मत्ती की पुस्तक: नया अनुबंध। (Matthew)



पहला अध्याय। 


१ दाऊद के और अब्राहम के बेटे यीशु मसीह की पीढ़ियों की पुस्तक। 

२ अब्राहम ने जनना इसहाक, और इसहाक ने जनना याकूब, और याकूब ने जनने यहुदा और उसके भाई। 

३ और यहुदा ने जनने पेरेस और ज़ेरह, तमार से, और पेरेस ने जनना एसरोन और एसरोन ने जनना राम। 

४ और राम ने जनना अम्मीनादाब, और अम्मीनादाब ने जनना नहशोन, और नहशोन ने जनना सलमोन। 

५ और सलमोन ने जनना बोआज़, रहाब से, और बोआज़ ने जनना ओबद, रूथ से, और ओबद ने जनना यिशय। 

६ और यिशय ने जनना राजा दाऊद, और राजा दाऊद ने सुलेमान को उस से जनना, जो ऊरिया की पत्नी रही थी। 

७ और सुलेमान ने जनना रोहबोआम, और रोहबोआम ने जनना अबिया, और अबिया ने जनना आसा। 

८ और आसा ने जनना यहोशाफट, और यहोशाफट ने जनना योरम, और योरम ने जनना उज़्ज़ीया। 

९ और उज़्ज़ीया ने जनना योथम, और योथम ने जनना अहाज़, और अहाज़ ने जनना हिज़किया। 

१० और हिज़किया ने जनना मनश्शे, और मनश्शे ने जनना अमोन, और अमोन ने जनना योशीयाह। 

११ और योशीयाह ने जनने यकोन्याह और उसके भाई, लगभग उस समय जब वो बेबिलोन में निष्कासित कर दिए गए थे। 

१२ और बेबिलोन में लाए जाने के पश्चात, यकोन्याह ने जनना शालतिएल, और शालतिएल ने जनना ज़रुब्बाबेल। 

१३ और ज़रुब्बाबेल ने जनना अबीहुद, और अबीहुद ने जनना एलयाकीम, और एलयाकीम ने जनना अज़ोर। 

१४ और अज़ोर ने जनना सदोक, और सदोक ने जनना अखीम, और अखीम ने जनना एलीहूद। 

१५ और एलीहूद ने जनना एलाज़र, और एलाज़र ने जनना मत्तान, और मत्तान ने जनना याकूब। 

१६ और याकूब ने जनना यूसुफ, पति मरियम का, जिस मरियम से यीशु पैदा हुए थे, जो मसीहा कहलाए जाते हैं। 

१७ तो सभी पीढ़ियाँ अब्राहम से लेकर दाऊद तक चौदह पीढ़ियाँ हैं: और दाऊद से लेकर बेबिलोन में निष्कासित कर दिए जाने तक चौदह पीढ़ियाँ हैं: और बेबिलोन में निष्कासित कर दिए जाने से लेकर मसीहा तक, चौदह पीढ़ियाँ हैं। 

१८ अब यीशु मसीह का जन्म इस प्रकार हुआ था: अब जैसे उनकी माँ मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हो चुकी थी (उनके एक साथ आने से पूर्व), तो वो पवित्र-प्राण से गर्भवती पाई गई थी। 

१९ तब उसका पति यूसुफ, एक न्यायपूर्ण व्यक्ति होता हुआ, और न चाहता हुआ कि उसका समाज में उदाहरण बनाया जाए, उसे गोपनीयता से त्यागने के लिए इच्छित था। 

२० परन्तु जैसे वो ये बातें सोच ही रहा था, देखो तो, प्रभु का एक दूत उसे एक स्वप्न में प्रकट हुआ कहता हुआ, यूसुफ तुम दाऊद के बेटे, अपनी पत्नी मरियम को स्वीकार करने से मत डरो; क्योंकि वो जो उस में गर्भ-धारित हैं, पवित्र-प्राण द्वारा हैं। 

२१ और वो एक पुत्र को जन्म देगी, और तुम उनका नाम यीशु पुकारोगे: क्योंकि वो अपने लोगों को उनके पापों से बचा लेंगे। 

२२ अब यह सब किया गया था, ताकि उसकी पूर्ति हो जाए, जो पैगम्बर द्वारा प्रभु के विषय में बोला गया था, कहते हुए,

