इफिसुसवासियों के लिए पौलुस का पत्र।(Ephesians)
पहला अध्याय।
१ पौलुस, ईश्वर की इच्छानुसार यीशु मसीह का एक अपौस्ल, उन सन्तों को जो इफिसुस में हैं, और मसीहा यीशु में विश्वसनीयों को:
२ तुम्हें ईश्वर हमारे पिताश्री से, और प्रभु यीशु मसीह से कृपा और शान्ति मिले।
३ धन्य हों वो ईश्वर और हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिताश्री, जिन्होंने हमें स्वर्गिक स्थानो में समस्त आध्यात्मिक आशीर्वादों के साथ मसीहा में आशीषित कर दिया है:
४ उसी के अनुसार जिस प्रकार उन्होंने हमें संसार की नीव-स्थापना से पूर्व उन्हीं में ही चुन लिया है, कि हम उनके समक्ष प्रेम-भाव में पवित्र और निर्दोष हों:
५ हमारा यीशु मसीह के द्वारा अपने प्रति दत्तक-संतान पर्यत बनने का पूर्वनिश्च्य कर देने पर, उन्हीं की ही इच्छा की अच्छी प्रसन्नतानुसार,
६ उनकी कृपा की महिमा की प्रशन्सा हेतु, जिस में उन्होंने हमें अतिप्रीयों में स्वीकारित बना दिया है।
७ जिन में हमारे पास उनके रक्त के माध्यम से मुक्तिभुक्तान है, पापों की क्षमा ही, उन्हीं की कृपा के आधिक्यानुसार;
८ जिस में वो हमारे प्रति सर्व विद्या और विवेक में प्रचूर हुए हैं;
९ हमें अपनी इच्छा के रहस्य की जानकारी दिलवा चुकने पर, अपनी ही अच्छी प्रसन्नतानुसार जिसे उन्होंने अपने स्वयं में ही निर्धारित कर दिया है:
१० ताकि कालों की परिपूर्णता के प्रबन्धन में वो मसीहा में ही सभी का एक ही में संघ्रहण कर दें, जो दोनो, स्वर्ग में हैं, और जो पृथ्वी में हैं; यहाँ तक कि अपने में ही:
११ जिन में हमने भी एक विरासत प्राप्त कर ली है, उन्हीं के उद्देश्यानुसर पूर्वनिश्चित बना दिए जाने पर, जो सभी बातें अपनी ही स्वयं की इच्छा के परामर्श से कार्यरत करते हैं:
१२ ताकि हम उनकी महिमा की प्रशन्सा में हों, जिन्होंने पहले मसीहा में विश्वास किया।
१३ जिन में तुम ने भी विश्वास किया, उस सत्य के शब्द को सुन लेने के पश्चात, तुम्हारे बचाव का वो शुभ-समाचार: जिन्हीं में भी, तुम्हारे विश्वास कर लेने के पश्चात, तुम उन प्रतिज्ञा के पवित्र-प्राण द्वारा मुहरबँद कर दिए जा चुके थे,
१४ जो हमारी विरासत का बयाना हैं, उस खरीदे जा चुके अधिकार के भुक्तान के समय के आगमन तक, उन्हीं की महिमा की प्रशन्सा पर्यत।
१५ इसी कारण मैं भी, तुम्हारे प्रभु यीशु मसीह में विश्वास, और सभी सन्तों के प्रति प्रेम के विषय में सुन लेने के पश्चात,
१६ तुम्हारे लिए धन्यवाद देने से रुकता नहीं हूँ, तुम्हारे विषय में अपनी प्रार्थनाओं में स्मरण करता हुआ;
१७ कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के वो ईश्वर, महिमा के वो पिताश्री, तुम्हें विद्या का प्राण और उनके ज्ञान का प्रत्यक्षिकरण प्रदान कर दें:
१८ तुम्हारी प्रज्ञा के नेत्र उज्ज्वलित होते हुए; ताकि तुम यह ज्ञान प्राप्त कर सको कि क्या है उनके बुलावे की आशा, और कि क्या है सन्तों में उनकी विरासत की महिमा का धन-धान्य,
१९ और कि क्या है उनकी शक्ती की अत्याधिक विशालता हमारे प्रति ही जो विश्वास करते हैं, उन्हीं की बलशाली शक्ती की कार्यरीतिनुसार,
२० जिसे उन्होंने मसीहा में कार्यरत किया, जब उन्होंने उन्हें मृतकों में से उठा दिया, और उन्हें अपने ही स्वयं के दाएँ हाथ पर स्वर्गिक स्थानो में विराजमान कर दिया,
२१ समस्त आधिपत्य, और शक्ती, और बल, और अधिराज्य, और प्रत्येक नाम-करण के नाम की ऊँचाई पार, न केवल इस संसार में, बल्कि उस में भी जो आने वाला है:
२२ और उन्होंने सभी कुछ उनके चरणों तले डाल दिया है, और उन्होंने उन्हें कलिसिए के समस्त विषयों का शीर्ष स्थापित कर दिया है,
२३ जो उन्हीं का ही शरीर है, उन्हीं की ही भरपूर्ता जो सर्वस्व को सर्वस्व में ही भरपूर कर देती है।
दूसरा अध्याय।
१ और तुम्हें उन्होंने सजीवित कर दिया है, जो अपराधों और पापों में मृत थे;
२ जिन्हीं में तुम बीते कालों में चला करते थे इस संसार की रीतिनुसार, वायु की शक्ति के राजकुमारानुसार, वही प्राण जो अब अवज्ञा की सन्तानों में कार्यरत है:
३ जिन्हीं में हम सब ने भी अतीत में अपना आचरण रखा, अपने शरीर की वासनाओं में, शारीरिकता और मस्तिष्क की तृष्णाओं की पूर्ती करते हुए; और हम स्वभाव से ही औरों के समान आक्रोश की सन्तानें थे।
४ किन्तु दया में धनवान ईश्वर ने, उस महान प्रेम के वास्ते जिस से उन्होंने हम से प्रेम किया,
५ जब कि हम पापों में मृत ही थे, हमें मसीहा के साथ सजीवित कर दिया, (कृपा द्वारा तुम बचते हो;)
६ और हमें एक साथ ऊपर उठा दिया है, और हमें मसीहा यीशु में इकट्ठा स्वर्गिक स्थानो में बैठा दिया है:
७ ताकि भविष्य में आने वाले युगों में वो हमें हमारे प्रति अपनी करुणता में अपनी कृपा की अत्याधिक विपुलता का मसीहा यीशु के माध्यम से प्रदर्शन कर दें।
८ क्योंकि विश्वास से तुम कृपा द्वारा बचते हो: और न कि अपने स्वयं से: यह ईश्वर का उपहार है:
९ कर्मों का नहीं, कहिं कोई भी व्यक्ति डींगें न मारे।
१० क्योंकि हम उन्हीं की कार्य-रचना हैं, अच्छे कर्मों हेतु मसीहा यीशु में निर्मित, जिन्हें ईश्वर ने पहले से ही पूर्वनिश्चित कर दिया है कि हम उन में चलें।
११ इसी कारण वश स्मरण करो, कि तुम अतीत में शारीरिक अन्यप्रजाती वाले होते हुए, जो हाथों से शरीर में किए गए ख़तनित कहलाए जाने वालों द्वारा बेख़तनित कहलाए जाते हो;
१२ कि उस समय तुम मसीहा-हीन थे, इस्राएल के राष्ट्र-मंडल से पृथक, और वचन के प्रतिज्ञा-पत्र के प्रति परदेशी, आशाहीन, और इस संसार में ईश्वर-हीन:
१३ परन्तु अब मसीहा यीशु में तुम, जो कभी बहुत दूर थे, मसीहा के रक्त ही के द्वारा निकट लाए जा चुके हो।
१४ क्योंकि वही हमारी शान्ति हैं, जिन्होंने दोनो को एक बना दिया है, और हमारे बीच विभाजन की उस बीच की दीवार को नीचे तोड़ गिराया है;
१५ अपने ही देह में उस शत्रुता को रद्द कर चुके हुए, यहाँ तक कि अध्यादेशों में पाए जाने वाले उन्हीं आदेशों के नियम को; अपने स्वयं में ही उन दोनो में से एक ही नवीन पुरुष का सृजन कर देने हेतु, इस प्रकार शान्ति स्थापित करते हुए;
१६ और कि वो क्रूस के माध्यम से ईश्वर के प्रति एक ही देह में दोनो का सामंजस्य कर दें, जिसके द्वारा वो उस शत्रुता का संहार कर चुके हैं:
१७ और आए और तुम्हें शान्ति का प्रवचन दिया जो बहुत दूर थे, और उन्हें जो निकट थे।
१८ क्योंकि उन्हीं के माध्यम से हम दोनो के पास एक ही प्राण द्वारा पिताश्री के प्रति अभिगम है।
१९ अब इसलिए तुम परदेशी या विदेशी नहीं हो, बल्कि सन्तों के साथ सह-नागरिक, और ईश्वर के घराने के सदस्य हो:
२० और तुम अपौस्लों और पैग़म्बरों की नीव पर निर्मित हो, यीशु मसीह स्वयं ही वो प्रमुख कोने का पत्थर होते हुए;
२१ जिन्हीं में वो सम्पूर्ण इमारत कस कर, एक साथ जुड़ कर, प्रभु में ही एक पवित्र मन्दिर पर्यत बढ़ती चली जाती है:
२२ जिन्हीं में तुम भी प्राण द्वारा एक साथ ईश्वर का एक निवास स्थान निर्मित हो।
तीसरा अध्याय।
१ इसी कारण वश मैं पौलुस, तुम अन्यप्रजाती-वालों के लिए यीशु मसीह का बन्दी,
२ यदि तुमने ईश्वर की उस कृपा के प्रबन्धन को सुन लिया है, जो मुझे तुम्हारे प्रति प्रदान की गई है:
३ कि कैसे उन्होंने प्रत्यक्षिकरण द्वारा मुझे उस रहस्य का ज्ञान करवाया; (जैसा मैंने पिछले कुछ शब्दों में लिख दिया है,
४ जिनके द्वारा, जब तुम पढ़ो, तुम मसीहा के रहस्य में मेरे ज्ञान को समझ सको)
५ जो अन्य युगों में मनुष्यों के बेटों को ज्ञात नहीं करवाया गया था, जिस प्रकार वो अब उनके पवित्र अपौस्लों और पैग़म्बरों को प्राण द्वारा प्रत्यक्ष करवा दिया गया है;
६ ताकि अन्यप्रजाती वाले, शुभ-समाचार द्वारा मसीहा में सह-उत्तराधिकारी, और उसी देह के, और उन्हीं की प्रतिज्ञा के भागीदार बन सकें;
७ जिसका कि मैं एक सेवक बना दिया गया था, उस ईश्वर की कृपा के उपहारानुसार जो मुझे प्रदान कर दी गई थी, उनकी शक्ती की प्रभावोत्पादक कार्यरीतिनुसार।
८ मुझे ही, जो सभी सन्तों में से न्यूनतम से भी कम है, यह कृपा प्रदान की गई है, ताकि मैं अन्यप्रजातियों के बीच मसीहा के अचिंतनीय धन-धान्यों का प्रवचन दे सकूँ;
