कुरिन्‍थुसवासियों के लिए पौलुस का द्वितीय पत्र।(Second Corinthians)



पहला अध्याय।


१ पौलुस, ईश्वर की इच्छा द्वारा यीशु मसीह का एक अपौस्ल, और तिमोथी हमारा भाई, ईश्वर के कलिसिए को जो कुरिन्‍थुस में है, सभी सन्तों के संग जो समस्त अकाया में हैं: 

२ तुम्हें ईश्वर हमारे पिताश्री द्वारा, और प्रभु यीशु मसीह द्वारा कृपा और शान्ति मिले।

३ धन्य हों ईश्वर, हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिताश्री ही, दयालुताओं के पिताश्री, और सर्व-सान्त्वना के ईश्वर; 

४ जो हमें हमारी समस्त आपत्तियों में सान्त्वनित करते हैं, ताकि हम उन्हें सान्त्वनित करने में सक्षम हों जो किसी भी प्रकार के कष्ट में हों, उसी सान्त्वना द्वारा जिस से हम भी स्वयं ईश्वर से सान्त्वनित हैं। 

५ क्योंकि जिस प्रकार मसीहा के कष्ट हम में प्रचूर हैं, उसी प्रकार हमारी सांत्वना भी मसीहा द्वारा प्रचूर है।

६ तो चाहे हम पीड़ित हों, यह तुम्हारी ही सान्त्वना और बचाव हेतु है, जो उन्हीं कष्टों को सहने के लिए प्रभावोत्पादक है जिन्हें हम भी झेलते हैं: या चाहे हम सान्त्वनित हों, यह तुम्हारी ही सान्त्वना और बचाव हेतु है।

७ और तुम्हारे प्रति हमारी आशा अविचल है, यह जानते हुए, कि जिस प्रकार तुम कष्टों के भागीदार हो, उसी प्रकार तुम उस सान्त्वना के भी भागीदार बनोगे।

८ क्योंकि भाई-जनो, हम नहीं चाहते, कि तुम हमारी उस पीड़ा से अनभिज्ञ रहो जो हम पर एशिया में आ पड़ी थी, कि हम सामर्थ्य की सीमा पार, दबोच दिए गए थे, यहाँ तक कि हम जीवन से ही निराश हो चुके थे:

९ परन्तु हमें स्वयं में मृत्यु का दण्डादेश मिल चुका था, कि हमें अपने स्वयं में भरोसा नहीं रखना चाहिए, बल्कि ईश्वर में, जो मृतकों को उठा देते हैं:

१० जिन्होंने हमारा इतनी विशाल मृत्यु से उद्धार कर दिया, और वो उद्धार करते भी हैं: जिन्हीं में हम विश्वास करते हैं कि वो हमारा तथापि उद्धार कर देंगे: 

११ तुम भी हमारे लिए एक संग प्रार्थना द्वारा सहायता करते हुए, ताकि कईयों के माध्यम द्वारा हम पर प्रदान की गई उस प्रतिभा के लिए, कईयों द्वारा ही हमारे हेतु धन्यवाद दे दिया जाए। 

१२ क्योंकि हमारा हर्ष हमारी अन्तरात्मा का यह साक्ष्य है, कि संसार में, और प्रचूरतापूर्वक तुम्हारे प्रति, हमारा आचरण निष्कपटता और ईश्वरीय नेकनीयती में रहा है, शारीरिक विद्या के साथ नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा द्वारा। 

१३ क्योंकि हम तुम्हें कोई भी अन्य बातें नहीं लिख रहे हैं, बल्कि वही जो तुम पढ़ते हो या अभिस्वीकार करते हो; और मुझे विश्वास है कि तुम अन्त पर्यत अभिस्वीकार भी करोगे; 

१४ जिस प्रकार तुमने हमें भी एक आंशिक रूप में अभिस्वीकार कर लिया है, कि हम तुम्हारा हर्ष हैं, जिस प्रकार तुम भी हमारा हर्ष हो, प्रभु यीशु के दिवस में ही। 

१५ और इसी भरोसे में मेरा ये प्रयोजन था कि भई मैं पहले तुम्हारे पास आ जाऊँ, ताकि तुम्हें एक दूसरा लाभ प्राप्त हो सके;

१६ और तुम्हारे पास से होता हुआ मैं मकिदुनिया चला जाऊँ, और पुनः मकिदुनिया से बाहर निकल कर दोबारा तुम्हारे पास आऊँ, और तुम्हारे द्वारा अपने पथ पर यहूदा की ओर अग्रसर कर दिया जाऊँ। 

१७ इसलिए जब मैं इस प्रकार प्रयोजित था, तो क्या मैंने चंचलता का प्रयोग किया? या वो बातें जो मैं निश्च्य करता हूँ, क्या मैं उनका निश्च्य शारीरिकतानुसार करता हूँ, ताकि मेरी बातों में कभी हाँ-हाँ और कभी न-न हों?

१८ परन्तु जैसे ईश्वर सत्यमय हैं, हमारा शब्द तुम्हारे प्रति हाँ और ना नहीं था।

१९ क्योंकि ईश्वर के पुत्र, यीशु मसीह, जिनका तुम्हारे बीच हमारे द्वारा प्रवचन दिया गया था, यहाँ तक कि मेरे और सिलवानुस और तिमोथेयस ही के द्वारा, वो हाँ और ना नहीं था, बल्कि यीशु में वो हाँ था।

२० क्योंकि ईश्वर की सभी प्रतिज्ञाएँ उन में हाँ हैं, और उन में तथास्तु हैं, हमारे द्वारा ईश्वर की महिमा पर्यत।

२१ अब वो जो हमें तुम्हारे साथ मसीहा में स्थापित करते हैं, और जिन्होंने हमारा अभिषेक भी कर दिया है, ईश्वर हैं;

२२ जिन्होंने हमारी मुहरबंदी भी कर दी है, और प्राण का बयाना हमारे हृदयों में प्रदान कर दिया है।

२३ इसके अतिरिक्त मैं अपनी आत्मा के प्रति ईश्वर के साक्ष्य का आह्वान कर रहा हूँ, कि तुम्हें बक्शने के लिए मैं अभी तक कुरिन्‍थुस नहीं आया।

२४ ऐसा नहीं है कि हम तुम्हारे विश्वास पर अधिराज्य जमाते हैं, बल्कि हम तुम्हारे आनंद के सहायक हैं: चूँकि विश्वास द्वारा ही तुम खड़े हो।



दूसरा अध्याय।


१ परन्तु मैंने यह अपने स्वयं में निर्धारित कर लिया, कि मैं पुनः तुम्हारे पास दु:ख मनाता हुआ नहीं आऊँगा। 

२ क्योंकि यदि मैं तुम्हें दुखी करता हूँ, तो भई फिर वो कौन है जो मुझे प्रसन्न करता है, बल्कि वही जो मेरे द्वारा दुखी कर दिया गया है?