२३ देखो, एक कुँवारी बच्चे के साथ होगी, और एक पुत्र को जन्म देगी, और वो उनका नाम इमैन्यूएल पुकारेंगे, जिसका व्याख्यानुसार अर्थ है: ईश्वर हमारे साथ।

२४ तब यूसुफ ने, नींद से उठ कर, जैसा प्रभु के दूत ने उसे अनुदेश दिया था, वैसा ही किया, और उसने अपनी पत्नी को अपने पास रख लिया:

२५ और उसने मरियम को तब तक नहीं जाना, जब तक कि उसने अपने प्रथम-जन्मे पुत्र को जन्म नहीं दे दिया था, और उसने उनका नाम यीशु पुकारा।   



दूसरा अध्याय।


१ अब जब यीशु का जन्म राजा हेरोदेस के दिनो में, यहूदा के बेतलेहम में हो चुका था, देखो, पूर्व से यरूशलेम में विद्वान व्यक्ति आए,

२ कहते हुए, भई कहाँ हैं वो यहूदियों के सम्राट जो पैदा हुए हैं? चूँकि हमने उनका सितारा पूर्व में देखा है, और हम उनकी आराधना करने आए हैं। 

३ जब राजा हेरोदेस ने यह बातें सुनी ली थीं, तो वो, और समस्त यरूशलेम उसके साथ विचलित हो उठा। 

४ और जब उसने लोगों के सभी प्रमुख पुरोहित और लिपिक एक साथ एकत्रित कर लिए थे, तो उसने उनसे पूछा कि मसीहा का जन्म कहाँ होना होगा। 

५ और उन्होंने उस से कहा, यहूदा के बेतलेहम में: क्योंकि इसी प्रकार ही यह पैगम्बर द्वारा लिखा गया है;

६ और तुम बेतलेहम, यहूदा की भूमि में, तुम न्यूनतम नहीं हो यहूदा के शासकों के बीच: क्योंकि तुम में से बाहर एक राज्यपाल निकलेंगे, जो इस्राएल मेरे लोगों पर शासन करेंगे। 

७ तब हेरोदेस ने, जब उसने गोपनीयता से उन विद्वानो को बुला लिया था, तो उनसे सूक्ष्मता से पूछताछ की, कि वो सितारा किस समय प्रकट हुआ था: 

८ और उसने उन्हें बेतलेहम भेज दिया, और कहा, जाओ और सटीकता से उस तरुण बालक का पता लगाओ, और जब तुम उसे पा लोगे, तो मुझे पुनः सूचना ले आना, ताकि मैं आकर उसकी आराधना कर सकूँ। 

९ तो जब उन्होंने राजा के शब्द सुन लिए थे, उन्होंने प्रस्थान कर लिया, और लो, वो सितारा जिसे उन्होंने पूर्व में देखा था, उनके आगे-आगे चलता गया, जब तक वो वहीं पहुँच कर खड़ा हो गया, जहाँ वो तरुण बालक थे। 

१० जब उन्होंने वो सितारा देखा, तो उन्होंने अत्याधिक हर्ष सहित आनंद मनाया। 

११ और जब उन्होंने घर में प्रवेश कर लिया था, तो उन्होंने उन तरुण बालक को मरियम उनकी माँ के साथ देखा, और वो नीचे गिर पड़े, और उन तरुण बालक की आराधना की: और जब उन्होंने अपने घन-कोष खोल लिए थे, तब उन्होंने उन तरुण बालक को उपहार प्रस्तुत किए, सोना, और लोहबान, और गन्धरस।  

१२ और एक स्वप्न में ईश्वर द्वारा चेतावनी पा लेने पर, कि वह हेरोदेस के पास वापस न जाएँ, उन्होंने अपने देश किसी दूसरे पथ से प्रस्थान कर लिया। 

१३ और जब उन्होंने प्रस्थान कर लिया था, तो देखो, प्रभु का एक दूत यूसुफ को एक स्वप्न में प्रकट हुआ, कहता हुआ, उठो, और उन तरुण बालक को, और उनकी माँ को लेकर मिस्र में भाग जाओ, और वहीं रहो जब तक मैं तुम्हें शब्द न ले आऊँ: चूँकि हेरोदेस इन तरुण बालक को नष्ट करने के लिए इन्हें ढूँढेगा। 

१४ तो जब वो उठा, उसने उन तरुण बालक को, और उनकी माँ को रात में ही लिया, और मिस्र चला गया:

१५ और वो हेरोदेस की मृत्यु तक वहीं रहा, ताकि उसकी पूर्ति हो जाए जो पैगम्बर द्वारा प्रभु के विषय में बोला गया था, कहते हुए, मिस्र में से है मैंने अपना बेटा बुलाया। 

१६ तब जब हेरोदेस ने देखा, कि उन विद्वान व्यक्तियों ने उसके साथ परिहास कर दिया था, तो वो अत्याधिक आक्रोशित हो उठा, और उसने भिजवाए, और उसने बेतलेहम में, और उसकी समस्त सीमाओं में, दो वर्ष और उस से कम आयु के सभी बच्चे मरवा डाले, उसी समयानुसार जिसे उसने विद्वानो से सूक्ष्मता से पूछाताछा था। 

१७ तब उसकी पूर्ति हुई थी, जो पैगम्बर यिर्मियाह द्वारा बोला गया था, कहते हुए,

१८ रमा में एक वाणी सुनी गई, विलाप और रोना, और बड़ा ही शोक, राहेल रो रही है अपनी सन्तानों के लिए, और वो सान्त्वनित नहीं होना चाह रही है, क्योंकि वो नहीं रहे। 

१९ परन्तु जब हेरोदेस की मृत्यु हो चुकी थी, तो देखो, प्रभु का एक दूत, यूसुफ को मिस्र में एक स्वप्न में प्रकट हुआ,

२० कहता हुआ, उठो, और उन तरुण बालक को, और उनकी माँ को लेकर, इस्राएल की भूमि में चले जाओ: चूँकि वो जो इन तरुण बालक के जीवन को लेने की सोच में थे, मर चुके हैं। 

२१ और वो उठा, और वो उन तरुण बालक को और उनकी माँ को लेकर, इस्राएल की भूमि में आ पहुँचा। 

२२ परन्तु जब उसने सुना कि अरखिलाउस यहूदा में, अपने पिता हेरोदेस के स्थान में राज कर रहा था, तो वो वहाँ जाने से डर गया: तब भी, एक स्वप्न में ईश्वर द्वारा चेतावनित हो, वो गलील के क्षेत्रों में परे मुड़ चला:

२३ और वो आया, और नासरत नाम के एक नगर में बस गया, ताकि उसकी पूर्ति हो जाए जो पैगम्बरों द्वारा बोला गया था, कि वो एक नाज़रीन पुकारे जाएँगे। 



तीसरा अध्याय।  


१ उन दिनो में योहन बपतिस्मादाता यहूदा के जँगली-क्षेत्रों में आया प्रवचन देता हुआ,

२ और कहता हुआ, तुम मन-परिवर्तन कर लो: क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट है। 

३ क्योंकि यह वही है जिसके विषय में पैगम्बर यशायाह द्वारा बोला गया था, कहता हुआ, जँगली-क्षेत्र में एक की वाणी चीखती हुई, प्रभु के पथ को उद्यत कर दो तुम, बना दो उनके पथों को सीधा। 

४ और उसी योहन के वस्त्र ऊँट के बालों के थे, और वो एक चमड़े की कमरपेटी अपनी कमर पर बाँधे था, और उसका भोजन जँगली शहद और टिड्डियाँ थे। 

५ तब यरूशलेम, और समस्त यहूदा, और यर्दन के चारों ओर का समस्त प्रदेश, उसके पास बाहर चले आए,

६ और उसके द्वारा यर्दन में, अपने पापों को स्वीकार करते हुए, बपतिस्मित हो गए। 

७ परन्तु जब उसने फैरिसीयों, और सदूकीयों में से कईयों को उसके बपतिस्मा में आते हुए देखा, तो उसने उनसे कहा, ओ विषैले-सर्पों की पीढ़ियों, तुम्हें आने वाले आक्रोश से भाग जाने के लिए किसने चेतावनी दे दी है?

