अपौस्लों के कार्य: नया अनुबन्ध। (Acts)
पहला अध्याय।
१ हे थियोफिलुस, वो पहला आलेख जो मैंने बनाया था, उस सभी के विषय में जिसे यीशु ने करना और सिखाना आरम्भ किया था,
२ उस दिन तक जिस में उन्हें ऊपर ले लिया गया था, उनके पवित्र-प्राण द्वारा अपौस्लों को आदेश दे देने के पश्चात, जिन्हें उन्होंने चुना था:
३ जिन्हें उन्होंने स्वयं कष्ट झेलने के पश्चात, कई असंदिग्ध प्रमाणों द्वारा स्वयं को जीवित भी दिखलाया, जो उनके द्वारा चालीस दिन देखे गए, और जिन से उन्हीने ईश्वर के राज्य से सम्बन्धित बातें भी कीं:
४ और, उन्हीं के साथ एकत्रित हो, उन्होंने उन्हें आदेश दिया कि वो यरूशलेम से प्रस्थान न करें, बल्कि पिताश्री की प्रतिज्ञा की प्रतीक्षा करो, जो तुम मुझ से सुन चुके हो।
५ क्योंकि योहन ने तो सच में पानी से बपतिस्मा किया; परन्तु तुम्हारा बपतिस्मा कुछ ही दिनो पश्चात पवित्र-प्राण द्वारा हो जाएगा।
६ इसलिए जब वह एक साथ संग्रहित हो गए थे, तो उन्होंने उन से पूछा, कहते हुए, प्रभु जी, क्या आप इसी समय राज्य इस्राएल को पुनःस्थापित कर देंगे क्या?
७ और उन्होंने उनसे कहा, यह तुम्हारे लिए नहीं है कि तुम उन समयों या ऋतुओं को जानो, जिन्हें पिताश्री ने अपनी ही शक्ति में रख-रखा है।
८ परन्तु तुम पवित्र-प्राण के तुम पर आ जाने के पश्चात, शक्ती ग्रहण करोगे: और तुम मेरे लिए यरूशलेम में, और समस्त यहूदा में, और समैरिया में, और पृथ्वी के अन्तिम क्षेत्रों तक भी साक्षी बनोगे।
९ और जब उन्होंने यह बातें कह दी थीं, तो लोगों के देखते-देखते ही, वो ऊपर ले लिए गए; और एक मेघ ने उन्हें उन जनों की दृष्टि से बाहर विदाई ले दी।
१० और यीशु के ऊपर आरोहण करते-करते, जैसे वह जन स्वर्ग की ओर ताक रहे थे, देखो तो, दो पुरुष श्वेत वस्त्रों में उनके साथ खड़े थे;
११ जिन्होंने कहा, गलील के तुम पुरुषों, तुम क्यों खड़े-खड़े ऊपर स्वर्ग को ताक रहे हो भई? यही यीशु, जिन्हें तुम से ऊपर स्वर्ग में ले लिया गया है, वही इसी प्रकार वापस आएँगे, जिस प्रकार तुमने उन्हें स्वर्ग में जाते हुए देखा है।
१२ तब वह जैतून कहलाए जाने वाले पहाड़ से, जो यरूशलेम से एक सैबथ दिन की यात्रा की दूरी पर है, वापस यरूशलेम लौट आए।
१३ और अन्दर प्रवेश कर लेने पर वो एक ऊपरी कक्ष में ऊपर चले गए, जहाँ पतरस, और याकूब, और योहन, और अन्द्रेयास, फिलिप, और थोमस, बरतोलोमी, और मत्ती, हलफई का बेटा याकूब, और सिमोन ज़ेलोटीस, और याकूब का भाई यूदस, ठहरे हुए थे।
१४ यह सभी, स्त्रियों के साथ, और यीशु की माँ मरियम, और यीशु के भाईयों के साथ, प्रार्थना और अनुनय में एक ही मन से लगे हुए थे।
१५ और उन दिनों में पतरस शिष्यों के बीच उठ खड़ा हुआ, और उसने कहा, (उन नामों की गिनती जो एक साथ थे, लगभग एक सौ बीस थी,)
१६ पुरुषों और भाईयों, इस शास्त्र की अवश्य ही पूर्ती होनी थी, जिसे यूदस के समबन्ध में, जो उनका मार्गदर्शक था जिन्होंने यीशु को पकड़ लिया था, पवित्र-प्राण पहले से ही दाऊद के मूँह से बोल चुके थे।
१७ क्योंकि उसकी गिनती हमारे साथ की गई थी, और उसने इस सेवाकार्य में एक भाग प्राप्त कर लिया था।
१८ अब इस व्यक्ति ने अधर्मता की पगार से एक खेत खरीदा; और वो सर के बल गिर कर, अपने अर्ध से फट गया, और उसकी सारी आँतें बाहर निकल आईं।
१९ और समस्त यरूशलेम वासी इस बात से परिचित थे; यहाँ तक कि वही खेत उनकी अपनी ही भाषा में अकलदमा कहलाया जाता है, अर्थात् रक्त का खेत।
२० क्योंकि यह भजनों की पुस्तक में लिखा हुआ है, उसके बसेरे को उजाड़ बन जाने दो, और किसी भी व्यक्ति को उस में न बसने दो: और उसकी धर्म-निर्देशक्ता का पद किसी और को ले लेने दो।
२१ इसलिए इन्हीं पुरुषों में से जो हमारी संगति में रहे हैं, उस सम्पूर्ण समय से लेकर, जब प्रभु यीशु का हमारे बीच आना-जाना था,
२२ योहन के बपतिस्मा के आरम्भ से लेकर, उसी दिन तक जब वह हम से ऊपर ले लिए गए थे, एक उनके पुनरुत्थान का साक्षी हमारे संग विहित-नियुक्त किया जाना चाहिए।
२३ और उन्होंने दो की नियुक्ति की, यूसुफ जो बारसबस कहलाया जाता था, जिसका उपनाम युस्तुस था, और मथियस।
२४ और उन्होंने प्रार्थना की, और कहा, आप प्रभु, जो सभी मनुष्यों के हृदय जानते हैं, दिखला दें कि इन दोनो में से आपने किसे चुना है,
२५ ताकि वो इस सेवाकार्य और अपौस्लत्व का भागीदार बन जाए, जिस से यूदस का अतिक्रमण द्वारा पतन हो गया, ताकि वो अपने स्वयं के ही स्थान में चला जाए।
२६ और उन्होंने अपनी पर्चियाँ डालीं; और पर्ची मथियस के नाम निकली; और उसकी गिनती उन ग्यारह अपौस्लों के साथ हो गई।
दूसरा अध्याय।
१ और जब पेंतेकोस्त का दिवस पूर्ण रूप से आ चुका था, वो सभी एक ही मन से एक ही स्थान में थे।
२ और अचानक स्वर्ग में से एक प्रचण्ड आँधी के झौंके जैसी एक ध्वनि आई, और उसने वो पूरा घर भर दिया, जहाँ वो बैठे थे।
३ और उन्हें अग्नि के समान विभाजित जीभें प्रकट हुईं, और वह उन में से प्रत्येक पर ठहर गईं।
४ और वो सभी पवित्र-प्राण से भर उठे, और अन्य जीभों से बोलने लग गए, जैसा प्राण ने उन्हें अर्णन दिया।
५ और वहीं यरूशलेम में, स्वर्ग तले, प्रत्येक राष्ट्र में से श्रद्धालू यहूदी पुरुष निवास कर रहे थे।
६ तो जब यह वाणी बाहर सुनी गई, वो जनौघ एक साथ आ गया, और भौंचक्के रह गए, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति ने उन्हें उसकी अपनी ही भाषा में बोलते हुए सुना।
७ और वो सभी विस्मित और अचम्भित हो गए, एक दूसरे से कहते हुए, भई देखो तो, क्या यह सभी जो बोल रहे हैं गलीलवासी नहीं हैं क्या?
८ और फिर हम कैसे प्रत्येक व्यक्ति को हमारी अपनी ही भाषा में बोलता हुआ सुन रहे हैं, जिस में हमारा जन्म हुआ था?
९ पारथी, और मदयवासी, और एलमवासी, और मेसोपोतामिया, और यहूदा, और कप्पदूकिया, और पोंतुस, और एशिया में बसने वाले,
१० फ्रुगिया, और पमफुलिया, मिस्र, और लिबिया और कुरेने के आस-पास के भागों से, और रोम के परदेशी, यहूदी और धर्मान्तरित-गण,
११ क्रेती और अरबी, हम इन्हें हमारी ही जीभों में ईश्वर के उत्तम कार्यों को बोलते हुए सुन रहे हैं।
१२ और वो सभी स्तंभित हो, संदेह में पड़ गए, एक दूसरे से कहते हुए, इस सब का क्या अर्थ है भई?
१३ औरों ने व्यंग करते हुए कहा, भई यह लोग तो नए अंगूर-रस से धुत हैं।
१४ परन्तु पतरस ने उन ग्यारह के साथ खड़े होकर, अपनी वाणी उठाई, और उनसे कहा, यहूदा के तुम पुरुषों, और तुम सभी जो यरूशलेम में ठहरे हो, ये जान लो तुम, और मेरे शब्दों का श्रवण कर लो:
१५ कि ये लोग मदिरा के नशे से चूर नहीं हैं, जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे हो, ये देखते हुए कि अभी बस दिन की तीसरी ही घड़ी है।
१६ बल्कि ये वो है जिसके विषय में पैग़म्बर योएल ने बोला था;
१७ और अन्तिम दिनों में यह होने को आएगा, कहते हैं ईश्वर, मैं सभी देहों पर अपने प्राण में से उँडेल दूँगा: और तुम्हारे बेटे और तुम्हारी बेटियाँ प्रेरित-उपदेश देंगे, और तुम्हारे युवा पुरुष दृश्य देखेंगे, और तुम्हारे वृद्ध पुरुष सपनों का स्वप्न लेंगे:
१८ और उन दिनों में मैं अपने प्राणमें से अपने नौकरों और नौकरानियों पर उँडेल दूँगा; और वो प्रेरित-उपदेश देंगे:
१९ और मैं ऊपर स्वर्ग में अद्धभुत चमत्कार, और नीचे पृथ्वी पर संकेत दिखलाऊँगा; रक्त, और अग्नि, और धूएँ का भाप:
२० और प्रभु के उस महान और गौरवशाली दिन के आगमन से पूर्व, सूर्य अन्धकार में परिवर्तित हो जाएगा, और चन्द्रमा रक्त में;
२१ और यह होने को आएगा, कि जो कोई भी प्रभु के नाम को पुकारेगा बच जाएगा।
२२ इस्राएल के तुम पुरुषों, भई सुन लो इन शब्दों को; नासरत के यीशु, एक पुरुष जो ईश्वर द्वारा तुम्हारे बीच चमत्कारों और अद्धभुत कार्यों और संकेतों द्वारा स्वीकृत थे, जिन्हें ईश्वर ने तुम्हारे बीच उनके माध्यम से किए, जैसा तुम स्वयं भी जानते हो:
२३ उन्हीं को, जिन्हें ईश्वर के निश्चित परामर्श और पूर्वज्ञान द्वारा तुम्हें प्रदान कर दिया गया था, तुमने लेकर, दुष्ट हाथों द्वारा क्रूस पर चढ़ा दिया और मार डाला:
२४ जिन्हें ईश्वर ने ऊपर उठा दिया है, मृत्यु की पीड़ा से मुक्त कर दिए गए: क्योंकि यह असम्भव था कि वो उसकी पकड़ में रहते।
२५ अब दाऊद उनके विषय में बोलते हैं, मैंने पूर्वाभास द्वारा प्रभु को सदैव अपने चहरे के सामने देखा है, क्योंकि वो मेरे दाएँ हाथ पर हैं, ताकि मैं अचल रहूँ:
२६ इसलिए मेरे हृदय ने हर्ष भी मनाया, और मेरी जीभ भी प्रसन्न हुई; इसके अतिरिक्त मेरा माँस भी आशा में विश्राम करेगा:
२७ क्योंकि आप मेरे आत्मा को नरक में नहीं छोड़ेंगे, न ही आप अपने पवित्र-एक को भ्रष्टता देखने की अनुमती देंगे।
२८ आपने ही मुझे जीवन के पथों का ज्ञान समझाया है; आप ही मुझे अपने मुखमण्डल द्वारा आनंद से परिपूर्ण कर देंगे।
२९ पुरुषों और भाईयों, मुझे स्वतंत्रता से कुलपति दाऊद के विषय में कह लेने दें, कि उनकी तो मृत्यु हो चुकी है, और वो दफ़ना भी दिए गए हैं, और उनका मक़बरा इस दिन तक हमारे साथ ही है।
३० इसलिए अब एक पैग़म्बर होते हुए, और यह जानते हुए कि ईश्वर ने उन्हें एक वचन द्वारा शपथ दी थी, कि उन्हीं की कटि के फल में से, शारीरिकतानुसार, वो मसीहा को अपने सिंहासन पर विराजमान होने के लिए उत्पन्न करेंगे;
३१ तो उन्होंने यह पूर्वता से ही देखते हुए मसीहा के पुनरुत्थान के विषय में बोल दिया था, कि उनकी आत्मा नरक में नहीं छोड़ी गई थी, न ही उनके शरीर ने भ्रष्टता देखी।
३२ इन्हीं यीशु को ईश्वर ने ऊपर उठा दिया है, जिनके हम सभी साक्षी हैं।
३३ इसलिए ईश्वर के दाएँ हाथ पर पदोन्नत, और पिताश्री द्वारा पवित्र-प्राण की प्रतिज्ञा को ग्रहण कर, उन्हीं ने यह उँडेल दिया है, जिसे तुम अब देख और सुन रहे हो।
३४ क्योंकि दाऊद स्वर्गों में आरोहित नहीं हुए हैं: परन्तु वो स्वयं कहते हैं, प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, विराजमान हो जाओ तुम मेरे दाएँ हाथ पर,
३५ जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारा पायदान नहीं बना देता।
३६ इसलिए इस्राएल के समस्त घराने को यह निश्चितता से जान लेने दो, कि ईश्वर ने इन्हीं यीशु को, जिन्हें तुम ने क्रूस पर चढ़ा दिया, प्रभु और मसीहा बना दिया है।
३७ अब जब उन लोगों ने यह सुना, तो उनके हृदयों में चुभन मच उठी, और उन्होंने पतरस और अन्य अपौस्लों से कहा, पुरुषों और भाईयों, तो हम क्या करें?
३८ तब पतरस ने उनसे कहा, तुम में से प्रत्येक व्यक्ति मन-परिवर्तन करो, और बपतिस्मित हो जाओ यीशु मसीह के नाम में पापों के परिहार हेतु, और तुम पवित्र-प्राण का उपहार प्राप्त कर लोगे।
३९ क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुम्हारे लिए है, और तुम्हारी सन्तानो के लिए, और उन सभी के लिए जो दूर हैं, यहाँ तक कि जितनों को भी प्रभु हमारे ईश्वर बुलाएँगे।
४० और कई अन्य शब्दों द्वारा पतरस ने साक्ष्य और अभिप्रेरणा दी, कहते हुए, स्वयं को बचा लो इस प्रतिकूल पीढ़ी से।
४१ तब जिन्होंने उसका शब्द प्रसन्नता से ग्रहण कर लिया था, बपतिस्मित हो गए: और उसी दिन लगभग तीन हज़ार आत्माएँ उनके साथ जुड़ गईं।
४२ और वह दृढ़ता से अपौस्लों की शिक्षा, और साहचर्य, और रोटी तोड़ने में, और प्रार्थनाओं में लगे रहे।
४३ और प्रत्येक आत्मा पर भय छा गया: और अपौस्लों द्वारा कई अद्धभुत चमत्कार और संकेत किए गए थे।
४४ और वो सभी जिन्होंने विश्वास कर लिया था, एक ही साथ थे, और उनकी सभी वस्तुएँ सामुहिक थीं;
४५ और उन्होंने अपनी सम्पत्तियाँ और सामान बेच कर, सभी को बाँट दिया, प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकतानुसार ही।
४६ और वह निरन्तर दिन-प्रतिदिन, एक ही मन से मन्दिर में, और घर-घर रोटी तोड़ने में, अपना भोजन प्रसन्नता और एक निष्कपट मन से करते थे,
४७ ईश्वर की प्रशंसा करते हुए, और सभी लोगों से अनुग्रह प्राप्त करते हुए। और प्रभु दिन-प्रतिदिन कलिसिए में उन्हें जोड़ देते थे जो बच जाते थे।
तीसरा अध्याय।
१ अब पतरस और योहन एक साथ प्रार्थना के समय पर, नौवी घड़ी में मन्दिर में ऊपर गए।
२ और किसी एक आदमी ने, जो अपनी माँ के गर्भ से ही विकलांग था, जिसे वो प्रत्येक दिन उठाकर मन्दिर के उस सुंदर कहलाए जाने वाले उस द्वार पर बिठा देते थे, ताकि वो मन्दिर में प्रवेश करने वालों से दान माँग सके;
३ जिसने देखते हुए कि पतरस और योहन मन्दिर में प्रवेश करने ही वाले थे, दान की भीख माँगी।
४ और पतरस ने योहन के साथ उस व्यक्ति पर अपनी आँखें गढ़ाते हुए कहा, देखो हमें।
५ और उसने उनका कहना माना, उनसे कुछ प्राप्त कर लेने की आशा से।
६ तब पतरस ने कहा, मेरे पास कोई सोना-चाँदी नहीं है; परन्तु वो जो मेरे पास है, वही मैं तुम्हें देता हूँ: नासरत के यीशु मसीह के नाम में ऊपर उठ जाओ और चलो।
७ और उसने उसे दाएँ हाथ से पकड़ा, और उसे ऊपर उठा दिया: और तुरँत ही उसके पैरों और टखनों की हड्डियों ने शक्ती प्राप्त कर ली।
८ और वो ऊपर उछलता हुआ खड़ा हो गया, और चलने-फिरने लग गया, और उनके साथ मन्दिर में, चलता हुआ, और छल्लाँगे लगाता हुआ, और ईश्वर की प्रशंसा करता हुआ, प्रवेश कर गया।
९ और सभी लोगों ने उसे चलते हुए और ईश्वर की प्रशंसा करते हुए देखा:
१० और वो ये जानते थे कि वो वही व्यक्ति था जो मन्दिर के सुन्दर दरवाज़े पर बैठा भीख माँगा करता था: और वह लोग उस घटना से जो उस के साथ घट चुकी थी, अचरज और अचम्भे से भर उठे।
११ और जैसे वो स्वस्थ कर दिया गया विकलांग व्यक्ति पतरस और योहन को पकड़े था, सभी लोग एक साथ उनके पास अत्यंत अचरज करते हुए सुलेमान के बराम्दे में दौड़ पड़े।
१२ और जब पतरस ने यह देखा, तो उसने लोगों को उत्तर दिया, तुम इस्राएल के पुरुषों, तुम इस पर क्यों अचम्भा कर रहे हो? या तुम हमें क्यों इतनी उत्सुकता से ताक रहे हो, मानो कि हमने अपनी ही शक्ति या पवित्रता से इस पुरुष को चलने के योग्य बना दिया हो?
१३ अब्राहम के, और इसहाक के, और याकूब के ईश्वर, हमारे पित्रों के ईश्वर ने अपने पुत्र यीशु का महिमामण्डन कर दिया है; जिन्हें तुम ने प्रदान कर दिया, और पिलातुस के सामने अस्वीकार कर दिया, जब उसने उन्हें रिहा कर देने की ठान ली थी।
१४ परन्तु तुमने उन पवित्र-एक को, उन न्यायपूर्ण को, अस्वीकार कर दिया, और एक हत्यारे की तुम्हारे प्रति रिहाई की माँग कर दी;
१५ और जीवन के शासक की हत्या कर डाली, जिन्हें ईश्वर ने मृतकों में से उठा दिया है; जिनके हम साक्षी हैं।
१६ और उनके नाम ने, उनके नाम में विश्वास द्वारा, इस व्यक्ति को सशक्त बना दिया है, जिसे तुम देख रहे हो, और जानते भी हो: हाँ भई, जो विश्वास इसके द्वारा है, उसी ने इसे तुम सभी के सामने यह परिपूर्ण आरोग्यता प्रदान कर दी है।
१७ और अब भाई-जनों, मुझे आभास है कि तुम ने, जैसे तुम्हारे अध्यक्षों ने भी, वो अज्ञानता द्वारा किया था।
१८ परन्तु जो बातें ईश्वर ने भूतपूर्व समय में अपने समस्त पैग़म्बरों के मूँह से बोल दी थीं, कि मसीहा को कष्ट झेलने होंगे, उन्होंने इसी प्रकार पूर्ण कर दिया है।
१९ इसलिए तुम मन-परिवर्तन कर लो भई, और वापस लौट आओ, ताकि तुम्हारे पाप मिटा दिए जाएँ, जब प्रभु की उपस्थिति से वो शीतल-स्फूर्तिमय समय आ जाएँगे;
२० और वो यीशु मसीह को भेजेंगे, जिन्हें भूतपूर्वता से तुम्हें प्रचारित कर दिया गया था:
२१ जिन्हें उन सभी बातों की पुनःस्थापना के समयों तक, स्वर्ग को निश्चितता से ग्रहण करना होगा, जिन्हें ईश्वर इस संसार के प्रारम्भ से अपने समस्त पवित्र पैग़म्बरों के मुखों के माध्यम से बोल चुके हैं।
२२ चूँकि मूसा ने सच्चाई से ही पित्रों से कहा था, मेरे जैसा ही एक पैग़म्बर, प्रभु तुम्हारे ईश्वर तुम्हारे ही भाई-जनों में से तुम्हारे लिए उठ-खड़ा कर देंगे; उन्हें तुम उन सभी बातों के विषय में सुनोगे जो कुछ भी वो तुम से कहेंगे।
२३ और यह होने को आएगा, कि वो प्रत्येक आत्मा जो उन पैग़म्बर को नहीं सुनेगी, लोगों के बीच में से नष्ट कर दी जाएगी।
२४ हाँ भई, शमूएल तक सभी पैग़म्बरों ने, और जो उसके पश्चात आए, जितने भी बोले थे, उन्हीं ने इसी प्रकार इन दिनों की भविष्यवाणी कर दी है।
२५ तुम पैग़म्बरों, और उस प्रतिज्ञा-पत्र की सन्तानें हो, जिसे ईश्वर ने हमारे पित्रों के साथ स्थापित किया था, अब्राहम से कहते हुए, और तुम्हारे बीज में पृथ्वी के समस्त कुल धन्य होंगे।
२६ ईश्वर ने अपने पुत्र यीशु का पुनरुत्थान कर चुकने पर, तुम्हारे पास ही उन्हें पहले भेजा, तुम्हें आशीष दे देने के लिए, तुम में से प्रत्येक को उसकी दुष्टताओं से परे मोड़ देने के लिए।
चौथा अध्याय।
१ और जैसे वो लोगों से बोल ही रहे थे, पुरोहित-गण, और मन्दिर का कप्तान, और सदूकी उन पर आ धमके,
२ पीड़ित होते हुए कि वो लोगों को शिक्षा प्रदान कर रहे थे, और यीशु के माध्यम से मृतकों में से पुनरुत्थान का प्रवचन दे रहे थे।
३ और उन्होंने उन पर अपने हाथ डाल कर, उन्हें अगले दिन तक बन्दीग्रह में ही रखा, क्योंकि अब सन्ध्या हो चुकी थी।
४ परन्तु उन लोगों में से कईयों ने, जिन्होंने वो शब्द सुना, विश्वास कर लिया; और उन पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार थी।
५ और यह होने को आया, कि अगले दिन, उनके अध्यक्ष, और वृद्ध-गण, और लिपिक,
६ और उच्च पुरोहित हन्ना, और काइफा, और योहन, और सिकन्दर, और जितने भी जो उच्च पुरोहित के कुल में से थे, एक साथ यरूशलेम में एकत्रित हो गए।
७ और जब उन्होंने उन्हें बीच में खड़ा कर दिया था, तो उन्होंने पूछा, भई किस प्राधिकार, या किस नाम द्वारा, तुमने यह किया है?
८ तब पतरस ने, पवित्र-प्राण से परिपूर्ण हो, उन से कहा, लोगों के तुम अध्यक्षों, और इस्राएल के वृद्धों,
९ यदि इस दिन हम से इस निर्बल पुरुष पर कर दिए गए उस अच्छे कार्य की पूछ-ताछ की जा रही है, कि किस माध्यम से यह बच गया है;
१० तुम सभी को, और इस्राएल के सभी लोगों को, यह ज्ञात हो जाए, कि नासरत के यीशु मसीह के नाम द्वारा, जिन्हें तुमने क्रूस पर चढ़ा दिया था, जिन्हें ईश्वर ने मृतकों में से उठा दिया है, उन्हीं के द्वारा ही यह व्यक्ति तुम्हारे समक्ष स्वस्थ खड़ा हुआ है।
११ यही वो पत्थर हैं जो तुम राजगीरों द्वारा तिरस्कृत कर दिए गए थे, जो कोने का सिरा बन चुके हैं।
१२ न ही बचाव किसी अन्य में है; क्योंकि स्वर्ग तले और कोई भी नाम मनुष्यों के बीच नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हमारा बचाव हो सके।
१३ अब जब उन्होंने पतरस और योहन का साहस देखा, और उन्होंने यह आभास किया कि वो तो साधारण अशिक्षित पुरुष ही थे, तो उन्होंने अचम्भा किया; और उन्होंने उनके विषय में यह जानकारी ली, कि वो यीशु के संग रहे थे।
१४ और उस स्वस्थ बना दिए गए पुरुष को उनके साथ खड़े देख, वो इस बात के विरुद्ध कुछ भी नहीं बोल पाए।
१५ परन्तु जब उन्होंने उन्हें परिषद में से बाहर भेज देने का आदेश दे दिया था, तो उन्होंने आपस में विचार-विमर्श किया,
१६ कहते हुए, हम इन आदमियों के साथ क्या करें भई? क्योंकि वास्तव में ही इनके इस असाधारण चमत्कार की करनी तो यरूशलेम में सभी बसने वालों के समक्ष प्रत्यक्ष है; और हम इसे अस्वीकार नहीं कर सकते।
१७ परन्तु ताकि यह बात लोगों के बीच और न फैले, हम इन्हें कड़ाई से धमका देते हैं, कि यह अब से लेकर किसी भी व्यक्ति से इस नाम में न बोलें।
१८ और उन्होंने उन्हें बुला कर, उन्हें यीशु के नाम में न ही कभी बोलने का, और न ही कभी सिखाने का, आदेश दे दिया।
१९ परन्तु पतरस और योहन ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, क्या ईश्वर की दृष्टि में तुम्हें ईश्वर की अपेक्षा अधिक सुनवाई देना सही है क्या? तुम्हीं इस बात का निर्णय करो।
२० चूँकि जो बातें हमने देखी और सुनी हैं, उनके विषय में न बोलना हमारे लिए असम्भव है।
२१ तो जब उन्होंने उन्हें और धमका दिया था, तो उन्होंने उन्हें रिहा कर दिया, क्योंकि लोगों के कारण, वो उन में कुछ भी दण्ड-योग्य नहीं पा सके: क्योंकि सभी लोग उस घटना के कारण ईश्वर को गौरवान्वित कर रहे थे।
२२ क्योंकि वो पुरुष, जिस पर आरोग्यता का चमत्कार प्रदर्शित कर दिया गया था, चालीस वर्षों से भी अधिक आयु का था।
२३ और रिहा हो जाने पर, वो अपने ही साथियों के पास चले गए, और उनसे उन सभी बातों की आख्या कर दी, जो कुछ भी प्रमुख-पुरोहितों और वृद्धों ने उनसे कही थीं।
२४ और जब उन्होंने वो सुन लिया था, तो उन्होंने अपनी वाणी ईश्वर को एक-मन से उठाई, और कहा, प्रभु जी, आप ईश्वर हैं, जिन्होंने स्वर्ग, और पृथ्वी, और समुद्र, और वो सब कुछ जो उन में है रचा दिया है:
२५ जिन्होंने अपने नौकर दाऊद के मुँह से बोल दिया है, अन्यप्रजातियाँ रोष से क्यों भर गईं, और लोगों ने व्यर्थ बातों की कल्पनाएँ क्यों की?
