सन्त योहन का प्रत्यक्षीकरण। (Revelation)
पहला अध्याय।
१ यीशु मसीह का प्रत्यक्षीकरण, जिसे ईश्वर ने उन्हें प्रदान किया, अपने सेवकों को वो घटनाएँ दिखला देने हेतु जिनकी होनी अवश्य ही शीघ्रता से घटेगी; और उन्होंने उसे अपने सेवक योहन को अपने दूत द्वारा भिजवा कर सूचित करवाया:
२ जिसने ईश्वर के शब्द का, और यीशु मसीह के साक्ष्य का, और उन सभी बातों का जिन्हें उसने देखा, साक्ष्य दिया।
३ धन्य है वो जो पढ़ता है, और वो जो इस प्रेरित-उपदेश के शब्दों को सुनते हैं, और उन बातों को रखते हैं जो इस में लिखी हुई हैं: चूँकि वो समय निकट ही है।
४ योहन द्वारा उन एशिया में सात कलिसियों को: तुम्हारे प्रति उनके द्वारा कृपा और शान्ति हो, जो हैं, और जो थे, और जो आने वाले हैं; और उन सात प्राणों द्वारा जो उनके सिंहासन के समक्ष हैं;
५ और यीशु मसीह द्वारा, वो जो विश्वसनीय साक्षी हैं, और मृतकों में से प्रथम जनने, और पृथ्वी के राजाओं के प्रमुख। उन्हीं के प्रति जिन्होंने हम से प्रेम किया, और अपने ही स्वयं के रक्त में जिन्होंने हमें हमारे पापों से धो डाला,
६ और हमें ईश्वर और उनके पिताश्री के प्रति राजा और पुरोहित बना दिया है; उन्हीं के प्रति महिमा और अधिराज्य सदा-सदा के लिए रहे। तथास्तु।
७ देखो, वो मेघों के साथ आगमन कर रहे हैं; और प्रत्येक आँख उन्हें देखेगी, और वो भी जिन्होंने उन्हें भेद दिया था: और उनके कारण पृथ्वी के समस्त कुल रोना-पीटना मचाएँगे। हाँ भई, तथास्तु।
८ मैं हूँ एल्फा और ओमेगा, वो प्रारम्भ और वो अन्त, कहते हैं प्रभु, जो हैं, और जो थे, और जो आने वाले हैं, वही सर्वबलशाली।
९ मैं योहन, जो तुम्हारा भाई भी हूँ, और आपत्तियों में, और यीशु मसीह के राज्य और धैर्य में सहयोगी, ईश्वर के शब्द के लिए, और यीशु मसीह के साक्ष्य हेतु, पतमुस कहलाए जाने वाले द्वीप में था।
१० मैं प्रभु के दिवस पर प्राण में था, और मैंने अपने पीछे एक प्रचण्ड वाणी सुनी, एक चिंघाड़े समान,
११ कहती हुई, मैं हूँ एल्फा और ओमेगा, वो प्रथम और वो अन्तिम: और, जो तुम देख रहे हो, एक पुस्तक में लिख कर एशिया में उन सात कलिसियों को भेज दो: इफिसुस को, और स्मुर्ना को, और पिरगमुन को, और थुआतीरा को, और सरदिस को, और फिलदेल्फ़िया को, और लौदीकिया को।
१२ और मैं उस वाणी को देखने हेतु मुड़ा जो मुझ से बोल रही थी। और मुड़े हुए, मैंने सात स्वर्ण दीपाधारों को देखा;
१३ और उन सात स्वर्ण दीपाधारों के बीच एक मनुष्य-पुत्र समान, एक वस्त्र से नीचे चरणों तक आवृत, और वक्ष के चारों ओर एक स्वर्ण कमरपेटी कसे हुए।
१४ उनका शीर्ष और उनके केश ऊन समान श्वेत थे, हिम समान श्वेत; और उनके नेत्र अग्नी की एक लपट समान थे;
१५ और उनके चरण प्रज्ज्वलित-पीतल समान, मानो कि वो एक भट्टी में जल रहे हों; और उनकी वाणी अनेक जलस्त्रोतों की ध्वनि समान।
१६ और उनके दाएँ हाथ में सात सितारे थे: और उनके मूँह में से एक तीव्र दुधारी तलवार बाहर निकलती हुई: और उनका मुखमण्डल सूर्य अपनी शक्ती में चमकता हुआ जैसा था।
१७ और जब मैंने उन्हें देखा, तो मैं उनके चरणों में मृत समान गिर पड़ा। और उन्होंने अपना दायाँ हाथ मुझ पर रखा, मुझ से कहते हुए, भयभीत मत हो; मैं वो प्रथम हूँ और वो अन्तिम:
१८ मैं वो हूँ जो जीता है, और जो मृत था: और देखो तो, मैं सदा के लिए सजीवित हूँ, तथास्तु; और मेरे पास नर्क और मृत्यु की चाबियाँ हैं।
१९ लिख लो इन बातों को जो तुमने देख ली हैं, और उन बातों को जो हैं, और उन बातों को जो इसके पश्चात घटेंगी;
२० मेरे दाएँ हाथ में उन सात सितारों का, और उन सात दीपाधारों का रहस्य, जिन्हें तुमने देखा था। वो सात सितारे उन सात कलिसियों के दूत हैं: और वो सात दीपाधार जो तुमने देखे थे, सात कलिसिए हैं।
दूसरा अध्याय।
१ इफिसुस के कलिसिए के दूत को लिखो; यह बातें वो कह रहे हैं जो अपने दाएँ हाथ में उन सात सितारों को पकड़े हुए हैं, जो उन सात स्वर्ण दीपाधारों के बीच चल रहे हैं;
२ मैं तुम्हारे कर्मों से, और तुम्हारे श्रम से, और तुम्हारे धैर्य से परिचित हूँ, और कि कैसे तुम उन्हें नहीं सह सकते जो बुरे हैं: और तुमने उन्हें परख लिया है, जो कहते हैं कि वो अपौस्ल हैं, परन्तु वो नहीं हैं, और तुमने उन्हें झूठा पाया है:
३ और तुमने भार ढोया है, और तुम धैर्यशील हो, और तुमने मेरे नाम वास्ते श्रम किया है, और तुम मूर्छित नहीं हुए।
४ तथापि मुझे तुम से कुछ कष्ट है, चूँकि तुमने अपने प्रथम प्रेम को छोड़ दिया है।
५ इसलिए स्मरण कर लो कि तुम कहाँ से गिरे चुके हो, और मन-परिवर्तन कर लो, और प्रथम कार्यों को करो; अन्यथा मैं तुम्हारे पास शीघ्रता से आकर तुम्हारे दीपाधार को उसके स्थान में से हटा दूँगा, सिवाय कि तुम मन-परिवर्तन कर लो।
६ परन्तु यह बात तो तुम्हारे पास है, कि तुम निकोलौस के अनुयायियों के कर्मों से घृणा करते हो, जिन से कि मैं भी घृणा करता हूँ।
७ जिसके पास कान है, वो सुने कि प्राण कलिसियों से क्या कह रहा है; उसे जो परास्त करता है, मैं जीवन के वृक्ष में से खाने के लिए प्रदान करूँगा, जो ईश्वर के स्वर्गलोक के बीच में है।
८ और स्मुर्ना के कलिसिए के दूत को लिखो; यह बातें वो प्रथम और वो अन्तिम कह रहे हैं, जो मृत थे, और जीवित हैं;
९ मैं तुम्हारे कर्मों से, और आपत्ती, और दरिद्रता से परिचित हूँ, (परन्तु तुम धनवान हो) और मैं उनकी निंदा से परिचित हूँ जो कहते हैं कि वो यहूदी हैं, लेकिन वो यहूदी नहीं हैं, बल्कि वो शैतान का यहूदी-आराधनालय हैं।
१० इन बातों में से किसी से भी भयभीत मत होना जिन्हें तुम झेलोगे: देखो, दानव तुम में से कुछों को कारावास में फैंक डालेगा, ताकि तुम परीक्षित हो सको; और तुम पर दस दिन आपत्ती आएगी: मृत्यु पर्यत भरोसेमंद रहना, और मैं तुम्हें जीवन का एक मुकुट प्रदान कर दूँगा।
११ जिसके पास कान है, वो सुने कि प्राण कलिसियों से क्या कह रहा है; वो जो परास्त करता है द्वितीय मृत्यु से चोट नहीं खाएगा।
१२ और पिरगमुन के कलिसिए के दूत को लिखो; यह बातें वो कह रहे हैं जिनके पास वो तीव्र दुधारी तलवार है;
१३ मैं तुम्हारे कर्मों से परिचित हूँ, और कि तुम कहाँ रहते हो, यहाँ तक कि शैतान का आसन कहाँ है: और कि तुम मेरा नाम कस कर पकड़े हो, और तुमने मेरे विश्वास को अस्वीकार नहीं किया है, यहाँ तक कि उन दिनो में ही जिन में अन्तिपास मेरा विश्वसनीय साक्षी था, जिसकी तुम्हारे बीच हत्या कर दी गई थी, जहाँ शैतान रहता है।
१४ लेकिन मुझे तुम से कुछ बातों में कष्ट है, क्योंकि वहाँ तुम्हारे पास वो हैं जो बिलाम की शिक्षा पकड़े हुए हैं, जिसने बलक को इस्राएल की सन्तानों के समक्ष एक ठोकर खा जाने वाले पत्थर को फैंक देने की शिक्षा प्रदान की थी, मूर्तियों के प्रति बलि चढ़ाई वस्तुओं का खान-पान, और अविवाहित-यौन करना।
१५ इसी प्रकार ही तुम्हारे पास वो भी हैं जो निकोलौस-वालों की शिक्षा पकड़े हुए हैं, जिस बात से मैं घृणा करता हूँ।
१६ मन-परिवर्तन कर लो; अन्यथा मैं तुम्हारे पास शीघ्रता से ही आ जाऊँगा, और मैं अपने मूँह की तलवार से उनके विरुद्ध लड़ाई करूँगा।
१७ जिसके पास कान है, वो सुने कि प्राण कलिसियों से क्या कह रहा है; उसे जो परास्त करता है मैं उस छुपे हुए मन्ना में से खाने के लिए दे दूँगा, और मैं उसे एक श्वेत पत्थर दूँगा, और उस पत्थर में एक नया नाम लिखा हुआ, जिस से कोई भी व्यक्ति परिचित नहीं है सिवाय उसके, जो उसे ग्रहण करता है।
१८ और थुआतीरा के कलिसिए के दूत को लिखो; यह बातें ईश्वर के पुत्र कह रहे हैं, जिनकी आँखें अग्नी की एक लपट समान हैं, और उनके चरण प्रज्ज्वलित-पीतल समान;
१९ मैं तुम्हारे कर्मों, और प्रेम, और सेवा, और विश्वास, और तुम्हारे धैर्य, और तुम्हारे कर्मों से परिचित हूँ; और कि अन्तिम प्रथम से अधिक हैं।
२० तथापि मुझे तुम से कुछ बातों में कष्ट है, क्योंकि तुम स्वयं को एक पैग़म्बरिका पुकारने वाली उस स्त्री इज़्बल को अनुमति दे रहे हो कि वो सिखाए, और मेरे सेवकों को अविवाहित-यौन करने, और मूर्तियों के प्रति बलि चढ़ाई वस्तुओं के खान-पान हेतु बहकाए।
२१ और मैंने उसे उसके अविवाहित-यौन से मन-परिवर्तन कर देने हेतु समय प्रदान किया; और उसने मन-परिवर्तन नहीं किया।
२२ देखो, मैं उसे एक बिस्तर में पटक डालूँगा, और उन्हें जो उसके साथ व्यभिचार करते हैं महा-आपत्ती में, सिवाय कि वो अपने कर्मों से मन-परिवर्तन कर लें।
२३ और मैं उसकी सन्तानों को मृत्यु से मार डालूँगा; और समस्त कलिसिए जान जाएँगे कि मैं वही हूँ जो अंतरम-भावों और हृदयों को टटोलता हूँ: और मैं तुम में से प्रत्येक को तुम्हारे कर्मोंनुसार ही प्रदान कर दूँगा।
२४ परन्तु मैं तुम से, और थुआतीरा में उन शेष अन्यों से कह रहा हूँ, जितनो के पास भी यह शिक्षा नहीं है, और जिन्होंने शैतान की गहराईयों को नहीं जाना है, जैसा कि वो बोलते हैं; मैं तुम पर और कोई भी अन्य बोझ नहीं लादूँगा।
२५ बल्कि वही जो तुम्हारे पास पहले से ही है, मेरे आने तक कस कर पकड़े रहो।
२६ और वो जो परास्त करता है, और मेरे कर्मों को अन्त तक रखता है, उसे मैं राष्ट्रों पर शक्ति प्रदान कर दूँगा:
२७ और वो उन पर एक लोह-लट्ठ के साथ शासन करेगा; किसी कुम्हार के मिट्टी के बर्तनों समान ही वो टुकड़ों-टुकड़ों में तोड़ दिए जाएँगे: यहाँ तक कि जैसा मैं अपने पिताश्री से ग्रहण कर चुका हूँ।
२८ और मैं उसे प्रभात का वो सितारा प्रदान कर दूँगा।
२९ जिसके पास कान है, वो सुने कि प्राण कलिसियों से क्या कह रहा है।
तीसरा अध्याय।
१ और सरदिस के कलिसिए के दूत को लिखो; यह बातें वो कह रहे हैं, जिनके पास ईश्वर के वो सात प्राण हैं, और वो सात सितारे; मैं तुम्हारे कर्मों से परिचित हूँ, कि तुम्हारे पास ये नाम है कि तुम जीते हो, और तुम तो मृत हो।
२ सचेत हो जाओ, और वो बातें जो बची रह गई हैं, जो मरने के लिए तैयार हैं, उन्हें सशक्त करो: चूँकि मैंने तुम्हारे कर्मों को ईश्वर के समक्ष परिपूर्ण नहीं पाया है।
३ स्मरण कर लो इसलिए कि तुमने कैसे ग्रहण और श्रवण किया है, और कस कर पकड़े रहो, और मन-परिवर्तन कर लो। इसलिए यदि तुम सचेत नहीं होगे, तो मैं तुम पर एक चोर समान आ पड़ूँगा, और तुम उस घड़ी को नहीं जान पाओगे जिस घड़ी में मैं तुम पर आ पड़ूँगा।
४ सरदिस में ही तुम्हारे पास कुछ नाम हैं, जिन्होंने अपने वस्र प्रदूषित नहीं किए हैं; और यही मेरे साथ श्वेत में चलेंगे: क्योंकि यह सुयोग्य हैं।
५ वही जो परास्त करता है, उसी को श्वेत पहनावा पहनवा दिया जाएगा; और मैं उसका नाम जीवन की पुस्तक में से बाहर नहीं मिटाऊँगा, बल्कि मैं उसका नाम अपने पिताश्री के समक्ष, और उनके दूतों के समक्ष स्वीकार करूँगा।
६ जिसके पास कान है, वो सुने कि प्राण कलिसियों से क्या कह रहा है।