३ और मैंने यही तुम्हें लिखा था, कहिं, जब मैं आऊँ, मुझे उन से दु:ख मिले जिनके विषय में मुझे हर्ष मनाना चाहिए; तुम सभी में यह विश्वस्तता रखते हुए, कि मेरा आनंद तुम सभी का आनंद है।

४ क्योंकि अत्यंत पीड़ा और हृदय की वेदना में से ही मैंने तुम्हें कई आँसुओं के साथ लिखा था; इस कारण नहीं कि तुम दुखी हो जाओ, बल्कि तुम उस प्रेम को जान सको जो मुझे तुम्हारे प्रति बड़ी ही आधिक्यता से है।

५ परन्तु यदि किसी ने भी दुखी किया है, उसने मुझे दुखी नहीं किया, बल्कि आंशिक रूप से: ताकि मैं तुम सभी पर बोझ न डालूँ। 

६ ऐसे व्यक्ति के लिए यह दण्ड पर्याप्त है, जो कईयों द्वारा प्रदान किया गया था।

७ इसलिए इसके विपरीत तुम्हें उसे क्षमा कर देना चाहिए, और उसे सान्त्वना प्रदान करनी चाहिए, कहिं ऐसा व्यक्ति दुःख के आधिक्य द्वारा निगल न लिया जाए। 

८ इसी कारण मैं तुमसे विनती करता हूँ कि तुम उसके प्रति अपने प्रेम की पुष्टि कर दो। 

९ क्योंकि इसी उद्देश्य से भी मैंने लिखा, कि मैं तुम्हें प्रमाणित कर सकूँ, यदि तुम समस्त विषयों में आज्ञाकारी हो।

१० जिसका तुम कुछ भी क्षमा करते हो, मैं भी क्षमा करता हूँ: क्योंकि यदि मैंने कुछ भी क्षमा किया हो, जिसका मैंने वो क्षमा किया, तुम्हारे वास्ते मसीहा के प्रतिनिधि स्वरूप ही मैंने उसे क्षमा किया;

११ कहिं शैतान हम पर प्रामुख्य प्राप्त कर ले: क्योंकि हम उसकी युक्तियों से अनभिज्ञ नहीं हैं।

१२ इसके अतिरिक्त, जब मैं मसीहा के शुभ-समाचार का प्रवचन देने त्रोआस पहुँचा, और प्रभु द्वारा मेरे लिए एक द्वार खोल दिया गया था,

१३ मेरा प्राण विचलित था, चूँकि मैंने अपने भाई तीतुस को नहीं पाया: बल्कि उनसे अपनी विदाई लेते हुए, मैं वहाँ से मकिदुनिया में चला गया।

१४ अब ईश्वर को धन्यवाद हो, जो हमें मसीहा में सदैव विजयी बनाते हैं, और प्रत्येक स्थान में हमारे द्वारा उनके ज्ञान की स्वादिष्टता प्रत्यक्ष करवाते हैं।

१५ क्योंकि हम ईश्वर के प्रति मसीहा का स्वादिष्ट माधुर्य हैं, उन में जो बचे हुए हैं, और उन में जो नष्ट हो रहे हैं:

१६ उन एक के प्रति हम मृत्यु में मृत्यु की स्वादिष्टता हैं; और उन दूसरों के प्रति हम जीवन में जीवन की ही स्वादिष्टता हैं। और भई कौन इन सभी विषयों के प्रति पर्याप्त है?

१७ क्योंकि हम उन बहुतों जैसे नहीं हैं, जो ईश्वर के शब्द को भ्रष्ट करते हैं: बल्कि नेकनीयती में, बल्कि ईश्वर की ओर से, ईश्वर की दृष्टि में, हम मसीहा में बोलते हैं। 



तीसरा अध्याय।


१ तो क्या हम पुनः स्वयं की सराहना करना आरम्भ कर दें? या क्या हमें कुछ अन्यों के समान आवश्यकता है, तुम्हारे प्रति सराहना-पत्रों की, या तुम से प्रशन्सा-पत्रों की?  

२ भई तुम हमारा पत्र हो हमारे ही हृदयों में लिखित, जो सभी लोगों द्वारा पहचाना और पढ़ा जाता है।

३ चूँकी तुम हमारे सेवाकार्य द्वारा मसीहा के पत्र प्रत्यक्षता से घोषित हो, स्याही से लिखित नहीं, बल्कि जीवन्त ईश्वर के प्राण से; पत्थर की पट्टियों में नहीं, बल्कि हृदय की माँसरूपी पट्टियों में।

४ और हमें ईश्वर की ओर मसीहा द्वारा इसी प्रकार का विश्वास है:

५ न कि हम अपने स्वयं से ही पर्याप्त हैं कि हम अपने स्वयं के विषय में कुछ भी सोचें; बल्कि हमारी पर्याप्तता ईश्वर से है; 

६ जिन्होंने हमें नए अनुबन्ध के सक्षम सेवक भी बना दिया है; आलेख के नहीं, बल्कि प्राण के: क्योंकि आलेख तो मार देता है, किन्तु प्राण जीवन प्रदान करते हैं।

७ परन्तु यदि मृत्यु का सेवाकार्य, पत्थरों में लिखित और अंकित, महिमामई था, कि इस्राएल की सन्तानें मूसा के चेहरे को देखने में सक्षम ही न थीं, उनके मुखमण्डल पर महिमा के कारण; जो महिमा परे हटा दी जानी थी:

८ अतः प्राण का सेवाकार्य फिर अपेक्षाकृत महिमामई क्यों नहीं होगा?

९ क्योंकि यदि दण्डादेश का सेवाकार्य महिमामई हो, तो इस से कहीं अधिक नेकी का सेवाकार्य महिमा में प्रचूर हो जाएगा।

१० क्योंकि वो भी जो महिमामई बना दिया गया था, कोई भी महिमा लिए न था, उस महिमा के कारण जो उत्कृष्ट है।

११ क्योंकि यदि वो जो परे हटा दिया गया है महिमामई था, तो और भी अधिकता से वो जो बचा रह गया है, महिमामई है।

१२ तो अब यह देखते हुए कि हम ऐसे आशावान हैं, हम वक्तृता में बहुत निर्भीकता का प्रयोग करते हैं:

१३ और मूसा के सदृश नहीं, जिन्होंने अपने चहरे पर एक आवरण लगा दिया था, कि इस्राएल की सन्तानें उनके उद्देश्य को देखने में सक्षम ही न थीं, जो क्षय हो चला है:

१४ बल्कि उनके मन नेत्रहीन बन गए थे: क्योंकि इस दिन तक पुराने अनुबन्ध की पढ़ाई में वही आवरण आवृत बचा रह गया है; जो आवरण मसीहा में अनावृत हो जाता है।

१५ परन्तु यहाँ तक कि इसी दिन तक ही, जब मूसा पढ़े जाते हैं, वही आवरण उन लोगों के हृदय पर है।

१६ तथापि जब वो प्रभु की ओर मुड़ जाएगा, तो वो आवरण अनावृत कर दिया जाएगा।

१७ अब प्रभु ही वो प्राण हैं: और जहाँ प्रभु का प्राण है, वहीं स्वाधीनता है।

१८ परन्तु हम सभी, अनावृत चहरे लिए प्रभु की महिमा को देखते हुए, मानो किसी दर्पण में, उसी प्रतिमा में परिवर्तित हैं, महिमा से लेकर महिमा तक, प्रभु के प्राण द्वारा ही।  



चौथा अध्याय।


१ इसलिए हम ये सेवाकार्य रखते हुए, जिस प्रकार हमने दया प्राप्त कर ली है, हम शिथिल नहीं होते;

२ बल्कि हमने लज्जा वाली उन छिपी बातों को ठुकरा दिया है, कपटता में न चलते हुए, न ही ईश्वर के शब्द का भ्रष्ट-मिलावट से प्रयोग करते हुए; बल्कि ईश्वर की दृष्टि में सत्य की प्रत्यक्षता द्वारा हम स्वयं को प्रत्येक व्यक्ति की अन्तरात्मा के प्रति प्रस्तुत करते हैं।

३ परन्तु यदि हमारा शुभ-समाचार छुपा हुआ हो, तो वो उनके लिए छुपा हुआ है जो खोए हुए हैं:

४ जिन में इस संसार के ईश्वर ने उनके मनों को नेत्रहीन बना दिया है जो विश्वास नहीं करते, कहिं मसीहा के महिमामय शुभ-समाचार का प्रकाश, जो ईश्वर की प्रतिमा हैं, उन पर प्रकाशवान न हो जाए।

५ चूँकि हम अपने स्वयं का प्रवचन नहीं देते, बल्कि प्रभु मसीहा यीशु का; और यीशु के वास्ते हम स्वयं तुम्हारे ही सेवक।

६ चूँकि ईश्वर ही, जिन्होंने अन्धकार में से प्रकाश को बाहर प्रकाशवान होने का आदेश दिया, हमारे ही हृदयों में प्रकाशवान हो गए हैं, यीशु मसीह के चहरे में ईश्वर की महिमा के ज्ञान के प्रकाश को प्रदान कर देने हेतु।