८ इसलिए मन-परिवर्तन के योग्य फल उत्पन्न करो: 

९ और सोचो मत अपने स्वयं से यह कहना, कि हमारे पास तो पिता के लिए अब्राहम है: क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि ईश्वर इन पत्थरों में से अब्राहम की सन्तानों को खड़ा कर देने में सक्षम हैं। 

१० और अभी ही पेड़ों की जड़ों पर कुल्हाड़ा रख दिया जा चुका है: इसलिए प्रत्येक पेड़ जो अच्छा फल उत्पन्न नहीं करता है, काट दिया गया है नीचे, और झोंक दिया गया है अग्नि में। 

११ मैं तो वास्तव में ही पानी से तुम्हारे मन-परिवर्तन का बपतिस्मा करता हूँ: परन्तु वो जो मेरे पश्चात आ रहें हैं, मुझ से अधिक बलशाली हैं, जिनके जूतों को भी उठाने का मैं सुयोग्य नहीं हूँ, वही तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र-प्राण और अग्नि से करेंगे: 

१२ जिनका सूप उनके हाथ में है, और वो अपने खलिहान का पूर्णता से शुद्धीकरण करेंगे, और अपने गेहूँ को खत्ती में एकत्रित करेंगे: परन्तु भूसे को वो अदमनीय अग्नि से भस्म कर डालेंगे। 

१३ तब यीशु योहन द्वारा बपतिस्मित होने गलील से यर्दन आ जाते हैं:

१४ परन्तु योहन ने उन्हें रोका, कहते हुए, जी मुझे आवश्यकता है आपसे बपतिस्मित होने की, और आप मेरे पास आ रहे हैं?

१५ और यीशु ने उत्तर देते हुए उस से कहा, अभी इसे ऐसा ही हो लेने दो भई: क्योंकि इसी प्रकार ही सर्व-नेकी को पूर्ण करना हमारे लिए उचित है। तो उसने उन्हें हो लेने दिया। 

१६ और यीशु, जब वो बपतिस्मित हो चुके थे, तुरन्त ही पानी में से बाहर ऊपर निकल आए: और लो, उनकी ओर स्वर्ग खुल गए थे, और उसने ईश्वर के प्राण को एक छोटे कबूतर समान अवरोहण करते हुए, और यीशु पर उतरते हुए देखा:

१७ और लो, एक स्वर्गवाणी कहती हुई, यही मेरा अतिप्रिय पुत्र है, जिस में मैं अतिप्रसन्न हूँ।  



चौथा अध्याय।  


१ तब यीशु, प्राण द्वारा जँगली-क्षेत्र में दानव से परीक्षित किए जाने हेतु ले जाए गए। 

२ और जब उन्होंने चालीस दिन और चालीस रात उपवास कर लिया था, तो बाद में उन्हें भूख लगी। 

३ और जब उनके पास वो परीक्षक आया, तो उसने कहा, यदि तुम ईश्वर के पुत्र हो, तो आदेश दे दो कि यह पत्थर रोटी बन जाएँ। 

४ परन्तु उन्होंने उसे उत्तर दिया, और कहा, यह लिखा है, मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं जिएगा, बल्कि प्रत्येक शब्द से जो ईश्वर के मुँह से प्रवृत्त होता है। 

५ तब वो दानव उन्हें ऊपर पवित्र नगर में ले गया, और उसने उन्हें मंदिर के एक शिखर पर स्थित कर दिया,

६ और वो उनसे कहता है, यदि तुम ईश्वर के पुत्र हो, तो स्वयं को नीचे गिरा दो: क्योंकि यह लिखा है, वह 

तुम्हारे सम्बंध में अपने दूतों को आज्ञा देंगे, और वो अपने हाथों में तुम्हें ऊपर उठा लेंगे, कहिं किसी भी समय तुम अपने पैर को पत्थर से ठोकर न मार लो!  

७ यीशु ने उस से कहा, पुनः यह लिखा है, तुम प्रभु अपने ईश्वर की परीक्षा नहीं लोगे। 

८ पुनः, वो दानव उन्हें एक बहुत ही ऊँचे पर्वत पर ले जाता है, और वो उन्हें संसार के समस्त राज्य, और उनका वैभव दिखलाता है। 

९ और वो उन से कहता है, मैं तुम्हें यह सभी वस्तुएँ प्रदान कर दूँगा, यदि तुम नीचे गिर कर मेरी आराधना करोगे। 

१० तब यीशु उस से कहते हैं, यहाँ से चला जा शैतान: क्योंकि यह लिखा है, तुम प्रभु अपने ईश्वर की ही आराधना करोगे, और केवल उन्हीं की ही तुम सेवा करोगे। 

