब, चूँकि ये ऐसा नहीं है, उन्होंने अपने क्रोध में सुध ले ली है; तब भी वो अत्याधिकता से नहीं जानता:

१६ इसलिए ही अय्यूब व्यर्थता में अपना मूँह खोल रहा है; वो बिना ज्ञान के शब्दों को बहुगुणित कर रहा है।



छत्तीसवाँ अध्याय।


१ एलिहू ने अग्रसर भी होकर कहा,

२ झेल लो मुझे बस थोड़ा सा ही, और मैं तुम्हें बताऊँगा कि मेरा तो ईश्वर की ओर से बोलना अभी बचा हुआ है।

३ मैं तो अपने ज्ञान को दूर-दूर से संचित करूँगा, और अपने बनाने वाले पर नेकी ठहराऊँगा।

४ चूँकिसच में मेरे शब्द झूठ नहीं होंगे: वो जो ज्ञान में परिपूर्ण है तुम्हारे साथ ही है।

५ देखो, ईश्वर बलशाली हैं, और किसी से भी घृणा नहीं करते: वो तो शक्ती और विद्या में बलशाली हैं।

६ वो उस दुष्ट के जीवन को परिरक्षित नहीं रखते: बल्कि उस दरिद्र को सही प्रदान कर देते हैं।

७ वो अपनी आँखों को उस नेक से परे नहीं हटाते: लेकिन राजाओं के साथ वो सिंहासन पर होती हैं; हाँ भई, वो उन्हें सदा के लिए स्थापित कर देते हैं, और वो पदोन्नत हो जाते हैं।

८ और यदि वो बेड़ियों में बन्धे हुए हों, और यातना के रस्सों में जकड़े हुए हों;

९ तब वो उन्हें उनका कर्म, और उनके अतिक्रम बता देते हैं कि वो जने हद से पार जा चुके हैं।

१० वो उनके कानों को अनुशासन के प्रति भी खोल देते हैं, और आदेश देते हैं कि वो अधर्मता से वापस लौट जाएँ।

११ यदि वो पालन कर लेते हैं और उनकी सेवा करते हैं, तो वो अपने दिनो को उन्नत्ती में, और अपने वर्षों को आनन्दों में व्यतीत कर लेंगे।

१२ परन्तु यदि वो पालन नहीं करते, वो तो तलवार से ही नष्ट हो जाएँगे, और वो ज्ञान के बिना ही मर जाएँगे।

१३ परन्तु मन में ढोंग करने वाले आक्रोश का ढेर खड़ा कर देते हैं: वो चीखते नहीं हैं जब वो उन्हें बाँध रहे होते हैं।

१४ वो तो यौवन में ही मर जाते हैं, और उनका जीवन उन गन्दों के बीच होता है।

१५ वो उस दरिद्र को उसकी यातना से मुक्त कर देते हैं, और कानों को अत्याचार में खोल देते हैं।

१६ इसी प्रकार ही उन्होंने तुम्हें भी संकीर्णता से एक चौड़े स्थान में हटा दिया होता, जहाँ कोई भी संकीर्णता नहीं होती; और वो जो तुम्हारी मेज़ पर रखा जाएगा चर्बी से भरा हुआ होगा।

१७ परन्तु तुमने तो उस दुष्ट के न्याय-निर्धारण को पूर्ण कर दिया है: न्याय-निर्धारण और न्याय ने ही तुम्हें पकड़ रहे हैं।

१८ चूँकि आक्रोश है, सावधान हो जाओ भई कहिं वो तुम्हें अपने वार से परे न हटा दें: तब एक बड़ी फिरौती तुम्हें नहीं छुड़ा पाएगी!

१९ क्या वो तुम्हारे धन-धान्यों को मान्यता देंगे क्या? नहीं, सोने को नहीं, न ही बल की समस्त शक्तियों को।

२० रात की वाँछा मत करो जब लोग उनके स्थानों में काट दिए जाते हैं।

२१ ध्यान दे लो, अधर्मता पर विचार मत रखो: चूँकि यही तुमने चुन लिया है यातना के बजाय।

२२ देखो, ईश्वर अपनी शक्ती से पदोन्नत करते हैं: कौन उनके समान सिखाता है?

२३ किसने उनसे उनके पथ की सुध ली है? या फिर कौन कह सकता है, जी आपने तो अधर्मता कर दी है?

