रोम-गणो के लिए: नया अनुबन्ध। (Romans)
पहला अध्याय।
१ पौलुस, यीशु मसीह का एक सेवक, अपौस्ल बनने के लिए बुलाया हुआ, ईश्वर के शुभ-समाचार प्रति पृथक कर दिया हुआ,
२ जिसका वचन उन्होंने भूतपूर्व काल में अपने पैग़म्बरों द्वारा पवित्र शास्त्रों में दे दिया था,
३ उनके पुत्र यीशु मसीह हमारे प्रभु के सम्बन्ध में, जो दाऊद के बीज में से शारीरिकतानुसार बनाए गए थे;
४ और जो शक्ती के साथ ईश्वर के पुत्र घोषित कर दिए गए थे, पवित्रता के प्राणानुसार, मृतकों में से पुनरुत्थान द्वारा,:
५ जिन्हीं के द्वारा हमने कृपा और अपौस्लत्व ग्रहण कर लिए हैं, सभी राष्ट्रों के बीच, उनके नाम के लिए, इस विश्वास के आज्ञापालन हेतु:
६ जिनके बीच तुम भी यीशु मसीह के बुलाए हुए हो:
७ रोम में उन सभी ईश्वर के अतिप्रीयों, सन्त बनने हेतु बुला दिए गयों को: ईश्वर हमारे पिताश्री, और प्रभु यीशु मसीह द्वारा तुम्हारे प्रति कृपा और शान्ति हो।
८ सर्वप्रथम, मैं अपने ईश्वर को यीशु मसीह के माध्यम से तुम सभी के लिए धन्यवाद देता हूँ, कि तुम्हारे विश्वास की चर्चा इस समस्त संसार के सर्वत्र में की जाती है।
९ क्योंकि ईश्वर मेरे साक्षी हैं, जिनकी मैं अपने प्राण द्वारा उनके पुत्र के शुभ-समाचार में सेवा करता हूँ, कि मैं बिना रुके सर्वदा तुम्हारी चर्चा अपनी प्रार्थनाओं में करता रहूँ;
१० अनुरोध करता हुआ, कि यदि अब किसी भी प्रकार से ईश्वर की इच्छानुसार तुम्हारे पास आना मेरे लिए सम्भव हो जाए।
११ क्योंकि मुझे तुम से मिलने की लालसा है, ताकि मैं तुम्हें कोई आध्यात्मिक प्रतिभा प्रदान कर दूँ, इस उद्देश्य से कि तुम सुदृढ़ बनो;
१२ या एसा कह लें, कि मैं तुम्हारे साथ सुदृढ़ बन जाऊँ, उस पारस्परिक विश्वास द्वारा जो तुम में और मुझ में है।
१३ अब भाईयों मैं नहीं चाहता कि तुम इस बात से अनभिज्ञ रहो, कि मैंने कई बार तुम्हारे पास आने का प्रयोजन किया परन्तु अब तक रुकावटें थीं, ताकि मेरे पास तुम्हारे बीच भी कुछ फल हो, जैसे कि दूसरी अन्यप्रजातियों के बीच।
१४ मैं दोनो यूनानियों का, और आदिवासियों का; और दोनो विद्वानों का, और विद्याहीनों का ऋणी हूँ।
१५ तो, जितना कुछ भी मुझ में है, मैं तुम्हें भी जो रोम में हो, शुभ-समाचार का प्रवचन देने के लिए तैयार हूँ।
१६ क्योंकि मैं मसीहा के शुभ-समाचार से लज्जित नहीं हूँ: चूँकि यह बचाव के प्रति ईश्वर की शक्ती उस प्रत्येक के लिए है जो विश्वास करता है; यहूदी के लिए प्रथम, और यूनानी के लिए भी।
१७ क्योंकि इसी में ईश्वर की नेकी प्रत्यक्ष होती है, विश्वास से लेकर विश्वास तक: जैसा यह लिखा गया है, न्यायी विश्वास द्वारा जीएगा।
१८ क्योंकि स्वर्ग से ईश्वर का आक्रोश मनुष्यों की समस्त ईश्वर-हीनताओं और अनैतिकताओं के विरुद्ध प्रत्यक्ष है, जो सत्य को अनैतिकता में पकड़े हुए हैं;
१९ क्योंकि ईश्वर के विषय में जो कुछ भी जाना जा सकता है उन में प्रत्यक्ष है; क्योंकि ईश्वर ने उसे उन्हें दिखला दिया है।
२० क्योंकि इस संसार की सृष्टि से लेकर, उन्हीं की वो अदृश्य बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं, जो उन निर्मित वस्तुओं द्वारा समझी जाती हैं, यहाँ तक कि उनकी अनन्त शक्ती और ईश्वरत्व भी; तो इसलिए वो अक्षम्य हैं:
२१ इसलिए क्योंकि, जब उन्हें ईश्वर का ज्ञान था, उन्होंने उन्हें ईश्वर के समान महिमामण्डित नहीं किया, न ही उन्हें धन्यवाद दिया; बल्कि वह अपनी ही कल्पनाओं में व्यर्थ बन गए, और उनका मूर्ख हृदय अन्धकारमय हो चला।
२२ स्वयं की पुष्टि करते हुए कि वो तो विद्वान हैं, वो मूर्ख बन गए,
२३ और उन्होंने अनश्वर ईश्वर की महिमा को नश्वर मनुष्य, और पक्षियों, और चार-पैरों वाले जानवरों, और रेंगते हुए जीवों के सदृश्य एक प्रतिमा में परिवर्तित कर दिया।
२४ इसी कारण वश ईश्वर ने भी उनका उनकी अपने ही हृदयों की वासनाओं द्वारा अस्वच्छताओं में त्याग कर डाला, अपने ही स्वयं के शरीरों को आपस में अपमानित करने हेतु:
२५ जिन्होंने ईश्वर के सत्य को एक झूठ में परिवर्तित कर दिया, और उन अन्तहीनता के लिए धन्य सृष्टिकर्ता की तुलना में, उन्होंने सृष्टि की अधिक आराधना और सेवा की।
२६ इसी कारण वश ईश्वर ने उनका नीचतापूर्ण वासनाओं में त्याग कर डाला: यहाँ तक कि उनकी स्त्रियों ने भी उस प्राकृतिक उपयोग को परिवर्तित कर दिया जो प्रकृति के विरुद्ध है:
२७ और इसी प्रकार वो पुरुष भी, स्त्री का प्राकृतिक उपयोग छोड़ कर, एक दूसरे की ओर अपनी वासना में जलते चले गए; पुरुष पुरुष के साथ वो करते हुए जो वीभत्स है, और अपने ही स्वयं में अपनी ही त्रुटि का सुयोग्य फल प्राप्त करते हुए।
२८ और जैसे उन्हें ईश्वर को अपने परिचय में रखना अच्छा नहीं लगा, ईश्वर ने उन्हें निरर्हित-बुद्धी के प्रति प्रदान कर दिया, उन कार्यों को करने हेतु जो असुविधाजनक हैं;
२९ सर्व अनैतिकता, अविवाहित-यौन, दुष्टता, लोलुप्ता, द्वेषता से भरे हुए; ईर्षा की जलन, हत्या, वाक्-युद्ध, धोखाधड़ी, विद्वेषपूर्णता से भरपूर; कानाफूसी करने वाले,
३० चुगल-खोरी करने वाले, ईश्वर से घृणा करने वाले, अपवादक, अहंकारी, डींगें मारने वाले, बुरी बातों का अविष्कार करने वाले, पिता-माता के अवज्ञक,
३१ प्रज्ञाहीन, प्रतिज्ञा-पत्र तोड़ने वाले, प्राकृतिक प्रेम से हीन, अतोषणीय, निर्दयी:
३२ जो ईश्वर के न्याय-निर्धारण का ज्ञान रखते हुए, कि वो जो ऐसे कार्य करते हैं, मृत्युदण्ड के योग्य हैं, न केवल ऐसा ही करते हैं, बल्कि उन में प्रसन्न होते हैं, जो इन्हें करते हैं।
दूसरा अध्याय।
१ इसलिए हे मानुष, तुम अक्षम्य हो, जो कोई भी तुम हो जो आँक रहे हो: क्योंकि जिन बातों में तुम किसी अन्य को आँक रहे हो, तुम स्वयं को ही दण्डनीय घोषित कर रहे हो; क्योंकि तुम जो आँक रहे हो, तुम भी वही कार्य करते रहते हो।
२ परन्तु हम विश्वस्त हैं कि ईश्वर का न्याय-निर्धारण सत्यानुसार उनके विरुद्ध है, जो भी ऐसे कार्य करते हैं।
३ और हे मानुष, क्या तुम यह सोच रहे हो जो ऐसे कार्य करने वालों को आँक रहे हो, जिन्हें तुम भी स्वयं करते हो, कि तुम ईश्वर के न्याय-निर्धारण से बच निकलोगे?
४ या तुम उनकी अच्छाई, और सहिष्णुता, और सहनशीलता के धन-धान्यों से घृणा कर रहे हो; न जानते हुए कि ईश्वर की अच्छाई तुम्हारा मन-परिवर्तन की ओर नेतृत्व कर रही है?
५ परन्तु तुम अपने कठोर और अपरिवर्तनीय हृदयानुसार स्वयं अपने प्रति उस आक्रोश और ईश्वर के नेक न्याय-निर्धारण के प्रत्यक्षीकरण-दिवस प्रति आक्रोश की बहुतायतता बढ़ाते जा रहे हो;
६ जो प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मोंनुसार फल प्रदान कर देंगे:
७ उन्हें जो धैर्य से लगातार भलाई करते हुए वैभव और सम्मान और अमरता को खोजते हैं, अनन्त जीवन:
८ परन्तु उन्हें जो झगड़ालू हैं, और जो सत्य का नहीं, बल्कि अनैतिकता का पालन करते हैं, क्षोभ और आक्रोश,
९ आपत्तियाँ और वेदना, मानव की उस प्रत्येक आत्मा पर जो बुराई करती है, यहूदी की प्रथम, और अन्यप्रजाती वाले की भी:
१० परन्तु वैभव, सम्मान, और शान्ति, उस प्रत्येक व्यक्ति को जो भलाई करता है, यहूदी को प्रथम, और अन्यप्रजाती वाले को भी:
११ क्योंकि ईश्वर किसी के भी बीच पक्षपात नहीं करते।
१२ क्योंकि जितनो ने भी नियम-विहीनता में पाप किए हैं, नियम-विहीनता में ही नष्ट हो जाएँगे: और जितनो ने भी नियम-आधीनता में पाप किए हैं, उनका न्याय-निर्धारण नियम द्वारा ही किया जाएगा;
१३ क्योंकि ईश्वर के समक्ष नियम को सुनने वाले नयायी-प्रमाणित नहीं होते, बल्कि नियम को करने वाले नयायी-प्रमाणित किए जाएँगे।
१४ क्योंकि जब यह अन्यप्रजातियाँ, जिनके पास नियम नहीं है, उन कार्यों को स्वाभाविकतानुसार करती हैं जो नियम में लिखे हुए हैं, यही, नियम-विहीन होती हुई, अपने स्वयं के प्रति ही नियम हैं:
१५ जो उस नियम का कर्म, उनके हृदयों में लिखा हुआ, प्रदर्शित करती हैं, उनकी अन्तरात्मा भी साक्ष्य देती हुई, और उनके विचार एक दूसरे को दोषी या फिर निर्दोष ठहराते हुए;
१६ उस दिन में जब ईश्वर, यीशु मसीह द्वारा मनुष्यों के रहस्यों का न्याय-निर्धारण मेरे शुभ-समाचारानुसार करेंगे।
१७ देखो भई, तुम एक यहूदी कहलाए जाते हो, और तुम नियम पर निर्भर रहते हो, और ईश्वर में अपनी डींगे मारते रहते हो,
१८ और तुम उनकी इच्छा से परिचित होते हुए, और नियम में से शिक्षित होते हुए, अच्छे-बुरे के बीच मतभेद कर सकते हो:
१९ और तुम आश्वस्त हो कि तुम स्वयं ही नेत्रहीनो के मार्गदर्शक हो, उनके प्रति एक उजाला जो अन्धकार में हैं,
२० मूर्खों के प्रशिक्षक, बालकों के अध्यापक, जो नियम के ज्ञान और उस में सत्य की आकृति धारण किए हुए हो।
२१ इसलिए तुम जो औरों को सिखा रहे हो, क्या तुम स्वयं को नहीं सिखा रहे हो क्या? तुम जो प्रवचन देते हो कि किसी को भी चोरी नहीं करनी चाहिए, क्या तुम चोरी करते हो?