११ तब उस दानव ने उन्हें छोड़ दिया, और देखो तो, दूतों ने आकर उनकी सेवा की। 

१२ अब जब यीशु ने सुना की योहन को कारावास में डाल दिया गया था, तो उन्होंने गलील में प्रस्थान कर लिया। 

१३ और नासरत को छोड़ते हुए, वो आए और कफरनहूम में बस गए, जो समुद्र के किनारे पर है, ज़बूलून और नफ्ताली की सीमाओं में:

१४ ताकि उसकी पूर्ति हो जाए जो पैगम्बर यशायाह द्वारा बोला गया था, कहता हुआ, 

१५ भूमि ज़बूलून की, और भूमि नफ्ताली की, यर्दन पार समुद्र के पथ के साथ अन्यप्रजातियों का गलील:

१६ अन्धकार में बैठे हुए उन लोगों ने देखा विशाल उजाला: और उनके लिए जो बैठे थे प्रदेश में और मृत्यु की परछाई में, उजाला उदय हो उठा है। 

१७ उसी समय से यीशु ने प्रवचन देना, और कहना आरम्भ किया: मन-परिवर्तन करो: क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट है। 

१८ और गलील के समुद्र के साथ चलते-चलते, यीशु ने दो भाईयों को देखा, सिमोन, जो पतरस कहलाया जाता है, और अन्द्रेयास उसका भाई, समुद्र में एक जाल फेंकते हुए: क्योंकि वो मछुआरे थे। 

१९ और वो उनसे कहते हैं, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ: और मैं तुम्हें मनुष्यों का मछुआरा बना दूँगा। 

२० और उन्होंने तुरन्त ही अपने जाल छोड़ दिए, और वो यीशु के पीछे-पीछे चल दिए। 

२१ और वहीं से आगे चलते हुए उन्होंने दो अन्य भाईयों को देखा, ज़ब्दी का बेटा याकूब, और योहन उसका भाई, एक जलयान में अपने पिता ज़ब्दी के साथ, अपने जालों की मरम्मत करते हुए: और यीशु ने उन्हें पुकारा। 

२२ और उन्होंने तुरँत ही उस जलयान को, और अपने पिता को छोड़ दिया, और वो उनके पीछे-पीछे चल दिए। 

२३ और यीशु समस्त गलील में से होते हुए गए, उनके यहूदी-आराधनालयों में सिखाते हुए, और राज्य के शुभ-समाचार का प्रवचन देते हुए, और लोगों के बीच प्रत्येक प्रकार की बीमारी को, और प्रत्येक प्रकार के रोग को स्वस्थ करते हुए।   

२४ और उनकी प्रसिद्धी समस्त सिरिया के सर्वत्र में फैल गई: और वह सभी बीमार लोगों को, जो विभिन्न रोगों से, और उत्पीड़नाओं से ग्रस्त थे, और वो जो दानवों के वश में थे, और वो जो पागल थे, और जिन्हें लकवा हो गया था, उनके पास ले आए, और उन्होंने उन्हें स्वस्थ कर दिया। 

२५ और गलील से, और दिकापोलिस से, और यरूशलेम से, और यहूदा से, और यर्दन पार से, लोगों के बड़े-बड़े जनौघ, उनके पीछे-पीछे चल दिए।  



पाँचवाँ अध्याय।  


१ और जनौघों को देखते हुए वो ऊपर एक पर्वत में चले गए: और जब वो बैठ गए थे, तो उनके शिष्य उनके पास आ गए: 

२ और उन्होंने अपना मुँह खोल कर उन्हें शिक्षा दी, कहते हुए,

३ धन्य हैं वो जो प्राण में दरिद्र हैं: क्योंकि उन्हीं का है स्वर्ग का राज्य।  

४ धन्य हैं वो जो शोक मना रहे हैं: क्योंकि वही सांत्वनित होंगे। 

५ धन्य हैं वो नम्र: क्योंकि वो पृथ्वी का उत्तराधिकार लेंगे। 

६ धन्य हैं वो जो नेकी के लिए भूखे और प्यासे हैं: क्योंकि वही संतुष्ट कर दिए जाएँगे। 

७ धन्य हैं वो दयावान: क्योंकि वही दया प्राप्त करेंगे। 

८ धन्य हैं वो जो हृदय में शुद्ध हैं: क्योंकि वही ईश्वर को देखेंगे। 

९ धन्य हैं वो जो शान्ति स्थापित करते हैं: क्योंकि वही ईश्वर की सन्तानें कहलाए जाएँगे।  

