भजनों की पुस्तक।(पहला भाग)। ६/२४/२०२६ (The Book of Psalms)
(एक सुझाव: इस पुस्तक का अनुवाद इस वर्तमान में क्रियाशील है। कृपया इस पुस्तक को अभी न पढ़ें। अन्य पुस्तकों को पहले पढ़ लें, धन्यवाद।)
पहला भजन।
१ धन्य है वो पुरुष जो ईश्वर-भक्ति-हीनों के परामर्श में नहीं चलता है, न ही पापियों के पथ में खड़ा होता है, न ही उपहास करने वालों के आसनों पर बैठता है।
२ बल्कि उसका आनन्द प्रभु के नियम में होता है; और उन्हीं के ही नियम में वो दिन-रात मनन-चिन्तन में लगा रहता है।
३ और वो जल की नदियों के साथ एक रोपे हुए वृक्ष के समान होगा, जो अपना फल अपनी ऋतु में उपजाता है; उसका पत्ता भी सूखेगा नहीं; और वो जो कुछ भी करता है उन्नत हो जाएगा।
४ वो ईश्वर-भक्ति-हीन ऐसे नहीं हैं: बल्कि वो तो उस भूसे के समान हैं जिसे वो हवा उड़ा ले जाती है।
५ इसलिए वो ईश्वर-भक्ति-हीन न्याय-निर्धारण में नहीं खड़े होंगे, न ही वो पापी उन न्यायोचितों की सभा में।
६ चूँकि प्रभु उन नेकों के पथ से परिचित हैं: परन्तु उन ईश्वर-भक्ति-हीनों का पथ नष्ट हो जाएगा।
दूसरा भजन।
१ अन्यप्रजातियाँ रोष क्यों कर रही हैं, और लोगों ने व्यर्थ बात की कल्पना क्यों की?
२ पृथ्वी के राजा स्वयं को स्थित कर रहे हैं, और वो शासक एक साथ प्रभु के, और उनके अभिषिक्त के विरुद्ध, मंत्रणा कर रहे हैं, कहते हुए,
३ हम उनकी बेड़ियों को दो में तोड़ डालें, और उनके रस्सों को हमारे पास से परे पटक डालें।
४ वो जो स्वर्गों में विराजमान हैं हँसेंगे: प्रभु उनकी खिल्ली उड़ाएँगे।
५ तब वो उनसे अपने आक्रोश में बोलेंगे, और उन्हें अपनी घोर अप्रसन्नता में व्यथित कर डालेंगे।
६ तथापि मैंने अपने राजा को सियोन की मेरी पवित्र पहाड़ी पर स्थित कर दिया है।
७ मैं उस आज्ञप्ति को घोषित कर दूँगा: प्रभु ने ही मुझ से कह दिया है, तुम ही मेरे पुत्र हो, इसी दिन मैंने तुम्हें जनना है।
८ माँगों मुझ से, और मैं तुम्हें वो अन्य-राष्ट्र तुम्हारी विरासत में प्रदान कर दूँगा, और पृथ्वी के वो अन्तिम छोर तुम्हारे हाथ में।
९ तुम उन्हें लोहे के एक लट्ठ से तोड़ डालोगे; तुम उन्हें एक कुम्हार के बर्तन के समान टुकड़ों-टुकड़ों में फोड़ डालोगे।
१० इसलिए ओ राजाओं अब विद्वान बन जाओ: निर्देशित हो जाओ तुम पृथ्वी के न्यायाधीषों।
११ प्रभु की सेवा भय के साथ करो, और थरथराते हुए खुशी मनाओ।
१२ पुत्र को चूम लो, कहिं वो क्रोधित न हो जाएँ, और तुम पथ पर से नष्ट हो जाओ, जब उनका आक्रोश बस थोड़ा सा ही सुलग उठता है। धनय हैं वो सभी जो उन में अपना भरोसा रखते हैं।
तीसरा भजन।
दाऊद का एक भजन, जब वो अपने बेटे अब्सलोम से भाग-खड़ा हुआ था।
१ प्रभु जी, मुझे सताने वाले कैसे बहुगुणित हो चले हैं! वो कई हैं जो मेरे विरुद्ध उठ रहे हैं।
२ मेरी आत्मा से कहने वाले वो कई हैं, ईश्वर में इसके लिए कोई भी सहायता नहीं है। सेला।
