भजनों की पुस्तक, भाग ३। (The Book of Psalms, Part 3.)
अट्ठाईस्वाँ भजन।
दाऊद का एक भजन।
१ जी आप ही की ओर मैं चीख-पुकार मचाऊँगा, मेरी चट्टान ओ प्रभु; मेरे प्रति चुप न रहें: कहिं यदि आप मेरे प्रति चुप रह जाएँ, तो मैं उनके जैसा बन जाऊँ जो नीचे गर्त में चले जाते हैं।
२ जब मैं आपकी ओर चीखता हूँ तो मेरे अनुनयों की वाणी सुन लें जी, जब मैं अपने हाथों को आपकी पवित्र ईश्वरीय-वाणी की ओर ऊपर उठाता हूँ।
३ मुझे उन दुष्टों के साथ, और उन अधर्म-कर्ताओं के साथ परे न खींचें, जो अपने पड़ौसियों से शान्ति की बात तो करते हैं, परन्तु जिनके मनों में बुराई होती है।
४ उन्हें उन्हीं के कर्मोंनुसार ही, और उनके प्रयासों की दुष्टतानुसार ही प्रदान कर दें: उनके हाथों के कर्मानुसार ही उन्हें दे दें जी; उन्हें लौटा दें वापस उन्हीं के भुक्तान को।
५ चूँकि वो न ही प्रभु के कर्मों पर, न ही उनके हाथों के कार्य पर ध्यान देते हैं, वो उन्हें नष्ट कर डालेंगे, और उनका निर्माण नहीं करेंगे।
६ धन्य हों प्रभु, चूँकि उन्होंने मेरे अनुनयों की वाणी को सुन लिया है।
७ प्रभु ही मेरी शक्ती और मेरी ढाल हैं; मेरे हृदय ने उन में विश्वास किया था, और मेरी सहायता कर दी गई है: इसलिए मेरा हृदय बहुत ही हर्ष मनाता है; और अपने गीत के साथ मैं उनकी प्रशन्सा करूँगा।
८ प्रभु ही उनकी शक्ती हैं, और वही अपने अभिषिक्त की बचाने वाली शक्ती हैं।
९ अपने लोगों को बचा लें जी, और अपनी विरासत को आशीष दे दें: उनका पोषण भी कर दें, और उन्हें सदा के लिए उठा दें।
उन्नत्तीसवाँ भजन।
दाऊद का एक भजन।
१ प्रदान कर दो प्रभु को, ओ तुम बशालियों, प्रदान कर दो प्रभु को महिमा और शक्ती।
२ प्रभु को उनके नाम के सुयोग्य महिमा प्रदान कर दो; प्रभु की पूजा पवित्रता के सौंदर्य में करो।
३ प्रभु की वाणी पानियों के ऊपर है: महिमा के ईश्वर गर्जन मचा रहे हैं: प्रभु कई पानियों के ऊपर हैं।
४ प्रभु की वाणी शक्तिशाली है; प्रभु की वाणी राज-प्रताप से भरपूर है।
५ प्रभु की वाणी देवदारों को तोड़ रही है; हाँ भई, प्रभु लेबनोन के देवदारों को तोड़ रहे हैं।
६ वो तो उन्हें बछड़ों के समान कुद-छलाँग भी करवाते हैं; लेबनोन और सिरयन को एक युवा इक-सींघे के समान।
७ प्रभु की वाणी अग्नी की लपटों को विभाजित कर डाल रही है!
८ प्रभु की वाणी जँगली-क्षेत्र को झकझोर रही है; प्रभु कदेश के जँगली-क्षेत्र को झकझोर रहे हैं।
९ प्रभु की वाणी उन हिरणियों से जन्म दिलवा रही है, और उन वनों को अनावृत कर रही है: और उन्हीं के मंदिर में हर एक उनके गौरव की बात-चीत करता है।
१० प्रलय पर प्रभु ही विराजमान हैं; हाँ भई, प्रभु सदा के लिए ही राजा विराजमान हैं।
११ प्रभु अपने लोगों को शक्ती प्रदान कर देंगे; प्रभु अपने लोगों को शान्ति का आशीष प्रदान कर देंगे।
तीसवाँ भजन।
दाऊद के घर के समर्पण के समय पर एक भजन और गान।
१ जी मैं आपकी सराहना करूँगा हे प्रभु; चूँकि आप ही ने मुझे ऊपर उठाया है, और मेरे बैरियों को मुझ पर हर्ष नहीं मनाने दिया।
२ हे प्रभु मेरे ईश्वर, मैंने आपसे चीख-पुकार मचाई, और आपने मुझे स्वस्थ कर दिया है।
३ हे प्रभु, आप कब्र में से मेरी आत्मा को ऊपर ले आए हैं: आपने मुझे जीवित रखा है जी, ताकि मैं नीचे उस गर्त में न चला जाऊँ।
४ प्रभु के प्रति गा लो, ओ तुम सभी उनके सन्तों, और उनकी पवित्रता के स्मरण पर कृतज्ञता प्रदान कर दो।
५ चूँकि उनका क्रोध बस एक क्षण के लिए ही तो रहता है; उनके अनुग्रह में जीवन है: रोना-धोना एक रात के लिए चलता रहे, परन्तु खुशी सुबह आ जाती है।
६ और अपने सुख-चैन में मैंने कहा, मैं तो कभी भी नहीं फिसलूँगा।
७ प्रभु जी, आप के अनुग्रह के माध्यम से आपने मेरे पर्वत को शक्तिशाली खड़ा कर दिया है: आपने अपना चेहरा तो छुपा ही दिया था, और मैं विचलित हो उठा था!
