कुरिन्थुसवासियों के लिए पौलुस का प्रथम पत्र।(First Corinthians)
पहला अध्याय।
१ पौलुस, ईश्वर की इच्छा द्वारा यीशु मसीह का बुलाया हुआ अपौस्ल बुलाया, और सौस्थेनेस हमारा भाई,
२ कुरिन्थुस में ईश्वर के कलिसिए को, उन्हें जो मसीहा यीशु में पुनीत हैं, सन्त बनने हेतु बुलाए हुए, उन सभी के साथ जो प्रत्येक स्थान में, जो प्रभु यीशु मसीह के नाम का आह्वान करते हैं, दोनो उनके और हमारे:
३ तुम्हें ईश्वर हमारे पिताश्री द्वारा, और प्रभु यीशु मसीह द्वारा कृपा और शान्ति मिले।
४ मैं सर्वदा अपने ईश्वर को तुम्हारी ओर से धन्यवाद देता हूँ, ईश्वर की उस कृपा के लिए जो तुम्हें यीशु मसीह द्वारा प्रदान की गई है;
५ कि तुम प्रत्येक विषय में उनके द्वारा समृद्ध हो, सम्पूर्ण अर्णन में, और सम्पूर्ण ज्ञान में;
६ उसी प्रकार जैसे मसीहा का साक्ष्य तुम में सुदृढ़ कर दिया जा चुका था:
७ ताकि तुम किसी भी प्रतिभा में विहीन न रह जाओ; हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन की आस भरी प्रतीक्षा करते हुए:
८ जो तुम्हें अन्त तक सुदृढ़ भी कर देंगे, ताकि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह के दिवस में निर्दोष होगे।
९ ईश्वर विश्वसनीय हैं, जिनके द्वारा तुम उनके पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के साहचर्य में बुला लिए गए थे।
१० अब भाई-जनो, मैं तुम से प्रभु यीशु मसीह के नाम द्वारा यह विनती करता हूँ, कि तुम सभी एक ही प्रकार की बोली बोलो, और कि तुम्हारे बीच कोई भी विभाजन न हों; बल्कि तुम एक साथ, पूर्णता से एक चित्त-मन में, और एक ही मान्यता में जुड़ जाओ।
११ क्योंकि तुम्हारे विषय में मेरे भाई-जनो, ख्लोए के घरबार-वालों ने मुझे यह बताया है, कि तुम्हारे बीच विसम्मितियाँ हैं।
१२ अब मैं यह कहता हूँ, कि तुम में से प्रत्येक कहता है, मैं तो भई पौलुस का हूँ; और मैं अपुल्लोस का; और मैं कैफा का; और मैं तो मसीहा का हूँ।
१३ क्या मसीहा विभाजित हैं? क्या पौलुस तुम्हारे लिए क्रूस पर चढ़ाया गया था क्या? या क्या तुम्हारा बपतिस्मा पौलुस के नाम में हुआ था क्या?
१४ मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मैंने तुम में से किसी का भी बपतिस्मा नहीं किया, सिवाय क्रिसपुस और गायुस के;
१५ कहिं कोई भी कहे कि मैंने अपने स्वयं के ही नाम में बपतिस्मा किया था।
१६ और मैंने स्तिफनास के घरबार का भी बपतिस्मा किया: इनके अतिरिक्त, मैं नहीं जानता कि मैंने किसी और का भी बपतिस्मा किया हो।
१७ क्योंकि मसीहा ने मुझे बपतिस्मा करने के लिए नहीं, बल्कि शुभ-समाचार का प्रवचन देने के लिए भेजा है: शब्दों की विद्या संग नहीं, कहिं मसीहा का क्रूस प्रभावहीन बना दिया जाए।
१८ क्योंकि क्रूस का प्रवचन उनके लिए जिनका विनाश होता है, मूर्खता है; परन्तु हमारे लिए जो बचे हुए हैं वही ईश्वर की शक्ती है।
१९ क्योंकि यह लिखा हुआ है, मैं विद्वानों की विद्या को नष्ट कर दूँगा, और विवेकियों के विवेक को तुच्छ बना दूँगा।
२० तो भई कहाँ है वो विद्वान? कहाँ है वो लिपिक? कहाँ है वो इस संसार का विवादी? क्या ईश्वर ने इस संसार की विद्या को मूर्खता नहीं बना दिया है क्या?
२१ क्योंकि जब ईश्वर की विद्या में यह संसार विद्या द्वारा ईश्वर से ज्ञात नहीं हुआ, तो ईश्वर इस से प्रसन्न हुए कि प्रवचन देने की मूर्खता से वो उनका बचाव कर दें, जो विश्वास करते हैं।
२२ क्योंकि यहूदी तो किसी संकेत की माँग करते हैं, और यूनानी विद्या को ढूँढते फिरते हैं:
२३ परन्तु हम क्रूस पर चढ़े हुए मसीहा का प्रवचन देते हैं, यहूदियों के प्रति ठोकर खा जाने का एक पत्थर, और यूनानियों के प्रति मूर्खता;
२४ परन्तु उनके प्रति जो बुलाए हुए हैं, दोनो यहूदियों और यूनानियों के, मसीहा ही ईश्वर की शक्ती, और ईश्वर की विद्या।
२५ क्योंकि ईश्वर की मूर्खता मनुष्यों से अधिक विद्वान है; और ईश्वर की निर्बलता मनुष्यों से अधिक बलशाली है।
२६ क्योंकि तुम अपना बुलावा देख रहे हो भाई-जनो, कि कैसे शारीरिकता के पीछे लगे हुए कई विद्वान लोग नहीं, न ही कई बलशाली, न ही कई कुलीन बुलाए हुए हैं:
२७ बल्कि ईश्वर ने विद्वानों को लज्जित करने हेतु संसार की मूर्ख वस्तुओं को चुन लिया है; और ईश्वर ने संसार की निर्बल वस्तुओं को बलशाली वस्तुओं को लज्जित करने हेतु चुन लिया है;
२८ और संसार की तुच्छ वस्तुओं को, और तिरस्कृत वस्तुओं को ईश्वर ने चुन लिया है, हाँ भई, और उन वस्तुओं को जो नहीं हैं, उन वस्तुओं को नहीं बना देने के लिए जो हैं:
२९ ताकि कोई भी शरीर उनकी उपस्थिति में गर्व न मनाए।
३० बल्कि उन्हीं के ही तुम मसीहा यीशु में हो, जो ईश्वर के ही, हमारे प्रति विद्या, और नेकी, और पुनीतता, और मुक्तिभुक्तान बने हुए हैं:
३१ ताकि, जिस अनुसार यह लिखित है, वो जो गर्व मनाता है, उसे प्रभु में ही गर्व मनाने दो।
दूसरा अध्याय।
१ और मैं, भाई-जनो, जब मैं तुम्हारे पास आया, मैं वक्तृता की या विद्या की श्रेष्ठता लिए तुम्हें ईश्वर के साक्ष्य की घोषणा करता हुआ नहीं आया था।
२ क्योंकि मैंने निश्चय किया कि मैं तुम्हारे बीच किसी भी अन्य बात का ज्ञान न रखूँ, सिवाय यीशु मसीह के, और वो क्रूस पर चढ़े हुए।
३ और मैं तुम्हारे साथ दुर्बलता, और भय, और अत्यन्त कम्पन में था।
४ और मेरी वक्तृता और मेरा प्रवचन मनुष्य की विद्या के मोहक शब्दों के साथ नहीं थे, बल्कि प्राण और शक्ती के प्रदर्शन में थे:
५ ताकि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों की विद्या में नहीं, बल्कि ईश्वर की शक्ती में खड़ा रहे।
६ तथापि हम उनके बीच विद्वता बोलते हैं जो परिपूर्ण हैं: तब भी इस संसार की विद्या नहीं, न ही इस संसार के शासकों की, जो शून्य बन जाते हैं:
७ बल्कि हम ईश्वर की विद्या एक रहस्य में बोलते हैं, वही गुप्त विद्या, जिसे ईश्वर ने हमारी महिमा के प्रति इस संसार से पूर्व विहित-नियुक्त कर दी थी:
८ जिसका ज्ञान इस संसार के शासकों में से किसी के पास भी न था: चूँकि यदि वो उस से परिचित हुए होते, तो उन्होंने महिमा के प्रभु को क्रूस पर न चढ़ाया होता।
९ परन्तु जैसा कि यह लिखा गया है, आँख ने न देखा, न ही कान ने सुना, न ही मनुष्य के हृदय में समाई वो बातें, जो ईश्वर ने उनसे प्रेम करने वालों के लिए तैयार कर दी हैं।
१० परन्तु ईश्वर ने उन्हें हमें अपने प्राण द्वारा प्रत्यक्ष करवा दिया है: क्योंकि वो प्राण सभी बातों की खोज-बीन करते हैं, हाँ भई, ईश्वर की गहरी गूढ़ता की भी।
११ अतः कौन सा मनुष्य, मनुष्य ही की बातों से परिचित है, सिवाय वो मनुष्य का प्राण जो उस में है? इसी प्रकार ईश्वर की बातों से कोई भी मनुष्य परिचित नहीं है, बल्कि ईश्वर का प्राण।
१२ अब हमने संसार के प्राण को ग्रहण नहीं किया है, बल्कि उन प्राण को जो ईश्वर के हैं; ताकि हम उन बातों को जान सकें जो हमें ईश्वर द्वारा निशुल्क प्रदान हैं।
१३ जो बातें हम बोलते भी हैं, उन शब्दों में नहीं जो मनुष्य की विद्या सिखाती है, बल्कि जो पवित्र-प्राण सिखाते हैं; आध्यात्मिक बातों की तुलना आध्यात्मिकता से करते हुए।
१४ परन्तु वो पाशविक व्यक्ति ईश्वर के प्राण की बातें ग्रहण नहीं करता है: क्योंकि वो उसके लिए मूर्खता हैं: न ही वो उन्हें जान सकता है, क्योंकि वो आध्यात्मिकता द्वारा ही पहचानी जाती हैं।
१५ परन्तु वो जो आध्यात्मिक है सभी बातें आँकता है, तथापि वो स्वयं किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं आँका जाता है।
१६ क्योंकि किसने परिचिय रखा है प्रभु के मन से, कि वो उन्हें निर्देश दे? परन्तु हमारे पास तो मसीहा का मन है।
तीसरा अध्याय।
१ और मैं भाई-जनो, तुम्हारे साथ आध्यात्मिकता-वालों के समान नहीं बोल सकता था, बल्कि मानो शारीरिकता-वालों से, ऐसे मान लो कि मसीहा में शिशुओं के साथ ही।
२ मैंने तुम्हारा पोषण दूध के साथ किया है, न कि भोजन के साथ: क्योंकि तब तक भी तुम सक्षम नहीं थे, न ही तुम अब तक भी सक्षम हो।
३ क्योंकि तुम अभी तक भी शारीरिकता में ही हो: अब चूँकी तुम्हारे बीच ईर्षा में जलना, और विग्रह, और विभाजन प्रस्तुत हैं, क्या तुम शारीरिक नहीं हो, मनुष्यों समान चलते हुए?
४ क्योंकि एक कहता है, मैं तो भई पौलुस का हूँ; और दूसरा, मैं अपुल्लोस का; तो क्या तुम शारीरिक नहीं हो क्या?
५ अतः पौलुस कौन है, और अपुल्लोस कौन है, बल्कि सेवक ही, जिनके द्वारा तुमने विश्वास किया, जिस प्रकार प्रभु ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रदान किए?