३ परन्तु आप, हे प्रभु, मेरे लिए एक ढाल हैं जी; मेरा गौरव, और मेरे शीर्ष को उठाने वाले।
४ मैंने अपनी वाने से प्रभु को चीख-पुकार मचाई, और उन्होंने अपने पवित्र पर्वत से मुझे सुनवाई दे दी।
५ मैंने स्वयं को नीचे लिटा दिया और सो गया; मैं जाग गया; चूँकि प्रभु ने मुझे समर्थित रखा।
६ मैं गणों के दसियों हज़ारों से नहीं डरूँगा, जिन्होंने स्वयं को मेरे विरुद्ध मेरे चारों ओर स्थित कर लिया है।
७ हे प्रभु, उठें; बचा लें मुझे, हे मेरे ईश्वर: चूँकि आप ही ने मेरे समस्त शत्रुओं को उनकी गाल की हड्डी पर चोट पहुँचा दी है; आप ही ने उन ईश्वर-भक्ति-हीनों के दाँत तोड़ डाले हैं जी।
८ बचाव प्रभु के पास ही है: आपका आशीर्वाद आप ही के गण पर है। सेला।
चौथा भजन।
नेगिनोथ पर प्रमुख संगीतकार को, दाऊद का एक भजन।
१ मेरी नेकी के हे ईश्वर सुने मुझे जब मैं पुकारता हूँ: जब मैं विचलित था, आप ही ने मुझे विस्त्रित किया; दया करें मुझ पर, और मेरी प्रार्थना सुन लें जी।
२ ओ तुम आदमियों के बेटों, तुम मेरे गौरव को और कितने समय तक लज्जा में बदलते रहोगे? व्यर्थता से तुम प्रेम, और झूठ की खोज कब तक करते रहोगे? सेला।
३ पर जान लो कि प्रभु ने अपने स्वयं के लिए उस ईश्वर-भक्त को पृथक कर दिया है: प्रभु सुनेंगे जब मैं उन्हें पुकरूँगा।
४ अचम्भित खड़े रहो, और पाप मत करो: अपनी ही शय्या पर अपने ही मन से विचार-गोष्ठी करो, और चुप कर जाओ। सेला।
५ नेकी की बलियाँ चढ़ाओ, और प्रभु में ही अपना भरोसा रख दो।
६ वो तो कई हैं जो कहते हैं, भई कौन हमें भलाई दिखाएगा? प्रभु जी, अपने मुखमण्डल के उजाले को हम पर उठा दें।
७ उस समय से भी अधिक जब उनका अनाज और अंगूर-रस गुणा हुए थे, आपने मेरे मन को आमोद प्रदान कर दिया है।
८ मैं तो शान्ति में स्वयं लेटूँगा और सो भी जाऊँगा: चूँकि प्रभु आप ही मुझे सुरक्षा में वास करवाते हैं।
पाँचवाँ भजन।
नेगिनोथ पर प्रमुख संगीतकार को, दाऊद का एक भजन।
१ हे प्रभु, मेरे शब्दों से कान लगा लें जी, मेरे मनन-चिन्तन का विचार करें।
२ मेरी चीख-पुकार का श्रवण कर लें जी, मेरे राजा, और मेरे ईश्वर: चूँकि आप से ही मैं प्रार्थना करूँगा।
३ मेरी वाणी को आप प्रातः में सुनेंगे हे प्रभु; प्रातः में ही मैं अपनी प्रार्थना को आपकी ओर निर्देशित करूँगा, और ऊपर देखूँगा।
४ चूँकि आप कोई ईश्वर नहीं हैं जो दुष्टता में आनंद मनाता हो: न ही आपके साथ बुराई वास करेगी।
५ वो मूर्ख आपकी दृष्टि में नहीं खड़ा होगा: आप तो अधर्मता के समस्त कार्यकर्ताओं से घृणा करते हैं।
६ आप उन्हें नष्ट कर डालेंगे जो असत्य बोलते हैं: प्रभु उस लहु के प्यासे और धोखेबाज़ आदमी से घृणा करते हैं।
७ परन्तु जहाँ तक मेरी बात आती है, मैं तो आपके घर में आपकी दया के जनौघ में प्रवेश करूँगा: और आप ही के भय में मैं आपके पवित्र मंदिर की ओर आराधना करूँगा।