२६ भूमी के राजा उठ खड़े हुए, और वो शासक एक साथ प्रभु के, और उनके मसीहा के विरुद्ध, एकत्रित हो गए।
२७ क्योंकि सच में आप ही के पवित्र बालक यीशु के विरुद्ध, जिनका आपने अभिषेक किया है, दोनों हेरोदेस और पोनतियुस पिलातुस, अन्यप्रजातियों के साथ, और इस्राएल के लोगों के साथ, संघ्रहित हो गए थे,
२८ वो सभी कुछ कर देने हेतु, जो आपके हाथ ने और आपके परामर्श ने, पहले से ही करने के लिए निर्धारित कर दिया था।
२९ और अब, उनकी धमकियाँ देख लें प्रभु जी: और अपने नौकरों को यह अनुदान दे दें, कि वो सम्पूर्ण साहस के साथ आपका शब्द बोलें,
३० आपके हाथ को फैला कर आरोग्यता प्रदान कर देने हेतु, और कि संकेत और अद्धभुत चमत्कार आपके पवित्र बालक यीशु के नाम में कर दिए जाएँ।
३१ और जब उन्होंने प्रार्थना कर ली थी, वो स्थान जहाँ वो एक साथ एकत्रित थे, झकझोर दिया गया था; और वो सभी पवित्र-प्राण से भर उठे, और उन्होंने ईश्वर का शब्द साहस के साथ बोला।
३२ और उन विश्वासियों का जनौघ एक ही मन और एक ही आत्मा का था: न ही उन में से किसी ने कहा कि उसकी सम्पत्ती की वस्तुओं में से कुछ भी उसका अपना था; बल्कि उनकी सभी वस्तुएँ सामुहिक थीं।
३३ और बड़ी ही शक्ति के साथ अपौस्लों ने प्रभु यीशु के पुनरुत्थान का साक्ष्य दिया: और उन सभी पर बड़ी ही कृपा थी।
३४ न ही उनके बीच किसी को भी किसी भी वस्तु का आभाव था: क्योंकि जितनों के पास भी भूमियाँ या घर थे, उन्होंने उन्हें बेच दिया था, और उन बेची गई सम्पत्तियों का मूल्य ले आए थे,
३५ और उन्हें अपौस्लों के पैरों में रख दिया था: और प्रत्येक व्यक्ति को उसी की आवश्यकतानुसार वितरण कर दिया गया था।
३६ और कुप्रुस देश के एक लेवीवंशज निवासी योशी ने, जिसे अपौस्लों ने बरनबास का उपनाम दिया था, (जिसका व्याख्यानुसार अर्थ, सांत्वना-पुत्र है),
३७ अपनी भूमी बेची और उसने वो पैसा लाकर, अपौस्लों के पैरों में रख दिया।
पाँचवाँ अध्याय।
१ परन्तु किसी एक अनन्याह नामक पुरुष ने अपनी पत्नी सैफायरा के साथ, एक सम्पत्ती बेची,
२ और उसने अपनी पत्नी की जानकारी में, उसके मूल्य का एक अन्श अपने पास रख कर, उसका एक शेष भाग लाकर, अपौस्लों के पैरों में रख दिया।
३ परन्तु पतरस ने कहा, भई अनन्याह, शैतान ने तुम्हारा मन पवित्र-प्राण से झूठ बोलने हेतु क्यों भर दिया है, कि तुम भूमी के मूल्य का अंश रख लो?
४ जब तक वो भूमी तुम्हारी थी, क्या वो तुम्हारी अपनी ही नहीं थी क्या? और उसकी बिक्री के पश्चात भी, क्या उसका मूल्य तुम्हारे अपने ही अधिकार में नहीं था क्या? तो तुमने क्यों अपने हृदय में इस बात की कल्पना की? तुमने मनुष्यों से नहीं, बल्कि ईश्वर से झूठ बोला है।
५ और यह शब्द सुनते-सुनते अनन्याह नीचे गिर पड़ा, और उसने अपने प्राण त्याग दिए: और उन सभी पर एक विशाल भय छा गया जिन्होंने इन बातों को सुना।
६ और कुछ युवा पुरुष उठे, और उसे बाँधकर उसे बाहर उठाकर ले गए, और उसे दफ़ना दिया।
७ और लगभग तीन घण्टे पश्चात, जब उसकी पत्नी, यह न जानती हुई कि क्या कर दिया गया था, अन्दर आई;
८ तो पतरस ने उसे उत्तर दिया, बताओ मुझे कि यदि तुम ने भूमी इस मूल्य की बेची थी या नहीं? और उसने कहा, हाँ, इतने की ही।
९ तो पतरस ने उस से कहा, भई ये कैसे है कि तुम एक साथ प्रभु के प्राण की परीक्षा करने हेतु सम्मत हो गए? देख लो, उनके पाँव द्वार पर ही हैं, जिन्होंने तुम्हारे पति को दफ़न दिया है, और वही तुम्हें उठा कर बाहर ले जाएँगे।
१० तब वो उसी पल पतरस के पैरों पर नीचे गिर पड़ी, और उसने अपने प्राण त्याग दिए: और उन युवा पुरुषों ने अन्दर आकर, और उसे मृत पाकर, उसे उठाकर बाहर उसके पति के साथ ही दफ़ना दिया।
११ और सम्पूर्ण कलिसिए पर, और उन पर, जितनों ने भी यह बातें सुनी, एक विशाल भय छा गया।
१२ और अपौस्लों के हाथों द्वारा लोगों के बीच कई संकेत और अद्भुत चमत्कार कर दिए गए थे; (और वो सभी एक ही मन से सुलेमान के बराम्दे में थे।
१३ और अन्य लोगों में से किसी ने भी उनके साथ सम्मिलित होने का साहस नहीं किया: बल्कि लोगों ने उनका आवर्धन किया।
१४ और और भी अधिकता से विश्वासी प्रभु के साथ जोड़े जा रहे थे, दोनो पुरुषों और स्त्रियों के जनौघ।)
१५ यहाँ तक कि वो बीमारों को गलियों में लाकर, उन्हें बिस्तरों और खाटों पर लिटा देते थे, ताकि कम से कम पतरस की परछाई ही वहाँ से उसके चलते-जाते, उन में से कुछों पर छा जाए!
१६ और आस-पास के नगरों में से भी एक जनौघ यरूशलेम तक आ पहुँचा, बीमार जनो, और अस्वच्छ भावात्माओ से व्यग्रित लोगों को लाता हुआ: और उन में से प्रत्येक आरोग्य कर दिया गया था।
१७ तब उच्च पुरोहित उठ खड़ा हुआ, और वो सभी जो उसके साथ थे, (जो कि सदूकीयों का सम्प्रदाय है,) और वो क्षोभ से भर उठे,
१८ और उन्होंने अपौस्लों पर अपने हाथ डाल कर उन्हें सार्वजनिक बन्दी-ग्रह में रख दिया।
१९ परन्तु प्रभु के दूत ने रात्रि के समय उस बन्दी-ग्रह के द्वार खोल दिए, और उन्हें बाहर लाकर उसने कहा,
२० चले जाओ, और मंदिर में खड़े हो कर इस जीवन के सभी शब्द लोगों को बता दो।
२१ और जब उन्होंने यह सुना, तो उन्होंने सुबह-सुबह मन्दिर में प्रवेश कर लिया, और सिखाया। परन्तु वो उच्च पुरोहित आया, और वो जो उसके साथ थे, और उन्होंने उस परिषद-मण्डली को, और इस्राएल की सन्तानों की समस्त महा-सभा को एक साथ बुला लिया, और बन्दी-ग्रह में से उन्हें ले आने के लिए भिजवा दिया।
२२ परन्तु जब वो अफ़सर आए, तो उन्होंने उन्हें बन्दी-ग्रह में नहीं पाया, तो वो वापस लौट आए, और बोले,
२३ कहते हुए, हमने बन्दी-ग्रह को तो प्रत्येक सावधानी से कस कर बन्द, और पहरेदारों को द्वारों के सामने बाहर खड़े पाया: परन्तु जब हमने द्वार खोले, तो हमने तो भीतर कोई भी आदमी नहीं पाया।
२४ अब जब उच्च पुरोहित और मन्दिर के कप्तान और प्रमुख पुरोहितों ने यह बातें सुनीं, तो वो उनके प्रति दुविधा में पड़ गए, कि इस बात का क्या बनेगा।
२५ तब फिर कोई एक आया और उसने उन्हें बताया, कहते हुए, देखो, वो आदमी जिन्हें तुमने बन्दी-ग्रह में डाल दिया था, अन्दर मन्दिर में खड़े होकर लोगों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
२६ तब वो कप्तान अफ़सरों के साथ गया, और उन्हें वहाँ से अहिंसा के साथ ले आया: क्योंकि वो लोगों से डरते थे, कहिं उन पर पथराव न कर दिया गया होता।
२७ और जब वो उन्हें ले आए थे, तो उन्होंने उन्हें परिषद के समक्ष स्थित कर दिया: और उच्च पुरोहित ने उनसे पूछा,
२८ कहते हुए, भई क्या हमने तुम्हें कड़ाई से आज्ञा नहीं दी थी कि तुम इस नाम में नहीं सिखाओगे? और देखो, तुमने तो यरूशलेम को अपनी शिक्षा से भर दिया है, और तुम इस व्यक्ति के रक्त का दोष हम पर डालना चाहते हो।
२९ तब पतरस और अन्य अपौस्लों ने उत्तर दिया और कहा, हमें मनुष्यों की आज्ञा की बजाय, ईश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए।
३० हमारे पित्रों के ईश्वर ने यीशु को ऊपर उठा दिया, जिन्हें तुमने मार कर पेड़ पर टाँग दिया।
३१ उन्हीं को ईश्वर ने अपने दाएँ हाथ से पदोन्नत कर दिया है, एक शासक और बचावक बन जाने के लिए, इस्राएल को मन-परिवर्तन और उनके पापों की क्षमा प्रदान कर देने के लिए।
३२ और हम इन बातों के विषय में उनके साक्षी हैं, और इसी प्रकार पवित्र-प्राण भी, जिन्हें ईश्वर ने उन्हें प्रदान कर दिया है जो उनका आज्ञा-पालन करते हैं।
३३ तो जब उन्होंने यह सुना, तो भई वो तो आग-बबूला हो उठे, और उन्होंने उन्हें मार डालने का परामर्श किया।
३४ तब उस परिषद में एक गमैलियल नामक फैरिसी उठ खड़ा हुआ, जो नियम का एक आचार्य था, और जो सभी लोगों के बीच प्रतिष्ठित था, उसी ने आदेश दिया कि उन अपौस्लों को थोड़े समय बाहर भेज दिया जाए;
३५ और उसने परिषद-मण्डली से कहा, तुम इस्राएल के पुरुषों, अपने ध्यान में रखो कि तुम इन आदमियों के साथ क्या करने की इच्छा कर रहे हो।
३६ क्योंकि इन दिनो से पूर्व एक थ्युदस उठ खड़ा हुआ था, स्वयं डींगें मारता हुआ कि वो तो भई कुछ है; जिसके साथ कई आदमी, लगभग चार सौ, जुड़ गए थे: जिसकी हत्या कर दी गई थी; और वो सभी जो उसके आज्ञाकारी थे, तितर-बितर हो गए और उनका कुछ न बना।
३७ इस आदमी के पश्चात गलील का यूदस, जनगणना के दिनो में उठ खड़ा हुआ था, और अपने पीछे-पीछे कई लोगों को बहका ले गया: वो भी नष्ट हो गया; और वो सब भी, जितने भी उसके आज्ञाकारी थे, तितर-बितर हो गए।
३८ और अब मैं तुम से कहता हूँ भई, कि इन व्यक्तियों से दूर हो जाओ, और इन्हें अकेला छोड़ दो: क्योंकि यदि यह योजना, या यह कार्य मनुष्यों का हो, तो इसका कुछ भी नहीं बनेगा:
३९ परन्तु यदि यह ईश्वर का हो, तो तुम इसे उलट-पलट नहीं कर सकते; कहिं मान लो कि तुम ईश्वर के विरुद्ध ही लड़ाई करते हुए पाए जाओ।
४० और वो इस व्यक्ति की बात मान गए: और जब उन्होंने उन अपौस्लों को बुलाकर उन्हें पीट डाला था, तो उन्होंने उन्हें आदेश दिया कि वो यीशु के नाम में न बोलें, और उन्हें रिहा कर दिया।
४१ और वो हर्ष मनाते हुए उस परिषद-मण्डली से प्रस्थान कर चले, कि वो उनके नाम के वास्ते अपमान सहने योग्य गिन लिए गए थे।
४२ और दिन-प्रतिदिन मन्दिर में, और प्रत्येक घर में, उन्होंने यीशु मसीह को सिखाना और उनका प्रवचन देना बन्द नहीं किया।
छटा अध्याय।
१ और उन दिनो में जब शिष्यों की संख्या बहुगुणित हो गई थी, यूनानियों की इब्रानियों के विरुद्ध बड़बड़ाहट उठी, क्योंकि दैनिक सेवा में उनकी विधवाओं की उपेक्षा हो रही थी।
२ तब उन बारह ने शिष्यों के उस जनौघ को अपने पास बुलाकर कहा, हमारे लिए उचित नहीं है कि हम ईश्वर के शब्द को छोड़ कर, खिलाने-पिलाने की सेवा में लगे रहें।
३ इसलिए, भाईयों, अपने बीच में से भला साक्ष्य लिए सात ऐसे पुरुषों को ढूँढ लो, जो पवित्र-प्राण और विद्या से भरपूर हों, जिन्हें हम इस कार्य पर नियुक्त कर दें।
४ परन्तु हम स्वयं को निरन्तर प्रार्थना, और शब्द के सेवाकार्य के प्रति अर्पित रखेंगे।
५ और इस बात ने उस सम्पूर्ण जनौघ को प्रसन्न कर दिया: और उन्होंने स्तीफनुस को, जो विश्वास और पवित्र-प्राण से भरपूर एक पुरुष था, और फिलिप को, और प्रोखूरुस को, और निकानौर को, और तिमोन को, और परमिनास को, और निकोलास को चुन लिया, जिसका अन्ताकिया में धर्मांतरण हुआ था:
६ इन्हें उन्होंने अपौस्लों के समक्ष स्थित कर दिया: और जब उन्होंने प्रार्थना कर ली थी, तो उन्होंने अपने हाथ उन पर रख दिए।
७ और ईश्वर के शब्द की वृद्धी होती चली गई; और यरूशलेम में शिष्यों की संख्या बहुत बहुगुणित होती चली गई; और पुरोहितों का एक बड़ा समूह विश्वास का पालन-कर्ता था।
८ और स्तीफनुस ने, विश्वास और शक्ती से भरपूर, लोगों के बीच कई अचरज भरे कार्य और चमत्कार किए।
९ तब दास-मुक्तों के कहलाए जाने वाले यहूदी-आराधनालय में से कुछ, और सायरीनी, और एलेक्सैंड्रिया से, और वो जो किलिकिया और एशिया के थे, उठ खड़े हुए, स्तीफनुस के साथ वाद-विवाद करते हुए।
१० और वो उस विद्या और प्राण का विरोध न कर पाए, जिसके द्वारा वो बोल रहा था।
११ तब उन्होंने आदमियों को घूस दे दी, जिन्होंने कहा, भई हमने तो इसे मूसा, और ईश्वर के विरुद्ध ईश्वर-निन्दा के शब्द बोलते हुए सुना है।
१२ और उन्होंने जनता को, और वृद्धों और लिपिकों को भड़का दिया, और वह स्तीफनुस पर आ धमके, और उसे पकड़ कर परिषद के सामने ले आए,
१३ और उन्होंने झूठे गवाह खड़े कर दिए, जिन्होंने कहा, यह व्यक्ति तो इस पवित्र स्थान और नियम के विरुद्ध ईश्वर-निंदा भरे शब्द बोलना बन्द ही नहीं कर रहा है:
१४ क्योंकि हमने इसे कहते हुए सुना, कि ये नासरत का यीशु इस स्थान को नष्ट कर देगा, और वो हमें मूसा द्वारा प्रदान की गई प्रथाओं को बदल देगा।
१५ और वो सभी जो उस परिषद-मण्डली में बैठे थे, स्तीफनुस को ताकते हुए देख रहे थे, मानो कि उसका मुखमण्डल किसी दूत के मुखमण्डल समान हो।
सातवाँ अध्याय।
१ तब उच्च पुरोहित ने कहा, क्या यह बातें ऐसी ही हैं?
२ और स्तीफनुस ने कहा, पुरुषों, भाईयों, और पिताओं, श्रवण करो; महिमा के ईश्वर हमारे पिता अब्राहम को प्रकट हुए थे, जब वो मेसोपोतामिया में ही थे, उनके खारान में बसने से पहले,
३ और उन्होंने उन से कहा, अपने देश में से और अपने कुल में से बाहर निकल कर, उस भूमी में आ जाओ जो मैं तुम्हें दिखलाऊँगा।
४ तब वो कसदियों की भूमी में से बाहर निकल कर, खारान में बस गए: और जब उनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी, तो उन्होंने वहाँ से उन्हें इस भूमी में हटवा दिया, जिस में तुम अब बस रहे हो।
५ और उन्होंने उन्हें इस भूमी में कोई भी विरासत नहीं दी, न जी न, अपना पाँव रखने का भी स्थान नहीं: तब भी उन्होंने ये प्रतिज्ञा दे दी कि वो ये भूमी उन्हें, और उनके बीज को उनके पश्चात एक अधिकार के लिए दे देंगे, जब कि वो अभी निःसन्तान ही थे।
६ और ईश्वर इस प्रकार बोले, कि अब्राहम का बीज एक परदेशी-भूमी में अल्पवास करेगा; जिसके लोग उन्हें बंध्वा-बेगारी तले ले आएँगे, और उनके साथ चार सौ वर्ष दुरव्यवहार करेंगे।
७ और ईश्वर ने कहा, कि उस राष्ट्र का, जिस में वो बंध्वा-बेगार होंगे, मैं न्याय-निर्धारण करूँगा: और उसके पश्चात वो बाहर निकल आएँगे, और इस स्थान में मेरी सेवा करेंगे।
८ और उन्होंने उन्हें ख़तने का प्रतिज्ञा-पत्र प्रदान कर दिया: तो अब्राहम ने इसहाक को जनना, और उसका ख़तना आठवें दिन कर दिया; और इसहाक ने जनना याकूब; और याकूब ने उन बारह कुलपतियों को जनना।
९ और उन कुलपतियों ने ईर्षा की जलन के मारे, यूसुफ को मिस्र में बेच दिया: परन्तु ईश्वर उसके साथ थे,
१० और उन्होंने यूसुफ का उसकी सभी पीड़ाओं से उद्धार कर दिया, और उसे मिस्र के राजा फैरो की दृष्टि में अनुग्रह और विद्या प्रदान कर दी; और उन्होंने उसे मिस्र का, और उसके सम्पूर्ण घराने का राज्यपाल बना दिया।
११ अब मिस्र और कनान की समस्त भूमी पर अकाल, और घोर पीड़ा आ पड़े थे: और हमारे पित्रों को कोई भी सम्पोषण नहीं मिला।
१२ परन्तु जब याकूब ने सुना कि मिस्र में अनाज था, तो उन्होंने पहले हमारे पित्रों को वहाँ भेजा।
१३ और दूसरी बार यूसुफ अपने भाईयों से परिचित हुआ; और यूसुफ का कुल फैरो से परिचित करवाया गया।
१४ तब यूसुफ ने भिजवाया, और अपने पिता याकूब को, और उनके सम्पूर्ण कुल को, अपने पास बुलवा लिया, पिछत्तर आत्माएँ ही।
१५ तो याकूब नीचे मिस्र में चले गए, और उनका निधन हो गया, उनका, और हमारे पित्रों का भी,
१६ और उन्हें उठा कर साईकम ले जाया गया, और उस मक़बरे में लिटा दिया गया, जिसे अब्राहम ने साईकम के पिता एमौर के बेटों से पैसों से खरीदा था।
१७ परन्तु जब उस प्रतिज्ञा का समय निकट आ रहा था, जिसे ईश्वर ने अब्राहम को दी थी, उन लोगों की मिस्र में वृद्धी हुई और वो बहुगुणित होते गए,
१८ जब तक एक अन्य राजा उठा, जो यूसुफ से परिचित न था।
१९ उसी ने हमारे कुल के साथ कपटता से व्यवहार किया, और हमारे पित्रों के साथ उसका बर्ताव बुरा था, कि उन्होंने उनके नवजात शिशुओं को बाहर फिंकवा दिया, इस उद्देश्य से कि वो जीवित न रहें।
२० जिस समय में मूसा पैदा हुए, और वो ईश्वर की दृष्टि में अति-विशिष्ट थे, और उनका अपने ही पिता के घराने में तीन महीने पालन-पोषण हुआ:
२१ और जब उन्हें बाहर फैंक दिया गया था, तो फैरो की बेटी ने उन्हें ऊपर उठा लिया, और उनका पालन-पोषण अपने ही बेटे समान किया।
२२ और मूसा मिस्रवासियों की समस्त विद्या के ज्ञानी थे, और वो शब्दों और कर्मों में पराक्रमी थे।
२३ और जब उनकी आयु के चालीस वर्ष पूर्ण हो चुके थे, उनके मन में विचार आया कि वो अपने भाई-जनो, इस्राएल की सन्तानों को देखें।
२४ और उन में से एक के साथ बुरा व्यवहार होते देख, मूसा ने उस व्यक्ति की रक्षा की, और उस अत्याचारित का प्रतिशोध लिया, और उस मिस्रवासी को मार डाला।
२५ क्योंकि मूसा ने ये अनुमान लगाया कि उनके भाई-जनो को ये समझ होगी कि ईश्वर कैसे उनके हाथों द्वारा उन्हें मुक्ति दिलवाएँगे: परन्तु उन्हें यह समझ में नहीं आया।
२६ और उसके अगले दिन जैसे वो आपस में झगड़ा कर रहे थे, मूसा ने पुनः उनके बीच मिलाप करवाने की इच्छा से स्वयं को दिखलाया, कहते हुए, श्रीमानो, भई तुम तो भाई-जन हो; तुम एक दूसरे के साथ बुराई क्यों कर रहे हो?
२७ परन्तु उसने जिसने अपने पड़ौसी के साथ बुराई की थी, उसी ने मूसा को परे खदेड़ दिया, कहते हुए, तुझे किसने हमारे बीच अध्यक्ष या न्यायाधीष नियुक्त किया है भई?
२८ क्या तू मुझे मार डालेगा, जैसा तूने कल उस मिस्रवासी के साथ कर डाला था?
२९ तो इस कहने पर मूसा भाग खड़े हुए, और वो मिद्यान की भूमी में एक परदेशी थे, जहाँ उन्होंने दो बेटों को जनना।
३० और जब चालीस वर्ष बीत चुके थे, उन्हें सीनय पहाड़ के जँगली-क्षेत्र में एक झाड़ी की अग्नि लपट में, प्रभु के एक दूत प्रकट हुए।
३१ जब मूसा ने यह देखा, तो उन्होंने इस दृश्य पर अचरज किया: और जैसे वो उसे देखने के लिए निकट आए, उन्हें प्रभु की वाणी पहुँची,
३२ कहती हुई, मैं तुम्हारे पित्रों का ईश्वर हूँ, ईश्वर अब्राहम का, और ईश्वर इसहाक का, और ईश्वर याकूब का। तब मूसा थरथराने लग गए, और उन्होंने देखने का भी साहस नहीं किया।
३३ तो फिर प्रभु ने उन से कहा, अपने जूतों को अपने पैरों पर से उतार लो: क्योंकि यह स्थान जहाँ तुम खड़े हो, पवित्र भूमि है।
३४ मैंने देख लिया है, मैंने देख लिया है अपने लोगों पर वो अत्याचार जो मिस्र में है, और मैंने उनका कराहना सुन लिया है, और मैं नीचे उनका उद्धार करने आ गया हूँ। और भई अब आ जाओ, मैं तुम्हें मिस्र में भेजूँगा।
३५ इन मूसा को, जिन्हें उन्होंने अस्वीकार कर दिया था, कहते हुए, भई तुझे किसने अध्यक्ष या न्यायाधीष नियुक्त कर दिया है? इन्हीं मूसा को ईश्वर ने एक अध्यक्ष और एक मुक्तिदाता नियुक्त करके भेजा, उन दूत के हाथ जो उन्हें झाड़ी में प्रकट हुए थे।
३६ वही उन्हें बाहर निकाल लाए, उनके द्वारा मिस्र की भूमी में, और लाल समुद्र में, और चालीस वर्ष जँगली-क्षेत्र में, अद्भुत चमत्कारों और संकेतों का प्रदर्शन कर देने के पश्चात।
३७ यही हैं वो मूसा, जिन्होंने इस्राएल की सन्तानों से कहा था, प्रभु तुम्हारे ईश्वर तुम्हारे लिए मेरे ही जैसा एक पैग़म्बर तुम्हारे ही भाई-जनो में से उठ खड़ा कर देंगे, उन्हीं का तुम श्रवण करोगे।
३८ यही वो मूसा हैं, जो जँगली-क्षेत्र में कलिसिए में थे, उन दूत के साथ जिन्होंने उनके साथ और हमारे पित्रों के साथ, सीनय के पहाड़ पर वार्तालाप किया था: जिन्होंने वो प्रफुल्लित उक्तियाँ हमें प्रदान करने के लिए ग्रहण की थीं।
३९ जिनका हमारे पित्रों ने अनुपालन करना नहीं चाहा, बल्कि उन्हें अपने पास से खदेड़ दिया, और वो पुनः अपने हृदयों में मुड़ कर मिस्र वापस चले गए,
४० हारुन से कहते हुए, हमारे आगे-आगे जाने हेतु हमारे लिए ईश्वरों को निर्मित कर दो: क्योंकि इस मूसा के विषय में, जो हमें मिस्र की भूमी में से बाहर निकाल लाया, हम जानते नहीं कि उसका क्या बन गया है।
४१ और उन्होंने उन्हीं दिनो में एक बछड़ा बनाया, और उस मूर्ती को बली चढ़ाई, और अपने ही स्वयं के हाथों के कर्मों में उन्होंने हर्ष मनाया।
४२ तब ईश्वर मुड़े, और उन्होंने उन लोगों का स्वर्ग के सितारों की पूजा करने हेतु त्याग कर डाला; जैसा पैग़म्बरों की पुस्तक में लिखा हुआ है, तुम इस्राएल का घराना, क्या तुमने मेरे प्रति चालीस वर्षों तक जँगली-क्षेत्र में मारे हुए जानवर और बलियाँ चढ़ाए हैं क्या?
४३ हाँ भई, तुमने तो मोलक का तम्बू, और अपने ईश्वर रेमफैन का सितारा, वो मूर्तियाँ जो तुमने अपनी पूजा के लिए निर्मित कीं, वही तुमने उठाईं: और अब मैं तुम्हें उठाकर बैबिलौन के पार ले जाऊँगा।
४४ जँगली-क्षेत्र में हमारे पित्रों के पास वो साक्ष्य का तम्बू था, जैसा कि उन्होंने नियुक्त किया था, मूसा से बोलते हुए, कि उन्हें उसका निर्माण उस भूषाचारानुसार करना था, जो उन्होंने देखा था।
४५ जिसे हमारे पित्र भी जो बाद में यीशु के साथ आए, अन्यप्रजातियों के अधिकार में भीतर ले आए, जिन्हें ईश्वर ने हमारे पित्रों के चेहरों के सामने से खदेड़ दिया था, दाऊद के दिनो तक;
४६ जिन्होंने ईश्वर के समक्ष अनुग्रह पाया, और याचना की, कि वो याकूब के ईश्वर के लिए एक तम्बू ढूँढ सकें।
४७ परन्तु सुलेमान ने उनके लिए एक घर का निर्माण किया।
४८ जबकि वो अति उच्चतम हाथों से निर्मित मन्दिरों में नहीं बसते; जैसा कि वो पैग़म्बर कहते हैं,
४९ स्वर्ग मेरा सिंहासन है, और पृथ्वी मेरा पायदान है: तुम मेरे लिए किस घर का निर्माण करोगे? कहते हैं ईश्वर: या फिर क्या है मेरे विश्राम का वो स्थान?
५० क्या मेरे हाथ ने ही यह सब कुछ नहीं बनाया है क्या?
५१ तुम ऐंठी गर्दन वालों, और हृदय और कानों में बेख़तनित लोगों, तुम सदैव पवित्र-प्राण का विरोध करते रहते हो, जैसा तुम्हारे पित्रों ने किया था, तुम भी वैसा ही करते रहते हो।
५२ पैग़म्बरों में से किस-किस का तुम्हारे पित्रों ने अत्याचार नहीं किया? और उन्होंने उन्हें मार डाला जिन्होंने पहले से ही उन नेक के आगमन की घोषणा कर दी थी; जिनके तुम अब विश्वासघाती और हत्यारे बन चुके हो:
५३ जिन्होंने दूतों के माध्यम से नियम तो ग्रहण किया, परन्तु उसका पालन नहीं किया।
५४ तो जब उन्होंने यह बातें सुनी, तो उनके ह्रदयों पर आरे चल उठे, और वो स्तीफनुस पर अपने दाँत किटकिटाने लग गए।
५५ परन्तु वो पवित्र-प्राण से भरपूर, ऊपर स्वर्ग की ओर द्रिढ़ता से ताक रहा था, और उसने ईश्वर की महिमा को, और यीशु को ईश्वर के दाहिने हाथ पर खड़ा हुआ देखा।
५६ और कहा, देखो, मैं स्वर्गों को खुला हुआ, और मनुष्य-पुत्र को ईश्वर के दाहिने हाथ पर खड़ा हुआ देख रहा हूँ।
५७ तब वो एक प्रबल वाणी से चीख पड़े, और उन्होंने अपने कान बन्द कर लिए, और उस पर एक मत से झपट पड़े,
५८ और उसे नगर के बाहर फैंक कर, उस पर पथराव कर डाला: और उन गवाहों ने अपने कपड़े एक शाऊल नामक युवा पुरुष के पैरों में नीचे रख दिए।
५९ और वो स्तीफनुस पर पथराव कर रहे थे, जो ईश्वर को पुकारता हुआ कह रहा था, प्रभु यीशु, मेरे प्राणको ग्रहण कर लें जी।
६० और वो नीचे अपने घुटनों के बल था, और एक प्रबल वाणी से चीखा, प्रभु, इस पाप को इन पर मत लगाईएगा। और जब उसने ऐसा कह दिया था, तो वो सो गया।
आठवाँ अध्याय।
१ और शाऊल उसकी हत्या के समर्थन में था। और उस समय यरूशलेम में उस कलिसिए के विरुद्ध बहुत अत्याचार हो रहा था; और अपौस्लों के सिवा, अन्य सभी यहूदा और समैरिया के सर्वत्र के क्षेत्रों में बाहर तितर-बितर हो गए थे।
२ और श्रद्धालु पुरुष स्तीफनुस को उसके दफ़्न के लिए उठा ले गए, और उसके लिए बड़ा ही दुखद विलाप मनाया।
३ परन्तु शाऊल ने कलिसिए का विध्वंस कर डाला, प्रत्येक घर में घुस-घुस कर, वो पुरुषों और स्त्रियों को घसीट-घसीट कर कारावास में ढकेलता जा रहा था।
४ इसी कारण वश वो जो बाहर बिखरे हुए थे प्रत्येक स्थान में शब्द का प्रवचन देते हुए चलते जा रहे थे।
५ तो फिलिप नीचे समैरिया के नगर में चला गया, और उसने उन्हें मसीहा का प्रवचन दिया।
६ और एक-मन से उन लोगों ने उन बातों पर ध्यान दिया जो फिलिप बोल रहा था, उन चमत्कारों को सुनते और देखते हुए, जो वो कर रहा था।
७ क्योंकि प्रबल वाणी से चीखती हुई अस्वछ भावात्माएँ, उन कईयों में से बाहर निकल आईं, जो उनके वश में थे: और कई लकवे से ग्रस्त, और विकलांग, स्वस्थ कर दिए गए थे।
८ और उस नगर में बड़ा ही आनंद मच गया था।
९ परन्तु वहीं कोई एक सिमोन नामक व्यक्ति था, जो उसी नगर में भूतपूर्व समय से जादू-टोने के प्रयोग से समैरिया के लोगों को मोहित किए रखता था, यह कहता हुआ कि वो तो स्वयं ही कोई महान व्यक्ति है:
१० जिसे नीचे से ऊपर तक, वो सभी लोग ध्यान से सुनते थे, कहते हुए, भई यह व्यक्ति तो ईश्वर की महान-शक्ती है!