२२ तुम जो कहते हो कि व्यभिचार नहीं करना चाहिए, क्या तुम व्यभिचार करते हो? तुम जो मूर्तियों से घृणा करते हो, क्या तुम मन्दिर में ही लूटपाट करते हो?
२३ तुम जो नियम में अपनी डींगें मारते हो, नियम को ही तोड़कर तुम ईश्वर का निरादर करते हो?
२४ इसलिए ईश्वर का नाम अन्यप्रजातियों के बीच तुम्हारे ही कारण निन्दित होता है, जैसा यह लिखा हुआ है।
२५ क्योंकि ख़तना सचमुच लाभ पहुँचाता है, यदि तुम नियम का पालन करते हो: परन्तु यदि तुम नियम को तोड़ने वाले बनते हो, तो तुम्हारा ख़तना बेख़तना बन जाता है।
२६ इसलिए यदि कोई बेख़तनित नियम की नेकी का पालन करता है, तो क्या उसका बेख़तना ख़तने में नहीं गिन लिया जाएगा क्या?
२७ और क्या बेख़तना जो प्राकृतिक है, यदि वो नियम को पूर्ण करे, क्या वो तुम्हारा न्याय-निर्धारण नहीं करेगा क्या, जो नियम का अतिक्रमण आलेख और ख़तने द्वारा करते हो?
२८ इसलिए वो यहूदी नहीं है, जो बाह्य रूप से यहूदी है; न ही वो ख़तना माना जाता है, जो बाह्य माँस का होता है:
२९ बल्कि वो यहूदी है, जो अभ्यन्तरिकता में यहूदी है; और वो ख़तना हृदय का है प्राण में, और न कि आलेख में; जिसकी प्रशंसा लोगों की नहीं, बल्कि ईश्वर की होती है।
तीसरा अध्याय।
१ तो फिर यहूदी के पास क्या वरिष्ठता रही? या फिर ख़तने का क्या लाभ रहा?
२ भई प्रत्येक प्रकार से: सर्वप्रथम, क्योंकि उन्हीं को ही ईश्वर की उक्तियाँ सुपुर्द कर दी गई थीं।
३ तो फिर क्या हो यदि कुछों ने विश्वास ही न किया हो? क्या उनका अविश्वास ईश्वर के विश्वास को प्रभावहीन बना देगा क्या?
४ कतई नहीं: हाँ भई, ईश्वर को सच्चा रहने दें, परन्तु प्रत्येक मनुष्य को झूठा; जैसा कि यह लिखा हुआ है, ताकि तुम अपने कथनो में नयायी-प्रमाणित बन जाओ, और जब तुम्हारा न्याय-निर्धारण होता है, तो तुम परास्त कर दो।
५ परन्तु यदि हमारी अनैतिकता ईश्वर की नेकी की सराहना करती हो, तो हम क्या कहें? क्या ईश्वर अनैतिक हैं जो प्रतिषोध लेते हैं? (मैं मनुष्य के स्वभाव में बोल रहा हूँ)
६ कतई नहीं: तो फिर ईश्वर इस संसार का न्याय कैसे करेंगे?
७ क्योंकि यदि मेरे झूठ द्वारा ईश्वर का सत्य उनकी महिमा के प्रति अधिक प्रचूर होता है; तो तथापि मेरा न्याय-निर्धारण एक पापी के रूप में भी क्यों किया जा रहा है?
८ और बल्कि न कहें, (जैसे कि हमारे विषय में निंदनीयता से कहा जाता है, और जैसे कुछ पुष्टि करते हैं कि हम कहते हैं,) आओ भई हम बुराई करें, ताकि अच्छाई उभर आए? जिनकी दण्डाज्ञा न्यायी है।
९ तो फिर क्या? क्या हम उनसे बेहतर हैं? नहीं जी, किसी भी प्रकार से नहीं: क्योंकि हमने पहले से ही ये प्रमाणित कर दिया है कि दोनो यहूदी और अन्यप्रजातियाँ, सभी पाप के आधीन हैं;
१० जैसा कि ये लिखा हुआ है, कोई भी नेक नहीं है, नहीं जी, एक भी नहीं:
११ कोई भी नहीं है जो समझ रहा हो, कोई भी नहीं है जो ईश्वर को ढूँढ रहा हो।
१२ ये सभी पथ पर से भटक चुके हैं, ये तो एक संग अलाभकारी बन चुके हैं; ऐसा कोई भी नहीं है जो अच्छाई करता हो, न जी न, एक भी नहीं।
१३ इनका गला एक खुला हुआ मक़बरा है; अपनी जीभों से इन्होंने धोखा-धड़ी का प्रयोग किया है; सर्पों का विष इनके होंटों तले है:
१४ जिनका मूँह श्रापों और कड़वाहटों से भरा हुआ है:
१५ इनके पैर वेग से रक्त बहाने के लिए दौड़ते हैं:
१६ इनके पथों में विनाश और विपदा हैं:
१७ और शान्ति का पथ इन्होंने नहीं जाना है:
१८ इनकी आँखों समक्ष ईश्वर का कोई भय नहीं है।
१९ तो अब हम ये जानते हैं कि जो कुछ भी बातें नियम कहता है, वो उनसे कहता है जो नियम के आधीन हैं: ताकि प्रत्येक मूँह बन्द कर दिया जा सके, और समस्त संसार ईश्वर के समक्ष दोषी ठहरा दिया जा सके।
२० इसलिए नियम के कर्मों द्वारा कोई भी शरीर ईश्वर की दृष्टि में न्यायी-प्रमाणित नहीं होगा: क्योंकि नियम द्वारा पाप का ज्ञान होता है।
२१ परन्तु अब ईश्वर की नेकी नियम के विहीन प्रत्यक्ष हो चुकी है, जिसका साक्ष्य नियम और पैग़म्बर देते हैं;
२२ यहाँ तक कि वही ईश्वर की नेकी जो यीशु मसीह के भरोसे द्वारा उन सभी के लिए है, और उन सभी पर है जो विश्वास करते हैं: क्योंकि कोई भी अन्तर नहीं है:
२३ चूँकि सभी पाप कर चुके हैं, और ईश्वर की महिमा से विहीन रह गए हैं;
२४ उनकी कृपा द्वारा निशुल्कता से न्यायी-प्रमाणित हो उस मुक्तिभुक्तान द्वारा जो मसीहा यीशु में है;
२५ जिन्हें ईश्वर ने उनके रक्त में विश्वास द्वारा एक प्रेषण स्थापित कर दिया है, किए जा चुके पापों के परिहार के लिए उन्हीं की नेकी को घोषित करने हेतु, ईश्वर की सहिष्णुता द्वारा;
२६ इसी समय में उनकी नेकी घोषित कर देने के लिए: ताकि वो न्यायी, और उसका न्यायी-प्रमाण करने वाले बन जाएँ जो यीशु में विश्वास करता है।
२७ तो अब डींगें मारना कहाँ रहा भई? वो तो वर्जित हो चुका है। किस नियम द्वारा? कर्मों के नियम द्वारा? नहीं जी, बल्कि विश्वास के नियम द्वारा।
२८ इसलिए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि एक व्यक्ति विश्वास द्वारा न्यायी-प्रमाणित होता है, नियम के कर्मों द्वारा नहीं।
२९ क्या वो केवल यहूदियों के ही ईश्वर हैं? क्या वो अन्यप्रजातियों के भी ईश्वर नहीं हैं क्या? हाँ भई, अन्यप्रजातियों के भी:
३० यह देखते हुए कि एक ही ईश्वर हैं, जो ख़तने को विश्वास से न्यायी-प्रमाणित करेंगे, और बेख़तने को भी वो विश्वास द्वारा ही न्यायी-प्रमाणित कर देंगे।
३१ तो क्या फिर हम विश्वास द्वारा नियम को अमान्य ठहराते हैं? कतई नहीं जी: हम तो नियम को स्थापित करते हैं।
चौथा अध्याय।
१ तो फिर भई हम क्या कहें कि हमारे पिता अब्राहम ने, शारीरिकता के सम्बन्ध में, क्या पाया है?
२ क्योंकि यदि अब्राहम अपने कर्मों द्वारा न्यायी-प्रमाणित ठहराए गए होते, तो उनके पास डींगे मारने का कारण रहता: परन्तु ईश्वर के समक्ष नहीं!
३ क्योंकि शास्त्र क्या कहता है? अब्राहम ने ईश्वर में विश्वास किया, और यही उनके प्रति नेकी के लिए गिन लिया गया।
४ अब वो जो कर्म करता है, फल उसके प्रति कृपा के लिए नहीं गिना जाता है, बल्कि ऋण के लिए।
५ परन्तु उसके प्रति जो कर्म नहीं करता है, बल्कि उन पर विश्वास करता है जो ईश्वरभक्तिहीनो को न्यायी-प्रमाणित ठहराते हैं, उसी का विश्वास नेकी के लिए गिन लिया जाता है।
६ यहाँ तक कि जैसे दाऊद भी उस व्यक्ति की धन्यता का वर्णन करते हैं, जिस पर ईश्वर बिना कर्मों के नेकी ठहरा देते हैं।
७ यह कहते हुए, धन्य हैं वो जिनकी अधर्मताएँ क्षमा कर दी गई हैं, और जिनके पाप ढक दिए गए हैं।
८ धन्य है वो पुरुष जिस पर प्रभु पाप नहीं ठहराएँगे।
९ तो फिर क्या ये धन्यता केवल ख़तनितों पर ही आती है, या फिर बेख़तनितों पर भी? क्योंकि हम कह रहे हैं कि अब्राहम के प्रति विश्वास की गिनती नेकी के लिए कर ली गई थी।
१० तो फिर कैसे की गई थी उसकी गिनती? जब वो ख़तने की स्तिथि में थे, या फिर बेख़तने की स्तिथि में? ख़तने की स्तिथि में नहीं, बल्कि बेख़तने की स्तिथि में।
११ और उन्होंने उस ख़तने का चिन्ह, उस विश्वास द्वारा प्राप्त की गई नेकी की एक मुहरबंदी के रूप में ग्रहण किया, जो उनके पास था, जब कि वो अभी बेख़तनित ही थे: ताकि वो उन सभी विश्वास करने वालों के पित्र बन जाएँ, जब कि वो बेख़तनित ही हों; ताकि नेकी उन पर भी ठहरा दी जाए:
१२ और वो ख़तनितों के पित्र केवल उन्हीं के ही न हों जो ख़तनित हैं, बल्कि उनके भी जो अब्राहम हमारे पिता के उस विश्वास के पद-चापों पर चलते हैं, जो उनके पास था जब वो अभी बेख़तनित ही थे।
१३ क्योंकि वो प्रतिज्ञा, कि वो इस संसार के वारिस होंगे, अब्राहम या उनके बीज को नियम द्वारा नहीं, बल्कि विश्वास की नेकी द्वारा प्रदान की गई थी।
१४ क्योंकि यदि नियम-वाले वारिस हों, तो विश्वास अमान्य ठहर जाता है, और वो प्रतिज्ञा प्रभावहीन:
१५ क्योंकि नियम आक्रोश उत्पन्न करता है: क्योंकि जहाँ कोई नियम नहीं है, वहाँ कोई अतिक्रमण नहीं होता।
१६ इसलिए वो विश्वास के माध्यम से है, ताकि वो कृपा द्वारा हो सके; इस उद्देश्य से कि वो प्रतिज्ञा समस्त बीज के लिए निश्चित हो सके; न केवल नियम-वालों के लिए ही, बल्कि उनके लिए भी जो अब्राहम के विश्वास-वाले हैं; जो हम सभी के पित्र हैं,
१७ (जैसा यह लिखा गया है, मैंने तुम्हें कई राष्ट्रों का पिता बना दिया है,) उनके समक्ष जिन पर अब्राहम ने विश्वास किया था, यहाँ तक कि ईश्वर पर ही, जो मृतकों को सजीवित करते हैं, और वो उन्हें पुकारते हैं जो नहीं हैं, मानो कि वो हों।