८ मेरे शत्रुओं के कारण अपनी नेकी में मेरा मार्गदर्शन करें, हे प्रभु; जी अपने पथ को मेरे चहरे के समक्ष सीधा कर दें।
९ चूँकि उनके मूँह में तो कोई भी विश्वसनीयता नहीं है जी; उनका आभ्यंतरिक भाग तो सरी दुष्टता ही है; उनका गला एक खुला हुआ मक़बरा है; वो तो अपनी जीभ से चापलूसी करते रहते हैं।
१० हे ईश्वर आप इन्हें नष्ट कर डालें; इन्हें अपनी ही स्वयं की मंत्रणाओं से गिर जाने दें जी; उनके अतिक्रमों के जनौघ में ही उन्हें बाहर फैंक डालें; चूँकि इन्होंने आपके विरुद्ध विद्रोह कर डाला है।
११ परन्तु उन सभी को जो आप में अपना भरोसा रखते हैं हर्षित हो जाने दें: उन्हें सदा के लिए खुशी के मारे चिल्ला देने दें जी, क्योंकि आप ही उनकी सुरक्षा करते हैं: उन्हीं भी जो आपके नाम से प्रेम करते हैं आप ही में हर्षित होने दें।
१२ चूँकि आप ही, प्रभु जी, उस नेक को आशीष देंगे; अनुग्रह संग ही आप उसे एक ढाल के समान ही घेर लेंगे।
छटा अध्याय।
नेगिनोथ पर शेमिनिथ पर प्रमुख संगीतकार को, दाऊद का एक भजन।
१ हे प्रभु, अपने क्रोध में मुझे न डाँटें, न ही मुझे अपनी अप्रसन्नता के ताप से लताड़ें।
२ हे प्रभु मुझ पर दया करें जी; चूँकि मैं दुर्बल हूँ: हे प्रभु, स्वस्थ कर दें मुझे; चूँकि मेरी हड्डियाँ व्यथित हैं।
३ मेरी आत्मा भी घोरता से व्यथित है: परन्तु आप, हे प्रभु, और कितनी देर तक जी?
४ वापस लौट आएँ जी हे प्रभु, मेरी आत्मा का उद्धार कर दें: अपनी ही दयालुताओं के वास्ते ही मुझे बचा लें जी।
५ चूँकि मृत्यु में आपका कोई स्मरण नहीं रहता है: आपको कब्र में कौन धन्यवाद देगा जी?
६ मैं अपने कराहने से थक चुका हूँ; सारी रात मैं अपने बिस्तरे को तैरने के लिए बनाता हूँ; मैं अपनी शय्या को अपने आँसूओं से भर देता हूँ।
७ मेरी आँख दुःख के कारण खा ली गई है; वो मेरे सभी शत्रुओं के कारण बूढ़ी होती चली जा रही है।
८ दूर चले जाओ मुझ से तुम सभी अधर्मता के कर्ता; क्योंकि प्रभु ने मेरे रोने की वाणी सुन ली है।
९ प्रभु ने मेरे अनुनय को सुन लिया है; प्रभु मेरी प्रार्थना को ग्रहण कर लेंगे।
१० मेरे सभी शत्रु लज्जित और घोरता से व्यथित हो जाएँ: वो वापस लौट जाएँ और अचानक ही लज्जित हो जाएँ।
सातवाँ अध्याय।
दाऊद का शिग्गायौन, जिसे उसे प्रभु को गाया, उस बिन्यामिन-वंशज कुश के शब्दों के समबन्ध में।
१ हे प्रभु मेरे ईश्वर, आप ही में मैं अपना विश्वास रखता हूँ: उन सभी से मुझे बचा लें जो मुझ पर अत्याचार करते हैं, और बचाव कर दें मेरा:
२ कहिं वो एक शेर के समान मेरी आत्मा को फाड़ डाले, उसे टुकड़ों-टुकड़ों में फाड़ता हुआ, जैसे कोई भी बचाने वाला ही न हो।
३ हे प्रभु मेरे ईश्वर, यदि मैंने ये कर दिया हो; यदि मेरे हाथों में अधर्मता हो;
४ यदि मैंने उसे जो मेरे साथ शान्ति से था बुराई चुकाई हो; जी हाँ, मैंने तो उसका उद्धार किया जो बिन कारण मेरा शत्रु है:
५ तो उस शत्रु को मेरी आत्मा पर अत्याचार ढा कर उसे ले लेने दें; जी हाँ, उसे धरती पर मेरे जीवन को रौंद डालने दें, और मेरे सम्मान को धूल में रख देने दें। सेला।
६ अपने क्रोध में उठ जाएँ जी हे प्रभु, मेरे शत्रुओं के रोष के कारण स्वयं को उठा लें: और मेरे लिए जाग जाएँ उस न्याय के प्रति जिसका आप आदेश दे चुके हैं।
७ तो इस प्रकार जन-सभा आपके चारों ओर आ जाएजी: इसलिए उन्हीं के कारण आप उच्चत्व लिए वापस लौट आएँ जी।
८ प्रभु लोगों का न्याय करेंगे: हे प्रभु मेरी नेकीनुसार, और मेरी सत्यनिष्ठानुसार जो मुझ में है, मेरा न्याय करें।
९ ओह उस दुष्ट की दुष्टता का अन्त हो जाने दें; परन्तु उस न्यायोचित को स्थापित कर दें: चूँकि वो नेक ईश्वर हृदयों और कलेजों को परखते हैं।
१० मेरी सुरक्षा ईश्वर की है, जो मन में सीधों को बचाते हैं।
११ ईश्वर नेक का न्याय करते हैं, और ईश्वर उस दुष्ट के साथ प्रत्येक दिन क्रोधित रहते हैं।
१२ यदि वो वापस न मुड़े, तो वो अपनी तलवार को तेज़ कर देंगे; उन्होंने अपने धनुष पर चढ़ाकर, उसे तैयार कर दिया है।
१३ उन्होंने उसके लिए मृत्यु के उपकरण भी उदय कर दिए हैं; वो अपने बाणों को उन अत्याचारकों के विरुद्ध विहित-नियुक्त करते हैं।
१४ देखो, वो तो अधर्मता से प्रसव-पीड़ा में है, और अनिष्टता से गर्भवति हो गया है, और झूठ को जन दिया है।
१५ उसने एक गड्ढा बनाया, और उसे खोदा, और उसी नाले में ही गिर गया जो उसने बनाया था।
१६ उसकी अनिष्टता उसी के अपने सर पर वापस आ पड़ेगी, और उसकी हिंसात्मकता उसी के अपने ही खोपड़े की चोटी पर नीचे आ पड़ेगी।
१७ मैं उन्हीं की ही नेकीनुसार प्रभु की प्रशन्सा करूँगा: और प्रभु अति-उच्चतम के नाम के प्रति ही गुण-गान गाऊँगा।
आठवाँ अध्याय।
गिट्टिथ पर प्रमुख संगीतकार को, दाऊद का एक भजन।
१ हे प्रभु हमारे प्रभु, समस्त पृथ्वी में आपका नाम कितना सर्वश्रेष्ठ है! जिन्होंने आपके गौरव को स्वर्गों से भी ऊपर स्थापित कर दिया है।
२ आपके शत्रुओं के कारण ही शिशुओं और स्तन से दूध पीते हुए मुँहों से आपने शक्ती विहित-नियुक्त करवाई, ताकि आप उस शत्रु और उस प्रतिषोधी को थाम दें।
३ जब मैं विचार करता हूँ आपके स्वर्गों का, आप की उँगलियों का कार्य, वो चंद्रमा और वो सितारे, जिन्हें आपने विहित-नियुक्त कर दिया है;
४ जी मनुष्य क्या है, कि आप उसकी सुध लेते हैं? और वो मनुष्य-पुत्र, कि आप उस पर दृष्टि टिकाते हैं?
५ चूँकि आपने तो उसे दूतों से थोड़ा नीचा बना दिया है; और उसे महिमा और प्रतिष्ठा का मुकुट पहना दिया है।
६ आपने तो उसे आपके हाथों के कार्यों पर अधिराज्य रखना दिलवा दिया है जी; आपने तो समस्त वस्तुएँ उसके पैरों तले रख दी हैं:
७ समस्त भेड़ें और साँड, हाँ जी, और खेत के जानवर;
८ पवन के पंछी, और सागर की मछलियाँ, और जो कुछ भी उन समुद्रों के पथों पर से चलते जाते हैं।
९ हे प्रभु हमारे प्रभु, समस्त पृथ्वी में आपका नाम कितना सर्वश्रेष्ठ है!