६ मैंने रोपा है, अपुल्लोस ने सींचा है, परन्तु ईश्वर ने वृद्धी प्रदान की है।
७ तो फिर न ही वो रोपने वाला कुछ भी है, न ही वो सींचने वाला; बल्कि ईश्वर ही जो वृद्धी प्रदान करते हैं।
८ अब वो जो रोपता है और वो जो सींचता है, एक ही हैं: और प्रत्येक व्यक्ति अपना वेतन अपने ही श्रमानुसार ग्रहण करेगा।
९ क्योंकि हम ईश्वर के साथ सम्मिलित श्रमिक हैं: तुम ईश्वर की कृषि हो, तुम ईश्वर की इमारत हो।
१० ईश्वर की कृपानुसार जो मुझे प्रदान की गई है, एक विद्वान विशारद-राजगीर के समान, मैंने नीव डाली है, और कोई अन्य उस पर निर्माण करता है। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति ध्यान दे ले कि वो उस पर कैसे निर्माण कर रहा है।
११ क्योंकि कोई अन्य नीव कोई भी व्यक्ति नहीं डाल सकता है, अपेक्षाकृत जो डाल दी जा चुकी है, जो यीशु मसीह हैं।
१२ अब यदि कोइ भी व्यक्ति इस नीव पर सोने का, चाँदी का, बहुमूल्य-पत्थरों का, लकड़ी, भूसे, घास-फूस का निर्माण करता है;
१३ तो प्रत्येक व्यक्ति का कार्य प्रत्यक्ष करवा दिया जाएगा: क्योंकि वो दिवस इसे घोषित करवा देगा, क्योंकि वो अग्नि द्वारा प्रत्यक्ष करवा दिया जाएगा; और वो अग्नि प्रत्येक व्यक्ति के कार्य को परखेगी कि वो किस प्रकार का है।
१४ यदि किसी भी व्यक्ति का कार्य बना रहता है, जिसका उसने उस पर निर्माण किया है, तो वो फल प्राप्त कर लेगा।
१५ यदि किसी भी व्यक्ति का कार्य भस्म हो जाता है, तो वो निष्फल रह जाएगा: परन्तु उसके स्वयं का बचाव हो जाएगा: मानो कि अग्नि में से पार जा कर ही!
१६ भई तुम यह जानते नहीं हो क्या कि तुम ईश्वर का मन्दिर हो, और कि ईश्वर के प्राण तुम में वास करते हैं?
१७ यदि कोई भी व्यक्ति ईश्वर के मन्दिर को दूषित करता है, तो उसे ईश्वर नष्ट कर डालेंगे; क्योंकि ईश्वर का मन्दिर पवित्र है, जो मन्दिर तुम हो।
१८ कोई भी व्यक्ति स्वयं को धोखा न दे। यदि तुम्हारे बीच कोई भी व्यक्ति इस संसार में विद्वान प्रतीत हो रहा है, तो उसे मूर्ख बन जाने दो, ताकि वो विद्वान बन सके।
१९ क्योंकि इस संसार की विद्या ईश्वर के साथ मूर्खता है। क्योंकि यह लिखा गया है, वो तो विद्वानों को उन्हीं की कपटता में ही पकड़ लेते हैं।
२० और पुनः, प्रभु विद्वानो के विचारों से परिचित हैं, कि वो व्यर्थ हैं।
२१ इसलिए कोई भी मनुष्य, मनुष्यों में गर्व न मनाए। चूँकि सभी वस्तुएँ तुम्हारी ही हैं;
२२ चाहे पौलुस, या अपुल्लोस, या कैफा, या संसार, या जीवन, या मरण, या बातें वर्तमान की, या बातें भविष्य की; सभी कुछ तुम्हारा ही है;
२३ और तुम मसीहा के हो; और मसीहा ईश्वर के हैं।
चौथा अध्याय।
१ लोग हमारी गिनती मसीहा के सेवकों, और ईश्वर के रहस्यों के प्रबन्धकों के समान कर लें।
२ इसके अतिरिक्त प्रबन्धकों के लिए ये आवश्यक है, कि वो व्यक्ति विश्वसनीय पाया जाए।
३ परन्तु मेरे लिए ये बात बहुत ही तुच्छ है कि मैं तुम्हारे द्वारा, या फिर मनुष्य के न्याय-निर्धारण द्वारा आँका जाऊँ: हाँ भई, मैं तो अपने स्वयं को ही नहीं आँकता।
४ चूँकि मैं तो अपने समबन्ध में कुछ भी नहीं जानता; तथापि अभी तक मैं न्यायी प्रमाणित नहीं हुआ हूँ: परन्तु वो जो मेरा न्याय करते हैं, प्रभु ही हैं।
५ इसलिए उस समय से पूर्व कुछ भी मत आँको, जब तक प्रभु आ जाते हैं, जो अन्धकार की गुप्त बातों को प्रकाशित कर देंगे, और हृदयों के परामर्शों को प्रत्यक्ष कर देंगे: और तब प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर से प्रशन्सा प्राप्त कर लेगा।
६ और भाई-जनो, यही बातें मैंने तुम्हारे वास्ते एक दृष्टान्त स्वरूप अपने स्वयं पर, और अपुल्लोस पर लागू कर दी हैं; ताकि तुम हम में यह सीख सको कि व्यक्तियों के विषय में, जो भी लिखा गया है उस से अधिक बढ़-चढ़ कर मत सोचो, ताकि तुम में से कोई भी एक दूसरे के विरुद्ध अपनी छाती न फुला बैठे।
७ क्योंकि कौन तुम्हें किसी अन्य से भिन्न बना रहा है भई? और वो क्या है तुम्हारे पास जो तुमने ग्रहण नहीं किया है? अब यदि तुमने उसे ग्रहण कर लिया है, तो भई फिर तुम डींगे क्यों मार रहे हो, मानो कि तुमने उसे ग्रहण ही न किया हो?
८ अब तुम भरपूर हो, अब तुम धनवान हो, तुमने हमारे बिना राजाओं के समान राज किया है: और हाँ भई मैं चाहता हूँ कि तुम राज करो, ताकि हम भी तुम्हारे साथ राज कर लें।
९ क्योंकि मैं तो ये सोचता हूँ कि ईश्वर ने हम अपौस्लों को सब से पीछे रख छोड़ा है, मानो कि मृत्यु के लिए ही नियुक्त: क्योंकि हम तो संसार, और दूतों, और लोगों के प्रति एक नाट्य-लीला बना दिए गए हैं।
१० हम तो मसीहा के वास्ते मूर्ख हैं, परन्तु तुम मसीहा में विद्वान हो; हम तो निर्बल हैं, परन्तु तुम बलवन्त हो; तुम आदरणीय हो, परन्तु हम निरादरणीय हैं।
११ यहाँ तक कि इसी वर्तमान घड़ी तक भी हम भूखे, और प्यासे, और निर्वस्त्र हैं, और हम घूँसे खाते हैं, और हमारे पास कोई भी निश्चित बसेरा नहीं है;
१२ और अपने स्वयं के ही हाथों से काम करते हुए, हम श्रम करते हैं: गाली खाते हुए, हम आशीष देते हैं; अत्याचारित होते हुए, हम उसे झेलते हैं:
१३ मानहानित हो, हम अनुरोध करते हैं: संसार के मैल जैसे बना दिए गए हैं हम, और इस दिन तक सभी वस्तुओं की खुरचन हैं हम।
१४ मैं ये बातें तुम्हें लज्जित करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि अपने अतिप्रीय बेटों समान मैं तुम्हें चेतावनी दे रहा हूँ।
१५ यद्यपि भले ही तुम्हारे पास मसीहा में दस हज़ार शिक्षक हैं, तद्यपि तुम्हारे पास कई पिता नहीं हैं: चूँकि मसीहा यीशु में, शुभ-समाचार के ही द्वारा मैंने तुम्हें जनना है।
१६ इसी कारण वश मैं तुमसे विनती कर रहा हूँ कि तुम मेरे अनुयायी बन जाओ।
१७ इसी कारण वश मैंने तुम्हारे पास तिमोथेयस को भेज दिया है, जो मेरा अतिप्रीय पुत्र, और प्रभु में भरोसेमन्द है, जो तुम्हें मसीहा में मेरे पथों को स्मरण में लाएगा, जिस प्रकार मैं प्रत्येक स्थान में प्रत्येक कलिसिए में सिखाता हूँ।
१८ अब कुछ हैं जो अपनी छातियाँ फुलाए बैठे हैं, मानो कि मैं तुम्हारे पास आऊँगा ही नहीं।
१९ परन्तु यदि प्रभु चाहें, मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगा, और मैं जान जाऊँगा, उनकी वक्तृता नहीं जो अपनी छातियाँ फुलाए बैठे हैं, बल्कि शक्ती।
२० क्योंकि ईश्वर का राज्य शब्दावली में नहीं, बल्कि शक्ती में है।
२१ तो क्या है तुम्हारी इच्छा? क्या मैं तुम्हारे पास छड़ी लिए आऊँ, या फिर स्नेह में, और विनय के प्राण में?
पाँचवाँ अध्याय।
१ सामान्यतः इस विषय में चर्चा है कि तुम्हारे बीच अविवाहित-यौन प्रचलित है, और ऐसा अविवाहित-यौन जो अन्यप्रजातियों के बीच भी नहीं पाया जाता है, कि कोई अपने पिता की पत्नी ले ले।
२ और तुम अपनी छातियाँ फुलाए बैठे हो, और अपेक्षाकृत तुम ने शोक नहीं मनाया, कि उसने जिसने यह कार्य किया है तुम्हारे बीच में से हटा दिया जाए।
३ चूँकि सच में, मैंने शरीर में अनुपस्थित परन्तु प्राण में उपस्थित होते हुए, पहले से ही न्याय निर्धारित कर दिया है, मानो कि मैं उपस्थित था, उसी के समबन्ध में जिस ने यह कार्य इस प्रकार कर डाला है,
४ हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में, जब तुम और मेरा प्राण एक साथ इकट्ठा एकत्रित हों, हमारे प्रभु यीशु मसीह की शक्ती से युक्त,
५ तो ऐसे को शरीर के विनाश हेतु शैतान को प्रदान कर देना, ताकि प्राण का प्रभु यीशु के दिवस में बचाव हो जाए।
६ तुम्हारा डींगे मारना अच्छा नहीं है। तुम यह जानते नहीं हो क्या कि थोड़ा सा ही खमीर पूरे पेढ़े को खमीरदार बना देता है?
७ पुराने खमीर का इसलिए शुद्धीकरण कर डालो, ताकि तुम आटे का एक नवीन पेढ़ा बन सको, जैसे कि तुम बेख़मीर हो। क्योंकि मसीहा हमारा पार-करना ही, हमारे लिए बलि चढ़ा दिए जा चुके हैं:
८ इसलिए हमें वो भोज पुराने खमीर के साथ नहीं, न ही द्वेषता और दुष्टता के खमीर के साथ रखना चाहिए; बल्कि नेकनीयती और सत्य की बेख़मीरी रोटी के साथ।
९ मैंने तुम्हें एक पत्र में लिखा था कि अविवाहित-यौन करने वालों के साथ साहचर्य मत रखो:
१० तथापि ऐसा नहीं कि इस संसार के अविवाहित-यौन करने वालों के साथ ही, या लोलुप लोगों के साथ, या बलादग्रहण कर्ताओं के साथ, या मूर्तिपूजकों के साथ; क्योंकि फिर तो तुम्हें अवश्य ही इस संसार में से बाहर निकल आना होगा।
११ परन्तु अब मैंने तुम्हें लिख दिया है कि उसके साथ साहचर्य मत रखो, यदि कोई भी भाई कहलाए जाने वाला व्यक्ति, अविवाहित-यौन कर्ता हो, या लोलुप हो, या मूर्तिपूजक हो, या झूठी निंदा करने वाला हो, या मदिराखोर हो, या बलादग्रहण करने वाला हो, ऐसे किसी के भी साथ भोजन तक भी मत करना।
१२ क्योंकि वो जो बाहर हैं, उनका भी न्याय करने से मुझे क्या लेना-देना भई? क्या तुम उनका जो भीतर हैं न्याय नहीं करते हो क्या?
१३ परन्तु वो जो बाहर हैं, ईश्वर उनका न्याय करते हैं। इसलिए अपने स्वयं के बीच में से उस दुष्ट व्यक्ति को परे हटा दो।
छटा अध्याय।
१ क्या तुम में से कोई भी किसी दूसरे के विरुद्ध, किसी भी बात के न्यायनिर्धारण हेतु, सन्तों के बजाय अन्यायीयों के पास जाने का साहस करता है क्या?
२ क्या तुम यह जानते नहीं हो कि सन्त संसार का न्यायनिर्धारण करेंगे? और यदि संसार का तुम्हारे द्वारा न्यायनिर्धारण होगा, तो क्या तुम सब से तुच्छ विवादों का न्याय करने के अयोग्य हो क्या?