१८ जिन्होंने निराश होते हुए आशा में विश्वास किया, ताकि वो कई राष्ट्रों के पिता बन जाएँ; उसी के अनुसार जो बोल दिया गया था, ऐसा ही तुम्हारा बीज होगा।
१९ और विश्वास में दुर्बल न होते हुए, उन्होंने अपने ही स्वयं के मृत शरीर का विचार नहीं किया, जब वो लग-भग एक सौ वर्ष की आयु के थे, न ही सैराह के निर्जीव गर्भ का:
२० वो ईश्वर के वचन पर अविश्वास के कारण लड़खड़ाए नहीं; बल्कि वो विश्वास में प्रबल थे, ईश्वर को महिमा प्रदान करते हुए;
२१ और पूर्णतः विश्वस्त होते हुए, कि जो वचन उन्होंने दिया था, वही उसे क्रियान्वित भी करने में सक्षम थे।
२२ और इसलिए वो उनके प्रति नेकी के लिए ठहरा दिया गया था।
२३ अब यह केवल अब्राहम के वास्ते ही नहीं लिखा गया था, कि वह उन्हीं के प्रति ठहरा दिया गया था;
२४ बल्कि हमारे लिए भी, जिनके प्रति यह ठहरा दिया जाएगा, यदि हम उन पर विश्वास कर लेते हैं जिन्होंने यीशु हमारे प्रभु को मृतकों में से ऊपर उठा दिया है;
२५ जो हमारे पापों के लिए प्रदान कर दिए गए थे, और पुनः हमारे न्याय-प्रमाण हेतु उठा दिए गए थे।
पाँचवाँ अध्याय।
१ इसलिए विश्वास द्वारा न्यायी-प्रमाणित हो कर, हम ईश्वर के साथ, हमारे प्रभु यीशु मसीह के माध्यम से, शान्ति रखते है:
२ जिनके द्वारा हमारे पास विश्वास के माध्यम से इस कृपा में अभिगम भी है, जिस में हम खड़े हैं, और ईश्वर की महिमा की आशा में हर्ष मनाते हैं।
३ और इतना ही नहीं, बल्कि हम आपत्तियों में भी गर्व मनाते हैं: यह जानते हुए कि अत्याचार धैर्य उत्पन्न करता है,
४ और धैर्य, अनुभव, और अनुभव, आशा;
५ और आशा लज्जित नहीं करती; क्योंकि ईश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में पवित्र-प्राण द्वारा उँडेल दिया गया है जो हमें प्रदान कर दिए गए हैं।
६ क्योंकि जब हम अभी निर्बल ही थे, मसीहा उचित समय पर ईश्वरभक्तिहीनो के लिए मर गए।
७ क्योंकि किसी नेक व्यक्ति के लिए कोई कठिनाई से ही अपना जीवन अर्पित करता है: तथापि मान लो किसी अच्छे व्यक्ति के लिए ही कुछ अपना जीवन अर्पित करने का साहस कर बैठें।
८ परन्तु ईश्वर हमारे प्रति अपने प्रेम की सराहना करते हैं, कि हमारे पापी रहते हुए, मसीहा हमारे लिए मर गए।
९ तो इस से भी बढ़कर, अब उनके रक्त द्वारा न्यायी-प्रमाणित होते हुए, हमारा उनके द्वारा ही आक्रोश से बचाव हो जाएगा।
१० क्योंकि यदि, जब हम शत्रु थे, हमारा ईश्वर के साथ उनके पुत्र की मृत्यु द्वारा सामंजस्य स्थापित हो गया, तो और भी बढ़कर, सामंजस्य स्थापित हो जाने पर, उन्हीं के जीवन द्वारा हमारा बचाव हो जाएगा।
११ और इतना ही नहीं, बल्कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के माध्यम से ईश्वर में हर्ष भी मनाते हैं, जिनके द्वारा हम वो पापमोचन अब प्राप्त कर चुके हैं।
१२ इसलिए, जैसे एक व्यक्ति द्वारा इस संसार में पाप, और पाप द्वारा मृत्यु ने प्रवेश किया था; और इस प्रकार मृत्य समस्त मानवता पर छा गई, चूँकि सभी पाप कर चुके हैं:
१३ (क्योंकि नियम आने तक इस संसार में पाप था: परन्तु नियम के अभाव में पाप नहीं ठहराया जाता है।
१४ तथापि मृत्यु ने आदम से लेकर मूसा तक राज किया, उन पर भी जिन्होंने आदम के अतिक्रमण की समानतानुसार पाप नहीं किया था, जो उनका प्रतीक है जिन्होंने आना था।
१५ परन्तु जैसा वो अपराध नहीं है, वैसा ही वो निशुल्क उपहार है। क्योंकि यदि एक के अपराध द्वारा कई मर जाएँ, इस से भी अधिक महान ईश्वर की कृपा है, और कृपा द्वारा वो उपहार, जो एक व्यक्ति, यीशु मसीह द्वारा, कईयों के लिए प्रचूर हो चुका है।
१६ और वैसे नहीं जैसे वो था उस एक के पाप करने से, वैसा ही वो उपहार है: क्योंकि उस एक के कारण वो न्याय-निर्धारण दण्डाज्ञा हेतु था, परन्तु वो निशुल्क उपहार कई पापों से न्याय-प्रमाणित होने हेतु है।
१७ क्योंकि यदि एक व्यक्ति के पाप से मृत्यु ने एक के द्वारा राज किया; तो इस से बढ़कर वो जो कृपा की बहुतायतता और उस नेकी के उपहार को ग्रहण करते हैं, जीवन में राज करेंगे, उन एक यीशु मसीहा ही के द्वारा।)
१८ इसलिए जैसे एक ही के अपराध द्वारा न्याय-निर्धारण सभी लोगों पर दण्डाज्ञा के प्रति आया; इसी प्रकार ही एक व्यक्ति की नेकी द्वारा वो निशुल्क उपहार समस्त मानवता के लिए, जीवन के न्याय-प्रमाण के प्रति आ गया।
१९ क्योंकि जिस प्रकार एक व्यक्ति की अवज्ञा द्वारा कई पापी बना दिए गए थे, इसी प्रकार ही एक व्यक्ति के अनुपालन द्वारा कई नेक बना दिए जाएँगे।
२० इसके अतिरिक्त नियम ने प्रवेश किया, ताकि अपराध प्रचूर हो जाए। परन्तु जहाँ पाप प्रचूर हुआ, कृपा और भी अधिकता से प्रचूर हो गई:
२१ कि जैसे पाप ने मृत्यु पर्यंत राज किया है, इसी प्रकार कृपा नेकी द्वारा अनन्त जीवन पर्यंत हमारे प्रभु यीशु मसीह के माध्यम से राज कर ले।
छटा अध्याय।
१ तो भई फिर हम क्या कहें? क्या हम पाप में लगे रहें, ताकि कृपा प्रचूर रहे?
२ कतई नहीं! हम कैसे, जो पाप के प्रति मृत हैं, उसी में कैसे अब और जीते रहें भई?
३ क्या तुम जानते नहीं हो, कि हम में से कितने जो यीशु मसीह में बपतिस्मित हुए थे, उन्हीं की मृत्यु में ही बपतिस्मित हो चुके थे?
४ इसलिए हम उनके साथ मृत्यु में बपतिस्मा द्वारा दफ़्न हैं: कि जिस प्रकार मसीहा को मृतकों में से पिताश्री की महिमा द्वारा उठा दिया गया था, उसी प्रकार हमें भी जीवन की नवीनता में चलना चाहिए।
५ क्योंकि यदि हम एक साथ उनकी मृत्यु की समानता में रोपे दिए गए हैं, इसी प्रकार हम उनके पुनरुत्थान की समानता में भी हो जाएँगे:
६ यह जानते हुए, कि हमारा पुराना मनुष्यत्व उन्हीं के साथ क्रूस पर चढ़ा दिया गया है, ताकि पाप का शरीर नष्ट कर दिया जाए, ताकि अब से हम पाप की सेवा न करें।
७ क्योंकि वो जो मर चुका है, पाप से मुक्त हो चुका है।
८ तो अब यदि हम मसीहा के साथ मृत हैं, हम ये विश्वास करते हैं कि हम उन्हीं के साथ जीएँगे भी:
९ यह जानते हुए कि मसीहा मृतकों में से उठा दिए गए अब और नहीं मरते हैं; मृत्य का उन पर अब और कोई भी अधिराज्य नहीं रहा।
१० अब चूँकि वो मरे, वो पाप के लिए एक ही बार मरे: और चूँकि वो जी रहे हैं, वो ईश्वर के प्रति जी रहे हैं।
११ इसी प्रकार तुम भी निश्चितता से स्वयं को पाप के प्रति मृत गिन लो, परन्तु ईश्वर के प्रति हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा जीवित।
१२ इसलिए पाप को अपने मरणशील शरीर में राज मत करने दो, कि तुम उसी की ही वासनाओं में उसका पालन करते रहो।
१३ न ही तुम अपने अंगों को अनैतिकता के यंत्रों समान पाप के प्रति प्रदान करो: बल्कि स्वयं को ईश्वर के प्रति प्रदान कर दो, उन जनो के समान जो मृतकों में से सजीव हैं, और अपने अंगों को नेकी के यंत्रों समान ईश्वर के प्रति।
१४ क्योंकि पाप का तुम पर कोई अधिराज्य नहीं होगा: क्योंकि तुम नियम के आधीन नहीं, बल्कि कृपा के आधीन हो।
१५ तो फिर क्या? क्या हम पाप करते रहें, क्योंकि हम नियम के आधीन नहीं, बल्कि कृपा के आधीन हैं? कतई नहीं भई!
१६ क्या तुम जानते नहीं, कि जिस किसी के भी आज्ञाकारी दास बनने के लिए तुम स्वयं को प्रदान करते हो, उसी के तुम दास बन जाते हो जिसकी तुम आज्ञा का पालन करते हो; या तो पाप के दास मृत्यु पर्यत, या फिर आज्ञापालन के दास नेकी पर्यत?
१७ परन्तु ईश्वर को धन्यवाद दे दिया जाए, कि तुम तो पाप के दास थे, परन्तु तुमने अपने हृदय से उस शिक्षा के रूप का पालन कर लिया है जो तुम्हें प्रदान की गई थी।
१८ तो पाप से मुक्त कर दिए जाने पर, तुम नेकी के दास बन गए।
१९ मैं मनुष्यों के स्वभावानुसार बोल रहा हूँ तुम्हारी शारीरिक दुर्बलता के कारण: चूँकि जिस प्रकार तुम अपने अंगों को अस्वच्छता और अधर्मता से अधर्मता तक दास बनने के लिए प्रदान कर चुके हो; इसी प्रकार ही तुम अब पवित्रता हेतु अपने अंगों को नेकी का दास बनने के लिए प्रदान कर दो।
२० चूँकि जब तुम पाप के सेवक थे, तुम नेकी से मुक्त थे।
२१ तो फिर क्या फल मिला तुम्हें उन बातों से जिनके विषय में तुम अब लज्जित हो? क्योंकि उन सभी बातों का अन्त मृत्यु है।
२२ परन्तु अब पाप से मुक्त हो चुके हुए, और ईश्वर के प्रति दास बन चुके हुए, तुम्हारे पास तुम्हारा फल पवित्रता में है, और वो अन्त अनन्तकाल जीवन।
२३ क्योंकि पाप का वेतन मृत्यु है, परन्तु ईश्वर का उपहार हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा अनन्त जीवन है।
सातवाँ अध्याय।
१ भई ज़नो क्या तुम जानते नहीं हो (क्योंकि मैं उनसे बोल रहा हूँ जो नियम के जानकार हैं,) कि कैसे नियम एक व्यक्ति के जीते-जी उस पर अधिराज्य रखता है?