२४ स्मरण में रखना कि तुम उनके कार्य को आवर्धित करो, जिसे लोग देखते हैं।

२५ सभी लोग देख लें उसे; मनुष्य उसे दूर से ही देख ले।

२६ देखो, ईश्वर महान हैं, और हम उन्हें नहीं जानते, न ही उनके वर्षों की संख्या की जाँच-पड़ताल की जा सकती है।

२७ चूँकि वो तो पानी की बूँदों कंकों छोटा बना देते हैं: वो वर्षा गिरा देते हैं उसके भाप अनुसार ही:

२८ जिन्हें वो मेघ मानुष पर अत्याधिकता से गिराते हैं और टप-टपाते हैं।

२९ और क्या कोई भी उन मेघों के फैलाव को, या उनके तम्बू के शोर को समझ सकता है क्या?

३० देखो तो वो अपने प्रकाश को उस पर फैला देते हैं, और सागर के तले को ढक देते हैं!

३१ उन्हीं से ही वो लोगों का न्याय करते हैं; वो अत्याधिकता से भोजन प्रदान करते हैं।

३२ मेघों से ही वो प्रकाश को ढक देते हैं; और बीच में आ जाने वाले उस मेघ से वो उसे न चमकने का आदेश दे देते हैं।

३३ उसका शोर उसके विषय में बता देता है, वो मवेशी भी उस भाप के विषय में।


सैंतीसवाँ अध्याय।


१ इस पर भी मेरा मन काँप रहा है, और उसके स्थान ने हिल चुका है। 

२ ध्यानपूर्वक्ता से सुन लो तुम उनकी वाणी के शोर को, और उस ध्वनि को जो उनके मूँह से प्रवृत्त हो रही है।

३ वो उसे उस सम्पूर्ण स्वर्ग तले निर्देशित करते हैं, और अपनी बिजली को पृथ्वी के अन्तिम छोरों तक भी।

४ उसके पीछे-पीछे एक वाणी दहाड़ती है: वो अपनी सर्वश्रेष्ठता की वाणी से गर्जन मचाते हैं; और वो उन्हें रोकेंगे नहीं जब उनकी वाणी सुनी जाती है।

५ ईश्वर आश्चर्यजनकता से अपनी वाणी से गर्जन मचाते हैं; विशाल कार्य करते हैं वो, जिन्हें हम समझ नहीं सकते।

६ चूँकि वो हिम से कहते हैं, धरती पर बरस जाओ; इसी प्रकार ही उस छोटी बारिश को, और उनकी शक्ती की उस बड़ी बारिश को।

७ वो प्रत्येक आदमी का हाथ मुहरबंद कर देते हैं; ताकि सभी लोग उनके कार्य से परिचित हो जाएँ।

८ तब वो जानवर गुफाओं में जाकर, अपने ही स्थानों में ठहर जाते हैं।

९ दक्षिण में से एक तूफ़ान आता है: और उत्तर में से ठण्ड।

१० ईश्वर के ही श्वास से बर्फ़ प्रदान की जाती है: और पानियों की चौड़ाई को संकीर्ण रखा जाता है।

११ पानी दे देने से वो उस घने मेघ को थका देते हैं: वो अपने चमकीले बादल को बिखेर देते हैं:

१२ और वो उनके परामर्शों के चारों ओर घुमा दिया जाता है: ताकि वो पृथ्वी में संसार के चहरे पर जो कुछ भी वो उन्हें आदेश देते हैं वही वो कर दें!

१३ वही उसका आगमन करवाते हैं, चाहे सुधार वाली पिटाई के लिए, या अपनी भूमी के लिए, या दया के वास्ते।

१४ हे अय्यूब श्रवण कर लो इसका: अचल खड़े हो जाओ भई, और ईश्वर के अचरज-भरे कारनामों का विचार कर लो।

१५ क्या तुम जानते हो कि कब उन्होंने उन्हें स्थापित किया था, और अपने मेघ के उजाले को  उज्ज्वलित करवाया था?

१६ क्या तुम उन मेघों की सन्तुलन-क्रिया से परिचित हो, उन्हीं के अचरज-भरे कार्य जो ज्ञान में परिपूर्ण हैं?

१७ कैसे तुम्हारे वस्त्र गरम होते हैं, जब वो पृथ्वी को दक्षिणी-वायु से चुप करा देते हैं?

१८ क्या तुमने उनके साथ आकाश को फैलाया है क्या, जो बलवन्त है, एक खौलते हुए दर्पण के समान?