११ और वो लोग उसे मानते थे, क्योंकि एक लम्बे समय से उसने उन्हें जादू-टोनो द्वारा सम्मोहित किया हुआ था।
१२ परन्तु जब उन लोगों ने ईश्वर के राज्य की, और यीशु मसीह के नाम के विषय की बातों पर, फिलिप द्वारा दिए गए प्रवचनों पर विश्वास कर लिया था, तो वो बपतिस्मित हो गए, दोनो, पुरुष और स्त्रियाँ।
१३ तब सिमोन ने भी स्वयं विश्वास कर लिया: और जब वो बपतिस्मित हो चुका था, तो वो फिलिप के साथ लगा रहा, और वो उन चमत्कारों और संकेतों को देखता हुआ जो किए जा रहे थे, अचरज में पड़ गया।
१४ अब जब यरूशलेम में अपौस्लों ने सुना कि समैरिया ने ईश्वर का शब्द ग्रहण कर लिया था, तो उन्होंने पतरस और योहन को उनके पास भेज दिया:
१५ जिन्होंने, वहाँ नीचे पहुँच कर, उनके लिए प्रार्थना की, कि वो पवित्र-प्राण ग्रहण कर लें:
१६ (क्योंकि अभी तक वो उन में से किसी पर भी उतर नहीं पड़े थे: बस केवल वो लोग प्रभु यीशु के नाम में ही बपतिस्मित हुए थे।)
१७ तब उन्होंने उन पर अपने हाथ रखे, और उन्होंने पवित्र-प्राण को ग्रहण कर लिया।
१८ और जब सिमोन ने यह देखा कि अपौस्लों के हाथों के रखे जाने से पवित्र-प्राण प्रदान किए जा रहे थे, तो उसने उन्हें पैसे देने का प्रस्ताव रखा,
१९ कहते हुए, मुझे भी यह शक्ती प्रदान कर दें जी, ताकि जिस किसी पर भी मैं हाथ रखूँ, वो पवित्र-प्राण ग्रहण कर ले।
२० परन्तु पतरस ने उस से कहा, तुम्हारा पैसा तुम्हारे ही साथ नष्ट हो जाए, क्योंकि तुमने यह कल्पना की है कि ईश्वर का उपहार पैसे से खरीदा जा सकता है।
२१ इस विशय में तुम्हारे पास न ही कोई भाग न ही कोई अधिकार है: क्योंकि तुम्हारा हृदय ईश्वर की दृष्टि में ठीक नहीं है।
२२ इसलिए अपनी इस दुष्टता से मन-परिवर्तिन कर लो, और ईश्वर से प्रार्थना करो, यदि यह सम्भव हो कि तुम्हारे हृदय की यह कल्पना तुम्हारे प्रति क्षमा कर दी जाए।
२३ क्योंकि मैं यह आभास कर रहा हूँ कि तुम कड़वे-पित्त की कड़वाहट में, और अधर्मता के बन्धन में जकड़े हुए हो।
२४ तब सिमोन ने उत्तर दिया, और कहा, आप प्रभु से मेरे लिए प्रार्थना करें, कि इन में से कोई भी बात जो आप ने बोली है मुझ पर न बीते।
२५ और उन्होंने, जब प्रभु के शब्द का साक्ष्य और प्रवचन दे दिया था, तो वो यरूशलेम वापस लौट चले, और शुभ-समाचार का प्रवचन समैरिया-वासियों के कई गाँवों में दिया।
२६ और प्रभु के दूत ने फिलिप से कहा, कहते हुए, उठो, और दक्षिण की ओर उस पथ पर चले जाओ जो यरूशलेम से नीचे गाज़ा तक जाता है, जो निर्जन-क्षेत्र है।
२७ और वो उठकर चला गया: और, देखो तो, इथियोपियावासियों की रानी कैनदस के आधीन एक बड़ा ही प्रतिष्ठावान इथियोपिया का पुरुष, एक नपुंसक, जो उसके समस्त धन-कोष का अध्यक्ष था, और जो आराधना करने यरूशलेम आया था,
२८ वापस लौट रहा था, और अपने रथ में बैठा-बैठा पैग़म्बर यशायाह को पढ़ रहा था।
२९ तब प्राण ने फिलिप से कहा, निकट चले जाओ, और तुम स्वयं इस रथ के साथ लग जाओ।
३० और फिलिप वहाँ भाग कर उसके पास चला गया, और उसने उसे पैग़म्बर यशायाह को पढ़ता हुआ सुना, और कहा, क्या तुम समझ रहे हो जो तुम पढ़ रहे हो?
३१ और उसने कहा, मैं ये कैसे समझ सकता हूँ, सिवाय कि कोई मेरा मार्गदर्शन करे? और उसने इच्छा व्यक्त की, कि फिलिप उसके साथ रथ में ऊपर चढ़कर बैठ जाए।
३२ शास्त्र में वो स्थान जहाँ वो पढ़ रहा था, वो यह था, उन्हें एक भेड़ समान पशु-वध के लिए ले जाया गया; और कतरने वाले के समक्ष एक मूक मेमने के समान, उन्होंने अपना मुख नहीं खोला:
३३ उनके निरादर में, उनका न्याय उनसे छीन लिया गया: और कौन उनकी पीढ़ी की घोषणा करेगा? क्योंकि उनका जीवन इस पृथ्वी में से छीन लिया गया है।
३४ और उस नपुंसक ने फिलिप को उत्तर दिया, और कहा, मैं प्रार्थना करता हूँ जी आप से, पैग़म्बर यह किस के विषय में बोल रहे हैं? स्वयं के, या किसी अन्य व्यक्ति के विषय में?
३५ तब फिलिप ने अपना मूँह खोल कर उसी शास्त्र से आरम्भ कर-कर, उसे यीशु का प्रवचन दे दिया।
३६ और जैसे-जैसे वो अपने पथ पर जा रहे थे, वो किसी जलाशय पर आ पहुँचे: और नपुंसक ने कहा, देखो तो, यहीं यह जलाशय है; मुझे बप्तिसमित हो जाने में क्या विघ्न है?
३७ और फिलिप ने कहा, यदि तुम अपने सम्पूर्ण हृदय से विश्वास करते हो, तो तुम बपतिस्मित हो सकते हो। और उसने उत्तर दिया और कहा, मैं विश्वास करता हूँ कि यीशु मसीह ईश्वर के पुत्र हैं।
३८ और उसने आदेश दिया कि वो रथ रोक दिया जाए: और वो दोनो उस जलाशय में नीचे उतर गए, फिलिप और वो नपुंसक; और उसने उसका बपतिस्मा कर दिया।
३९ और जब वो दोनो उस जलाशय में से ऊपर बाहर निकल आए थे, तो प्रभु के प्राण फिलिप को पकड़ ले चले, कि उस नपुंसक ने उसे फिर नहीं देखा: और वो अपने पथ पर हर्ष मनाता-मनाता चलता चला गया।
४० परन्तु फिलिप अज़ोतस में पाया गया: और गुज़रते हुए उसने सभी नगरों में प्रवचन दिया, जब तक वो कैसरिया पहुँच गया।
नवाँ अध्याय।
१ और शाऊल, अभी भी प्रभु के शिष्यों को धमकाने की, और उनका संहार कर देने की साँसें भरता हुआ, उच्च पुरोहित तक जा पहुँचा,
२ और उसने उस से इच्छा व्यक्त की, कि वो उसे दमिश्क के यहूदी-आराधनालयों के नाम पत्र प्रदान कर दे, कि यदि वो इस पथ के किसी भी सदस्य को पाए, भले ही वो पुरुष हों या स्त्री, वो उन्हें बाँध कर यरूशलेम ला सके।
३ और वो यात्रा करता-करता दमिश्क के समीप पहुँच रहा था: और अचानक उसके चारों ओर स्वर्ग में से एक उजाला चमक उठा:
४ और वो धरती पर गिर पड़ा, और उसने एक वाणी सुनी उस से कहती हुई, शाऊल, शाऊल, तुम मेरा अत्याचार क्यों कर रहे हो भई?
५ और उसने कहा, जी आप कौन हैं, प्रभु? और प्रभु ने कहा, मैं यीशु हूँ जिसका तुम अत्याचार कर रहे हो: अँकुशों पर लात से ठोकर मारना तुम्हारे लिए कठिन है।
६ और वो काँपता और आश्चर्यचकित होता हुआ बोला, प्रभु, जी आप की क्या इच्छा है कि मैं करूँ? और प्रभु ने उस से कहा, उठो, और नगर में चले जाओ, और वो तुम्हें बता दिया जाएगा कि तुम्हें क्या करना है।
७ और वो आदमी जो उसके साथ यात्रा कर रहे थे, मूक खड़े रह गए, एक वाणी तो सुनते हुए, परन्तु कोई व्यक्ति न देखते हुए।
८ और शाऊल धरती पर से उठा; और जब उसकी आँखें खुलीं, तो उसने किसी को भी नहीं देखा: बल्कि वो उसका हाथ से नेतृत्व कर, उसे दमिश्क ले आए।
९ और वो तीन दिन दृष्टि-हीन रहा, और न ही उसने भोजन किया, न ही पानी पिया।
१० और दमिश्क में कोई एक अनन्याह नामक शिष्य था; और उस से प्रभु ने एक दृश्य में कहा, अनन्याह। और उसने कहा, देखें जी, मैं यहाँ हूँ प्रभु जी।
११ और प्रभु ने उस से कहा, उठो, और उस पथ में चले जाओ जो सीधा कहलाया जाता है, और यूदस के घर में तरसुस के एक शाऊल कहलाए जाने वाले की पूछ-ताछ करो: क्योंकि, देखो, वो प्रार्थना कर रहा है,
१२ और उसने एक दृश्य में एक अनन्याह नामक पुरुष को प्रवेश करते हुए, और उस पर हाथ रखते हुए देखा है, ताकि वो अपनी दृष्टि ग्रहण कर ले।
१३ तब अनन्याह ने उत्तर दिया, प्रभु जी, मैंने तो कईयों से इस व्यक्ति के विषय में सुना है, कि इसने यरूशलेम में आपके सन्तों के साथ कितनी बुराईयाँ की हैं:
१४ और यहाँ इसके पास प्रमुख पुरोहितों द्वारा, उन सभी को बन्दी बना देने का प्राधिकार है, जो भी आपके नाम का आह्वान करते हैं जी।
१५ परन्तु प्रभु ने उस से कहा, भई चले जाओ अपने रस्ते पर: क्योंकि यह मेरे लिए एक चुना हुआ पात्र है, अन्यप्रजातियों, और राजाओं, और इस्राएल की सन्तानों के समक्ष मेरा नाम ढोने हेतु:
१६ क्योंकि मैं इसे दिखलाऊँगा कि इसे मेरे नाम वास्ते कितनी बड़ी-बड़ी बातें सहन करनी हैं।
१७ और अनन्याह अपने पथ पर चला गया, और उस घर में प्रवेश किया; और उस पर अपने हाथ रखते हुए कहा, भाई शाऊल, यहाँ तक कि प्रभु यीशु ने ही, जो तुम्हारे आते हुए तुम्हें पथ पर प्रकट हुए थे, मुझे भेजा है ताकि तुम अपनी दृष्टि ग्रहण कर लो, और पवित्र-प्राण से भर जाओ।
१८ और तुरन्त ही उसकी आँखों पर से मानो जैसे शल्क गिर पड़े हों: और उसने झट से अपनी दृष्टि ग्रहण कर ली, और वो उठा, और बपतिस्मित हो गया।
१९ और जब उसने भोजन ग्रहण कर लिया था, तो वो सम्बल हो गया। तो शाऊल कुछ दिन उन शिष्यों के साथ रहा जो दमिश्क में थे।
२० और तुरन्त ही उसने यहूदी-आराधनालयों में मसीहा का प्रवचन दिया, कि वही ईश्वर के पुत्र हैं।
२१ परन्तु वो सभी जिन्होंने उसे सुना चकित रह गए, और कहा; क्या ये वही नहीं है जिसने यरूशलेम में इस नाम का आह्वान करने वालों को नष्ट कर डाला था, और ये उसी आशय से यहाँ आ पहुँचा, ताकि वो उन्हें बाँध कर प्रमुख पुरोहितों के पास ले जा सके?
२२ परन्तु शाऊल की शक्ति में वृद्धी होती चली गई, और यह प्रमाणित करते हुए कि यीशु ही मसीहा हैं, उसने दमिश्क में बसने वाले यहूदियों को चकरा दिया।
२३ और कई दिनो के बीतने की समाप्ति के पश्चात, यहूदियों ने उसकी हत्या कर देने का परामर्श किया:
२४ परन्तु शाऊल उनके षड्यंत्र से परिचित था। और वो दिन-रात दरवाज़ों पर उसकी हत्या कर देने के लिए पहरा दे रहे थे।
२५ तब शिष्यों ने उसे एक टोकरे में लेकर, रात्रि में ही दीवार के साथ नीचे उतार दिया।
२६ और जब शाऊल यरूशलेम आ पहुँचा था, तो उसने शिष्यों के साथ सम्मिलित होने का प्रयत्न किया: परन्तु वो सभी उस से डरते थे, और यह विश्वास नहीं किया कि वो एक शिष्य था।
२७ परन्तु बरनबास ने उसे लिया, और वो उसे अपौस्लों के पास ले आया, और उसने उन्हें यह विवरण दिया कि कैसे उसने प्रभु को पथ पर देखा था, और कि प्रभु उसके साथ बोले थे, और कैसे उसने यीशु के नाम में साहस के साथ दमिश्क में प्रवचन दिया था।
२८ और शाऊल का उनके साथ यरूशलेम में आना-जाना था।
२९ और वो यीशु के नाम में साहस के साथ बोला, और उसने यूनानियों के विरुद्ध तर्क-वितर्क किया: परन्तु वो उसकी हत्या कर देने के प्रयत्न में लगे हुए थे।
३० जिसकी जब भाई-जनों को जानकारी मिली, तो वो उसे नीचे कैसरिया ले आए, और उसे आगे तरसुस भेज दिया।
३१ तब यहूदा, गलील और समैरीया के समस्त सर्वत्र के कलिसियों को शान्ति प्राप्त हुई, और उनका आध्यात्मिक-निर्माण हुआ; और प्रभु के भय में, और पवित्र-प्राण की सान्त्वना में चलते-चलते, वो बहुगुणित हुए।
३२ और यह होने को आया, कि सभी क्षेत्रों में से गुज़रते हुए, पतरस लुद्दा में बसने वाले सन्तों के पास भी नीचे आ पहुँचा।
३३ और वहीं उसने किसी एक एनीयस नामक पुरुष को पाया, जो आठ वर्षों से अपना पलंग पकड़े था, और वो लकवे से बीमार था।
३४ और पतरस ने उस से कहा, एनीयस, यीशु मसीह तुम्हें स्वस्थ कर रहे हैं: उठो, और अपना बिस्तर बना लो। और वो तुरन्त ही उठ गया।
३५ और लुद्दा और सैरन में सभी बसने वालों ने उसे देखा, और प्रभु की ओर मुड़ गए।
३६ अब याफा में एक तबिथा नामक शिष्या थी, जो व्याख्यानुसार दौरकस है: यह स्त्री अच्छे कार्यों और दान-दक्षिणाओं से भरपूर थी, जिन्हें वो करती रहती थी।
३७ और यह होने को आया उन दिनो में, कि वो बीमार थी, और वो मर गई: जिसे जब उन्होंने स्नान करा दिया था, उन्होंने उसे एक ऊपर के कक्ष में लिटा दिया था।
३८ और चूँकी लुद्दा याफा के निकट ही था, और शिष्यों ने यह सुन लिया था कि पतरस वहीं था, उन्होंने उसके पास दो पुरुषों को भिजवा दिया, इस इच्छा से कि वो बिना विलम्ब किए उनके पास आ जाए।
३९ तो पतरस उठ कर उनके साथ चल दिया। जब उसका आगमन हो गया था, तो वो उसे उस ऊपर के कक्ष में ले आए: और वो सभी विधवाएँ रोती हुई उसके साथ खड़ी थीं, उन अंगरखों और वस्त्रों को दिखाती हुईं जो दौरकस ने बनाए थे, जब वो उनके साथ ही थी।
४० परन्तु पतरस ने उन सभी को बाहर भेज दिया, और नीचे अपने घुटनो के बल उसने प्रार्थना की; और उस शव की ओर मुड़ते हुए कहा, तबिथा उठ जाओ। और उसने अपने नयन खोले: और जब उसने पतरस को देखा, तो वो उठ कर बैठ गई।
४१ और पतरस ने उसे अपना हाथ दिया, और उसे ऊपर उठा लिया, और उसने उन सन्तों और विधवाओं को बुलाकर, उसे उन्हें जीवित प्रस्तुत कर दिया।
४२ और ये याफा के समस्त सर्वत्र में जान लिया गया था; और कईयों ने प्रभु में विश्वास कर लिया।
४३ और यह होने को आया, कि वो कई दिनो तक याफा में एक किसी सिमोन नामक चर्मकार के साथ ठहरा रहा।
दसवाँ अध्याय।
१ कैसरिया में एक कोई कोर्नेलियुस नामक पुरुष, जो इतालियानी-पलटन नामक एक पलटन का शतपती था,
२ एक श्रद्धालु व्यक्ति, जो अपने समस्त घराने समेत ईश्वर का भय माना करता था, जो लोगों को बहुत दान दिया करता था, और सदैव ईश्वर से प्रार्थना किया करता था।
३ उसने लगभग दिन की नवीं घड़ी में एक दृश्य में ईश्वर के एक दूत को उसके पास आते हुए, और उस से कहते हुए देखा, कोर्नेलियुस!
४ और जब उसने दूत को देखा, तो वो डर गया, और उसने कहा, जी क्या बात है, प्रभु? और दूत ने उस से कहा, तुम्हारी प्रार्थनाएँ और तुम्हारे दान ईश्वर के समक्ष स्मरण में आएँ हैं।
५ और तुम आदमियों को याफा भेज दो, और एक सिमोन उपनामित पतरस को बुलवा लो:
६ वो किसी एक सिमोन नामक चर्मकार के साथ वास कर रहा है, जिसका घर समुद्र-तट पर है: वही तुम्हें बताएगा कि तुम्हें क्या करना है।
७ और जब दूत ने कोर्नेलियुस के साथ वार्तालाप समाप्त कर प्रस्थान कर लिया था, तो उसने अपने घराने के दो नौकरों को, और उसकी निरन्तर सेवा करने वालों में से एक श्रद्धालु सैनिक को बुलाया;
८ और जब उसने उन्हें इन सभी बातों का विवरण दे दिया था, तो उसने उन्हें याफा भेज दिया।
९ अगले दिन, जैसे यह अपनी यात्रा पर नगर के निकट पहुँच रहे थे, पतरस घर की छत पर ऊपर लगभग छटी घड़ी में प्रार्थना करने गया:
१० और उसे बहुत कड़ी भूख लगी, और उसे भोजन करने की इच्छा हुई: परन्तु जैसे वो तैयारी कर रहे थे, वो अवचेतन में आविष्ट हो गया,
११ और उसने स्वर्ग को खुलता हुआ देखा, और कोई एक पात्र उसके पास नीचे उतरता हुआ, मानो कि वो चार कोनों में बुनी हुई एक बड़ी चादर हो, और वो पृथ्वी की ओर नीचे किया जा रहा था:
१२ जिस में पृथ्वी के समस्त प्रकार के चार पैरों वाले जानवर, और जँगली जानवर, और रेंगेते हुए जन्तु, और पवन में उड़ने वाले जन्तु थे।
१३ और उसे एक वाणी आई, उठो, पतरस; मार दो, और खा लो।
१४ परन्तु पतरस ने कहा, इस प्रकार नहीं, प्रभु जी; क्योंकि मैंने तो कभी भी कुछ भी जो अपवित्र या अस्वच्छ है, नहीं खाया है।
१५ और वो वाणी पतरस से पुनः दूसरी बार बोली, वो जो ईश्वर ने स्वच्छ बना दिया है, उसे तुम अपवित्र मत कहो।
१६ यह तीन बार किया गया: और वो पात्र पुनः ऊपर स्वर्ग में ग्रहण कर लिया गया।
१७ अब जब पतरस अपने स्वयं में दुविधा में पड़ गया था कि इस दृश्य का क्या अर्थ बनेगा जिसे उसने देखा था, देखो तो, कोर्नेलियुस द्वारा भेजे गए उन आदमियों ने सिमोन के घर के लिए पूछ-ताछ कर ली थी, और वो द्वार के सामने खड़े थे,
१८ और उन्होंने पुकारा, और पूछा यदि सिमोन, जिसका उपनाम पतरस था, वहीं ठहरा हुआ था क्या?
१९ अब जैसे पतरस उस दृश्य के विषय में विचार कर ही रहा था, प्राण ने उस से कहा, देखो भई, तीन आदमी तुम्हें ढूँढ रहे हैं।
२० इसलिए उठो, और तुम नीचे चले जाओ, और बिना कोई संदेह किए उनके साथ चले जाओ: क्योंकि मैंने ही इन्हें भेजा है।
२१ तब पतरस नीचे उन आदमियों के पास चला गया, जो उसके पास कोर्नेलियुस से भेजे गए थे; और उसने कहा, देखो, मैं वही हूँ जिसे तुम ढूँढ रहे हो: तुम्हारे आने का क्या कारण है?
२२ और उन्होंने कहा, शतपती कोर्नेलियुस, एक न्यायपूर्ण पुरुष, और जो ईश्वर से डरते हैं, और जो यहूदियों के समस्त राष्ट्र में सम्मानित हैं, उन्हीं को ईश्वर ने अपने एक पवित्र दूत द्वारा यह अनुदेश दिया कि वो आपको अपने घर बुलवा-भेजें, आप से शब्दों को सुनने हेतु।
२३ तब उसने उन्हें अन्दर बुला लिया, और उन्हें ठहरा दिया। और अगले दिन पतरस उनके साथ, और याफा के कुछ भाई-जनो के साथ, चला गया।
२४ और उसके अगले दिन उन्होंने कैसरिया में प्रवेश किया। और कोर्नेलियुस उनकी प्रतीक्षा में था, और उसने अपने कुलवालों को, और घनिष्ट मित्रों को एक साथ बुलवा लिया था।
२५ और जैसे पतरस अन्दर प्रवेश कर रहा था, कोर्नेलियुस उस से मिला, और वो उसके पैरों में नीचे गिर कर उसकी आराधना करने लगा।
२६ परन्तु पतरस ने उसे ऊपर उठाया, कहते हुए, खड़े हो जाओ भई; मैं भी स्वयं एक पुरुष ही तो हूँ।
२७ और जैसे वो उसके साथ बात चीत कर रहा था, उसने भीतर प्रवेश किया, और वहाँ कईयों को पाया जो एक साथ एकत्रित थे।
२८ और उसने उन से कहा, तुम जानते हो कि किसी भी यहूदी पुरुष के लिए यह नियम-विरुद्ध है, कि वो किसी भी अन्य राष्ट्र के व्यक्ति के साथ साहचर्य रखे, या उसके घर में प्रवेश करे; परन्तु ईश्वर ने मुझे यह दिखा दिया है कि मैं किसी भी व्यक्ति को अपवित्र या अस्वच्छ न पुकारूँ।
२९ इसलिए जैसे ही मुझे बुलवाया गया, मैं तुम्हारे पास बिना विरोध किए आ गया: इसलिए मैं पूछ रहा हूँ कि तुम ने मुझे किस आशय से बुलवा भेजा है?
३० और कोर्नेलियुस ने कहा, चार दिन पूर्व मैं इस घड़ी तक उपवास कर रहा था; और नौवी घड़ी में मैं अपने घर में प्रार्थना कर रहा था, और, देखो, मेरे समक्ष खड़े उज्ज्वलित वस्त्र पहने एक पुरुष
३१ ने कहा, कोर्नेलियुस, तुम्हारी प्रार्थना सुन ली गई है, और तुम्हारे दान ईश्वर की दृष्टि में स्मरण किए जा चुके हैं।
३२ इसलिए याफा में भिजवा दो, और सिमोन, जिसका उपनाम पतरस है, उसे यहाँ बुलवा लो; वो किसी एक चर्मकार सिमोन के घर में समुद्र तट पर निवास कर रहा है: और जब वो तुम्हारे पास आ जाता है, वही तुम्हारे साथ बात करेगा।
३३ इसलिए तुरँत ही मैंने आपके पास लोग भिजवा दिए; और आपने अच्छा किया कि आप आ गए हैं। अब इसलिए हम सभी यहाँ ईश्वर के समक्ष उन सभी बातों को सुनने हेतु प्रस्तुत हैं, जो आपको ईश्वर द्वारा आदेशित हैं।
३४ तब पतरस ने अपना मूँह खोल कर कहा, सच में मैं आभास कर रहा हूँ कि ईश्वर किसी भी व्यक्ति के प्रति पक्षपात नहीं करते:
३५ बल्कि प्रत्येक राष्ट्र में, वो जो उन से डरता है, और नेकी करता है, उनके द्वारा स्वीकृत हो जाता है।
३६ वो शब्द जो ईश्वर ने इस्राएल की सन्तानों को भेजा, यीशु मसीह द्वारा शान्ति प्रचारित करते हुए: (वही सभी के प्रभु हैं:)
३७ उस बपतिस्मा के पश्चात जिसका योहन ने प्रचार किया था, उस शब्द का, (मैं कहता हूँ), तुम जानते हो, जिसकी घोषणा गलील से आरम्भ हो कर, यहूदा के समस्त सर्वत्र में कर दी गई थी;
३८ कि कैसे ईश्वर ने नासरत के यीशु का पवित्र-प्राण के साथ, और शक्ति के साथ अभिषेक किया: जो अच्छे कर्म करते हुए, और दानव द्वारा उत्पीड़ित उन सभी को स्वस्थ करते हुए चलते गए; क्योंकि ईश्वर उनके साथ थे।
३९ और हम उन सभी कार्यों के साक्षी हैं जिन्हें उन्होंने दोनो यहूदियों की भूमी में, और यरूशलेम में किए; जिन्हें उन्होंने मार डाला और एक पेड़ पर टाँग दिया:
४० उन्हीं को ईश्वर ने तीसरे दिन उठाकर, उन्हें स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष कर दिया;
४१ सभी लोगों को नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा पहले से ही चुने हुए साक्षीयों को ही, हमें ही, जिन्होंने उनके साथ उनके मृतकों में से उठ जाने के पश्चात खाया और पिया है।
४२ और उन्होंने हमें आदेश दिया कि हम लोगों को प्रवचन दें, और यह साक्ष्य दें कि यह वही हैं जिन्हें ईश्वर ने सजीवितों और मृतकों का न्यायाधीष बनने हेतु विहित-नियुक्त कर दिया था।
४३ इन्हीं के प्रति सभी पैग़म्बर साक्ष्य देते हैं, कि इन्हीं के नाम द्वारा, जो कोई भी इन पर विश्वास कर लेगा पापों का परिहार प्राप्त कर लेगा।
४४ जैसे पतरस यह शब्द बोल ही रहा था, पवित्र-प्राण उन सभी पर उतर पड़े, जिन्होंने शब्द सुना।
४५ और वो ख़तनित विश्वासी जो पतरस के साथ आए थे, आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि अन्यप्रजातियों पर भी पवित्र-प्राण का उपहार उँडेल दिया गया था।
४६ क्योंकि उन्होंने उन्हें जीभों से बोलते हुए, और ईश्वर का आवर्धन करते हुए सुना। तब पतरस ने उत्तर दिया,
४७ क्या कोई भी व्यक्ति पानी की मनाही कर सकता है, कि इन लोगों का बपतिस्मा न हो, जिन्होंने पवित्र-प्राण को ग्रहण कर लिया है, जैसा कि हम ने भी किया है?