७ और फिलदेल्फ़िया के कलिसिए के दूत को लिख दो; यह बातें वो कह रहे हैं जो पवित्र हैं, वो जो सत्यमय हैं, वही जिनके पास दाऊद की चाबी है, वो जो खोल देते हैं, और कोई भी बन्द नहीं कर सकता; और जो बन्द कर देते हैं, और कोई भी नहीं खोल सकता;
८ मैं तुम्हारे कर्मों से परिचित हूँ: देखो, मैंने तुम्हारे समक्ष एक खुला द्वार स्थित कर दिया है, और कोई भी उसे बन्द नहीं कर सकता है: क्योंकि तुम्हारे पास थोड़ा सा ही बल है, और तुमने मेरे शब्द को रखे रखा है, और तुमने मेरे नाम को अस्वीकार नहीं किया है।
९ देखो, मैं उन्हें शैतान के यहूदी-आराधनालय वाला बना दूँगा, जो कहते हैं कि वो यहूदी हैं, और नहीं हैं, बल्कि झूठ बोलते हैं; देखो, मैं उन्हें बाध्य कर दूँगा कि वो तुम्हारे पैरों समक्ष आएँ और आराधना करें, और यह जान लें कि मैंने तुम से प्रेम किया है।
१० चूँकि तुमने मेरे धीरज के शब्द को बचा कर रखा है, मैं भी तुम्हें उस परीक्षा की घड़ी से बचा कर रख लूँगा, जो इस समूचे संसार पर आ पड़ेगी, उनकी परीक्षा लेने हेतु जो इस पृथ्वी पर बसते हैं।
११ देखो, मैं शीघ्रता से आगमन कर रहा हूँ: उसे जो तुम्हारे पास है, कस कर पकड़े रहो, ताकि कोई भी व्यक्ति तुम्हारा मुकुट न ले ले।
१२ वो जो परास्त करता है, उसे मैं अपने ईश्वर के मन्दिर में एक स्तम्भ बना दूँगा, और वो अब और अधिक बाहर नहीं जाएगा: और मैं उस पर अपने ईश्वर का नाम लिख दूँगा, और अपने ईश्वर के नगर का नाम, जो कि नया यरूशलेम है, जो मेरे ईश्वर से स्वर्ग में से नीचे बाहर आता है: और मैं उस पर अपना नवीन नाम लिख दूँगा।
१३ जिसके पास कान है, वो सुने कि प्राण कलिसियों से क्या कह रहा है।
१४ और लौदीकिया के कलिसिए के दूत को लिख दो; यह बातें कहते हैं वो तथास्तु, वो विश्वसनीय और वो सच्चे साक्षी, ईश्वर के सृजन के प्रारम्भ;
१५ मैं तुम्हारे कर्मों से परिचित हूँ, कि तुम न ही ठण्डे हो और न ही गर्म: काश कि तुम ठण्डे या गर्म होते।
१६ अतः चूँकि तुम गुनगुने हो, और न ही ठण्डे न ही गर्म, मैं तुम्हें अपने मूँह में से बाहर थूक डालूँगा।
१७ चूँकि तुम कहते हो, मैं तो धनवान हूँ, और मैं वस्तुओं में धनी हूँ, और मुझे तो किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं है; और तुम यह जानते नहीं हो कि तुम तो व्यथित हो, और दयनीय हो, और दरिद्र, और नेत्रहीन, और नग्न हो:
१८ मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम मुझ से अग्नी द्वारा परीक्षित स्वर्ण खरीद लो, ताकि तुम धनवान बन सको; और श्वेत वस्त्र, ताकि तुम आवृत हो सको, ताकि तुम्हारी नग्नता की लज्जा दिखाई न दे; और अपने नेत्रों पर नेत्र-अंजन मल लो, ताकि तुम देख सको।
१९ जितनो से भी मैं प्रेम करता हूँ, मैं उन्हें लताड़ता हूँ और दण्डित करता हूँ: इसलिए जोशीले बन जाओ, और मन-परिवर्तन कर लो।
२० देखो, मैं द्वार पर खड़ा हूँ, और दस्तक दे रहा हूँ: यदि कोई भी व्यक्ति मेरी वाणी सुनता है, और द्वार खोल देता है, तो मैं उसी के पास भीतर आ जाऊँगा, और उसके साथ रात्रिभोज खाऊँगा, और वही मेरे साथ।
२१ उसको जो परास्त करता है, मैं उसे अपने ही साथ, अपने ही सिंहासन में बैठने का अनुदान प्रदान कर दूँगा, जिस प्रकार मैंने भी पराजित किया, और मैं अपने ही पिताश्री के संग उन्हीं के सिंहासन में विराजमान हूँ।
२२ जिसके पास कान है, वो सुने कि प्राण कलिसियों से क्या कह रहा है।
चौथा अध्याय।
१ इसके पश्चात मैंने देखा, और देखो तो, एक द्वार स्वर्ग में खोल दिया गया था: और वो जो प्रथम वाणी मैंने सुनी वो थी मानो कि किसी एक चिंघाड़े जैसी मेरे साथ बातचीत करती हुई; जिसने कहा, इधर ऊपर आ जाओ, और मैं तुम्हें वो बातें दिखाऊँगा जो अवश्य ही इसके पश्चात घटेंगी।
२ और तुरन्त ही मैं प्राण में था: और देखो तो, एक सिंहासन स्वर्ग में स्थित था, और एक उस सिंहासन पर विराजमान थे।
३ और वो जो विराजमान थे दिखने में एक सूर्यकान्त और एक चुन्नी के पत्थर समान थे: और उस सिंहासन के चारों ओर एक मेघधनुष था, जो दिखने में एक पन्ने समान था।
४ और सिंहासन के चारों ओर चौबीस कुर्सियाँ थीं: और उन कुर्सियों पर मैंने चौबीस वृद्धों को श्वेत वस्त्रों में आवृत बैठे देखा; और उनके पास उनके सरों पर स्वर्ण मुकुट थे।
५ और सिंहासन में से बिजलियाँ और गरजनें और वाणियाँ बाहर प्रवृत्त हो रही थीं: और सिंहासन के समक्ष अग्नी के सात दीपक प्रज्ज्वलित थे, जो कि ईश्वर के सात प्राण हैं।
६ और सिंहासन के समक्ष एक काँच का समुद्र था, स्फटीक समान ही: और उस सिंहासन के मध्य में, और सिंहासन के चारों ओर, चार जानवर थे, आगे और पीछे आँखों से भरे हुए।
७ और वो पहला जानवर एक शेर समान था, और वो दूसरा जानवर एक बछड़े के समान, और उस तीसरे जानवर का चेहरा एक पुरुष के समान था, और वो चौथा जानवर एक उड़ते हुए गरुड़ के समान था।
८ और उन चार जानवरों में से प्रत्येक के पास छह पँख थे, उसी के चारों ओर; और वो भीतर आँखों से भरे हुए थे: और वो दिन-रात विश्राम नहीं करते, कहते हुए, पवित्र, पवित्र, पवित्र, प्रभु ईश्वर सर्व-बलशाली, जो थे, और जो हैं, और जो आने वाले हैं।
९ और जब वो जानवर उन्हें महिमा और सम्मान और कृतज्ञता देते जो उस सिंहासन पर विराजमान थे, जो सदा-सदा के लिए जीवन्त हैं,
१० तो वो चौबीस वृद्ध उनके समक्ष नीचे गिर जाते, जो उस सिंहासन पर विराजमान थे, और उनकी आराधना करते, जो सदा-सदा के लिए जीवन्त हैं, और अपने मुकुटों को उस सिंहासन समक्ष फैंक देते, कहते हुए,
११ आप ही महिमा और सम्मान और शक्ती ग्रहण करने के सुयोग्य हैं, हे प्रभु, क्योंकि आप ही ने समस्त वस्तुओं का सृजन कर दिया है, और आप ही की प्रसन्नता हेतु यह हैं और इन्हें सृजना दिया गया था।
पाँचवाँ अध्याय।
१ और मैंने एक पुस्तक देखी जो उनके दाएँ हाथ में थी जो उस सिंहासन पर विराजमान थे, जो भीतर और बाहर से लिखित थी, सात मुहरों से मुहरबंद।
२ और मैंने एक शक्तिमान दूत को एक प्रबल वाणी से घोषणा करते हुए देखा, कौन सुयोग्य है इस पुस्तक को खोलने के लिए, और इसकी मुहरों को तोड़ डालने के लिए?
३ और कोई भी व्यक्ति, न ही स्वर्ग में, न ही पृथ्वी में, न ही पृथ्वी के तले, उस पुस्तक को खोलने के लिए, न ही उसे देखने के लिए सक्षम था।
४ और मैं बहुत रोया, क्योंकि कोई भी व्यक्ति उस पुस्तक को खोलने और उसे पढ़ने के सुयोग्य नहीं पाया गया था, न ही उसे देखने के लिए।
५ और वृद्धों में से एक मुझ से कहने लगा, रो मत: देखो, यहूदा प्रजाति के शेर, दाऊद की जड़, इस पुस्तक को खोल देने के लिए, और उसकी सात मुहरों को तोड़ डालने के लिए अभिभावी ठहर चुके हैं।
६ और मैंने देखा, और लो, उस सिंहासन और उन चारों जानवरों के बीच, और उन वृद्धों के बीच, एक मेमने खड़े थे, मानो कि उनका वध कर दिया जा चुका था, सात सींघ और सात आँखें लिए, जो समस्त पृथ्वी में बाहर भेजे हुए ईश्वर के सात प्राण हैं।
७ और उन्होंने आकर उस पुस्तक को उनके दाएँ हाथ में से बाहर निकाल लिया, जो उस सिंहासन पर विराजमान थे।
८ और जब उन्होंने उस पुस्तक को ले लिया था, तो वो चार जानवर और वो चौबीस वृद्ध उन मेमने के समक्ष नीचे गिर पड़े, उन में से प्रत्येक वीणाएँ, और धूप-सुगंध से भरे स्वर्ण प्याले लिए हुए, जो कि सन्तों की प्रार्थनाएँ हैं।
९ और उन्होंने एक नवीन गान गाया कहते हुए, आप ही इस पुस्तक को लेने के, और इसकी मुहरों को खोलने के सुयोग्य हैं: क्योंकि आप का वध कर दिया गया था, और आप हमारा ईश्वर के प्रति अपने रक्त के माध्यम से, प्रत्येक कुल, और जीभ, और गण, और राष्ट्र में से मुक्तिभुक्तान कर चुके हैं;
१० और हमें हमारे ईश्वर के प्रति राजा और पुरोहित बना चुके हैं: और हम पृथ्वी पर राज्य करेंगे।
११ और मैंने देखा, और मैंने कई दूतों की वाणी सुनी, सिंहासन के, और जानवरों के, और उन वृद्धों के चारों ओर, और उनकी संख्या दस हज़ार गुणा दस हज़ार और हज़ारों ही हज़ार थी;
१२ एक प्रबल वाणी से कहते हुए, सुयोग्य हैं वो मेमने जिनका वध कर दिया गया था, शक्ती, और धन-धान्य, और विद्या, और बल, और सम्मान, और महिमा, और आशीर्वाद ग्रहण करने हेतु।
१३ और प्रत्येक जन्तु जो स्वर्ग में है, और पृथ्वी पर है, और पृथ्वी तले है, और ऐसे जो समुद्र में हैं, और वो समस्त जो उन में हैं, मैंने कहते हुए सुने, आशीर्वाद, और सम्मान, और महिमा, और शक्ती, उनके प्रति हो जो सिंहासन पर विराजमान हैं, और उन मेमने के प्रति, सदा से लेकर सदा तक।
१४ और उन चारों जानवरों ने कहा, तथास्तु। और वो चौबीस वृद्ध नीचे गिर पड़े और उनकी आराधना की जो सदा से लेकर सदा तक जीवन्त हैं।
छटा अध्याय।
१ और मैंने देखा कि जब उन मेमने ने मुहरों में से एक को खोला, तो मैंने उन चार जानवरों में से एक को गर्जन की ध्वनि समान कहते हुए सुना, भई आ जाओ और देख लो।
२ और मैंने देखा, और देखो तो एक श्वेत अश्व: और वो जो उस पर सवार था उसके पास एक धनुष था; और उसे एक मुकुट दे दिया गया था: और वो पराजित करता हुआ चलता गया, और पराजित कर देने हेतु।
३ और जब उन्होंने दूसरी मुहर खोल दी थी, तो मैंने दूसरे जानवर को कहते हुए सुना, भई आ जाओ और देखो।
४ और एक अन्य अश्व बाहर निकल चला जो लाल था: और उस पर बैठे हुए को पृथ्वी पर से शान्ति हटा देने की शक्ति प्रदान कर दी गई थी, और कि वो एक दूसरे को मार डालें: और उसे एक विशाल तलवार प्रदान कर दी गई थी।
५ और जब उन्होंने तीसरी मुहर खोल दी थी, तो मैंने उस तीसरे जानवर को कहते हुए सुना, भई आ जाओ और देखो। और मैंने देखा, और लो भई एक काला अश्व; और वो जो उस पर सवार था उसके पास उसके हाथ में एक तराज़ू का जोड़ा था।
६ और मैंने उन चारों जानवरों के बीच में से एक वाणी को कहते हुए सुना, गेहूँ का एक माप एक दीनार के लिए, और तीन माप जौ एक दीनार के लिए; और देख लेना कि तुम तेल और अंगूर-रस को हानि मत पहुँचाना।
७ और जब उन्होंने चौथी मुहर खोल दी थी, तो मैंने चौथे जानवर को कहते हुए सुना, आ जाओ भई और देखो।
८ और मैंने देखा, और देखो तो एक फीके रंग का अश्व: और वो जो उस पर सवार था उसका नाम मृत्यु था, और नरक उसी के साथ पीछे-पीछे आ रहा था। और उन्हें पृथ्वी के चौथे भाग पर शक्ती प्रदान कर दी गई थी, तलवार से, और भूख से, और मृत्यु से, और पृथ्वी के जानवरों से मार डालने हेतु।
९ और जब उन्होंने पाँचवी मुहर खोल दी थी, तो मैंने बलिवेदी के तले उनकी आत्माओं को देखा जो ईश्वर के शब्द के, और उस साक्ष्य के वास्ते जिसे उन्होंने पकड़े रखा था, मार दिए गए थे:
१० और वो एक प्रबल वाणी से चीखे, कहते हुए, हे पवित्र और सत्यमय प्रभु, और कितने समय तक आप उन पृथ्वी पर बसने वालों पर हमारे रक्त का न्याय और प्रतिषोध नहीं लेंगे?