९ और सभी लोगों को यह दिखला सकूँ कि उस रहस्य का साहचर्य क्या है, जो संसार के प्रारम्भ से ईश्वर में छुपा हुआ है, जिन्होंने सभी वस्तुओं का सृजन यीशु मसीह द्वारा किया है:
१० इस आशय से कि अब उन आधिपत्यों और स्वर्गिक स्थानो में शक्तियों को कलिसिए द्वारा ईश्वर की बहुसंख्यक विद्या का ज्ञान करवाया जा सके,
११ उस अनन्त उद्देश्यानुसार जिसे उन्होंने हमारे प्रभु मसीहा यीशु में प्रायोजित किया:
१२ जिन में हमारे पास निर्भीकता और विश्वस्तता के साथ अभिगम है, उन्हीं में विश्वास द्वारा।
१३ इसी कारण मैं यह इच्छा करता हूँ कि तुम मेरी तुम्हारे प्रति आपत्तियों के वास्ते मूर्छित मत हो, जो तुम्हारा गौरव है।
१४ इसी कारण वश मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिताश्री के प्रति अपने घुटने टेकता हूँ,
१५ जिन से स्वर्ग और पृथ्वी में समस्त परिवार का नाम-करण हुआ है,
१६ ताकि वो तुम्हें अपनी महिमा के धन-धान्योंनुसार यह प्रदान कर दें, कि तुम आभ्यन्तरिकत मनुष्यत्व में उनके प्राण द्वारा शक्ती के साथ प्रबल बनो;
१७ ताकि मसीहा तुम्हारे हृदयों में विश्वास द्वारा वास करें; ताकि तुम, प्रेम में गहरी जड़ें पकड़े और भूस्थिर होते हुए,
१८ सभी सन्तों के साथ समझ सको कि वो चौड़ाई, और वो लम्बाई, और वो गहराई, और वो ऊँचाई क्या है;
१९ और मसीहा के प्रेम से ज्ञात हो सको, जो प्रज्ञा पार है, ताकि तुम ईश्वर की समस्त भरपूरता से भरपूर हो सको।
२० अब उन्हीं के प्रति जो अधिक्तम आधिक्यता से भी बढ़कर उस सभी को कर देने में सक्षम हैं, जो भी हम माँगें या सोचें, उस शक्तिनुसार जो हम में क्रियाशील है,
२१ उन्हीं के प्रति कलिसिए में महिमा हो, यीशु मसीह द्वारा, समस्त युगों के सर्वत्र में, विश्व में अन्तहीनता तक। तथास्तु।
चौथा अध्याय।
१ इसलिए मैं प्रभु का बन्दी, तुम से विनती करता हूँ कि तुम उस बुलावे के योग्य चलो जिस से तुम बुलाए गए हो,
२ पूर्ण दीनता और विनम्रता सहित, सहनशीलता के साथ, एक दूसरे को प्रेम में सहन करते हुए;
३ प्राण की एकात्मकता को शान्ति में बाँध कर रखने का प्रयास करते हुए।
४ एक ही शरीर है, और एक ही प्राण, उसी प्रकार जैसे तुम अपने बुलावे की एक ही आशा में बुलाए गए हो;
५ एक ही प्रभु, एक ही विश्वास, एक ही बपतिस्मा,
६ एक ही ईश्वर और सभी के पिताश्री, जो सभी पर सर्वोपरी हैं, और जो सभी में से हैं, और तुम सभी में व्याप्त हैं।
७ परन्तु हम में से प्रत्येक को मसीहा के उपहार के मापानुसार कृपा प्रदान की गई है।
८ इसी कारण वो कहता है, जब वो ऊँचाई पार ऊपर आरोहण कर गए, तो वो बाँधत्वता को बाँधत्व में ले चले, और उन्होंने लोगों को उपहार दे दिए।
९ (तो अब जब कि वो आरोहण कर चुके, तो क्या अर्थ बना इसका, कि वो पहले पृथ्वी के निचले भागों में भी अवरोहित हो गए?