१९ सिखादो हमें हम क्या कहें उन से; चूँकि हम अंधकार के कारण अपनी बोली को व्यवस्थित नहीं कर सकते।

२० क्या ये उन्हें बता दिया जाए कि मैं बोल रहा हूँ? यदि कोई पुरुष बोले, अवश्य ही वो निगल लिया जाएगा।

२१ और अब लोग उस उज्ज्वलित उजाले को देख नहीं रहे हैं जो उन मेघों में हैं: बल्कि वो वायु चलती हुई उन्हें साफ़ करती जा रही है।

२२ अच्छा मौसम उत्तर से पधार रहा है: ईश्वर के साथ ही आतँक वाला राज-प्रताप है।

२३ उन सर्व-बलशाली के समबन्ध में, हम उन्हें नहीं खोज निकाल सकते: वो तो शक्ती में, और न्याय-निर्धारण में, और  न्याय की बहुतायत में सर्वश्रेष्ठ हैं: वो उत्पीड़ित नहीं करेंगे।

२४ इसलिए ही लोग उनका भय मानते हैं: वो उन मन में विद्वानों में से किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करते।



अड़तीसवाँ अध्याय।


१ तब प्रभु ने अय्यूब को उस आँधी-तूफ़ान में से उत्तर देते हुए कहा,

२ भई ये कौन है जो अज्ञानता वाले शब्दों से परामर्श को अन्धेरा बना रहा है?

३ एक पुरुष के समान अपनी कटियों को अब कस लो; चूँकि मैं तुमसे पूछूँगा, और तुम मुझे उत्तर दोगे।

४ कहाँ थे तुम जब मैंने पृथ्वी की नीवें बिछाई थीं? बताओ भई, यदि तुम्हारे पास प्रज्ञा हो।

५ किसने उसकी सीमाएँ निर्धारित की हैं, क्या तुम जानते हो? या फिर किसने उस पर वो नापने वाली पट्टी खींची है?

६ उसकी नीवें किस पर टिकी हुई हैं? या फिर किसने उसका कोने वाला पत्थर रखा है;

७ जब वो प्रभात वाले सितारे एक साथ गाए थे, और ईश्वर के सभी बेटे हर्ष के मारे चिल्ला पड़े थे?

८ या फिर किसने सागर को द्वारों से बँद कर दिया, जब वो आगे फूट पड़ा था, मानो कि वो किसी गर्भ में से ही बाहर निकल पड़ा हो?

९ जब मैंने मेघ को उसका वस्त्र बनाया था, और घोर अंधकार उसके लिए एक लपेटने वाला पट्टा,

१० और उसके लिए ही अपने आदेशित स्थान को तोड़ डाला था, और पट्टे और द्वार लगा दिए थे,

११ और कहा, यहाँ तक तो तुम आ जाओगे, लेकिन और आगे नहीं: और यहीं तुम्हारी अहंकारी लहरें थाम दी जाएँगी?

१२ क्या तुमने अपने दिनो से लेकर प्रातःकाल को आदेश दिया है क्या; और प्रभात को उसके स्थान का ज्ञान दिलवाया है क्या;

१३ कि वो पृथ्वी के अन्तिम छोरों की पकड़ ले ले, ताकि वो दुष्ट उस में से बाहर झाड़ दिए जा सकें?

१४ वो तो मुहर के नीचे चिकनी मिट्टी के समान बदल जाता हैं; और वो एक वस्त्र के समान ही खड़े हो जाते हैं।

१५ और उन दुष्टों से उनका उजाला रोक दिया जाता है, और वो ऊँची भुजा तोड़ डाली जाएगी।

१६ क्या तुमने समुद्र के जल-स्त्रोतों में प्रवेश किया है क्या? या फिर क्या तुम उस गहराई की खोज करने चले हो क्या?

१७ क्या तुम्हारे लिए मृत्यु के वो दरवाज़े खोल दिए गए हैं क्या? या फिर क्या तुमने मृत्यु की परछाई के द्वारों को देख लिया है क्या?

१८ तुमने क्या पृथ्वी की चौड़ाई का आभास किया है क्या? यदि तुम उसे पूर्णता से जानते हो तो बता दो भई।

१९ कहाँ है वो पथ जहां प्रकाश निवास करता है? और अन्धकार, भई उसका स्थान कहाँ है,

२० कि तुम उसे उसकी सीमा रेखा तक ले चलो, और कि तुम उसके निवास के पथों को का ज्ञान रखो?

२१ ये जानते हो क्या तुम, चूँकि तुम्हारा तो तब जन्म हो चुका था? या चूँकि तुम्हारे दिनो की गिनती बहुत बड़ी है?