१० धन्य हैं वो, जिनका नेकी के वास्ते अत्याचार होता है: क्योंकि इन्हीं का है स्वर्ग का राज्य। 

११ धन्य हो तुम, जब लोग तुम्हें गाली देंगे, और तुम्हारा अत्याचार करेंगे, और तुम्हारे विरुद्ध मेरे वास्ते, प्रत्येक प्रकार की झूठी बुराई बोलेंगे। 

१२ हर्षित, और अत्याधिक प्रसन्न हो जाना: क्योंकि स्वर्ग में तुम्हारा फल विशाल है: क्योंकि इसी ही प्रकार उन्होंने पैगम्बरों का भी अत्याचार किया था, जो तुम से पहले थे। 

१३ तुम पृथ्वी का नमक हो: परन्तु यदि नमक ही अपना स्वाद खो दे, तो फिर वो किस से नमकीन बनाया जाएगा? वो फिर किसी भी काम का नहीं रह जाता है भई, बल्कि बाहर फेंके जाने के लिए, और लोगों के पैरों तले कुच दिए जाने के लिए। 

१४ तुम संसार का प्रकाश हो। एक नगर, जो किसी पहाड़ी पर स्थित है, छुपाया नहीं जा सकता। 

१५ न ही लोग दीपक जला कर उसे किसी मापने के बर्तन तले रखते हैं, बल्कि उसे एक दीपाधार पर रखते हैं; और वह उन सभी को प्रकाश प्रदान करता है, जो घर में हैं। 

१६ अपने प्रकाश को इसी प्रकार लोगों के समक्ष उज्ज्वल हो जाने दो, ताकि वो तुम्हारे अच्छे कार्यों को देख सकें, और तुम्हारे पिताश्री का महिमामण्डन कर सकें, जो स्वर्ग में हैं। 

१७ यह मत सोचो कि मैं नियम को, या पैग़म्बारों को नष्ट करने आया हूँ: मैं नष्ट करने नहीं, बल्कि पूर्ण करने आया हूँ। 

१८ क्योंकि सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि स्वर्ग और पृथ्वी के गुज़र जाने तक, नियम में से एक भी बिंदु, या एक भी मात्रा किसी भी प्रकार से नहीं गुज़रेंगी, जब तक सभी कुछ पूर्ण नहीं हो जाता है।

१९ इसलिए जो कोई भी इन न्यूनतम आदेशों में से एक को भी तोड़ेगा, और लोगों को ऐसा करना सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में न्यूनतम कहलाया जाएगा: परन्तु जो कोई भी उन्हें करेगा और उन्हें सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान कहलाया जाएगा। 

२० इसलिए मैं कहता हूँ तुम से, कि सिवाय तुम्हारी नेकी लिपिकों और फैरिसीयों की नेकी से बढ़कर हो, तुम किसी भी प्रकार से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। 

२१ तुमने सुना है, कि यह उनसे कहा गया था जो प्राचीन समय के थे, तुम हत्या नहीं करोगे: और जो कोई भी हत्या करेगा न्याय-निर्धारण के संकट में आ जाएगा: 

२२ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि जो कोई भी अपने भाई से बिन-कारण क्रोधित है, न्याय-निर्धारण के संकट में आ जाएगा: और जो कोई भी अपने भाई को राका बुलाएगा, परिषद के संकट में आ जाएगा: परन्तु जो कोई भी कहेगा, ओ मूर्ख, वही नर्क की अग्नि के संकट में आ जाएगा। 

२३ इसलिए यदि तुम अपनी भेंट बलिवेदी पर लाते हो, और वहीं स्मरण करते हो, कि तुम्हारे भाई को तुम से कोई कष्ट है: 

२४ तो अपनी भेंट को वहीं बलिवेदी के समक्ष छोड़ दो, और अपने पथ पर चले जाओ; और पहले अपने भाई के साथ पुनः मिलाप करो, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ाओ। 

२५ अपने विपक्षी से शीघ्रता से ही सहमत हो जाओ, जैसे तुम उसके साथ अभी पथ पर ही हो: कहिं किसी भी समय तुम्हारा विपक्षी तुम्हें न्यायाधीष को प्रदान कर दे, और न्यायाधीष तुम्हें अफ़सर को प्रदान कर दे, और तुम कारावास में फैंक दिए जाओ। 