३ क्या तुम नहीं जानते कि हम दूतों का न्यायनिर्धारण करेंगे? तो फिर कितनी अधिकता से उन बातों का जो इस जीवन से सम्बंधित हैं?
४ अतः यदि इस जीवन से सम्बंधित बातों का तुम्हें न्याय करना है, तो उन्हें न्याय करने के लिए बिठा दो जो कलिसिए में न्यूनतम मान्यता रखते हैं।
५ तुम्हें लज्जित करने के लिए मैं यह बोल रहा हूँ। क्या ऐसा है, कि तुम्हारे बीच एक भी विद्वान व्यक्ति नहीं है क्या? न जी न, एक भी नहीं जो अपने भाई-जनो के बीच न्याय करने में सक्षम हो?
६ बल्कि भाई भाई के विरुद्ध न्याय के लिए जा रहा है, और वो भी अविश्वासियों के सम्मुख।
७ अब इसलिए निश्च्य से ही तुम्हारे बीच एक दोष है, क्योंकि तुम एक दूसरे के विरुद्ध न्याय की ओर चल देते हो। अपेक्षाकृत तुम हानी क्यों नहीं भुगत लेते हो भई? अपेक्षाकृत तुम स्वयं का ठगा जाना क्यों नहीं भुगत लेते हो?
८ न जी न, तुम तो हानी पहुँचाते हो, और ठगते हो, अपने ही भाई जनो को।
९ क्या तुम यह जानते नहीं हो कि अनैतिक लोग ईश्वर के राज्य को विरासत में नहीं लेंगे? धोखे में मत पड़ो: न ही अविवाहित-यौन करने वाले, न ही मूर्तिपूजक, न ही व्यभिचारक, न ही स्त्रैण, न ही स्वयं का मनुष्यता के साथ कुप्रयोग करने वाले,
१० न ही चोर, न ही लोलुप, न ही मदिराखोर, न ही झूठी निंदा करने वाले, न ही बलादग्रहण करने वाले, ईश्वर के राज्य को विरासत में लेंगे।
११ और ऐसे ही तुम में से कुछ थे: परन्तु तुम धुल चुके हो, परन्तु तुम पुनीत बन चुके हो, परन्तु तुम प्रभु यीशु के नाम में, और हमारे ईश्वर के प्राण द्वारा, न्यायी-प्रमाणित ठहर चुके हो।
१२ मेरे प्रति सभी बातें न्यायी हैं, परन्तु सभी बातें हितकर नहीं होतीं: मेरे लिए सभी बातें न्यायी हैं, परन्तु मैं किसी भी बात के प्रभुत्व के आधीन नहीं बनूँगा।
१३ भोजन पेट के लिए, और पेट भोजनों के लिए: परन्तु ईश्वर दोनो उसे और उन्हें नष्ट कर डालेंगे। अब शरीर अविवाहित-यौन के लिए नहीं है, बल्कि प्रभु के लिए; और प्रभु शरीर के लिए।
१४ और ईश्वर ने दोनो, प्रभु को ऊपर उठा भी दिया है, और वो हमें भी अपनी ही स्वयं की शक्ती द्वारा ऊपर उठा देंगे।
१५ क्या तुम जानते नहीं हो कि तुम्हारे शरीर मसीहा के अँग हैं? तो फिर क्या मैं मसीहा के अंगों को लेकर, उन्हें किसी वैश्या के अंग बना दूँ? कतई नहीं!
१६ क्या भई? तुम क्या जानते नहीं कि वो जो किसी वैश्या के साथ जुड़ा हुआ है एक ही शरीर होता है? इसलिए दो कहते हैं वो, एक ही माँस बन जाएँगे।
१७ परन्तु वो जो प्रभु के साथ जुड़ा हुआ है, वो एक ही प्राण है।
१८ अविवाहित-यौन से भाग-खड़े हो। प्रत्येक पाप जो भी व्यक्ति करता है शरीर से बाहर करता है; परन्तु वो जो अविवाहित-यौन करता है, अपने स्वयं के ही शरीर के विरुद्ध पाप करता है।
१९ क्या भई? क्या तुम जानते नहीं कि तुम्हारा शरीर पवित्र-प्राण का मन्दिर है जो तुम में हैं, जो तुम्हें ईश्वर से मिले हैं, और तुम अपने स्वयं के नहीं हो?
२० क्योंकि तुम एक मूल्य से ख़रीदे हुए हो: इसलिए ईश्वर का महिमामंडन अपने शरीर में, और अपने प्राण में करो, जो कि ईश्वर के हैं।
सातवाँ अध्याय।
१ अब उन बातों के समबन्ध में जिनके विषय में तुमने मुझे लिखा था: यह भला है कि पुरुष स्त्री को न छुए।
२ तथापि, अविवाहित-यौन से परिवर्जन रखने के लिए, प्रत्येक पुरुष को अपनी ही पत्नी रख लेने दो, और प्रत्येक स्त्री को अपना ही पति।
३ पति पत्नी के प्रति उदारता का ऋण प्रदान करे: और इसी प्रकार पत्नी पति के प्रति।
४ पत्नी का अपने स्वयं के शरीर पर अधिकार नहीं है, बल्कि पति का: और इसी प्रकार ही पति का अपने स्वयं के शरीर पर अधिकार नहीं है, बल्कि पत्नी का।
५ एक दूसरे को ठगो मत तुम, सिवाय कि वो सम्मति से कुछ ही समय के लिए हो, ताकि तुम स्वयं उपवास और प्रार्थना में अवकाश ले सको; और पुनः एक-संग आ जाओ, ताकि शैतान तुम्हारी संयमहीनता के कारण तुम्हें प्रलोभित न कर दे।
६ परन्तु मैं यह अनुमति द्वारा बोल रहा हूँ, और न कि आदेश द्वारा।
७ क्योंकि मेरी यह इच्छा है कि सभी पुरुष ऐसे ही हों जैसा कि मैं हूँ। परन्तु प्रत्येक पुरुष के पास ईश्वर द्वारा अपनी यथोचित प्रतिभा है, एक के पास इस प्रकार की, और दूसरे के पास उस प्रकार की।
८ इसलिए मैं अविवाहितों और विधवाओं से कहता हूँ, कि यह उनके लिए भला है कि वो मेरे समान ही रहें।
९ परन्तु यदि वो संयम नहीं रख सकते, तो उन्हें विवाह कर लेने दो: क्योंकि विवाह कर लेना जलते रहने से बेहतर है।
१० और विवाहितों को मैं यह आदेश देता हूँ, मैं नहीं बल्कि प्रभु, पत्नी को अपने पति से अलग मत हो जाने दो:
११ परन्तु और यदि वो अलग हो जाती है, तो उसे अविवाहित ही रहने दो, या वो अपने पति से सामंजस्य स्थापित कर ले: और पति को अपनी पत्नी का त्याग मत करने दो।
१२ परन्तु शेष लोगों से प्रभु नहीं, बल्कि मैं कहता हूँ: यदि किसी भी भाई की पत्नी अविश्वासी हो, और वो उसके साथ वास करने में प्रसन्न है, तो उस पति को उसका त्याग मत करने दो।
१३ और वो स्त्री जिसका पति अविश्वासी है, और यदि वो उसके साथ वास करने में प्रसन्न हो, तो उस पत्नी को उसे मत छोड़ने दो।
१४ क्योंकि वो अविश्वासी पति पत्नी द्वारा पुनीत हो जाता है, और वो अविश्वासी पत्नी पति द्वारा पुनीत हो जाती है: अन्यथा तुम्हारी सन्तानें अस्वच्छ थीं; परन्तु अब वो पवित्र हैं।
१५ परन्तु यदि वो अविश्वासी चला जाता है, तो उसे चले जाने दो। एक भाई या बहन इन स्तिथियों में बन्धे हुए नहीं हैं: परन्तु ईश्वर ने हमें शान्ति के प्रति बुलाया हुआ है।
१६ क्योंकि क्या जानती हो तुम ओ पत्नी, क्या तुम अपने पति को बचा लोगी? या ओ पुरुष, कैसे जान सकते हो तुम कि यदि तुम अपनी पत्नी को बचा लोगे?
१७ परन्तु जिस प्रकार ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति को वितरण कर दिया है, जिस प्रकार प्रभु ने प्रत्येक को बुलाया हुआ है, उसी प्रकार उसे चल लेने दो। और इस प्रकार मैं सभी कलिसियों में विहित-नियुक्त करता हूँ।
१८ क्या कोई पुरुष ख़तनित बुला लिया गया है? तो उसे बेख़तनित मत बनने दो। क्या कोई बेख़तनित बुला लिया गया है? तो उसे ख़तनित मत बन जाने दो।
१९ ख़तना कुछ भी नहीं है, और बेख़तना कुछ भी नहीं है, बल्कि ईश्वर के आदेशों का पालन करना।
२० प्रत्येक व्यक्ति को उसी बुलावे में रहने दो जिस में उसे बुला लिया गया था।
२१ क्या तुम दास होते हुए बुलाए गए हो? चिंता मत करो इसकी: परन्तु यदि तुम दासत्व-मुक्त बन सको, अपेक्षाकृत उसका प्रयोग करो।
२२ क्योंकि वो जो एक दास होता हुआ, प्रभु में बुलाया गया है, वो प्रभु का दासमुक्त है: इसी प्रकार भी वो जो दासमुक्ति में बुलाया गया है, वही मसीहा का दास है।
२३ तुम एक मूल्य से ख़रीदे हुए हो; तुम लोगों के दास मत बनो।
२४ भाई-जनो, प्रत्येक व्यक्ति को जिस भी स्थिति में बुलाया गया है, उसी में ईश्वर के साथ रहने दो।
२५ अब कुँवारों के समबन्ध में मेरे पास प्रभु द्वारा कोई आदेश नहीं है: तथापि मैं अपना न्याय देता हूँ, उस एक के प्रकार जिसने प्रभु द्वारा विश्वसनीय होने की दया प्राप्त की है।
२६ इसलिए मेरा यह अनुमान है कि यह भला है इस वर्तमान के कष्ट के कारण, मैं कहता हूँ, कि एक पुरुष के लिए यही स्तिथि अच्छी है।
२७ क्या तुम एक पत्नी के साथ बंधे हुए हो? बंधनमुक्ति मत ढूँढो। क्या तुम पत्नी से बंधनमुक्त हो? पत्नी मत ढूँढो।
२८ परन्तु और यदि तुम विवाह करते हो, तुमने पाप नहीं किया है; और यदि एक कुँवारी विवाह करती है, उसने पाप नहीं किया है। तथापि इन्हें शरीर में कष्ट होंगे: लेकिन मैं तुम्हें बक्शता हूँ।
२९ परन्तु भाई-जनो यह मैं कहता हूँ, कि समय कम है: इसलिए दोनो वो जिनके पास पत्नियाँ हैं, ऐसे हों मानो कि वो पत्नीहीन ही हों;
३० और वो जो रो रहे हैं, मानो कि वो रोए ही न हों; और वो जो आनंद मना रहे हैं, मानो कि वो आनन्दहीन हों; और वो जो ख़रीदते हैं, मानो कि वो प्राप्तिहीन हों;
३१ और वो जो इस संसार का प्रयोग करते हैं, जैसे कि उसका दुरुपयोग न करते हुए: क्योंकि इस संसार का भूषाचार गुज़रता चला जा रहा है।
३२ परन्तु मेरी यह इच्छा है कि तुम निश्चिंत रहो। वो जो अविवाहित है, उन विषयों की चिंता करता है जो प्रभु के हैं, कि वो प्रभु को कैसे प्रसन्न कर सके:
३३ परन्तु वो जो विवाहित है, वो संसार के विषयों की चिंता करता है, कि वो अपनी पत्नी को कैसे प्रसन्न कर सके।
३४ एक पत्नी और एक कुँवारी के बीच एक अन्तर भी है। वो अविवाहित स्त्री प्रभु के विषयों की चिंता करती है, कि वो दोनो शरीर और प्राण में पवित्र बन सके: परन्तु वो जो विवाहित है, वो संसार के विषयों की चिंता करती है, कि वो अपने पति को कैसे प्रसन्न कर सके।
३५ और यह मैं तुम्हारे अपने ही कल्याण के लिए कह रहा हूँ; न कि मैं तुम पर कोई फंदा डाल रहा हूँ, बल्कि उसके लिए जो सम्मान-योग्य है, और कि तुम विकर्षण-हीनता से प्रभु की भक्ति में लीन रहो।
३६ परन्तु यदि कोई भी पुरुष यह सोचता है कि यह उसकी कुँवारी के लिए अपमान-जनक है, कि वो तो सयानी हो चुकी है, और उसकी यही इच्छा है, तो उसे अपनी ही इच्छानुसार कर लेने दो, वो पाप नहीं कर रहा है: उन्हें विवाह कर लेने दो।
३७ तथापि वो जो अपने हृदय में अविचल खड़ा है, अनावश्यकता के साथ, बल्कि उसे अपनी ही स्वेच्छा पर प्रभुत्व है, और इस प्रकार उसने अपने हृदय में आज्ञप्ति दे दी है कि वो अपनी कुँवारी को रखे रहेगा, तो वो भला करता है।
३८ अतः वो जो उसे विवाह में देता है भला करता है: परन्तु वो जो उसे विवाह में नहीं देता है, अच्छा-भला करता है।