७ परन्तु हमारे पास यह धनसंग्रह मिट्टी के पात्रों में है, ताकि शक्ती की सर्वश्रेष्ठता ईश्वर की हो, हमारी नहीं।

८ हम सभी दिशाओं से दबोचे जा रहे हैं, तथापि हम निचुड़े हुए नहीं हैं; हम निरुत्तर हैं, परन्तु निराश नहीं;

९ हम अत्याचारित हैं, परन्तु त्यागे हुए नहीं; नीचे गिरे हुए, परन्तु नष्ट नहीं;

१० शरीर में सर्वदा प्रभु यीशु की मृत्यु ढोते फिरते, ताकि यीशु का जीवन भी हमारे ही शरीर में प्रत्यक्ष हो जाए।  

११ क्योंकि हम जो जीवित हैं, हम यीशु के वास्ते ही सदैव मृत्यु में प्रदान हैं, ताकि यीशु का जीवन भी हमारे मरणशील शरीर में प्रत्यक्ष हो जाए।

१२ तो इस प्रकार मृत्यु हम में क्रियाशील है, परन्तु जीवन तुम में।

१३ हम उसी विश्वास के प्राण को रखते हुए, उसी के अनुसार जैसा यह लिखा हुआ है, मैंने विश्वास किया, और इसलिए ही मैं बोला; हम भी विश्वास करते हैं, और इसलिए ही बोलते हैं;

१४ इसका ज्ञान रखते हुए कि उन्होंने जिन्होंने प्रभु यीशु को ऊपर उठा दिया, वही यीशु द्वारा हमें भी ऊपर उठा देंगे, और हमें तुम्हारे साथ प्रस्तुत कर देंगे।

१५ क्योंकि सभी कुछ तुम्हारे ही वास्ते है, ताकि वो प्रचूर कृपा अनेकों के धन्यवाद द्वारा ईश्वर की महिमा के प्रति विपुल हो जाए।

१६ जिस कारण वश हम शिथिल नहीं होते; परन्तु यद्यपि हमारा बाह्य मानुष नष्ट हो रहा हो, तद्यपि वो आभ्यांतरिक मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नवीन हो रहा है।

१७ क्योंकि हमारी हल्की सी ही क्षणिक पीड़ा, हमारे लिए एक अति अत्याधिक और अनन्त भारवत महिमा क्रियाशील कर रही है;

१८ यद्यपि हम अपनी दृष्टि उन वस्तुओं पर नहीं टिका रहे हैं जो दृश्य हैं, बल्कि उन पर जो अदृश्य हैं: क्योंकि वो वस्तुएँ जो दृश्य हैं अनित्य हैं; परन्तु वो वस्तुएँ जो अदृश्य हैं, अनन्त हैं। 





पाँचवाँ अध्याय।


१ क्योंकि हमें यह ज्ञान है कि यदि हमारा यह पार्थिव घर जो इस तम्बू का है, विलय हो जाए, तो हमारे पास एक ईश्वर की इमारत है, बिन-हाथों द्वारा निर्मित एक घर, स्वर्गों में अनन्त।  

२ क्योंकि इस में तो हम कराहते हैं, उत्सुकता से अपने घर के साथ आवृत हो जाने की इच्छा करते हुए, जो स्वर्ग से है:  

३ यदि ऐसा हो कि आवृत होते हुए हम नग्न न पाए जाएँ।

४ क्योंकि हम जो इस तम्बू में हैं, कराह रहे हैं, बोझ तले दबे हुए: अनावृत होने की नहीं, बल्कि इसी पर ही आवृत हो जाने के इच्छित, ताकि मरणशीलता जीवन द्वारा निगल ली जाए।

५ अब जिन्होंने हमें इसी बात के लिए कार्यरत किया है ईश्वर ही हैं, जिन्होंने हमें प्राण का बयाना भी प्रदान कर दिया है।

६ इसलिए हम सर्वदा आश्वस्त हैं, यह ज्ञान रखते हुए कि, यद्यपि हम शरीर में घर पर ही हैं, हम प्रभु से अनुपस्थित हैं:

७ (क्योंकि हम विश्वास द्वारा चलते हैं, दृष्टि द्वारा नहीं:)

८ हम विश्वस्त हैं, मैं कहता हूँ, और इच्छुक कि हम तो बल्कि शरीर से अनुपस्थित हो, प्रभु के साथ उपस्थित हो जाएँ।   

९ इसी कारण वश हम श्रम करते हैं, कि, यदि उपस्थित या अनुपस्थित, हम उनके दारा स्वीकृत हो जाएँ।

१० क्योंकि निश्च्य से ही हम सभी को मसीहा के न्याय सिंघासन के समक्ष प्रस्तुत होना है; ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर में की गई बातों को ग्रहण कर ले, उसी के अनुसार जो उसने किया है, चाहे वो अच्छा हो या बुरा। 

११ इसलिए प्रभु के भय का ज्ञान रखते हुए, हम लोगों को विश्वस्त करते हैं; परन्तु हम ईश्वर के समक्ष प्रत्यक्ष हैं; और मुझे यह भरोसा है कि तुम्हारी अन्तरआत्माओं में भी हम प्रत्यक्ष हैं।

१२ क्योंकि हम अपने स्वयं की तुम्हारे प्रति पुनः सराहना नहीं करते, बल्कि तुम्हें हमारे हेतु गर्व मनाने का अवसर प्रदान कर रहे हैं, ताकि तुम्हारे पास कुछ उन्हें उत्तर देने योग्य हो, जो रूप-रंगानुसार तो गर्व करते हैं, परन्तु हृदय में नहीं।  

१३ क्योंकि चाहे हम बेसुध हों, यह ईश्वर के प्रति है: या चाहे हम संयमी हों, यह तुम्हारे वास्ते ही है।

१४ चूँकि मसीहा का प्रेम हमें बाध्य करता है; क्योंकि हम इस प्रकार निर्णय करते हैं, कि यदि एक सभी के लिए मरे हों, तो सभी मृत थे:

१५ और चूँकी वो सभी के लिए मरे, कि वो जो जी रहे हैं अब से लेकर अपने स्वयं के लिए न जीएँ, बल्कि उनके लिए जो उनके लिए मरे, और पुनः उठ गए।

१६ इस कारण इस समय पश्चात हम किसी भी व्यक्ति से शारीरिकतानुसार परिचय नहीं रखते: हाँ भई, यद्यपि हमने मसीहा से शारीरिकतानुसार परिचय रखा है, तद्यपि अब इस समय पश्चात हम उन से परिचित नहीं हैं। 

१७ इसलिए यदि कोई भी व्यक्ति मसीहा में हो, वही एक नवीन सृजन है: पिछली बातें बीत चुकी हैं; देखो तो, समस्त बातें नवीन बना दी गई हैं।

१८ और समस्त बातें ईश्वर की ही हैं, जिन्होंने हमारा अपने ही स्वयं के साथ सामंजस्य यीशु मसीह द्वारा करवा दिया है, और हमें सामंजस्यत्व की सेवाक्रिया प्रदान कर दी है;

१९ अर्थात्, कि ईश्वर मसीहा में थे, संसार का अपने स्वयं के साथ सामंजस्य करते हुए, उनके पापों को उन पर न ठहराते हुए; और उन्होंने सामंजस्यत्व का शब्द हमारे सुपुर्द कर दिया है।

२० तो अब हम मसीहा के लिए राजदूत हैं, मानो कि ईश्वर ने तुम से हमारे द्वारा याचना की हो: हम तुम से मसीहा के स्थान में प्रार्थना करते हैं, कि तुम भी ईश्वर के साथ सामंजस्य बना लो।

२१ क्योंकि उन्होंने उन्हें हमारे लिए पाप बना दिया, जिन्होंने कोई पाप नहीं जाना; ताकि हम उन्हीं में ईश्वर की नेकी बना दिए जाएँ।



छटा अध्याय।


१ अतः हम उनके साथ सहकर्मी होने के नाते, तुम से भी विनती करते हैं कि तुम ईश्वर की कृपा व्यर्थता में ग्रहण मत करो।

२ (क्योंकि वो कहते हैं, मैंने तुम्हें एक स्वीकृत समय में सुन लिया है, और बचाव के दिन में मैंने तुम्हारी सहायता कर दी है: देखो, अभी का ही है वो स्वीकृत समय; देखो, अभी का ही है ये बचाव का दिन!)