४८ और उसने उन्हें प्रभु के नाम में बप्तिसमित हो जाने का आदेश दे दिया। तब उन्होंने पतरस से प्रार्थना की, कि वो उनके साथ कुछ दिन ठहर जाए।
ग्यारहवाँ अध्याय।
१ और यहूदा में अपौस्लों और भाई-जनो ने सुना कि अन्यप्रजातियों ने भी ईश्वर का शब्द ग्रहण कर लिया था।
२ और जब पतरस ऊपर यरूशलेम आ पहुँचा था, तो ख़तनितों ने उसकी आलोचना की,
३ कहते हुए, तुमने बेख़तनित आदमियों के घर में प्रवेश किया, और उनके साथ भोजन भी खाया।
४ परन्तु पतरस ने इस घटना का आरम्भ से प्रतिपादन किया, और उसकी उन्हें क्रमशः अभिप्रेरणा की, कहते हुए,
५ मैं याफा नगर में प्रार्थना कर रहा था: और अवचेतन में आविष्ट हो एक दृश्य देखा, कोई एक पात्र नीचे उतरता हुआ, मानो कि वो कोई एक बड़ी चादर हो, जो अपने चारों कोनों से पृथ्वी की ओर नीचे किया जा रहा था; और वो मुझ तक पहुँच गया:
६ जिस पर जब मैंने अपनी आँखें गढ़ा ली थीं, मैंने ध्यान से देखा कि भई उस पर तो पृथ्वी के चौपाए जानवर, और जँगली जानवर, और रेंगेते हुए जन्तु, और पवन के उड़ने वाले जन्तु थे।
७ और मैंने एक वाणी सुनी मुझ से कहती हुई, उठो पतरस; मार दो और खा लो।
८ परन्तु मैंने कहा, ऐसे नहीं, प्रभु जी, क्योंकि किसी भी अपवित्र या अस्वच्छ भोजन ने कभी भी मेरे मूँह में प्रवेश नहीं किया है।
९ परन्तु उस वाणी ने स्वर्ग में से मुझे पुनः उत्तर दिया, वो जो ईश्वर ने स्वच्छ बना दिया है, उसे तुम अपवित्र मत कहो।
१० और यह तीन बार किया गया था: और वो सभी स्वर्ग में पुनः ऊपर खींच लिए गए।
११ और, देखो, तुरन्त ही तीन आदमी पहले से ही उस घर पर पहुँच चुके थे, जहाँ मैं था, मेरे पास कैसरिया से भेजे हुए।
१२ और प्राण ने मुझे बोला, कि मैं बिना किसी संदेह के इन आदमियों के साथ चला जाऊँ। इसके अतिरिक्त ये छह भाई भी मेरे साथ गए, और हमने उस व्यक्ति के घर में प्रवेश कर लिया:
१३ और उसने हमें बताया, कि उसने कैसे एक दूत को अपने घर में खड़े देखा था, उस से कहते हुए, आदमियों को याफा भेज दो, और सिमोन को बुलवा लो, जिसका उपनाम पतरस है;
१४ वही तुम्हें शब्द बताएगा, जिनके द्वारा तुम्हारा और तुम्हारे समस्त घराने का बचाव हो जाएगा।
१५ और जैसे मैंने बोलना आरम्भ किया, पवित्र-प्राण उन पर उतर पड़े, जैसे आरम्भ में हम पर।
१६ तब मैंने प्रभु के शब्द का स्मरण किया, कि उन्होंने कैसे कहा था, योहन ने तो वास्तव में पानी से बपतिस्मा किया; परन्तु तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र-प्राण द्वारा हो जाएगा।
१७ अब चूँकी ईश्वर ने इन्हें भी वही उपहार प्रदान कर दिया जैसे उन्होंने हमें प्रदान किया, जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास किया है; तो मैं कौन था, जो ईश्वर को रोक सकता था?
१८ तो जब उन्होंने इन बातों को सुन लिया था, वो चुप कर गए, और ईश्वर को गौरवान्वित किया, कहते हुए, तो फिर ईश्वर ने अन्यप्रजातियों को भी जीवन की ओर मन-परिवर्तन प्रदान कर दिया है।
१९ अब वो जो उस अत्याचार के कारण बाहर बिखर गए थे, जो स्तीफनुस को लेकर उठा था, वही दूर फैनिकिया, कुप्रुस और अन्ताकिया तक भी यात्रा करते हुए, शब्द का प्रवचन किसी और को नहीं, बस केवल यहूदियों को ही देते गए।
२० और उन में से कुछ पुरुष कुप्रुस और कुरेने से थे, जो, जब वो अन्ताकिया पहुँच गए थे, यूनानियों से बोले, प्रभु यीशु का प्रवचन देते हुए।
२१ और प्रभु का हाथ उनके साथ था: और बहुसंख्यकों ने विश्वास कर लिया, और प्रभु की ओर मुड़ गए।
२२ तब इन बातों के समाचार यरूशलेम के कलिसिए के कानों तक पहुँचे: और उन्होंने बरनबास को अन्ताकिया तक भी चले जाने के लिए भेज दिया।
२३ जिसने, जब वहाँ पहुँच कर ईश्वर की कृपा देख ली थी, प्रसन्न होकर उन सभी को अभिप्रेरित किया, कि वो एक ही हार्दिक-उद्देश्य के साथ प्रभु से चिपट कर रहें।
२४ क्योंकि वो एक अच्छा पुरुष था, पवित्र-प्राण और विश्वास से भरपूर: और कई लोग प्रभु के साथ जुड़ गए थे।
२५ तब बरनबास ने शाऊल को ढूँढने तरसुस की ओर प्रस्थान कर लिया।
२६ और जब उसने उसे खोज लिया था, तो वो उसे अन्ताकिया ले आया। और यह होने को आया, कि एक पूरे साल वो स्वयं कलिसिए के साथ एकत्रित रहे, और उन्होंने कई लोगों को शिक्षा प्रदान की। और अन्ताकिया में वो शिष्य सब से पहले मसीही कहलाए गए।
२७ और इन्हीं दिनो में यरूशलेम से पैग़म्बर अन्ताकिया आए।
२८ और उन में से एक एगबस कहलाया जाने वाला उठ खड़ा हुआ, और उसने प्राण द्वारा सूचित किया कि समस्त संसार में बहुत दुर्लभता आएगी: जिसकी होनी रोम के राजा क्लौदियुस के दिनो में घटी थी।
२९ तब शिष्यों ने, प्रत्येक व्यक्ति ने अपने सामर्थ्यानुसार ही, यहूदा में बसने वाले भाई-जनों के लिए सहायता भेजने का निश्च्य किया:
३० जिसे उन्होंने सम्पूर्ण भी किया, और उस सहायता को बरनबास और शाऊल के हाथों, वृद्ध-गणो तक भिजवा दिया।
बारहवाँ अध्याय।
१ अब, लगभग उस समय राजा हेरोदेस ने कलिसिए में से कुछों को व्यग्रित कर देने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए।
२ और उसने योहन के भाई याकूब को तलवार से मार डाला।
३ और यह देख कर कि इस कार्य से यहूदी प्रसन्न हो गए थे, उसने अग्रसर हो, पतरस को भी पकड़ लिया। (तब बेख़मीरी रोटी के दिन थे।)
४ और जब उसने उसे पकड़ लिया था, तो उसने उसे कारावास में डाल दिया, और उसे चार सैनिकों के गुट के चार दलों को उसकी पहरेदारी करने हेतु प्रदान कर दिया; इस आशय से कि वो पतरस को लोगों के समक्ष ईस्टर के पश्चात प्रस्तुत कर दे।
५ तो इसलिए पतरस को कारावास में रख दिया गया था: परन्तु कलिसिया उसके लिए ईश्वर से निरन्तर प्रार्थना कर रहा था।
६ और जब हेरोदेस उसे लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने ही वाला था, तो उसी रात पतरस दो बेड़ियों से बन्धा, दो सैनिकों के बीच सो रहा था: और संतरी द्वार के समक्ष कारावास पर पहरा दे रहे थे।
७ और, देखो, प्रभु का एक दूत पास आया, और कारावास में एक उजाला चमका, और उसने पतरस की छाती की करवट पर थपेड़ कर उसे ऊपर उठा दिया, कहते हुए, भई फुर्ती से ऊपर उठ जाओ। और उसकी बेड़ियाँ उसके हाथों पर से गिर गईं।
८ और दूत ने उस से कहा, अपनी कमर कस लो, और अपने जूते बाँध लो। और उसने ऐसा कर लिया। और वो दूत उस से कहता है, अपने वस्त्र लपेट लो, और मेरे पीछे-पीछे आ जाओ।
९ और वो बाहर निकल आया, और दूत के पीछे-पीछे चल दिया; और वो इसकी वास्तविकता नहीं जानता था; बल्कि उसने सोचा कि वो तो कोई दृश्य देख रहा था।
१० तो जब वो पहले और दूसरे पहरे को पार कर चले थे, वो उस लोहे के दरवाज़े तक पहुँच गए जो नगर की ओर ले जाता है; जो अपने आप से ही खुल गया: और वो बाहर निकल आए, और एक गली में से पार चलते गए; और झट से ही उस दूत ने उस से प्रस्थान कर लिया।
११ और जब पतरस अपनी जाग्रिती में वापस लौट आया था, तो उसने कहा, अब मैं निस्संदेह जान गया हूँ, कि प्रभु ने अपने दूत को भेज कर मेरा हेरोदेस के हाथ से बाहर, और यहूदी लोगों की सम्पूर्ण प्रत्याशा से उद्धार कर दिया है।
१२ और इस बात पर विचार करके, वो योहन उपनामित मार्कुस की माँ मरियम के घर पहुँच गया; जहाँ कई एक साथ एकत्रित होकर प्रार्थना कर रहे थे।
१३ और जैसे पतरस दरवाज़े के द्वार पर दस्तक दे रहा था, रोदा नामक एक युवती सुनने आई।
१४ और जब उसने पतरस की वाणी पहचान ली थी, तो उसने हर्ष के मारे दरवाज़ा ही नहीं खोला, बल्कि अन्दर भाग कर उसने यह बताया कि कैसे पतरस दरवाज़े के सामने खड़ा था।
१५ और उन्होंने उस से कहा, भई तुम तो पगला गई हो। परन्तु वो एकतार पुष्टि करती रही कि वो बात ऐसी ही है। तब उन्होंने कहा, भई वो तो उसका दूत है।
१६ परन्तु पतरस लगातार दस्तक देता ही रहा; और जब उन्होंने द्वार खोल कर पतरस को देखा, तो वो आश्चर्यचकित रह गए।
१७ परन्तु उसने, उनकी ओर हाथ से शान्ति बनाए रखने का संकेत किया, और उन्हें बताया कि कैसे प्रभु ने उसे कारावास में से बाहर निकाल लिया था। और उसने कहा, जाओ और यह सभी बातें याकूब, और भाई-जनो को बता दो। और उसने प्रस्थान कर लिया, और वो किसी अन्य स्थान में चला गया।
१८ अब जैसे ही दिन हो गया था, सैनिकों के बीच बहुत ही खलबली मच गई, कि पतरस का क्या बना।
१९ और जब हेरोदेस ने उसे ढूँढा, और उसे न पा सका, तो उसने सन्त्रियों की जाँच-पड़ताल की, और आदेश दिया कि उन्हें मृत्यु के घाट उतार दिया जाए। और वो यहूदा से नीचे कैसरिया चला गया, और वहीं ठहरे रहा।
२० और हेरोदेस टाय्र और सिदोन के निवासियों से अत्यंत अप्रसन्न था; परन्तु वह एक मन से उसके पास आए, और राजा के प्रबन्धक ब्लास्तुस को अपना मित्र बना लेने पर, शान्ति की कामना की; क्योंकि उनके देश का पोषण राजा की भूमी से ही होता था।
२१ और किसी एक स्थित दिवस पर हेरोदेस राजसी वस्त्र पहने, अपने सिंहासन पर बैठा, और उसने उन्हें एक भाषण दिया।
२२ और लोग चिल्ला पड़े कहते हुए, भई ये तो किसी ईश्वर की वाणी है, किसी मनुष्य की नहीं।
२३ और तुरन्त ही प्रभु के दूत ने हेरोदेस पर वार कर डाला, क्योंकि उसने ईश्वर को गौरव प्रदान नहीं किया: और उसे कीड़े खा गए, और उसने अपने प्राण त्याग दिए।
२४ परन्तु ईश्वर का शब्द बढ़ता और बहुगुणित होता चला गया।
२५ और जब बरनबास और शाऊल ने अपना सेवाकार्य पूर्ण कर लिया था, तो वो अपने साथ योहन उपनामित मार्कुस को लेकर, यरूशलेम से वापस लौट आए।
तेरहवाँ अध्याय।
१ अब अन्ताकिया के उस कलिसिए में बरनबास, और सिमियन जो कि कलुआ कहलाया जाता था, और कुरेने का लूसियस, और मनाएन जो चतुरादिदारूक हेरोदेस के साथ पला-बड़ा था, और शाऊल जैसे कुछ पैग़म्बर और शिक्षक थे।
२ और जैसे वो प्रभु की सेवा और उपवास कर रहे थे, पवित्र-प्राण बोले, बरनबास और शाऊल को मेरे लिए उस काम हेतु पृथक कर दो, जिसके लिए मैंने उन्हें बुलाया है।
३ और जब उन्होंने उपवास और प्रार्थना कर ली थी, और उन पर अपने हाथ रख दिए थे, तो उन्होंने उन्हें विदा कर दिया।
४ इस प्रकार पवित्र-प्राण द्वारा उनके बाहर भेज दिए जाने पर, उन्होंने सिलूकिया प्रस्थान कर लिया; और वहाँ से जलयात्रा कर वो कुप्रस चले गए।
५ और जब वो सलमिस में थे, तो उन्होंने यहूदियों के सभा-ग्रहों में ईश्वर के शब्द का प्रवचन दिया: और उनके पास योहन उनकी सेवा हेतु भी था।
६ और जब वो पाफुस नामक द्वीप में से चलते जा रहे थे, तो उन्हें वहाँ एक कोई जादू-टोना करने वाला, झूठा यहूदी पैग़म्बर मिला, जिसका नाम बर-यीशु था:
७ जो उस देश के अध्यक्ष, एक विवेकी पुरुष सरगियुस पौलुस के साथ था; जिसने बरनबास और शाऊल को बुलवाया, और उसने ईश्वर के शब्द को सुनने की इच्छा व्यक्त की।
८ परन्तु एलिमस उस जादू-टोना करने वाले ने (क्योंकि यही उसका नाम व्याख्यानुसर था) उनका विरोध किया, उस अध्यक्ष को विश्वास से परे मोड़ देने हेतु।
९ तब शाऊल ने, (जो पौलुस भी कहलाया जाता है) पवित्र-प्राण से भर कर, अपने नेत्र उस पर गढ़ा दिए,
१० और कहा, अरे ओ समस्त चालाकी और कपटता से भरे हुए दानव की सन्तान, सर्व-नेकी का तू शत्रु, भई क्या तू प्रभु के सही पथों को विकृत करना नहीं छोड़ेगा क्या?
११ और अब देख ले, प्रभु का हाथ तुझ पर आ पड़ा है, और तू अन्धा हो जाएगा, और सूर्य को कुछ समय तक नहीं देखेगा। और तुरन्त ही उस पर एक धुँध और एक अन्धकार छा गया; और वो ढूँढने लग गया कि कोई उसका हाथ पकड़ कर उसे ले चले।
१२ तब उस अध्यक्ष ने, जब उसने देखा कि क्या कर दिया गया था, विश्वास कर लिया, प्रभु की शिक्षा पर आश्चर्यचकित होता हुआ।
१३ अब जब पौलुस और उसके साथी पाफुस छोड़ चले थे, तो वो पंफुलिया में परगा आ पहुँचे; और योहन उन्हें छोड़ कर यरूशलेम वापस आ गया।
१४ परन्तु जब उन्होंने परगा से प्रस्थान कर लिया था, तो वो पिसिदिया में अन्ताकिया आ गए, और सैबथ के दिन यहूदी-आराधनालय में जाकर बैठ गए।
१५ और नियम और पैग़म्बरों के पढ़ लिए जाने के पश्चात, यहूदी-आराधनालय के अध्यक्षों ने उन्हें कहलवा भेजा, तुम पुरुषों और भाईयों, यदि तुम्हारे पास लोगों की अभिप्रेरणा के लिए कोई शब्द हो, तो बता दो।
१६ तब पौलुस ने उठ कर अपने हाथ द्वारा संकेत करते हुए कहा, इस्राएल के पुरुषों, और तुम जो ईश्वर से डरते हो, सुनो अब।
१७ इस्राएल के इन लोगों के ईश्वर ने हमारे पित्रों को चुन कर उन्हें पदोन्नत कर दिया, जब वो परदेशियों जैसे मिस्र की भूमी में बसा करते थे, और वह अपने भारी बाहुबल से उन्हें उस में से बाहर निकाल लाए।
१८ और उन्होंने जँगली-क्षेत्र में उनके बर्तावों को लगभग चालीस वर्षों तक सहा।
१९ और जब उन्होंने कनान की भूमी में सात राष्ट्रों को नष्ट कर डाला था, तो उन्होंने उनकी भूमी को उनके प्रति पर्चियाँ डलवा कर विभाजित कर दिया।
२० और इसके पश्चात उन्होंने उन्हें लगभग चार सौ पचास वर्षों तक न्यायाधीष दिए, शमूएल पैग़म्बर तक।
२१ और तत्-पश्चात् उन्होंने एक राजा की माँग की: तो ईश्वर ने उन्हें किश का बेटा शाऊल, बिन्यामिन की प्रजाति का एक पुरुष, चालीस वर्षों के लिए प्रदान कर दिया।
२२ और जब उन्होंने उसे हटा दिया था, तो उन्होंने दाऊद को उनका राजा बन जाने के लिए खड़ा कर दिया; जिनके प्रति उन्होंने साक्ष्य भी दिया, और कहा, मैंने यिशय के बेटे दाऊद को ढूँढ लिया है, एक पुरुष जो मेरे अपने ही हृदय के पीछे पड़ा हुआ है, जो मेरी सम्पूर्ण इच्छा को पूर्ण करेगा।
२३ इसी व्यक्ति के बीज में से ही ईश्वर ने अपने वचनानुसार, इस्राएल के लिए एक बचानेवाले उठा दिए हैं, यीशु ही:
२४ जब योहन ने उनके आगमन से पूर्व, पहले ही इस्राएल के सभी लोगों को मन-परिवर्तन के बपतिस्मा का प्रवचन दे दिया था।
२५ और जैसे योहन अपना कार्यकाल पूरा कर रहे था, तो उसने कहा, तुम क्या सोचते हो कि मैं कौन हूँ? मैं वो नहीं हूँ। परन्तु देखो, मेरे पश्चात एक आ रहे हैं, जिनके चरणों के जूते भी मैं खोलने के योग्य नहीं हूँ।
२६ पुरुषों और भाईयों, अब्राहम की वंशावली की सन्तानों, और तुम्हारे बीच जो कोई भी ईश्वर से डरता है, तुम्हें ही इस बचाव का शब्द भेज दिया गया है।
२७ क्योंकि वो जो यरूशलेम में बसते हैं, और उनके शासक, चूँकि उन्होंने उन्हें नहीं पहचाना, न ही इस वर्तमान तक भी वो पैग़म्बरों के शब्दों से परिचित हैं, जो प्रत्येक सैबथ पर पढ़े जाते हैं, इन्हीं ने यीशु को दण्डनीय-घोषित कर, पैग़म्बरों के शब्दों को पूर्ण कर दिया है।
२८ और यद्यपि इन्होंने उन में मृत्युदण्ड का कोई भी कारण नहीं पाया, तद्यपि उन्होंने पिलातुस से माँग की, कि उनकी हत्या कर दी जाए।
२९ और जब उन्होंने वो सब कुछ पूर्ण कर दिया था, जो भी उनके विषय में लिखा गया था, तो उन्होंने उन्हें पेड़ पर से नीचे उतार कर उन्हें एक मक़बरे में लिटा दिया।
३० परन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से उठा दिया:
३१ और कईयों ने उन्हें कई दिनो तक देखा, उन में से जो उनके साथ गलील से ऊपर यरूशलेम आए थे, जो लोगों के प्रति उनके साक्षी हैं।
३२ और हम तुम्हें शुभ समाचार की घोषणा करते हैं, कि कैसे वो वचन जो पित्रों को दिया गया था,
३३ ईश्वर ने उसी को हमारे, उनकी सन्तानों के प्रति पूर्ण कर दिया है, कि उन्होंने यीशु को पुनः ऊपर उठा दिया है; जैसा कि यह दूसरे भजन में भी लिखा गया है, तुम मेरे पुत्र हो, इसी दिन मैंने तुम्हें जनना है।
३४ और इस विषय में कि उन्होंने उन्हें मृतकों में से ऊपर उठा दिया, अब और भ्रष्टता में वापस जाने के लिए नहीं, उन्होंने इस प्रकार से कहा, मैं तुम्हें दाऊद की विश्वसनीय दयालुताएँ प्रदान कर दूँगा।
३५ इसी कारण वो किसी अन्य भजन में भी कहते हैं, आप अपने पवित्र-एक को भ्रष्टता देखने की अनुमती नहीं देंगे।
३६ क्योंकि दाऊद, ईश्वर की इच्छा द्वारा अपनी पीढ़ी की सेवा कर लेने के पश्चात, सो गए थे, और वो अपने पित्रों के साथ लिटा दिए गए थे, और उन्होंने भ्रष्टता देखी:
३७ परन्तु उन्होंने, जिन्हें ईश्वर ने पुनः उठा दिया, कोई भी भ्रष्टता नहीं देखी।
३८ इसलिए पुरुषों और भाईयों, यह तुम्हें ज्ञात हो जाए, कि इन्हीं व्यक्ति द्वारा तुम्हें पापों की क्षमा का प्रवचन दिया जा रहा है:
३९ और इन्हीं के द्वारा, वो सभी जो विश्वास करते हैं सभी बातों समबन्धी न्यायी-प्रमाणित हैं, जिन से तुम मूसा के नियम द्वारा न्यायी-प्रमाणित नहीं हो सकते थे।
४० इसलिए सावधान हो जाओ, कहिं तुम पर वो आ पड़े, जो पैग़म्बरों में बोला गया है;
४१ देख लो भई, तुम तिरस्कारकों, और अचरज करो, और नष्ट हो जाओ: क्योंकि मैं तुम्हारे दिनो में एक ऐसा कार्य क्रियान्वित कर रहा हूँ, एक ऐसा कार्य जिस पर तुम किसी भी प्रकार से विश्वास नहीं करोगे, भले ही कोई तुम्हें उसकी घोषणा करे।
४२ और जब यहूदी उस यहूदी-आराधनालय में से बाहर निकल आए थे, तो अन्यप्रजातियों ने उन से विनती की, कि इन्हीं शब्दों का प्रवचन उन्हें आगामी सैबथ पर दे दिया जाए।
४३ अब जब वो सभा विसर्जित हो चुकी थी, तो यहूदी और धार्मिक-धर्मांतरित लोगों में से कई पौलुस और बरनबास के पीछे-पीछे चल दिए: जिन्होंने उन से बोलते हुए, उन्हें विश्वस्त किया कि वो ईश्वर की कृपा में चलते रहें।
४४ और अगले सैबथ के दिन, लगभग वो समस्त नगर एक साथ ईश्वर के शब्द को सुनने आ पहुँचा।
४५ परन्तु जब यहूदियों ने उन जनौघों को देखा, तो वो तो भई ईर्षा की जलन से भर उठे, और पौलुस द्वारा बोली गई बातों के विरुद्ध, खण्डन और निन्दा करते हुए बोले।
४६ तब पौलुस और बरनबास ने बड़ी ही निडरता से कहा, यह आवश्यक था कि ईश्वर का शब्द पहले तुम्हें बताया जाए: परन्तु यह देखते हुए कि तुम उसे अपने से दूर कर रहे हो, और स्वयं को अनन्तकाल जीवन के अयोग्य ठहरा रहे हो, लो, हम तो अन्यप्रजातियों की ओर मुड़ रहे हैं,
४७ क्योंकि ऐसा ही प्रभु ने हमें आदेश दिया है, मैंने तुम्हें अन्यप्रजातियों का एक उजाला बना दिया है, ताकि तुम पृथ्वी की अन्तिम सीमाओं तक बचाव का माध्यम बन जाओ।
४८ और जब अन्यप्रजातियों ने यह सुना, तो वो प्रसन्न हो उठे, और उन्होंने प्रभु का शब्द गौरवान्वित किया: और जो भी अनन्त जीवन प्रति विहित-नियुक्त थे उन्होंने विश्वास कर लिया।
४९ और प्रभु का शब्द उस समस्त क्षेत्र में घोषित कर दिया गया था।
५० परन्तु यहूदियों ने श्रद्धालु और प्रतिष्ठित स्त्रियों को, और नगर के मुख्य नेताओं को भड़का कर, पौलुस और बरनबास के विरुद्ध अत्याचार खड़ा कर दिया, और उन्हें अपनी सीमाओं में से बाहर खदेड़ डाला।
५१ परन्तु उन्होंने उनके विरुद्ध अपने पैरों पर से धूल झाड़ ली, और वो इकोनियुम आ गए।
५२ और वो शिष्य आनंद से, और पवित्र-प्राण से भरे हुए थे।
चौदहवाँ अध्याय।
१ और इकोनियुम में यह होने को आया, कि वो दोनो एक साथ यहूदियों के सभाग्रह में गए, और ऐसे बोले, कि दोनो यहूदियों और अन्यप्रजातियों के भी एक बड़े जनौघ ने विश्वास कर लिया।
२ परन्तु अविश्वासी यहूदियों ने अन्यप्रजातियों को भड़का कर, भाई-जनो के विरुद्ध उनके मन द्वेषता से भर दिए।
३ तो इसलिए एक दीर्घ-काल के लिए वो वहीं रहे, प्रभु में साहस से प्रवचन देते हुए, जिन्होंने अपनी कृपा के शब्द का साक्ष्य, और उनके हाथों द्वारा संकेत और अचरज भरे कार्यों की क्रिया का अनुदान दिया।
४ परन्तु नगर का जनौघ विभाजित था: और एक भाग यहूदियों की पकड़ में था, और दूसरा भाग अपौस्लों की।
५ और जब दोनो अन्यप्रजातियों, और यहूदियों ने भी अपने अध्यक्षों से मिलकर, उनके साथ अपमानजनक दुर्व्यवहार, और उन पर पथराव करने के लिए घर्षण किया,
६ तो उन्हें इसका ज्ञान था, और वो लुकाओनिया के नगरों, लुस्त्रा और दिरबे, और उनके आस पास के क्षेत्र में भाग खड़े हुए:
७ और वहीं उन्होंने शुभ-समाचार का प्रवचन दिया।
८ और वहीं लुस्त्रा में कोई एक अपने पैरों में निर्बल आदमी बैठा करता था, जो अपनी माँ के गर्भ से ही विकलांग था, जो कभी भी चल नहीं पाया था:
९ उसी ने पौलुस को बोलते हुए सुना: जिसने उसकी ओर दृढ़ता से देखते हुए, और आभास करते हुए कि उस में स्वस्थ होने का विश्वास था,
१० एक प्रबल वाणी से कहा, अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। और वो उछल कर चल पड़ा।
११ और जब लोगों ने देखा कि पौलुस ने क्या कर दिया था, तो उन्होंने अपनी वाणियाँ उठा कर, लुकाओनिया की भाषा में कहा, मनुष्यों की समानता में हमारे पास ईश्वरों का नीचे आगमन हो गया है भई!