३९ पत्नी नियम से बन्धी हुई है जब तक उसका पति जीवित है; परन्तु यदि उसके पति की मृत्यु हो जाती है, तो वो स्वतंत्र है जिस किसी से भी वो विवाह करना चाहे; केवल प्रभु में ही।
४० परन्तु वो अधिक सुखी रहेगी, यदि वो मेरे न्यायनिर्धारण के अनुसार ही रहे: और मेरा यह सोचना भी है कि मेरे पास ईश्वर के प्राण हैं।
आठवाँ अध्याय।
१ अब उन वस्तुओं के विषय में जो मूर्तियों पर चढ़ाई जाती हैं, हमें जानकारी है कि हम सभी के पास ज्ञान है। ज्ञान छाती फूलवाता है, परन्तु प्रेम आध्यात्मिक-निर्माण करवाता है।
२ और यदि कोई भी यह सोचता है कि वो कुछ भी जानता है, वो अभी तक कुछ भी नहीं जानता है, जैसा कि उसे जानना चाहिए।
३ परन्तु यदि कोई भी ईश्वर से प्रेम करता है, वही उनका जाना हुआ होता है।
४ इसलिए मूर्तियों को बलि में चढ़ाई जाने वाली वस्तुओं के खाने के समबन्ध में, हमें यह ज्ञान है कि एक मूर्ति इस संसार में कुछ भी नहीं है, और कि कोई अन्य ईश्वर नहीं हैं सिवाय एक के।
५ क्योंकि भले ही चाहे स्वर्ग में, या पृथ्वी में वो हों जो ईश्वर पुकारे जाते हों (जैसे ईश्वर कई हैं, और प्रभु कई हैं,)
६ परन्तु हमारे केवल एक ही ईश्वर हैं, पिताश्री ही जिन की सभी वस्तुएँ हैं, और हम उन्हीं में; और एक ही प्रभु यीशु मसीह, जिनके द्वारा सभी वस्तुएँ हैं, और हम उन्हीं के द्वारा ही।
७ यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति में वो ज्ञान नहीं है: क्योंकि कुछ इस घड़ी तक भी उस मूर्ति की चेतना रखते हुए उसे खा लेते हैं जैसे कि वो वस्तु मूर्ति पर ही चढ़ाई गई हो; और उनकी चेतना दुर्बल होती हुई दूषित हो जाती है।
८ परन्तु भोजन हमें ईश्वर के समीप नहीं ले जाता है: चूँकि न ही यदि हम खाएँ, तो हम बेहतर बनते हैं; न ही यदि हम न खाएँ, तो हम भत्तर बनते हैं।
९ परन्तु ध्यान रखो कहिं किसी भी प्रकार से तुम्हारी यह स्वतंत्रता उनके प्रति जो दुर्बल हैं एक ठोकर खा जाने का पत्थर न बन जाए।
१० क्योंकि यदि कोई भी व्यक्ति तुम ज्ञानी को मूर्ति के मन्दिर में भोजन के लिए बैठे देखता है, तो क्या उसकी चेतना जो दुर्बल है, प्रोत्साहित नहीं हो जाएगी उन वस्तुओं को खाने के लिए जो मूर्तियों पर चढ़ाई जाती हैं;
११ और तुम्हारे ज्ञान द्वारा वो दुर्बल भाई नष्ट हो जाएगा, जिसके लिए मसीहा मरे थे?
१२ परन्तु जब तुम इस प्रकार भाई-जनो के विरुद्ध पाप करते हो, और उनकी दुर्बल चेतना को घायल करते हो, तुम मसीहा के विरुद्ध पाप करते हो।
१३ इस कारण, यदि भोजन मेरे भाई को अवरोधित करता है, तो मैं इस संसार के खड़े रहते-रहते कोई भी माँस नहीं खाऊँगा, कहिं मैं अपने भाई को अवरोधित न कर दूँ।
नौवाँ अध्याय।
१ क्या मैं एक अपौस्ल नहीं हूँ? क्या मैं स्वतंत्र नहीं हूँ? क्या मैंने यीशु मसीह हमारे प्रभु को देखा नहीं है क्या? क्या तुम प्रभु में मेरा श्रम नहीं हो क्या?
२ यदि मैं औरों के प्रति अपौस्ल न हूँ, तथापि निस्संदेह मैं तुम्हारे प्रति तो हूँ: क्योंकि तुम प्रभु में मेरे अपौस्लत्व की मुहरबन्दी हो।
३ वो जो मेरी जाँच कर रहे हैं मेरा उत्तर उनके लिए यह है,
४ क्या हमारे पास खाने-पीने की शक्ती नहीं है क्या?
५ क्या अन्य अपौस्लों, और प्रभु के भाई-जनो, और कैफा के समान, क्या हमारे पास शक्ती नहीं है कि हम भी एक बहन को पत्नी बनाकर उसे लिए चलें?
६ या केवल मैं ही और बरनबास, क्या हमारे पास शक्ती नहीं है कि हम काम करना विरत कर दें?
७ कौन किसी भी समय अपने ही ख़र्चों पर युद्ध करने जाता है? कौन अंगूर-खेत रोपता है, और उसका फल नहीं खाता? अथवा कौन झुण्ड चराता है, और उस झुण्ड के दूध में से नहीं पीता?
८ तो क्या मैं यह बातें मनुष्य के रूप में बोल रहा हूँ? या क्या नीयम भी यही नहीं कह रहा है?
९ क्योंकि मूसा के नियम में यह लिखा हुआ है, तुम अनाज को दाँवनेवाले उस साँड का मूँह नहीं बाँधोगे। क्या ईश्वर सांडों की चिन्ता करते हैं?
१० या क्या वो पूर्णरूप से हमारे वास्ते ही यह कह रहे हैं? हमारे वास्ते ही निस्संदेह, यह लिखा गया है: ताकि वो जो जोते वो आशा में जोते; और वो जो आशा में दाँवना करता है, अपनी ही आशा का भागीदार हो।
११ यदि हमने तुम्हें आध्यात्मिक बातें बोई हैं, तो क्या यह कोई बहुत बड़ी बात है यदि हम तुम्हारी सांसारिक बातों की कटाई कर लें?
१२ यदि तुम पर अन्य लोग इस प्राधिकार के भागीदार हों, तो अपेक्षाकृत हम नहीं क्या? तथापि हमने इस प्राधिकार का प्रयोग नहीं किया है; बल्कि हम सभी बातें सहते हैं, कहिं हम मसीहा के शुभ-समाचार में विघ्न न डाल दें।
१३ तुम यह जानते नहीं हो क्या कि वो जो पवित्र वस्तुओं में सेवारत हैं मन्दिर की ही वस्तुओं से निर्वाह करते हैं? और वो जो बलिवेदी की परिचर्या में हैं वही बलिवेदी के साथ भागीदार हैं?
१४ इसी प्रकार प्रभु ने विहित-नियुक्त किया है कि वो जो शुभ-समाचार का प्रवचन देते हैं शुभ-समाचार के ही द्वारा निर्वाह करें।
१५ परन्तु मैंने इन में से किसी भी बातों का प्रयोग नहीं किया है: न ही मैंने यह बातें लिखी हैं, कि यह मेरे लिए इसी प्रकार किया जाना चाहिए: क्योंकि मेरे लिए मर जाना बेहतर होता, अपेक्षाकृत कि कोई व्यक्ति मेरे गर्व को अमान्य ठहराए।
१६ यद्यपि भले ही मैं शुभ-समाचार का प्रचार करता हूँ, मेरे पास गर्व करने के लिए कुछ भी नहीं है: क्योंकि मुझ पर आवश्यकता डाल दी गई है; हाँ भई, हाय पड़े मुझ पर, यदि मैं शुभ-समाचार का प्रवचन न दूँ!
१७ क्योंकि यदि मैं यह कार्य इच्छानुसार करूँ, मुझे वेतन मिलेगा: परन्तु यदि मेरी इच्छा विरुद्ध, शुभ-समाचार का प्रबन्धन मेरे सुपुर्द कर दिया गया है।
१८ तो फिर क्या है मेरा वेतन? कि जब मैं शुभ-समाचार का प्रवचन दूँ, मैं मसीहा के शुभ-समाचार को निशुल्क बना सकूँ, ताकि मैं शुभ-समाचार में अपनी शक्ती का कुप्रयोग न करूँ।
१९ यद्यपि भले ही मैं सभी लोगों से मुक्त हूँ, तद्यपि मैंने स्वयं को सभी के प्रति दास बना दिया है, ताकि मैं बहुतों को प्राप्त कर सकूँ।
२० और यहूदियों के प्रति मैं यहूदी जैसा बन गया, ताकि मैं यहूदियों को प्राप्त कर सकूँ; उनके प्रति जो नियम के आधीन हैं, जैसे कि नियम के आधीन, ताकि मैं उन्हें प्राप्त कर सकूँ जो नियम के आधीन हैं;
२१ उनके प्रति जो नियम-विहीन हैं, नियम-विहीन जैसा, (ईश्वर के प्रति नियम-विहीन न होता हुआ, बल्कि नियम के आधीन मसीहा के प्रति,) ताकि मैं उन्हें प्राप्त कर सकूँ जो नियम-विहीन हैं।
२२ निर्बल के प्रति मैं निर्बल जैसा बन गया, ताकि मैं निर्बलों को प्राप्त कर सकूँ: मैं सभी लोगों के प्रति सभी कुछ बना दिया गया हूँ, ताकि मैं सभी माध्यमों से कुछों को बचा सकूँ।
२३ और मैं यह शुभ-समाचार के वास्ते करता हूँ, ताकि मैं तुम्हारे साथ उस में भागीदार बन सकूँ।
२४ तुम क्या यह नहीं जानते कि दौड़ में जो भागते हैं, वो सभी दौड़ते हैं, परन्तु एक ही पुरस्कार प्राप्त करता है? तो भई इस प्रकार दौड़ो, ताकि तुम प्राप्त कर सको।
२५ और प्रत्येक प्रतियोगी सभी बातों में संयमित होता है। अब वो तो इसे एक नश्वर मुकुट की प्राप्ति के लिए करते हैं; परन्तु हम एक अनश्वर मुकुट के लिए।
२६ मैं इसलिए ऐसे दौड़ता हूँ, अनिश्चित्तता से नहीं; मैं ऐसे मुक्केबाज़ी करता हूँ, हवा को मारता हुआ नहीं;
२७ बल्कि मैं अपने शरीर को स्ववश में रखता हूँ, और उसे आधीन बनाता हूँ: कहिं किसी भी प्रकार से, जब मैंने औरों को प्रवचन दे दिया है, तो मैं स्वयं ही एक परित्यक्त न बन जाऊँ।
दसवाँ अध्याय।
१ इसके अतिरिक्त, भाई-जनो, मेरी यह इच्छा नहीं है कि तुम अनभिज्ञ रहो, कि कैसे हमारे सभी पित्र मेघ तले थे, और सभी समुद्र में से होते हुए गए थे;
२ और उन सभी का मूसा प्रति मेघ में और सागर में बपतिस्मा हुआ था;
३ और उन सभी ने वही आध्यात्मिक भोजन खाया;
४ और उन सभी ने वही आध्यात्मिक पेय पीया: क्योंकि उन्होंने उन आध्यात्मिक शिला से पीया जो उनके पीछे-पीछे चले थे; और वो शिला मसीहा थे।
५ परन्तु उन में से कईयों के साथ ईश्वर भले-प्रसन्न नहीं थे: क्योंकि उन्हें जँगली-क्षेत्र में बिखेर दिया गया था।
६ अब यह घटनाएँ हमारे लिए उदाहरण स्वरूप थीं, इस आशय से कि हम बुरी वस्तुओं के प्रति वासना न करें, जैसे कि उन्होंने भी वासना की थी।
७ न ही तुम मूर्तिपूजक बनो, जैसे उन में से कुछ थे; जैसा यह लिखा हुआ है, लोग खाने-पीने के लिए नीचे बैठ गए, और क्रीड़ा के लिए ऊपर उठ गए।
८ न ही हमें अविवाहित-यौन करना चाहिए, जैसा कि उन में से कुछों ने भी किया, और एक ही दिन में तेईस हज़ार गिर पड़े।
९ न ही हमें मसीहा को परखना चाहिए, जैसे उन में से कुछों ने भी परखा, और वो सर्पों द्वारा नष्ट हो गए।
१० न ही तुम बड़बड़ाओ, जैसे उन में से भी कुछ बड़बड़ाए, और वो विनाशक द्वारा नष्ट हो गए।
११ अब यह सभी बातें उनके साथ उदाहरण स्वरूप घटीं: और यह हमारी चेतावनी के लिए लिख दी गई हैं, जिन पर संसार के अन्त आ पड़े हैं।
१२ इसी कारण वो जो सोचता है कि वो खड़ा है, ध्यान रखे कहिं वो गिर न पड़े।
१३ तुम्हें ऐसे किसी भी प्रलोभन ने नहीं पकड़ा है, बल्कि वैसे ने जो मानवता के लिए सामान्य है: परन्तु ईश्वर विश्वसनीय हैं, जो तुम्हें तुम्हारी क्षमता से अधिक प्रलोभित नहीं होने देंगे; बल्कि वो प्रलोभन के साथ एक बच निकलने का पथ भी उद्यत कर देंगे, ताकि तुम उसे सहन कर सको।
१४ इसी कारण, मेरे अति प्रीयों, मूर्तिपूजा से भाग-खड़े हो।
१५ मैं विद्वान जैसों से बोल रहा हूँ; जो मैं कह रहा हूँ उसे आँक लो!