८ ओ प्रभु जी, मैंने आपकी ओर पुकारा; और प्रभु के प्रति ही मैंने अनुनय किया।
९ मेरे रक्त में क्या लाभ है, जब मैं गर्त में नीचे जाऊँगा? क्या वो धूल आपकी प्रशन्सा करेगी? क्या वो आपके सत्य की घोषणा करेगी?
१० सुन लें हे प्रभु जी, और मुझ पर दया करें: प्रभु आप मेरे सहायक बन जाएँ जी।
११ आपने मेरे लिए मेरे शोक को नृत्य में परिवर्तित कर दिया है: आपने मेरे टाट-वस्त्र को उतार दिया है, और मुझे प्रसन्नता से कस दिया है;
१२ इस उद्देश्य से कि मेरा गौरव आपकी प्रशन्सा गाए, और चुप न रहे। ओ प्रभु जी मेरे ईश्वर, मैं आपको सदा के लिए धन्यवाद दूँगा।
इकत्तीसवाँ भजन।
प्रमुख संगीतकार को, दाऊद का एक भजन।
१ ओ प्रभु जी, आप ही में मैं अपना भरोसा रखता हूँ जी; मुझे कभी भी लज्जित न हो जाने दें: अपनी नेकी में मेरा उद्धार कर दें।
२ जी मेरे प्रति अपने कान को झुका लें; बचा लें मुझे शीघ्रता से ही: मेरी शक्तिशाली चट्टान बन जाएँ आप, मुझे बचाने हेतु एक सुरक्षा के घर हेतु ही।
३ चूँकि आप ही मेरी चट्टान और मेरा गढ़ हैं; इसलिए अपने ही नाम के वास्ते मेरा नेतृत्व कर दें और मेरा निर्देशन कर दें।
४ मुझे उस जाल में से बाहर खींच लें जो उन्होंने छुपके से मेरे लिए बिछाया है: चूँकि आप ही मेरी शक्ती हैं।
५ आप ही के हाथ में मैं अपना प्राण सौंपता हूँ जी: आपने मेरा मुक्ति-भुक्तान कर दिया है ओ प्रभु जी सच्चाई के ईश्वर।
६ मैंने उनसे घृणा की है जो झूठी व्यर्थताओं को महत्व देते हैं: परन्तु मैं प्रभु में विश्वास करता हूँ।
७ मैं प्रसन्न हूँगा और आपकी दया में हर्ष मनाऊँगा: चूँकि आपने मेरे कष्ट को ध्यान में रखा है; आपने कष्टों में मेरी आत्मा से परिचय रखा है;
८ और मुझे शत्रु के हाथ में बँद नहीं किया है: आपने मेरे पैरों को एक बड़े कमरे में खड़ा कर दिया है।
९ ओ प्रभु जी, मुझ पर दया करें जी, चूँकि मैं सताया हुआ हूँ जी: मेरी आँख शोक से खा ली जा चुकी है, जी हाँ, मेरी आत्मा और मेरा उदर।
१० चूँकि मेरा जीवन शोक के साथ बीत रहा है, और मेरे वर्ष आहें भरने से: मेरे अधर्म के कारण मेरी शक्ती क्षीण होती जा रही है, और मेरी हड्डियाँ समाप्त हो चुकी हैं।
११ मैं तो अपने समस्त शत्रुओं के बीच एक धिक्कार था, परन्तु विशेषता से अपने पड़ौसियों के बीच, और अपने परिचित के प्रति एक भय: जिन्होंने मुझे बाहर देखा मुझे से भाग खड़े हुए।
१२ मैं तो एक मन से भूले हुए एक मृत पुरुष के समान भुला दिया गया हूँ: मैं तो एक टूटे हुए बर्तन के समान हूँ।
१३ चूँकि मैंने कईयों की झूठी निंदा सुन ली है: प्रत्येक दिशा पर भय था: जैसे वो मेरे विरुद्ध एक साथ परामर्श कर रहे थे, वो मेरे जीवन को ले लेने की योजना बना रहे थे।
१४ परन्तु मैंने आप में भरोसा किया ओ प्रभु जी: मैंने कहा, आप मेरे ईश्वर हैं।
१५ मेरे समय आप ही के हाथ में हैं: बचा लें जी मुझे मेरे शत्रुओं के हाथ में से, और उन से जो मुझ पर अत्याचार ढा रहे हैं।