१२ और उन्होंने बरनबास को ज़्यूस पुकारा; और पौलुस को हरमीज़, क्योंकि वो प्रमुख वक्ता था।
१३ तब ज़्यूस का पुरोहित, जो उनके नगर के सामने था, मन्दिर के दरवाज़ों तक लोगों के साथ बली चढ़ाने की इच्छा से बैलों और पुष्पहारों को ले आया।
१४ जिसके विषय में जब अपौस्लों बरनबास और पौलुस ने सुना, तो उन्होंने अपने कपड़े फाड़ डाले, और वो उन लोगों के बीच में भागे, चीखते हुए,
१५ और कहते हुए, श्रीमानो, तुम यह कार्य क्यों कर रहे हो भई? हम भी तो तुम्हारे ही समान मनोभाव रखने वाले मनुष्य हैं, और तुम्हें प्रवचन दे रहे हैं कि तुम इन व्यर्थताओं से जीवन्त ईश्वर की ओर मुड़ जाओ, जिन्होंने स्वर्ग, और पृथ्वी, और समुद्र, और उन में सभी कुछ बनाया है:
१६ जिन्होंने बीते कालों में सभी राष्ट्रों को अपने-अपने मार्गों पर चलने दिया।
१७ तब भी उन्होंने स्वयं को साक्ष्यहीन नहीं छोड़ा, कि उन्होंने अच्छा किया, और हमें स्वर्ग में से वर्षा, और फल-भरी ऋतुएँ प्रदान कीं, हमारे हृदयों को भोजन और प्रसन्नता से भरते हुए।
१८ और इन्हीं कथनो द्वारा वो कठिनाई से ही उन लोगों को उनके प्रति बलि चढ़ाने से रोक पाए।
१९ और वहीं अन्ताकिया और इकोनियुम से कुछ यहूदी आ पहुँचे, जिन्होंने लोगों को मनवाकर, और पौलुस पर पथराव करवा कर, यह समझते हुए कि वो मर गया था, उसे नगर से बाहर घसीट कर ले गए।
२० परन्तु, जैसे शिष्य उसके आस-पास चारों ओर खड़े थे, तो वो उठ गया, और नगर के अन्दर आ गया, और अगले दिन उसने बरनबास के साथ दिरबे की ओर प्रस्थान कर लिया।
२१ और जब उन्होंने उस नगर को शुभ-समाचार का प्रवचन दे दिया था, और कईयों को शिक्षा प्रदान कर दी थी, तो वो वापस लुस्त्रा, और इकोनियुम, और अन्ताकिया आ गए,
२२ शिष्यों की आत्माओं को सुदृढ़ करते हुए, और उन्हें अभिप्रेरणा देते हुए कि वो विश्वास में बने रहें, और कि हमें ईश्वर के राज्य में अनेक आपत्तियों में से निकल कर ही प्रवेश करना होगा।
२३ और जब उन्होंने प्रत्येक कलिसिए में वृद्धों को विहित-नियुक्त कर दिया था, और उपवासों के साथ प्रार्थना कर ली थी, तो उन्होंने उन्हें प्रभु को सौंप दिया, जिन पर उन्होंने विश्वास किया था।
२४ और जब वो पिसिदिया के समस्त क्षेत्र में से जा चुके थे, तो वो पंफुलिया आ गए।
२५ और जब उन्होंने शब्द का प्रवचन परगा में दे दिया था, तो वो नीचे अत्तालिया में चले गए:
२६ और वहाँ से जलयात्रा कर वो अन्ताकिया आ गए, जहाँ से उन्हें ईश्वर की कृपा में, उस कार्य के लिए, जिसे उन्होंने पूर्ण कर दिया था, अनुशंसित किया गया था।
२७ और जब वो आ गए थे, तो उन्होंने कलिसिए को एकत्रित कर, उन्हें वो सब कुछ प्रतिपादित कर दिया, जो ईश्वर ने उनके साथ किया था, और कि कैसे ईश्वर ने अन्यप्रजातियों के लिए विश्वास के द्वार खोल दिए थे।
२८ और उन्होंने वहीं शिष्यों के साथ एक दीर्घ-काल के लिए निवास किया।
पन्द्रहवाँ अध्याय।
१ और यहूदा से नीचे आए कुछ आदमियों ने भाई-जनो को सिखाया, सिवाय कि तुम मूसा की रीतिनुसार ख़तनित हो, तुम बच नहीं पाओगे।
२ इसलिए जब पौलुस और बरनबास की उनके साथ बड़ी ही विसम्मिति, और तर्क-वितर्क हो चुका था, तो उन्होंने यह निश्च्य किया कि पौलुस और बरनबास, और उन में से कुछ अन्य, ऊपर यरूशलेम में अपौस्लों और वृद्धों के पास इस प्रश्न के विषय में चले जाएँ।
३ और कलिसिए द्वारा अपने पथ पर विदा कर देने के पश्चात, वो फैनिकिया और समैरिया में से होते हुए चलते गए, अन्यप्रजातियों की वापसी की घोषणा करते हुए: और उन्होंने सभी भाई-जनो को बहुत ही आनंदित कर दिया।
४ और जब वो यरूशलेम पहुँच गए थे, तो कलिसिए ने, और अपौस्लों और वृद्धों ने उनका स्वागत किया, और उन्होंने उन सभी बातों की घोषणा की जो ईश्वर ने उनके साथ की थीं।
५ परन्तु विश्वासी फैरिसियों के सम्प्रदाय में से कुछ उठ खड़े हुए, कहते हुए, कि यह आवश्यक था कि उन्हें ख़तनित किया जाए, और आदेश दिया जाए कि वो मूसा के नियम को रखें।
६ और अपौस्ल और वृद्ध-गण इस विषय पर विचार करने एक साथ आ गए।
७ और जब बहुत तर्क-वितर्क किया जा चुका था, तो पतरस ऊपर उठा, और उसने उन से कहा, पुरुषों और भाईयों, तुम जानते हो कि बहुत समय पूर्व ईश्वर ने हमारे बीच यह चयन किया था, कि अन्यप्रजातियाँ मेरे मूँह द्वारा शुभ-समाचार का शब्द सुने, और विश्वास कर लें।
८ और ईश्वर ने जो हृदयों से परिचित हैं, उन्हें साक्ष्य दिया, उन्हें पवित्र-प्राण प्रदान कर कर, जैसे उन्होंने हमारे साथ भी किया:
९ और हमारे और उनके बीच कोई भी अन्तर नहीं किया, उनके हृदयों को विश्वास द्वारा शुद्ध कर के।
१० इसलिए अब तुम ईश्वर को क्यों परख रहे हो भई, शिष्यों की गर्दनों पर एक जूआ लादने हेतु, जिसे न ही हमारे पित्र और न ही हम ढोने में सक्षम थे?
११ परन्तु हम विश्वास करते हैं कि प्रभु यीशु मसीह की कृपा द्वारा हमारा बचाव हो जाएगा, जैसे उनका भी।
१२ तब वो पूरी सभा चुप कर गई, और उन्होंने बरनबास और पौलुस को सुनवाई दी, घोषणा करते हुए, कि कौन-कौन से चमत्कार और अचरज भरे कार्य ईश्वर ने उनके द्वारा अन्यप्रजातियों के बीच किए थे।
१३ और उनके चुप हो जाने के पश्चात, याकूब ने उत्तर दिया, कहते हुए, पुरुषों और भाईयों, श्रवण करो मेरा;
१४ सिमियन ने घोषित कर दिया है कि कैसे आरम्भ में ईश्वर ने अन्यप्रजातियों पर दृष्टि टिकाई, उन में से अपने नाम के लिए एक लोग पृथक कर देने हेतु।
१५ और इस बात से पैग़म्बरों के शब्द सहमत होते हैं; जैसा कि यह लिखा हुआ है,
१६ इसके पश्चात मैं वापस लौटूँगा, और दाऊद के तम्बू का पुनर्निर्माण करूँगा, जो नीचे गिरा हुआ है; और मैं पुनः उसके खँडहरों का निर्माण कर दूँगा, और मैं उसे ऊपर खड़ा कर दूँगा:
१७ ताकि वो शेष लोग और वो समस्त अन्यप्रजातियाँ प्रभु को ढूँढें, जिन पर मेरे नाम का आह्वान किया जाता है, कहते हैं प्रभु, जो यह सभी कार्य करते हैं।
१८ संसार के प्रारम्भ से ही ईश्वर को अपने सभी कार्यों की जानकारी है।
१९ इसी कारण वश मेरा निर्णय यह है, कि हम उन्हें न सताएँ, जो अन्यप्रजातियों के बीच में से ईश्वर की ओर मुड़ चुके हैं:
२० बल्कि हम उन्हें लिखें, कि वो मूर्तियों के प्रदूषणों से, और अविवाहित-यौन से, और घोंटे हुओं से, और रक्त से बच-कर रहें।
२१ क्योंकि प्राचीन समय के मूसा के पास, प्रत्येक नगर में वो हैं जो उसके प्रवचन देते हैं, जो प्रत्येक सैबथ के दिन यहूदी-आराधनालयों में पढ़े जाते हैं।
२२ तब अपौस्ल और वृद्ध सम्पूर्ण कलिसिए के संग सहमत हो गए, कि उन्हीं के समूह में से कुछ चुने हुए पुरुष, पौलुस और बरनबास के साथ अन्ताकिया भेज दिए जाएँ; यूदस जिसका उपनाम बारसबस था, और सीलास, भाई-जनो के बीच मुख्य प्रमुख:
२३ और उन्होंने उनके हाथ से इस प्रकार लिखा; अपौस्ल और वृद्ध-गण और भाई-जन, उन अन्यप्रजातियों के भाई-जनो को प्रणाम भेज रहे हैं, जो अन्ताकिया, और सिरीया, और किलिकिया में हैं:
२४ चूँकी हमने सुना है, कि कुछों ने, जो हमारे पास से बाहर निकल कर गए थे, तुम्हें शब्दों द्वारा सताया है, तुम्हारे प्राणों को विकृत करते हुए, कहते हुए, कि तुम्हें अवश्य ही ख़तनित होना पड़ेगा, और नियम को रखना पड़ेगा: जिन्हें हमने ऐसा कोई भी आदेश नहीं दिया था:
२५ हमें एक मत से एकत्रित हो यह अच्छा प्रतीत हुआ, कि हम अतिप्रीय बरनबास और पौलुस के साथ, चुने हुए पुरुषों को तुम्हारे पास भेज दें,
२६ पुरुष जिन्होंने अपने जीवनों को हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम के वास्ते संकट में डाला है।
२७ हमने इसलिए यूदस और सीलास को भेजा है, जो तुम्हें भी वही बातें अपने मुखों से बताएँगे।
२८ क्योंकि यह पवित्र-प्राण को अच्छा प्रतीत हुआ, और हमें भी, कि इन आवश्यक बातों के सिवा तुम पर और कोई भारी बोझ न लादा जाए;
२९ कि तुम मूर्तियों पर चढ़ाए गए भोजनों से, और रक्त से, और घोंटे हुओं से, और अविवाहित-यौन से परहेज़ रखो: जिन से यदि तुम स्वयं को दूर रखोगे, तुम भलाई करोगे। तुम्हारे साथ भला रहे।
३० तो जब उन्हें विदा कर दिया गया था, वो अन्ताकिया आ पहुँचे: और जब उन्होंने जनौघ को एक साथ एकत्रित कर लिया था, तो उन्होंने वो पत्र प्रदान कर दिया:
३१ जिसे जब उन्होंने पढ़ लिया था, वो उस सान्त्वना से हर्षित हो उठे।
३२ और यूदस और सीलास ने भी, स्वयं पैग़म्बर होते हुए, भाई-जनो को कई शब्दों द्वारा अभिप्रेरित, और सुदृढ़ किया।
३३ और जब वो वहाँ कुछ समय ठहर चुके थे, तो उन्हें भाई-जनो के पास से शान्ति से अपौस्लों के पास विदा कर दिया गया।
३४ किन्तु सीलास अभी वहीं वास करने में प्रसन्न था।
३५ पौलुस भी और बरनबास अन्ताकिया में रहते रहे, प्रभु के शब्द को कई अन्यों के साथ, सिखाते और उसका प्रवचन देते हुए।
३६ और कुछ दिनो पश्चात पौलुस ने बरनबास से कहा, हम पुनः जाकर अपने भाई-जनो से प्रत्येक नगर में भेंट करते हैं, जहाँ हमने प्रभु के शब्द का प्रवचन दिया है, और हम देखते हैं कि वो कैसे हैं।
३७ और बरनबास ने उनके साथ योहन को ले जाने का निश्च्य किया, जिसका उपनाम मार्कुस था।
३८ परन्तु पौलुस की सोच में यह अच्छा नहीं था कि उसे उनके साथ ले जाया जाए, जिसने पंफुलिया में उन्हें छोड़ दिया था, और उनके साथ कार्य करने नहीं गया था।
३९ और उनके बीच वो विसम्मिति इतनी तीव्र थी, कि वो पृथक होकर, एक दूसरे से अलग हो गए: तो बरनबास मार्कुस को लेकर कुप्रुस की ओर जल-यात्रा पर निकल पड़ा:
४० और भाई-जनो द्वारा ईश्वर की कृपा में प्रदान हो कर, पौलुस ने सीलास को चुन कर प्रस्थान कर लिया।
४१ और वो सिरीया और किलिकिया में से होता हुआ कलिसियों को सुदृढ़ करता हुआ चलता गया।
सोलहवाँ अध्याय।
१ तब वो दिरबे और लुस्त्रा आ पहुँचा: और, देखो, वहाँ कोई एक तिमोथेयस नामक शिष्य था, किसी एक विश्वासी यहूदन स्त्री का बेटा, परन्तु उसका पिता एक यूनानी था:
२ जिसके विषय में लुस्त्रा और इकोनियुम के भाई-जन अच्छा साक्ष्य दिया करते थे।
३ पौलुस यह चाहता था कि तिमोथेयस ही उसके साथ बाहर जाए, और उन क्षेत्रों में यहूदियों के होने के कारण, उसने उसे लिया और उसका ख़तना कर दिया: क्योंकि वो सब जानते थे कि उसका पिता एक यूनानी था।
४ और जैसे वो नगरों में से चलते जा रहे थे, तो उन्होंने वो आज्ञप्तियाँ उन्हें पालन करने हेतु प्रदान कर दीं, जिन्हें उन अपौस्लों और वृद्धों द्वारा विहित-नियुक्त किया गया था जो येरूशलेम में थे।
५ और इस प्रकार कलिसिए विश्वास में संस्थापित किए जा रहे थे, और संख्या में दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे थे।
६ अब जब वो फ्रुगिया और गलाती के क्षेत्र में से होकर जा चुके थे, और वो पवित्र-प्राण द्वारा एशिया में शब्द का प्रवचन देने के लिए वर्जित कर दिए गए थे,
७ मिसिया पहुँच जाने के पश्चात, वो बिथिनिया जाने का प्रयत्न कर रहे थे: परन्तु प्राण ने उन्हें अनुमती नहीं दी।
८ और वो मिसिया से होते हुए नीचे त्रोआस पहुँच गए।
९ और पौलुस को रात्रि में एक दृश्य प्रकट हुआ; एक मकिदुनिया का पुरुष खड़ा होकर उस से प्रार्थना कर रहा था, कहता हुआ, मकिदुनिया में आ जाओ, और हमारी सहायता करो।
१० और उसके इस दृश्य को देख लेने के पश्चात, हम तुरँत ही मकिदुनिया जाने की तैयारी में लग गए, सप्रमाणित हो कि प्रभु ने हमें उन्हें शुभ-समाचार का प्रवचन देने के लिए बुलाया था।
११ इसलिए त्रोआस को छोड़ते हुए, हम एक सीधे-जलमार्ग से समोथ्रेसिया पहुँचे, और अगले दिन नीयेपोलिस;
१२ और फिर वहाँ से फिलिपाय, जो मकिदुनिया के उस क्षेत्र का एक मुख्य नगर और उपनिवेश है: और हम कुछ दिन उसी नगर में ठहरे हुए थे।
१३ और सैबथ पर हम उस नगर के बाहर एक नदी के किनारे चले गए, जहाँ माना जाता था कि प्रार्थना की जाती थी; और हम नीचे बैठ गए, और हमने उन स्त्रियों से बात-चीत की जो वहाँ आई थीं।
१४ और थुआतीरा नगर की एक लुदिया नामक महिला ने, जो जामुनी रंग की विक्रेता थी, जो ईश्वर की अर्चना किया करती थी, हमें सुना: जिसका हृदय प्रभु ने खोल दिया, कि उसने उन बातों पर ध्यान दिया जो पौलुस द्वारा बोली जा रही थीं।
१५ और जब वो और उसका घराना बपतिस्मित हो गए थे, तो उसने हम से विनती की, कहते हुए, यदि आप सोचते हैं कि मैं प्रभु पर विश्वास करती हूँ, मेरे घर में पधार कर निवास कर लें जी। और उसने हमें विवश कर दिया।
१६ और यह होने को आया, कि जैसे हम प्रार्थना करने जा रहे थे, कोई एक दासी हम से मिली जो भविष्यवाणी देने के प्राण के वश में थी, जो अपने मालिकों के लिए भविष्यवाणियों द्वारा बहुत लाभ कमाती थी:
१७ वही पौलुस के और हमारे पीछे लग गई, और चीखी, कहती हुई, यह पुरुष अति उच्चतम ईश्वर के नौकर हैं, जो हमें बचाव का पथ बता रहे हैं।
१८ और उसने यह कई दिनो तक किया। परन्तु तंग आकर पौलुस मुड़ा, और उसने उस प्राण से कहा, मैं तुझे यीशु मसीह के नाम में आदेश देता हूँ इस में से बाहर निकल आ। और वो उसी घड़ी बाहर निकल आया।
१९ और जब उसके मालिकों ने यह देखा कि उनके लाभ की आशा समाप्त हो चुकी थी, तो उन्होंने पौलुस और सीलास को पकड़ लिया, और वो उन्हें खींच कर बाज़ार में अफ़सरों के पास ले गए,
२० और वो उन्हें न्याय-अध्यक्षों के पास ले आए, कहते हुए, यह लोग, यहूदी होते हुए, हमारे नगर को अत्यंतता से विचलित कर रहे हैं,
२१ और रीतियाँ सिखा रहे हैं, जो हमारे लिए न ही ग्रहण करने हेतु, न ही पालन करने हेतु न्यायी हैं, क्योंकि हम तो रोम-नागरिक हैं।
२२ और वो जनौघ एक साथ उनके विरुद्ध उठ खड़ा हुआ: और उन न्याय-अध्यक्षों ने अपने कपड़े फाड़ डाले, और उनकी पिटाई कर देने का आदेश दे दिया।
२३ और जब उन्होंने उन पर अनेक कोड़े बरसा डाले थे, तो उन्होंने उन्हें कारावास में फैंक डाला, कारावास के अधीक्षक को आदेश देते हुए कि वो उन्हें सुरक्षा से रखे:
२४ जिसने ऐसा आदेश ग्रहण कर, उन्हें भीतरी कारावास में धकेल डाला, और उनके पैर उसने कस कर लक्कड़ में जकड़ दिए।
२५ और मध्य-रात्रि के समय पौलुस और सीलास ने प्रार्थना की, और ईश्वर की प्रशंसा के गीत गाए: और कारावासियों ने उन्हें सुना।
२६ और अचानक एक बड़ा भूकम्प हुआ, कि उस कारावास की नीवें झकझोर दी गई थीं: और तुरँत ही सभी द्वार खुल गए, और सभी के बन्धन ढीले पड़ गए।
२७ और उस कारावास का रखवाला अपनी नींद से जागता हुआ, और यह देखता हुआ कि कारावास के द्वार खुले हुए थे, उसी ने अपनी तलवार बाहर खींची, और आत्महत्या कर ली होती, यह अनुमान लगाते हुए कि कारावासी भाग चुके थे।
२८ परन्तु पौलुस एक प्रबल वाणी से चीखा, कहता हुआ, स्वयं को कोई भी हानी मत पहुँचाओ भई: क्योंकि हम सभी यहीं हैं।
२९ तब उसने एक दीपक मँगवाया, और अन्दर कूद पड़ा, और काँपता हुआ आया, और पौलुस और सीलास के समक्ष नीचे गिर पड़ा,
३० और वो उन्हें बाहर ले आया, और बोला, श्रीमानो, मैं बचने के लिए क्या करूँ?
३१ और उन्होंने कहा, विश्वास कर लो प्रभु यीशु मसीह पर, और तुम्हारा बचाव हो जाएगा, और तुम्हारे घराने का भी।
३२ और उन्होंने उस से, और उन सभी से जो उसके घर में थे, प्रभु का शब्द बोला।
३३ और वो उन्हें रात की उसी घड़ी में ले गया, और उसने उनकी कोडों की धारियों को धो डाला; और वो और उसके घराने के सभी, तुरँत ही बपतिस्मित हो गए।
३४ और जब वो उन्हें अपने घर में ले आया था, तो उसने उनके समक्ष भोजन परोसा, और हर्ष मनाया, अपने समस्त घराने के संग ईश्वर में विश्वास करते हुए।
३५ और जब दिन हो चला था, तो उन न्याय-अध्यक्षों ने हवलदारों द्वारा कहलवा भेजा, कहते हुए, भई उन आदमियों को रिहा कर दो।
३६ और कारावास के रखवाले ने यह पौलुस को बताया कहते हुए, कि न्याय-अध्यक्षों ने आपको रिहा कर देने के लिए भिजवाया है: इसलिए अब प्रस्थान कर लें, और शान्ति से विदा हो जाएँ।
३७ परन्तु पौलुस ने उनसे कहा, उन्होंने हमें सरे आम बिना दण्डनीय घोषित किए पीटा है, हमारे रोम-नागरिक होते हुए, और हमें कारावास में फैंक दिया है; और अब वो हमें चुपके से बाहर धकेल रहे हैं? नहीं जी; बल्कि उन्हें स्वयं हमारे पास आ जाने दो हमें बाहर रिहा कर देने के लिए।
३८ और हवलदारों ने उनके शब्द न्याय-अध्यक्षों को सुना दिए: और वो डर गए, जब उन्होंने सुना कि वो तो रोम-नागरिक थे।
३९ और वो आए और उन्होंने उनसे विनती की, और वो उन्हें बाहर ले आए, और उन से यह अनुरोध किया कि वो नगर से बाहर प्रस्थान कर लें।
४० और वो कारावास से बाहर निकल आए, और उन्होंने लुदिया के घर में प्रवेश किया; और जब वो भाई-जनो से मिल लिए थे, तो उन्होंने उन्हें सान्त्वना दी, और प्रस्थान कर लिया।
सत्रहवाँ अध्याय।
१ अब जब वो एम्फिपुलिस और अपुल्लोनीया में से होकर जा चुके थे, तो वो थिस्सलूनीका आ पहुँचे, जहाँ यहूदियों का एक सभाग्रह था:
२ और पौलुस ने, जैसी उसकी रीति थी, उनके पास भीतर प्रवेश किया, और उनके साथ शास्त्रों में से तीन सैबथ के दिन तर्क-वितर्क किया,
३ उन्हें खोलते हुए और प्रमाणित करते हुए, कि मसीहा को निश्चितता से ही कष्ट भोगना, और मृतकों में से पुनः उठ जाना था; और कि यही यीशु, जिनका मैं तुम्हें प्रवचन दे रहा हूँ, वही मसीहा हैं।
४ और उन में से कुछों ने विश्वास कर लिया, और वो और श्रद्धालु यूनानियों में से एक बड़ा जनौघ, और कई प्रमुख महिलाएँ भी, पौलुस और सीलास के संग लग लिए।
५ परन्तु अविश्वासी यहूदियों ने ईर्षा से जल कर अपने साथ कुछ दुष्ट गुंडे-मवालियों को लिया, और एक जन-समूह एकत्रित कर लिया, और उस पूरे नगर में एक उत्पात मचा दिया, और जेसन के घर पर घर्षण कर डाला, और वो उन्हें लोगों के पास बाहर ले आने की सोच में थे।
६ और जब उन्होंने उन्हें नहीं पाया, तो वो जेसन और कुछ अन्य भाई-जनों को खींचते हुए नगर के अध्यक्षों के पास ले चले, चीखते हुए, इन्होंने जिन्होंने इस संसार को उलट-पलट कर डाला है, भई ये तो यहाँ भी आ पहुँचे हैं;
७ जिनका जेसन ने स्वागत किया है: और यह सभी रोम के राजा की आज्ञप्तियों के विपरीत करते रहते हैं, कहते हुए कि कोई अन्य सम्राट है, कोई यीशु।
८ और उन्होंने लोगों को और उस नगर के शासकों को विचलित कर दिया, जब उन्होंने यह बातें सुनी।
९ और जब उन्होंने जेसन और उस दूसरे की ज़मानत ले ली थी, तो उन्होंने उन्हें जाने दिया।
१० और भाई-जनो ने तुरँत ही पौलुस और सीलास को रात्रि के समय बेरीया भेज दिया: जो वहाँ पहुँच कर यहूदियों के एक सभाग्रह में चले गए।
११ यह थिस्सलूनीका के यहूदियों से अधिक कुलीन थे, कि इन्होंने मन की समस्त उत्सुकता से शब्द को ग्रहण किया, और वो दिन-प्रतिदिन शास्त्रों में खोज-बीन करते थे, कि क्या ये बातें ऐसी ही थीं।
१२ इसलिए उन में से, और यूनानी प्रमुख महिलाओं में से भी, और पुरुषों में से भी कईयों ने विश्वास कर लिया।
१३ परन्तु जब थिस्सलूनीका के यहूदियों को यह ज्ञात हुआ कि ईश्वर के शब्द का प्रवचन पौलुस द्वारा बेरीया में दिया जा रहा था, तो वो वहाँ भी आ धमके, और उन्होंने लोगों को भड़का दिया।
१४ और तुरँत ही भाई-जनो ने पौलुस को भेज दिया, मानो कि वो समुद्र की ओर जाए; परन्तु सीलास और तिमोथेयस अभी वहीं ठहरे रहे।
१५ और पौलुस को पहुँचाने वाले उसे अथेने ले आए: और सीलास और तिमोथेयस के लिए यह आदेश ग्रहण कर, कि वो बिना विलम्ब किए उसके पास आ जाएँ, वो लौट आए।
१६ अब जैसे पौलुस उनके लिए अथेने में प्रतीक्षा कर रहा था, तो उसका प्राण उस में, यह देख कर कि वो नगर पूर्ण रूप से मूर्तिपूजा में लिप्त था, उत्तेजित हो उठा।
१७ इसलिए उसने यहूदियों के साथ सभाग्रह में, और श्रद्धालु व्यक्तियों के साथ, और बाज़ार में उनके साथ जो उस से मिले, दिन-प्रतिदिन तर्क-वितर्क किया।
१८ तब कुछ एपिक्यूरियनों और स्टोइकों में से कुछ दार्शनिकों ने पौलुस के साथ भिड़ंत कर ली। और कुछों ने कहा, भई यह बकवादी क्या कहेगा? औरों ने कहा, ये तो विचित्र दानवों का प्रचारक जान पड़ता है भई: क्योंकि उसने उन्हें यीशु का, और पुनरुत्थान का प्रवचन दिया था।
१९ और वो उसे लेकर एरियौपेगुस ले आए, कहते हुए, क्या हम जान सकते हैं भई कि यह नवीन शिक्षा क्या है, जिसके विषय में तुम बोल रहे हो?