३ किसी भी बात में अवरोधित न करते हुए, ताकि सेवाकार्य को दोषी न ठहराया जाए:

४ बल्कि सभी बातों में स्वयं को ईश्वर के सेवक प्रमाणित करते हुए, धैर्यपूर्णता में, अत्याचारों में, आवश्यकताओं में, कष्टों में,

५ कोडों की धारियों में, बन्दीग्रहों में, कोलाहलों में, श्रमों में, अनिद्रताओं में, उपवासों में;

६ शुद्धता द्वारा, ज्ञान द्वारा, सहनशीलता द्वारा, दया द्वारा, पवित्र-प्राण द्वारा, निष्कपट प्रेम द्वारा,

७ सत्य के शब्द द्वारा, ईश्वर की शक्ती द्वारा, दाएँ और बाएँ हाथ में नेकी के शस्त्र द्वारा,

८ आदर और निरादर द्वारा, बुरी और अच्छी आख्या द्वारा: बहुरूपियों जैसे, और तब भी सच्चे;

९ अज्ञातों जैसे, और तब भी ज्ञात; मरते हुए जैसे, और देखो तो, हम जीते हैं; पीटे गए, परन्तु मारे गए नहीं;

१० हम शोकार्तित हैं, तब भी सर्वदा हर्षित; दरिद्रों जैसे, तब भी अनेकों को धनी बनाते हुए; कुछ भी न रखते हुए, और तब भी सब कुछ रखते हुए।

११ ओ तुम कुरिन्‍थुसवासियों, हमारा मूँह तुम्हारी ओर खुला हुआ है, हमारा हृदय अभिवर्धित है।

१२ तुम हम में तंग नहीं हो, बल्कि तुम अपनी स्वयं की ही प्रगाढ़ करुणाओं में तंग हुए हो भई!

१३ अब इसी में भुगतान हेतु, (मैं अपने बच्चों जैसों से कह रहा हूँ,) तुम भी अभिवर्धित हो जाओ।

१४ अविश्वासीयों के संग एक साथ असमान जुए में तुम मत जुतो: क्योंकि नेकी का अनैतिकता के साथ क्या साहचर्य है? और उजाले का अन्धकार संग क्या समन्वय है?

१५ और मसीहा का बलियल के साथ क्या समझौता है? या उसका जो विश्वास करता है, एक काफिर के संग क्या भाग है?  

१६ और ईश्वर के मन्दिर की, मूर्तियों के साथ क्या सहमति है? क्योंकि तुम जीवन्त ईश्वर का मन्दिर हो; जैसा ईश्वर ने बोला है, मैं उन में बसूँगा, और उन में चलूँगा; और मैं उनका ईश्वर बनूँगा, और वो मेरे लोग बन जाएँगे।

१७ इसी कारण उनके बीच में से बाहर निकल आओ, और तुम पृथक हो जाओ, कहते हैं प्रभु, और अस्वच्छ वस्तु को मत छुओ; और मैं तुम्हें ग्रहण कर लूँगा,

१८ और मैं तुम्हारे प्रति एक पिता बन जाऊँगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियाँ बन जाओगे, कहते हैं प्रभु सर्वबलशाली।






सातवाँ अध्याय।


१ इसलिए मेरे अतिप्रियों, इन प्रतिज्ञाओं को रखते हुए, हमें स्वयं को शरीर और प्राण की समस्त मलिनता से विमल कर लेना चाहिए, पवित्रता को ईश्वर के भय में परिपूर्ण करते हुए। 

२ ग्रहण कर लो हमें, हमने किसी भी व्यक्ति को हानि नहीं पहुँचाई है भई; हमने किसी को भी भ्रष्ट नहीं किया है, हमने किसी को भी धोखा नहीं दिया है।

३ मैं यह तुम पर दोष लगाने के लिए नहीं कह रहा हूँ: क्योंकि मैं पहले ही कह चुका हूँ, कि तुम हमारे हृदयों में हो, तुम्हारे ही साथ मरने और जीने हेतु। 

४ तुम्हारे प्रति मेरी वक्तृता का साहस अति विशाल है, तुम्हारे प्रति मेरा गर्व अति बृहत्त है: मैं सान्त्वना से भरपूर हूँ, मैं हमारी समस्त आपत्ती में आधिक्यता से हर्ष मनाता हूँ।

५ क्योंकि जब हम मकिदुनिया में पहुँच गए थे, हमारे देह ने कोई विश्राम नहीं पाया, बल्कि हम सभी दिशाओं में कष्टों से घिरे हुए थे; बाहर लड़ाई-झगड़े थे, भीतर भय और डर थे।

६ तथापि ईश्वर ने, जो नीचे गिरे हुओं को सान्त्वना प्रदान करते हैं, हमें तीतुस के आगमन द्वारा सान्त्वनित कर दिया;

७ और केवल उसके आगमन द्वारा ही नहीं, बल्कि उस सान्त्वना द्वारा जिस से वो तुम में आश्वस्त था, जब उसने हम से तुम्हारी उत्सुक इच्छा, तुम्हारा शोक, तुम्हारा मेरे प्रति उत्कट मन व्यक्त किया; ताकि मैंने और भी अधिक हर्ष मनाया।

८ क्योंकि यद्यपि मैंने एक पत्र द्वारा तुम्हें दुखी कर दिया हो, तो मुझे खेद नहीं है, यद्यपि मुझे खेद हुआ: क्योंकि मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि उसी पत्र ने तुम्हें दुःख दिया, भले ही वो कुछ ही समय के लिए था।

९ अब मैं हर्षित हूँ, इसलिए नहीं कि तुम दुखी कर दिए गए थे, बल्कि इसलिए कि तुमने मन-परिवर्तन के प्रति दुःख मनाया: क्योंकि तुम्हें एक ईश्वरीय प्रकार से दुःख दिलवाया गया था, ताकि किसी भी विषय में तुम्हें हम से क्षति न पहुँचे।

१० क्योंकि ईश्वरीय दुःख बचाव के प्रति मन-परिवर्तन क्रियाशील करता है, जिस से मन-परिवर्तन नहीं करना पड़ता: परन्तु सांसारिक दुःख मृत्यु क्रियाशील करता है। 

११ तो भई अब इसी बात को ही देख लो, कि तुमने ईश्वरीय प्रकार से दुःख मनाया, तो तुम में क्या कर्मठता क्रियाशील हुई, हाँ भई क्या प्रतिरक्षा, हाँ भई क्या रोष, हाँ भई क्या भय, हाँ भई क्या उत्कंठता, हाँ भई क्या जोश, हाँ भई क्या प्रतिषोध! सभी बातों में तुमने स्वयं को इस विषय में निर्दोष अनुमोदित कर दिया है।

१२ इस कारण वश, भले ही मैंने तुम्हें लिखा, मैंने उसके कारण नहीं लिखा जिसने वो त्रुटि की थी, न ही उसके कारण जिसने वो त्रुटि सही, बल्कि ताकि ईश्वर की दृष्टि में तुम्हारे प्रति हमारा ध्यान तुम्हें प्रत्यक्ष हो सके। 

१३ इसलिए हम तुम्हारी सान्त्वना में सान्त्वनित हुए: हाँ भई, और अधिक आधिक्यता से हम तीतुस के हर्ष में हर्षित हुए, क्योंकि उसका प्राण तुम सभी द्वारा पुनश्चर्यित हो गया था। 

१४ क्योंकि यदि मैंने तुम पर उस से किसी भी बात में गर्व मनाया हो, तो मैं लज्जित नहीं हूँ; बल्कि जिस प्रकार हमने तुमसे सभी बातें सच्चाई से कहीं, इसी प्रकार हमारा गर्व मनाना, जिसे मैंने तीतुस के समक्ष मनाया, सच्चाई ही है।