१० उन्हीं ने जिन्होंने अवरोहण किया, यह वही हैं जिन्होंने समस्त स्वर्गों की ऊँचाईयों पार ऊपर आरोहण कर लिया, ताकि वो समस्त वस्तुओं को परिपूर्ण कर दें।)
११ और उन्होंने कुछ अपौस्ल दिए; और कुछ पैग़म्बर; और कुछ शुभ-समाचार-प्रचारक; और कुछ चरवाहे और शिक्षक;
१२ सन्तों की परिपूर्णता हेतु, सेवाकार्य के कार्य हेतु, मसीहा के शरीर के आध्यात्मिक-निर्माण हेतु:
१३ जब तक कि हम सभी विश्वास की एकात्मकता, एवं ईश्वर के पुत्र के ज्ञान तक नहीं पहुँच जाते, एक परिपूर्ण पुरुष पर्यत, मसीहा की भरपूर्ता की उच्चता के माप पर्यत:
१४ ताकि हम अब से लेकर बच्चे न बने रहें, शिक्षण के प्रत्येक झौंके से इधर-उधर पटके-फिरते हुए, लोगों की धूर्तता और चतुर कपटता द्वारा, जिसके द्वारा वो घात लगाए बहकाने की ताक में पड़े रहते हैं;
१५ बल्कि प्रेम में सत्य बोलते हुए, हम उन्हीं में सभी बातों में बढ़ते चले जाएँ, जो कि वो शीर्ष हैं, मसीहा ही:
१६ जिन से वो सम्पूर्ण शरीर एक साथ सट कर जुड़ा हुआ और उस से सुगठित, जो प्रत्येक जोड़ प्रदान करता है, उस प्रत्येक भाग के माप में उस प्रभावोत्पादक कार्यरीतिनुसार, शरीर की बढ़ौतरी करता रहता है प्रेम में अपने स्वयं के ही आध्यात्मिक-निर्माण पर्यत।
१७ इसलिए मैं यह कहता हूँ, और प्रभु में यह साक्ष्य देता हूँ, कि भई तुम अब से लेकर अन्यप्रजातियों के समान मत चलो, उन्हीं के मनों की व्यर्थताओं में,
१८ समझ-बूझ को अंधेरा बनाए हुए, अपनी ही अनभिज्ञता द्वारा ईश्वर के जीवन से विमुख हुए हुए, उन्हीं के हृदयों की नेत्रहीनता के कारण:
१९ जिन्होंने निठुर हो अपने स्वयं को लज्जाहीन कामुकता के प्रति प्रदान कर दिया है, समस्त अस्वच्छता को लोभ संग क्रियाशील कर देने हेतु।
२० परन्तु तुमने मसीहा को इस प्रकार नहीं सीखा है;
२१ यदि ऐसा हो कि तुमने उन्हें सुना हो, और उनके द्वारा शिक्षित किए गए हो, जैसे सत्य यीशु में है:
२२ कि तुम उस भूतपूर्व व्यवहार समबन्धी उस पुराने मनुष्य को उतार फेंको, जो भ्रमकारी दुर्वासनाओंनुसार भ्रष्ट है;
२३ और तुम अपने मन के प्राण में नवीकृत बन जाओ:
२४ और कि तुम उस नवीन मनुष्य से आवृत हो जाओ, जो ईश्वर-समान नेकी और सच्ची पवित्रता में निर्मित है।
२५ इसलिए झूठ-बोलना परे हटाते हुए, प्रत्येक व्यक्ति अपने पड़ौसी से सत्य बोले: क्योंकि हम एक दूसरे के अंग हैं।
२६ तुम क्रोध करो, परन्तु पाप मत करो: अपने आक्रोश पर सूर्यास्त मत हो जाने दो:
२७ न ही दानव के लिए स्थान बनाओ।
२८ वो जो चुराता था अब और न चुराए: बल्कि वो अपने ही हाथों द्वारा श्रम करे, उस अच्छी बात को क्रियाशील करता हुआ, ताकि उसके पास उसे देने के लिए हो, जिसे आवश्यक्ता है।