२० क्योंकि तुम तो हमारे कानो में कुछ अनोखी बातें सुना रहे हो: इसलिए हम जानना चाहते हैं कि इन बातों का क्या अर्थ है।
२१ (क्योंकि सभी अथेने-वासी और परदेशी जो वहाँ थे, अपना समय किसी भी बात में व्यतीत नहीं करते थे, बस केवल कोई नई बात बताने या सुनने में।)
२२ तब पौलुस एरियौपेगुस के बीच में खड़ा हुआ, और उसने कहा, तुम अथेने के पुरुषों, मैं यह आभास कर रहा हूँ कि तुम सभी बातों में बहुत ही अन्धविश्वासी हो।
२३ क्योंकि चलते-चलते जैसे मैं जा रहा था, और तुम्हारी पूजा-भक्तियाँ देख रहा था, तो मैंने इस शिलालेख के साथ एक बलिवेदी पाई, "अज्ञात ईश्वर के प्रति"। उन्हीं की, जिनकी तुम अनभिज्ञता में आराधना करते रहते हो, उन्हीं की मैं तुम्हें घोषणा कर रहा हूँ।
२४ ईश्वर ने, जिन्होंने संसार को और जो सब कुछ इस में है, बनाया है, यह देखते हुए कि वो स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु हैं, वो हाथों से बनाए गए मन्दिरों में नहीं बसते;
२५ न ही उनकी आराधना लोगों के हाथों द्वारा होती है, मानो कि उन्हें किसी भी वस्तु की आवश्यकता हो, यह देखते हुए कि वो सभी को जीवन, और श्वास, और सभी वस्तुएँ प्रदान करते हैं;
२६ और उन्होंने पृथ्वी के समस्त चहरे पर, बसने के लिए लोगों के सभी राष्ट्र, एक ही रक्त से बनाए हैं, और उन्होंने उन राष्ट्रों के समयों का, और उनके निवास की सीमा-रेखाओं का, पहले से ही निर्धारण कर दिया है:
२७ ताकि वो प्रभु को ढूँढें, यदि कहिं वो उन्हें टटोल लें, और उन्हें पा लें, यद्यपि वो हम में से प्रत्येक से दूर नहीं हैं:
२८ क्योंकि उन्हीं में ही हम जीते हैं, और चलते हैं, और अपना अस्तित्व रखते हैं; जैसा तुम्हारे अपने ही कुछ कवियों ने भी बोला है, कि हम भी उन्हीं के वंशधर हैं।
२९ तब यदि हम ईश्वर के वंशधर हैं, हमें ऐसे नहीं समझना चाहिए कि ईश्वरत्व सोने, या चाँदी, या पत्थर के समान है, कला या मनुष्य की कल्पना द्वारा उत्कीर्ण किया गया।
३० और इस अनभिज्ञता के इन समयों को ईश्वर ने देखा-अनदेखा कर दिया; परन्तु अब वो सभी मनुष्यों को सभी स्थानो में आदेश दे रहें हैं मन-परिवर्तित कर लेने का:
३१ क्योंकि उन्होंने एक दिवस की नियुक्ति कर दी है, जिस में वो इस संसार का न्याय उन पुरुष द्वारा नेकी में करेंगे, जिन्हें उन्होंने विहित-नियुक्त किया है; जिनका उन्होंने सभी लोगों को यह आश्वासन दिया है, कि उन्होंने उन्हें मृतकों में से उठा दिया है।
३२ और जब उन्होंने मृतकों के पुनरुत्थान के विषय में सुना, तो कुछों ने हँसी उड़ाई: और अन्यों ने कहा, हम तुझे इस विषय में फिर कभी और सुनेंगे।
३३ तो पौलुस उनके बीच में से बाहर निकल आया।
३४ तब भी कुछ पुरुष उसके साथ दृढ़ता से जुड़ गए, और उन्होंने विश्वास कर लिया: जिन में से एक वो एरियौपेगुस का दायोनिसियस था, और एक दैमरिस नामक महिला, और उनके साथ अन्य।
अट्ठारहवाँ अध्याय।
१ इन घटनाओं के पश्चात पौलुस ने अथेने से प्रस्थान कर लिया, और कुरिन्थुस आ पहुँचा;
२ और उसने पोंतुस में जन्मा कोई एक अकिला नामक यहूदी पाया, जो अभी-अभी अपनी पत्नी प्रिस्किल्ला के साथ इटली से आया था; (क्योंकि क्लौदियुस ने सभी यहूदियों को रोम से बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया था:) और वो उनके पास आ गया।
३ और चूँकि वो उसी कारीगरी का था, वो उनके साथ ही रहता रहा, और काम किया: क्योंकि उनका व्यवसाय तम्बू बनाने का था।
४ और उसने प्रत्येक सैबथ यहूदी-आराधनालय में बहस की, और यहूदियों और यूनानियों को विश्वस्त किया।
५ और जब सीलास और तिमोथेयस मकिदुनिया से आ गए थे, पौलुस प्राण में बाध्य-विवश था, और उसने यहूदियों को साक्ष्य दिया कि यीशु ही मसीहा थे।
६ और जब स्वयं उन लोगों ने विरोध करते हुए निंदा की, तो उसने अपने वस्त्र झाड़ते हुए उन से कहा, तुम्हारा रक्त तुम्हारे अपने ही सरों पर पड़े; मैं निर्दोष हूँ: अब से मैं अन्यप्रजातियों के पास जाऊँगा।
७ और वो वहाँ से चला गया, और उसने किसी एक युस्तुस नामक पुरुष के घर में प्रवेश किया, जो ईश्वर का आराधक था, जिसका घर यहूदी-आराधनालय के साथ बिल्कुल सटा हुआ था।
८ और क्रिसपुस, उस यहूदी-आराधनालय के प्रमुख-अध्यक्ष ने, अपने सम्पूर्ण घराने के साथ प्रभु पर विश्वास किया; और कुरिन्थुसवासियों में से कईयों ने सुनकर विश्वास कर लिया, और बपतिस्मित हो गए थे।
९ तो फिर प्रभु पौलुस से रात्रि में एक दृश्य द्वारा बोले, डरो मत, बल्कि बोलो, और चुप मत रहो:
१० क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ, और कोई भी व्यक्ति तुम्हें हानि पहुँचाने के लिए तुम पर हमला नहीं करेगा: क्योंकि इस नगर में मेरे कई लोग हैं।
११ और वो वहीं एक वर्ष और छह महीने रहा, उनके बीच ईश्वर का शब्द सिखाता हुआ।
१२ और जब गैलियो अकाया का उपराज्यपाल था, तो यहूदियों ने पौलुस के विरुद्ध एक मत से आक्रान्त कर दिया, और वो उसे न्यायासन तक ले आए,
१३ कहते हुए, भई ये बन्दा तो लोगों को नियम के विपरीत ईश्वर की आराधना करने के लिए उकसा रहा है।
१४ और जब पौलुस बस अभी अपना मूँह खोलने ही वाला था, तो गैलियो ने यहूदियों से कहा, यदि ये बात किसी अन्याय या दुष्कर्म के विषय में होती, अरे यहूदियों, तो उचितता से मैं तुम्हारी बात सुनता:
१५ परन्तु यदि ये बात तुम्हारे नियम में शब्दों के प्रश्नो, या नामों के विषय में है, तो तुम ही ये सब जानो; क्योंकि मैं ऐसी बातों का न्याय नहीं करूँगा।
१६ और उसने उन्हें न्यायासन से खदेड़ दिया।
१७ तब उन सभी यूनानियों ने यहूदी-आराधनालय के प्रमुख सौस्थेनेस को ले कर, उसे न्यायासन के समक्ष पीट डाला। और गैलियो ने इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
१८ और पौलुस इसके पश्चात बहुत समय तक वहीं ठहरे रहा, और फिर उसने भाई-जनो से विदाई ले ली, और वहाँ से प्रिस्किल्ला और अकिला के साथ, सिरीया की ओर जल-यात्रा पर निकल पड़ा; किंख्रेय में अपने सर को कतरवा कर: क्योंकि उसने एक प्रण लिया हुआ था।
१९ और वो इफिसुस आ पहुँचा, और उन्हें वहीं छोड़ दिया: परन्तु उसने स्वयं एक यहूदी-आराधनालय में प्रवेश किया, और यहूदियों के साथ तर्क-वितर्क किया।
२० जब उन्होंने यह इच्छा व्यक्त की, कि वो उनके साथ कुछ समय और ठहरा रहे, तो उसने स्वीकृति नहीं दी;
२१ बल्कि उनसे यह कहते हुए उसने विदाई ले ली, कि मुझे किसी भी प्रकार से इस भोज को रखना है, जो यरूशलेम में आ रहा है: परन्तु मैं पुनः तुम्हारे पास वापस लौट आऊँगा, यदि ईश्वर की यह इच्छा हो। और वो इफिसुस से जल-यात्रा पर निकल पड़ा।
२२ और जब वो कैसरिया उतर आया था, और ऊपर चला गया था, और उसने कलिसिए का अभिवादन कर लिया था, तो वो नीचे अन्ताकिया चला गया।
२३ और वहीं कुछ समय व्यतीत कर लेने के पश्चात, उसने प्रस्थान कर लिया, और वो गलाती और फ्रुगिया के सभी प्रदेशों में से क्रमानुसार जाता हुआ, सभी शिष्यों को प्रबल करता गया।
२४ और कोई एक सिकन्द्रीया में जन्मा, शास्त्रों में शक्तिशाली सुवक्ता पुरुष, अपुल्लोस नामक यहूदी, इफिसुस आया।
२५ इस व्यक्ति को प्रभु के पथ में शिक्षा मिली हुई थी; और प्राण में उत्कट होता हुआ, वो सटीकता से प्रभु की बातों को बोलता और सिखाता था, केवल योहन के बपतिस्मा की ही जानकारी रखता हुआ।
२६ और वो यहूदी-आराधनालय में साहस के साथ बोलने लगा: और जब अकिला और प्रिस्किल्ला ने उसे सुन लिया था, तो वो उसे अपने पास ले आए, और उन्होंने उसे प्रभु के पथ को और अधिक यथार्थता के साथ अर्थ-प्रतिपादित कर दिया।
२७ और जब वो अकाया में चले जाने के लिए उतारू था, तो भाई-जनो ने शिष्यों को लिख कर अभिप्रेरित किया कि वो उसका स्वागत करें: जिसने वहीं पहुँच कर, उनकी बहुत सहायता की जिन्होंने कृपा द्वारा विश्वास कर लिया था:
२८ क्योंकि उसने बड़ी ही प्रबलता से सार्वजनिक रूप से यहूदियों को आश्वस्त किया, शास्त्रों द्वारा दिखलाते हुए, कि यीशु ही मसीहा थे।
उन्नीसवाँ अध्याय।
१ और ये होने को आया, कि जैसे अपुल्लोस कुरिन्थुस में था, पौलुस ऊपरी सीमाओं में से हो कर इफिसुस आ पहुँचा: और कुछ शिष्यों को पाकर,
२ उसने उनसे कहा, क्या विश्वास कर लेने के पश्चात तुमने पवित्र-प्राण ग्रहण कर लिए हैं क्या? और उन्होंने उस से कहा, भई हम ने तो कभी सुना ही नहीं कि कोई पवित्र-प्राण भी होते हैं।
३ और उसने उन से कहा, तो फिर तुम्हारा बपतिस्मा किस के प्रति हुआ था? और उन्होंने कहा, योहन के बपतिस्मा के प्रति।
४ तो पौलुस ने कहा, योहन ने सच में मन-परिवर्तन के बपतिस्मा से बपतिस्मा किया था, लोगों से कहता हुआ, कि उन्हें उन पर विश्वास करना चाहिए जो उसके पश्चात आएँगे, मसीहा यीशु पर ही।
५ तो जब उन्होंने यह सुना, उनका प्रभु यीशु के नाम में बपतिस्मा हो गया।
६ और जब पौलुस ने उन पर अपने हाथ रख दिए थे, तो पवित्र-प्राण उन पर आ गए; और वो भाषाओं के साथ बोले, और उन्होंने प्रेरित-उपदेश दिए।
७ और वो सभी पुरुष लगभग बारह थे।
८ और उसने यहूदी-आराधनालय में प्रवेश किया, और साहस के साथ तीन महीने बोला, ईश्वर के राज्य सम्बन्धी बातों के विषय में तर्क-वितर्क करता हुआ और मनवाता हुआ।
९ परन्तु जब कुछ लोगों के मन कठोर हो गए थे, और उन्होंने विश्वास नहीं किया, बल्कि वो जनौघ के समक्ष उस पथ के विषय में बुरा कहने लग गए, तो उसने उनसे प्रस्थान कर लिया, और शिष्यों को पृथक कर दिया, दिन-प्रतिदिन एक तुरन्नुस की पाठशाला में तर्क-वितर्क करता हुआ।
१० और यह दो वर्षों तक चलता रहा; तो एशिया में बसने वाले उन सभी ने, दोनो यहूदियों ने और यूनानियों ने, प्रभु यीशु का शब्द सुन लिया।
११ और ईश्वर ने पौलुस के हाथों विशिष्ट चमत्कार करवाए:
१२ कि जब बीमारों के पास उसके शरीर से रूमाल या तहबंद लाए जाते थे, तो उनकी बीमारियाँ उन से दूर हो जाती थीं, और उन में से बुरी भावात्माएँ बाहर निकल आती थीं।
१३ तब कुछ आवारा यहूदी ओझाओं ने स्वयं प्रयत्न किया कि वो उन पर, जो बुरे भावात्माओं के वश में थे, प्रभु यीशु के नाम का आह्वान करें, कहते हुए, हम तुम्हें यीशु की सौगन्ध दिलवाते हैं, जिसका पौलुस प्रवचन देता है।
१४ और ऐसा एक यहूदी और पुरोहितों का एक प्रमुख, स्कीवा, और उसके सात बेटे किया करते थे।
१५ और उस बुरे प्राण ने उत्तर दिया और कहा, यीशु से तो मैं परिचित हूँ, और पौलुस से तो मैं परिचित हूँ; परन्तु तुम कौन हो भई?
१६ और वो आदमी जिस में वो बुरा प्राण था उन पर कूद पड़ा, और हावी हो गया, और उनके विरुद्ध प्रबल ठहरा, कि वो उस घर में से नंगे और घायल होकर बाहर भाग खड़े हुए।
१७ और इस बात की जानकारी इफिसुस में बसने वाले सभी यहूदियों और यूनानियों को भी मिली; और उन सभी पर एक भय छा गया, और प्रभु यीशु का नाम आवर्धित हुआ।
१८ और कई विश्वास करने वाले आए, स्वीकार करते हुए, और अपने कर्मों की सूचना देते हुए।
१९ विचित्र-कलाओं का प्रयोग करने वालों में से भी कई अपनी पुस्तकें एक साथ ले आए, और उन्हें सभी लोगों के समक्ष भस्म कर दिया: और उन्होंने उनका मूल्य गिना, और उसे पचास हज़ार चाँदी के टुकड़ों का पाया।
२० तो ईश्वर का शब्द बड़ी प्रबलता से बढ़ा और अभिभावी ठहरा।
२१ इन सभी घटनाओं के अन्त के पश्चात, पौलुस ने प्राण में निश्च्य किया, कि जब वो मकिदुनिया और अकाया में से हो लेगा, तो वो यरूशलेम चला जाए, कहता हुआ, वहाँ पहुँच लेने के पश्चात, मुझे रोम भी अवश्य देखना है।
२२ तो उसने अपने दो सेवकों में से, तिमोथेयस और एरस्तुस को ही मकिदुनिया भेज दिया; परन्तु वो स्वयं अभी कुछ समय एशिया में ही रुका रहा।
२३ और उसी समय उस पथ के विषय में एक बड़ा हंगामा खड़ा हो गया था।
२४ क्योंकि देमेत्रियुस नामक एक रजतकार, जो अर्तिमिस के रजत के मन्दिर बनाता था, और जो शिल्पकारों को बहुत लाभ दिलवाता था;
२५ जिन्हें उसने उसी व्यवसाय के कारीगरों के साथ बुल लिया, और कहा, श्रीमानो, तुम जानते हो कि इसी कारीगरी के कारण हमारे पास हमारा घन-वैभव है।
२६ इसके अतिरिक्त तुम देख और सुन रहे हो, कि न केवल इफिसुस में, बल्कि लगभग समस्त एशिया में, इस पौलुस ने कई लोगों को फुसला कर परे मोड़ दिया है, कहते हुए कि हाथों से बने हुए कोई ईश्वर-गण नहीं होते:
२७ इस कारण न केवल यह हमारी कला निरर्थक बन जाने के संकट में है; बल्कि उस महान देवी अर्तिमिस के मन्दिर से भी घृणा की जाएगी, और उसकी भव्यता नष्ट कर दी जाएगी, जिसकी समस्त एशिया और संसार अर्चना करते हैं।
२८ और जब उन्होंने ये बातें सुनी, तो वो आक्रोश से भर उठे, और चीख पड़े, कहते हुए, महान है इफिसुसवासियों की अर्तिमिस।
२९ और वह समस्त नगर अस्तव्यस्तता से भर उठा था: और मकिदुनिया के दो व्यक्तियों, गायुस और अरिस्तर्खुस को पकड़ लेने के पश्चात, जो पौलुस के सहयात्री थे, वो एक ही मत से नाट्यशाला में झपट पड़े।
३० और जब पौलुस ने उन लोगों के पास अन्दर प्रवेश करना चाहा, तो शिष्यों ने उसे अनुमती नहीं दी।
३१ और एशिया के प्रमुखों में से कुछों ने, जो उसके मित्र थे, उन्हीं ने उसको कहलवा भेजा, उस से यह इच्छा व्यक्त करते हुए कि वो नाट्यशाला में स्वयं प्रवेश न करे।
३२ तब कुछ लोग एक बात चीख रहे थे, और कुछ और कोई अन्य बात, क्योंकि वो सभा अव्यवस्थित थी: और उसका अधिकतर भाग जानता न था कि वह किस कारण एक साथ एकत्रित थे!
३३ और उन्होंने उस जनौघ में से सिकन्दर को बाहर खींच लिया, यहूदी उसे आगे धक्का देते हुए। और सिकन्दर ने अपने हाथ से संकेत किया, और वो उन लोगों के सामने अपने बचाव में बोलना चाहता था।
३४ परन्तु जब वो जान गए थे कि वो एक यहूदी था, तो वो सभी एक ही वाणी के साथ लगभग दो घण्टों तक चीखते रहे, महान है इफिसुसवासियों की अर्तिमिस।
३५ और जब उस नगर के लिपिक ने भीड़ को शान्त कर दिया था, तो उसने कहा, इफिसुस के पुरुषों, वो कौन सा व्यक्ति है, जो ये नहीं जानता कि इफिसुसवासियों का नगर उस महान देवी अर्तिमिस का, और उस प्रतिमा का आराधक है, जो ज़्यूस से गिरी थी?
३६ इसलिए अब ये देखते हुए कि इन बातों के विरुद्ध कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, तुम्हें चुप कर जाना चाहिए, और हड़बड़ी में कुछ भी नहीं करना चाहिए।
३७ क्योंकि तुम यहाँ इन पुरुषों को ले आए हो, जो न ही कलिसियों के डकैत हैं, न ही तुम्हारी देवी के निंदक।
३८ इस कारण यदि देमेत्रियुस, और वो शिल्पकार जो उसके साथ हैं, किसी भी व्यक्ति के साथ कोई विग्रह रखते हों, तो नियम खुला हुआ है, और उपराज्यपाल बैठे हैं: उन्हें एक दूसरे पर अभियोग लगा लेने दो।
३९ परन्तु यदि तुम किसी भी अन्य विषय में पूछ-ताछ करते हो, तो उसका निर्णय एक विधिसम्मत सभा में दिया जाएगा।
४० क्योंकि हम इस दिन के उपद्रव के विषय में दोषी ठहरा दिए जाने के संकट में हैं, कोई कारण न होता हुआ जिसके द्वारा हम इस दंगे का स्पष्टीकरण दे सकें।
४१ और जब उसने ऐसा बोल दिया था, तो उसने वो सभा विसर्जित कर दी।
बीसवाँ अध्याय।
१ और उस उत्पात की समाप्ति के पश्चात, पौलुस ने अपने पास शिष्यों को बुला कर उन्हें गले लगाया, और मकिदुनिया जाने के लिए प्रस्थान कर लिया।
२ और जब वो उन क्षेत्रों में से हो कर जा चुका था, और उन्हें बहुत अभिप्रेरणा प्रदान कर दी थी, तो वो यूनान आ पहुँचा,
३ और उसने वहाँ तीन महीने निवास किया। और जब यहूदी उसके लिए घात लगाए बैठे थे, जैसे वो जल-यात्रा से सिरीया जाने ही वाला था, तो उसने मकिदुनिया में से होकर वापस आने का निश्च्य किया।
४ और वहाँ एशिया में उसके संग, बेरीया का सोपत्रुस, और थिस्सलूनीकावासियों में से अरिस्तर्खुस और सेकुन्दुस; और दिरबे का गायुस, और तिमोथीयस; और एशिया के तुखिकुस और त्रोफ़िमुस थे।
५ यही हम से पहले जाकर हमारे लिए त्रोआस में रुके रहे।
६ और हम बेख़मीरी रोटी के दिनो के पश्चात फिलिपाय से जलयात्रा पर निकल पड़े, और उनके पास पाँच दिनो में त्रोआस आ गए; जहाँ हम ने सात दिन निवास किया।
७ और सप्ताह के प्रथम दिन, जब शिष्य एक साथ रोटी तोड़ने के लिए एकत्रित हो गए थे, तो पौलुस ने उन्हें प्रवचन दिया, अगले दिन प्रस्थान करने की तैयारी में; और वो अपना प्रवचन मध्य-रात्रि तक देता गया।
८ और वहीं उस ऊपर के कक्ष में कई दीपक थे, जहाँ वो एक साथ एकत्रित थे।
९ और वहीं एक खिड़की में कोई एक यूतिकुस नामक युवा पुरुष बैठा हुआ था, जो एक गहरी नींद में पड़ गया: और जैसे पौलुस लम्बा प्रवचन दे रहा था, तो वो युवक नींद में नीचे झुकता हुआ, तीसरे स्तर से नीचे गिर पड़ा, और उसे मृत उठा लिया गया।
१० और पौलुस नीचे गया, और उस पर लेट गया और उसे गले लगाते हुए बोला, स्वयं विचलित मत हो; क्योंकि इसका प्राण इसी में ही है।
११ तो जब वो पुनः ऊपर आ गया था, और रोटी तोड़ ली थी, और खा ली थी, और एक लम्बे समय तक, दिन के निकलने तक भी उसने वार्तालाप कर लिया था, तो उसने प्रस्थान कर लिया।
१२ और वो उस युवा पुरुष को जीवित ले आए, और वो बहुत ही सान्त्वनित थे।
१३ और हम पहले ही जलयान में जा चुके थे, और एस्सोस तक जल-यात्रा कर ली, वहीं पौलुस को ले लेने के विचार से: क्योंकि उसने यही निर्धारित किया था, इस इच्छा से कि वो स्वयं पैदल ही जाना चाहता था।
१४ और जब वो हम से एस्सोस में मिला, तो हमने उसे अपने साथ ले लिया, और मितुलेन आ गए।
१५ और हमने वहाँ से जल-यात्रा की, और अगले दिन हम खियोस के सामने आ गए; और अगले दिन हम सामोस जा पहुँचे, और त्रोगिलियो में ठहरे; और अगले दिन हम मिलेतुस आ पहुँचे।
१६ क्योंकि पौलुस ने इफिसुस के बाजू से जल-यात्रा पर निकलने का निश्चय कर लिया था, क्योंकि उसकी एशिया में समय व्यतीत करने की इच्छा नहीं थी: क्योंकि वो शीघ्रता कर रहा था, कि उसके लिए यह सम्भव हो सके कि वो पेंतेकोस्त के दिन यरूशलेम में ही हो।
१७ और मिलेतुस से उसने इफिसुस कहलवा भेजा, और कलिसिए के वृद्धों को बुलवा लिया।
१८ और जब वो उसके पास आ गए थे, तो उसने उनसे कहा, तुम जानते हो कि उस प्रथम दिन से जब से मैं एशिया में आ पहुँचा था, कि मैं किस आचरण से तुम्हारे साथ हर समय रहा हूँ,
१९ मन की सम्पूर्ण नम्रता के साथ प्रभु की सेवा करता हुआ, और बहुत आँसुओं और परीक्षाओं के साथ, जो मुझ पर यहूदियों के घात लगाए बैठने के कारण आ पड़ी थीं:
२० और कि कैसे मैंने कुछ भी परे नहीं रख छोड़ा, जिस से तुम्हें लाभ मिल सके, बल्कि मैंने तुम्हें बता दिया है, और सार्वजनिक रूप से सिखा दिया है, और घर-घर भी,
२१ दोनो यहूदियों को, और यूनानियों को भी ईश्वर की ओर मन-परिवर्तन करने का, और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने का साक्ष्य देते हुए।
२२ और अब देखो, मैं प्राण में बन्धा यरूशलेम जा रहा हूँ, उन घटनाओं को न जानता हुआ जो मुझ पर वहाँ आ पड़ेंगी:
२३ सिवाय कि पवित्र-प्राण प्रत्येक नगर में यह साक्ष्य दे रहे हैं, कहते हुए कि बेड़ियाँ और पीड़ाएँ मेरे साथ रहेंगी।
२४ परन्तु इन में से कोई भी बातें मुझे विचलित नहीं कर रही हैं, न ही मैं अपने जीवन को अपने स्वयं के लिए बहुमूल्य मान रहा हूँ, ताकि मैं अपना कार्यकाल, और यह सेवाकार्य जो मैंने प्रभु यीशु से ग्रहण किया है, आनंद सहित समाप्त कर सकूँ, जो ईश्वर की कृपा के शुभ-समाचार का साक्ष्य देना है।
२५ और अब देखो, मैं जानता हूँ कि तुम सभी, जिनके बीच मैंने जाकर ईश्वर के राज्य का प्रवचन दिया है, मेरा चेहरा फिर कभी नहीं देखोगे।
२६ इसी कारण मैं इस दिन तुम्हें यह साक्ष्य देता हूँ, कि मैं सभी लोगों के रक्त से निर्दोष हूँ।
२७ क्योंकि मैंने ईश्वर के सम्पूर्ण परामर्श की तुम्हें सूचना देने से स्वयं को नहीं रोका।
२८ इसलिए अपना और सम्पूर्ण झुण्ड का ध्यान रखना, जिन पर पवित्र-प्राण ने तुम्हें निरीक्षक बना दिया है, ईश्वर के कलिसिए का पोषण करने के लिए, जिसे उन्होंने अपने स्वयं के ही रक्त से खरीद लिया है।
२९ क्योंकि मैं यह जानता हूँ, कि मेरे चले जाने के पश्चात, तुम्हारे बीच ख़ूँख़ार भेड़िए भीतर घुस आएँगे, जो झुण्ड को नहीं छोड़ेंगे।
३० तुम्हारे अपने ही बीच में से भी आदमी उठ खड़े होंगे, भ्रष्ट बातें बोलते हुए, शिष्यों को अपने पीछे-पीछे खींचते हुए।
३१ इसलिए सचेत रहना, और स्मरण में रखना, कि कैसे तीन वर्षों तक मैं हर एक को दिन-रात आँसू बहा-बहा कर चेतावनी देने से रुका नहीं।
३२ और अब भाई-जनो, मैं तुम्हें ईश्वर के प्रति, और उनके शब्द की कृपा के प्रति सुपुर्द करता हूँ, जो तुम्हारा निर्माण करने में, और तुम्हें उन सभी पुनीतों के बीच एक विरासत देने में, सक्षम हैं।
३३ मैंने किसी भी व्यक्ति के चाँदी, या सोने, या वस्त्रों के लिए लोलुपता नहीं की।
३४ हाँ भई, तुम स्वयं जानते हो, कि इन्हीं हाथों ने मेरी और उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण किया है, जो मेरे साथ थे।
३५ मैंने तुम्हें सभी बातें बता दी हैं, कि कैसे इसी प्रकार श्रम करते हुए तुम्हें दुर्बलों की सहायता करनी चाहिए, और प्रभु यीशु के शब्दों को स्मरण में रखना चाहिए, कि कैसे उन्होंने कहा था, लेने की अपेक्षा में देना अधिक धन्य है।
३६ और जब उसने इस प्रकार बोल लिया था, तो उसने नीचे घुटने टेक कर उन सभी के साथ प्रार्थना की।
३७ और वो सभी बहुत रोए, और पौलुस की गर्दन पर गिर पड़े, और उन्होंने उसे चूमा,
३८ उन बातों पर सब से अधिक शोक मनाते हुए जो उसने उन से कही थीं, कि वो उसका चेहरा फिर कभी नहीं देखेंगे। और वह उसके साथ जलयान तक चले गए।
इक्कीसवाँ अध्याय।
१ और यह होने को आया, कि जब हमने उनसे विदाई ले ली थी, और निकल पड़े थे, तो हम एक सीधे-जलमार्ग से कोस आ पहुँचे, और उसके अगले दिन रोदुस, और वहाँ से पतारा;
२ और जलयात्रा पर फिनिके जाने वाले एक जलयान को पाकर, हम उस में चढ़ गए, और निकल पड़े।
३ अब जब हमें कुप्रुस दिखाई पड़ा, तो हम उसे बाएँ हाथ पर छोड़ते हुए जलयात्रा से सिरीया आ गए, और टाय्र में उतर गए: क्योंकि वहीं उस जलयान को अपना माल उतारना था।
४ और शिष्यों को पाकर, हम वहीं सात दिन ठहर गए: जिन्होंने प्राण द्वारा पौलुस से कहा, कि वो यरूशलेम न जाए।
५ और जब हम वो दिन पूर्ण कर चुके थे, तो हमने प्रस्थान कर लिया और अपने पथ पर चल दिए; और वह सभी हमें पथ पर पत्नियों और बच्चों के साथ छोड़ने आए, जब तक हम नगर के बाहर पहुँच गए थे: और हम ने समुद्र तट पर नीचे घुटने टेके, और प्रार्थना की।
६ और जब हम ने एक दूसरे से विदाई ले ली थी, तो हम जलयान में जा चढ़े, और वह पुनः वापस अपने घर लौट चले।
७ और जब हमने टाय्र से अपना कार्यकाल समाप्त कर लिया था, तो हम प्तुलिमियस आ पहुँचे, और हमने भाई-जनो को प्रणाम किया, और उनके साथ एक दिन ठहर गए।
८ और उसके अगले दिन, हम जो पौलुस के साथी थे, हमने प्रस्थान कर लिया, और हम कैसरिया आ पहुँचे: और हमने शुभ-समाचार-प्रचारक फिलिप के घर में प्रवेश किया, जो उन सातों में से एक था; और हमने उसके साथ निवास किया।
९ और उसी व्यक्ति की चार कुँवारी बेटियाँ थीं, जो प्रेरित-उपदेश देती थीं।
१० और जैसे हम वहीं कई दिनो तक वास कर रहे थे, यहूदा से कोई एक एगबस नामक पैग़म्बर नीचे आया।
११ और हमारे पास पहुँच कर, उसने पौलुस की कमरपेटी ली, और अपने हाथों और पैरों को बाँध कर कहा, पवित्र-प्राण इस प्रकार कहते हैं, कि इसी प्रकार यरूशलेम में यहूदी उस आदमी को बाँध देंगे, जिसकी ये कमरपेटी है, और वो उसे अन्यप्रजातियों के हाथों में प्रदान कर देंगे।
१२ और जब हम ने ये बातें सुनी, तो हम ने और उस जगह के लोगों ने, पौलुस से विनती की कि वो ऊपर यरूशलेम न जाए।
१३ तब पौलुस ने उत्तर दिया, तुम रो-रो कर मेरे दिल को क्यों तोड़ रहे हो भई? क्योंकि मैं तो प्रभु यीशु मसीह के नाम के लिए न केवल बन्दी बन जाने हेतु, बल्कि यरूशलेम में मर जाने हेतु भी तैयार हूँ।
१४ और जब वो नहीं मनवाया गया, तो हम भी चुप कर गए, कहते हुए, कि प्रभु की इच्छा पूर्ण हो।
१५ और उन दिनो के पश्चात, हम ने अपने सामान ऊपर उठाए, और ऊपर यरूशलेम चले गए।
१६ हमारे साथ कैसरिया से कुछ शिष्य भी गए थे, और वो अपने साथ एक वृद्ध शिष्य, कुप्रुस के मनैस्सोन को लाए, जिसके साथ हम ने वास करना था।
१७ और जब हम यरूशलेम आ पहूँचे थे, तो भाई-जनो ने हमारा प्रसन्नता से स्वागत किया।
१८ और अगले दिन पौलुस हमारे साथ याकूब के पास अन्दर गया; और सभी वृद्ध-गण प्रस्तुत थे।
१९ और जब उसने उनका अभिवादन कर लिया था, उसने अनुक्रमिकतानुसार उन बातों की घोषणा की, जिन्हें ईश्वर ने अन्यप्रजातियों के बीच उसके सेवाकार्य द्वारा करवाई थीं।
२० और यह सुन कर उन्होंने प्रभु को गौरवान्वित किया, और उस से कहा, भाई तुम देख रहे हो, कि यहूदियों में से कितने हज़ारों हैं जो विश्वास करते हैं; और वो सभी नियम के प्रति कट्टरपन्थी हैं:
२१ और वो तुम्हारे विषय में सूचित हैं, कि तुम उन सभी यहूदियों को जो अन्यप्रजातियों के बीच हैं, यह सिखा रहे हो कि वो मूसा का त्याग कर दें, कहते हुए कि उन्हें अपने बच्चों का ख़तना नहीं करना चाहिए, न ही प्रथाओं का पालन करना चाहिए।
२२ तो भई अब क्या किया जाए? ये तो निश्चित है कि लोग इकट्टा होंगे: क्योंकि वो सुनेंगे कि तुम आ पहुँचे हो।
२३ इसलिए यह करो जो हम तुम से कह रहे हैं: हमारे पास चार आदमी हैं, जिन्होंने एक प्रण लिया हुआ है;
२४ उन्हें लेकर, स्वयं की उनके साथ शुद्धी कर लो, और उनके सरों के मुण्डन का खर्च तुम भर दो: तो सभी जान जाएँगे कि वो बातें जो उन्होंने तुम्हारे विषय में सुनी थीं, वो बातें अमान्य हैं; बल्कि तुम स्वयं भी व्यवस्थानुसर ही चलते हो, और नियम का पालन करते हो।
२५ अब उन विश्वासी अन्यप्रजातियों के विषय में, हम ने लिख दिया है और इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि वो ऐसी बातों का पालन न करें, सिवाय वो केवल मूर्तियों पर चढ़ाई गई वस्तुओं से, और रक्त से, और घोंटे हुओं से, और अविवाहित-यौन से स्वयं को सुरक्षित रखें।
२६ तब पौलुस ने उन आदमियों को साथ लेकर अगले दिन स्वयं को उनके साथ शुद्ध किए हुए, मन्दिर में प्रवेश किया, शुद्धीकरण की पूर्ती के दिनो की सूचना देने हेतु, जब प्रत्येक की ओर से आहुति चढ़ाई जाएगी।
२७ और जब वो सात दिन लगभग पूर्ण होने पर ही थे, एशिया के यहूदीयों ने उसे मन्दिर में देख कर सभी लोगों को भड़का दिया, और पौलुस पर अपने हाथ डाल दिए,
२८ चीखते हुए, इस्राएल के आदमियों, बचाओ!: यही वो आदमी है, जो सभी लोगों को सभी स्थानो में, हमारे लोगों के, और नियम के, और इस स्थान के विरुद्ध सिखाता रहता है: और इसके अतिरिक्त यह यूनानियों को भी मन्दिर में ले आया, और इसने इस पवित्र स्थान को प्रदूषित कर दिया है।
२९ (क्योंकि उन्होंने एक त्रोफ़िमुस नामक इफिसुसवासी को उसके साथ नगर में पहले देख लिया था, यह समझते हुए कि पौलुस उसे मन्दिर में लाया था।)
३० और सारे नगर में हलचल मच उठी थी, और लोग एक साथ भाग पड़े: और उन्होंने पौलुस को पकड़ कर उसे मन्दिर से बाहर खींच निकाला: और झट से द्वार बन्द कर दिए गए थे।
३१ और जैसे वो उसको मार डालने के यत्न में थे, पलटन के प्रमुख कप्तान के पास यह समाचार पहुँचा, कि समस्त यरूशलेम में उत्पात मचा हुआ है।
३२ तो वो तत्कालता से ही सैनिक और शतपतियों को लेकर उनकी ओर नीचे भागा: और जब उन लोगों ने प्रमुख कप्तान और सैनिकों को देखा, तो उन्होंने पौलुस को पीटना बन्द कर दिया।
३३ तब वो प्रमुख कप्तान निकट आया, और उसने पौलुस को पकड़ लिया, और आदेश दिया कि उसे दो बेड़ियों से बाँध दिया जाए; और उसने उस से पूछा कि वो कौन था, और कि उसने क्या कर डाला था।
३४ और जनौघ के बीच कुछ लोग कुछ चीखे, और कुछ अन्य लोग कुछ और: और जब वो इस कोलाहल का कारण नहीं जान पाया, तो उसने आदेश दिया कि उसे किले में उठाकर ले जाया जाए।
३५ और जब वो सीढ़ियों पर आ पहुँचा था, तो यह हुआ कि लोगों की हिंसा के कारण सैनिकों ने उसे ऊपर उठा लिया।
३६ क्योंकि लोगों का जनौघ चीखता हुआ पीछे-पीछे आ रहा था, दूर कर दो इसे।
३७ और जैसे पौलुस को किले में ले जाया जा रहा था, उसने प्रमुख-कप्तान से कहा, क्या मैं आप से बात कर सकता हूँ जी? जिसने कहा, क्या तू यूनानी बोल सकता है?