नौवाँ भजन।
मुथलब्बेन पर प्रमुख संगीतकार को, दाऊद का एक भजन।
१ मैं तो हे प्रभु, अपने सम्पूर्ण हृदय से आपकी प्रशन्सा करूँगा जी; मैं तो आपके समस्त आश्चर्यजनक कार्यों का वर्णन करूँगा।
२ मैं तो आप में प्रसन्न और हर्षित हूँगा: मैं तो आपके नाम के प्रति प्रशन्सा का गुणगान करूँगा जी, हे आप अति उच्चतम जी।
३ जब मेरे शत्रु वापस मुड़ चुके होंगे, तो वो आपकी उपस्थिति पर गिर कर नष्ट हो जाएँगे।
४ चूँकि आप ही ने मेरा सही होना और मेरी दलील को बनाए रखा है; आप ही सिंहासन पर विराजमान सही न्याय कर रहे थे।
५ आपने उन अन्य-प्रजातियों को डाँट लगा दी है, आपने उन दुष्टों को नष्ट कर डाला है, आपने तो उनके नाम को सदा-सदा के लिए मिटा डाला है जी।
६ अरे ओ तू दुश्मन, विनाश एक अन्तहीन अन्त पर आ पहुँचे हैं: और तूने तो नगरों को नष्ट कर डाला है; उनका स्मारक उन्हीं के साथ नष्ट हो चुका है।
७ परन्तु प्रभु अन्तहीनता तक बने रहेंगे: उन्होंने अपने सिंहासन को न्याय-निर्धारण हेतु उद्यत कर दिया है।
८ और वो तो संसार का न्याय नेकी में करेंगे, वो तो लोगों को न्याय निष्कलंकता में प्रदान करेंगे।
९ प्रभु तो उन उत्पीडितों के लिए एक शरण भी होंगे, उत्पीड़ना के समयों में एक शरण।
१० और वो जो आपके नाम से परिचित हैं आप ही में अपना भरोसा रख देंगे: चूँकि प्रभु जी आपने उन्हें नहीं त्यागा है जो आपको खोजते हैं।
११ प्रभु के प्रति जो सियोन में बसते हैं, प्रशंसाओं का गुणगान करो: लोगों के बीच उनकी करनीयों को घोषित करो।
१२ जब वो रक्त के लिए जाँच-पड़ताल करते हैं, तो वो उनका स्मरण करते हैं: वो उन विनम्र की चीख-पुकार को नहीं भूलते।
१३ मुझ पर दया करें हे प्रभु; मुझ से घृणा करने वालों द्वारा मेरी उस यातना का विचार करें जी जो मैं झेल रहा हूँ, कि आप मुझे मृत्यु के दरवाज़ों से ऊपर उठा लें:
१४ ताकि मैं आपकी समस्त प्रशन्सा का सियोन की बेटी के दरवाज़ों में वर्णन कर दूँ: मैं तो आपके बचाव में हर्ष मनाऊँगा जी।
१५ वो अन्य-राष्ट्र तो उसी गड्ढे में नीचे डूब चुके हैं जिसे उन्होंने ही बनाया था: उसी जाल में जिसे उन्होंने छुपाया था उनका अपना ही पैर पकड़ में ले लिया गया है!
१६ प्रभु तो उस न्याय-निर्धारण से जाने जाते हैं जिसे वो क्रियान्वित करते हैं: वो दुष्ट तो अपने ही हाथों की क्रिया में फँस जाता है। हिज्ञों। सेला।
१७ वो दुष्ट तो नरक में मोड़ दिया जाएगा, और वह सभी राष्ट्र जो ईश्वर को भूल जाते हैं!