२ क्योंकि वो स्त्री जिसके पास एक पति है, नियम द्वारा ही अपने पति से उसके जीते-जी बन्धी हुई है; परन्तु यदि उसके पति की मृत्यु हो जाती है, तो वो अपने पति के नियम से मुक्त हो जाती है।
३ तो फिर यदि उसके पति के जीते-जी, वो किसी अन्य पुरुष से विवाहित हो, तो वो एक व्यभिचारी कहलाई जाएगी: परन्तु यदि उसके पति की मृत्यु हो जाती है, तो वो उस नियम से मुक्त है; तो फिर वो व्यभिचारी नहीं है, भले ही वो किसी दूसरे पुरुष से विवाहित है।
४ इसी कारण वश, मेरे भाईयों, तुम भी मसीहा के शरीर द्वारा नियम के प्रति मृत बन चुके हो; कि तुम्हारा विवाह किसी अन्य के साथ हो जाए, उन्हीं के ही साथ जो मृतकों में से उठ चुके हैं, ताकि हम ईश्वर के प्रति फल उत्पन्न करें।
५ क्योंकि जब हम शारीरिकता में थे, नियम के द्वारा पापों की वासनाएँ, हमारे अंगों में क्रियाशील रहीं, मृत्यु के प्रति फल उत्पन्न करने हेतु।
६ परन्तु अब हमारा नियम से उद्धार हो चुका है, जिस में हम मृत पकड़े हुए थे; ताकि हम प्राण की नवीनता में सेवारत हो जाएँ, और न कि आलेख की प्राचीनता में।
७ तो फिर हम क्या कहें? क्या नियम पाप है? कतई नहीं! मैंने तो पाप जाना ही न होता, सिवाय नियम के द्वारा: क्योंकि मैं वासना से परिचित न हुआ होता, यदि नियम ने न कहा होता कि तुम लोलुपता नहीं करोगे।
८ परन्तु आदेश द्वारा, पाप ने अवसर पा कर, मुझ में प्रत्येक प्रकार की तृष्णा कार्यरत कर दी। क्योंकि नियम के विहीन, पाप मृत था।
९ क्योंकि नियम के विहीन किसी समय मैं जीवित था: परन्तु जब वो आदेश आया, तो पाप जी उठा, और मैं मर गया।
१० और वो आदेश जो जीवन के लिए नियुक्त था, मैंने मृत्यु का कारण पाया।
११ क्योंकि पाप ने आदेश द्वारा अवसर पा कर, मुझे धोखा दे दिया, और उस के द्वारा उसने मुझे मार डाला।
१२ इस कारण नियम पवित्र है, और वो आदेश पवित्र, और न्यायी, और अच्छा है।
१३ तो फिर क्या वो जो अच्छा है, मेरे लिए मृत्यु का कारण बन गया? कतई नहीं! बल्कि उसके द्वारा जो अच्छा है, वो पाप, पाप प्रत्यक्ष हो जाए, मुझ में मृत्यु कार्यरत करता हुआ; ताकि आदेश द्वारा पाप अत्याधिक पापी बन जाए।
१४ क्योंकि हमें यह ज्ञान है कि नियम आध्यात्मिक है: परन्तु मैं शारीरिक हूँ, पाप तले बिका हुआ।
१५ क्योंकि वो जो मैं करता हूँ मैं उसकी अनुमती नहीं देता: क्योंकि वो जो मैं चाहता हूँ कि मैं करूँ, मैं तो वो करता नहीं; बल्कि वो जिस से मैं घृणा करता हूँ, वही मैं करता रहता हूँ।
१६ तो यदि मैं वो करता हूँ जो मैं करना नहीं चाहता, मैं नियम को सम्मति देता हूँ कि वो अच्छा है।
१७ तो फिर अब वो मैं नहीं हूँ जो वो करता है, बल्कि पाप जो मुझ में वास करता है।
१८ क्योंकि मैं यह जानता हूँ कि मुझ में (अर्थात् मेरे शरीर में) कोई भी अच्छी बात वास नहीं करती: क्योंकि इच्छा करना तो मेरे पास है; परन्तु उस अच्छे को करना, वो मुझे नहीं पता।
१९ क्योंकि वो अच्छा जो मैं चाहता हूँ, वो तो मैं करता नहीं: बल्कि वो बुरा जो मैं नहीं चाहता, वही मैं करता रहता हूँ।
२० तो अब यदि मैं वो करता हूँ जो मैं नहीं चाहता, वो मैं नहीं हूँ जो वो करता है, बल्कि पाप जो मुझ में वास करता है।
२१ तो फिर मैं एक नियम पाता हूँ, कि जब मैं अच्छा करना चाहता हूँ, बुराई मेरे साथ रहती है।
२२ क्योंकि मैं अभ्यन्तरिक मनुष्यत्व के भाव से ईश्वर के नियम में प्रसन्नता मनाता हूँ:
२३ परन्तु मैं अपने अंगों में एक दूसरा नियम पाता हूँ, जो मेरे मन के नियम के विरुद्ध युद्ध करता रहता है, और जो मुझे मेरे अंगों में स्थित पाप के नियम का बन्दी बनाता रहता है।
२४ आह! मैं कैसा दुखियारा पुरुष हूँ! कौन मेरा इस मृत्यु के शरीर से उद्धार करेगा?
२५ मैं ईश्वर को यीशु मसीह हमारे प्रभु द्वारा धन्यवाद देता हूँ। तो फिर मैं स्वयं अपने मन द्वारा ईश्वर के नियम की सेवा करता हूँ; परन्तु अपने शरीर द्वारा पाप के नियम की सेवा।
आठवाँ अध्याय।
१ इसलिए अब उनके प्रति कोई दण्डाज्ञा नहीं बची रही जो मसीहा यीशु में हैं, जो शारीरिकता के पीछे-पीछे नहीं, बल्कि प्राण के पीछे चलते हैं।
२ क्योंकि मसीहा यीशु में जीवन के प्राण के नियम ने मुझे पाप और मृत्यु के नियम से मुक्त कर दिया है।
३ चूँकी वो जो नियम नहीं कर पाया, क्योंकि वो शरीर द्वारा दुर्बल था, ईश्वर ने अपने ही पुत्र को पापी शरीर की समानता में, और पाप के लिए भेजकर, शरीर में पाप को दण्डनीय-घोषित कर दिया:
४ ताकि नियम की नेकी हम में परिपूर्ण हो जाए, जो शरीर के पीछे नहीं बल्कि प्राण के पीछे-पीछे चलते हैं।
५ क्योंकि वो जो शरीर के पीछे लगे हुए हैं, शारीरिकता की ही बातों का विचार करते रहते हैं; परन्तु वो जो प्राण के पीछे लगे हुए हैं, प्राण की ही बातों का विचार करते हैं।
६ क्योंकि शारीरिकता की विचारशीलता में रहना मृत्यु है; परन्तु आध्यात्मिकता की विचारशीलता में रहना जीवन और शान्ति है।
७ क्योंकि शारीरिक मन ईश्वर के विरुद्ध शत्रुता है, क्योंकि वो ईश्वर के नियम के आधीन नहीं है, न ही वो कभी आधीन हो सकता है।
८ तो वो जो शारीरिकता में हैं वो ईश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते।
९ परन्तु तुम शारीरिकता में नहीं हो, बल्कि प्राण में हो, यदि ऐसा हो कि ईश्वर के प्राण तुम में वास करते हों। अब यदि किसी भी व्यक्ति के पास मसीहा के प्राण न हों, तो वो उनका अपना नहीं है।
१० और यदि मसीहा तुम में हों, तो वो देह पाप के कारण मृत है; परन्तु वो प्राण जीवन हैं, नेकी के कारण।
११ परन्तु यदि उनका प्राण जिन्होंने यीशु को मृतकों में से उठा दिया था, तुम में वास करते हों, तो उन्होंने जिन्होंने मसीहा को मृतकों में से उठा दिया था, तुम्हारे मरणशील शरीरों को भी सजीवित कर देंगे, उन्हीं के प्राण द्वारा जो तुम में वास करते हैं।
१२ इसलिए, भाईयों, हम शारीरिकता के प्रति ऋणी नहीं हैं, शारीरिकतानुसार जीने के लिए।
१३ क्योंकि यदि तुम शारीरिकतानुसार जीयोगे, तो तुम मर जाओगे: परन्तु यदि तुम प्राण द्वारा शरीर के कर्मों का संहार कर डालोगे, तो तुम जी लोगे।
१४ क्योंकि जितने भी ईश्वर के प्राण द्वारा संचालित हैं, वही ईश्वर के बेटे हैं।
१५ क्योंकि तुमने बंध्वा-बेगारी का प्राण पुनः भयभीत होने के लिए नहीं ग्रहण किया है; बल्कि तुमने दत्तक-सन्तान बनने के प्राण को ग्रहण कर लिया है, जिनके द्वारा हम चीखते हैं, बापू जी, पिताश्री जी।
१६ वो प्राण स्वयं हमारे प्राण के साथ यह साक्ष्य देते हैं, कि हम ईश्वर की ही सन्तानें हैं।
१७ और यदि हम सन्तानें हैं, तो हम उत्तराधिकारी भी हैं; ईश्वर के ही उत्तराधिकारी, मसीहा के ही संग साझेदार-उत्तराधिकारी; यदि ऐसा हो कि हम उन्हीं के संग कष्ट भोगें, ताकि हम एक ही संग महिमामण्डित भी हो जाएँ।
१८ क्योंकि मैं मानता हूँ कि इस वर्तमान के कष्ट उस महिमा के साथ अतुल्नीय हैं, जो हम में प्रत्यक्ष कर दी जाएगी।
१९ क्योंकि प्राणी की उत्सुकता भरी प्रत्याशा, ईश्वर के पुत्रों की प्रत्यक्षता की प्रतीक्षा में है।
२० क्योंकि वो प्राणी व्यर्थताओं के आधीन बना दिया गया था, स्वेच्छा से नहीं, बल्कि उनके कारण जिन्होंने उसे आशा में आधीन कर दिया है,
२१ क्योंकि स्वयं वो प्राणी भी भ्रष्टता की बंध्वा-बेगारी से, ईश्वर की सन्तानों की गौरवशाली स्वतंत्रता में स्वतंत्र हो जाएगा।
२२ क्योंकि हमें यह ज्ञान है कि सम्पूर्ण सृष्टि मिलकर, इस वर्तमान काल तक प्रसव पीड़ा में कराह रही है।
२३ और न केवल वो ही, बल्कि हम भी, जिनके पास प्राण का प्रथम-फल है, सो हम भी स्वयं अपने आप में ही कराह रहे हैं, दत्तक-सन्तान बनने की प्रतीक्षा में, अर्थात्, हमारे शरीर के मुक्तिभुक्तान हेतु।
२४ क्योंकि आशा द्वारा हमारा बचाव होता है: परन्तु वो आशा जो दिखाई देती है, तो वो आशा नहीं रही: क्योंकि वो जो कोई देख सकता है, तो वो फिर किस बात की आशा करता रहे भई?
२५ परन्तु यदि हम उस बात की आशा करें जिसे हम देख नहीं सकते, तब हम उसकी धैर्यता से प्रतीक्षा करते हैं।
२६ इसी प्रकार प्राण भी हमारी दुर्बलताओं की सहायता करते हैं: क्योंकि हमें ज्ञान नहीं है कि हमें किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए: परन्तु प्राण स्वयं ही हमारे लिए उन कराहनाओं द्वारा मध्यस्तथा करते हैं जिनका अर्णन करना सम्भव नहीं है।
२७ और वही जो हृदयों की जाँच करते हैं, जानते हैं कि प्राण का क्या मन है, क्योंकि वही सन्तों के लिए ईश्वर की ही इच्छानुसार मध्यस्तथा करते हैं।
२८ और हमें यह ज्ञान है कि जो लोग ईश्वर से प्रेम करते हैं, उनके लिए सभी बातें अच्छाई हेतु मिलकर काम करती हैं, उन्हीं के लिए ही जो उनके उद्देश्यानुसार बुलाए हुए हैं।
२९ क्योंकि जिनका उन्हें पूर्वज्ञान था, उन्हीं की उन्होंने पूर्वनियुक्ति भी कर दी अपने ही पुत्र की प्रतिमा अनुरूप बन जाने हेतु, ताकि वह कई भाईयों के बीच पहलौठा जन्म ले लें।
३० इसके अतिरिक्त जिनकी उन्होंने पूर्वनियुक्ति की, उन्हीं को उन्होंने बुलाया: और जिन्हें उन्होंने बुलाया, उन्हीं को उन्होंने न्यायी-प्रमाणित भी कर दिया: और जिन्हें उन्होंने न्यायी-प्रमाणित कर दिया, उन्हीं को उन्होंने महिमामण्डित भी कर दिया।
३१ तो फिर हम इन बातों के विषय में क्या कहें? यदि ईश्वर हमारे पक्ष में हों, तो फिर हमारे विरुद्ध कौन हो सकता है?