११ और उन में से प्रत्येक को श्वेत लबादे प्रदान कर दिए गए थे; और उन से यह कह दिया गया था, कि उन्हें कुछ ही समय तक और विश्राम करना होगा, जब तक कि उन्हीं के साथी-सेवकों की भी, और उनके भाई-जनों की, जिनकी हत्या उन्हीं के समान घटने को है, पूर्ण हो जाए।
१२ और मैंने देखा जब उन्होंने छटी मुहर खोल दी थी, और लो, एक विशाल भूकम्प हुआ; और सूर्य एक बालों के टाट-वस्त्र समान काला हो गया, और चन्द्रमा रक्त के समान बन गया;
१३ और स्वर्ग के सितारे पृथ्वी पर गिर गए, उसी प्रकार जिस प्रकार अंजीर का पेड़ अपने असामयिक अंजीरों को गिरा डालता है, जब कोई प्रबल वायु उसे झकझोर देती है।
१४ और स्वर्ग एक लपेटे जाने वाले बेलन-आकारी सूचीपत्र समान प्रस्थान कर चला; और प्रत्येक पर्वत और द्वीप उनके स्थानो में से बाहर हिला दिए गए थे।
१५ और पृथ्वी के राजाओं ने, और महान व्यक्तियों ने, और धनवान व्यक्तियों ने, और प्रमुख कप्तानों ने, और बलशाली व्यक्तियों ने, और प्रत्येक दास ने, और प्रत्येक दास-मुक्त ने स्वयं को गुफाओं में, और पर्वतों की चट्टानों में छिपा लिया;
१६ और उन पर्वतों और चट्टानों से कहा, भई हम पर गिर पड़ो, और हमें उनके चहरे से छुपा लो जो सिंहासन पर विराजमान हैं, और मेमने के आक्रोश से:
१७ चूँकि उनके आक्रोश का वो विशाल दिवस आ गया है; और कौन खड़ा रह सकेगा?
सातवाँ अध्याय।
१ और इन घटनाओं के पश्चात मैंने चार दूतों को पृथ्वी के चारों कोनों पर खड़े देखा, पृथ्वी की चार वायुओं को पकड़े हुए, ताकि वायु न ही पृथ्वी पर, न ही समुद्र पर, न ही किसी भी वृक्ष पर चले।
२ और मैंने एक अन्य दूत को पूर्व से आरोहण करते हुए देखा, जिस पर जीवन्त ईश्वर की मुहर लगी हुई थी: और वो एक प्रबल वाणी से उन चारों दूतों को चीखा जिन्हें पृथ्वी और समुद्र को हानी पहुँचाना प्रदान कर दिया गया था,
३ कहते हुए, न ही पृथ्वी को, न ही समुद्र को, न ही वृक्षों को हानी पहुँचाना, जब तक हम अपने ईश्वर के सेवकों को उनके माथों पर मुहरबंद नहीं कर देते।
४ और मैंने उनकी संख्या सुनी जो मुहरबंद कर दिए गए थे: और इस्राएल की सन्तानों की समस्त प्रजातियों में से एक लाख चवालीस हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे।
५ यहूदा की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। रूबेन की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। गाद की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे।
६ आसेर की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। नफ्तालिम की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। मनश्शे की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे।
७ शिमोन की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। लेवी की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। इस्सकार की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे।
८ ज़बूलून की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। यूसुफ की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे। बिन्यामिन की प्रजाति में से बारह हज़ार मुहरबंद कर दिए गए थे।
९ इसके पश्चात मैंने देखा, और लो भई, एक विशाल जनौघ, जिसकी गिनती कोई भी मनुष्य नहीं कर सकता था, समस्त राष्ट्रों में से, और कुलों में से, और गणों में से, और भाषाओं में से; सिंहासन के समक्ष, और मेमने के समक्ष खड़ा था, श्वेत लबादों से आवृत, और अपने हाथों में खजूर के पत्ते लिए,
१० और वो एक प्रबल वाणी से कहते हुए चीखे, हमारे ईश्वर के प्रति जो सिंहासन पर विराजमान हैं, और मेमने के प्रति बचाव।
११ और सभी दूत सिंहासन के चारों ओर, और वृद्धों के चारों ओर, और उन चारों जानवरों के चारों ओर खड़े हुए अपने चेहरों के बल सिंहासन के समक्ष गिर पड़े, और ईश्वर की आराधना की,
१२ कहते हुए, तथास्तु: आशीर्वाद, और गौरव, और विद्या, और कृतज्ञता, और सम्मान, और शक्ति, और बल, हमारे ईश्वर के प्रति सदा से लेकर सदा तक रहे। तथास्तु।
१३ और वृद्धों में से एक ने उत्तर दिया, मुझ से कहता हुआ, यह कौन हैं जो श्वेत लबादों में आवृत हैं? और यह कहाँ से आए हैं?
१४ और मैंने उस से कहा, श्रीमान, आप जानते हैं। और उसने मुझ से कहा, यह वही हैं जो महा-आपत्ती में से बाहर निकल कर आए हैं, और इन्होंने मेमने के रक्त में अपने लबादों को धो कर, उन्हें श्वेत बना दिया है।
१५ इसलिए यह ईश्वर के सिंहासन के समक्ष हैं, और यह उनकी सेवा उनके मन्दिर में दिन-रात करते रहते हैं: और वो जो सिंहासन पर विराजमान हैं इन्हीं के बीच बस जाएँगे।
१६ इन्हें फिर कभी भूख नहीं लगेगी, न ही फिर कभी प्यास लगेगी; न ही इन पर सूर्य पड़ेगा, न ही कोई भी ताप।
१७ चूँकि वो मेमने जो सिंहासन के मध्य में हैं इन्हें चराएँगे, और इनका जलों के जीवन्त जल-स्त्रोतों की ओर नेतृत्व करेंगे: और ईश्वर इनके नेत्रों से सभी आँसुओं को पोंछ डालेंगे।
आठवाँ अध्याय।
१ और जब उन्होंने सातवीं मुहर खोल दी थी, तो स्वर्ग में आधे घण्टे के लिए चुप्पी छा गई।
२ और मैंने उन सात दूतों को देखा जो ईश्वर के समक्ष खड़े थे; और उन्हें सात चिंघाड़े प्रदान कर दिए गए थे।
३ और एक अन्य दूत आकर बलिवेदी संग खड़ा हो गया, एक स्वर्णमई अग्नी-पात्र लिए; और उसे बहुतेरी सुगंधित-धूप प्रदान कर दी गई थी, ताकि वो उसे उस स्वर्णमई बलिवेदी पर समस्त सन्तों की प्रार्थनाओं सहित अर्पित कर दे, जो उस सिंहासन के समक्ष थी।
४ और उस सुगंधित-धूप का धूआँ, जो सन्तों की प्रार्थनाओं संग आया, ईश्वर के समक्ष उस दूत के हाथ में से ऊपर उठता चला गया।
५ और उस दूत ने उस अग्नी-पात्र को लेकर उसे बलिवेदी की अग्नी से भर कर उसे पृथ्वी पर फैंक डाला: और वाणियाँ, और गर्जने, और बिजलियाँ, और एक भूकम्प घटने लगे।
६ और उन सात दूतों ने, जिनके पास वो सात चिंघाड़े थे, स्वयं को चिंघाड़ने हेतु उद्यत किया।
७ तो पहले दूत ने चिंघाड़ मचाई, और रक्त के संग मिश्रित ओले और अग्नी उतपन्न हो उठे, और इन्हें पृथ्वी पर फैंक दिया गया: और वृक्षों का एक तिहाई भाग भस्म हो गया था, और समस्त हरी घास भस्म हो गई थी।
८ और दूसरे दूत ने चिंघाड़ मचाई, और मानो कि अग्नी से जलता हुआ एक विशाल पर्वत समुद्र में फैंक दिया गया था: और समुद्र का एक तिहाई भाग रक्त बन गया:
९ और समुद्र में वो जो जीवन रखने वाले जन्तु थे, उनका एक तिहाई भाग मर गया; और जलयानों का एक तिहाई भाग नष्ट हो गया।
१० और तीसरे दूत ने चिंघाड़ मचाई, और स्वर्ग में से एक विशाल सितारा गिरा, मानो कि वो कोई जलती हुई मशाल हो, और वो नदियों के एक तिहाई भाग पर, और जलों के जल-स्त्रोतों पर जा गिरा;
११ और उस सितारे का नाम नागदौना कहा जाता है: और जलों का एक तिहाई भाग नागदौना बन गया; और कई लोग जलों से मर गए, चूँकि वो कड़वे बना दिए गए थे।
१२ और चौथे दूत ने चिंघाड़ मचाई, और सूर्य के एक तिहाई भाग पर वार कर दिया गया था, और चन्द्रमा के एक तिहाई भाग पर, और सितारों के एक तिहाई भाग पर; कि उनका एक तिहाई भाग अन्धेरा बना दिया गया था, और दिन एक तिहाई भाग तक उज्ज्वल नहीं हुआ, और इसी प्रकार ही रात्रि।
१३ और मैंने देखा, और एक दूत को स्वर्ग के बीच में से उड़ते हुए सुना, एक प्रबल वाणी से बोलता हुआ, हाय पड़े, हाय पड़े, हाय पड़े, पृथ्वी के निवासियों पर उन तीन दूतों के चिंघाड़ों की वाणियों के कारण, जिनका चिंघाड़ना अभी बचा रहता है!
नौवाँ अध्याय।
१ और पाँचवे दूत ने चिंघाड़ मचाई, और मैंने एक सितारे को स्वर्ग में से पृथ्वी पर गिरते हुए देखा: और उसे उस तलहीन-गर्त की चाबी प्रदान कर दी गई थी।
२ और उसने उस तलहीन-गर्त को खोल दिया; और उस गर्त में से बाहर एक धुआँ उठा, मानो कि किसी विशाल भट्टी का धुआँ: और सूर्य और वायु गर्त के उस धुएँ के कारण अन्धकारमय हो गए थे।
३ और पृथ्वी पर उस धुएँ में से टिड्डियाँ बाहर निकल आईं: और उन्हें पृथ्वी के बिच्छुओं की शक्ति समान शक्ति प्रदान कर दी गई थी।
४ और उन्हें यह आदेश दे दिया गया था कि वो पृथ्वी की घास को हानि न पहुँचाएँ, न ही किसी भी हरी वस्तु को, न ही किसी भी वृक्ष को; बल्कि केवल उन्हीं लोगों को जिनके माथों पर ईश्वर की मुहर नहीं लगी हुई है।
५ और उन्हें यह प्रदान कर दिया गया था कि वो उन्हें मार न डालें, बल्कि उन लोगों को पाँच महीने उत्पीड़ित किया जाए: और उनकी उत्पीड़ना बिच्छू की उत्पीड़ना समान थी, जब वो किसी व्यक्ति को डंक मार देता है।
६ और उन दिनो में लोग मृत्यु को ढूँढेंगे, और वो उसे ढूँढ नहीं पाएँगे; और वो मर जाने की वांछा करेंगे, और मृत्यु उनसे भाग जाएगी।
७ और उन टिड्डियों के आकार थे मानो युद्ध के लिए उद्यत अश्वों समान; और उनके सरों पर मानो स्वर्णमई मुकुट थे, और उनके चहरे लोगों के चेहरों समान थे।
८ और उनके बाल स्त्रियों के बालों समान थे, और उनके दाँत सिंघों के दाँतों समान थे।
९ और उनके पास छाती-कवच थे, मानो कि लोहे के छाती-कवच; और उनके पंखों की ध्वनि रण की ओर दौड़ते हुए अनेक अश्वों के रथों समान थी!