१५ और तुम्हारे प्रति उसका आभ्यांतरिक स्नेह अत्याधिक है, जैसे वो तुम सभी के अनुपालन का स्मरण करता है, कि कैसे भय और कम्पन के साथ तुमने उसका स्वागत किया।

१६ इसलिए मैं हर्ष मनाता हूँ कि मैं तुम में सभी बातों हेतु विश्वस्त हूँ।




आठवाँ अध्याय।


१ इसके अतिरिक्त, भाई-जनो, हम तुम्हें ईश्वर की उस कृपा से अवगत करवा देना चाहते हैं जो मकिदुनिया के कलिसियों को प्रदान है;

२ कि कैसे कष्ट के एक विशाल परीक्षण में उनके हर्ष का आधिक्य, और उनकी प्रगाढ़ दरिद्रता, उनकी उदारता के धन-धान्य के प्रति प्रचूर हुई।

३ अब उनके सामर्थ्य प्रति, मैं साक्ष्य देता हूँ, हाँ भई, और उनके सामर्थ्य-पार वो अपने स्वयं से ही इच्छित थे;

४ हम से बहुत ही आग्रह से प्रार्थना करते हुए, कि हम वो उपहार ग्रहण कर लें, और कि हम सन्तों के प्रति उस सेवाकार्य का साहचर्य अपने पर ले लें।

५ और यही उन्होंने भी किया, वैसे नहीं जैसी हमने आशा की थी, बल्कि सर्वप्रथम उन्होंने अपने स्वयं को प्रभु के प्रति, और हमारे प्रति, ईश्वर की ही इच्छानुसार, अर्पित कर दिया।

६ यहाँ तक कि हमारी इच्छा थी कि तीतुस, जिस प्रकार उसने आरम्भ किया था, उसी प्रकार वो तुम में उसी कृपा को पूर्ण भी कर दे।

७ इसलिए, जिस प्रकार तुम प्रत्येक बात में, विश्वास में, और अर्णन में, और ज्ञान में, और सम्पूर्ण कर्मठता में, और हमारे प्रति अपने प्रेम में प्रचूर हो, देख लो भई कि तुम इस कृपा में भी प्रचूर हो जाओ। 

८ मैं आदेश द्वारा नहीं, बल्कि औरों की उत्सुकता कारण वश बोल रहा हूँ, और तुम्हारे प्रेम की नेकनीयती को प्रमाणित करने हेतु। 

९ क्योंकि तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह की कृपा का ज्ञान है, कि यद्यपि वो धनवान थे, तद्यपि तुम्हारे वास्ते वो दरिद्र बन गए, ताकि तुम उन्हीं की दरिद्रता द्वारा धनवान बन जाओ।

१० और इस समबन्ध में मैं अपना सुझाव देता हूँ: क्योंकि यह तुम्हारे लिए लाभकारी है, जिन्होंने पहले से ही आरम्भ कर लिया है, न केवल करने के लिए, बल्कि एक वर्ष पूर्व इच्छित होने के लिए भी।

११ अब इसलिए उसकी करनी को क्रियान्वित कर दो; ताकि जिस प्रकार इच्छित होने का औत्सुक्य था, उसी प्रकार प्रदर्शन भी हो सके, उसी में से जो तुम्हारे पास है। 

१२ क्योंकि यदि मन पहले से ही इच्छित हो, इसकी स्वीकृति उसके अनुसार है जो किसी व्यक्ति के पास है, और उसके अनुसार नहीं जो उसके पास नहीं है।

१३ मेरा यह अर्थ नहीं है कि अन्य लोग निश्चिन्त हो जाएँ, और तुम बोझ तले दब जाओ:

१४ बल्कि एक-तुल्यता से, ताकि अब इस समय तुम्हारी आधिक्यता उनके अभाव का प्रदाय बन सके, ताकि उनकी आधिक्यता भी तुम्हारे अभाव का प्रदाय बन सके: ताकि एक-तुल्यता बनी रहे:

१५ जैसा कि यह लिखा हुआ है, उसने जिसने अधिकता से बटोरा आधिक्यहीन ही रहा; और उसने जिसने अल्पता से बटोरा, अल्पहीन ही रहा। 

१६ परन्तु ईश्वर को धन्यवाद दिया जाए, जिन्होंने तुम्हारे प्रति तीतुस के हृदय में वही तत्पर ध्यान डाल दिया।

१७ क्योंकि वास्तव में ही उसने यह अभिप्रेरणा स्वीकार की; परन्तु अधिक उत्साही होता हुआ, अपनी ही स्वेच्छा से वो तुम्हारे पास चला गया।

१८ और हमने उसके साथ उस भाई को भी भेजा है, जिसकी शुभ-समाचार में प्रशन्सा सभी कलिसियों के सर्वत्र में प्रचलित है;

१९ और यही नहीं, बल्कि जो कलिसियों द्वारा भी चुना गया था, हमारे संग इस कृपा के साथ यात्रा करने हेतु, जो हमारे द्वारा सेवारत की जाती है, उन्हीं प्रभु की महिमा के प्रति, और तुम्हारे उद्यत मन की घोषणा हेतु:  

२० यह परिवर्जन करते हुए, कि कोई भी व्यक्ति हम पर इस आधिक्यता समबन्धी दोष न लगाए, जो हमारे द्वारा सेवारत की जाती है:

२१ सच्चरित्र बातें न केवल प्रभु की दृष्टि समक्ष उपलब्ध करवाते हुए, बल्कि लोगों की दृष्टि समक्ष भी।

२२ और हमने उनके साथ अपने भाई को भेजा है, जिसे हमने कई बार कई बातों में कर्मठ प्रमाणित किया है, परन्तु अब और भी अधिक कर्मठ, उस बड़े असंशय पर जो मुझे तुम में है।

२३ यदि कोई भी तीतुस के विषय में पूछताछ कर रहा हो, वो तुम्हारे समबन्ध में मेरा साथी और सहयोगी है: या हमारे भाई-जनो के विषय में पूछताछ की जा रही हो, वो कलिसियों के दूत हैं, और मसीहा की महिमा।

२४ इसी कारण वश तुम उन्हें और कलिसियों के समक्ष, अपने प्रेम, और तुम्हारे हेतु हमारे गर्व का प्रमाण प्रदर्शित कर दो।




नौवाँ अध्याय।


१ क्योंकि सन्तों के प्रति सेवा के विषय में, मेरे लिए तुम्हें कुछ भी लिखना अत्याधिक होगा:

२ क्योंकि मैं तुम्हारे मन की उत्सुकता से परिचित हूँ, जिसका मैं मकिदुनिया-वालों से गर्व करता हूँ, कि अकाया एक वर्ष पूर्व उद्यत था; और तुम्हारे उत्साह ने बहुतों को उद्दीप्त कर दिया है।

३ तथापि मैंने भाई-जनो को भेज दिया है, कहिं हमारा गर्व तुम्हारे प्रति इस हेतु व्यर्थ न हो जाए; कि जैसा मैंने कहा, तुम उद्यत हो सको:

४ कहिं किसी प्रकार से यदि वो जो मकिदुनिया के हैं मेरे साथ पधारें, और तुम्हें उद्यत न पाएँ, और हम (ताकि हम ये न कहें कि तुम) लज्जित हो जाएँ इसी असंशित गर्व में। 

५ इसलिए मुझे यह अनिवार्य प्रतीत हुआ कि मैं भाई-जनो को अभिप्रेरित करूँ, ताकि वो पहले ही तुम्हारे पास चले जाएँ, और पहले से ही तुम्हारे आशीष को उद्यत कर दें, जिसकी सूचना तुम्हें पहले से ही थी, ताकि वही उद्यत हो सके, आशीष के विषय में ही, और न कि लोलुप्ता के समबन्ध में।

६ परन्तु मैं यह कहता हूँ, कि वो जो कृपणता से बोता है, कृपणता से ही फसल काटेगा; और वो जो उदारता से बोता है, उदारता से ही फसल काटेगा।

७ प्रत्येक व्यक्ति को अपने ही हृदय के उद्देश्यानुसर दे देने दो; दुखी होते हुए नहीं, न ही विवशता पूर्वक: चूँकि ईश्वर खुशी-खुशी से देने वाले से प्रेम करते हैं।