३२ उन्होंने जिन्होंने अपने ही पुत्र को नहीं बक्शा, बल्कि उन्हें हम सभी के लिए प्रदान कर दिया, तो फिर वही कैसे हमें उन्हीं के साथ सभी वस्तुएँ प्रदान नहीं कर देंगे जी?
३३ तो फिर कौन ईश्वर के निर्वाचितों पर अभियोग लगा सकता है? वह ईश्वर हैं जो न्यायी-प्रमाणित ठहराते हैं।
३४ वो कौन है जो दण्डनीय घोषित कर रहा है? वो मसीहा हैं जो मर गए, और हाँ बल्कि वही पुनः उठे भी हुए हैं, जो ईश्वर के दाएँ हाथ पर ही हैं, जो हमारे लिए मध्यस्तथा भी करते हैं।
३५ हमें मसीहा के प्रेम से कौन पृथक कर सकता है? क्या आपत्ति, या पीड़ा, या अत्याचार, या अकाल, या वस्त्रहीनता, या विपत्ति, या तलवार?
३६ जैसा यह लिखा हुआ है, आपके वास्ते सारे दिन हमें मारा जा रहा है; हमारी गिनती भेड़ों समान पशु-वध हेतु की जा रही है।
३७ नहीं भई, हम इन सभी बातों में उनके द्वारा जिन्होंने हम से प्रेम किया है, विजयताओं से भी बढ़ कर हैं।
३८ क्योंकि मैं विश्वस्त हूँ, कि न ही मृत्यु, न ही जीवन, न ही दूत, न ही राज्य, न ही शक्तियाँ, न ही बातें वर्तमान की, न ही बातें भविष्य की,
३९ न ही ऊँचाई, न ही गहराई, न ही कोई भी अन्य प्राणी, हमें ईश्वर के उस प्रेम से पृथक करने में सक्षम है, जो हमारे प्रभु मसीहा यीशु में है।
नवाँ अध्याय।
१ मैं मसीहा में सत्य बोल रहा हूँ, मैं झूठ नहीं बोल रहा, मेरी अन्तरात्मा भी मुझे पवित्र-प्राण में साक्ष्य देती हुई,
२ कि मुझे अपने हृदय में बहुत दुःख और निरन्तर पीड़ा है।
३ मैं तो यहाँ तक कामना करता हूँ, कि मैं ही स्वयं अपने भाई-जनो के, शारीरिकतानुसार अपने नातेदारों के वास्ते, मसीहा से श्रापग्रस्त बन जाऊँ:
४ जो इस्राएली हैं; जिनके प्रति दत्तक-सन्तान बनना, और वो महिमा, और वो प्रतिज्ञा-पत्रिकाएँ, और नियम का प्रदान किया जाना, और ईश्वर की सेवा, और वह प्रतिज्ञाएँ सम्बन्धित हैं;
५ जिन्हीं के ही पित्र हैं, और जिन्हीं में से ही शारीरिकतानुसार मसीहा आए, जो सभी पर सर्वप्रधान हैं, ईश्वर-धन्य सदा के लिए, तथास्तु।
६ ऐसा नहीं है कि मानो ईश्वर के शब्द ने कोई प्रभाव ही न डाला हो। क्योंकि वो सभी इस्राएल नहीं हैं, जो इस्राएल के हैं:
७ न ही क्योंकि वो अब्राहम के बीज में से हैं, वो सभी सन्तानें हैं: बल्कि, इसहाक में तुम्हारा बीज कहलाया जाएगा।
८ अर्थात्, वो जो शारीरिकता की सन्तानें हैं, यह ईश्वर की सन्तानें नहीं हैं: बल्कि उस प्रतिज्ञा की सन्तानें बीज में गिने जाते हैं।
९ क्योंकि यही है प्रतिज्ञा का वो शब्द, मैं इस समय आऊँगा, और सैरा को एक बेटा होगा।
१० और केवल यही नहीं; बल्कि जब रबेक्काह भी एक के द्वारा गर्भवती हुई थी, हमारे पित्र इसहाक के ही द्वारा;
११ (क्योंकि उन बच्चों का अभी जन्म भी नहीं हुआ था, न ही उन्होंने कोई भी अच्छाई या बुराई की थी, कि ईश्वर का उद्देश्य निर्वाचनानुसार खड़ा रह सके, कर्मों का नहीं, बल्कि उन्हीं के द्वारा जो बुलाते हैं;)
१२ रबेक्काह से यह कह दिया गया था, अग्रज अनुज की सेवा करेगा।
१३ जैसा कि यह लिखा हुआ है, याकूब से मैंने प्रेम किया है, परन्तु एसाव से मैंने घृणा की है।
१४ भई तो फिर हम क्या कहें? क्या ईश्वर के साथ अनैतिकता है? कतई नहीं!
१५ क्योंकि वो मूसा से कहते हैं, मैं उस पर दया दिखाऊँगा जिस पर मुझे दया होगी, और मैं उसके साथ सहानुभूति रखूँगा जिस पर मुझे सहानुभूति होगी।
१६ तो फिर यह किसी की भी स्वेच्छा से, या दौड़ा-भागी करने से नहीं मिलता है, बल्कि ईश्वर द्वारा मिलता है, जो दया दिखाते हैं।
१७ क्योंकि शास्त्र फैरो से कहता है, इसी उद्देश्य से मैंने तुझे ऊपर उठाया है, ताकि मैं अपनी शक्ति तुझ में प्रदर्शित कर दूँ, और कि मेरा नाम इस समस्त पृथ्वी के सर्वत्र में घोषित कर दिया जाए।
१८ इसलिए वह उन पर दया दिखलाते हैं जिन पर वह दया करना चाहते हैं, और जिसे वह चाहें वह उसका हृदय कठोर बना देते हैं।
१९ तो फिर तुम मुझ से कहोगे, तो फिर वो दोष क्यों डालते हैं? क्योंकि किसने उनकी स्वेच्छा का विरोध किया है?
२० नहीं, बल्कि ओ मनुष्य, तुम कौन होते हो जो ईश्वर के विरुद्ध उत्तर दे रहे हो? क्या वो जो निर्मित किया गया है अपने निर्माता से पूछेगा, तुमने मुझे ऐसा क्यों निर्मित किया है भई?
२१ क्या कुम्हार के पास मिट्टी पर अधिकार नहीं है क्या, उसी एक गारे के गोले से एक पात्र को आदरशील बना देने के लिए, और दूसरे को अनादरशील बना देने के लिए?
२२ तो क्या हो यदि ईश्वर ने अपने आक्रोश को प्रदर्शित करने के लिए, और अपनी शक्ति को ज्ञात करवाने के लिए, विनाश हेतु नियुक्त किए गए उन आक्रोश के पात्रों को बहुत ही सहनशीलता से सहा:
२३ और कि वह अपनी महिमा के धन-धान्यों को दया के उन पात्रों पर ज्ञात करा दें, जिन्हें उन्होंने महिमा के लिए भूतपूर्वता से ही तैयार कर दिया था,
२४ यहाँ तक कि हमें ही, जिन्हें उन्होंने बुलाया है, यहूदियों में से ही नहीं, बल्कि अन्यप्रजातियों में से भी?
२५ जैसे वो होशे में भी कहते हैं, मैं उन्हें अपना ही जन पुकारूँगा जो मेरे अपने जन नहीं थे; और उसे अतिप्रीय जो अतिप्रीय नहीं थी।
२६ और यह होने को आएगा, कि उस स्थान में जहाँ उनसे यह कहा गया था, तुम मेरे लोग नहीं हो; वहीं वह जीवन्त ईश्वर की सन्तानें कहलाए जाएँगे।
२७ यशायाह भी इस्राएल के समबन्ध में चीखता है, यद्यपि इस्राएल की सन्तानों की संख्या समुद्र के रेत जितनी हो, एक अवशेष मात्र ही बचेगा:
२८ चूँकि वो कार्य को पूर्ण कर देंगे, और उसे नेकी में संक्षिप्त काट डालेंगे: क्योंकि प्रभु पृथ्वी पर एक संक्षिप्त कार्य बना देंगे।
२९ और जैसा कि यशायाह ने पहले ही कहा था, सिवाय कि सैबायोथ के प्रभु ने हमें एक बीज रख छोड़ा होता, हम सोदोमा जैसे ही होते, और हम गौमोराह के ही सदृश बना दिए गए होते।
३० तो फिर हम क्या बोलें? कि उन अन्यप्रजातियों ने, जिन्होंने नेकी का पालन नहीं किया, नेकी सिद्ध कर ली है, वही नेकी जो विश्वास की है।
३१ परन्तु इस्राएल ने, जिसने नेकी के नियम का पालन किया, नेकी के नियम को सिद्ध नहीं किया।
३२ किस कारण? क्योंकि उन्होंने उसे विश्वास द्वारा नहीं ढूँढा, बल्कि मानो कि नियम के कर्मों द्वारा। क्योंकि वो उस ठोकर खाने के पत्थर पर ठोकर खा गए:
३३ जैसा कि यह लिखा हुआ है, देखो मैं सियोन में एक ठोकर का पत्थर और एक अवरोधक-शिला लगा रहा हूँ: और जो कोई भी उन पर विश्वास करता है लज्जित नहीं होगा।
दसवाँ अध्याय।
१ भाई-जनो, इस्राएल के लिए मेरी हार्दिक इच्छा, और ईश्वर से यह प्रार्थना है, कि उनका बचाव हो जाए।
२ क्योंकि मैं उन्हें यह साक्ष्य दे रहा हूँ कि उन्हें ईश्वर के प्रति उत्साह तो है, परन्तु ज्ञानानुसार नहीं।
३ क्योंकि उन्होंने ईश्वर की नेकी से अनभिज्ञ होते हुए, और अपनी स्वयं की ही नेकी स्थापित करते हुए, स्वयं को ईश्वर की नेकी के प्रति आधीन नहीं किया है।
४ क्योंकि मसीहा उस प्रत्येक के प्रति नेकी के लिए नियम का अन्त हैं, जो विश्वास करता है।
५ क्योंकि मूसा नियम की उस नेकी का उल्लेख करते हैं, कि वो व्यक्ति जो उन बातों को करेगा वही उन में जीएगा।
६ परन्तु वो नेकी जो विश्वास से है, इस प्रकार बोल रही है, कहो मत अपने हृदय में, कौन स्वर्ग में आरोहण करेगा? (अर्थात्, मसीहा का ऊपर से नीचे लाना:)
७ या फिर कौन उस तलहीन-गर्त में अवरोहण करेगा? (अर्थात् मसीहा का पुनः मृतकों में से ऊपर ले आना।)
८ बल्कि वह क्या कह रहे हैं? वो शब्द तुम्हारे निकट ही है, तुम्हारे मूँह में ही, और तुम्हारे हृदय में ही: अर्थात्, वो विश्वास का शब्द, जिसका हम प्रवचन देते हैं;
९ कि यदि तुम अपने मूँह से प्रभु यीशु को स्वीकार करोगे, और अपने हृदय में विश्वास करोगे कि ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से उठा दिया है, तो तुम बच जाओगे।
१० क्योंकि हृदय से मनुष्य नेकी के प्रति विश्वास कर लेता है; और मूँह से बचाव के प्रति स्वीकृति दे दी जाती है।
११ क्योंकि शास्त्र कहता है, जो कोई भी उन पर विश्वास करता है लज्जित नहीं होता।
१२ क्योंकि यहूदी और यूनानी के बीच कोई भी अन्तर नहीं है: क्योंकि वही सभी पर प्रधान प्रभु उन सभी पर प्रचूर हैं जो उनका आह्वान करते हैं।
१३ इसलिए जो कोई भी प्रभु के नाम को पुकारेगा, बच जाएगा।
१४ तो फिर वो उनका कैसे आह्वान करेंगे जिन पर उन्होंने विश्वास ही न किया हो? और वो कैसे उन पर विश्वास करेंगे जिनके विषय में उन्होंने सुना ही न हो? और वो कैसे सुनेंगे बिना किसी प्रचारक के?
१५ और वो कैसे प्रवचन देंगे, सिवाय कि उन्हें भेजा जाए? जैसा यह लिखा हुआ है, कितने सुंदर हैं वो उनके पाँव जो शान्ति के शुभ-समाचार का प्रवचन देते हैं, और अच्छी बातों का सुखद समाचार लाते हैं!