१० और उनके पास बिच्छुओं समान पूँछें थीं, और उनकी पूँछों में डंक थे: और उनकी शक्ति लोगों को पाँच महीने हानि पहुँचाने की थी।
११ और उन पर एक राजा नियुक्त था, जो उस तलहीन-गर्त का दूत है, जिसका नाम इब्रानी जीभ में अबद्यौन है, परन्तु यूनानी भाषा में उसका नाम अप्पुलयोन है।
१२ एक हाय तो बीत चुकी है; और देखो तो, दो अन्य हाएँ इसके पश्चात आ रही हैं।
१३ और छटे दूत ने चिंघाड़ मचाई, और मैंने ईश्वर के समक्ष उस स्वर्ण बलिवेदी के चार सींघों से एक वाणी सुनी,
१४ चिंघाड़े को लिए उस छटे दूत से कहती हुई, भई उस महा-नदी फरात में बन्धे हुए उन चारों दूतों को खुला छोड़ दो।
१५ और उन चारों दूतों को खुला छोड़ दिया गया था, जिन्हें एक घण्टे, और एक दिन, और एक माह, और एक वर्ष के लिए तैयार किया गया था, लोगों के एक तिहाई भाग को मार डाल देने हेतु।
१६ और घुड़सवारों की सेना की संख्या बीस करोड़ थी: और मैंने उनकी संख्या सुनी।
१७ और इस प्रकार मैंने उन अश्वों को उस दृश्य में देखा, और उन्हें जो उन पर सवार थे, अग्नी, और बिल्लौर, और गन्धक के छाती-कवच लिए हुए: और उन अश्वों के सर ऐसे थे मानो कि सिंघों समान; और उनके मुँखों से बाहर अग्नी, और धुआँ, और गन्धक प्रवृत हो रहे थे।
१८ इन्हीं तीनों के द्वारा लोगों का एक तिहाई भाग मार दिया गया था, अग्नी के द्वारा, और उस धुएँ के द्वारा, और उस गन्धक के द्वारा, जो उनके मुखों से बाहर प्रवृत हो रहे थे।
१९ चूँकि उनकी शक्ति उनके मूँह में, और उनकी पूँछों में है: क्योंकि उनकी पूँछें सर्पों समान थीं, और उन पर सर थे, और उन्हीं से वो चोट पहुँचाते हैं।
२० और उन शेष लोगों ने, जो इन विपत्तियों द्वारा नहीं मारे गए थे, उन्होंने तब भी अपने हाथों के कर्मों से मन-परिवर्तित नहीं किया, कि उन्हें दानवों की, और सोने, और चाँदी, और पीतल, और पत्थर, और लकड़ी की मूर्तियों की आराधना नहीं करनी चाहिए: जो न ही देख सकती हैं, न ही सुन सकती हैं, न ही चल-फिर सकती हैं:
२१ न ही उन्होंने अपनी हत्याओं से, न ही अपने तन्त्र-विष-ज्ञानों से, न ही अपने अविवाहित-यौन से, न ही अपनी चोरियों से मन-परिवर्तित किया।
दसवाँ अध्याय।
१ और मैंने एक अन्य बलशाली दूत को, एक मेघ से आवृत, स्वर्ग से नीचे आते हुए देखा: और दूत के सर पर एक मेघधनुष था, और चेहरा ऐसा था मानो कि वो सूर्य हो, और पैर अग्नी के स्तम्भों समान:
२ और दूत के हाथ में एक खुली हुई छोटी सी पुस्तक थी: और दूत ने अपना दायाँ पैर समुद्र पर स्थित किया, और अपना बायाँ पैर पृथ्वी पर।
३ और दूत ने एक प्रबल वाणी से चीख मचाई, एक शेर के दहाड़ने के समान: और जब दूत ने चीख दिया था, सात गर्जनों ने अपनी वाणियाँ अर्णित कर दीं।
४ और जब उन सात गर्जनों ने अपनी वाणियाँ अर्णित कर दी थीं, तो मैं लिखने ही वाला था: और मैंने एक स्वर्गवाणी मुझ से कहती हुई सुनी, उन बातों को जिन्हें उन सात गर्जनों ने अर्णित कर दिया है उन्हें मुहरबन्द कर दो, और उन्हें मत लिखो।
५ और मेरे द्वारा देखे गए समुद्र पर और पृथ्वी पर खड़े दूत ने अपना हाथ स्वर्ग की ओर उठाया,
६ और दूत ने उनके माध्यम से वचन दिया जो सदा से लेकर सदा तक जीते हैं, जिन्होंने स्वर्ग का, और उसी में स्थित उन वस्तुओं का, और पृथ्वी का, और उसी में स्थित उन वस्तुओं का, और समुद्र का, और उसी में स्थित उन वस्तुओं का सृजन कर दिया था, कि अब और अधिक विलम्ब नहीं होगा:
७ बल्कि उस सातवें दूत की वाणी के दिनो में, जब वो चिंघाड़ना आरम्भ कर देगा, तो ईश्वर के रहस्य की समाप्ति हो जाएगी, जैसा कि उन्होंने अपने सेवकों उन पैग़म्बरों को घोषित कर दिया है।
८ और वो वाणी जिसे मैंने स्वर्ग से सुनी थी मुझ से पुनः बोली, और कहा, जाओ और उस छोटी सी पुस्तक को ले लो जो समुद्र पर और पृथ्वी पर खड़े दूत के हाथ में खुली हुई है।
९ और मैं दूत के पास गया, और मैंने दूत से कहा, मुझे वो छोटी सी पुस्तक दे दो जी। और दूत ने मुझ से कहा, ले लो इसे, और इसे खा लो; और यह तुम्हारे पेट को कड़वा बना देगी, लेकिन ये तुम्हारे मूँह में मधु समान मधुर होगी।
१० और मैंने उस छोटी सी पुस्तक को दूत के हाथ में से बाहर निकाल कर खा लिया: और वो मेरे मूँह में मधु समान मधुर थी: और जैसे ही मैंने उसे खा लिया था, तो मेरा पेट कड़वा हो चला।
११ और दूत ने मुझ से कहा, तुम्हें अवश्य ही पुनः कई गणों, और राष्ट्रों, और जीभों, और राजाओं, के समक्ष प्रेरित-उपदेश देने हैं।
ग्यारहवाँ अध्याय।
१ और मुझे एक छड़ी समान सरकंडा दे दिया गया था: और दूत ने खड़े हुए कहा, उठो, और ईश्वर के मन्दिर का, और बलिवेदी का, और उनका माप ले लो, जो वहाँ भीतर आराधना करते हैं।
२ लेकिन उस आँगन को जो मन्दिर के बाहर है, उसे छोड़ दो, और उसे मत नापो: क्योंकि उसे अन्यप्रजातियों को प्रदान कर दिया गया है: और उस पवित्र नगर को वो पैरों तले बयालिस महीने रौंद डालेंगे।
३ और मैं अपने दोनो साक्षियों को शक्ती प्रदान करूँगा, और वो टाट-वस्त्र में आवृत, एक हज़ार दो सौ साठ दिन प्रेरित-उपदेश देंगे।
४ यही वो दो जैतून के पेड़ हैं, और वो दो दीपाधार पृथ्वी के ईश्वर समक्ष खड़े हुए।
५ और यदि कोई भी व्यक्ति उन्हें हानि पहुँचाने का इच्छुक होगा, तो अग्नी उनके मुँहों में से प्रवृत होगी, और उनके शत्रुओं का भुख-भक्षण कर डालेगी: और यदि कोई भी व्यक्ति उन्हें हानि पहुँचाने की इच्छा करेगा, उसे निश्चितता से ही इसी प्रकार मार डाल दिया जाएगा।
६ यह स्वर्ग को बँद कर देने की शक्ती रखते हैं, कि उनके प्रेरित-उपदेश के दिनो में वर्षा न गिरे: और यह जलस्त्रोतों पर शक्ती रखते हैं उन्हें लहू में परिवर्तित कर देने की, और कि वो पृथ्वी को समस्त विपत्तियों से अपनी मन चाही इच्छानुसार, आघातित करते रहें।
७ और जब यह अपने साक्ष्य को समाप्त कर चुकेंगे, तो वो जानवर जो तलहीन-गर्त में से बाहर आरोहण करता है, इनके विरुद्ध संग्राम करेगा, और वो इन्हें पराजित कर देगा, और इन्हें मार डालेगा।
८ और इनके शव उस महा नगर की सड़क पर पड़े होंगे, जो आध्यात्मिकतानुसार सदोम और मिस्र कहलाया जाता है, जहाँ हमारे प्रभु क्रूस पर भी चढ़ा दिए गए थे।
९ और वो जो गणों और कुलों और जीभों और राष्ट्रों में से हैं, उनके शव साढ़े तीन दिन देखेंगे, और वो उनके शवों को क़ब्रों में नहीं डाला जाने देंगे।
१० और वो जो पृथ्वी पर बसते हैं उन पर हर्ष और मगन मनाएँगे, और एक दूसरे को उपहार भेजेंगे; क्योंकि इन दोनो पैग़म्बरों ने पृथ्वी पर बसने वालों को उत्पीड़ित किया था।
११ और साढ़े तीन दिनो के पश्चात ईश्वर से जीवन के प्राण ने उन में प्रवेश किया, और वो अपने पैरों पर खड़े हो गए; और उन्हें देखने वालों पर एक विशाल भय छा गया।
१२ और उन्होंने स्वर्ग में से एक प्रचण्ड वाणी को उनसे कहते हुए सुना, भई इधर ऊपर आ जाओ। और उन्होंने एक मेघ में ऊपर स्वर्ग तक आरोहण कर लिया; और उनके शत्रुओं ने उन्हें देखा।
१३ और उसी घड़ी एक विशाल भूकम्प हुआ, और उस नगर का दसवाँ भाग गिर गया, और उस भूकम्प में सात हज़ार लोग मार दिए गए थे: और वो शेष भाग भयभीत हो उठे, और उन्होंने स्वर्ग के ईश्वर को महिमा प्रदान कर दी।
१४ दूसरी हाय बीत चुकी है; और देखो तो, वो तीसरी हाय शीघ्रता से आ रही है।
१५ और उस सातवें दूत ने चिंघाड़ मचाई, और स्वर्ग में बड़ी वाणियाँ बोल रही थीं, इस विश्व के राज्य हमारे प्रभु के, और उनके मसीहा के राज्य बन चुके हैं; और वो सदा-सदा तक राज करेंगे।
१६ और वो चौबीस वृद्ध, जो ईश्वर समक्ष अपनी कुर्सियों पर बैठे थे, अपने चेहरों के बल गिर पड़े, और ईश्वर की आराधना की,
१७ कहते हुए, हम आपको धन्यवाद देते हैं, हे प्रभु ईश्वर सर्वबलशाली, जो हैं, और जो थे, और जो आने वाले हैं; चूँकि आपने ही अपने प्रति अपनी महा-शक्ती ले ली है, और आपने राज कर लिया है।
१८ और वो राष्ट्र क्रोधित थे, और आपका आक्रोश आ गया है, और मृतकों का वो समय, कि उनका न्याय-निर्धारण कर दिया जाए, और कि आप अपने सेवकों उन पैग़म्बरों को, और सन्तों को, और उन्हें जो आपके नाम से डरते हैं, छोटों और बड़ों को, वेतन प्रदान कर दें; और उन्हें विनष्ट कर डालें जो पृथ्वी को नष्ट करते हैं।
१९ और स्वर्ग में ईश्वर का वो मन्दिर खोल दिया गया था, और उनके मन्दिर में उनके अनुबन्ध का संदूक दिख रहा था: और बिजलियाँ, और वाणियाँ, और गर्जने, और एक भूकम्प, और बृहत् ओले घट रहे थे।
बारहवाँ अध्याय।
१ और स्वर्ग में एक विशाल अचम्भा प्रकट हुआ, एक स्त्री सूर्य से आवृत, और चन्द्रमा उसके पैरों तले, और उसके सर पर एक बारह सितारों वाला मुकुट:
२ और वो बच्चे से होती हुए चीख रही थी, जन्म देने की प्रसव वेदना में, और प्रसूति की पीड़ा में।
३ और स्वर्ग में एक अन्य अचम्भा प्रकट हुआ; और देखो तो, एक विशाल लाल अजगर, सात सर और दस सींघ लिए, और सात मुकुट उसके सरों पर।
४ और उसकी पूँछ ने स्वर्ग के सितारों का एक तिहाई भाग खींच कर, उन्हें पृथ्वी पर फैंक दिया: और वो अजगर उस स्त्री के समक्ष जो जन्म देने ही वाली थी, खड़ा था, उसके बच्चे का जन्म लेते ही भुख-भक्षण कर देने हेतु।
५ और उसने एक नर बच्चा उतपन्न किया, जिन्होंने समस्त राष्ट्रों पर एक लोहे के लट्ठ से राज करना था: और उसके बच्चे को, ईश्वर और उनके सिंहासन तक ऊपर पकड़ कर छीन लिया गया।
६ और वो स्त्री जँगली-क्षेत्र में भाग-खड़ी हुई, जहाँ उसके पास ईश्वर द्वारा तैयार किया गया एक स्थान है, कि वो उसका वहाँ एक हज़ार दो सौ साठ दिन पोषण करें।
७ और स्वर्ग में युद्ध छिड़ गया: मिखाएल और उसके दूतों ने अजगर के विरुद्ध लड़ाई की: और उस अजगर ने लड़ाई की और उसके दूतों ने,
८ और वो अभिभावी नहीं ठहरे; न ही स्वर्ग में उनका स्थान अब और पाया गया था।
९ और उस विशाल अजगर को बाहर फैंक दिया गया था, उस प्राचीन सर्प को ही, जो दानव कहलाया जाता है, और शैतान, जो समस्त संसार को धोखा देता है: उसे बाहर पृथ्वी पर फैंक दिया गया था, और उसके दूतों को उसी के साथ बाहर फैंक दिया गया था।
१० और मैंने स्वर्ग में एक प्रबल वाणी सुनी कहती हुई, अब बचाव आ गया है, और शक्ती, और हमारे ईश्वर का राज्य, और उनके मसीहा की शक्ति: क्योंकि हमारे भाई-जनो का दोषारोपक नीचे फैंक दिया गया है, जो उनका हमारे ईश्वर समक्ष दिन-रात दोषारोपण किया करता था।
११ और उन्होंने उसे मेमने के रक्त द्वारा, और उनके साक्ष्य के शब्द द्वारा, पराजित कर दिया; और उन्होंने मरते-दम तक अपने जीवनों से प्रेम नहीं किया।
१२ इसलिए हर्ष मनाओ, तुम स्वर्गों, और तुम जो उन में बसते हो। हाय पड़े धरती और समुद्र के बसने वालों पर! चूँकि वो दानव नीचे तुम्हारे पास आ गया है, अत्यन्त आक्रोश लिए, क्योंकि वो ये जानता है कि उसके पास बस केवल थोड़ा सा ही समय है।
१३ और जब उस अजगर ने देखा कि उसे तो पृथ्वी पर पटक दिया गया था, तो उसने उस स्त्री का अत्याचार किया जिसने उन नर बच्चे को उत्पन्न किया था।
१४ और उस स्त्री को एक विशाल गरुड़ के दो पँख प्रदान कर दिए गए थे, ताकि वो उस जँगली-क्षेत्र में उड़ चली जाए, अपने स्थान में ही, जहाँ उसका पोषण किया जाता है एक समय, और समयों, और आधे समय तक, सर्प के चहरे से परे।
१५ और उस सर्प ने उस स्त्री के पीछे एक नदी समान अपने मूँह में से पानी बाहर उगला, ताकि वो उसे उस प्रलय में बहा ले जाए।
१६ और धरती ने उस स्त्री की सहायता की, और धरती ने अपना मूँह खोल लिया, और उस प्रलय को निगल लिया, जिसे अजगर ने अपने मूँह में से बाहर उगल दिया था।
१७ और वो अजगर उस स्त्री के प्रति आक्रोश से भरा हुआ था, और वो उसके बीज के शेष भाग के साथ युद्ध करने निकल पड़ा, जो ईश्वर के आदेशों का पालन करते हैं, और यीशु मसीह का साक्ष्य रखते हैं।
तेरहवाँ अध्याय।
१ और मैं समुद्र के रेत पर खड़ा था, और मैंने एक जानवर को समुद्र में से बाहर ऊपर उठते हुए देखा, सात सर और दस सींघ लिए, और उसके सींघों पर दस मुकुट थे, और उसके सरों पर ईश्वर-निंदा का नाम।
२ और वो जानवर जिसे मैंने देखा एक तेंदुए के समान था, और उसके पैर ऐसे थे मानो कि एक भालू जैसे, और उसका मूँह एक शेर के मूँह के समान था: और उस अजगर ने उसे उसकी शक्ती, और उसका आसन, और विशाल प्राधिकार प्रदान किए।
३ और मैंने उसके सरों में से एक को देखा, कि वो प्राण-घात से मार दिया गया था; और उसका वो जानलेवा घाव स्वस्थ हो गया था: और समस्त संसार उस जानवर के पीछे-पीछे अचरज मनाता जा रहा था।
४ और उन्होंने उस अजगर की आराधना की, जिसने उस जानवर को शक्ति प्रदान की थी: और उन्होंने उस जानवर की आराधना की, कहते हुए, कौन है इस जानवर के जैसा? कौन इसके साथ युद्ध करने का सामर्थ्य रखता है?