२२ क्या तुमने हिम के धन-भण्डारों,ए प्रवेश किया है क्या? या तुमने क्या ओलों के धन-कोषों को देख लिया है क्या,

२३ जिन्हें मैंने कष्ट की ऋतु के लिए संरक्षित रखा हुआ है, रण और युद्ध के उस दिन के लिए ही?

२४ उजाला किस पथ पर विभाजित होता हाओ, जो पृथ्वी पर उस पूर्वी वायु को तितर-बितर करती है?

२५ जलों के उभरते हुए प्रवाहों के लिए किसने जल-धारा काटी है भई, या एक पथ गर्जन की बिजली के लिए ही;

२६ धरती पर वर्षा करवाने के लिए, जहाँ कोई भी पुरुष नहीं है; उस जँगली-क्षेत्र पर, जहाँ कोई भी आदमी नहीं है;

२७ उस उजाड़ और बेकार धरती को तृप्त करवा देने हेतु; और उस कोमल पौधे को उगवा देने हेतु?

२८ क्या वर्षा के पास कोई पिता है क्या? या फिर किसने ओस की बूँदों का जनन किया है?

२९ किसके गर्भ में से बर्फ़ बाहर निकली? और स्वर्ग का वो जमा हुआ पाला, किसने प्रजनन किया है उसका/

३० वो पानी छुपा दिए गए हैं मानो की किसी पत्थर के साथ ही, और उस गहराई का वो चेहरा जमा हुआ है।

३१ क्या तुम कृतिका के मधुर-मोहक प्रभावों को बाँध सकते हो क्या, या मृगशीर्ष के बन्धनों को खोल सकते हो क्या?

३२ क्या तुम मज़्ज़रोथ-नक्षत्र को उसके समय पर उदित कर सकते हो क्या? या फिर क्या तुम सप्तऋषि का उसके बेटों के साथ मार्गदर्शन कर सकते हो क्या?

३३ क्या तुम स्वर्ग के अध्यादेशों से परिचित हो? क्या तुम उसके अधिराज्य को पृथ्वी पर रख सकते हो क्या?

३४ क्या तुम उन मेघों तक अपनी वाणी ऊपर उठा सकते हो क्या, ताकि जलों की बहुतायत ढक दे तुम्हें?

३५ क्या तुम बिजलियों को भेज सकते हो क्या, ताकि वो चली जाएँ, और तुमसे कह दें, जी हम हाज़िर हैं?

३६ भीतर वाले भागों में किसने विद्या डाली है? या फिर किसने हृदय को प्रज्ञा प्रदान की है?

३७ विद्या लिए कौन उन मेघों की गिनती कर सकता है? या फिर कौन स्वर्ग की उन बोतलों को बँद रख सकता है,

३८ जब वो मिट्टी कठोर होती चली जाती है, और वो रोड़े कस कर चिपक जाते हैं?

३९ क्या तुम शेर के लिए शिकार का शिकार करोगे क्या? या फिर उन युवा शेरों की भूख को मिटा दोगे क्या,

४० जब वो अपनी गुफाओं में लेटे होते हैं, और घात लगाए बैठे रहते हैं आड़ में?

४१ बड़े-कव्वे को उसका खाना कौन देता है? जब उसके छोटे बच्चे ईश्वर को चीख-पुकार मचाते हैं, खाने की कमी के कारण वो भटकते फिरते हैं।






उनतालीसवाँ अध्याय।


१ क्या तुम उस समय से परिचित हो जब चट्टानों-वाली वो जँगली-बकरियाँ जन्म देती हैं? या फिर क्या तुम ध्यान देते हो जब वो हिरनियाँ बच्चे जनती हैं?

२ क्या तुम उनके महीनों को गिन सकते हो क्या जो वो पूरे करती हैं? या फिर क्या तुम उनके बियाने के समय को जानते हो क्या?

३ वो तो स्वयं को झुका लेती हैं, वो अपने छोटे-छोटों को बाहर ले आती हैं, वो अपनी पीड़ाओं को बाहर निकाल देती हैं।

४ उनके छोटे-नन्हें सुरूप होते हैं, वो अनाज के साथ-साथ बड़े होते हैं, वो आगे निकल चले जाते हैं, और उनके पास वापस नहीं लौटते हैं,

५ किसने उस जँगली-गधे को बाहर स्वच्छंद भेज दिया है? या फिर किसने उस जँगली-गधे की लगाम को खोल डाला है भई?