२६ सच में, मैं कहता हूँ तुम से, तुम किसी भी साधन से वहाँ से बाहर नहीं निकल पाओगे, जब तक तुम सब से अन्तिम कौड़ी नहीं चुका दोगे।  

२७ तुमने सुना है, कि यह उनसे कहा गया था, जो प्राचीन समय के थे, कि तुम व्यभिचार नहीं करोगे: 

२८ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि जो कोई भी किसी स्त्री को वासना से देखता है, उसने अपने मन में उसके साथ पहले से ही व्यभिचार कर लिया है। 

२९ और यदि तुम्हारी दाईं आँख तुम्हें अवरोधित करती है, तो उखाड़ दो तुम उसे बाहर, और फैंक दो उसे अपने पास से: क्योंकि यह लाभदायक है तुम्हारे लिए, कि तुम्हारे अंगों में से एक का नाश हो जाए, और न कि तुम्हारे सम्पूर्ण शरीर को नर्क में फैंक दिया जाए। 

३० और यदि तुम्हारा दायाँ हाथ तुम्हें अवरोधित करता है, तो काट डालो तुम उसे, और फैंक दो उसे अपने पास से: क्योंकि यह लाभदायक है तुम्हारे लिए, कि तुम्हारे अंगों में से एक का नाश हो जाए, और न कि तुम्हारे सम्पूर्ण शरीर को नर्क में फैंक दिया जाए।

३१ यह कहा गया है, जो कोई भी अपनी पत्नी को त्यागेगा, उसे अपनी पत्नी को विवाह-विच्छेद पत्र दे देने दो:

३२ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि जो कोई भी अपनी पत्नी का त्याग करता है, सिवाय अविवाहित-यौन के कारण, उस से व्यभिचार करवाता है: और जो कोई भी उस से विवाह करता है जो विवाह-विच्छेदित है, व्यभिचार करता है। 

३३ पुनः तुम ने सुना है, कि यह उनसे कह दिया गया है, जो प्राचीन समय के थे, कि तुम स्वयं से झूठा वचन नहीं दोगे, बल्कि तुम प्रभु के प्रति अपनी शपथों को पूर्ण करोगे:

३४ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, शपथ कतई भी मत खाओ, न ही स्वर्ग से, क्योंकि वो ईश्वर का सिंहासन है:

३५ न ही पृथ्वी से, क्योंकि वो उनका पायदान है: न ही यरूशलेम से, क्योंकि वो उस महा-सम्राट का नगर है। 

३६ न ही तुम अपने सर से शपथ खाओ, क्योंकि तुम एक भी बाल श्वेत या काला नहीं बना सकते। 

३७ बल्कि अपनी बोली को, हाँ, हाँ: ना, ना, ही रहने दो: क्योंकि जो कुछ भी इनके अतिरिक्त है, बुराई से आता है।  

३८ तुमने सुना है कि यह कहा गया है, आँख के बदले आँख, और दाँत के बदले दाँत ।

३९ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि तुम अनुचितताओं का विरोध मत करो: बल्कि जो कोई भी तुम्हें दाएँ गाल पर थप्पड़ मारता है, उसकी ओर बायाँ गाल भी कर दो। 

४० और यदि कोई भी व्यक्ति तुम पर न्याय का अभियोग करना, और तुम्हारा अंगरखा ले लेना चाहता है, तो उसे तुम्हारा चौगा भी रख लेने दो।

४१ और जो कोई भी तुम्हें एक मील जाने के लिए विवश करता है, तो उसके साथ दो चले जाओ। 

४२ दे दो उसे जो माँगता है तुम से: और उसे से, जो उधार लेना चाहता है तुम से, तुम परे मत मुड़ो। 

४३ तुम ने सुना है, कि यह कहा गया है, तुम अपने पड़ौसी से प्रेम करोगे, और अपने शत्रुओं से घृणा करोगे:

४४ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, अपने शत्रुओं से प्रेम करो, आशीष दो उन्हें जो तुम्हें श्रापित करते हैं, अच्छा करो उनके लिए जो तुम से घृणा करते हैं, और प्रार्थना करो उनके लिए, जो तुम्हारा द्वेषपूर्णता से प्रयोग करते हैं, और जो तुम्हारा अत्याचार करते हैं:

४५ ताकि तुम अपने पिताश्री की सन्तानें बन सको, जो स्वर्ग में हैं, क्योंकि वो अपने सूर्य को दोनो बुरों पर, और अच्छों पर उदय करवाते हैं; और वो वर्षा दोनो न्यायीयों पर, और अन्यायीयों पर गिरवाते हैं। 

४६ क्योंकि यदि तुम उन्हीं से प्रेम करते हो जो तुम से प्रेम करते हैं, तो भई क्या फल रहा तुम्हारे पास? क्या चुंगी-कर्मचारी भी ऐसा ही नहीं करते हैं क्या ? 