१६ अपने सेवक पर अपने चहरे को उज्ज्वलित करवा दें जी: अपनी दयालुताओं के वास्ते मुझे बचा लें जी।
१७ मुझे लज्जित न हो जाने दें ओ प्रभु; चूँकि मैंने आपको पुकार लिया है: उन दुष्टों को लज्जित हो जाने दें, और उन्हें ही कब्र में चुप कर जाने दें जी।
१८ उन झूठे होटों को चुप करवा दें; जो उस नेक के विरुद्ध अहंकार और घिक्कार से शोचनीय बातें बोलते हैं।
१९ क्या भई! आपकी अच्छाई कितनी विशाल है, जिसे आपने उनके लिए बिछा दी है जो आपका भय मानते हैं; जिसे आपने उनके लिए क्रियान्वित कर दी है जो मनुष्यों के बेटों के समक्ष आप में भरोसा करते हैं!
२० आप उन्हें पुरुष के अभिमान से अपनी उपस्थिति की गोपनीयता में छुपा देंगे: आप उन्हें जीभों के लड़ाई-झगड़े से गोपनीयता से एक मण्डप में रख देंगे।
२१ धन्य हों प्रभु: चूँकि उन्होंने मुझे अपनी आचम्भित कर देने वाली करुणा एक शक्तिशाली नगर में दिखला दी है।
२२ क्योंकि मैंने अपनी जल्द-बाज़ी में कह डाला, मैं तो आपकी आँखों के सामने से काट दिया गया हूँ: तथापि जब मैं आपकी ओर चीखा आपने मेरे अनुनयों की वाणी सुन ली।
२३ अरे भई प्रभु से प्रेम कर लो, तुम सभी उनके संतों: चूँकि प्रभु उन विश्वास करने वालों को परिरक्षित रखते हैं, और अधिकता से उस घमण्डी-कर्ता को भुक्तान करते हैं।
२४ अच्छे सुदृढ़ बनो, और वो तुम्हारे हृदय को सशक्त कर देंगे, तुम सभी जो प्रभु में आशा रखते हो।
बत्तीसवाँ भजन।
दाऊद का एक भजन, मशिल।
१ धन्य है वो जिसका अतिक्रम क्षमा कर दिया गया है, जिसका पाप ढक दिया गया है।
२ धन्य है वो मानुष जिस पर प्रभु अधर्मता नहीं ठहराते हैं, और जिसके प्राण में कोई भी छल-कपट नहीं होता।
३ जब मैं चुप रहा, तो मेरी हड्डियाँ जीर्ण होती चली गईं सारे दिन भर मेरे दहाड़ने से।
४ चूँकि दिन-रात आपका हाथ मुझ पर भारी था: मेरी नमी ग्रीष्म ऋतु के सूखे में परिवर्तित हो चुकी है जी। सेला।
५ मैंने आपसे अपने पाप को अभिस्वीकार कर लिया, और मैंने अपनी अधर्मता को छुपाया नहीं। मैंने कहा, मैं प्रभु से अपने अतिक्रमों को स्वीकृति दे दूँगा; और अपने मेरे पाप की अधर्मता को क्षमा कर दिया। सेला।
६ इसी के लिए वो प्रत्येक जो ईश्वरीय है आपसे ऐसे समय में प्रार्थना करेगा जब आप पाए जा सकें: अवश्य ही विशाल पानियों के प्रलयों में वो आपके निकट नहीं आएँगे।
७ आप मेरे छिप जाने का स्थान हैं; आप ही मुझे कष्ट से परिरक्षित रखेंगे; आप ही मुझे उद्धार के गीतों से चारों ओर घेरे रहेंगे। सेला।
८ मैं ही तुम्हें निर्देश दूँगा और उस पथ में जिस पर तुम्हें जाना है मैं तुम्हें शिक्षा प्रदान करूँगा: मैं ही तुम्हारा अपनी आँख से मार्गदर्शन करूँगा।
९ उस घोड़े या उस खच्चर के जैसे मत बनो तुम, जिन्हें कोई समझ नहीं होती: जिसका मूँह रास और लगाम की ही पकड़ में रखा जाता है, कहिं वो तुम्हारे निकट न आ जाएँ।
१० उस दुष्ट पर कई दुःख पड़ेंगे: परन्तु वो जो प्रभु में विश्वास करता है, दयालुता उसे घेर लेगी।