६ उस जँगली-क्षेत्र को जिसका मैंने घर, और उस बंजर धरती को उसका बसेरा बना दिया है।

७ वो तो नगर के उस कोलाहल की हँसी उड़ाता है, न ही वो उस हाँकने वाले की चीख पर ध्यान देता है।

८ पर्वतों की शृंखला ही उसकी चरन-भूमी है, और वो प्रत्येक हरी-वस्तु को ढूँढता रहता है।

९ क्या वो इक-सींघा तुम्हारी सेवा करने की, या तुम्हारी पालनी के साथ वास करने की इच्छा रखेगा क्या?

१० क्या तुम उस इक-सींघे को खेत की रेखा में उसके रस्से से बाँध सकते हो क्या? या फिर क्या वो तुम्हारे पीछे-पीछे उन घाटियों पर हेंग चलाएगा क्या? 

११ क्या तुम उस पर भरोसा रखोगे, चूँकि उसकी शक्ती विशाल है? या फिर क्या तुम अपने श्रम को उसके लिए छोड़ दोगे क्या?

१२ क्या तुम उस पर विश्वास करोगे, कि वो तुम्हारे बीज को घर ले आएगा, और उसे तुम्हारे खलिहान में एकत्रित कर देगा?

१३ क्या तुमने उन मोरों को वो सुंदर-सुंदर पँख दिए हैं क्या? या उस शतुरमुर्गी को पँख और पँखुड़ियाँ?

१४ जो अपने अंडों को धरती में छोड़ देती है, और उन्हें धूल में गरमाती है,

१५ और भूल जाती है कि कोई पाँव उन्हें कुचल सकता है, या फिर कोई जँगली जानवर उन्हें तोड़ डाल सकता है!

१६ वो तो अपने छोटे-नन्हों के प्रति कठोर हो चुकी है, मानो कि वो उसके हो ही न: उसका श्रम व्यर्थ ही है निर्भयता संग;

१७ चूँकि ईश्वर ने उसे विद्या से विहीन रख छोड़ा है, न ही उन्होंने उसे प्रज्ञा प्रदान की है।

१८ जिस समय वो स्वयं को उच्चत्व में पदोन्नत करती है, वो घोड़े की और उस पर सवार की हँसी उड़ाती है।

१९ क्या तुमने घोड़े को शक्ती प्रदान की है? क्या तुमने उसकी गर्दन को गर्जन से आवृत किया है क्या?

२० क्या तुम उसे किसी टिड्डी के समान डरा सकते हो क्या? उसके नथुनों का गौरव भयानक है।

२१ वो घाटी में टाप मारता है, और अपनी शक्ती में हर्ष मनाता है: वो उन सशस्त्रित आदमियों से हेंट करने चलता जाता है।

२२ वो डर का उपहास करता है, और भय नहीं मनाता; न ही वो तलवार से पीछे मुड़ता है।

२३ उस से सटा वो तरकश खड़खड़ाता है, वो चमचमाती हुई तलवार और वो ढाल।

२४ वो क्रुद्धता और रोष से धरती को निगल लेता है: न ही विश्वास करता है कि वो तो चिंघाड़े का बजना है।

२५ वो उन चिंघाड़ों के बीच कहता है, अहा, अहा; और वो रण को दूर सी सूँघ लेता है, उन कप्तानों की गर्जन को ही, और उस चिल्लाने को।

२६ क्या वो बाज़ तुम्हारी विद्यानुसार उड़ती हुई अपने पंखों को दक्षिण की ओर फैलाती है क्या?

२७ क्या वो गरुड़ तुम्हारे आदेश पर ऊपर आरोहण करती हुई अपना घोंसला ऊँचाई पर बनाती है क्या?

२८ वो तो चट्टान पर रहती हुई निवास करती है, उस चट्टान के शिखर पर ही, उस शक्तिशाली जगह में ही।

२९ वहीं से ही वो अपने शिकार को ढूँढती है, और उसकी आँखें दूर-दूर तक देखती हैं।

३० उसके वो छोटे-नन्हें भी रक्त चूसते हैं: और जहाँ वो मारे हुए होते हैम वहीं वो होती है।



चालीसवाँ अध्याय।


१ इसके अतिरिक्त प्रभु ने अय्यूब को उत्तर दिया, और कहा,

२ क्या वो जो सर्वबलशाली के साथ संघर्ष करता है उसे सिखाएगा क्या? वो जो ईश्वर को सुधार रहा है, उसी को ही उत्तर दे देने दो।