२९ कोई भी भ्रष्ट शब्द तुम्हारे मुँहों में से बाहर न निकले, बल्कि वो जो आध्यात्मिक-निर्माण के प्रयोग हेतु अच्छा हो, ताकि वो सुनने वालों को कृपा की सेवा प्रदान कर दे।
३० और ईश्वर के पवित्र-प्राण को पीड़ित मत करो, जिनके द्वारा तुम उस मुक्तिभुक्तान दिवस पर्यत मुहरबँद हो।
३१ समूची कड़वाहट, और आक्रोश, और क्रोध, और रोना-चीखना, और दुर्वचनों को अपने पास से परे हटा दो, समस्त द्वेषभावना सहित:
३२ और तुम एक दूसरे के प्रति कृपाशील बनो, करुणामई, एक दूसरे को क्षमा करते हुए, उसी प्रकार जिस प्रकार ईश्वर ने मसीहा के वास्ते तुम्हें भी क्षमा कर दिया है।
पाँचवाँ अध्याय।
१ इसलिए ईश्वर के पीछे-पीछे चलो, प्रीय सन्तानों समान;
२ और प्रेम में चलो, जिस प्रकार मसीहा ने भी हम से प्रेम किया, और अपने स्वयं को हमारे लिए ईश्वर के प्रति एक आहुती और एक बलिदान अर्पित कर दिया, एक मधुर-सुगन्धित स्वादिष्टता हेतु।
३ और जैसे सन्तों के योग्य है, तैसे ही अविवाहित-यौन, और समस्त अस्वच्छता, या लोलुप्ता का नाम भी एक बार तुम्हारे बीच न लिया जाए:
४ न ही अश्लील-भद्दापन, न ही मूर्खतापूर्ण बात चीत, न ही मज़ाक-बाज़ी, यह जो अशोभनीय हैं: बल्कि अपेक्षाकृत धन्यवादों का देना।
५ क्योंकि इस से तुम अवगत हो, कि कोई भी वैश्या-बाज़, न ही अस्वच्छ व्यक्ति, न ही लोलुप पुरुष, जो एक मूर्तिपूजक है, मसीहा और ईश्वर के राज्य में कोई भी विरासत रखता है।
६ किसी भी व्यक्ति को तुम्हें व्यर्थ बातों द्वारा धोखा मत दे देने दो: क्योंकि इन्हीं बातों के कारण ईश्वर का आक्रोश अवज्ञाकारी सन्तानों पर आ पड़ता है।
७ इसलिए तुम उनके साथ भागीदार मत बनो।
८ क्योंकि तुम किसी समय तो अन्धेरा ही थे, परन्तु अब हो तुम प्रभु में ही उजाला: उजाले की सन्तानों समान चलो:
९ (चूँकि प्राण का फल समस्त अच्छाई और नेकी और सच्चाई में है;)
१० उसे प्रमाणित करते हुए जो प्रभु के प्रति स्वीकार योग्य है।
११ और अन्धकार की निष्फल क्रियाओं के संग कोई भी साहचर्य मत रखो, बल्कि उनका खण्डन करो।
१२ क्योंकि उनके द्वारा गोपनीयता में की जाने वाली बातों के विषय में बोलना भी लज्जापूर्ण है।
१३ परन्तु वो सभी बातें जिनका खण्डन किया जाता है, उजाले द्वारा प्रत्यक्ष कर दी जाती हैं: क्योंकि जो कुछ भी प्रत्यक्ष करता है, उजाला ही है।
१४ इसी कारण वश वो कहता है, जाग जाओ तुम जो सो रहे हो, और मृतकों में से उठ जाओ, और मसीहा तुम्हें उजाला प्रदान कर देंगे।
१५ तो सावधान रहो कि तुम सटीकता से चलो, मूर्खों समान नहीं, बल्कि विद्वानो समान,
१६ समय की बचत करते हुए, क्योंकि दिन बुरे हैं।
१७ इसी कारण वश नासमझ मत बनो, बल्कि सूझ-बूझ रखते हुए कि प्रभु की इच्छा क्या है।