१६ वो आशीर्वाद का प्याला जिसे हम आशीष देते हैं, क्या वही मसीहा के रक्त का समन्वय नहीं है? वो रोटी जो हम तोड़ते हैं, क्या वही मसीहा के शरीर का समन्वय नहीं है क्या?
१७ क्योंकि हम कई होते हुए, एक ही रोटी हैं, और एक ही शरीर: क्योंकि हम सभी उन एक रोटी के ही भागीदार हैं।
१८ दैहिकता के पीछे पड़े इस्राएल को ही देख लो: क्या वो जो बलियों में से खाते हैं बलिवेदी के भागीदार नहीं हैं क्या?
१९ अतः भई क्या कहूँ मैं फिर? कि क्या वो मूर्ति कुछ भी महत्व रखती है, या फिर वो जो मूर्तियों को बलिदान में चढ़ाया जाता है, कुछ भी महत्व रखता है क्या?
२० परन्तु मैं कहता हूँ, कि वो वस्तुएँ जो अन्यप्रजातियाँ बलि चढ़ाते हैं, वो दानवों को बलियाँ चढ़ाते हैं, और ईश्वर को नहीं: और मेरी यह इच्छा नहीं है कि तुम दानवों के साथ साहचर्य रखो।
२१ तुम प्रभु के प्याले से, और दानवों के प्याले से नहीं पी सकते हो: तुम प्रभु की मेज़, और दानवों की मेज़ के भागीदार नहीं बन सकते हो।
२२ भई क्या हम प्रभु को ईर्षा करने हेतु उत्तेजित कर रहे हैं? क्या हम उन से अधिक शक्तिशाली हैं?
२३ सभी बातें मेरे लिए न्यायी हैं, परन्तु सभी बातें हितकर नहीं होतीं: सभी बातें मेरे लिए न्यायी हैं, परन्तु सभी बातें आध्यात्मिक-निर्माण नहीं करतीं।
२४ कोई भी व्यक्ति अपना ही लाभ न सोचे, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे का भला सोचे।
२५ जो कुछ भी कसाई के बाज़ार में बिकता है, उसे चेतना के वास्ते बिना कोई प्रश्न पूछे, खा लो:
२६ क्योंकि पृथ्वी प्रभु की है, और उसकी भरपूरता।
२७ यदि अविश्वासियों में से कोई भी तुम्हें किसी भोज पर आमंत्रित करता है, और तुम जाने की इच्छा रखते हो; तो जो कुछ भी तुम्हारे सामने रखा जाता है, उसे खा लो, चेतना के वास्ते बिना कोई प्रश्न पूछे।
२८ परन्तु यदि कोई भी व्यक्ति तुम से कहता है, भई ये तो मूर्तियों को बलि में चढ़ाया गया है, तो उसके वास्ते मत खाओ जिसने तुम्हें बताया है, और चेतना के वास्ते: क्योंकि पृथ्वी प्रभु की है, और उसकी भरपूरता:
२९ चेतना, मैं कहता हूँ, तुम्हारी अपनी नहीं, बल्कि उस दूसरे की: क्योंकि मेरी स्वतंत्रता किसी अन्य व्यक्ति की चेतना से क्यों आँकी जाए भई?
३० क्योंकि यदि मैं कृपा द्वारा भागीदार हूँ, तो मेरे विषय में उसके लिए बुरा क्यों बोला जा रहा है, जिसके लिए मैं धन्यवाद देता हूँ?
३१ इसलिए चाहे तुम खाते हो, या पीते हो, या फिर जो कुछ भी तुम करते हो, सभी ईश्वर की महिमा के लिए करो।
३२ किसी का भी अवरोध मत करो, न ही यहूदियों का, न ही अन्यप्रजातियों का, न ही ईश्वर के कलिसिए का:
३३ जिस प्रकार मैं सभी लोगों को सभी बातों में प्रसन्न करता हूँ, अपने स्वयं का भला न सोचता हुआ, बल्कि कईयों का लाभ, कि उनका बचाव हो जाए।
ग्यारहवाँ अध्याय।
१ तुम मेरे अनुयायी बन जाओ, जैसे कि मैं भी मसीहा का अनुयायी हूँ।
२ अब मैं तुम्हारी प्रशन्सा करता हूँ, भाई-जनो, कि तुम मेरा स्मरण सभी बातों में करते हो, और उन अध्यादेशों का पालन करते हो, जैसे मैंने तुम्हें प्रदान किए थे।
३ परन्तु मेरी यह इच्छा है, कि तुम यह ज्ञान रखो, कि प्रत्येक पुरुष का शीर्ष मसीहा हैं; और स्त्री का शीर्ष पुरुष है; और मसीहा का शीर्ष ईश्वर हैं।
४ प्रत्येक पुरुष अपना शीर्ष ढक कर प्रार्थना करता हुआ, या प्रेरित-उपदेश देता हुआ, अपने शीर्ष का अनादर करता है।
५ परन्तु प्रत्येक स्त्री जो अपना शीर्ष अनढक कर प्रार्थना करती है, या प्रेरित-उपदेश देती है, अपने शीर्ष का अनादर करती है: क्योंकि यह तो वैसा ही है कि मान लो उसके शीर्ष पर उस्तरा फिरा हुआ हो।
६ क्योंकि यदि स्त्री ढकी हुई न हो, तो उसके बाल कटे हुए ही रहने दो: परन्तु यदि किसी स्त्री के लिए बाल कटे होना, या उस्तरा फिरा होना, अपमानजनक हो, तो उसे ढका ही रहने दो भई।
७ क्योंकि निश्चितता से पुरुष को अपना शीर्ष ढकना नहीं चाहिए, चूँकी वो ईश्वर की प्रतिमा और महिमा है: परन्तु स्त्री पुरुष की महिमा है।
८ क्योंकि पुरुष स्त्री से नहीं है; बल्कि स्त्री पुरुष से है।
९ न ही पुरुष स्त्री के लिए सृजनाया गया था; बल्कि स्त्री पुरुष के लिए।
१० इसी कारण वश स्त्री को अपने शीर्ष पर दूतों के कारण शक्ती रखनी चाहिए।
११ तथापि प्रभु में, न तो पुरुष स्त्री के बिना है, न ही स्त्री पुरुष के बिना।
१२ क्योंकि जैसे स्त्री पुरुष से है, वैसे ही पुरुष भी तो स्त्री से ही है भई; परन्तु समस्त वस्तुएँ ईश्वर से।
१३ अपने स्वयं में आँको, क्या यह सम्मान-योग्य है कि कोई स्त्री अनढकी स्तिथि में ईश्वर से प्रार्थना करे?
१४ क्या स्वयं प्रकृति ही तुम्हें यह शिक्षा नहीं देती है, कि, यदि पुरुष के बाल लम्बे हों, तो ये उसके लिए लज्जा की बात है?