३ तब अय्यूब ने प्रभु को उत्तर दिया, और कहा,

४ देखिए जी, मैं तो नीच हूँ; मैं आपको क्या उत्तर दे सकता हूँ जी? मैं अपने हाथ को अपने मूँह पर रख दूँगा।

५ एक ही बार मैं बोल लिया हूँ; लेकिन अब मैं उत्तर नहीं दूँगा जी: हाँ जी, दो बार ही; पर मैं अब और आगे नहीं बढ़ूँगा।

६ तब प्रभु ने अय्यूब को उस आँधी-तूफ़ान में से उत्तर दिया, और कहा,

७ एक पुरुष के समान अपनी कटियों को अब कस लो: मैं तुमसे पूछूँगा, और तुम मुझे बताओगे।

८ क्या तुम मेरे न्याय-निर्धारण को भी रद्द कर दोगे क्या? क्या तुम मुझे दोषी ठहराओगे, ताकि तुम न्यायी ठहर जाओ?

९ क्या तुम्हारे पास ईश्वर जैसी एक भुजा है क्या? या फिर क्या तुम उनके समान एक वाणी लिए गर्जन मचा सकते हो क्या?

१० अभी ही स्वयं को राज-प्रताप और सर्वश्रेष्ठता से आभूषित कर लो; और गौरव और सौन्दर्य से स्वयं को आवृत कर दो।

११ अपने आक्रोश के ग़ुस्से को बाहर बखेर दो: और उस प्रत्येक को देख लो जो अहंकारी है, और उसे पदावनत कर दो।

१२ दृष्टि टिका लो उस प्रत्येक पर जो अभिमानी है, और उसे नीचे ले आओ; और उन दुष्टों को उनके स्थान में ही कुचल डालो।

१३ उन्हें एक ही साथ धूल में छुपा दो; और उनके चेहरों को गोपनीयता में छुपा दो।

१४ तब मैं भी तुम्हें स्वीकृति दे दूँगा कि तुम्हारा अपना ही दायाँ हाथ तुम्हारा बचाव कर सकता है।

१५ अब बहमोथ को ही देख लो भई, जिसे मैंने तुम्हारे साथ ही सृजनाया; वो एक साँड के जैसे ही घास चरता है।

१६ लो भई अब, उसकी शक्ती उसकी कटियों में है, और उसका बल उसके पेट की माँसपेशियों में ही है।

१७ वो अपनी पूँछ को एक देवदार के समान हिलाता है: उसके पत्थरों के कंडरे एक साथ ही लिपटे हुए हैं।

१८ उसकी हड्डियाँ पीतल के शक्तीशाली टुकड़ों जैसी हैं; उसकी हड्डियाँ लोहे के पटरों जैसी हैं।

१९ वो ईश्वर के पथों का प्रमुख है: उसने जिसने इसे बनाया है अपनी तलवार को इसके निकट ला सकता है।

२० वो पर्वत अवश्य ही इसे भोजन लाते हैं, जहाँ खेत के समस्त पशु खेलते-कूदते हैं।

२१ वो उन छायादार वृक्षों तले लेट जाता है, उस सरकंडे और नरकटों की आड़ में ही।

२२ वो छायादार पेड़ उसे अपनी परछाई से ढक देते हैं; नदी के बेद-वृक्ष उसे चारों ओर घेरे रहते हैं।

२३ देखो तो, वो एक नदी को ही पी जाता है, और शीघ्रता नहीं मचाता है: उसे ये भरोसा है कि वो तो यर्दन को ही अपने मूँह में खींच लेगा।

२४ वो उसे अपनी आँखों से ही ले लेता है: उसकी नाक फंदों को आर-पार भेद डालती है।



इकतालीसवाँ अध्याय।


१ क्या तुम एक कंटिया से लेव्याथन को बाहर खींच सकते हो क्या? या उसकी जीभ को किसी एक डोरी से जिसे तुम नीचे करते हो?

२ क्या तुम उसकी नाक में कोई अँकुड़ा डाल सकते हो? या उसके जबड़े को किसी काँटे से आर-पार भेद सकते हो क्या?

३ क्या वो तुमसे कई अनुनय करेगा क्या? क्या वो तुमसे कोमल शब्द बोलेगा क्या?

४ क्या वो तुम्हारे साथ एक प्रतिज्ञा-पत्र बनाएगा क्या? क्या तुम उसे सदा के लिए एक सेवक ले लोगे क्या?