१८ और मदिरा से धुत मत हो, जिस में अतिक्रम है; बल्कि प्राण से भर जाओ:
१९ एक दूसरे से भजनो, और स्तोत्रों, और आध्यात्मिक गीतों में वार्तालाप करते हुए, और अपने हृदय में प्रभु के प्रति गाते हुए और धुन-लय बनाते हुए;
२० सदैव, सभी वस्तुओं के लिए ईश्वर और उन पिताश्री को हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में धन्यवाद देते हुए;
२१ एक दूसरे के प्रति स्वयं को ईश्वर के भय में आधीन करते हुए।
२२ पत्नियों, अपने स्वयं को अपने ही पतियों के प्रति आधीन करो, मानो कि ईश्वर ही के प्रति।
२३ क्योंकि पति पत्नी का शीर्ष है, उसी प्रकार जैसे मसीहा कलिसिए के शीर्ष हैं: और वो देह के बचाने-वाले हैं।
२४ इसलिए जिस प्रकार कलिसिया मसीहा के आधीन है, उसी प्रकार पत्नियाँ अपने स्वयं के पतियों के प्रति सभी बातों में आधीन बन जाएँ।
२५ पतियों, अपनी पत्नियों से प्रेम करो, उसी प्रकार जैसे मसीहा ने भी कलीसिए से प्रेम किया, और उसी के वास्ते स्वयं को अर्पित कर दिया;
२६ ताकि वो उसे शब्द द्वारा जल-स्नान की धुलवाई से पुनीत और स्वच्छ कर दें,
२७ ताकि वो उसे अपने स्वयं को ही एक महिमामई कलिसिया प्रस्तुत कर दें, बिना धब्बे के, या झुर्री के, या किसी भी ऐसी बात के; बल्कि ताकि वो पवित्र और निष्कलंक हो।
२८ इसी प्रकार पुरुषों को अपने ही शरीर समान अपनी पत्नियों से प्रेम करना चाहिए। वो जो अपनी पत्नी से प्रेम करता है, अपने स्वयं से प्रेम करता है।
२९ क्योंकि किसी भी पुरुष ने कभी भी अपने स्वयं के देह से घृणा नहीं की; बल्कि वो उसका पालन-पोषण करता है, और उसकी देख-भाल करता है, उसी प्रकार जैसे प्रभु कलिसिए को पालते-पोसते हैं:
३० क्योंकि हम उन्हीं के शरीर के अँग हैं, उन्हीं के देह के, और उन्हीं की हड्डियों के।
३१ इसी कारण वश एक पुरुष अपने पिता और अपनी माता को छोड़ कर अपनी पत्नी के साथ जुड़ जाएगा: और वो दोनो एक ही देह बन जाएँगे।
३२ यह एक बृहत् रहस्य है: परन्तु मैं मसीहा और कलिसिए के समबन्ध में बोल रहा हूँ।
३३ तथापि तुम में से प्रत्येक विशेषकर अपनी पत्नी के साथ अपने ही समान प्रेम करे; और पत्नी यह देख ले कि वो अपने पति का भय माने।
छटा अध्याय।
१ बच्चों, अपने पिता-माता का प्रभु में अनुपालन करो: क्योंकि यही उचित है।
२ अपने पिता और माता का आदर करो; (जो प्रतिज्ञा सहित प्रथम आदेश है;)
३ ताकि तुम्हारे साथ भला रह सके, और कि तुम पृथ्वी पर एक दीर्घ काल तक जी सको।
४ और, तुम सभी पिताओं, अपने बच्चों का आक्रोश मत भड़काओ: बल्कि उनकी परवरिश प्रभु के शिक्षण और चेतावनी में करो।
५ तुम नौकरों, वो जो तुम्हारे शारीरिकतानुसार मालिक हैं, उनका तुम भय और कम्पन के साथ आज्ञापालन करो, अपने हृदय की एकाग्रता से, मानो कि मसीहा के प्रति ही;