१६ परन्तु उन सब ने शुभ-समाचार का पालन नहीं किया है। इसलिए यशायाह कहते हैं, प्रभु, किसने हमारी आख्या पर विश्वास किया है?
१७ तो फिर विश्वास सुनवाई से आता है, और सुनवाई ईश्वर के शब्द द्वारा आती है।
१८ परन्तु मैं कहता हूँ, क्या उन्होंने नहीं सुना? जी हाँ सच में, उनकी ध्वनि समस्त पृथ्वी में चली गई, और उनके शब्द संसार के अन्तिम छोरों तक भी।
१९ परन्तु मैं कहता हूँ, क्या इस्राएल को ज्ञान नहीं था? पहले मूसा कहता है, मैं तुम्हें उनके द्वारा ईर्षा से जलने के लिए उत्तेजित कर दूँगा जो लोग ही नहीं हैं, और एक मूर्ख राष्ट्र द्वारा मैं तुम्हें क्रोध से भड़का दूँगा।
२० परन्तु यशायाह बड़े ही निर्भीक हैं, और कहते हैं, मैं उनके द्वारा पा लिया गया था जो मुझे ढूँढ नहीं रहे थे; मैं उन्हें प्रत्यक्ष करवा दिया गया था जो मेरे विषय में पूछ-ताछ नहीं कर रहे थे।
२१ परन्तु इस्राएल से वो कहते हैं, सारे दिन-भर मैंने अपने हाथ एक अवज्ञाकारी और विरोधी लोगों पर फैला रखे हैं।
ग्यारहवाँ अध्याय।
१ तो मैं कहता हूँ, क्या ईश्वर ने अपने लोगों को परे खदेड़ दिया है क्या? कतई नहीं। क्योंकि मैं भी एक इस्राएली हूँ, अब्राहम के बीज का, बिन्यामिन की जनजाती का।
२ ईश्वर ने अपने लोगों को परे नहीं खदेड़ा है जिनका उन्हें पूर्वज्ञान था। क्या तुम्हें ये ज्ञान नहीं है कि एलियाह के विषय में शास्त्र क्या कहता है? कि वो कैसे इस्राएल के विरुद्ध ईश्वर से मध्यस्तथा करते हैं, कहते हुए,
३ प्रभु जी, उन्होंने आपके पैग़म्बरों को मार डाला है, और आपकी बलिवेदियों को नीचे खोद डाला है; और मैं ही अकेला बचा रह गया हूँ जी, और वो मेरी जान ले लेना चाहते हैं।
४ परन्तु ईश्वर का उत्तर क्या कहता है उन से? मैंने स्वयं के लिए सात हज़ार पुरुषों को बचा कर रखा है, जिन्होंने बअल की प्रतिमा के समक्ष अपने घुटने नहीं टेके हैं।
५ तो इसी प्रकार ही इस वर्तमान समय में भी, कृपा के निर्वाचनानुसार एक अवशेष मात्र बचा हुआ है।
६ और यदि वो कृपा द्वारा है, तो वो कर्मोंनुसार नहीं है: अन्यथा कृपा अब कृपा नहीं रही। परन्तु यदि वो कर्मोंनुसार है, तो फिर वो कृपा नहीं रही; अन्यथा कर्म अब कर्म नहीं रहा।
७ तो फिर क्या? इस्राएल ने वो नहीं प्राप्त किया जो वो प्राप्त करना चाहता है; परन्तु निर्वाचितों ने उसे प्राप्त कर लिया है, और वह शेष नेत्रहीन बना दिए गए
८ (इसके अनुसार जो लिखा हुआ है, ईश्वर ने उन्हें अचेतनता का प्राण प्रदान कर दिया है, नेत्र कि वो देख न सकें, और कर्ण कि वो सुन न सकें;) इसी दिन तक।
९ और दाऊद कहते हैं, उनकी मेज़ को एक फंदा, और एक पिंजड़ा, और एक ठोकर खाने का पत्थर, और उनके लिए एक क्षतिपूर्ती बन जाने दो:
१० उनके नेत्रों पर अन्धकार छा जाए, ताकि वो देख न सकें, और सदैव अपनी पीठ को नीचे झुका कर रखें।
११ तो इसलिए मैं कहता हूँ, तो क्या उन्होंने ठोकर खा ली है कि वो गिर पड़ें? कतई नहीं: बल्कि उनके पतन द्वारा अन्यप्रजातियों के लिए बचाव आ गया है, उन्हें ईर्षा से जलाने के लिए।
१२ अब यदि उनकी गिरावट इस संसार के लिए विपुलता बन गई है, और उनका पतन अन्यप्रजातियों की विपुलता; तो उनकी भरपूर्ता द्वारा क्या होगा?
१३ क्योंकि मैं तुम अन्यप्रजातियों से बोलता हूँ, चूँकी मैं अन्यप्रजातियों का अपौस्ल हूँ, मैं अपने सेवा-कार्य पर गर्व मनाता हूँ:
१४ यदि मैं किसी भी माध्यम से उन्हें अनुकरण के लिए उत्तेजित कर दूँ जो मेरे हाँडमाँस के हैं, और उन में से कुछों को बचा लूँ।
१५ क्योंकि यदि उनका परे खदेड़ दिया जाना इस संसार के लिए सामनजस्य की स्थापना है, तो उनका स्वीकार हो जाना क्या होगा, निश्च्य से ही मृतकों में से जीवन?
१६ क्योंकि यदि प्रथम-फल पवित्र हो, तो वो आटे का पेढ़ा भी पवित्र है: और यदि वो जड़ पवित्र हो, तो वो डालियाँ भी पवित्र हैं।
१७ और यदि कुछ डालियाँ तोड़ कर उखाड़ दी गई हों, और तुम, एक जँगली जैतून का पेड़ होते हुए, उनके बीच कलम बाँध दिए गए हो, और उन्हीं के साथ उस जैतून के पेड़ की जड़ और उसके तेल-रस के भागीदार हो रहे हो;
१८ तो उन डालियों के विरुद्ध डींगें मत मारो। परन्तु यदि तुम डींगे मार रहे हो, तो तुम उस जड़ को नहीं ढो रहे हो, बल्कि वो जड़ तुम्हें ढो रही है।
१९ इसलिए तुम फिर यह कहोगे, भई वो डालियाँ तो तोड़ कर उखाड़ दी गई थीं, ताकि मेरा उन में कलम बाँधना हो जाए।
२० ठीक है भई; अविश्वास के कारण उन्हें तोड़ कर उखाड़ दिया गया था, और तुम विश्वास द्वारा खड़े हो। अभिमानी मत बनो, बल्कि डर जाओ:
२१ क्योंकि यदि ईश्वर ने प्राकृतिक डालियों को नहीं बक्शा, सावधान हो जाओ कहिं वो तुम्हें भी न बक्शें।
२२ देख लो इसलिए ईश्वर की अच्छाई और उनकी कड़ाई: उन पर जो गिर गए, कड़ाई; परन्तु तुम्हारे प्रति अच्छाई, यदि तुम उनकी अच्छाई में निरन्तर लगे रहोगे: नहीं तो तुम भी काट कर उखाड़ दिए जाओगे।
२३ और वो भी, यदि वो अविश्वास में वास न करते रहें, कलम बाँध दिए जाएँगे: क्योंकि ईश्वर उन्हें पुनः कलम बाँध देने में सक्षम हैं।
२४ क्योंकि यदि तुम उस जँगली प्राकृतिक जैतून के पेड़ में से बाहर काट दिए गए थे, और प्रकृति के विपरीत तुम एक अच्छे जैतून के पेड़ में कलम बाँध दिए गए हो: तो फिर और कितने आधिक्य से ये, जो प्राकृतिक डालियाँ हैं, अपने ही जैतून के पेड़ में कलम बाँध दी जाएँगी?
२५ क्योंकि मैं यह नहीं चाहता भाईयों, कि तुम इस रहस्य से अनभिज्ञ रहो, कहिं तुम अपनी ही कल्पनाओं में विद्वान बन जाओ; कि इस्राएल पर कुछ अन्धापन आ गया है, जब तक अन्यप्रजातियों की परिपूर्णता नहीं आ जाती।
२६ और इस प्रकार सम्पूर्ण इस्राएल का बचाव हो जाएगा; जैसे यह लिखा गया है, सियोन में से बाहर निकल कर आएँगे वो उद्धारक, और वो याकूब में से ईश्वरहीनता को दूर परे हटा देंगे:
२७ क्योंकि यही मेरा उनके प्रति प्रतिज्ञा-पत्र है, जब मैं उनके पापों को परे हटा दूँगा।
२८ शुभ-समाचार के समबन्ध में वो तुम्हारे वास्ते शत्रु हैं: परन्तु निर्वाचन की दृष्टि से, वो पित्रों के वास्ते अतिप्रीय हैं।
२९ क्योंकि ईश्वर के उपहार और उनकी पुकार अपरिवर्तनीय हैं।
३० अब जैसे कि तुमने बीते हुए कालों में ईश्वर में विश्वास नहीं किया, तथापि उनके अविश्वास द्वारा तुमने अब दया प्राप्त कर ली है:
३१ इसी प्रकार इन्होंने भी अभी विश्वास नहीं किया है, ताकि तुम्हारी दया के माध्यम से ये भी दया प्राप्त कर लें।
३२ क्योंकि ईश्वर ने उन सभी को अविश्वासी तय कर दिया है, ताकि वो सभी पर दया दिखा दें।
३३ आह! दोनो, ईश्वर की विद्या, और ज्ञान की विपुलता की गहराई! कितने ही अचिंतनीय हैं उनके न्याय-निर्धारण, और कितने ही अगम्य हैं उनके पथ!
३४ क्योंकि किसने परिचय रखा है प्रभु के मन से? या फिर कौन उनका परामर्शदाता रहा है?
३५ या फिर किसने उन्हें पहले दिया है, और वो उसे पुनः लौटा दिया जाएगा?