५ क्या तुम उसके साथ एक पंछी समान खेल खेलोगे क्या? या फिर क्या तुम उसे अपनी कन्याओं के लिए बाँध दोगे क्या?

६ क्या सगे-साथी उस में से एक भोज-दावत बनाएँगे? क्या वो उसे व्यापारियों के बीच विभाजित कर देंगे?

७ क्या तुम उसकी चर्म को लोहे की बरछियों से भर दोगे क्या? या उसके सर को मछुआरे के भालों से?

८ रख दो अपना हाथ उस पर, रण का स्मरण रखना, अब और मत करना।

९ देख लो भई, उसकी आशा रखना व्यर्थ है: उसके दिखते ही क्या कोई नीचे ही नहीं गिर पड़ेगा?

१० कोई भी इतना क्रुद्ध नहीं है कि वो उसे जगा देने का साहस कर बैठे: तो फिर मेरे सामने कौन खड़ा रह सकता है भई?

११ किसने मुझे पहले दिया, कि मैं उसे वापस चुका दूँ? जो कुछ भी इस समस्त स्वर्ग तले है मेरा ही है।

१२ मैं उसके अंगों को छुपाऊँगा नहीं, न ही उसकी शक्ती को, न ही उसके सुरूप डील-डौल को।

१३ कौन उसके आवरण के चहरे को अनावृत कर सकता है? या फिर कौन उसके पास उसके दुगुने जबड़े के पास आ सकता है?

१४ कौन उसके चेहरे के द्वारों को खोल सकता है? उसके दाँत चारों ओर भयानक हैं भई!

१५ उसके शल्क उसका अभिमान हैं, एक साथ सट कर बँद हुए हुए मुहरबँद।

१६ एक दूसरे से इतना सटा हुआ है, कि कोई भी वायु उनके बीच नहीं आ सकती है।

१७ वो एक दूसरे के ही साथ जुड़े हुए हैं, वो एक साथ चिपटे हुए हैं, कि उन्हें दो में नहीं किया जा सकता!

१८ उसकी छींकों में एक उजाला चमकता है, और उसकी आँखें प्रभात की पलकों के समान हैं।

१९ उसके मूँह में से बाहर जलते हुए दीपक जाते हैं, और अग्नी की चिंगारियाँ बाहर छलाँगें लगाती हैं।

२० उसके नथुनों में से धूआँ निकलता है, मानो कि किसी उबलते हुए पतीले या कढ़ाई में से ही।

२१ उसका श्वास कोयलों को सुलगा देता है, और एक अग्नी-लपट उसके मूँह में से बाहर निकलती है। 

२२ उसकी गर्दन में शक्ती ठहरे रहती है, और दुःख सुख में उसके सामने परिवर्तित हो जाता है।

२३ उसके माँस की परतें एक साथ जुड़ी हुई हैं: वो स्वयं में ही ठोस हैं; वो हिलाई नहीं जा सकतीं।

२४ उसका हृदय एक पत्थर के समान ठोस है; हाँ भई, चक्की के निचले पत्थर के जैसा ही पथरीला।

२५ जब वो स्वयं को उठाता है, तो पराक्रमी घबरा जाते हैं: तोड़-फोड़ के कारण ही वो स्वयं का शुद्धीकरण कर डालते हैं!

२६ उसकी तलवार जो उस पर पड़ती है पकड़ नहीं रख सकती: वो भाला, वो बरछी, न ही वो जिरह-बख्तर।

२७ वो लोहे की गिनती भूसे में करता है, और पीतल की सड़ी हुई लकड़ी में।

२८ वो बाण उसे भगा नहीं सकता: गोफन से फेंके हुए पत्थर उसके साथ घास-फूस में परिवर्तित हो जाते हैं!

२९ बरछियों की गिनती भूसे में की जाती है: वो भाले को हिलाने की हँसी उड़ाता है।

३० कँटीले पत्थर उसके नीचे हैं: वो पैनी-नुकीली कीलें बखेरता है कीचड़-दल-दल पर।

३१ वो गहराई को एक कढ़ाई के जैसे उबाल पर ले आता है: वो समुद्र को एक मरहम वाले पतीले समान बना डालता है।

३२ वो अपने पीछे-पीछे एक चमकदार पथ बना देता है; कोई सोच ले कि वो गहराई तो सफेद बाल लिए है!