८ और ईश्वर तुम्हारे प्रति सर्व-कृपा प्रचूर करवाने में सक्षम हैं; ताकि तुम, सदैव सभी बातों में सर्व-पर्याप्तता रखते हुए, प्रत्येक अच्छे कार्य प्रति प्रचूर हो सको:

९ (जैसा कि यह लिखा हुआ है, उन्होंने बिखेर दिया है बाहर; उन्होंने दरिद्रों को दे दिया है: उनकी नेकी सदा के लिए रहती है।

१० अब वो जो बोनेवाले को बीज की आपूर्ति करते हैं, तुम्हारे भोजन के लिए रोटी, और तुम्हारे बोए हुए बीज के लिए गुणन पर्याप्त करें, और तुम्हारी नेकी के फलों के लिए बढ़ौतरी;) 

११ सभी बातों में सर्व-उदारता हेतु समृद्ध, जो हमारे द्वारा ईश्वर के प्रति कृतज्ञता क्रियान्वित करवाती है।

१२ क्योंकि इस सेवाकार्य का सेवारत होना न केवल सन्तों की कमी की आपूर्ती करता है, बल्कि वो कई धन्यवादों द्वारा ईश्वर प्रति प्रचूर भी है;

१३ यद्यपि इस सेवाकार्य के अनुभव द्वारा वो ईश्वर का महिमामण्डन करते हैं, तुम्हारी मसीहा के शुभ-समाचार प्रति व्यक्त आधीनता हेतु, और तुम्हारे उनके और सभी लोगों के प्रति उदार वितरण हेतु;

१४ और तुम्हारे लिए उनकी प्रार्थना द्वारा, जो तुम्हारे लिए लालसा करते हैं, तुम में ईश्वर की उस अत्याधिक कृपा के कारण।

१५ ईश्वर को धन्यवाद हो उनके अवर्णनीय उपहार के लिए।



दसवाँ अध्याय।


१ अब स्वयं मैं ही पौलुस तुम से मसीहा के विनय और विनीतता द्वारा निवेदन करता हूँ, जो तुम्हारे बीच उपस्थिति में तो नीचा हूँ, परन्तु अनुपस्थिति में मैं तुम्हारे प्रति निर्भीक हूँ:

२ परन्तु मैं तुम से निवेदन करता हूँ, कि मैं निर्भीक न बनूँ जब मैं उस विश्वस्तता के साथ उपस्थित हूँ, जिसके द्वारा मैं कुछों के विरुद्ध निर्भीक होने की सोच रखता हूँ, जो हमारे विषय में सोचते हैं कि मानो हम शारीरिकतानुसार चले थे।

३ चूँकि भले ही हम शरीर में चलते हैं, हम शरीरानुसार युद्ध नहीं करते:

४ (क्योंकि युद्ध के हमारे अस्त्र-शत्र दैहिक नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा शक्तिमान हैं, बलशाली गढ़ों को नीचे गिरा देने हेतु:)

५ तर्क-वितर्कों को, और उस प्रत्येक ऊँची बात को नीचे गिराते हुए, जो ईश्वर के ज्ञान विरुद्ध स्वयं को पदोन्नत करती है, और प्रत्येक विचार को मसीहा के अनुपालन हेतु बन्धन में लाते हुए;

६ और समस्त अवज्ञा का प्रतिषोध लेने हेतु उद्यतता रखते हुए, जब तुम्हारी आज्ञाकारिता सम्पूर्ण होती है।

७ क्या तुम वस्तुओं के बाह्य रूप-रंग को ही देखते रहते हो क्या? यदि कोई भी व्यक्ति स्वयं में यह विश्वास रखता है कि वो मसीहा का है, उसे स्वयं के विषय में यह पुनः सोच लेने दो, कि, जैसे वो मसीहा का है, उसी प्रकार हम भी मसीहा के ही हैं।

८ क्योंकि भले ही मुझे हमारे प्राधिकार हेतु थोड़ा बहुत गौरव मना ही लेना चाहिए, जिसे प्रभु ने हमें आध्यात्मिक-निर्माण हेतु प्रदान किया है, और न कि तुम्हारे विनाश हेतु, मुझे लज्जित नहीं होना चाहिए:

९ ताकि मैं ऐसा न प्रतीत होऊँ मानो कि मैं तुम्हें पत्रों द्वारा आतंकित करता हूँ।

१० क्योंकि वो कहते हैं, कि भई उसके पत्र तो गम्भीर और शक्तिशाली हैं; परन्तु उसकी दैहिक उपस्थिति दुर्बल है, और उसकी वक्तृता निन्दनीय। 

११ ऐसे को ये विचार कर लेने दो, कि, जैसे हम शब्द में हैं पत्रों द्वारा अनुपस्थिति में, वैसे ही हम कर्मों में भी होंगे उपस्थिति में।

१२ क्योंकि हम यह साहस नहीं करते अपने स्वयं की गिनती उनके साथ करने में, या स्वयं अपनी अपेक्षा उनके साथ करने में, जो स्वयं की सराहना करते हैं: बल्कि वो स्वयं का माप स्वयं ही के साथ करते हुए, और स्वयं की तुलना आपस में ही करते हुए, विद्वान नहीं हैं। 

१३ परन्तु हम अपनी सीमा के पार की बातों पर गर्व नहीं करेंगे, बल्कि उस मापदण्ड के मापानुसार जो ईश्वर ने हमें वितरित किया है, एक माप तुम्हीं तक पहुँच जाने के लिए!

१४ क्योंकि हम स्वयं को अपने माप से अधिक नहीं खींचते हैं, मानो कि हम तुम तक पहुँचे ही न हों: क्योंकि हम तो तुम्हारे पास इतनी दूर तक भी आ गए हैं मसीहा के शुभ-समाचार का प्रवचन देते हुए:

१५ हमारी सीमा के पार की बातों पर गर्व न मनाते हुए, अर्थात दूसरों के श्रमों पर; बल्कि यह आशा रखते हुए, कि जब तुम्हारे विश्वास की बढ़ौतरी होगी, तो हम भी तुम्हारे द्वारा अत्याधिकता से अभिवर्धित हो जाएँगे हमारे ही मापदण्डानुसार,

१६ तुम्हारे पार के उन क्षेत्रों में शुभ-समाचार का प्रवचन देने के लिए, और न कि हम किसी अन्य व्यक्ति के माप में उद्यत की गई बातों पर गर्व करें।

१७ परन्तु वो जो गर्व मना रहा है, उसे प्रभु में ही गर्व मना लेने दो।

१८ क्योंकि वो अनुमोदित नहीं होता जो स्वयं की सराहना करता है, बल्कि वो अनुमोदित होता है जिसकी ईश्वर सराहना करते हैं। 




ग्यारहवाँ अध्याय। 


१ काश कि तुम मुझे मेरी मूर्खता में थोड़ा सा झेल लेते: और अवश्य ही झेल लो मुझे भई!

२ क्योंकि मैं तुम्हारे प्रति ईश्वरीय ईर्षा से ईर्षालू हूँ: क्योंकि मैंने तुम्हारी मंगनी एक पति के साथ कर दी है, ताकि मैं तुम्हें एक प्रांजल कुँवारी स्वरूप मसीहा को प्रस्तुत कर सकूँ।

३ परन्तु मुझे भय है, कहिं किसी भी प्रकार से, जैसे साँप ने हव्वा को अपनी चालाकी से छलित कर दिया था, वैसे ही तुम्हारे मन मसीहा में नेकनीयती से भ्रष्ट न हो जाएँ।

४ क्योंकि यदि कोई आकर किसी अन्य यीशु का प्रवचन देता है, जिसका हमने प्रवचन नहीं दिया, या फिर तुम कोई अन्य प्राण ग्रहण करते हो, जिसे तुमने ग्रहण नहीं किया, या कोई अन्य शुभ-समाचार, जिसे तुमने स्वीकार नहीं किया, तुम उसे तो भला झेलते रहो।

५ क्योंकि मैं यह सोचता हूँ कि मैं सब से प्रमुख अपौस्लों में से किसी से भी कम नहीं था।

६ अब भले ही मैं बोल-चाल में असभ्य हूँ, तथापि ज्ञान में नहीं; बल्कि हम सम्पूर्णता से तुम्हारे बीच सभी बातों में प्रत्यक्ष कर दिए जा चुके हैं।

७ क्या मैंने कोई अपराध कर दिया है स्वयं को पदावनत करने में ताकि तुम पदोन्नत हो जाओ, क्योंकि मैंने तुम्हें ईश्वर के शुभ-समाचार का प्रवचन निशुल्क प्रदान किया?