३६ क्योंकि उन्हीं से, और उन्हीं के द्वारा, और उन्हीं के प्रति ही सभी कुछ है: जिन्हीं के प्रति महिमा सदा के लिए रहे।तथास्तु।
बारहवाँ अध्याय।
१ इसलिए भाई-जनों, ईश्वर की दयालुताओं के वास्ते, मैं तुम से विनती करता हूँ, कि तुम अपने शरीरों को एक सजीवित आहुति प्रस्तुत करो, पवित्र, और ईश्वर के प्रति स्वीकारयोग्य, जो कि तुम्हारी उचित सेवा है।
२ और तुम इस संसार के अनुरूप मत बनो, बल्कि तुम अपने मनो के नवीनिकरण द्वारा रूपान्तरित हो जाओ, ताकि तुम सिद्ध कर दो कि ईश्वर की वो अच्छी, और स्वीकारयोग्य, और परिशुद्धता-पूर्ण इच्छा क्या है।
३ क्योंकि मैं उस कृपा द्वारा जो मुझे प्रदान की गई है, तुम्हारे बीच उस प्रत्येक व्यक्ति से यह कह रहा हूँ, कि वो अपने स्वयं के विषय में औचित्यता से अधिक बढ़-चढ़ कर न सोचे, बल्कि वो स्वस्थचित्तता से सोचे, उसी विश्वास के मापानुसार जिसे ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रदान किया है।
४ क्योंकि जिस प्रकार हमारे एक ही शरीर में कई अंग हैं, और सभी अंगों का एक-समान उपयोग नहीं है:
५ उसी प्रकार, हम अनेक होते हुए, मसीहा में एक ही शरीर हैं, और प्रत्येक एक दूसरे के ही अंग हैं।
६ तो फिर विभिन्न प्रतिभाएँ रखते हुए जो हमें उस कृपानुसार प्रदान कर दी गई हैं, यदि प्रेरित-उपदेश देना हो, तो हम उसी विश्वास के अनुपातानुसार प्रेरित-उपदेश दें;
७ या फिर सेवाकार्य करना, तो हम सेवारत हो जाएँ: या फिर वो जो सिखा रहा है, वही सिखाए;
८ या वो जो अभिप्रेरित कर रहा है, वही अभिप्रेरित करे: वो जो दे रहा है, वह यही निष्कपटता से करे; वो जो निरीक्षण करता है, वो ये कर्मठता से करे; वो जो दया दिखाता है, वो ये प्रसन्नता से करे।
९ प्रेम को निषकपट रहने दो, वो जो बुरा है उस से घृणा करो; वो जो भला है उस से चिपट जाओ।
१० भ्रात्रीय-प्रेम संग एक-दूसरे के साथ करुणा रखो; आदर-सम्मान में एक-दूसरे को अधिमान्यता देते हुए;
११ काम-काज में आलसी नहीं; प्राण में उत्कट; प्रभु की सेवा करते हुए;
१२ आशा में हर्षित; आपत्तियों में धीर; प्रार्थना में लगातार;
१३ सन्तों की आवश्यकताओं में भागीदार बनते हुए; अतिथि-सत्कार करते हुए।
१४ उन्हें आशीष दो जो तुम्हारा अत्याचार करते हैं: आशीष दो, शाप मत दो।
१५ उनके साथ हर्ष मनाओ जो हर्षित हैं, और उनके साथ रो जो रो रहे हैं।
१६ एक दूसरे के साथ एकसा मन रखो। ऊँची बातों पर मन मत लगाओ, बल्कि दीन दशा के लोगों के स्तर पर नीचे आ जाओ। अपने ही अनुमानों में विद्वान मत बनो।
१७ किसी भी व्यक्ति के प्रति बुराई का भुगतान बुराई से मत करो। सभी व्यक्तियों की दृष्टि में सच्चरित्र बातें उपलब्ध करो।
१८ यदि यह सम्भव हो, जितना भी तुम से हो सके, सभी लोगों के साथ शान्तिप्रीयता से रहो।
१९ प्यारे अतिप्रीयों, स्वयं प्रतिषोध मत लो, बल्कि आक्रोश को अवसर दो: क्योंकि यह लिखा गया है, प्रतिषोध मेरा है; मैं बदला चुकाऊँगा, कहते हैं प्रभु।
२० इसलिए यदि तुम्हारा शत्रु भूखा हो, तो उसे भोजन प्रदान कर दो; यदि वो प्यासा हो, तो उसे पानी प्रदान कर दो: क्योंकि ऐसा करने से तुम उसके शीर्ष पर अग्नि के अंगारों का ढेर बना दोगे।
२१ बुराई से पराजित मत हो, बल्कि बुराई को भलाई से पराजित कर दो।
तेरहवाँ अध्याय।
१ प्रत्येक आत्मा को उच्च शक्तियों के आधीन बन जाने दो। क्योंकि कोई शक्ती नहीं है बल्कि ईश्वर की: वो जो शक्तियाँ हैं वो ईश्वर द्वारा ही विहित-नियुक्त हैं।
२ जो कोई भी इसलिए उस शक्ती का प्रतिरोध करता है, ईश्वर के अध्यादेश का प्रतिरोध करता है: और वो जो प्रतिरोध करते हैं अपने स्वयं ही के लिए दण्डाज्ञा ग्रहण करेंगे।
३ क्योंकि अध्यक्ष अच्छे कर्मों के लिए आतंक नहीं हैं, बल्कि बुरों के लिए। तो फिर क्या तुम उस शक्ती से डरोगे नहीं? वही करो जो अच्छा है, और तुम उसी के द्वारा प्रशन्सा प्राप्त कर लोगे:
४ क्योंकि वो अच्छाई हेतु तुम्हारे प्रति ईश्वर का सेवक है। परन्तु यदि तुम वो करते हो जो बुरा है, तो डर जाओ; क्योंकि वो व्यर्थता में तलवार नहीं उठाता है: क्योंकि वो ईश्वर का सेवक है, बुराई करने वाले पर आक्रोश क्रियान्वित करने वाला प्रतिषोधी।
५ इसी कारण वश तुम्हें आधीन बनने की आवश्यक्ता है, न केवल आक्रोश के वास्ते, बल्कि अन्तरात्मा के वास्ते भी।
६ क्योंकि इसी कारण वश तुम राजकर भी भरते हो: क्योंकि वह ईश्वर के सेवक हैं, इसी बात के प्रति निरन्तर सेवारत।
७ भर दो इसलिए उन सभी को उनके शुल्क: राजकर जिसे राजकर बकाया है; चुँगी जिसे चुँगी; डर जिस के प्रति डर; आदर जिस के प्रति आदर।
८ किसी भी व्यक्ति के ऋणी मत बनो, बल्कि एक दूसरे से प्रेम करो: क्योंकि वो जो किसी दूसरे से प्रेम करता है, उसने नीयम को पूर्ण कर लिया है।
९ क्योंकि, तुम व्यभिचार नहीं करोगे, तुम हत्या नहीं करोगे, तुम चोरी नहीं करोगे, तुम झूठी गवाही नहीं दोगे, तुम लोलुपता नहीं करोगे; और यदि कोई भी अन्य आदेश हो, तो वो संक्षिप्तता से इसी कहावत में समझा जा सकता है, तुम अपने पड़ौसी के साथ स्वयं समान प्रेम करोगे।
१० प्रेम अपने पड़ौसी को कोई हानि नहीं पहुँचता है: इसलिए प्रेम नियम की परिपूर्णता है।
११ और कि, समय का ज्ञान रखते हुए, कि अब वो घड़ी आ चुकी है कि हम नीन्द में से जाग उठें: क्योंकि अब हमारे विश्वास कर लेने वाली उस घड़ी से हमारा बचाव और भी निकट है।
१२ रात बहुत बीत चुकी है, दिन निकलने को है: हमें इसलिए अन्धकार के कार्यों को त्याग देना चाहिए, और हमें उजाले के शस्त्र को धारण कर लेना चाहिए।
१३ हमे दिन के योग्य सच्चरित्रता में चलना चाहिए; रंगरेलियों और मादकता में नहीं, न ही बिस्तर-बाज़ियों और कामुकताओं में, न ही विग्रह या ईर्षा की जलन में।
१४ बल्कि तुम प्रभु यीशु मसीह को धारण कर लो, और शरीर की वासनाओं को परिपूर्ण करने के सोच-विचार त्याग दो।
चौदहवाँ अध्याय।
१ वो जो विश्वास में दुर्बल है, उसे तुम ग्रहण कर लो, परन्तु शंका-भरे वाद-विवादों के साथ नहीं।
२ क्योंकि कोई यह विश्वास करता है कि वो सब कुछ खा सकता है: परन्तु वो जो दुर्बल है, वो पौधे ही खाता है।
३ वो जो खाता है, वो उसके साथ घृणा न करे जो नहीं खाता है; और वो जो नहीं खाता है, उसे खाने वाले को नहीं आँकना चाहिए: क्योंकि ईश्वर ने उसे ग्रहण कर लिया है।
४ भई तुम कौन होते हो जो किसी और के नौकर को आँकते हो? वो अपने ही मालिक के प्रति खड़ा होता है या गिरता है। हाँ भई, वो खड़ा कर दिया जाएगा: क्योंकि ईश्वर उसे खड़ा कर देने में सक्षम हैं।
५ कोई किसी एक दिन को दूसरे से अधिक मान्यता प्रदान करता है: तो कोई दूसरा, प्रत्येक दिन को समान मान्यता प्रदान करता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने ही स्वयं के मन में विश्वस्त हो जाने दो।
६ वो जो किसी दिन को श्रेष्ठ मानता है, वो उसे प्रभु के प्रति श्रेष्ठ मानता है; और वो जो किसी दिन को श्रेष्ठ नहीं मानता है, वो उसे प्रभु के प्रति श्रेष्ठ नहीं मानता है। वो जो खा रहा है, प्रभु के प्रति खा रहा है, क्योंकि वो ईश्वर को धन्यवाद दे रहा है; और वो जो खा नहीं रहा है, वही प्रभु के प्रति खा नहीं रहा है, और ईश्वर को धन्यवाद दे रहा है।
७ क्योंकि हम में से कोई भी स्वयं के प्रति नहीं जीता है, और कोई भी व्यक्ति स्वयं के प्रति नहीं मरता है।
८ इसलिए यदि हम जीते हैं, हम प्रभु के प्रति ही जीते हैं; और यदि हम मरते हैं, तो हम प्रभु के प्रति ही मर जाते हैं: इसलिए यदि हम जीते हैं, या मरते हैं, हम प्रभु के ही हैं।
९ क्योंकि इसी उद्देश्य हेतु ही मसीहा दोनो, मरे और उठ गए, और पुनर्जीवित हो गए, ताकि वो दोनो, मृतकों और जीवितों के प्रभु बन जाएँ।
१० परन्तु तुम क्यों अपने ही भाई को आँक रहे हो भई? या तुम क्यों अपने ही भाई को तुच्छ समझ रहे हो? क्योंकि हम सभी यीशु के न्यायासन समक्ष खड़े होंगे।
११ क्योंकि यह लिखा हुआ है, मेरे जीते जी, कहते हैं प्रभु, प्रत्येक घुटना मेरे समक्ष टेका जाएगा, और प्रत्येक जीभ ईश्वर को स्वीकृति देगी।
१२ तो फिर हम में से प्रत्येक अपने स्वयं का लेखा-जोखा ईश्वर को देगा।
१३ इसलिए हमें एक दूसरे को अब और नहीं आँकना चाहिए: बल्कि इस बात को आँको, कि कोई भी व्यक्ति अपने भाई के पथ में ठोकर का पत्थर, या कोई ठेस का कारण न लगा दे।
१४ मैं जानता हूँ, और प्रभु यीशु द्वारा विश्वस्त हूँ, कि कुछ भी अपने स्वयं से अस्वच्छ नहीं है: बल्कि वो जो किसी भी वस्तु को अस्वच्छ मानता है, वही उसी के लिए अस्वच्छ है।
१५ परन्तु यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे भोजन से दुखी हो रहा हो, तो तुम प्रेम-भाव से नहीं चल रहे हो। उसे अपने भोजन द्वारा नष्ट मत करो, जिसके लिए मसीहा मरे!