१५ परन्तु यदि स्त्री लम्बे बाल रखे, यही उसके लिए एक गौरव की बात है: क्योंकि उसके बाल उसे ढकने के लिए प्रदान किए गए हैं।
१६ परन्तु यदि कोई भी व्यक्ति विवादास्पद हो, हमारी ऐसी कोई प्रथा नहीं है, न ही ईश्वर के कलिसियों की।
१७ अब इस विषय में जिसे मैं तुम्हें बतला रहा हूँ, मैं तुम्हारी प्रशन्सा नहीं कर रहा हूँ, कि तुम एक साथ बेहतरी के लिए नहीं, बल्कि भत्तरी के लिए संघ्रहित होते हो।
१८ क्योंकि सर्व प्रथम, जब तुम कलिसिए में एक साथ संघ्रहित होते हो, मैं सुनता हूँ कि तुम्हारे बीच विभाजन हैं; और मैं कुछ हद तक इस बात पर विश्वास करता हूँ।
१९ क्योंकि तुम्हारे बीच पाषंड भी अवश्य होंगे, कि वो जो तुम्हारे बीच स्वीकृत हैं प्रत्यक्ष हो सकें।
२० इसलिए जब तुम एक साथ एक स्थान में संग्रहित होते हो, यह प्रभु-भोज के खाने के लिए नहीं है।
२१ क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से पहले ही अपना भोज खा लेता है: और कोई भूखा रह जाता है, और कोई अन्य नशे में चूर हो जाता है।
२२ क्या भई? तुम्हारे पास घर नहीं हैं खाने और पीने के लिए? या फिर तुम ईश्वर के कलिसिए का तिरस्कार करते हो, और उन्हें लज्जित करते हो जो निर्धन हैं? भई क्या कहूँ मैं तुम से? क्या मैं इस में तुम्हारी प्रशन्सा करूँ? मैं तुम्हारी प्रशन्सा नहीं कर रहा।
२३ क्योंकि मैंने प्रभु से वो ग्रहण किया है जो मैंने तुम्हें भी प्रदान कर दिया है, कि उसी रात्रि में, प्रभु यीशु ने रोटी ली थी, जिस में उनके साथ विश्वासघात कर दिया गया था:
२४ और जब उन्होंने धन्यवाद दे दिया था, तो उन्होंने उसे तोड़ा, और कहा, लो, खा लो: यही मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए तोड़ा गया है: यही मेरी स्मृति में करना।
२५ इसी रीतिनुसार भी उन्होंने वो प्याला लिया, जब यीशु ने भोज कर लिया था, कहते हुए, यह प्याला मेरे रक्त में नया अनुबन्ध है: मेरी स्मृति में तुम इसे करना, जितनी भी बार तुम इसे पीते हो।
२६ क्योंकि जितनी बार भी तुम इस रोटी को खाते हो, और इस प्याले को पीते हो, तुम प्रभु के आगमन तक उनकी मृत्यु घोषित करते हो।
२७ इस कारण जो कोई भी अयोग्यता से इस रोटी को खाएगा, और प्रभु के इस प्याले को पीएगा, प्रभु के शरीर और रक्त का दोषी होगा।
२८ परन्तु उस व्यक्ति को स्वयं की जाँच कर लेने देना, और फिर उसे उस रोटी में से खा लेने देना, और उस प्याले में से पी लेने देना।
२९ क्योंकि वो जो अयोग्यता से खाता और पीता है, अपने स्वयं के प्रति दण्डाज्ञा खाता और पीता है, प्रभु के शरीर का प्रभेद न करता हुआ।
३० इसी कारण कई तुम्हारे बीच निर्बल और रोग-ग्रस्त हैं, और कई सोए हुए हैं।
३१ क्योंकि यदि हम स्वयं को आँकेंगे, हमें आँका नहीं जाएगा।
३२ परन्तु जब हमें आँका जाता है, हम प्रभु द्वारा पीटे जाते हैं, ताकि हम संसार के साथ दण्डनीय न घोषित किए जाएँ।
३३ इसी कारण वश, मेरे भाई-जनो, जब तुम एक साथ खाने के लिए संघ्रहित होते हो, तो एक दूसरे के लिए प्रतीक्षा करो।
३४ और यदि कोई भी व्यक्ति भूखा हो, उसे घर पर ही खा लेने दो; ताकि तुम एक साथ दण्डाज्ञा में न आओ। और शेष बातें, जब मैं आऊँगा मैं विधि-व्यवस्थित कर दूँगा।
बारहवाँ अध्याय।
१ भाई-जनो, मैं अब इच्छुक नहीं हूँ, कि तुम आध्यात्मिक प्रतिभाओं के समबन्ध में अनभिज्ञ रहो।
२ तुम जानते हो कि तुम अन्यप्रजातियों-वाले थे, इन मूक मूर्तियों की ओर खिंचते हुए, जैसे भी तुम्हें ले जाया जाता था।
३ इसी कारण मैं तुम्हें यह समझ प्रदान कर रहा हूँ, कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर के प्राण से बोलता हुआ यीशु को श्रापित नहीं पुकारता है: और कि कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता है कि यीशु प्रभु हैं, सिवाय पवित्र-प्राण द्वारा।
४ अब प्रतिभाएँ विभिन्न हैं, परन्तु वही वो प्राण।
५ और सेवाएँ विभिन्न हैं, परन्तु वही वो प्रभु।
६ और कार्य-प्रणालियाँ विभिन्न हैं, परन्तु वही वो ईश्वर हैं जो सभी कुछ सभी मैं क्रियाशील करते हैं।
७ परन्तु प्राण की प्रत्यक्षता प्रत्येक व्यक्ति को प्रदान कर दी गई है सभी के कल्याण हेतु।
८ क्योंकि एक को प्राण द्वारा विद्या का शब्द प्रदान किया गया है; तो किसी अन्य को ज्ञान का शब्द उन्हीं प्राण द्वारा;
९ किसी और को उन्हीं प्राण द्वारा विश्वास; तो किसी अन्य को उन्हीं प्राण द्वारा स्वास्थ-वर्धक प्रतिभाएँ;
१० किसी और को चमत्कारी कार्य; तो किसी अन्य को प्रवचन देना; किसी और को प्राणों में प्रभेद करना; तो किसी अन्य को विभिन्न प्रकार की जीभें; किसी और को जीभों की व्याख्या:
११ परन्तु इन सभी को वही एकमात्र प्राण स्वयं ही कार्यरत करते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही इच्छानुसार विभिन्नता से विभाजित करते हुए।
१२ क्योंकि जिस प्रकार देह एक ही है, और उसके कई अँग होते हैं, और वह सभी अँग उस एक ही देह के, अनेक होते हुए एक ही देह हैं: इसी प्रकार मसीहा भी हैं।
१३ क्योंकि एक ही प्राण द्वारा हम सभी एक ही देह में बपतिस्मित हो चुके हैं, चाहे हम यहूदी हों या अन्यप्रजाती-वाले, चाहे हम दास हों या दास-मुक्त; और हम सभी को एक ही प्राण में पेयपान करवा दिया गया है।
१४ क्योंकि देह एक ही अँग नहीं है, बल्कि अनेक।
१५ तो भई यदि पैर कहता है, क्योंकि मैं हाथ नहीं हूँ, मैं देह का नहीं हूँ; तो क्या वो इसलिए उस देह का नहीं है?
१६ और यदि कान कहता है, भई क्योंकि मैं आँख नहीं हूँ, मैं देह का नहीं हूँ; तो क्या वो इसलिए उस देह का नहीं है?
१७ यदि सम्पूर्ण शरीर एक आँख ही होता, तो सुनना कहाँ से होगा भई? यदि वो सम्पूर्ण सुनना हो, तो सूँघना कहाँ से होगा?
१८ परन्तु अब ईश्वर ने अंगों में से प्रत्येक को शरीर में स्थित कर दिया है, अपनी ही प्रसन्नतानुसार।
१९ तो यदि वो सभी एक ही अँग होते, तो भई शरीर कहाँ होगा?
२० परन्तु अब वह अनेक अँग हैं, तथापि एक ही शरीर।
२१ और आँख हाथ से नहीं कह सकती, मुझे तुम्हारी कोई आवश्यक्ता नहीं है: न ही सर पैरों से, भई मुझे तो तुम्हारी कोई भी आवश्यक्ता नहीं है।
२२ न जी न, अधिक आधिक्यता से शरीर के उन अंगों की आवश्यक्ता है, जो अधिक निर्बल प्रतीत होते हैं:
२३ और शरीर के जो अँग हमें अल्प-सम्मान-योग्य समझ पड़ते हैं, इन्हीं को हम बड़ी आधिक्यता से सम्मान प्रदान करते हैं; और हमारे अशोभनीय अंगों के पास अधिक आधिक्यता से शोभा है।
२४ क्योंकि हमारे शोभनीय अंगों को कोई आवश्यकता नहीं है: परन्तु ईश्वर ने शरीर की एक साथ संयुक्ति कर दी है, उस आभाव-ग्रस्त अँग को अधिकता से सम्मान दिए हुए:
२५ ताकि शरीर में कोई भी विभेद न रहे; बल्कि अँगों को एक दूसरे का एक समान ध्यान रखना चाहिए।
२६ और यदि एक अँग कष्ट भोग रहा हो, तो सभी अँग उसके संग कष्ट भोगें; या फिर किसी एक अँग को सम्मान मिले, तो सभी अँग उसके संग हर्ष मनाएँ।
२७ अब तुम मसीहा का देह हो, और विशेषता से उनके अँग।
२८ और ईश्वर ने कुछों को कलिसिए में नियुक्त किया है, पहले अपौस्लों को, दूसरे पैग़म्बर, तीसरे शिक्षक, और उसके पश्चात चमत्कार-कर्ता, फिर स्वास्थ-वर्धक प्रतिभाएँ, सहायताएँ, प्रबन्धक, जीभों की विभिन्नताएँ।
२९ क्या सभी अपौस्ल हैं? क्या सभी पैग़म्बर हैं? क्या सभी शिक्षक हैं? क्या सभी चमत्कार-कर्ता हैं?
३० क्या सभी के पास स्वास्थ-वर्धक प्रतिभाएँ हैं? क्या सभी जीभों के साथ बोलते हैं? क्या सभी व्याख्या करते हैं?
३१ पर तुम उत्सुकता से उन अति उत्तम प्रतिभाओं की अभिलाषा करो: और तथापि मैं तुम्हें एक अधिक सर्वोच्चत्तम पथ दिखलाता हूँ।
तेरहवाँ अध्याय।
१ भले ही मैं लोगों और दूतों की जीभों से बोलूँ, परन्तु मैं प्रेमहीन हूँ, मैं खनखनाते हुए पीतल, या झनझनाते हुए झाँझ जैसा बन गया हूँ।
२ और भले ही मेरे पास प्रेरित-उपदेशों की प्रतिभा हो, और मैं समस्त रहस्यों, एवं समस्त ज्ञान को समझ लूँ: और भले ही मेरे पास सम्पूर्ण विश्वास हो, ताकि मैं पर्वतों को हटा सकूँ, और मैं प्रेमहीन हूँ, मैं कुछ भी नहीं हूँ।
३ और भले ही मैं अपनी समस्त सम्पत्ती को दरिद्रों के भोजन के लिए प्रदान कर दूँ, और भले ही मैं अपने शरीर को जला देने के लिए प्रदान कर दूँ, और मैं प्रेमहीन हूँ, यह मेरा कोई भी कल्याण नहीं करेगा।
४ प्रेम दीर्घ काल तक सहनशील रहता है, और दयालु है; प्रेम ईर्षा से नहीं जलता; प्रेम स्वयं की डींगें नहीं मारता, न ही उसकी छाती फूलती है,
५ प्रेम स्वयं अशोभनीय व्यवहार नहीं करता, अपनी स्वयं की चिंता नहीं करता, सहजता से उत्तेजित नहीं होता, कोई बुराई नहीं सोचता;
६ अधर्मता में हर्ष नहीं मनाता, बल्कि सत्य में हर्ष मनाता है;
७ सभी कुछ झेल लेता है, सभी बातों पर विश्वास कर लेता है, सभी बातों में आशा रखता है, सभी बातों को सहन कर लेता है।
८ प्रेम कभी भी विफल नहीं होता: क्योंकि भले ही प्रेरित-उपदेश हों, वो विफल हो जाएँगे: भले ही जीभें हों, वो समाप्त हो जाएँगी; भले ही ज्ञान हो, वो लुप्त हो जाएगा।
९ क्योंकि हमारा ज्ञान अपूर्ण है, और हम अपूर्णता में ही प्रेरित-उपदेश देते हैं।
१० परन्तु जब वो जो परिशुद्धता-पूर्ण है आ जाएगा, तब वो जो अपूर्ण है हटा दिया जाएगा।
११ जब मैं एक बच्चा था, मैं एक बच्चे समान बोलता था, एक बच्चे समान ही समझता था, एक बच्चे समान ही सोचता था: परन्तु जब मैं पुरुष बन गया, मैंने बचकानी बातें परे हटा दीं।
१२ क्योंकि हमें तो इस वर्तमान में दर्पण धुँधला सा ही दिखता है; परन्तु तब आमने-सामने: अभी तो मेरा ज्ञान अपूर्ण है; परन्तु तब मैं जान जाऊँगा जैसे कि मैं भी जाना हुआ हूँ।
१३ तो अब विश्वास, आशा, प्रेम, यह तीन रह जाते हैं: परन्तु इन में से सर्वश्रेष्ठ है प्रेम।
चौदहवाँ अध्याय।
१ प्रेम के पीछे पड़ जाओ, और आध्यात्मिक प्रतिभाओं की कामना करो, परन्तु अपेक्षाकृत कि तुम प्रेरित-उपदेश दे सको।
२ क्योंकि वो जो किसी अज्ञात जीभ में बोलता है, लोगों से नहीं, बल्कि ईश्वर से बोलता है: क्योंकि कोई भी व्यक्ति उसे समझ नहीं पाता है; यद्यपि प्राण में वो रहस्यमई बातें बोलता है।
३ परन्तु वो जो प्रेरित-उपदेश देता है, लोगों से उनके आध्यात्मिक-निर्माण, और अभिप्रेरणा, और उनकी सान्त्वना निमित्त बोलता है।
४ वो जो किसी अज्ञात जीभ में बोलता है, स्वयं का ही आध्यात्मिक-निर्माण करता है; परन्तु वो जो प्रेरित-उपदेश देता है, कलिसिए का आध्यात्मिक-निर्माण करता है।
५ मेरी यह इच्छा है कि तुम सभी जीभों से बोलते होते, परन्तु अपेक्षाकृत कि तुम प्रेरित-उपदेश देते होते: क्योंकि वो जो प्रेरित-उपदेश देता है, जीभों से बोलने वाले से अधिक महान होता है, सिवाय कि वो व्याख्या करे, ताकि कलिसिया आध्यात्मिक-निर्माण प्राप्त कर सके।
६ अब, भाई-जनो, यदि मैं तुम्हारे पास जीभों से बोलता हुआ आऊँ, तो मैं तुम्हें क्या लाभ प्रदान कर पाऊँगा, सिवाय कि मैं तुम से, या प्रत्यक्षता द्वारा, या ज्ञान द्वारा, या प्रेरित-उपदेश द्वारा, या शिक्षण द्वारा बोलूँ?