१८ चूँकि वो ग़रीब सदा के लिए नहीं भूला जाएगा: उस दरिद्र की आशा सदा के लिए नहीं नष्ट होगी।
१९ उठ जाएँ जी, हे प्रभु; मनुष्य को अभिभावी मत होने दें: उन अन्य-राष्ट्रों का न्याय आप ही की दृष्टि में कर दिया जाने दें जी।
२० हे प्रभु, उन्हें भयभीत कर दें जी: ताकि ये राष्ट्र जान जाएँ कि ये स्वयं ही बस केवल मानुष ही हैं। सेला।
दसवाँ अध्याय।
१ हे प्रभु आप इतनी दूर क्यों खड़े हैं जी? आप स्वयं को कष्ट के समयों में छुपा क्यों लेते हैं जी?
२ वो दुष्ट अपने अहंकार में उस दरिद्र पर अत्याचार ढाता तो है: उन्हें उन्हीं की ही युक्तियों में पकड़ लिया जाने दें जिनकी उन्होंने कल्पना कर ली है।
३ चूँकि वो दुष्ट तो अपने ही हृदय की वाँछा की डींगें मारता है, और उस लोलुप-लालची को आशीष देता है, जिन से प्रभु घृणा करते हैं।
४ वो दुष्ट अपनी मुखाकृति के घमण्ड के माध्यम से, ईश्वर से पूछ-ताछ नहीं करेगा: ईश्वर उसके समस्त विचारों में नहीं हैं।
५ उसके पथ तो सदैव दुखदाई होते हैं; आपके न्याय उसकी दृष्टि से बाहर दूर ऊँचाई में हैं जी: जहाँ तक उसके शत्रुओं की बात आती है, वो तो उन पर फूंकें मारता रहता है।
६ वो तो अपने हृदय में कह चुका है, मैं तो नहीं हिलाया जाऊँगा: चूँकि मैं तो संकट में कभी भी नहीं पड़ूँगा भई।
७ उसका मुख तो गाली-श्राप और धोखाधड़ी और छल-कपट से भरा है: उसकी जीभ तले तो अपकार और अनिष्टता हैं।
८ वो तो गाँवों के लुका-छिपी वाले स्थानों में दुबक कर बैठा रहता है: उन गुप्त स्थानों में वो उन निर्दोषों को मार डालता है: उसकी आँखें तो छुपी-छुपाई उस दरिद्र के विरुद्ध टिकी हुई हैं भई।
९ वो घात लगाए छुपा हुआ प्रतीक्षा करता रहता है गुफा में एक शेर के समान: उस दरिद्र को दबोच लेने हेतु वो घात लगाए रहता है, वो उस विनम्र को दबोच ही लेता है, जब वो उसे अपने जाल में खींच लेता है।
१० वो झुकता है, और स्वयं को विनम्र बनाता है, ताकि वो दरिद्र उसे बलशालियों के माध्यम से गिर जाए।
११ वो तो अपने मन में कह चुका है, ईश्वर तो भूल चुके हैं भई: वो तो अपना चेहरा छुपा रहें हैं; वो तो कभी भी नहीं ये देखेंगे।
१२ उठ जाएँ हे प्रभु; हे ईश्वर, अपने हाथ को ऊपर उठा दें: उस विनम्र को न भूलें।
१३ वो दुष्ट ईश्वर को क्यों घिक्करते हैं? वो तो अपने मन में कह चुका है, आप तो जाँच-पड़ताल करेंगे ही नहीं।
१४ आपने ने तो इसे देख लिया है जी; चूँकि आप अपकार और अपमान पर दृष्टि टिकाते हैं, उसका अपने हाथ से भुक्तान कर देने हेतु: वो दरिद्र स्वयं को आपके सुपुर्द कर देता है; आप ही उस पिता-हीन के सहायक हैं जी।
१५ उस दुष्ट और दुराचारी की भुजा आप तोड़ डालें: उसकी दुष्टता की खोज-बीन कर डालें जब तक आप अब और पाएँ ही न!
१६ प्रभु ही सदा-सदा के लिए सम्राट हैं: वो अन्य-राष्ट्र उनकी भूमी में से बाहर नष्ट हो चुके हैं।
१७ प्रभु, जी आपने उन विनम्र की वाँछा सुन ली है: आप उनके हृदयों को तैयार करवा ही देंगे, आप अपने कान से सुनवा ही देंगे:
१८ उन पिता-हीनों और उन उत्पीडितों का न्याय कर देने हेतु, ताकि पृथ्वी का वो मानुष अब और अत्याचारित न करें।
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