३३ पृथ्वी पर उसकी समानता में कोई नहीं है, जो निडरता से बना हो।

३४ वो सभी ऊँची बातों को देखता है: वो अहंकार की समस्त सन्तानों पर राजा है।



बयालीसवाँ अध्याय।


१ तब अय्यूब ने प्रभु को उत्तर दिया और कहा,

२ मैं जानता हूँ कि आप सब कुछ कर सकते हैं, और कि कोई भी विचार आपसे रोका नहीं जा सकता है।

३ वो कौन है जो बिना ज्ञान के परामर्श छुपा रहा है? इसलिए मैंने वो बोल दिया जिसकी मुझे प्रज्ञा न थी; मेरे लिए बातें अति-आश्चर्यजनक, जिन से मैं परिचित न था।

४ सुनें जी, मैं आपसे विनती करता हूँ, और मैं बोलूँगा: मैं आपसे पूछूँगा, और आप मुझे बता दें।

५ मैं आपके विषय में कान की सुनवाई द्वारा सुना है: पर अब मेरी आँख आपको देख रही है।

६ इस कारण मैं स्वयं से घृणा कर रहा हूँ, और धूल और राखों में पछतावा कर रहा हूँ।

७ और ये ऐसा हुआ कि प्रभु के अय्यूब से इन शब्दों के बोल देने के पश्चात, प्रभु ने एलिफ़ज उस तेमान-वंशज से कहा, मेरा आक्रोश तुम्हारे विरुद्ध, और तुम्हारे दोनो मित्रों के विरुद्ध सुलग उठा है भई: चूँकि तुमने मेरे विषय में वो उचित बात नहीं बोली है, जैसे मेरे सेवक अय्यूब ने बोली है।

८  इसलिए अब अपने लिए सात साँड और सात मेढ़े ले लो, और मेरे सेवक अय्यूब के पास जाकर, अपने स्वयं के लिए एक जला-चढ़ावा चढ़ा दो; और मेरा सेवक अय्यूब तुम्हारे लिए प्रार्थना करेगा: चूँकि उसे ही मैं स्वीकार करूँगा: कहिं मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी त्रुटिनुसार ही बर्ताव न कर बैठूँ, कि तुमने मेरे विषय में वो उचित बात नहीं बोली है, मेरे सेवक अय्यूब के समान।

९ तो एलिफ़ज वो तेमान-वंशज और बिल्दद वो शूआ-वंशज और ज़ोफ़र वो नमा-वासी चले गए, और कर दिया उनके प्रति प्रभु के अदेशानुसार ही: प्रभु ने अय्यूब को भी स्वीकार कर लिया।

१० और प्रभु ने अय्यूब के बाँधत्व को परे मोड़ दिया, जब उसने अपने मित्रों के लिए प्रार्थना कर ली थी: और प्रभु ने अय्यूब को उसके पास पहले जो कुछ था उसका दुगुना दे दिया।

११ तब उसके समस्त भाई, और सभी बहने, और उस से पहले से परिचित सभी जन उसके पास आ गए, और उसके साथ उसके घर में रोटी खाई: और उन्होंने उस पर शोक-विलाप मनाया, और उसे उस समस्त बुराई के प्रति सान्त्वना प्रदान की जो प्रभु उस पर ले आए थे: प्रत्येक पुरुष ने उसे पैसे का एक टुकड़ा भी दिया, और हर एक ने सोने की एक बाली।

१२ तो प्रभु ने अय्यूब के अंतिम अन्श को उसके प्रारम्भ से अधिक धन्य बना दिया: चूँकि उसके पास चौदह हज़ार भेड़ थे, और छह हज़ार ऊँट, और सांडों के एक हज़ार जूए, और एक हज़ार मादा-गधियाँ।

१३ उसके पास सात बेटे और तीन बेटियाँ भी थीं।

१४ और उसने पहली का नाम येमिमा रखा, और दूसरी का नाम केज़िया; और तीसरी का नाम करेनहपक।

१५ और समस्त भूमी में अय्यूब की बेटियों के समान सुन्दर कोई भी स्त्रियाँ नहीं पाई गई थीं: और उनके पिता ने उन्हें उनके भाईयों के बीच ही विरासत दे दी।

१६ इसके पश्चात अय्यूब एक सौ चालीस वर्ष जीया, और उसने अपने बेटे देखे, और उसके बेटों के बेटे, चार पीढ़ियाँ ही।

१७ तो अय्यूब का देहान्त हो गया, वृद्ध होता हुआ और दिनो से भरपूर।



०६/२४/२०२६: 














 


























 

























 























 




















Comments

Popular posts from this blog