११ प्रभु में प्रसन्न हो जाओ, और हर्ष मनाओ तुम नेकों: और खुशी के मारे चिल्लाओ, तुम सभी जो हृदय में निष्कलंक हो।
तैंतीसवाँ भजन।
१ प्रभु में हर्ष मनाओ, ओ तुम नेकों: चूँकि सत्य-निष्ठावानों के लिए ही प्रशन्सा सुयोग्य होती है।
२ प्रभू की प्रशन्सा वीणा से करो: उनके प्रति सारंगी के साथ और दस तारों वाले एक वाद्य-यंत्र के साथ गाओ।
३ उन्हें एक नवीन गीत गा दो; कौशल्य से एक प्रबल ध्वनि से वादन करो।
४ चूँकि प्रभु के शब्द सही है; और उनके समस्त कार्य सत्य में क्रियान्वित होते हैं।
५ वो नेकी और न्याय से प्रेम करते हैं: पृथ्वी तो प्रभु की अच्छाई से भरपूर है जी।
६ प्रभु के शब्द के द्वारा ही वो स्वर्ग निर्मित हुए थे; और उनकी समस्त सेना उनके मूँह के श्वास द्वारा ही।
७ वो एक ढेर के समान ही समुद्र के पानियों का एक साथ संघ्रहण कर लेते हैं: वो उस गहराई को भण्डार-गृहों में बिछा देते हैं।
८ समस्त पृथ्वी को प्रभु का भय मान लेने दो भई: संसार के समस्त निवासियों को उनसे आश्चर्यचकित खड़े रह जाने दो।
९ चूँकि वह बोले, और वो कर दिया गया था; उन्होंने आदेश दिया, और वो खड़ा रह गया।
१० प्रभु उन अन्य-राष्ट्रों के परामर्श को रद्द कर डालते हैं: वो लोगों की योजनाओं को निष्क्रय बना देते हैं।
११ प्रभु का परामर्श सदा के लिए खड़ा रहता है, उनके मन के विचार समस्त पीढ़ियों तक।
१२ धन्य है वो राष्ट्र जिसके ईश्वर प्रभु हैं; और वो गण जिन्हें उन्होंने अपनी ही विरासत के लिए चुन लिया है।
१३ प्रभु स्वर्ग से देखते हैं; वो मानुष के सभी बेटों को देखते हैं।
१४ अपने निवास-स्थान से वह पृथ्वी के समस्त निवासियों पर दृष्टि लगाते हैं।
१५ वही उनके हृदयों की एक समान रचना करते हैं; वह उनके समस्त कार्यों को विचार में रखते हैं।
१६ कोई भी राजा किसी सेना के जनौघ से नहीं बचता है: कोई बलशाली व्यक्ति बहुत शक्ती द्वारा नहीं बच पाता है।
१७ सुरक्षा हेतु कोई घोड़ा तो एक व्यर्थ वस्तु ही होता है: न ही वो किसी को भी अपनी महा शक्ती से बच निकाल पाएगा।
१८ देखो लो भई, प्रभु की आँख उन पर होती है जो उनका भय मानते हैं, उन पर ही जो उनकी दया में आशा रखते हैं;
१९ उनकी आत्मा को मृत्यु से बचा देने हेतु, और उन्हें अकाल में जीवित रखने हेतु।
२० हमारी आत्मा प्रभु के लिए प्रतीक्षा करती है: वही हमारी सहायता और हमारी ढाल हैं।
२१ चूँकि हमारा हृदय उन्हीं में हर्ष मनाएगा, क्योंकि हमने उनके पवित्र नाम में भरोसा किया है।
२२ हे प्रभु अपनी दया को हम पर ठहर जाने दें जी, आप में हमारी आशानुसार ही।
चौन्तीसवाँ भजन।
दाऊद का एक भजन जब उसने अबिमलेक के समक्ष अपना व्यवहार बदल दिया था; जिसने उसे परे खदेड़ दिया था, और उसने प्रस्थान कर लिया था।
१ मैं तो प्रत्येक समय में प्रभु को आशीष दूँगा: उनकी प्रशन्सा मेरे मूँह में निरंतर रहेगी।
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