५ और उसे बड़ी-बड़ी बातें, और ईश्वर-निंदाएँ बोलता हुआ एक मूँह प्रदान कर दिया गया था; और उसे बयालिस महीने बने रहने की शक्ति प्रदान कर दी गई थी।
६ और उसने ईश्वर के विरुद्ध निंदा में अपना मूँह खोला, उनके नाम की, और उनके तम्बू की, और उनकी जो स्वर्ग में बसते हैं, निंदा करने हेतु।
७ और उसे यह प्रदान कर दिया गया था कि वो सन्तों के साथ युद्ध करे, और उन्हें परास्त कर दे: और उसे समस्त कुलों पर, और भाषाओं पर, और राष्ट्रों पर, शक्ती प्रदान कर दी गई थी।
८ और वो सभी जो पृथ्वी पर बसते हैं, जिनके नाम उन संसार की नीव से मार दिए गए मेमने की जीवन की पुस्तक में नहीं लिखे हुए हैं, उसकी आराधना करेंगे।
९ यदि किसी के पास भी कान हैं, सुन लेने दो उसे।
१० वो जो बन्धन में ले जाता है बन्धन में ही ले जाया जाएगा: वो जो तलवार से मारता है, निश्च्य से ही तलवार द्वारा ही मार दिया जाएगा। यहीं है सन्तों का धीरज और विश्वास।
११ और मैंने एक अन्य जानवर को बाहर धरती में से ऊपर निकलते हुए देखा; और वो एक भेड़ के समान दो सींघ लिए था, और वो एक अजगर समान बोला।
१२ और वो उस से पहले वाले उस प्रथम जानवर के समस्त प्राधिकार का क्रिया-कर्ता है, और वो पृथ्वी से और उन से जो उस में बसते हैं, उस प्रथम जानवर की आराधना करवाता है, जिसका वो जानलेवा घाव स्वस्थ हो गया था।
१३ और वो बड़े अचम्भे करता है, कि वो लोगों की दृष्टि समक्ष स्वर्ग में से धरती पर अग्नी नीचे गिरवाता है,
१४ और उन चमत्कारों के माध्यम से जिन्हें कर देने की शक्ती उसके पास उस जानवर की दृष्टि में थी, वो पृथ्वी पर बसने वालों को धोखा देता है; पृथ्वी के निवासियों से कहता हुआ, कि उन्हें उस जानवर के प्रति एक प्रतिमा बना देनी चाहिए, जो तलवार द्वारा घायल हुआ था, और जीवित भी रहा।
१५ और उसके पास उस जानवर की प्रतिमा को जीवन प्रदान कर देने की शक्ति थी, ताकि उस जानवर की प्रतिमा दोनो बोल सके, और उन सभी को मरवा भी दे, जितने भी उस जानवर की प्रतिमा की आराधना न करें।
१६ और वो सभी पर, दोनो छोटों पर और बड़ों पर, धनवान और दरिद्र पर, दास-मुक्त और दास पर, उनके दाएँ हाथ में, या उनके माथों में एक चिन्ह छपवाता है;
१७ और कि कोई भी व्यक्ति खरीद या बेच न सके, सिवाय उसके जिस पर वो चिंन्ह छपा हो, या उस जानवर का नाम, या उसके नाम का क्रमांक।
१८ यहीं है विद्या। उसे जिसके पास समझदारी है उसे गिन लेने दो उस जानवर का क्रमांक: क्योंकि वो एक मनुष्य का क्रमांक है; और उसका क्रमांक छह सौ छियासठ है।
चौदहवाँ अध्याय।
१ और मैंने देखा, और लो, एक मेमने सियोन पहाड़ पर खड़े थे, और उनके साथ एक लाख चवालीस हज़ार थे, उनके माथों में मेमने के पिताश्री का नाम लिखित।
२ और मैंने एक स्वर्गवाणी सुनी, कई पानियों की वाणियों समान, और एक विशाल गर्जन की वाणी समान: और मैंने वीणा वादकों की वाणी सुनी अपनी वीणाओं पर वीणा-वादन करते हुए:
३ और उन्होंने सिंहासन समक्ष, और उन चारों जानवरों के, और उन वृद्धों के समक्ष, मानो कोई एक नवीन गान गाया: और कोई भी व्यक्ति उस गाने को नहीं सीख सकता था, बस केवल वो एक लाख चवालीस हज़ार ही, जिनका पृथ्वी में से मुक्तिभुक्तान कर दिया गया था।
४ ये वो हैं जो स्त्रियों संग प्रदूषित नहीं हुए थे; क्योंकि ये कुँवारें हैं। ये वही हैं जो मेमने के पीछे-पीछे चलते हैं जहाँ कहीं भी वो मेमने जाते हैं। इनका लोगों के बीच में से मुक्तिभुक्तान कर दिया गया था, ईश्वर के प्रति और उन मेमने के प्रति प्रथम-फल।
५ और उनके मूँह में कोई भी छल नहीं पाया गया था: चूँकि ये ईश्वर के सिंहासन समक्ष दोषहीन हैं।
६ और मैंने एक अन्य दूत को स्वर्ग के मध्य में उड़ता हुआ देखा, उस अनन्त शुभ-समाचार को लिए हुए, उन्हें प्रचारित करने हेतु जो पृथ्वी पर बसते हैं, और प्रत्येक राष्ट्र को, और कुल को, और भाषा को, और गणों को,
७ एक प्रबल वाणी से कहता हुआ, ईश्वर से डरो, और उन्हें महिमा प्रदान करो; क्योंकि उनके न्याय-निर्धारण की घड़ी आ गई है: और उनकी आराधना करो जिन्होंने स्वर्ग, और पृथ्वी, और समुद्र, और जलों के जलस्त्रोत, निर्मित किए हैं।
८ और एक अन्य दूत पीछे-पीछे आया, कहता हुआ, वो महा नगरी बेबिलोन गिर चुकी है, गिर चुकी है, क्योंकि उसने अपने अविवाहित-यौन के अंगूर-रस के आक्रोश में से समस्त राष्ट्रों को पिलवा दिया।
९ और वो तीसरा दूत उनके पीछे-पीछे आया, एक प्रबल वाणी से कहता हुआ, यदि कोई भी व्यक्ति उस जानवर और उसकी प्रतिमा की आराधना करेगा, और उसके चिंन्ह को अपने माथे में या अपने हाथ में छपवाएगा,
१० वही ईश्वर के आक्रोश के अंगूर-रस से पियेगा, जो बिना मिश्रण के उनके रोष के प्याले में उंडेल दिया गया है, और वही पवित्र दूतों की प्रस्तुति में, और उन मेमने की प्रस्तुति में, अग्नी और गन्धक से उत्पीड़ित होता रहेगा:
११ और उनकी उत्पीड़ना का धुआँ सदा से लेकर सदा तक ऊपर उठता रहता है: और उन्हें दिन-रात कोई भी विश्राम नहीं मिलता है, जो उस जानवर की, और उसकी प्रतिमा की आराधना करते हैं, और जो कोई भी उसके नाम का चिंन्ह छपवा लेता है।
१२ यहीं सन्तों का धीरज है: यहीं हैं वो जो ईश्वर के आदेशों को, और यीशु के विश्वास को रखते हैं।
१३ और मैंने एक स्वर्गवाणी मुझ से कहती हुई सुनी, लिख दो, धन्य हैं वो मृत जो अब से लेकर प्रभु में मरेंगे: हाँ भई, कहते हैं वो प्राण, ताकि वो अपने श्रमों से विश्राम ले लें; और उनके कर्म उनके पीछे पीछे ही आ रहे हैं।
१४ और मैंने देखा, और देखो तो एक श्वेत मेघ, और उस मेघ पर एक मनुष्य-पुत्र समान विराजमान थे, अपने सर पर एक स्वर्ण मुकुट धारण किए हुए, और उनके हाथ में एक तीव्र हँसिया।
१५ और एक अन्य दूत मन्दिर में से बाहर निकल आया, एक प्रबल वाणी से उनकी ओर चीखता हुआ, जो उस मेघ पर विराजमान थे, अपने हँसिए को घोंप दें जी, और फसल-कटाई कर लें: क्योंकि आपकी कटाई कर देने का वो समय आ गया है; क्योंकि पृथ्वी की फसल कटने हेतु पक चुकी है।
१६ और उन्होंने जो उस मेघ पर विराजमान थे, अपना हँसिया पृथ्वी में घोंप डाला; और पृथ्वी की फसल की कटाई हो गई।
१७ और स्वर्ग में उस मन्दिर में से एक अन्य दूत बाहर निकल आया, वो भी एक तीव्र हँसिया लिए हुए।
१८ और एक अन्य दूत उस बलिवेदी में से बाहर निकला, जिसके पास अग्नी पर शक्ती थी; और वो एक उच्च वाणी से उसकी ओर कहता हुआ चीखा, जिसके पास वो तीव्र हँसिया था, अपने तीव्र हँसिए को घोंप डालो, और पृथ्वी की लता के गुच्छों का संग्रहण कर लो; क्योंकि उसके अंगूर पूर्णता से पक चुके हैं।
१९ और उस दूत ने अपना हँसिया पृथ्वी में घोंप डाला, और पृथ्वी की लता का संहग्रहण कर, उसे ईश्वर के आक्रोश के विशाल अंगूर-रस के कोल्हू में फैंक डाला।
२० और उस अंगूर-रस के कोल्हू को उस नगर के बाहर रौंद डाल दिया गया था, और उस अंगूर-रस के कोल्हू में से रक्त बाहर निकल आया, यहाँ तक कि अश्व की लगामों तक भी, एक हज़ार छह सौ फरलौंगों की दूरी तक।
पन्द्रहवाँ अध्याय।
१ और मैंने स्वर्ग में एक अन्य विशाल, और अद्भुत संकेत देखा, सात दूत उन सात अंतिम विपत्तियों को लिए; चूँकि उन्हीं में ईश्वर का आक्रोश भरा हुआ है।
२ और मैंने देखा मानो कि अग्नी से मिश्रित एक काँच का समुद्र था: और वो उस काँच के समुद्र पर ईश्वर की वीणाएँ लिए खड़े थे, जिन्होंने उस जानवर पर, और उसके चिन्ह की छाप पर, और उसके नाम के क्रमांक पर, विजय प्राप्त कर ली थी।
३ और वो ईश्वर के सेवक मूसा का गीत, और उन मेमने का गीत गाते हैं, कहते हुए, महान और अद्भुत हैं आपके कर्म, प्रभु ईश्वर सर्वबलशाली; न्यायी और सत्यमय हैं आपके पथ, आप सन्तों के सम्राट।
४ हे प्रभु, कौन आपका भय नहीं मानेगा, और आपके नाम को गौरव नहीं प्रदान करेगा? क्योंकि बस केवल आप ही तो पवित्र हैं: क्योंकि समस्त राष्ट्र आएँगे और आपके सम्मुख आराधना करेंगे; क्योंकि आपके न्याय-निर्धारण प्रत्यक्षित कर दिए गए हैं।
५ और इसके पश्चात मैंने देखा, और देखो तो, स्वर्ग में साक्ष्य के उस तम्बू का वो मन्दिर खोल दिया गया था:
६ और वो सात दूत मन्दिर में से बाहर निकल आए, उन सात विपत्तियों को लिए हुए, शुद्ध और श्वेत छालटी से आवृत, और उनकी छातियाँ स्वर्ण कमरपेटियों से कसी हुईं।
७ और उन चारों जानवरों में से एक ने, उन सात दूतों को सदा से लेकर सदा तक जीवन्त ईश्वर के आक्रोश से भरे हुए सात स्वर्ण प्याले प्रदान कर दिए।
८ और वो मन्दिर ईश्वर की महिमा के, और उनकी शक्ति के धुएँ से भर उठा था; और कोई भी व्यक्ति उस मन्दिर में प्रवेश करने में सक्षम न था, जब तक उन सात दूतों की वो सात विपत्तियाँ पूर्ण नहीं हो गई थीं।
सोलहवाँ अध्याय।
१ और मैंने मन्दिर में से बाहर उन सात दूतों से कहती हुई एक प्रचण्ड वाणी सुनी, अपने पथों पर चले जाओ, और ईश्वर के आक्रोश से भरे उन प्यालों को पृथ्वी पर उँडेल दो।
२ और वो पहला गया, और अपना प्याला धरती पर उँडेल दिया; और उन लोगों पर जिन पर उस जानवर का चिंन्ह छपा हुआ था, और उन पर जो उसकी प्रतिमा पूज रहे थे, एक दुखद और कष्टदाई व्रण आ पड़ा।
३ और उस दूसरे दूत ने अपना प्याला समुद्र पर उँडेल दिया; और वो एक मृत व्यक्ति के रक्त समान बन गया: और समुद्र में प्रत्येक जीवित आत्मा मर गई।
४ और उस तीसरे दूत ने अपना प्याला नदियों और पानियों पर उँडेल दिया; और वो रक्त बन गए।
५ और मैंने पानियों के दूत को कहते हुए सुना, आप नेक हैं, हे प्रभु, जो हैं, और जो थे, और जो होंगे, चूँकि आपने इस प्रकार न्याय कर दिया है।