८ भई मैंने तो तुम्हारी सेवा करने के लिए दूसरे कलिसियों पर डाका डाला, उनसे वेतन लेकर।

९ और जब मैं तुम्हारे साथ उपस्थित था, और मुझे कमी पड़ी, मैं किसी भी व्यक्ति पर बोझ नहीं बना: क्योंकि मेरे अभाव की आपूर्ति मकिदुनिया से आए भाई-जनो ने पूरी की: और सभी बातों में मैंने स्वयं को तुम पर बोझ नहीं बनने दिया, और इसी प्रकार ही मैं स्वयं को रखूँगा। 

१० जैसे मसीहा का सत्य मुझ में है, कोई भी मुझे अकाया के क्षेत्रों में इस गर्व को मनाने से रोकेगा नहीं। 

११ किस कारण? क्योंकि मैं तुम से प्रेम नहीं करता? ईश्वर जानते हैं।

१२ परन्तु वो जो मैं करता हूँ, वही मैं करूँगा, ताकि मैं उनके दाँवपेंच काट सकूँ जो दाँवपेंच करना चाहते हैं; ताकि जिस में वो घमंड करते हैं, वो उसी में हमारे समान ही पाए जाएँ।  

१३ क्योंकि ऐसे ही हैं झूठे अपौस्ल, धोखेबाज़ कार्यकर्ता, मसीहा के अपौस्लों में स्वयं का रूपांतरण करते हुए। 

१४ और अचम्भा मत करो; क्योंकि शैतान स्वयं ही उजाले के एक दूत में रूपांतरित है। 

१५ इसलिए यह कोई बड़ी बात नहीं है यदि उसके सेवक भी नेकी के सेवकों समान रूपांतरित हों; जिनका अंत उनके कर्मोंनुसार हो जाएगा।

१६ मैं पुनः कहता हूँ, कि कोई भी व्यक्ति मुझे मूर्ख न समझे; अन्यथा मुझे एक मूर्ख ही के समान ग्रहण कर लो, ताकि मैं स्वयं थोड़ा बहुत गर्व मना सकूँ।

१७ वो जो मैं बोल रहा हूँ, मैं वो प्रभु के अनुसार नहीं बोल रहा हूँ, बल्कि मानो कि मूर्खता में, इसी गर्व की विश्वस्तता में।

१८ यह देखते हुए कि कई शारीरिकतानुसार गर्व करते हैं, तो मैं भी गर्व करूँगा।

१९ चूँकि भई तुम मूर्खों को तो प्रसन्नता से सह लेते हो, ये देखते हुए कि तुम तो स्वयं ही विद्वान हो।

२० क्योंकि तुम ये तो सह लेते हो, यदि कोई व्यक्ति तुम्हें बंध्वा-बेगारी में डाल दे, या कोई तुम्हारा भुख-भक्षण कर दे, या कोई तुम से ले ले, या कोई स्वयं को पदोन्नत कर दे, या कोई तुम्हें तुम्हारे चहरे पर थप्पड़ मार दे।

२१ मैं धिक्कार के विषय में बोल रहा हूँ, मानो कि हम दुर्बल रहे हों। तथापि जिस किसी भी विषय में कोई साहसी है, (मैं मूर्खता से बोलता हूँ,) मैं भी साहसी हूँ।

२२ क्या वो इब्रानी हैं? तो मैं भी हूँ। क्या वो इस्राएली हैं? तो मैं भी हूँ। भई क्या वो अब्राहम के बीज हैं? तो मैं भी हूँ।

२३ क्या वो मसीहा के सेवक हैं? (मैं मूर्खता से बोलता हूँ) मैं उन से बढ़कर हूँ; श्रमों में अत्याधिक, कोड़ों की धारियों में प्रचूर, कारावासों में हद से पार, मृत्युओं में बार-बार!

२४ यहूदियों से मैंने पाँच बार चालीस से एक कम, कोड़े खाए।

२५ तीन बार मुझे बैंत से पीटा गया, एक बार मुझ पर पथराव कर दिया गया, तीन बार मैंने जलयान-ध्वंस सहा, एक रात और एक दिन मैं गहराईयों में रहा हूँ;

२६ यात्राओं में प्रायः, पानियों के संकटों में, डकैतों के संकटों में, मेरे अपने ही देश वासियों के संकटों में, काफिरों के संकटों में, नगर में संकटों में, जँगली-क्षेत्र में संकटों में, समुद्र में संकटों में, झूठे भाई-जनो के बीच संकटों में;

२७ परिश्रम और पीढ़ा में, अनिद्रताओं में कई बार, भूख और प्यास में, उपवासों में प्रायः, ठण्ड और वस्त्रहीनता में।

२८ इन बाह्य बातों के अतिरिक्त, सभी कलिसियों की चिन्ता, जो मुझ पर दिन-प्रतिदिन आ पड़ती है!

२९ कौन दुर्बल है, और मैं दुर्बल नहीं? भई कौन अवरोधित है, और मैं जलता नहीं?

३० यदि मुझे गर्व ही करना है, तो मैं उन बातों के विषय में गर्व करूँगा जो मेरी दुर्बलताओं से सम्बंधित हैं।

३१ हमारे प्रभु यीशु मसीह के ईश्वर और पिताश्री, जो सदा के लिए धन्य हैं, जानते हैं कि मैं झूठ नहीं बोल रहा।

३२ दमिश्क में राजा अरेता के अधीनस्थ राज्यपाल ने मुझे पकड़ लेने की इच्छा से, उस दमिश्कवासियों के नगर पर पहरेदारी लगा रखी थी, 

३३ और एक टोकरे में, एक खिड़की में से मुझे दीवार के साथ-साथ नीचे कर दिया गया था, और मैं उसके हाथों से बच निकला।



बारहवाँ अध्याय।


१ निस्संदेह मेरे लिए गर्व करना हितकर नहीं है। मैं प्रभु के दृश्यों और प्रत्यक्षिकरणो पर आता हूँ।

२ मैं चौदह वर्षों से अधिक पूर्व, मसीहा में एक पुरुष से परिचित था, (यदि देह सहित, मैं नहीं बता सकता; या फिर देह रहित, मैं नहीं बता सकता: ईश्वर जानते हैं;) ऐसा एक जो तीसरे स्वर्ग तक ऊपर पकड़ कर छीन लिया गया था।

३ और मैं ऐसे एक पुरुष से परिचित था, (यदि देह सहित, या देह रहित, मैं यह नहीं बता सकता: ईश्वर जानते हैं;)

४ कि वो कैसे ऊपर स्वर्गलोक में पकड़ कर छीन लिया गया था, और उसने अवर्णनीय शब्द सुने, जिनका अर्णन करना किसी भी व्यक्ति के लिए नियम-विरुद्ध है।

५ इस ऐसे व्यक्ति पर मैं गर्व मनाऊँगा: तथापि अपने स्वयं के विषय में मैं गर्व नहीं मनाऊँगा, बल्कि अपनी दुर्बलताओं में।

६ क्योंकि भले ही मैं गर्व करने की इच्छा करूँ, मैं मूर्ख नहीं बनूँगा; क्योंकि मैं सत्य बोलूँगा: परन्तु अब मैं रुक जाता हूँ, कहिं कोई भी व्यक्ति, जो मैं हूँ वो देख कर, या मेरे विषय में सुन कर, मेरे समबन्ध में उस से बढ़-चढ़ कर न सोच ले। 