३८ क्या तू वो मिस्रवासी नहीं है, जिसने कुछ दिनो पूर्व एक उपद्रव मचा दिया था, और जो चार हज़ार हत्यारे आदमियों को जँगली-क्षेत्र में बाहर ले चला था?
३९ परन्तु पौलुस ने कहा, मैं किलिकिया के नगर तरसुस का एक यहूदी पुरुष हूँ, किसी साधारण नगर का नागरिक नहीं: और मैं आप से निवेदन करता हूँ, कि आप मुझे लोगों से बोलने की अनुमति दे दें।
४० और जब उसने पौलुस को अनुमति दे दी थी, तो पौलुस ने सीढीयों पर खड़ा हो कर लोगों को अपने हाथ से संकेत किया। और जब वहाँ बहुत शान्ति हो गई थी, तो वो उन से इब्रानी भाषा में बोला, कहता हुआ,
बाईसवाँ अध्याय।
१ पुरुषों, भाईयों, और पिताओं, मेरे पक्ष में सफाई सुनो जो मैं अब तुम्हें दे रहा हूँ।
२ (और जब उन्होंने सुना कि वो उन से इब्रानी भाषा में बोल रहा था, तो वो और भी अधिक शान्त हो गए: और उसने कहा,)
३ मैं सच में एक यहूदी पुरुष हूँ, किलिकिया के तरसुस में जन्मा, तथापि मैं इसी नगर में गमैलियल के पैरों में पला-बड़ा हूँ, और मुझे पित्रों के नियम की सम्पूर्ण प्रणालीनुसार शिक्षा दी गई है, और मैं ईश्वर के प्रति कट्टर था, जैसे तुम सभी इस दिन हो।
४ और मैंने इस पथ का मृत्यु तक अत्याचार किया, दोनो पुरुषों, और स्त्रियों को बाँध-बाँध कर मैंने उन्हें कारावासों में डाला।
५ जैसे कि मेरे प्रति उच्च पुरोहित और वृद्धों का पँथ भी साक्षी हैं: जिन से मैं भाईयों के प्रति पत्र ग्रहण कर, दमिश्क चला गया, वहाँ से बन्दियों को यरूशलेम लाकर दण्ड दिलवाने के लिए।
६ और यह होने को आया, कि जैसे मैं अपनी यात्रा पर था, और लगभग दोपहर के समय दमिश्क के निकट आ रहा था, अचानक स्वर्ग में से मेरे चारों ओर एक विशाल उजाला चमका।
७ और मैं धरती पर गिर पड़ा, और मैंने एक वाणी सुनी मुझ से कहती हुई, शाऊल-शाऊल, तुम मेरा अत्याचार क्यों कर रहे हो भई?
८ और मैंने उत्तर दिया, जी आप कौन हैं प्रभु? और उन्होंने मुझ से कहा, मैं नासरत का यीशु हूँ, जिसका तुम अत्याचार कर रहे हो।
९ और उन्होंने जो मेरे साथ थे, निश्चितता से उस उजाले को तो देखा, और वो डर गए थे; परन्तु उन्होंने उनकी वाणी नहीं सुनी जो मुझ से बोले थे।
१० और मैंने कहा, प्रभु मैं क्या करूँ? और प्रभु ने मुझ से कहा, उठो, और दमिश्क चले जाओ; और वहीं तुम्हें उन सभी बातों के विषय में बता दिया जाएगा, जो तुम्हारे द्वारा कर देने हेतु नियुक्त की गई हैं।
११ और जब मैं उस उजाले की महिमा के कारण देख नहीं पाया था; उनके हाथों जो मेरे साथ थे, मैं दमिश्क आ गया।
१२ और एक नियमानुसार श्रद्धालु पुरुष, अनन्याह, जो वहीं के सभी निवासी यहूदियों के बीच सम्मानित था,
१३ मेरे पास आकर खड़ा हो गया, और उसने मुझ से कहा, भाई शाऊल, अपनी दृष्टि ग्रहण कर लो। और उसी घड़ी मैंने उसकी ओर ऊपर देखा।
१४ और उसने कहा, हमारे पित्रों के ईश्वर ने तुम्हें चुन लिया है, कि तुम उनकी इच्छा जान लो, और उन नेक एक को देखो, और उनके मूँह की वाणी सुन लो।
१५ क्योंकि तुम उनके, सभी लोगों के प्रति, उन बातों के साक्षी होगे, जो तुमने देखी और सुनी हैं।
१६ और अब तुम विलम्ब क्यों कर रहे हो? उठो और बपतिस्मित हो जाओ, और प्रभु के नाम का आह्वान करते हुए, अपने पाप धो डालो।
१७ और यह होने को आया, कि, जब मैं यरूशलेम पुनः आ गया था, जैसे मैं मन्दिर में प्रार्थना कर ही रहा था, कि मैं अवचेतन में आविष्ट हो उठा;
१८ और मैंने उन्हें मुझ से कहते हुए देखा, शीघ्रता करो भई, और तुम फुर्ती से यरूशलेम से बाहर चले जाओ: क्योंकि यह मेरे विषय में तुम्हारा साक्ष्य ग्रहण नहीं करेंगे।
१९ और मैंने कहा, प्रभु, ये तो जानते हैं कि मैंने प्रत्येक यहूदी-आराधनालय में उन्हें बन्दी बनाया और कोड़ों से पीटा, जिन्होंने भी आप पर विश्वास कर लिया था:
२० और जब आपके साक्षी स्तीफनुस का रक्त बहा दिया गया था, मैं भी तो वहीं खड़ा था, उसकी मृत्यु की स्वीकृति देता हुआ, और मैंने उनके वस्त्र रख लिए थे जिन्होंने उसकी हत्या की थी।
२१ और उन्होंने मुझ से कहा, चले जाओ: क्योंकि मैं तुम्हें यहाँ से दूर अन्यप्रजातियों के पास भेज दूँगा।
२२ और उन लोगों ने पौलुस को इस शब्द तक सुनवाई दी, और फिर वो चिल्ला उठे कहते हुए, दूर कर दो इस बन्दे को धरती पर से: क्योंकि इसके लिए जीवित रहना सुयोग्य नहीं है।
२३ और जैसे वो चीख रहे थे, और अपने कपड़े फ़ेक रहे थे, और हवा में धूल उड़ा रहे थे,
२४ उस प्रमुख कप्तान ने आदेश दिया कि उसे किले में ले आया जाए, और उसने यह कहा कि उसकी कोडों की पिटाई से जाँच की जाए; ताकि वो यह जान सके कि वो उसके विरुद्ध किस कारण वश इस प्रकार चीख-चिल्ला रहे थे।
२५ और जैसे वो उसे डोरियों से बान्ध ही रहे थे, कि पौलुस ने उस शतपती से कहा जो वहीं खड़ा था, क्या तुम्हारे लिए किसी निर्दोष रोम-नागरिक को कोडों से पीटना न्यायी है क्या?
२६ जब उस शतपती ने यह सुना, उसने जाकर प्रमुख कप्तान को बताया, कहते हुए, आप सावधानी बरतें जी कि आप क्या कर रहे हैं: क्योंकि ये आदमी तो एक रोम-नागरिक है।
२७ तब वो प्रमुख कप्तान आया, और उसने उस से कहा, बता मुझे, क्या तू एक रोम-नागरिक है? उसने कहा, हाँ जी।
२८ और उस प्रमुख कप्तान ने उत्तर दिया, बहुत मूल्य से मैंने यह स्वतंत्रता प्राप्त की है। और पौलुस ने कहा, परन्तु मैं तो स्वतंत्र ही जन्मा था जी।
२९ तब तुरँत ही वो जो उसकी जाँच-पड़ताल करने ही वाले थे, उस से परे हट गए, और वो प्रमुख कप्तान भी डर गया था, यह जान लेने के पश्चात कि वो एक रोम-नागरिक था, और चूँकि उसने उसे बाँध दिया था।
३० उसके अगले दिन, क्योंकि वो कारण जानना चाहता था कि यहूदियों ने उस पर क्यों आरोप लगाया था, उसने उसे उसके बन्धनों से मुक्त कर दिया, और उच्च पुरोहितों और उनकी सम्पूर्ण परिषद-मण्डली को प्रस्तुत हो जाने का आदेश दे दिया, और उसने पौलुस को नीचे लाकर उनके समक्ष स्थित कर दिया।
तेईसवाँ अध्याय।
१ और पौलुस परिषद-मण्डली को एकटक उत्सुकता से देखता हुआ बोला, पुरुषों-भाईयों, मैंने ईश्वर के समक्ष एक अच्छी अन्तरात्मा में इस दिन तक जीवन व्यतीत किया है।
२ और उच्च पुरोहित अनन्याह ने उन्हें जो उसके साथ खड़े थे, आदेश दिया कि वो उसे मूँह पर थप्पड़ मार दें।
३ तो पौलुस ने उस से कहा, ईश्वर तुम्हें थप्पड़ मारेंगे, सफ़ेदी से पुती हुई दीवार: क्योंकि तुम नियमानुसार मेरा न्याय-निर्धारण करने तो बैठे हो, और तुम मुझे नियम के विरुद्ध मार खाने के लिए आदेश दे रहे हो?
४ और वो जो वहीं खड़े थे बोले, भई क्या तू ईश्वर के उच्च पुरोहित से अपशब्द बोलेगा क्या?
५ तब पौलुस बोला, भाई-जनो, मैं ये नहीं जानता था कि ये उच्च पुरोहित हैं: क्योंकि यह लिखा हुआ है, तुम अपने लोगों के अध्यक्ष के विषय में बुरा नहीं बोलोगे।
६ परन्तु जब पौलुस ने यह आभास कर लिया था कि एक भाग सदूकीयों का था, और दूसरा फैरिसियों का, तो वो उस परिषद में चीख पड़ा, पुरुषों और भाईयों, मैं तो एक फैरिसी हूँ, एक फैरिसी ही का बेटा: मृतकों की आशा और पुनरुत्थान के विषय में मुझ पर ये अभियोग लगाया जा रहा है।
७ और जब उसने ऐसा कह दिया था, तो उन फैरिसियों और सदूकीयों के बीच विसम्मिति खड़ी हो गई: और वो जनौघ विभाजित हो गया।
८ क्योंकि सदूकी कहते हैं कि कोई भी पुनरुत्थान नहीं होता, न ही दूत, न ही भावात्मा: परन्तु फैरिसी दोनो को स्वीकार करते हैं।
९ और एक बड़ा ही कोलाहल मच उठा था: और फैरिसियों के दल के लिपिक उठ खड़े हुए, और झगड़ पड़े, कहते हुए, भई हम तो इस व्यक्ति में कोई भी बुराई नहीं पा रहे हैं: परन्तु यदि किसी प्राण या किसी दूत ने इस से कुछ बोला है, तो हमें ईश्वर के विरुद्ध लड़ना नहीं चाहिए।
१० और जब एक बहुत ही बड़ी विसम्मिति खड़ी हो गई थी, तो उस प्रमुख कप्तान ने, इस डर के मारे कि पौलुस उन लोगों द्वारा टुकड़ों-टुकड़ों में न फाड़ दिया जाए, सैनिकों को नीचे जाकर उसे बलपूर्वक उनके बीच में से निकाल लेने का, और उसे किले में ले जाने का आदेश दे दिया।
११ और उसकी अगली रात प्रभु ने उसके साथ खड़े होकर कहा, पौलुस अच्छे प्रोत्साहित हो जाओ भई: क्योंकि जिस प्रकार तुमने मेरा साक्ष्य यरूशलेम में दिया है, अवश्य ही इसी प्रकार तुम्हें रोम में भी साक्ष्य देना है।
१२ और जब दिन हो चला था, तो यहूदियों में से कुछों ने गुटबंदी कर, स्वयं को एक अभिशाप तले बान्ध लिया, कहते हुए कि वो न ही कुछ खाएँगे और न ही कुछ पीएँगे, जब तक वो पौलुस को मार नहीं डालते।
१३ और वो चालीस से अधिक थे जिन्होंने यह षड्यन्त्र रचा था।
१४ और वो प्रमुख पुरोहितों और वृद्ध-गणो के पास आए, और कहा, हमने स्वयं को एक बड़े ही अभिशाप तले बाँध दिया है, कि हम तब तक कुछ भी नहीं खाएँगे, जब तक हम पौलुस की हत्या नहीं कर डालते।
१५ अब इसलिए तुम परिषद-मण्डली वालों, उच्च कप्तान को यह सूचना दे दो कि वो उसे कल तुम्हारे पास नीचे ले आए, मानो कि तुम उसके विषय में कुछ और सूक्ष्मता से पूछ-ताछ करना चाहते हो: और हम उसके निकट पहुँचते ही उसकी हत्या कर देने के लिए तैयार हैं।
१६ और जब पौलुस की बहन के बेटे ने उनके घात लगाने के विषय में सुना, तो उसने जाकर किले में प्रवेश किया, और पौलुस को बता दिया।
१७ तब पौलुस ने शतपतियों में से एक को अपने पास बुलाकर उस से कहा, इस युवक को प्रमुख कप्तान के पास ले जाओ: क्योंकि इसके पास उन्हें बताने के लिए कोई एक बात है।
१८ तो वो उसे लेकर प्रमुख कप्तान के पास ले आया, और कहा, कारावासी पौलुस ने मुझे अपने पास बुलाकर, अनुरोध किया कि मैं इस युवक को आपके पास ले आऊँ, जिसके पास आपसे कुछ कहने के लिए है।
१९ तब प्रमुख कप्तान ने उसे हाथ से पकड़ा, और उसके साथ अकेले परे जाकर उस से पूछा, वो क्या बात है जो तुम्हें मुझे बतानी है?
२० और उसने कहा, यहूदी सहमत हो गए हैं कि वो आपसे पूछें कि आप कल पौलुस को नीचे परिषद-मण्डली के सामने ले आएँ, मानो कि वो उस से कुछ और सूक्ष्मता से पूछ-ताछ कर सकें।
२१ परन्तु आप उनकी बात न मानिएगा जी, क्योंकि उन में से चालीस से भी अधिक आदमी पौलुस के लिए घात लगाए बैठे हैं, जिन्होंने स्वयं को एक शपथ से बाँध लिया है, कि वो न ही कुछ खाएँगे, न ही कुछ पीएँगे, जब तक वो उसे मार नहीं डालते: और अब वो आपके निर्णय की प्रतीक्षा में तैयार बैठे हैं।
२२ तो प्रमुख कप्तान ने उस युवा पुरुष को जाने दिया, और उसे आदेश दिया, भई देख लेना तुम, कि किसी भी व्यक्ति को मत बताना कि तुमने यह बातें मुझ से कही हैं।
२३ और उसने अपने पास दो शतपतियों को बुलाकर कहा, रात्रि की तीसरी घड़ी पर, कैसरिया जाने के लिए दो सौ सैनिकों को, और सत्तर घुड़-सवारों को, और दो सौ भालों से सशस्त्रित सैनिकों को तैयार कर दो:
२४ और उन्हें जानवर उपलब्ध करवा दो, ताकि वो पौलुस को उन पर बिठा कर, उसे राज्यपाल फीलिक्स के पास सुरक्षित ले जाएँ।
२५ और उसने इस प्रकार एक पत्र लिखा:
२६ क्लौदियुस लुसियस द्वारा अति-उत्कृष्ट राज्यपाल फीलिक्स को अभिवादन।
२७ यह आदमी यहूदियों में से पकड़ा गया था, और यह उनके द्वारा मार दिया गया होता: तब मैंने एक सैन्य-दल के साथ आकर इसे बचा लिया, यह जानकर कि यह एक रोम-नागरिक है।
२८ और जब मैं उनके, इसके प्रति दोषारोपण का कारण जानना चाहता था, तो मैं इसे उनकी परिषद-मण्डली के समक्ष ले आया:
२९ जिसके विषय में मैंने आभास किया कि यह उनके नियम के प्रशनों के कारण आरोपित था, परन्तु इस पर मृत्यु या बँधनो के योग्य कोई भी आरोप नहीं था।
३० और जब मुझे यह सूचना मिली कि कैसे यहूदी इस आदमी के लिए घात लगाए बैठे थे, तो मैंने इसे तुरँत ही आपके पास भिजवा दिया, और इसके आरोपियों को भी यह आदेश दे दिया कि वो आपके समक्ष बोलें कि उनका इसके विरुद्ध क्या अभियोग है। विदाई में प्रणाम।
३१ तब उन सैनिकों ने, आदेशानुसार, पौलुस को लिया, और उसे रात-रात में ही अंतिपत्रिस ले आए।
३२ अगले दिन उन्होंने उन घुड़-सवारों को पौलुस के साथ जाने के लिए रहने दिया, और वो वापस किले आ गए:
३३ जिन्होंने कैसरिया पहुँच कर राज्यपाल को वो पत्र प्रदान कर दिया, और पौलुस को भी उसके समक्ष प्रस्तुत कर दिया।
३४ और जब राज्यपाल ने वो पत्र पढ़ लिया था, तो उसने पूछा कि वो किस प्रान्त से था। और जब उसने यह समझ लिया था कि वो किलिकिया का था;
३५ तो उसने कहा, मैं तुम्हारी सुनवाई लूँगा, जब तुम्हारे आरोपी भी आ जाएँगे। और उसने आदेश दिया कि उसे हेरोदेस के प्रांतपति-निवास में सुरक्षित रख दिया जाए।
चौबीसवाँ अध्याय।
१ और पाँच दिनो पश्चात उच्च पुरोहित अनन्याह, वृद्धों, और किसी एक तरतुल्लूस नामक वाग्मी के साथ नीचे आ पहुँचा, जिसने पौलुस के विरुद्ध राज्यपाल को सूचना दी।
२ और जब उसे आगे बुला लिया गया था, तो तरतुल्लूस उस पर आरोप लगाने लग गया, कहता हुआ, यह देखते हुए कि आपके द्वारा हम अपार शान्ति का आनन्द लेते हैं, और कि कई अति सुयोग्य कार्यों की करनी आप ही की दूरदर्शिता के कारण इस राष्ट्र के प्रति की जाती है,
३ हम यह सदैव, और प्रत्येक स्थानों में, पूर्ण कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं, ओ महामहिम फीलिक्स।
४ किन्तु अब मेरे न चाहते हुए, कि मैं आपके लिए अधिक विलम्ब का कारण बनूँ, मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ, कि आप अपनी दयाशीलता से हमारे कुछ शब्द सुन लें।
५ क्योंकि हमने इस आदमी को एक महामारी फैलाने वाले कीड़े समान, और इस समस्त संसार में यहूदियों के बीच एक राजद्रोह भड़काने वाला, और नासरीनों के सम्प्रदाय का मुखिया पाया है:
६ जिसने मन्दिर को भी कलुषित कर देने का प्रयास किया है: जिसे हमने पकड़ लिया था, और हम इसका अपने नियमानुसार न्याय-निर्धारण कर देते।
७ परन्तु प्रमुख कप्तान लुसियस हम पर आ धमके, और बड़ी हिंसा के साथ वो इसे हमारे हाथों में से बाहर निकाल ले गए,
८ इसके आरोपियों को आपके पास उपस्थित होने का आदेश देते हुए: जिसकी जाँच-पड़ताल कर लेने के पश्चात आप स्वयं इन सभी घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर लें, जिनके विषय में हम इस पर आरोप लगा रहे हैं।
९ और उन यहूदियों ने भी स्वीकृति दी, कहते हुए कि यह घटनाएँ ऐसी ही घटी थीं।
१० तब पौलुस ने, राजपाल के उसके बोलने की अनुमती के संकेत को दे देने के पश्चात, उत्तर दिया, मेरे यह जानते हुए कि आप कई वर्षों से इस राष्ट्र पर न्यायाधीष स्थापित हैं, मैं अति प्रसन्नता से अपने स्वयं के प्रतिपक्ष में बोलता हूँ:
११ ताकि आप समझ सकें, कि बस केवल बारह दिन पूर्व ही मैं ऊपर यरूशलेम में आराधना करने गया था।
१२ और इन्होंने न ही मुझे मन्दिर में किसी भी व्यक्ति के साथ वाद-विवाद करते हुए पाया, न ही लोगों को भड़काते हुए, न ही यहूदी-आराधनालयों मे, और न ही नगर में:
१३ न ही यह इन बातों को प्रमाणित कर सकते हैं जिनके विषय में यह मुझ पर अब आरोप लगा रहे हैं।
१४ परन्तु मैं आपसे यह स्वीकार करता हूँ, कि जिस पथ को यह पाषंड मानते हैं, मैं उसी पथानुसार अपने पित्रों के ईश्वर की आराधना करता हूँ, उन सभी बातों पर विश्वास करता हुआ जो नियम और पैग़म्बरों में लिखी हुई हैं:
१५ और ईश्वर के प्रति मुझे यह आशा है, जिसकी यह भी स्वयं स्वीकृति देते हैं, कि मृतकों का एक पुनरुत्थान होगा, दोनो न्यायियों का और अन्यायियों का भी।
१६ और इसी में मैं स्वयं यह प्रयत्न करता हूँ, कि मैं अपनी अन्तरात्मा ईश्वर के प्रति, और मानवता के प्रति सदैव निर्दोष रखूँ।
१७ अब कई वर्षों पश्चात मैं अपने राष्ट्र में दान, और आहुतियाँ लाने हेतु आया।
१८ जिस पर कि एशिया के कुछ यहूदियों ने मुझे मन्दिर में शुद्ध-स्थिति से पाया, न ही जनौघ के साथ, न ही किसी कोलाहल के साथ।
१९ जिन्हें यहीं आपके समक्ष उपस्थित हो कर विरोध करना चाहिए था, यदि उन्हें मुझ से कोई शिकायत होती।
२० अन्यथा इन्हीं को जो यहाँ हैं, बोलना चाहिए, यदि इन्होंने मुझ में कोई भी दुषकर्म पाया हो, जब मैं परिषद-मण्डली के समक्ष खड़ा था,
२१ सिवाय इस एक वाणी के, जो मैं उन के बीच खड़ा हुआ चीखा, मृतकों के पुनरुत्थान के विषय में मुझ से आपके द्वारा इस दिन यह प्रश्नावली की जा रही है।
२२ और जब फीलिक्स ने यह बातें सुनी, उस पथ के विषय में अधिक सटीक जानकारी रखते हुए, तो उसने उन्हें स्थगित कर दिया, और कहा, जब प्रमुख-कप्तान लुसियस नीचे आ जाएगा, तो मैं तुम्हारी इस समस्या की समझ ले लूँगा।
२३ और उसने एक शतपती को पौलुस को रखने का आदेश दे दिया, और कि वो उसे स्वतन्त्र रख कर, उसके किसी भी परिचित को उसकी सेवा करने से या उस से मिलने से न रोके।
२४ और कुछ दिनो पश्चात, जब फीलिक्स अपनी यहूदन पत्नी द्रुसिल्ला के साथ पधारा, तो उसने पौलुस को बुलवा भेजा, और उस से मसीहा में विश्वास सम्बन्धी बातें सुनी।
२५ और जैसे वो नेकी, संयम, और आने वाले न्याय-निर्धारण के विषय में बहस कर चुका था, फीलिक्स ने काँपते हुए उत्तर दिया, इस समय अपने पथ पर चलते बनो; जब मेरे पास समय उचित होगा, तो मैं तुम्हें बुलवा लूँगा।
२६ वो ये आशा भी करता था कि पौलुस उसे पैसे दे दे, ताकि वो उसे रिहा कर दे: इसी कारण वो उसे बार-बार बुलाकर उसके साथ वार्तालाप किया करता था।
२७ परन्तु दो वर्ष पश्चात पौरशियस फेस्तुस फीलिक्स के पद पर नियुक्त हुआ: और फीलिक्स ने यहूदियों को प्रसन्न कर देने के उद्देश्य से, पौलुस को बन्दी ही छोड़े रखा।
पच्चीसवाँ अध्याय।
१ अब जब फेस्तुस उस प्रान्त में आ गया था, तीन दिनो पश्चात वो कैसरिया से ऊपर यरूशलेम गया।
२ तब उच्च पुरोहित ने और यहूदियों के प्रमुखों ने उसे पौलुस के विरुद्ध सूचित किया, और उस से निवेदन किया,
३ और उसके विरुद्ध अनुग्रह की इच्छा व्यक्त की, कि वो उसे यरूशलेम भिजवा दे, उसकी पथ पर घात लगाए हत्या कर देने हेतु,
४ परन्तु फेस्तुस ने उत्तर दिया, कि पौलुस को कैसरिया में ही रखा जाएगा, और कि वो स्वयं भी वहीं जाने के लिए प्रस्थान करेगा।
५ तो उसने कहा, इसलिए उन्हें जो तुम्हारे बीच सक्षम हैं, मेरे साथ नीचे चले जाने दो, और इस आदमी पर अभियोग लगा देने दो, यदि इस में कोई भी दुष्टता हो।
६ और जब वो उनके बीच दस दिन से अधिक ठहर लिया था, तो वो नीचे कैसरिया चला गया; और अगले दिन न्यायासन पर बैठ कर उसने पौलुस को प्रस्तुत करने की आज्ञा दी।
७ और जब वो आ गया था, यरूशलेम से नीचे आए उन यहूदियों ने एक घेरे में खड़े होकर पौलुस के विरुद्ध अनेक गम्भीर आरोप लगाए जिन्हें वो प्रमाणित नहीं कर पाए।
८ जबकि उसने अपने पक्ष के समर्थन में उत्तर दिया, मैंने किसी भी प्रकार की बात का उल्लंघन नहीं किया है, न ही यहूदियों के नियम के विरुद्ध, न ही मन्दिर के विरुद्ध, और न ही रोम के राजा के विरुद्ध।
९ परन्तु फेस्तुस ने यहूदियों के प्रति एक अनुग्रह कर देने की इच्छा से, पौलुस को उत्तर दिया, और कहा, क्या तुम ऊपर यरूशलेम जाना चाहते हो, और वहीं मेरे समक्ष इन बातों समबन्धी तुम्हारा न्याय कर दिया जाए?