१६ अपनी भलाई की बुराई मत बुलवाई जाने दो:
१७ क्योंकि ईश्वर का राज्य भोजन और पेय नहीं है; बल्कि नेकी, और शान्ति, और पवित्र-प्राण में हर्ष।
१८ क्योंकि वो जो इन बातों में मसीहा की सेवा करता है, वही ईश्वर द्वारा स्वीकारयोग्य है, और लोगों द्वारा अनुमोदित।
१९ इसलिए हम उन बातों का अनुसरण करें जो शान्तिवर्धक हैं, और जिनके द्वारा हम एक दूसरे का आध्यात्मिक-निर्माण करें।
२० भोजन के वास्ते ईश्वर का कार्य नष्ट मत करो। सभी वस्तुएँ वास्तव में शुद्ध हैं; परन्तु उस व्यक्ति के लिए यह अच्छा नहीं है जो ठोकर खा कर खाता है।
२१ यह भला है कि न ही माँस खाया जाए, न ही अंगूर-रस पीया जाए, न ही कोई भी अन्य बात की जाए जिसके द्वारा तुम्हारा भाई ठोकर खाए, या अवरोधित हो जाए, या निर्बल बना दिया जाए।
२२ क्या तुम्हारे पास विश्वास है? उसे ईश्वर के समक्ष अपने पास ही रखो। सुखी है वो जो स्वयं को उसी बात में दण्डनीय नहीं बनाता है जिसकी वो अनुमती देता है।
२३ और वो जो सन्देह करता है दण्डित है यदि वो खाता है, क्योंकि वो विश्वास से नहीं खा रहा है: क्योंकि जो कुछ भी विश्वास से नहीं है, वही पाप है।
पन्द्रहवाँ अध्याय।
१ तो हम जो प्रबल हैं, हमें निर्बलों की निर्बलताओं का भार उठा लेना चाहिए, परन्तु अपनी स्वयं की प्रसन्नता हेतु नहीं।
२ हम में से प्रत्येक को उसके पड़ौसी को उसी की अच्छाई हेतु आध्यात्मिक-निर्माण निमित्त प्रसन्न करना चाहिए।
३ क्योंकि मसीहा ने भी स्वयं को प्रसन्न नहीं किया; बल्कि, जैसा यह लिखा हुआ है, उनके धिक्कार जिन्होंने तुम्हें धिक्कारा मुझ पर आ पड़े।
४ क्योंकि जो भी बातें पहले से ही लिख दी गई थीं, हमारी शिक्षा हेतु ही लिख दी गई थीं, ताकि हम धैर्य और शास्त्रों की सान्त्वना के माध्यम से आशावाँ रहें।
५ अब धैर्य और ढाढ़स के ईश्वर तुम्हें मसीहा यीशूनुसार एक दूसरे के प्रति एकसा मन रखने का अनुदान दे दें:
६ ताकि तुम एक ही मन और एक ही मुख द्वारा ईश्वर को गौरवान्वित करो, हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिताश्री को ही।
७ इसी कारण एक दूसरे को ग्रहण कर लो, जैसे मसीहा ने भी हमें ईश्वर की महिमा निमित्त ग्रहण कर लिया है।
८ अब मैं यह कह रहा हूँ कि यीशु मसीह, ईश्वर के सत्य हेतु ख़तनितों के एक सेवक थे, उन प्रतिज्ञाओं को सुदृढ़ करने हेतु जो पित्रों को प्रदान कर दी गई थीं:
९ और कि अन्यप्रजातियाँ ईश्वर का महिमामंडन उनकी दया के कारण करें; जैसा कि यह लिखा हुआ है, इस कारण मैं अन्यप्रजातियों के बीच आपको स्वीकृति दूँगा, और आप के नाम के प्रति गाऊँगा।
१० और पुनः वो कहता हैं, हर्ष मनाओ तुम काफिरों, उनके लोगों के संग।
११ और पुनः, प्रभु की प्रशन्सा करो, तुम सभी अन्यप्रजातियों; और उनकी सराहना करो, तुम सभी लोग।
१२ और पुनः, यशायाह कहते हैं, यिशय की एक जड़ होगी, और वो काफिरों पर शासन करने के लिए उठेंगे; उन्हीं में काफिर भरोसा करेंगे।
१३ अब आशा के ईश्वर तुम्हें सम्पूर्ण हर्ष और विश्वास में शान्ति से भर दें, ताकि तुम आशा में, पवित्र-प्राण की शक्ती के माध्यम से, प्रचूर हो जाओ।
१४ और मैं भी स्वयं तुम्हारे विषय में विश्वस्त हूँ मेरे भाई-जनो, कि तुम भी अछाई से भरे हो, सर्व-ज्ञान से भरपूर, एक दूसरे को चेतावनित करने में भी सक्षम।
१५ तथापि, भाई-जनो, मैंने तुम्हें किसी प्रकार से बहुत साहस के साथ लिखा है, तुम्हें अपने मन में रख कर, उस कृपा कारणवश जो मुझे ईश्वर द्वारा प्रदान की गई है,
१६ कि मैं अन्यप्रजातियों के प्रति यीशु मसीह का सेवक बनू, ईश्वर के शुभ-समाचार का सेवाकार्य करता हुआ, ताकि अन्यप्रजातियों का चढ़ाया जाना पवित्र-प्राण द्वारा पुनीत कर दिया हुआ, स्वीकारयोग्य बन जाए।
१७ इसलिए मेरे पास यीशु मसीह के माध्यम से ईश्वर के समबन्ध की उन बातों पर गौरव करने का कारण है।
१८ पर मैं उन बातों में से किसी के भी विषय में बोलने का साहस नहीं करूँगा जिन्हें मसीहा ने मेरे द्वारा क्रियान्वित नहीं किया है, अन्यप्रजातियों को, शब्द और कर्म द्वारा आज्ञाकारी बनाने में,
१९ बलशाली संकेतों और अद्धभुत चमत्कारों द्वारा, ईश्वर के प्राण की शक्ती द्वारा; ताकि यरूशलेम से, और आस-पास से लेकर इलिरिकम तक, मैंने पूर्ण रूप से मसीहा के शुभ-समाचार का प्रवचन दे दिया है।
२० हाँ भई, इस प्रकार मैंने शुभ-समाचार का प्रवचन देने के लिए यत्न किया है, वहाँ नहीं जहाँ मसीहा का नाम लिया गया था, कहिं मैं किसी अन्य व्यक्ति की नीव पर निर्माण करूँ:
२१ परन्तु जैसा यह लिख दिया गया है, जिन से उनके विषय में नहीं बोला गया था, वही देखेंगे: और उन्हींने जिन्होंने सुना नहीं है समझ लेंगे।
२२ इसी कारण वश भी, तुम्हारे पास आगमन करने में मुझे बहुत रुकावट हुई।
२३ परन्तु अब इन क्षेत्रों में कोई और स्थान न रखते हुए, और इन कई वर्षों से तुम्हारे पास आने की बहुत अभिलाषा रखते हुए;
२४ जब कभी भी मैं स्पेन में जाने की यात्रा करूँगा, तो मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगा: क्योंकि मैं तुम्हें अपनी यात्रा में देखने की आशा रखता हूँ, और कि मैं तुम्हारे द्वारा अपने पथ पर आगे भेज दिया जाऊँ, यदि पहले मैं तुम्हारे साहचर्य से थोड़ा-बहुत भरपूर हो जाऊँ।
२५ परन्तु अब मैं यरूशलेम जा रहा हूँ सन्तों की सेवा करने हेतु।
२६ क्योंकि मकिदुनिया और अकाया वाले, यरूशलेम में दरिद्र सन्तों के लिए कुछ योगदान करने हेतु प्रसन्न हैं।
२७ इसने उन्हें सचमुच प्रसन्न किया है; और वो उनके ऋणी हैं। क्योंकि यदि अन्यप्रजातियाँ उनकी आध्यात्मिक वस्तुओं के भागीदार हैं, तो उनका यह कर्तव्य भी है कि वो उनकी सांसारिक वस्तुओं में भी सेवा करें।
२८ अब जब मैं यह कर दूँगा, और इस फल को उनके प्रति मुहरबंद कर चुकूँगा, मैं तुम्हारे पास से होता हुआ स्पेन चला जाऊँगा।
२९ और मैं आश्वस्त हूँ कि, जब मैं तुम्हारे पास आऊँगा, मैं मसीहा के शुभ-समाचार के आशीर्वाद की परिपूर्णता में आ जाऊँगा।
३० अब मैं तुम से विनती करता हूँ, भाई-जनो, प्रभु यीशु मसीह के वास्ते, और प्राण के प्रेम के वास्ते, कि तुम मेरे लिए ईश्वर के प्रति अपनी प्रार्थनाओं में मेरे साथ यत्न करो:
३१ ताकि मेरा उनसे बचाव हो जाए जो युदेया में अविश्वासी हैं; और कि मेरी सेवा जो मेरे पास यरूशलेम के लिए है, सन्तों द्वारा स्वीकृत हो जाए;
३२ ताकि मैं ईश्वर की इच्छा द्वारा तुम्हारे पास हर्ष के साथ आऊँ, और तुम्हारे साथ विश्राम कर लूँ।
३३ अब शान्ति के ईश्वर तुम सभी के साथ रहें। तथास्तु।
सोलहवाँ अध्याय।
१ मैं तुम्हें हमारी बहन फीबे की सराहना करता हूँ, जो किंख्रेय के कलिसिए की एक सेविका है:
२ ताकि तुम उसका सन्तों के योग्य प्रभु में स्वागत करो, और कि तुम, जिस किसी भी काम-काज में उसे तुम्हारी आवश्यक्ता हो, उसकी सहायता करो: क्योंकि वो कईयों की सहायिका रही है, और मेरे स्वयं की भी।
३ मसीहा यीशु में मेरे सहायकों प्रिस्किल्ला और अकिल्ला का अभिवादन करो:
४ जिन्होंने मेरे जीवन के लिए अपनी गर्दने दाव पर लगा दीं: जिनका न केवल मैं, बल्कि काफिरों के समस्त कलिसिए भी धन्यवाद करते हैं।
५ इसी प्रकार उस कलिसिए का अभिवादन करो जो उनके घर में है। मेरे अतिप्रीय इपैनितुस को प्रणाम करो, जो मसीहा के प्रति अकाया का प्रथमफल है।
६ मरियम का अभिवादन करो, जिसने हमारे लिए बहुत परिश्रम किया।
७ मेरे कुल-वाले, और मेरे साथी कारावासियों अंद्रोनिकुस और युनिया को प्रणाम करो, जो अपौस्लों के बीच सुख्यात हैं, जो मुझ से पहले से ही मसीहा में थे।
८ प्रभु में मेरे अतिप्रीय एमप्लीयस का अभिवादन करो।
९ मसीहा में हमारे सहायक अरबानुस को, और स्ताखुस मेरे अतिप्रीय को प्रणाम करो।
१० मसीहा में अनुमोदित अपिल्लेस को प्रणाम करो। वो जो अरिस्तोबुलुस के घरबार के हैं उन्हें प्रणाम करो।
११ हेरोदियोन मेरे कुल-वाले को प्रणाम करो। नरकिस्सुस के घरबार वाले जो प्रभु में हैं, उनका अभिवादन करो।
१२ त्रुफैना और त्रुफोसा, जो प्रभु में परिश्रम करते हैं, उन्हें प्रणाम करो। अतिप्रीय पर्सिस जिसने प्रभु में बहुत श्रम किया, उसे प्रणाम करो।
१३ प्रभु में चुने हुए रूफुस, और उसकी और मेरी माँ को प्रणाम करो।
१४ असुनक्रितुस, फ्लेगौन, हिरमास, पत्रुबस, हिरमेस, और उनके साथ उन भाई-जनो को प्रणाम करो।
१५ फिलोलुगुस, और यूलिया, नेरेउस, और उसकी बहन, और उलुमपस, और उनके साथ-साथ सभी सन्तों को प्रणाम करो।
१६ एक दूसरे को एक पवित्र चुम्बन से प्रणाम करो। मसीहा के कलिसिए तुम्हें प्रणाम करते हैं।
१७ अब मैं तुम से विनती करता हूँ, भाई-जनो, कि तुम उन्हें अंकित कर लो जो तुम्हारे द्वारा सीखी गई उस शिक्षा के विपरीत विभाजन और अवरोधन करवाते हैं; और उन से दूर रहो।
१८ क्योंकि इन जैसे हमारे प्रभु यीशु मसीह की सेवा नहीं, बल्कि अपनी ही पेट-पूजा करते हैं; और अच्छे शब्दों और सुंदर भाषणों द्वारा भोले-भालों के हृदयों को धोखा देते हैं।
१९ क्योंकि तुम्हारा आज्ञापालन बाहर सभी लोगों तक फैल चुका है। इसलिए मैं तुम्हारे हेतु प्रसन्न हूँ: परन्तु तब भी मेरी यह इच्छा है कि तुम जो अच्छा है उसके प्रति विद्वान, और बुरे के प्रति निष्छल रहो।
२० और शान्ति के ईश्वर तुम्हारे पैरों तले शैतान को शीघ्र ही कुचल डालेंगे। हमारे प्रभु यीशु मसीह की कृपा तुम्हारे साथ रहे। तथास्तु।
२१ तिमोथेयस मेरा सहकर्मी, और लूकियुस, और यसोन, और सोसिपत्रुस, मेरे कुल-वाले, तुम्हें प्रणाम करते हैं।
२२ मैं तरतीयुस जिसने यह पत्र लिखा है, तुम्हें प्रभु में प्रणाम करता हूँ।
२३ मेरे और सम्पूर्ण कलिसिए के आतिथ्यसतकारी गायुस तुम्हें प्रणाम करते हैं। एरस्तुस नगर प्रबन्धक, और क्वार्तुस एक भाई, तुम्हें प्रणाम करते हैं।
२४ हमारे प्रभु यीशु मसीह की कृपा तुम सभी के साथ रहे। तथास्तु।
२५ अब उन्हीं के प्रति जो तुम्हें मेरे शुभ-समाचार और यीशु मसीह के प्रवचनानुसार स्थापित करने की शक्ती रखते हैं, उस रहस्य के प्रत्यक्षीकरणानुसार जो इस संसार के प्रारम्भ से गुप्त रखा गया था,
२६ परन्तु जो अब प्रत्यक्ष कर दिया गया है, और पैग़म्बरों के शास्त्रों द्वारा अनन्तकालिक ईश्वर के आदेशानुसार विश्वास के आज्ञापालन हेतु, सभी राष्ट्रों को ज्ञात करवा दिया गया है:
२७ उन्हीं एकमात्र विद्वान ईश्वर के प्रति, यीशु मसीह द्वारा ही, सदा के लिए महिमामण्डन रहे। तथास्तु।
०४/२९/२०२३:
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