७ और कहिं मैं उन प्रत्यक्षिकरणो की बहुतायत द्वारा हद से पार घमण्ड न कर बैठूँ, मुझे माँस में एक काँटा प्रदान कर दिया गया था, शैतान का एक दूत मुझे घूँसे मारने के लिए, कहिं मैं हद से पार घमण्डी न बन जाऊँ।

८ इसी बात के लिए मैंने प्रभु से तीन बार निवेदन किया, कि वो मुझ से दूर हो जाए।

९ और उन्होंने मुझ से कहा, मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है: क्योंकि मेरी शक्ती दुर्बलता द्वारा परिपूर्ण बनती है। अति प्रसन्नता से इसलिए मैं अपेक्षाकृत अपनी दुर्बलताओं में गर्व मनाऊँगा, ताकि मसीहा की शक्ती मुझ पर ठहर सके।

१० इसलिए मैं दुर्बलताओं में, निन्दाओं में, आवश्यकताओं में, अत्याचारों में, मसीहा के वास्ते कष्टों में, आनन्द मनाता हूँ: चूँकि जब मैं दुर्बल हूँ, तभी मैं प्रबल हूँ।

११ मैं तो भई गर्व करता हुआ एक मूर्ख बन चुका हूँ; तुम ने तो मुझे विवश कर दिया है: क्योंकि मेरी तो तुम्हारे द्वारा सराहना की जानी चाहिए थी: क्योंकि मैं किसी भी विषय में सब से प्रमुख अपौस्लों में से किसी से भी कम नहीं हूँ, भले ही मैं कुछ भी नहीं हूँ।

१२ सच में तुम्हारे बीच, सर्व धैर्यता के साथ, संकेतों में, और अचरजों में, और बलशाली कार्यों में, एक अपौस्ल के संकेत कार्यरत किए गए थे। 

१३ तो फिर वो क्या है जिस में कि तुम सभी अन्य कलिसियों से कम रह गए, सिवाय कि मैं स्वयं तुम पर बोझ नहीं बना था? मेरी यह त्रुटि क्षमा कर दो भई।

१४ देख लो, इस तीसरी बार मैं तुम्हारे पास आने के लिए तैयार हूँ; और मैं तुम पर बोझ नहीं बनूँगा: क्योंकि मैं तुम्हारे से नहीं, बल्कि तुम्हें चाह रहा हूँ: क्योंकि बच्चों को पिता-माता के लिए धन संचय नहीं करना चाहिए, बल्कि पिता-माता को बच्चों के लिए।

१५ और मैं बहुत प्रसन्नता से खर्च करूँगा, और तुम्हारे लिए खर्च हो जाऊँगा; तथापि जितनी अधिकता से मैं तुम से प्यार करता हूँ, उतनी ही लघुता से मैं तुम्हारा प्यारा हूँ।

१६ पर रहने दो इसे ऐसे ही, मैंने तुम पर बोझ नहीं डाला: तब भी चतुराई से मैंने तुम्हें छल के साथ पकड़ लिया।  

१७ क्या मैंने तुम से उनके द्वारा कोई लाभ कमाया जिन्हें मैंने तुम्हारे पास भेजा था?

१८ मैंने तीतुस से इच्छा व्यक्त की, और उसके संग मैंने एक भाई को भेजा। क्या तीतुस ने तुम से कोई लाभ कमाया? क्या हम एक समान प्राण में नहीं चले क्या? क्या हम एक समान पद-चिन्हों पर नहीं चले क्या?

१९ तो फिर से भई, क्या तुम सोचते हो कि हम तुम्हारे प्रति अपनी सफाई प्रस्तुत कर रहे हैं? हम ईश्वर के समक्ष मसीहा में बोलते हैं: परन्तु हम सभी कुछ तुम्हारे आध्यात्मिक-निर्माण हेतु करते हैं, अति प्रीयों!

२० क्योंकि मुझे यह भय है, कहिं, जब मैं आऊँ, मैं तुम्हें वैसा न पाऊँ जैसा कि मैं चाहता हूँ, और कि मैं तुम्हारे प्रति वैसा पाया जाऊँ जैसा कि तुम नहीं चाहते: कहिं वाक्-युद्ध, ईर्षाओं की जलन, आक्रोश, विग्रह, मानहानियाँ, कानाफूसियाँ, अभिमान, क्रमभंगताएँ हो रही हों:

२१ और कहिं, जब मैं दोबारा आऊँ, मेरे ईश्वर मुझे तुम्हारे बीच विनम्र कर दें, और कि मैं छाती पीट-पीट कर कईयों के लिए बिलख कर रोऊँ जिन्होंने पहले से ही पाप कर डाला है, और उस अस्वच्छता और अविवाहित-यौन और कामुकता से मन-परिवर्तन नहीं किया है, जिसे उन सब ने कर डाला है।



तेरहवाँ अध्याय।


१ यह अब तीसरी बार है कि मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ। दो या तीन साक्षियों के मूँह से प्रत्येक शब्द प्रमाणित कर दिया जाएगा।

२ मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया था, और मैं तुम्हें पहले से ही बता रहा हूँ, मानो कि मैं उस दूसरी बार उपस्थित था; और अब इस समय अनुपस्थित हो मैं उन्हें लिख रहा हूँ जिन्होंने अभी तक भी पाप किए रखा है, और उन सभी अन्यों को, कि यदि मैं दोबारा आऊँगा, मैं बक्शूँगा नहीं:

३ क्योंकि तुम मुझ में मसीहा के बोलने का प्रमाण ढूँढ रहे हो, जो तुम्हारे प्रति दुर्बल नहीं हैं, बल्कि तुम्हीं में बलशाली हैं।

४ क्योंकि भले ही वो दुर्बलता द्वारा क्रूस पर चढ़ा दिए गए थे, तदापि वो ईश्वर की शक्ती द्वारा जीते हैं। क्योंकि हम भी उन्हीं में दुर्बल हैं, परन्तु हम उन्हीं के साथ जीएँगे तुम्हारे ही प्रति ईश्वर की शक्ती द्वारा।

५ अपने आप को जाँच लो, यदि तुम विश्वास में हो या नहीं; अपने स्वयं को प्रमाणित करो। क्या तुम अपने ही आप से परिचित नहीं हो क्या, कि कैसे यीशु मसीह तुम्हीं में हैं, सिवाय कि तुम निरर्हित हो?

६ परन्तु मुझे यह भरोसा है कि तुम यह जान जाओगे कि हम निरर्हित नहीं हैं।

७ मैं अब ईश्वर से यह प्रार्थना करता हूँ कि तुम कोई भी बुराई मत करो; ऐसा नहीं कि हम अनुमोदित दिखाई पड़ें, बल्कि तुम वही करो जो निष्कपट है, भले ही हम निरर्हितों जैसे ही हों।

८ क्योंकि हम सत्य के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकते, बल्कि सत्य के प्रति।

९ क्योंकि हम प्रसन्न होते हैं, जब हम दुर्बल और तुम बलशाली होते हो: और यह भी हम चाहते है, तुम्हारी ही परिपूर्णता।

१० इसलिए मैं यह बातें अनुपस्थित होता हुआ लिख रहा हूँ, कहिं उपस्थित होता हुआ मैं तीक्ष्णता का प्रयोग करूँ, उस शक्तीनुसार जिसे प्रभु ने मुझे आध्यात्मिक-निर्माण हेतु प्रदान की है, और न कि विनाश हेतु।

११ अन्ततः भाई-जनो, विदाई। परिपूर्ण रहो, अच्छे सान्त्वनित रहो, एक ही मन के रहो, शान्ति में रहो; और प्रेम और शान्ति के ईश्वर तुम्हारे साथ रहेंगे।

१२ एक दूसरे का एक पवित्र चुम्बन द्वारा अभिवादन करो।

१३ सभी संत तुम्हें प्रणाम करते हैं।

१४ प्रभु यीशु मसीह की कृपा, और ईश्वर का प्रेम, और पवित्र-प्राण का समन्वय, तुम सभी के साथ रहे। तथास्तु।



०९/१३/२०२३: 

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