१० तब पौलुस ने कहा, मैं रोम के राजा के न्यायासन के समक्ष खड़ा हूँ, जहाँ मेरा न्याय किया जाना चाहिए; मैंने यहूदियों के विरुद्ध कोई भी अपराध नहीं किया है, जैसा आप भली-भाँति जानते हैं।
११ क्योंकि यदि मैं अपराधी हूँ, या मैंने कुछ भी मृत्युदण्ड के योग्य किया हो, तो मैं मर जाने को अस्वीकार नहीं करता: परन्तु यदि ऐसी कोई भी बातें न हों जिनके विषय में यह मुझ पर आरोप लगा रहे हैं, कोई भी व्यक्ति मुझे इनके हाथों में प्रदान न करे। मैं रोम के राजा से पुनरावेदन करता हूँ।
१२ तब परिषद से विचार-विमर्श कर लेने पर, फेस्तुस ने उत्तर दिया, क्या तुम ने रोम के राजा से पुनरावेदन किया है? तो तुम रोम के राजा ही के पास जाओगे।
१३ और कुछ दिनो पश्चात राजा अग्रिप्पा और बरनीके, फेस्तुस का अभिवादन करने कैसरिया आ पहुँचे।
१४ और जब वो वहीं कई दिन ठहर चुके थे, तो फेस्तुस ने पौलुस की परिस्तिथि राजा के समक्ष प्रस्तुत की, कहते हुए, फीलिक्स द्वारा कोई एक आदमी बन्दी छोड़ दिया गया है:
१५ जिसके विषय में, जब मैं यरूशलेम में था, तो प्रमुख पुरोहितों और यहूदियों के वृद्धमानों ने मुझे सूचित किया, उसके विरुद्ध न्याय-निर्धारण की इच्छा करते हुए।
१६ जिन्हें मैंने उत्तर दिया, रोम-गण की यह रीति नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को मृत्युदण्ड दे दिया जाए, इस से पहले कि अभियुक्त और अभियोगी आमने-सामने न खड़े हो जाएँ, और वो अभियुक्त अपने स्वयं के पक्ष में उस अपराध के विषय में अपना प्रतिपक्ष न प्रस्तुत कर दे, जिसका कि उस पर आरोप लगाया गया है।
१७ इसलिए, जब वो यहाँ आ गए थे, तो बिना विलम्ब किए उसके अगले दिन ही मैं न्यायासन पर बैठा, और उस आदमी को प्रस्तुत करने का आदेश दे दिया।
१८ जिसके विरुद्ध जब वो आरोपी उठ खड़े हुए, तो उन्होंने ऐसा कोई भी आरोप नहीं लगाया जिनके विषय में मैं अनुमान लगा रहा था:
१९ बल्कि वो उसके विरुद्ध अपने ही अन्धविश्वासों से सम्बन्धित, और किसी एक यीशु से सम्बन्धित, जो कि मर चुका है, प्रश्न उठा रहे थे, जिसके विषय में पौलुस ने यह पुष्टि दी कि भई वो तो जीवित है।
२० अब चूँकी मुझे इन प्रकार के प्रश्नो के विषय में सन्देह था, तो मैंने उस से पूछा कि क्या वो यरूशलेम जाना चाहेगा ताकि वहीं उसका इन विषयों में न्याय किया जाए।
२१ परन्तु जब पौलुस ने औगुस्तुस की सुनवाई तक स्वयं के संरक्षण का पुनरावेदन किया, तो मैंने आदेश दे दिया कि उसे तब तक रख लिया जाए, जब तक मैं उसे रोम के राजा के पास न भेज दूँ।
२२ तब अग्रिप्पा ने फेस्तुस से कहा, मैं भी स्वयं इस व्यक्ति को सुनना चाहता हूँ। उसने कहा, उसे आप कल सुन लीजिएगा।
२३ और अगले दिन, जब अग्रिप्पा और बरनीके बड़े ही ठाठ-बाठ के साथ आ गए थे, और उन्होंने उच्च कप्तानों, और नगर के प्रतिष्ठित पुरुषों के साथ सभाभावन में प्रवेश कर लिया था, तो फेस्तुस के आदेशानुसार पौलुस को आगे लाया गया।
२४ और फेस्तुस ने कहा, राजा अग्रिप्पा, और आप सभी पुरुष जो यहाँ हमारे साथ उपस्थित हैं, आप इस आदमी को देख रहे हैं, जिसके समबन्ध में यहूदियों के समस्त जनौघ ने मुझ से चीख-चीख कर माँग की है, यरूशलेम में, और यहाँ भी, कि इस व्यक्ति को और अधिक जीवित नहीं रहना चाहिए।
२५ परन्तु जब मैंने पाया कि इसने मृत्युदण्ड के योग्य कोई भी कार्य नहीं किया था, और कि इसने स्वयं ही औगुस्तुस को पुनरावेदन कर दिया था, तो मैंने इसे भेजने का निश्च्य कर लिया है।
२६ जिसके विषय में मेरे पास कोई भी स्पष्ट बात नहीं है जिसे मैं अपने मालिक को लिख सकूँ। इसी कारण वश मैं इसे आपके समक्ष लाया हूँ, और विशेष रूप से आपके समक्ष हे राजा अग्रिप्पा, ताकि जाँच-पड़ताल के पश्चात, मुझे कुछ लिखने का आधार मिल जाए।
२७ क्योंकि मुझे ये अयोग्य लग रहा है, कि मैं किसी बन्दी को उसके विरुद्ध लगाए गए अपराधों के अभियोग का उल्लेख किए बिना ही भेज दूँ।
छब्बीसवाँ अध्याय।
१ तब अग्रिप्पा ने पौलुस से कहा, तुम्हें अपने स्वयं के प्रति बोलने की अनुमती है। तब पौलुस ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर अपने स्वयं के पक्ष में उत्तर दिया:
२ मैं स्वयं प्रसन्न हूँ राजा अग्रिप्पा, क्योंकि मैं आपके समक्ष अपने स्वयं के पक्ष में इस दिन उन सभी बातों के समबन्ध में उत्तर दूँगा, जिनके विषय में यहूदियों ने मुझ पर आरोप लगाए हैं:
३ विशेष रूप से क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप यहूदियों की सभी रीतियों, और प्रश्नों के विशेषज्ञ हैं: इसी कारण मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप मुझे धैर्यपूर्वकता से सुने।
४ सभी यहूदी मेरे युवाकाल से लेकर मेरे जीवन की प्रणाली से परिचित हैं, जो पहले मेरे अपने राष्ट्र यरूशलेम में बीती;
५ जो मुझ से आरम्भ से ही परिचित हैं, यदि यह साक्ष्य दे दें, कि हमारे धर्म के सब से कट्टर सम्प्रदायानुसार ही मैंने एक फैरिसी का जीवन व्यतीत किया।
६ और अब मेरे खड़े होते हुए मुझ पर उस प्रतिज्ञा की आशा हेतु यह अभियोग लगाया जा रहा है, जो ईश्वर ने हमारे पित्रों को दी थी:
७ जिस प्रतिज्ञा के प्रति हमारी बारह प्रजातियाँ रात-दिन ईश्वर की कर्मठता से सेवा करती हुईं, प्रवेश करने की आशा रखती हैं। राजा अग्रिप्पा, इसी आशा के वास्ते यहूदियों ने मुझ पर आरोप लगाया है।
८ आपको यह बात अविश्वसनीय क्यों प्रतीत हो, कि ईश्वर मृतकों को ऊपर उठा दें?
९ मैंने सच में अपने ही मन में सोचा, कि मैं नासरत के यीशु के नाम के विरुद्ध कई कार्य करूँ।
१० जो कार्य मैंने यरूशलेम में भी किए: और प्रमुख पुरोहितों द्वारा प्राधिकार प्राप्त कर लेने पर, मैंने कई सन्तों को कारावास में बँद कर दिया, और जब उन्हें मृत्यु के घाट उतार दिया जाता था, मैंने उनके विरुद्ध अपनी स्वीकृति दी।
११ और मैंने उनको बार-बार प्रत्येक यहूदी-आराधनालय में दण्ड दिया, और उन्हें ईश्वर-निंदा करने पर विवश किया: और उनके विरुद्ध अत्यंत आक्रोश से बावला हो, मैंने उनका अत्याचार परदेशी नगरों तक भी किया।
१२ तो प्रमुख पुरोहितों द्वारा प्राधिकार और अनुमती प्राप्त कर लेने पर, जैसे मैं दमिश्क जा रहा था,
१३ दोपहर के समय, हे राजा, मैंने पथ पर स्वर्ग से एक उजाला देखा, जो सूर्य के उजाले से भी अधिक उज्ज्वल था, मेरे और उनके चारों ओर चमकता हुआ जो मेरे साथ उस यात्रा में थे।
१४ और जब हम सभी धरती पर गिर पड़े थे, तो मैंने एक वाणी सुनी मुझ से इब्रानी भाषा में बोलती हुई, शाऊल-शाऊल, तुम मेरा अत्याचार क्यों कर रहे हो भई? अँकुशों पर लात से ठोकर मारना तुम्हारे लिए कठिन है।
१५ और मैंने कहा, जी आप कौन हैं प्रभु? और उन्होंने कहा, मैं यीशु हूँ जिसका तुम अत्याचार कर रहे हो।
१६ अब उठो, और अपने पैरों पर खड़े हो जाओ: क्योंकि मैं तुम्हें दोनो, इन बातों का जिन्हें तुमने देखा है, और उन बातों का जिनके विषय में मैं तुम्हें प्रकट हूँगा, एक सेवक और साक्षी बनाने के उद्देश्य से प्रकट हुआ हूँ;
१७ तुम्हारा लोगों से और अन्यप्रजातियों से उद्धार करते हुए, जिनके पास मैं तुम्हें अब भेज रहा हूँ,
१८ उनकी आँखें खोलने के लिए, और उन्हें अन्धेरे से उजाले की ओर, और शैतान की शक्ती से ईश्वर की ओर मोड़ने के लिए, ताकि वो अपने पापों के लिए क्षमा, और उन सभी के बीच एक विरासत ग्रहण कर लें, जो मुझ में विश्वास द्वारा पुनीत हो चुके हैं।
१९ तो हे राजा अग्रिप्प्पा, मैंने इस स्वर्गिक दृश्य की अवज्ञा नहीं की जी:
२० बल्कि पहले मैंने दमिश्क वासियों को, और यरूशलेम में, और यहूदा के सर्वत्र की सीमाओं में, और फिर अन्यप्रजातियों को बताया, कि उन्हें मन-परिवर्तन कर ईश्वर की ओर मुड़ जाना चाहिए, और मन-परिवर्तन के योग्य कार्य करने चाहिएँ।
२१ यही कारण हैं कि यहूदियों ने मुझे मन्दिर में पकड़ लिया, और वो मेरी हत्या करने का यत्न कर रहे थे।
२२ इसलिए ईश्वर द्वारा सहायता प्राप्त कर लेने पर, मैं इस दिन तक लगा हुआ हूँ जी, दोनो छोटों को और बड़ों को साक्ष्य देता हुआ, केवल उन्हीं बातों को बोलता हुआ जिनकी होनी के विषय में पैग़म्बरों और मूसा ने कह दिया था:
२३ कि मसीहा को कष्ट झेलने होंगे, और कि उन्हीं को सबसे पहले मृतकों में से उठ कर, लोगों और अन्यप्रजातियों को उजाले का संदेश घोषित करना होगा।
२४ और जैसे वो अपने स्वयं के पक्ष में बोल रहा था, फेस्तुस ने एक प्रबल वाणी से कहा, पौलुस, भई तुम तो बेसुध हो चुके हो; तुम्हारे अध्ययन के आधिक्य ने तो तुम्हें पागल बना डाला है!
२५ परन्तु उसने उत्तर दिया, मैं पागल नहीं हूँ, सबसे महामहिम फेस्तुस; बल्कि मैं सत्य और संयमी शब्द बोल रहा हूँ।
२६ क्योंकि राजा इन बातों के जानकार हैं, जिनके समक्ष मैं स्वतंत्रता से बोल रहा हूँ: क्योंकि मैं विश्वस्त हूँ कि इन में से कोई भी बात इन से छुपी नहीं है; क्योंकि यह घटना किसी कोने में नहीं घटी थी।
२७ राजा अग्रिप्पा, आप पैग़म्बरों में विश्वास करते हैं न? मैं जानता हूँ कि आप विश्वास करते हैं।
२८ तब अग्रिप्पा ने पौलुस से कहा, तुम तो मुझे मसीही बन जाने के लिए लगभग पूरा ही मनवा दोगे भई!
२९ और पौलुस ने कहा, मेरी ईश्वर से यह इच्छा है, कि न केवल आप, बल्कि वो सब भी जो मुझे इस दिन सुन रहे हैं, दोनो लगभग, और पूर्णतः मेरे जैसे ही बन जाते, सिवाय इन बेड़ियों के।
३० और जब उसने ऐसा कह दिया था, राजा, और वो राज्यपाल, और बरनीके, और वो जो उनके साथ बैठे थे, उठ गए:
३१ और जब वो अलग परे हो गए थे, तो उन्होंने स्वयं के बीच वार्तालाप किया, कहते हुए, ये व्यक्ति तो मृत्युदण्ड या फिर बेड़ियों के योग्य कुछ भी नहीं करता है।
३२ तब अग्रिप्पा ने फेस्तुस से कहा, इस आदमी को तो रिहा कर दिया जा सकता था, यदि इसने रोम के राजा से पुनरावेदन की दुहाई न माँगी होती।
सत्ताईसवाँ अध्याय।
१ और जब यह निर्धारित कर दिया गया था कि हमें जलयात्रा द्वारा इटली जाना होगा, तो उन्होंने पौलुस और कुछ अन्य कारावासियों को औगुस्तुस की पलटन के किसी यूलियुस नामक शतपती के हाथों में प्रदान कर दिया।
२ और अद्रमुत्तियम के एक जलयान में प्रवेश कर, हम निकल पड़े, एशिया के किनारों के साथ-साथ जल-यात्रा करने के प्रयोजन से; थिस्सलूनीका के एक मकिदुनियावासी अरिस्तर्खुस के हमारे साथ होते हुए।
३ और अगले दिन हमने सिदोन में लंगर डाला। और यूलियुस ने पौलुस को सुशीलता दिखाई, और उसे अपने मित्रों के पास पाहुन होने की अनुमति दे दी।
४ और जब हम वहाँ से निकल पड़े थे, तो हमने कुप्रुस के तले जल-यात्रा की, क्योंकि वायुएँ प्रतिकूल थीं।
५ और जब हमने किलिकिया और पंफुलिया के समुद्र पर से जल-यात्रा कर ली थी, तो हम लुकिया के एक नगर, मायरा पहुँचे।
६ और वहीं उस शतपती ने सिकन्द्रीया का एक जलयान पाया, जो इटली जा रहा था; और उसने हमें उसी पर चढ़ा दिया।
७ और जब हमने कई दिन धीमी गती से जल-यात्रा कर ली थी, और हम बस अभी क्नीदुस के पास पहुँचे ही थे, वायु हमारा साथ न देती हुई, तो हम क्रेते के तले जल-यात्रा करते गए, सलमोने के सामने से;
८ और, उसे कठिनाई से ही पार करते हुए, हम उस एक स्थान आ पहुँचे जो "सुन्दर नौकाश्रय" कहलाया जाता है; लसेया के नगर के निकट ही।
९ अब जब बहुत समय बीत चुका था, और जब जल-यात्रा करना अब संकटमय था, क्योंकि उपवास बीत चुका था, पौलुस ने उन्हें चेतावनी दी,
१० और उनसे कहा, श्रीमानों, मुझे प्रतीत हो रहा है कि यह समुद्र-यात्रा हानी और बहुत क्षति के साथ होगी, न केवल लदे हुए माल और जलयान की, बल्कि हमारे जीवनों की भी।
११ तब भी उस शतपती ने जलयान-चालक और उस जलयान के मालिक पर अधिक विश्वास किया, पौलुस द्वारा बोली गई बातों की तुलना में।
१२ और क्योंकि वो नौकाश्रय शीत ऋतु बिताने के योग्य नहीं था, लोगों में से अधिकांश ने वहाँ से भी प्रस्थान कर लेने का सुझाव दिया, यदि वो फैनिकिया तक किसी भी प्रकार पहुँच सकें, और वहीं शीत ऋतु बिताएँ; जो क्रेते का एक नौकाश्रय है, जो दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम की ओर अन्मुख है।
१३ और जब दक्षिणी वायु मृदुलता से चली, यह सोचते हुए कि उनका उद्देश्य पूर्ण हो गया था, तो वो वहाँ से निकलते हुए, क्रेते के निकट जलयात्रा करते गए।
१४ परन्तु कुछ ही समय पश्चात उसके विरुद्ध एक तूफ़ानी आँधी उठी, जो यूरोक्लिदोन कहलाई जाती है।
१५ और जब वो जलयान उसकी पकड़ में आ गया था, और वो उस वायु का सामना नहीं कर पाया, तो हमने उसे बहते चले जाने दिया।
१६ और किसी एक क्लौदा नामक द्वीप तले चलते हुए, हम कठिनाई से ही डोंगी को नियंत्रित कर पाए:
१७ जिसे जब उन्होंने ऊपर ले लिया था, तो उन्होंने सहायताओं के प्रयोग से जलयान को चारों-ओर से बाँध दिया; और इस भय से कि कहीं वो सिर्टिस के रेत में न फँस जाएँ, उन्होंने पाल को नीचे कर दिया, और तो वो इस प्रकार बहते चले गए।
१८ और हम एक तूफ़ान से अत्याधिकता से झकझोरे हुए, अगले दिन उन्होंने जलयान को हल्का कर दिया;
१९ और तीसरे दिन हमने अपने स्वयं के हाथों से ही उस जलयान के यंत्र-आदि बाहर फैंक दिए।
२० और जब कई दिनो तक न ही सूर्य और न ही सितारे दिखाई पड़े, और जब हम एक शक्तिशाली तूफ़ान की चपेट में आ गए थे, हमारे बचाव की सारी आशा तब विलुप्त हो गई।
२१ परन्तु बहुत समय के परिवर्जन पश्चात पौलुस ने उनके बीच आगे खड़ा हो कर कहा, श्रीमानो, तुम्हें मेरी बात का श्रवण कर लेना चाहिए था, और क्रेते से प्रस्थान नहीं करना चाहिए था, ताकि तुम इस हानी और घाटे से अप्रभावित रहते।
२२ और अब मैं तुम्हें अच्छा प्रोत्साहित होने की अभिप्रेरणा दे रहा हूँ: क्योंकि तुम्हारे बीच किसी भी व्यक्ति का जीवन नष्ट नहीं होगा, बस केवल जलयान का ही।
२३ क्योंकि इस रात मेरे साथ ईश्वर के दूत ने खड़ा होकर, जिनका की मैं हूँ, और जिनकी मैं सेवा करता हूँ,
२४ कहा, डरो मत पौलुस: तुम्हें अवश्य ही रोम के राजा के समक्ष लाया जाना है: और लो, ईश्वर ने तुम्हें यह सब भी प्रदान कर दिए हैं जो तुम्हारे साथ जलयात्रा कर रहे हैं।
२५ इस कारण श्रीमानो, अच्छे प्रोत्साहित हो जाओ: क्योंकि मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ, कि वैसा ही होगा जैसा मुझे बता दिया गया था।
२६ लेकिन हमे अवश्य ही किसी एक द्वीप पर पटक दिया जाना होगा।
२७ परन्तु जब चौदहवीं रात हो गई थी, जैसे हम आद्रिया में ऊपर-नीचे बहते जा रहे थे, लगभग मध्य-रात्रि के समय नाविकों ने यह सोचा कि वो किसी देश के निकट आ गए हैं;
२८ और उन्होंने थाह मापी, और उसे बीस फैथम पाया: और जब वो थोड़ी ही दूर आगे गए, तो उन्होंने पुनः थाह मापी, और उन्होंने उसे पन्द्रह फैथम पाया।
२९ तब इस भय से कि कहिं हम पत्थरों से न जा टकरें, उन्होंने जलयान के पिछले भाग से चार लंगर डाल दिए, और प्रातःकाल की प्रतीक्षा करने लग गए।
३० और जैसे वो नाविक जलयान में से बाहर भाग जाने ही वाले थे, जब उन्होंने समुद्र में डोंगी को नीचे कर दिया था, मानो दिखावे से कि वो जलयान के अग्रभाग में से लंगरों को डाल देंगे,
३१ पौलुस ने उस शत-पति और उन सैनिकों से कहा, सिवाय यह जलयान में ठहरे रहें, तुम बच नहीं पाओगे।
३२ तब उन सैनिकों ने उस डोंगी के रस्सों को काट दिया, और उसे गिर जाने दिया।
३३ और जैसे-जैसे दिन चढ़ रहा था, पौलुस ने उन सब से भोजन करने की विनती की, कहते हुए, यह दिन अब चौदहवाँ दिन हो गया है जब से तुम चिंता में लगातार निराहार रहे हो, और तुम ने कुछ भी नहीं लिया है।
३४ इसी कारण मैं तुम से प्रार्थना कर रहा हूँ कुछ भोजन कर लो: क्योंकि यह तुम्हारे लिए स्वास्थवर्धक है: क्योंकि तुम में से प्रत्येक के सर पर से एक भी बाल नहीं झड़ेगा।
३५ और जब उसने ऐसा बोल दिया था, तो उसने रोटी ली, और उन सभी की उपस्थिति में ईश्वर को धन्यवाद दिया: और जब उसने उसे तोड़ लिया था, वो खाने लग गया।
३६ तब वो सभी अच्छे प्रोत्साहित हो गए, और उन्होंने कुछ भोजन भी कर लिया।
३७ और हम सभी जो उस जलयान में थे, दो सौ छियत्तर आत्माएँ थे।
३८ और जब उन्होंने समुचित खा लिया था, तो उन्होंने जलयान को हल्का कर दिया, और गेहूँ को बाहर समुद्र में फैंक दिया।
३९ और जब दिन हो चला था, तो उन्होंने उस भूमी को पहचाना नहीं: परन्तु उनकी दृष्टि किसी एक किनारे वाली खाड़ी पर पड़ी, जिस में उन्होंने निश्च्य किया कि यदि हो सके, तो वो उस जलयान को धकेल दें।
४० और जब उन्होंने लंगरों को ऊपर खींच लिया था, तो उन्होंने स्वयं को समुद्र के प्रति सुपुर्द कर दिया, और पतवार के बन्धनों को ढीला कर दिया, और मुख्यपाल को हवा में तानकर लहरा दिया, और तट की ओर चल पड़े।
४१ और दो समुद्रों के संगम के एक स्थान में आ-पड़ने पर, उन्होंने जलयान को भूग्रस्त कर डाला; और वो अग्रभाग कस कर अटक गया, और अचल रहा, परन्तु पिछला भाग लहरों की उग्रता से टूट गया था।
४२ और सैनिकों का परामर्श था कि बन्दियों को मार दिया जाए, कहिं उन में से कोइ भी तैर कर भाग न जाए।
४३ परन्तु शत-पति ने पौलुस को बचाने की इच्छा से उन्हें उनके उद्देश्य से रोक दिया; और यह आदेश दे दिया कि पहले वो जो तैर सकते हों, समुद्र में स्वयं छलाँग लगाकर तट पर पहुँच जाएँ:
४४ और शेष लोग, कुछ पटरों पर, और कुछ जलयान के टूटे-फूटे हुए टुकड़ों पर आ जाएँ। और तो यह होने को आया, कि वो सभी बच कर भूमी पर सुरक्षित पहुँच गए।
अट्ठाईसवाँ अध्याय।
१ और जब वो बच निकले थे, तब उन्हें पता चला कि उस द्वीप का नाम माल्टा था।
२ और उन आदिवासियों ने हमारे साथ करुणा में कोई लघुता नहीं छोड़ी: क्योंकि उन्होंने वर्षा के कारण, और ठण्ड के कारण, हमारे लिए एक आग जला कर हम में से प्रत्येक का स्वागत किया।
३ और जब पौलुस ने डंडियों का एक गंठल इकट्ठा कर-कर, उन्हें उस आग पर रख दिया था, तो एक सर्प उस ताप में से बाहर निकल कर उसके हाथ पर जा गढ़ा।
४ और जब उन आदिवासियों ने उस विषैले पशु को उसके हाथ पर लटका हुआ देखा, तो उन्होंने आपस में कहा, भई निस्सन्देह ही यह आदमी तो एक हत्यारा है, जो समुद्र से तो बच निकला है, तथापि प्रतिषोध इसे जीवित नहीं रहने दे रहा है!
५ और पौलुस ने उस जानवर को उस अग्नि में झटक डाला, और उसे कोई हानि प्रतीत नहीं हुई।
६ परन्तु वो यह देख रहे थे कि पौलुस कब सूज जाएगा, या फिर कब अचानक मर कर नीचे गिर पड़ेगा: परन्तु जब उन्होंने बहुत देर तक देख लिया था, और उन्होंने उस पर कोई भी क्षति आती हुई नहीं देखी, तो उन्होंने अपने विचार परिवर्तित कर लिए, और कहा कि भई वो तो कोई ईश्वर है।
७ उन्हीं क्षेत्रों में उस द्वीप के पुब्लियुस नामक मुखिया की सम्पत्तियाँ थीं; जिसने हमारा स्वागत किया, और हमें तीन दिन सुशीलता से निवास करवाया।
८ और यह होने को आया, कि पुब्लियुस का पिता ज्वर और रक्तातिसार से ग्रस्त पड़ा था: जिसके पास पौलुस ने प्रवेश किया और प्रार्थना की, और अपने हाथ उस पर रख कर, उसे स्वस्थ कर दिया।
९ तो जब यह कर दिया गया था, तो उस द्वीप के अन्य बीमार लोग भी आ गए, और वो स्वस्थ कर दिए गए थे:
१० जिन्होंने हमारा कई प्रकारों से आदर-सत्कार भी किया; और जब हम ने प्रस्थान किया, तो उन्होंने हमारे लिए आवश्यक वस्तुएँ भी लाद दीं।
११ और तीन महीनो पश्चात हमने सिकन्द्रीया के एक जलयान में प्रस्थान कर लिया, जिसने शरद ऋतु उसी द्वीप में बिताई थी, जिसका चिन्ह कैस्टर और पौलुक्स था।
१२ और सुरकूसा पहुँचने पर, हम वहीं तीन दिन ठहरे रहे।
१३ और वहाँ से हम एक चक्कर लगा कर रेगियुम आ गए: और एक दिन पश्चात दक्षिणी वायु चली, और हम अगले दिन पुतियुली आ पहुँचे:
१४ जहाँ हमने भाई-जन पाए, और उनसे अनुरोधित हो हम उनके साथ सात दिन ठहर लिए: और इस प्रकार हम रोम की ओर चलते चले गए।
१५ और वहाँ से, जब भाई-जनों ने हमारे समबन्ध में सुना, तो वो हम से अप्पियुस के चौक और तीन सरायों तक भी मिलने आए: जिन्हें जब पौलुस ने देखा, तो उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया, और साहस लिया।
१६ और जब हम रोम आ पहुँचे थे, तो उस शत-पति ने बन्दियों को रक्षकों के कप्तान को प्रदान कर दिया: परन्तु पौलुस को एक पहरेदार-सैनिक के साथ अकेले सुरक्षित रहने की अनुमती मिल गई।
१७ और यह होने को आया, कि तीन दिनो पश्चात पौलुस ने यहूदियों के प्रमुखों को एक साथ बुला लिया: और जब वो एक साथ आ गए थे, तो उसने उनसे कहा, पुरुषों और भाईयों, जबकि मैंने हमारे लोगों या पित्रों की रीतियों के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया है, तथापि मुझे यरूशलेम से रोम-गण के हाथों बन्दी सौंप दिया गया है।
१८ जिन्हें मेरी जाँच-पड़ताल कर लेने के पश्चात मुझे रिहा कर देना था, चूँकि मुझ में मृत्युदण्ड का कोई भी कारण न था।
१९ परन्तु जब यहूदियों ने इसकी आलोचना की, तो मैं रोम के राजा से पुनरावेदन करने पर बाध्य हो गया; यद्यपि मुझे अपने ही लोगों पर कोई भी अभियोग नहीं लगाना था।
२० इसलिए इसी कारण वश मैंने तुम्हें बुलवा लिया है, तुम से मिलने, और तुम से वार्ता करने हेतु: क्योंकि इस्राएल की आशा के कारण ही मैं इस बेड़ी से बन्धा हुआ हूँ।
२१ और उन्होंने उस से कहा, हमने तुम्हारे समबन्ध में न ही यहूदा से पत्र ग्रहण किए हैं, न ही किसी भी भाई-जनो में से पधारे हुए ने तुम्हारे सम्बंध में बुरी सूचना दी या बोला है।
२२ परन्तु हमारी ये इच्छा है कि हम तुम से सुने कि तुम क्या सोचते हो: क्योंकि जहाँ तक इस सम्प्रदाय की बात आती है, हम जानते हैं कि प्रत्येक स्थान में इसकी आलोचना की जा रही है।
२३ और जब उन्होंने उसे एक दिन नियुक्त कर दिया था, तो कई उसके पास उसके निवास-स्थान आ पहुँचे; जिन्हें उसने ईश्वर के राज्य को अर्थप्रतिपादित कर उसका साक्ष्य दिया, दिन से लेकर रात तक उन्हें यीशु के समबन्ध में मूसा के नियम में से और पैग़म्बरों में से भी विश्वस्त करते हुए ।
२४ और कुछों ने उन बातों पर विश्वास कर लिया जो बोली गई थीं, और कुछों ने विश्वास नहीं किया।
२५ और जब वो आपस में सहमत नहीं हो रहे थे, तो उन्होंने प्रस्थान कर लिया, उसके पश्चात कि पौलुस ने एक शब्द बोल दिया था, अच्छा ही बोले पवित्र-प्राण हमारे पित्रों से पैग़म्बर यशायाह द्वारा,
२६ कहते हुए, चले जाओ इन लोगों के पास और कहो, सुनते हुए तुम सुनोगे, और समझोगे नहीं; और देखते हुए तुम देखोगे, और आभास नहीं करोगे:
२७ क्योंकि इन लोगों के हृदय मोटे हुए पड़े हैं, और इनके कान सुनने में मंदे हैं, और इन्होंने अपनी आँखें बँद कर ली हैं; कहिं यह अपनी आँखों से देख सकें, और अपने कानो से सुन सकें, और अपने हृदय से समझ सकें, और वापस लौट जाएँ, और मैं इन्हें स्वस्थ कर दूँ।
२८ इसलिए तुम यह जान लो, कि ईश्वर का बचाव अन्यप्रजातियों को भेज दिया गया है, और कि वही उसे सुनेंगे।
२९ और जब उसने यह शब्द कह दिए थे, तो उन यहूदियों ने प्रस्थान कर लिया, और आपस में अपने बीच बड़ा वाद-विवाद किया।
३० और पौलुस अपने ही किराए के घर में दो पूर्ण वर्ष रहता रहा, और वो उन सभी का स्वागत किया करता था जो उसके पास आते थे,
३१ ईश्वर के राज्य का प्रवचन देता हुआ, और प्रभु यीशु मसीह से सम्बन्धित बातों को सम्पूर्ण निर्भीकता, और निर्विघ्नता से सिखाता हुआ।
०१/२७/२०२३;
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