६ क्योंकि उन्होंने सन्तों और पैग़म्बरों का रक्त बहाया है, और आपने इन्हें पीने के लिए रक्त प्रदान कर दिया है; क्योंकि वो सुयोग्य हैं।
७ और मैंने एक अन्य को बलिवेदी में से बाहर कहते हुए सुना, प्रभु ईश्वर सर्वबलशाली, आपके न्याय-निर्धारण इसी प्रकार ही सत्यमय और नेक हैं।
८ और चौथे दूत ने अपना प्याला सूर्य पर उँडेल दिया; और उसे लोगों को अग्नी से झुलसाने की शक्ति प्रदान कर दी गई थी।
९ और लोग कड़ी गर्मी से झुलसा दिए गए थे, और उन्होंने ईश्वर के नाम की निन्दा की, जिनके पास इन विपत्तियों पर प्रभुत्व है: और इन्होंने उन्हें महिमा प्रदान करने हेतु मन-परिवर्तन नहीं किया।
१० और उस पाँचवे दूत ने अपना प्याला उस जानवर की कुर्सी पर उँडेल दिया; और उसका राज्य अन्धकार से भर उठा; और उन्होंने अपनी जीभें पीड़ा के मारे चबाईं,
११ और अपनी पीड़ाओं और व्रणों के कारण, स्वर्ग के ईश्वर की निन्दा की, और अपने कर्मों के प्रति मन-परिवर्तन नहीं किया।
१२ और छटे दूत ने अपना प्याला उस महा नदी फरात पर उँडेल डाला; और उसका पानी सूख गया, ताकि पूर्व के राजाओं का पथ उद्यत कर दिया जा सके।
१३ और मैंने तीन मेंढकों समान अस्वच्छ प्राणों को अजगर के मूँह में से, और जानवर के मूँह में से, और उस झूठे पैग़म्बर के मूँह में से बाहर निकलते देखा।
१४ क्योंकि यही दानवों के प्राण हैं, चमत्कार क्रियान्वित करते हुए, जो पृथ्वी के और सम्पूर्ण विश्व के राजाओं के पास जाते हैं, उन्हें ईश्वर सर्वबलशाली के उस संग्राम के महा दिवस हेतु एकत्रित करने के लिए।
१५ देखो तो, मैं एक चोर समान आ रहा हूँ। धन्य है वो जो सचेत रहता है, और अपने वस्त्र रखे रखता है, कहिं वो नंगा चलता चले, और वो उसकी निर्लज्जता देख लें।
१६ और उसने उनका एक ही संग एक स्थान में एकत्रण कर लिया, जो इब्रानी जीभ में हरमगिदोन कहलाया जाता है।
१७ और सातवें दूत ने अपना प्याला वायु में उँडेल दिया; और स्वर्ग के मन्दिर में से बाहर, सिंहासन से एक प्रचण्ड वाणी कहती हुई आई, वो कर दिया गया है जी।
१८ और वाणियाँ, और गर्जनें, और बिजलियाँ थीं; और एक ऐसा विशाल भूकम्प घटा, कि जब से लोग धरती पर थे, इतना शक्तिशाली और विशाल भूकम्प कभी नहीं घटा था।
१९ और वो महा नगरी तीन भागों में विभाजित हो गई थी, और राष्ट्रों के नगर गिर गए: और महा बेबिलोन ईश्वर के समक्ष स्मरण में आई, उसे उनके आक्रोश की क्रुद्धता के अंगूर-रस का प्याला दे देने हेतु।
२० और प्रत्येक द्वीप भागता चला गया, और पर्वत नहीं पाए गए।
२१ और लोगों पर स्वर्ग में से बाहर एक-एक तलनतन-भार के बड़े-बड़े ओलों की बौछार गिरी: और लोगों ने ओलों की विपत्ती के कारण, ईश्वर की निन्दा की; चूँकि उनकी विपत्ती अत्याधिकता से अत्यंत थी।
सत्रहवाँ अध्याय।
१ और उन सात प्यालों को लिए उन सात दूतों में से एक ने आकर मेरे साथ वार्ता की, मुझ से कहते हुए, इधर आ जाओ; मैं तुम्हें कई जलस्त्रोतों पर बैठी हुई उस बड़ी वैश्या का न्याय-निर्धारण दिखलाता हूँ:
२ जिसके साथ पृथ्वी के राजाओं ने अविवाहित-यौन किया है, और पृथ्वी के निवासी उसी के अविवाहित-यौन के अंगूर-रस के साथ धुत कर दिए गए हैं।
३ तो वो मुझे प्राण में जँगली-क्षेत्र में उठा ले गया: और मैंने एक स्त्री को एक सुर्ख रंगी जानवर पर बैठे देखा, ईश्वर-निंदा के नामों से भरा हुआ, सात सर और दस सींघ लिए।
४ और वो स्त्री जामुनी और सुर्ख रंग में आवृत थी, और सोने और अनमोल रत्नों और मोतियों से लदी हुई थी, अपने हाथ में एक सोने का प्याला लिए, अति-घ्रणितताओं और उसके अविवाहित्त-यौन की मलिनता से भरा:
५ और उसके माथे पर एक नाम लिखा था, रहस्यमय, महा-बेबिलोन, वेश्याओं की और पृथ्वी की अति-घ्रणितताओं की माता।
६ और मैंने उस स्त्री को सन्तों के रक्त से, और यीशु के साक्षियों के रक्त से धुत पाया: और जब मैंने उसे देखा, तो मैंने बड़े ही आश्चर्य से अचरज किया।
७ और उस दूत ने मुझ से कहा, किस कारण तुम ने अचम्भा किया? मैं तुम्हें उस स्त्री का, और उस सात सर और दस सींघ लिए जानवर का रहस्य बतलाऊँगा, जो उस स्त्री को उठाए हुए है।
८ वो जानवर जिसे तुमने देखा, वो था, और वो नहीं है; और वो उस तलहीन-गर्त में से बाहर आरोहण करेगा, और सर्वनाश में चला जाएगा: और वो जो पृथ्वी पर बसते हैं अचम्भा करेंगे, जिनके नाम उस जीवन की पुस्तक में नहीं लिखे थे, जो संसार की नीव से है, जब वो उस जानवर को देखेंगे जो था, और जो नहीं है, और जो तथापि है।
९ और यहीं है वो मन जिसके पास विद्या है। वो सात सर सात पर्वत हैं, जिन पर वो स्त्री बैठी हुई है।
१० और सात राजा हैं: पाँच गिर चुके हैं, और एक है, और वो अन्य अभी तक नहीं आया है; और जब वो आ जाता है, तो उसे थोड़े ही समय निश्चितता से बने रहना है।
११ और वो जानवर जो था, और जो नहीं है, वही आठवाँ है, और उन सातों में से है, और वो सर्वनाश में जा रहा है।
१२ और वो दस सींघ जो तुमने देखे थे, दस राजा हैं, जिन्होंने अभी तक कोई भी राज्य ग्रहण नहीं किया है; परन्तु वो राजाओं समान उस जानवर के साथ एक घण्टा शक्ति ग्रहण करते हैं।
१३ इनके मन एक ही हैं, और यह अपनी शक्ति और बल उस जानवर को प्रदान कर देंगे।
१४ यही उन मेमने के साथ युद्ध लड़ेंगे, और वह मेमने इन्हें परास्त कर डालेंगे: क्योंकि वही प्रभुओं के प्रभु हैं, और सम्राटों के सम्राट: और वो जो उनके साथ हैं बुलाए हुए हैं, और चुने हुए हैं, और विश्वसनीय हैं।
१५ और वो मुझ से कहता है, वो जल जो तुमने देखे जहाँ वो वैश्या बैठी है, लोगों के गण, और जनौघ, और राष्ट्र, और भाषाएँ हैं।
१६ और वो दस सींघ जो तुमने उस जानवर पर देखे थे, यही उस राँड से घृणा करेंगे, और उसे उजाड़ और नग्न बना देंगे, और उसका माँस खाएँगे, और उसे अग्नी से जला डालेंगे।
१७ क्योंकि ईश्वर ने इनके हृदयों में डाल दिया है कि वो उनकी इच्छा पूर्ण कर दें, और सहमत हो जाएँ, और अपने राज्य को उस जानवर को प्रदान कर दें, जब तक ईश्वर के शब्दों की पूर्ती नहीं हो जाती है।
१८ और वो स्त्री जो तुमने देखी थी, वही वो महा नगरी है, जो धरती के राजाओं पर राज चलाती है।
अठारहवाँ अध्याय।
१ और इन बातों के पश्चात मैंने एक अन्य दूत को महा शक्ति लिए, स्वर्ग से नीचे आते देखा; और पृथ्वी उसकी महिमा से प्रकाशित हो उठी थी।
२ और वो एक शक्तिशाली वाणी के साथ प्रबलता से चीखा, कहता हुआ, वो महा बेबिलोन गिर गई है, गिर गई है, और वो दानवों का बसेरा बन चुकी है, और प्रत्येक कलुषित प्राण का कारावास, और प्रत्येक अस्वच्छ और घृणास्पद पक्षी का पिंजरा।
३ चूँकि सभी राष्ट्र उसके अविवाहित-यौन के आक्रोश के अंगूर-रस से पी चुके हैं, और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ अविवाहित-यौन कर लिया है, और पृथ्वी के व्यापारी उसके सुख-विलास की आधिक्यता के माध्यम द्वारा अधिकता से धनवान बन चले हैं।
४ और मैंने एक अन्य स्वर्गवाणी को कहते हुए सुना, इस में से बाहर निकल आओ मेरे लोगों, ताकि तुम इसके पापों के भागीदार न बनो, और कि इसकी विपत्तियों में से कोई भी तुम पर न आ पड़े।
५ चूँकि इसके पाप स्वर्ग तक पहुँच चुके हैं, और ईश्वर ने इसकी अधर्मताओं का स्मरण कर लिया है।
६ जिस प्रकार इसने तुम्हें भुगतान किया है, उसी प्रकार इसे भुगतान कर दो, इसके कर्मोनुसार दुगुने पर दुगुना: उस प्याले में जिसे इसने भर दिया है, इसके लिए दुगुना भर दो।
७ इसने तो स्वयं की कितनी बढ़ाई की है, और सुख विलास्ता मनाई है, उतनी ही उत्पीड़ना और शोक इसे दे दो: क्योंकि ये तो अपने मन ही मन कहती है, भई मैं तो बैठी हुई एक रानी हूँ, कोई विधवा नहीं, और कोई भी शोक नहीं देखूँगी।
८ इसलिए इसकी विपत्तियाँ एक ही दिन में आ पड़ेंगी, मृत्यु, और शोकि-विलाप, और अकाल; और यह अग्नी से ही सरासर भस्म कर दी जाएगी: क्योंकि शक्तिशाली हैं वो प्रभु ईश्वर जो इसका न्याय करते हैं।
९ और वो पृथ्वी के राजा जिन्होंने इसके साथ अविवाहित-यौन किया है, और इसके साथ सुख विलास में जिए हैं, इसके लिए बिलखेंगे, और यह इसके लिए विलाप मनाएँगे, जब वो इसके भस्म हो जाने का धुआँ देखेंगे,
१० दूर खड़े इसकी उत्पीड़ना के भय के कारण कहते हुए, हाय, हाय, वो महा नगर बेबिलोन, वो बलशाली नगर! क्योंकि एक ही घण्टे में तेरा न्याय-निर्धारण आ चुका है।
११ और पृथ्वी के व्यापारी उस पर रोना-धोना और शोक-विलाप मनाएँगे; क्योंकि कोई भी व्यक्ति अब और उनका व्यापारिक-माल नहीं खरीद रहा है:
१२ व्यापारिक-माल सोने, और चाँदी, और अनमोल रत्नों का, और मोतियों का, और महीन छालटी का, और जामुनी रंग का, और रेशम का, और सुर्ख रंग का, और प्रत्येक थुईनौन की लकड़ी का, और हाथी-दाँत के प्रत्येक प्रकार के पात्रों का, और प्रत्येक प्रकार के अति अनमोल लकड़ी के पात्रों का, और पीतल का, और लोहे का, और संगमरमर का,
१३ और दाल-चीनी का, और सुगन्धों का, और मरहमों का, और लोहबान का, और अंगूर-रस का, और तेल का, और बारीक आटे का, और गेहूँ, और जानवर, और भेड़, और अश्व, और रथ, और दास, और लोगों की आत्माएँ।
१४ और वो फल जिनके लिए तेरी आत्मा वासना किया करती थी, तुझ से विदाई ले चुके हैं; और वो सभी वस्तुएँ जो ललित और चमकदार थीं, तुझ से विदाई ले चुकी हैं, और तू इन्हें अब और कतई भी नहीं पाएगी।
१५ इन वस्तुओं के व्यापारी, जो इसके द्वारा धनवान बना दिए गए थे, इसकी उत्पीड़ना के भय के कारण दूर खड़े हो जाएँगे, रोते-धोते, और विलाप मनाते हुए,
१६ और कहते हुए, हाय, हाय, वो महा नगरी, जो महीन छालटी, और जामुनी रंग में, और सुर्ख रंग में आवृत थी, और सोने, और अनमोल रत्नों, और मोतियों से लदी हुई थी!