७ और यहाँ तक कि स्वर उत्पन्न करती हुई निर्जीव वस्तुएँ भी, चाहे बाँसुरी या वीणा, सिवाय कि वो स्वरों में विभेद उत्पन्न करें, यह कैसे ज्ञात हो पाएगा कि बाँसुरी या वीणा पर क्या बजाया जा रहा है?
८ चूँकि यदि चिंघाड़ा कोई अनिश्चित स्वर उत्पन्न करता हो, तो कौन स्वयं को युद्ध के लिए उद्यत कर पाएगा?
९ इसी प्रकार तुम भी, सिवाय कि तुम जीभ द्वारा सहजता से समझे जाने वाले शब्दों का अर्णन करो, यह कैसे ज्ञात हो पाएगा कि क्या बोला गया है? क्योंकि तुम तो हवा से ही बोलते हुए रह जाओगे।
१० जगत में न जाने कितनी प्रकार की बोलियाँ हैं, और उन में से कोई भी निरर्थक नहीं है।
११ इसलिए यदि मैं बोली का अर्थ नहीं जानता, तो मैं तो उसके प्रति जो बोल रहा है एक आदिवासी प्रतीत हूँगा, और वो जो बोल रहा है मुझे एक आदिवासी प्रतीत होगा।
१२ इसी प्रकार तुम, चूँकि तुम आध्यात्मिक प्रतिभाओं के लिए उत्सुक हो, इसका यत्न करो कि तुम कलिसिए के आध्यात्मिक-निर्माण निमित्त श्रेष्ठ बन सको।
१३ इस कारण उसे जो किसी अज्ञात जीभ से बोल रहा है, यह प्रार्थना करने दो कि वो व्याख्या कर सके।
१४ क्योंकि यदि मैं किसी अज्ञात जीभ से प्रार्थना करता हूँ, तो मेरा प्राण प्रार्थना करता है, परन्तु मेरी समझ निष्फल है।
१५ तो फिर क्या? मैं प्राण के साथ प्रार्थना करूँगा, और मैं समझ के साथ भी प्रार्थना करूँगा: मैं प्राण के साथ गान गाऊँगा, और मैं समझ के साथ भी गान गाऊँगा।
१६ अन्यथा जब तुम प्राण से आशीष दोगे, तो फिर वो जो अशिक्षित का स्थान भरता है, कैसे तुम्हारे धन्यवाद देने पर तथास्तु कह पाएगा भई, यह देखते हुए कि वो तो समझ ही नहीं पा रहा है जो तुम कह रहे हो?
१७ चूँकि तुम तो वास्तव में उचितता से धन्यवाद दे रहे हो, परन्तु उस दूसरे का आध्यात्मिक-निर्माण नहीं हो रहा है।
१८ मैं अपने ईश्वर का धन्यवाद करता हूँ, कि मैं जीभों से तुम सभी से अधिक बोलता हूँ:
१९ तथापि कलिसिए में मैं अपनी समझ से बस पाँच ही शब्द बोलूँ, ताकी अपनी बोली द्वारा मैं दूसरों को भी शिक्षा प्रदान कर सकूँ, बजाय कि मैं दस हज़ार शब्द किसी अज्ञात जीभ में बोलूँ।
२० भाई-जनों, तुम सूझ-बूझ में बच्चे मत बने रहो: बल्कि द्वेषता में बच्चे बन जाओ, परन्तु सूझ-बूझ में वयस्क।
२१ नियम में यह लिखा हुआ है, अन्य जीभों और अन्य होठों से मैं इन लोगों से बोलूँगा; और तथापि इस सब के बावजूद वो मुझे नहीं सुनेंगे, कहते हैं प्रभु।
२२ इसी कारण जीभें उनके लिए संकेत नहीं हैं जो विश्वास करते हैं, बल्कि उनके लिए जो विश्वास नहीं करते: परन्तु प्रेरित-उपदेश देना उन्हें लाभ नहीं पहुँचाता जो विश्वास नहीं करते, बल्कि उन्हें जो विश्वास करते हैं।
२३ तो इसलिए यदि सम्पूर्ण कलिसिया एक स्थान में एक संग संघ्रहित हो, और सभी जीभों के साथ बोल रहे हों, और वहाँ अशिक्षित या अविश्वासी अन्दर आ जाएँ, तो क्या वो नहीं कहेंगे भई कि तुम पागल हो?
२४ परन्तु यदि सभी प्रेरित-उपदेश देते हों, और वहाँ कोई एक अविश्वासी या कोई अशिक्षित अन्दर आ जाता है, तो वो सभी द्वारा दोषी ठहरा दिया जाता है, वो सभी द्वारा आँक दिया जाता है:
२५ और इस प्रकार उसके हृदय के रहस्य प्रत्यक्ष हो जाएँगे; अतः वो अपने चहरे के बल नीचे गिरता हुआ ईश्वर की आराधना करेगा, और यह घोषणा करेगा कि ईश्वर सचमुच तुम में हैं।
२६ तो फिर यह कैसे है, भाई-जनो? जब तुम एक साथ आते हो, तुम में से हर एक के पास कोई भजन होता है, कोई उपदेश होता है, कोई जीभ होती है, कोई प्रकाशन होता है, कोई व्याख्या होती है। सभी कुछ आध्यात्मिक-निर्माण निमित्त होने दो।
२७ यदि कोई भी पुरुष किसी अज्ञात जीभ में बोले, दो-दो कर, या अधिक से अधिक तीन-तीन कर, और वो भी बारी-बारी से; और एक को व्याख्या कर लेने दो।
२८ परन्तु यदि कोई व्याख्या करने वाला न हो, तो उसे कलिसिए में चुप ही रहने दो; और उसे अपने स्वयं के साथ, और ईश्वर के साथ ही बात-चीत कर लेने दो।
२९ दो या तीन पैग़म्बरों को बोलने दो, और अन्य को आँकने दो।
३० यदि साथ बैठे किसी को कुछ भी प्रत्यक्ष हो जाए, तो पहल वाले को शान्त हो जाने दो।
३१ ताकि तुम सभी बारी-बारी से प्रेरित-उपदेश दे सको, ताकि सभी शिक्षित हो सकें, और सभी सान्त्वनित हो सकें।
३२ और पैग़म्बरों के प्राण पैग़म्बरों के ही आधीन होते हैं।
३३ क्योंकि ईश्वर अव्यवस्था के नहीं बल्कि शान्ति के कर्ता हैं, जैसे कि सन्तों के समस्त कलिसियों में ही।
३४ अपनी स्त्रियों को कलिसियों में चुप रहने दो: क्योंकि उन्हें बोलने की अनुमति नहीं है; बल्कि उन्हें यह आदेश दिया गया है कि वो अनुपालन के आधीन हों, जैसा कि नियम भी कहता है।
३५ और यदि वो कोई भी शिक्षा ग्रहण करने की इच्छुक हों, तो उन्हें घर पर ही अपने पतियों से पूछ लेने दो: क्योंकि स्त्रियों के लिए कलिसिए में बोलना लज्जित होने वाली बात है।
३६ क्या भई? ईश्वर का शब्द तुम ही से बाहर निकला है? या वो केवल तुम्हारे पास ही आया है?
३७ यदि कोई भी व्यक्ति स्वयं को पैग़म्बर, या आध्यात्मिक माने, तो उसे यह स्वीकार कर लेने दो कि वो बातें जो मैं तुम्हें लिख रहा हूँ प्रभु के आदेश हैं।
३८ परन्तु यदि कोई भी अनभिज्ञ ही रहना चाहता हो, तो उसे अनभिज्ञ ही रहने दो।
३९ इस कारण, भाई-जनो, प्रेरित-उपदेश देने की अभिलाषा रखो, और जीभों से बोलने पर प्रतिबन्ध मत लगाओ।
४० सभी बातें उचितता से और व्यवस्थानुसार की जाएँ।
पन्द्रहवाँ अध्याय।
१ इसके अतिरिक्त, भाई-जनो, मैं उस शुभ-समाचार की तुम्हें घोषणा करता हूँ जिसका मैंने तुम्हें प्रवचन दिया था, जिसे तुम ने ग्रहण भी किया, और जिस में तुम खड़े भी हो;
२ जिसके द्वारा तुम्हारा बचाव भी होता है, यदि तुम उसे स्मरण में रखो जिसका मैंने तुम्हें प्रवचन दिया था, कहिं तुम्हारा विश्वास व्यर्थता से किया गया हो।
३ क्योंकि सर्वप्रथम मैंने तुम्हें वो प्रदान कर दिया है जिसे मैंने भी ग्रहण किया, कि कैसे शास्त्रोंनुसार मसीहा हमारे पापों के लिए मरे;
४ और कि वो दफ़ना दिए गए, और वो तीसरे दिन पुनः उठ गए, शास्त्रोंनुसार ही:
५ और कि वो कैफा द्वारा देखे गए, फिर उन बारह द्वारा:
६ इसके पश्चात, वो पाँच सौ से अधिक भाई-जनो द्वारा एक साथ देखे गए; जिनका अधिकांश भाग इस वर्तमान में जीवित है, परन्तु कुछ निद्रा ले चुके हैं।
७ इसके पश्चात, वो याकूब द्वारा देखे गए; फिर समस्त अपौस्लों द्वारा।
८ और सबसे अन्त में वो मेरे द्वारा भी देखे गए, ऐसा एक, मानो कि जो निश्चित समय पश्चात जन्मा हो।
९ चूँकि मैं अपौस्लों में से सब से निम्न हूँ, कि मैं अपौस्ल कहलाए जाने के योग्य भी नहीं हूँ, क्योंकि मैंने ईश्वर के कलिसिए का अत्याचार किया।
१० परन्तु ईश्वर की कृपा द्वारा मैं हूँ, जो मैं हूँ: और उनकी कृपा जो मुझे प्रदान की गई थी व्यर्थता में नहीं थी; परन्तु मैंने उन सभी से अधिक श्रम किया: तथापि मैंने नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा ने जो मेरे साथ थी।
११ तो इसलिए चाहे वो मैं था या वो जने, इसी प्रकार ही हम प्रवचन देते हैं, और इसी प्रकार ही तुम ने विश्वास किया।
१२ अब यदि मसीहा के विषय में यह प्रवचन दिया जाता है कि वो मृतकों में से उठ गए थे, तो भई फिर तुम्हारे बीच कुछ यह कैसे कह रहे हैं कि मृतकों का कोई पुनरुत्थान ही नहीं होता है?
१३ क्योंकि यदि मृतकों का कोई पुनरुत्थान ही नहीं होता, तो मसीहा उठे ही नहीं हैं:
१४ और यदि मसीहा उठे ही न हों, तो हमारी प्रवचन-क्रिया व्यर्थ है भई, और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है।
१५ हाँ भई, और हम ईश्वर के झूठे साक्षी पा लिए गए हैं; क्योंकि हमने ईश्वर का यह साक्ष्य दिया है कि उन्होंने मसीहा को ऊपर उठा दिया: जिन्हें उन्होंने ऊपर ही नहीं उठाया, यदि ऐसा हो कि मृतक उठते ही न हों।
१६ क्योंकि यदि मृतक उठते ही न हों, तो मसीहा उठे नहीं हैं:
१७ और यदि मसीहा ही न उठे हों, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; तुम तो अभी तक भी अपने पापों में ही हो।
१८ तथापि वो भी जो मसीहा में सो चुके हैं नष्ट हो चुके हैं।
१९ यदि मसीहा में हमारी आशा केवल इसी जीवन तक सीमित है, तो हम सभी लोगों में से सबसे दयनीय हैं!