६ दिखावे के लिए नहीं, लोगों को प्रसन्न करने वालों जैसे; बल्कि मसीहा के नौकरों जैसे, ईश्वर की इच्छा हृदय से करते हुए;
७ भलाई संग सेवाकार्य करते हुए, मानो कि प्रभु के प्रति ही, और न की लोगों के प्रति:
८ यह ज्ञान रखते हुए कि जो भी अच्छाई कोइ व्यक्ति करता है, वही वो प्रभु से ग्रहण कर लेगा, चाहे वो बंध्वा हो या मुक्त।
९ और, तुम मालिकों, यही बातें तुम उनके प्रति करो, धमकियाँ मत दो: यह ज्ञान रखते हुए कि तुम्हारे मालिक भी स्वर्ग में हैं; न ही वो किसी का भी पक्ष लेते हैं।
१० अन्ततः मेरे भाई-जनो, प्रभु में, और उनकी शक्ती और बल में सुदृढ़ बनो।
११ ईश्वर के सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र धारण कर लो, ताकि तुम दानव की कपट-विद्या के विरुद्ध खड़े रह सको।
१२ क्योंकि हम माँस और रक्त के विरुद्ध युद्ध नहीं करते, बल्कि आधिपत्यों, और शक्तियों, और इस संसार के अन्धकार के शासकों के विरुद्ध, ऊँचे स्थानो में आध्यात्मिक दुष्टता के विरुद्ध।
१३ इसी कारण वश अपने पर ईश्वर के समस्त अस्त्र-शस्त्र धारण कर लो, ताकि तुम उस बुरे दिन पर सामना कर सको, और सब कुछ कर लेने के पश्चात, तुम खड़े रह सको।
१४ खड़े हो जाओ इसलिए, अपनी कटियों को सत्य के कमरबंद से कस कर, और नेकी का छाती-कवच चढ़ा कर;
१५ और अपने पैरों पर शान्ति के शुभ-समाचार की तैयारी के जूते बाँध कर;
१६ और इन सभी पर, विश्वास की ढाल लेते हुए, जिसके द्वारा तुम दुष्टों के सभी अग्नि-बाणों को बुझा दोगे।
१७ और बचाव का लोह-टोप ले लो, और प्राण की तलवार, जो ईश्वर का शब्द है:
१८ सदैव प्रार्थना में लीन, प्राण में प्रार्थना और अनुनय करते हुए, और उन्हीं में सचेत रहते हुए, अटल लगन के साथ और सभी सन्तों के लिए अनुनय में;
१९ और मेरे लिए, कि मुझे अर्णण प्रदान कर दिया जाए, ताकि मैं अपना मूँह निर्भीकता से खोल सकूँ, शुभ-समाचार के रहस्य को ज्ञात करवाने हेतु,
२० जिसके वास्ते मैं बँधनो में एक राजदूत हूँ: ताकि मैं उसी में निर्भीकता से बोलूँ, जैसे मुझे बोलना चाहिए।
२१ और कि तुम मेरा हाल-चाल, और कि मैं कैसा हूँ, यह भी जान सको; तुखिकुस, एक अति-प्रीय भाई और प्रभु में एक विश्वसनीय सेवक, तुम्हें सभी बातों से अवगत करवा देगा:
२२ जिसे मैंने तुम्हारे पास इसी उद्देश्य से भेजा है, ताकि तुम हमारे हाल-चाल जान लो, और कि वो तुम्हारे हृदयों को सान्त्वनित कर दे।
२३ भाई-जनो को शान्ति हो, और विश्वास सहित प्रेम, ईश्वर पिताश्री और प्रभु यीशु मसीह द्वारा।
२४ उन सभी पर कृपा हो जो हमारे प्रभु यीशु मसीह से नेकनीयती में प्रेम करते हैं। तथास्तु।
१०/२०/२०२३:
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