१७ क्योंकि एक ही घण्टे में इतने विशाल धन-धान्य उजाड़ बना दिए गए हैं। और प्रत्येक जलयान-चालक, और जलयानों में समस्त जनौघ, और नाविक, और जितने भी समुद्र पर व्यापार करने वाले थे, दूर खड़े हुए,
१८ चीख पड़े जब उन्होंने उसके भस्म हो जाने का धुआँ देखा, कहते हुए, भई वो कौन सा नगर है जो इस महा नगरी के समान है!
१९ और उन्होंने अपने सरों पर धूल फैंकी, और वो चीखे, रोते-बिलखते और विलाप मनाते हुए, कहते हुए, हाय, हाय, वो महा नगरी, जिस में वो सभी जिनके पास समुद्र में जलयान हैं, धनवान बना दिए गए थे उसकी अनमोलता के कारण! क्योंकि एक ही घण्टे में ये तो उजाड़ बना दी गई है!
२० इस पर हर्ष मना लो, तुम स्वर्ग, और तुम पवित्र अपौस्लों, और पैग़म्बरों; क्योंकि ईश्वर ने इस पर तुम्हारा प्रतिषोध ले लिया है।
२१ और एक बलशाली दूत ने एक बहुत ही बड़ा चक्की के पत्थर समान एक पत्थर लिया, और उसे समुद्र में पटक डाला, कहता हुआ, इसी प्रकार हिंसा के साथ वो महा नगरी बेबिलोन नीचे गिरा दी जाएगी, और कभी भी नहीं पाई जाएगी।
२२ और वीणा-वादकों की, और संगीतकारों की, और मुरली-धरों की, और तुरही बजाने वालों की वाणी, अब कतई भी तुझ में कभी भी नहीं सुनी जाएगी; और कोई भी शिल्पकार, जिस किसी भी शिल्प का वो हो, तुझ में अब और कभी भी नहीं पाया जाएगा; और चक्की की ध्वनि कतई भी तुझ में अब और कभी भी नहीं सुनी जाएगी;
२३ और दीपक का प्रकाश तुझ में कतई भी नहीं प्रकाशवान होगा; और वर और वधु की वाणी अब और तुझ में कतई भी नहीं सुनी जाएगी: क्योंकि तेरे व्यापारी पृथ्वी के वो बड़े लोग थे; क्योंकि तेरे ही तन्त्र-विष-ज्ञानों के माध्यम से सभी राष्ट्र भ्रमित कर दिए गए थे।
२४ और पैग़म्बरों का, और सन्तों का, और उन सभी का रक्त उसी में पाया गया था, जिनकी पृथ्वी पर हत्या कर दी गई थी।
उन्नीसवाँ अध्याय।
१ और इन घटनाओं के पश्चात मैंने स्वर्ग में कई लोगों की एक प्रचण्ड वाणी सुनी, कहती हुई, आल्लेलूया; बचाव, और महिमा, और सम्मान, और शक्ती प्रभु हमारे ईश्वर के प्रति:
२ क्योंकि सत्यमय और नेक हैं उनके न्याय-निर्धारण: क्योंकि उन्होंने उस महा वैश्या का न्याय-निर्धारण कर डाला है, जिसने पृथ्वी को अपने अविवाहित-यौन से भ्रष्ट कर डाला था, और उसके हाथों पर से अपने सेवकों के रक्त का प्रतिषोध ले लिया है।
३ और उन्होंने पुनः कहा, आल्लेलूया। और उसका धुआँ सदा से लेकर सदा तक ऊपर उठता चला गया।
४ और वो चौबीस वृद्ध और चार जानवर नीचे गिर पड़े और उन्होंने सिंहासन पर विराजमान ईश्वर की आराधना की, कहते हुए, तथास्तु; आल्लेलूया।
५ और एक वाणी सिंहासन में से बाहर निकली, कहती हुई, हमारे ईश्वर की प्रशन्सा करो, उनके तुम सभी सेवक, और तुम जो उनसे डरते हो, दोनो छोटों और बड़ों।
६ और मैंने मानो कि एक विशाल जनौघ की वाणी, और कई जलस्त्रोतों की वाणी, और शक्तिशाली गर्जनों की वाणी सुनी, कहती हुई, आल्लेलूया: क्योंकि प्रभु ईश्वर सर्व-शक्तिमान राज करते हैं।
७ हम प्रसन्नता और हर्ष मनाएँ, और उन्हें सम्मान प्रदान करें: चूँकि उन मेमने का विवाह आ गया है, और उनकी पत्नी ने स्वयं को तैयार कर लिया है।
८ और उसे यह प्रदान कर दिया गया था कि वो महीन छालटी में आवृत हो, विमल और श्वेत: क्योंकि वो महीन छालटी सन्तों की नेकी है।
९ और वो मुझ से कहता है, लिखो, धन्य हैं वो जिन्हें उन मेमने के विवाह के रात्रि-भोज में बुलाया गया है। और वो मुझ से कहता है, यही ईश्वर के वो सच्चे कथन हैं।
१० और मैं उसके पैरों पर उसकी आराधना करने हेतु गिर पड़ा। और उसने मुझ से कहा, देखो भई, तुम यह मत करो: मैं तुम्हारा और तुम्हारे भाई-जनो का सह-सेवक हूँ, जिनके पास यीशु का साक्ष्य है: ईश्वर की आराधना करो: क्योंकि यीशु का साक्ष्य प्रेरित-उपदेश का प्राण है।
११ और मैंने स्वर्ग को खुलते हुए देखा, और देखो तो एक श्वेत अश्व; और वो जो उस पर सवार थे, विश्वसनीय और सत्यमय कहलाए गए थे, और नेकी में वो न्याय और युद्ध करते हैं।
१२ उनकी आँखें अग्नी की एक लपट समान थीं, और उनके शीर्ष पर कई मुकुट थे; और उनका एक लिखित नाम था, जो कोई भी व्यक्ति नहीं जानता था, बस केवल वो स्वयं ही।
१३ और वो एक रक्त में डुबोए हुए वस्त्र से आवृत थे: और उनका नाम ईश्वर के शब्द कहलाया जाता है।
१४ और वो जो सेनाएँ स्वर्ग में थीं उनके पीछे-पीछे श्वेत अश्वों पर आईं, महीन छालटी से आवृत, श्वेत और विमल।
१५ और एक तीव्र तलवार उनके मूँह में से बाहर निकल रही थी, कि उस से वो राष्ट्रों पर वार करें: और वही उन पर एक लोह-लट्ठ के साथ राज करेंगे: और वो सर्वबलशाली ईश्वर की खूँखारता और आक्रोश के अंगूर-रस के कोल्हू को रौंद डालते हैं।
१६ और उनके पास उनके वस्त्र पर और उनकी जाँघ पर एक नाम लिखित है, सम्राटों के सम्राट, और प्रभुओं के प्रभु।
१७ और मैंने एक दूत को सूर्य में खड़े देखा; और वो एक प्रबल वाणी से, स्वर्ग के बीच सभी उड़ने वाले पंछियों से कहता हुआ चीखा, भई आ जाओ और उन महा-ईश्वर के रात्रि-भोज के लिए स्वयं का एक साथ संग्रहण कर लो;
१८ ताकि तुम राजाओं का माँस, और कप्तानों का माँस, और बलशाली व्यक्तियों का माँस, और अश्वों का माँस, और उन पर बैठने वालों का माँस, और सभी लोगों का माँस, दोनो दास-मुक्तों का और बँधवा-दासों का, दोनो छोटों का और बड़ों का, खा लो।
१९ और मैंने उस जानवर को, और पृथ्वी के उन राजाओं को, और उनकी सेनाओं को, एक साथ एकत्रित देखा, उनके विरुद्ध युद्ध करने जो अश्व पर सवार थे, और उनकी सेना के विरुद्ध।
२० और उस जानवर को पकड़ में ले लिया गया था, और उसके साथ वो झूठा पैग़म्बर जो उसके समक्ष चमत्कार किया करता था, जिनके माध्यम से उसने उन्हें भ्रमित कर दिया था जिन्होंने उस जानवर का चिंन्ह छपवालिया था, और जो उसकी प्रतिमा की आराधना करते थे। इन्हीं दोनो को एक गन्धक से जलती हुई अग्नी की झील में जीवित ही फैंक दिया गया था।
२१ और वो शेष उनकी तलवार से मार दिए गए थे जो उस अश्व पर सवार थे, जो तलवार उनके मुँह में से बाहर प्रवृत्त थी: और सभी पक्षी उनके माँस से तृप्त हो गए थे।
बीसवाँ अध्याय।
१ और मैंने एक दूत को स्वर्ग में से नीचे आते हुए देखा, उस तलहीन-गर्त की चाबी लिए, और एक बड़ी ज़ंजीर उसके हाथ में।
२ और उसने उस अजगर को पकड़ लिया, उसी प्राचीन सर्प को ही, जो कि वो दानव है, और शैतान, और उसे एक हज़ार साल बाँध दिया,
३ और उसे उस तलहीन-गर्त में फैंक कर उसे बन्द कर दिया, और उस पर मुहर-बन्दी लगा दी, ताकि वो अब राष्ट्रों को और अधिक भ्रमित न करे, जब तक कि वो हज़ार साल पूरे नहीं हो जाते हैं: और उसके पश्चात उसे अवश्य ही थोड़े समय के लिए रिहा कर दिया जाएगा।
४ और मैंने सिंहासन देखे, और वो उन पर बैठे थे, और उन्हें न्याय-निर्धारण प्रदान कर दिया गया था: और मैंने उनकी आत्माओं को देखा जिनके सर बेधड़ कर दिए गए थे, यीशु के साक्ष्य के वास्ते, और ईश्वर के शब्द के वास्ते, और जिन्होंने न ही उस जानवर की आराधना की थी, न ही उसकी प्रतिमा की, न ही उन्होंने उसके चिंन्ह की छाप अपने माथों पर या अपने हाथों में छपवाई थी; और वो मसीहा के साथ एक हज़ार वर्ष जीए, और राज किया।
५ परन्तु मृतकों में से शेष पुनः नहीं जिए जब तक कि वो हज़ार वर्ष समाप्त नहीं हो चुके थे। यही प्रथम पुनरुत्थान है।
६ धन्य और पवित्र है वो जो प्रथम पुनरुत्थान में भागीदार है: ऐसे पर वो द्वितीय मृत्यु कोई शक्ती नहीं रखती, बल्कि वो ईश्वर और मसीहा के पुरोहित होंगे, और उनके साथ एक हज़ार वर्ष राज करेंगे।
७ और जब वो हज़ार वर्ष समाप्त हो चुकेंगे, तब शैतान को उसके कारावास में से रिहा कर दिया जाएगा,
८ और वो पृथ्वी के चारों कोनो में राष्ट्रों को, गोग एवं मागोग को, भ्रमित कर देने हेतु, बाहर निकल चला जाएगा, उन्हें एक साथ संग्राम के लिए एकत्रित कर देने हेतु: जिनकी संख्या समुद्र के रेत समान है।
९ और उन्होंने पृथ्वी की चौड़ाई पर चढ़ाई कर डाली और सन्तों की छावनी को, और उस अतिप्रीय नगर को चारों ओर से घेर लिया: और ईश्वर से स्वर्ग में से बाहर अग्नी नीचे गिरी, और उनका भुख-भक्षण कर डाला।
१० और उस दानव को जिसने उन्हें भ्रमित कर दिया था, उस गन्धक से जलती हुई अग्नी की झील में फैंक दिया गया, जहाँ वो जानवर और वो झूठा पैग़म्बर हैं, और वो दिन-रात सदा से लेकर सदा तक उत्पीड़ित कर दिए जाएँगे।
११ और मैंने एक विशाल श्वेत सिंहासन देखा, और उन्हें जो उस पर विराजमान थे, जिन के चहरे से पृथ्वी और स्वर्ग परे भाग चले; और उनके लिए कोई भी स्थान नहीं पाया गया।
१२ और मैंने मृतकों को ईश्वर के समक्ष खड़े देखा, दोनो छोटों को और बड़ों को; और वो पुस्तकें खोल दी गई थीं: और एक अन्य पुस्तक खोली गई थी, जो जीवन की पुस्तक है: और उन मृतकों का न्याय-निर्धारण उन पुस्तकों में लिखी हुई बातों से उन्हीं के कर्मोनुसार कर दिया गया।
१३ और समुद्र ने मृतकों को प्रदान कर दिया जो उस में थे; और मृत्यु और नरक ने उन मृतकों को प्रदान कर दिया जो उन में थे: और उनका न्याय-निर्धारण, प्रत्येक व्यक्ति का, उसी के कर्मोनुसार कर दिया गया था।