२० परन्तु अब मसीहा मृतकों में से उठ चुके हैं, और सोते हुओं में से प्रथम-फल बन गए हैं।
२१ अब चूँकि मनुष्य द्वारा मृत्यु आई, मनुष्य ही के द्वारा मृतकों का पुनरुत्थान भी आया।
२२ क्योंकि जैसे आदम में सभी मर जाते हैं, इसी प्रकार ही मसीहा में सभी सजीवित कर दिए जाएँगे।
२३ परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपने ही क्रमानुसार: मसीहा वह प्रथम-फल; इसके पश्चात वो जो मसीहा के हैं उनके आगमन पर।
२४ तब अन्त आ जाता है, जब वो राज्य को ईश्वर को सौंप चुके होंगे, पिताश्री को ही; जब वो समस्त शासन और समस्त प्राधिकार और शक्ती को नष्ट कर चुके होंगे।
२५ क्योंकि उन्हें अवश्य ही राज करना है, जब तक वो समस्त शत्रुओं को उनके पैरों तले नहीं डाल देते।
२६ वो अन्तिम शत्रु जिसका विनाश कर दिया जाएगा, मृत्यु है।
२७ क्योंकि उन्होंने सभी कुछ उनके पैरों तले डाल दिया है। परन्तु जब वो कहते हैं, सभी कुछ उनके आधीन कर दिया गया है, यह स्पष्ट है कि वो जिन्होंने सभी कुछ उनके तले डाल दिया है, उन में सम्मिलित नहीं हैं।
२८ और जब सभी कुछ उनके आधीन कर दिया जाएगा, तब वह पुत्र भी स्वयं उन्हीं के आधीन हो जाएँगे, जिन्होंने सभी कुछ उनके तले डाला, ताकि ईश्वर समस्तों में समस्त बन जाएँ।
२९ अन्यथा वो क्या करेंगे जो मरे हुओं के लिए बपतिस्मित हैं, यदि मृतक उठते ही न हों? तो फिर वो क्यों मृतकों के लिए बपतिस्मित हुए हैं?
३० और हम भी क्यों हर घड़ी संकट में खड़े हैं?
३१ मैं तुम्हारे हर्ष की सौगन्ध खाता हूँ जो मुझे हमारे प्रभु मसीहा यीशु में है, कि भई मैं तो दिन-प्रतिदिन मरता रहता हूँ।
३२ यदि मनुष्यों के स्वभावानुसार मैंने इफिसुस में जानवरों के साथ लड़ाई की है, तो मुझे क्या लाभ प्राप्त हो रहा है, यदि मृतक उठते ही न हों? तो आओ भई हम खाएँ-पीयें; क्योंकि कल तो हम मर ही जाएँगे!
३३ धोखे में मत पड़ो: बुरे संचार शिष्टाचार को भ्रष्ट कर देते हैं।
३४ नेकी के प्रति जाग उठो, और पाप मत करो; क्योंकि कुछों के पास ईश्वर का ज्ञान नहीं है: मैं यह तुम्हें लज्जित करने के लिए ही बोल रहा हूँ।
३५ परन्तु कोई कहेगा, मृतक किस प्रकार उठाए जाते हैं? और वो कौन से शरीर में आते हैं?
३६ अरे मूर्ख, वो जो तुम बोते हो सजीवित नहीं होता है, सिवाय कि वो मर जाए:
३७ और वो जो तुम बोते हो, तुम वो शरीर नहीं बोते जो उत्पत होगा, बल्कि मात्र बीज का दाना, चाहे वो गेहूँ हो, या फिर कोई अन्य अन्न।
३८ परन्तु ईश्वर उसे एक शरीर प्रदान करते हैं जैसा भी वो चाहें, और प्रत्येक बीज को उसी का अपना ही शरीर।
३९ प्रत्येक माँस एक स्वरूप माँस नहीं होता है: बल्कि मनुष्यों का माँस एक प्रकार का होता है, पशुओं का माँस दूसरे प्रकार का, और मछलियों का, और पक्षियों का भी।
४० अन्तरिक्षीय देह भी होते हैं, और देह पार्थिव भी: परन्तु अन्तरिक्षीय की महिमा एक प्रकार की होती है, और पार्थिव की महिमा कुछ और।
४१ सूर्य की अपनी महिमा है, और चन्द्रमा की अपनी महिमा, और सितारों की अपनी महिमा: क्योंकि एक सितारे की महिमा दूसरे से भिन्न होती है।
४२ इसी प्रकार ही मृतकों में से पुनरुत्थान भी होता है। वो नश्वरता में बोया जाता है; वो अनश्वर्ता में उठा दिया जाता है:
४३ वो अनादर में बोया जाता है; वो महिमा में उठा दिया जाता है: वो निर्बलता में बोया जाता है; वो बलिष्ठता में उठा दिया जाता है:
४४ वो एक पाशविक शरीर बोया जाता है; वो एक आध्यात्मिक शरीर उठा दिया जाता है। एक पाशविक शरीर होता है, और एक आध्यात्मिक शरीर होता है।
४५ तो इस कारण यह लिखा है, वो प्रथम पुरुष आदम एक जीवित आत्मा बना दिया गया था; वो अन्तिम आदम एक जीवनदायक प्राण बना दिए गए थे।
४६ यद्यपि वो प्रथम नहीं था जो आध्यात्मिक है, बल्कि वो जो पाशविक है; और उसके उपरान्त वो जो आध्यात्मिक हैं।
४७ वो प्रथम पुरुष पृथ्वी से है, पार्थिव: वो द्वितीय पुरुष प्रभु हैं, स्वर्ग से।
४८ जैसा वो पार्थिव है, वैसे ही वो भी हैं जो पृथ्वी से हैं: और जैसे वो स्वर्गिक हैं, वैसे ही वो भी हैं जो स्वर्गिक हैं।
४९ और जैसे हमने पार्थिव की प्रतिमा धारण की है, हम स्वर्गिक की भी प्रतिमा धारण कर लेंगे।
५० अब मैं यह कहता हूँ, भाई-जनो, कि माँस और रक्त ईश्वर के राज्य को विरासत में नहीं प्राप्त कर सकते; न ही नश्वरता अनश्वर्ता को विरासत में प्राप्त कर सकती है।
५१ देखो, मैं तुम्हें एक रहस्य बतलाता हूँ; हम सभी सोते नहीं रेहेंगे, बल्कि हम सभी रूपान्तरित कर दिए जाएँगे,
५२ एक ही क्षण में, पलक झपकते ही, अन्तिम चिंघाड़ पर: क्योंकि वो चिंघाड़ा बजेगा, और वो मृतक अनश्वर उठा दिए जाएँगे, और हम रूपान्तरित कर दिए जाएँगे।
५३ क्योंकि इस नश्वर को अवश्य ही अनश्वरता धारण करनी है, और इस मरणशील को अवश्य ही अमरता धारण करनी है।
५४ अतः जब यह नश्वर अनश्वरता को धारण कर लेगा, और यह मरणशील अमरता को धारण कर लेगा, तथापि उस कथन की पूर्ती हो जाएगी जो लिखा हुआ है, मृत्यु विजय में निगल ली गई है।
५५ ओ मृत्यु, कहाँ है तेरा डंक? ओ कब्र, कहाँ है तेरी जीत?
५६ मृत्यु का डंक पाप है; और पाप की शक्ती नियम है।
५७ परन्तु ईश्वर को धन्यवाद दे दिया जाए, जो हमें हमारे प्रभु यीशु मसीह द्वारा विजय प्रदान करते हैं।
५८ इसलिए, मेरे अति प्रीय भाई-जनो, तुम अटल, अडिग बनो, प्रभु के कार्य में सर्वदा प्रचूर होते हुए, क्योंकि तुम्हें यह ज्ञान है कि प्रभु में तुम्हारा श्रम व्यर्थ नहीं है।
सोलहवाँ अध्याय।
१ अब सन्तों के लिए संग्रहण के समबन्ध में, जैसा मैंने गलाती के कलिसियों को निर्देश दिया है, उसी प्रकार तुम भी करो।
२ सप्ताह के प्रथम दिवस पर तुम में से प्रत्येक वो संघ्रहित कर ले, जिस भी प्रकार से ईश्वर ने उसे उन्नति प्रदान की है, ताकि मेरे आगमन पर कोई एकत्रण न किया जाए।
३ और जब मैं आऊँगा, जिन्हें भी तुम अपने पत्रों द्वारा अनुमोदित करोगे, उन्हीं को मैं तुम्हारी उदारता यरूशलेम ले जाने के लिए भेज दूँगा।
४ और यदि यह सुयोग्य हो कि मैं भी जाऊँ, तो वो मेरे साथ जाएँगे।
५ अब जब मैं मकिदुनिया में से होता हुआ जाऊँगा, तो मैं तुम्हारे पास आऊँगा: चूँकि मैं मकिदुनिया में से ही गुज़रता हुआ जाता हूँ।
६ और यदी हो सका तो मैं ठहर जाऊँगा, हाँ भई, और तुम्हारे साथ ही शीत ऋतु बिता लूँगा, ताकि तुम मुझे मेरी यात्रा में विदा कर दो जहाँ कहिं भी में जाऊँ।
७ चूँकि पथ पर ही अभी मेरी इच्छा नहीं है तुमसे मिलने की; परन्तु यदि प्रभु अनुमती दे दें, तो मैं तुम्हारे साथ कुछ समय ठहर जाने की आशा रखता हूँ।
८ परन्तु मैं पेंतेकोस्त तक इफिसुस में ही ठहरूँगा।
९ क्योंकि एक विशाल और प्रभावोत्पादक द्वार मेरे लिए खुल गया है, और कई विपक्षी हैं।
१० अब यदि तिमोथेयस आता है, देख लेना कि वो तुम्हारे संग निर्भयता से रहे; क्योंकि वो प्रभु के कार्य का कर्ता है, जैसे मैं भी करता हूँ।
११ इसलिए किसी भी व्यक्ति को उसे तुच्छ मत समझने देना: बल्कि उसे शान्ति से आगे भेज देना, ताकि वो मेरे पास आ सके: क्योंकि मैं भाई-जनो के साथ उसकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
१२ अब हमारे भाई अपुल्लोस के समबन्ध में, मेरी यह बहुत इच्छा थी कि वो भाई-जनो के साथ तुम्हारे पास आ जाए: परन्तु उसकी यह इच्छा कतई नहीं थी कि वो इस समय आए; परन्तु जब उसके पास सुविधाजनक समय होगा तो वो आ जाएगा।
१३ सचेत रहो, विश्वास में अडिग रहो, पुरुषार्थी बनो, बलवन्त बनो।
१४ तुम्हारे सभी कर्म प्रेम सहित क्रियान्वित हों।
१५ मैं यह विनती करता हूँ, भाई-जनो, (तुम स्तिफनास के घराने से परिचित हो जाओ कि वो अकाया का प्रथम-फल है, और कि उन्होंने स्वयं को सन्तों के सेवाकार्य में लीन कर दिया है,)
१६ कि तुम स्वयं को ऐसों के, और उस प्रत्येक के आधीन कर लो, जो हमारे संग सहायता और श्रम करता है।
१७ मैं स्तिफनास और फुरतूनातुस और अखइकुस के आगमन से प्रसन्न हूँ: क्योंकि उन्होंने तुम्हारी कमी की पूर्ती कर दी है।
१८ क्योंकि उन्होंने मेरे और तुम्हारे प्राण को पुनश्चर्यित कर दिया है: इसलिए तुम ऐसों को अभिस्वीकार करो।
१९ एशिया के कलिसिये तुम्हें प्रणाम करते हैं। अकिल्ला और प्रिस्किल्ला तुम्हें प्रभु में बहुत प्रणाम करते हैं, उस कलिसिए के संग जो उनके घर में है।
२० समस्त भाई-जन तुम्हारा अभिवादन करते हैं। तुम एक दूसरे का अभिवादन पवित्र चुम्बन द्वारा करो।
२१ यह मेरा ही मेरे अपने ही हाथों द्वारा पौलुस ही का प्रणाम।
२२ यदि कोई भी व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह से प्रेम न करता हो, तो उसे अनथेमा मरनाथा बन जाने दो।
२३ हमारे प्रभु यीशु मसीह की कृपा तुम्हारे साथ बनी रहे।
२४ मसीहा यीशु में मेरा प्रेम तुम सभी के साथ बना रहे। तथास्तु।
०६/१७/२०२३:
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