१४ और मृत्यु और नरक, अग्नी की उस झील में फैंक दिए गए थे। यही वो द्वितीय मृत्यु है।
१५ और जो कोई भी जीवन की पुस्तक में लिखित नहीं पाया गया था, वही अग्नी की उस झील में फैंक दिया गया था।
इक्कीसवाँ अध्याय।
१ और मैंने एक नवीन स्वर्ग और एक नवीन पृथ्वी को देखा: क्योंकि वो पहला स्वर्ग और वो पहली पृथ्वी गुज़र चले थे; और समुद्र अब और नहीं रहा था।
२ और मैंने योहन ने, उस पवित्र नगरी नवीन यरूशलेम को ईश्वर से स्वर्ग में से बाहर नीचे उतरते हुए देखा, एक विभूषित वधु समान अपने वर के लिए उद्यत।
३ और मैंने एक प्रचण्ड स्वर्गवाणी सुनी कहती हुई, देखो तो, ईश्वर का तम्बू लोगों के साथ है, और वो उनके साथ बसेंगे, और वो उनके गण होंगे, और ईश्वर स्वयं ही उन्हीं के साथ रहेंगे, और उनके ईश्वर बनेंगे।
४ और ईश्वर उनके समस्त आँसुओं को उनकी आँखों से पोंछ डालेंगे, और अब और कोई भी मृत्यु नहीं होगी, न ही शोक, न ही रोना-धोना, न ही कोई भी और पीड़ा होगी: क्योंकि वो पिछली बातें बीत चुकी हैं।
५ और वो जो सिंहासन पर विराजमान थे, उन्होंने कहा, देखो, मैं समस्त वस्तुएँ नवीन बनाता हूँ। और उन्होंने मुझ से कहा, लिखो: क्योंकि यह शब्द सत्यमय और विश्वसनीय हैं।
६ और उन्होंने मुझ से कहा, कर दिया गया है वो। मैं एल्फा और ओमेगा हूँ, वो प्रारम्भ और वो अन्त। मैं उसे जो प्यासा है निशुल्कता से जीवन के जलस्त्रोत में से प्रदान करूँगा।
७ वो जो परास्त करता है, समस्त वस्तुओं को विरासत में ले लेगा; और मैं उसका ईश्वर हूँगा, और वही मेरा पुत्र होगा।
८ परन्तु वो कायर, और अविश्वासी, और वो घृणा-योग्य, और हत्यारे, और वैश्याबाज़, और तन्त्र-विष-ज्ञान कर्ता, और मूर्तिपूजक, और समस्त झूठ बोलने वालों का भाग, उस अग्नी की झील में होगा, जो गन्धक से जलती है: जो वही द्वितीय मृत्यु है।
९ और मेरे पास उन सात दूतों में से एक आया जिनके पास उन सात अंतिम विपत्तियों से भरे वो सात प्याले थे, और वो मुझ से बोला, कहता हुआ, इधर आ जाओ, मैं तुम्हें वो वधु दिखलाता हूँ, उन मेमने की दुल्हन।
१० और वो मुझे एक विशाल और ऊँचे पर्वत पर, प्राण में उठा ले गया, और उसने मुझे वो महा-नगरी दिखला दी, वही पवित्र यरुशलेम, ईश्वर से स्वर्ग में से बाहर अवरोहण करती हुई,
११ ईश्वर की महिमा लिए: और उसकी ज्योति ऐसी थी मानो कि किसी अति बहुमूल्यवान पत्थर जैसी, यहाँ तक कि एक सूर्यकान्त रत्न जैसी, सटीक समान उज्ज्वल;
१२ और उसकी एक विशाल और ऊँची दीवार थी, जिसके बारह द्वार थे, और उन द्वारों पर बारह दूत, और उन पर नाम लिखे हुए, जो इस्राएल की सन्तानों की बारह प्रजातियों के नाम हैं:
१३ पूर्व की ओर तीन द्वार; उत्तर की ओर तीन द्वार; दक्षिण की ओर तीन द्वार; और पश्चिम की ओर तीन द्वार।
१४ और उस नगरी की दीवार की बारह नीवें थीं, और उन में उन मेमने के बारह अपौस्लों के नाम थे।
१५ और उसके पास जो मुझ से बात कर रहा था, एक स्वर्ण सरकंडा था उसी नगरी को, और उसके द्वारों को, और उसकी दीवार को मापने हेतु।
१६ और वो नगरी चौकोर थी, और उसकी लम्बाई उसकी चौड़ाई जितनी ही लम्बी थी: और उसने उस सरकंडे से वो नगरी बारह हज़ार फरलौंग नापी। उसकी लम्बाई और चौड़ाई और ऊँचाई एक तुल्य हैं।
१७ और उसने उसकी दीवार एक सौ चवालीस हाथ मापी, एक मानुष के मापानुसार ही, अर्थात् उसी दूत के मापानुसार।
१८ और उसकी दीवार का निर्माण सूर्यकान्त का था; और वो नगरी विशुद्ध स्वर्ण थी, मानो शुद्ध काँच के समान ही।
१९ और उस नगरी की दीवार की नीवें समस्त प्रकारों के अन्मोल पत्थरों से सुसज्जित थीं। पहली नीव, सूर्यकान्त की थी; दूसरी, नीलम की; तीसरी, एक गोदन्ती की; चौथी, एक पन्ने की;
२० पाँचवी, गोमेद की; छटी, चुन्नी की; सातवीं, स्वर्णमणि की; आठवीं, फ़िरोज़ा की; नौवीं, पुखराज की; दसवीं, लहसुनिए की; ग्यारहवीं, धूम्रकांत की; बारहवीं, बिल्लौर की।
२१ और वो बारह द्वार बारह मोती थे; प्रत्येक पृथक द्वार एक मोती था; और उस नगरी का पथ विशुद्ध स्वर्ण था, मानो कि वो पारदर्शी काँच हो।
२२ और मैंने उस में कोई भी मन्दिर नहीं देखा: क्योंकि प्रभु ईश्वर सर्वबलशाली और वो मेमने ही उसी का मन्दिर हैं।
२३ और उस नगरी को उस में, न ही सूर्य के और न ही चन्द्रमा के चमकने की आवश्यकता थी: क्योंकि ईश्वर का गौरव ही उसे उज्ज्वलित करता था, और वह मेमने उसी का प्रकाश हैं।
२४ और उन में से जो वो राष्ट्र बचे हुए हैं, उसी के प्रकाश में चलेंगे: और पृथ्वी के राजा अपना गौरव और सम्मान उसी के अन्दर लाते हैं।
२५ और उसके द्वार दिन में कतई भी बन्द नहीं किए जाएँगे: चूँकि वहाँ कोई भी रात्रि नहीं होगी।
२६ और वो उसी में राष्ट्रों का गौरव और सम्मान लाएँगे।
२७ और उस में किसी भी प्रकार से ऐसा कुछ भी प्रवेश नहीं करेगा जो दूषित करता हो, न ही जो कुछ भी घृणात्मकता क्रियान्वित करता हो, या झूठ बोलता हो: बल्कि वही जो उन मेमने की जीवन की पुस्तक में लिखित हैं।
बाईसवाँ अध्याय।
१ और उसने मुझे एक जीवन-जल की विशुद्ध धारा दिखलाई, सफ़टीक समान चम-चमाती हुई, ईश्वर के सिंहासन और उन मेमने के सिंहासन में से बाहर प्रवृत्त होती हुई।
२ उसी के मार्ग के मध्य में, और उस धारा के दोनो ओर, जीवन का वो वृक्ष, जो बारह प्रकार के फल देती है, और अपना फल प्रत्येक माह देती है: और उस वृक्ष के पत्ते राष्ट्रों की चिकित्सा के लिए थे।
३ और वहाँ और कोई भी अभिशाप नहीं होगा: बल्कि ईश्वर का और उन मेमने का सिंहासन उस में होगा: और उनके सेवक उनकी सेवा करेंगे:
४ और वह उनका चेहरा देखेंगे; और उनका नाम उनके माथों में होगा।
५ और वहाँ कोई रात्रि नहीं होगी; और उन्हें किसी भी दीपक की आवश्यकता नहीं है, न ही सूर्य के उजाले की; चूँकि प्रभु ईश्वर उन्हें उजाला प्रदान करते हैं: और वह सदा से लेकर सदा तक राज करेंगे।
६ और उसने मुझ से कहा, यह कथन विश्वसनीय और सत्यमय हैं: और पवित्र पैग़म्बरों के प्रभु ईश्वर ने अपने दूत को अपने सेवकों को उन बातों को दिखला देने के लिए भेजा है, जो निश्च्य से ही शीघ्र कर दी जाएँगी।
७ देखो तो, मैं शीघ्रता से आगमन कर रहा हूँ: धन्य है वो जो इस पुस्तक के प्रेरित-संदेश के कथनों को रखता है।
८ और मैंने योहन ने इन बातों को देखा, और उन्हें सुना। और जब मैंने सुन और देख लिया था, तो मैं उस दूत के पैरों समक्ष आराधना करने नीचे गिर पड़ा, जिसने मुझे यह बातें दिखला दी थीं।
९ तब वो मुझ से कहता है, देखो भई, तुम यह मत करो: क्योंकि मैं तुम्हारा, और तुम्हारे भाई-जनो उन पैग़म्बरों का, और इस पुस्तक के कथनों को रखने वालों का, सह-सेवक हूँ: ईश्वर की आराधना करो भई!
१० और वह मुझ से कहते हैं, इस पुस्तक के प्रेरित-संदेश के कथनों पर मुहरबंदी मत लगाओ: क्योंकि समय निकट ही है।
११ वो जो अन्यायी है, उसे अन्यायी ही बना रहने दो: और वो जो मलिन है, उसे मलिन ही बना रहने दो: और वो जो नेक है, उसे नेक ही बना रहने दो: और वो जो पवित्र है, उसे पवित्र ही बना रहने दो।
१२ और देखो मैं शीघ्रता से आगमन कर रहा हूँ; और मेरा फल मेरे साथ ही है, प्रत्येक व्यक्ति को उसी के कर्मों की करनीनुसार प्रदान कर देने हेतु।
१३ मैं एल्फा और ओमेगा हूँ, वो प्रारम्भ और वो अन्त, वो प्रथम और वो अन्तिम।
१४ धन्य हैं वो जो उनके आदेशों के कर्ता हैं, ताकी उनके पास जीवन-वृक्ष के प्रति अधिकार हो, और कि वो उन द्वारों में से उस नगरी में प्रवेश कर लें।
१५ क्योंकि बाहर तो कुत्ते हैं, और तन्त्र-विष-ज्ञान कर्ता, और वैश्याबाज़, और हत्यारे, और मूर्तिपूजक, और जो कोई भी झूठ से प्रेम और उसका कर्ता है।
१६ मैंने यीशु ने, अपने दूत को तुम्हारे पास कलिसियों में इन बातों का साक्ष्य दे देने हेतु भेजा है। मैं ही दाऊद की जड़ और उसका वंशधर हूँ, वो उज्ज्वल और प्रभात-सितारा।
१७ और वो प्राण और वो वधु कहते हैं, आ जाएँ। और वो जो सुन रहा है कहे, आ जाएँ। और वो जो प्यासा है आ जाए। और जो कोई भी इच्छित है, उसी को जीवन का जल निशुल्क ले लेने दो।
१८ क्योंकि मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को यह साक्ष्य दे रहा हूँ जो इस पुस्तक के प्रेरित-संदेश के शब्द सुन रहा है, यदि कोई भी व्यक्ति इन बातों में जोड़ेगा, तो ईश्वर उसके प्रति वही विपत्तियाँ जोड़ देंगे जो इस पुस्तक में लिखी हुई हैं:
१९ और यदि कोई भी व्यक्ति इस पुस्तक के प्रेरित-संदेश के शब्दों में से हटाएगा, तो ईश्वर उसका भाग जीवन की पुस्तक में से, और उस पवित्र नगरी में से, और इस पुस्तक में लिखित बातों में से बाहर हटा देंगे।
२० वो जो इन बातों का साक्ष्य दे रहे हैं, कह रहे हैं, निश्चितता से ही मैं शीघ्र आगमन कर रहा हूँ। तथास्तु। तब भी, आ ही जाएँ प्रभु यीशु जी!
२१ हमारे प्रभु यीशु मसीह की कृपा तुम सभी के साथ रहे। तथास्तु।
०५/२०/२०२४:
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