४७ और यदि तुम अपने भाईयों को ही प्रणाम करते हो, औरों से क्या अधिक करते हो तुम? क्या चुंगी-कर्मचारी भी ऐसा ही नहीं करते हैं क्या? 

४८ इसलिए बन जाओ तुम परिशुद्धता-पूर्ण; जैसे तुम्हारे पिताश्री, जो स्वर्ग में हैं, हैं परिशुद्धता-पूर्ण। 



छटा अध्याय।  


१ ध्यान रखना कि तुम अपने दान लोगों के समक्ष न देना, उनसे देखे जाने के लिए: नहीं तो तुम्हें तुम्हारे पिताश्री द्वारा, जो स्वर्ग में हैं, कोई भी फल नहीं मिलेगा। 

२ इसलिए जब तुम अपने दान देते हो, तो तुरही मत बजाना अपने सामने, जैसा ढोंगी करते हैं, यहूदी-आराधनालयों में, और सड़कों पर, ताकि उनके पास लोगों की प्रशंसा हो। सच में मैं कहता हूँ तुम से, उनके पास उनका फल है। 

३ परन्तु जब तुम दान देते हो, तो अपने बाएँ हाथ को यह न जानने दो कि तुम्हारा दाँया क्या दे रहा है:

४ ताकि तुम्हारे दान गोपनीयता में हों: और तुम्हारे पिताश्री जो गोपनीयता में देखते हैं, स्वयं तुम्हें सरे आम फल दे देंगे। 

५ और जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुम ढोंगियों जैसे मत बनो: क्योंकि वो यहूदी-आराधनालयों में, और सड़कों के कोनो पर खड़े होकर प्रार्थना करना पसंद करते हैं, ताकि वो लोगों द्वारा देखे जा सकें। सच में मैं कहता हूँ तुम से, उनके पास उनका फल है।

६ परन्तु तुम, जब तुम प्रार्थना करते हो, तो अपनी कोठरी में जाकर जब तुमने अपना द्वार बंद कर लिया हो, तो गोपनीयता में अपने पिताश्री से प्रार्थना करना, और तुम्हारे पिताश्री जो गोपनीयता में देखते हैं, तुम्हें सरे आम फल दे देंगे। 

७ परन्तु जब तुम प्रार्थना करते हो, तो व्यर्थ दोहराईयों का प्रयोग मत करना, जैसा अन्यप्रजातियों वाले करते हैं: क्योंकि वो सोचते हैं कि उनके बहुत बोलने से उनकी सुनवाई हो जाएगी। 

८ इसलिए तुम उनके जैसे मत बनो: चूँकि तुम्हारे पिताश्री, तुम्हारे उनसे माँगने से पहले ही जानते हैं, कि तुम्हें किन-किन वस्तुओं की आवश्यकता है, 

९ इसलिए इस प्रकार तुम प्रार्थना करो: हमारे पिताश्री, जो स्वर्ग में हैं, पवित्र हो आपका नाम। 

१० आपका राज्य आए। आपकी इच्छा पूर्ण की जाए, पृथ्वी में, जैसे की स्वर्ग में। 

११ हमें इस दिन प्रदान कर दें, हमारी दिन प्रति-दिन की रोटी। 

१२ और क्षमा कर दें हमारे ऋणों को, जैसे हम क्षमा करते हैं अपने ऋणियों को। 

१३ और ले न जाएँ हमें परीक्षा में, बल्कि उद्धार कर दें हमारा बुराई से: चूँकि आप ही का है राज्य, और शक्ति, और महिमा, सदा के लिए, तथास्तु।  

१४ इसलिए, यदि तुम लोगों के अपराधों को क्षमा कर दोगे, तो तुम्हारे स्वर्गिक पिताश्री भी तुम्हारे अपराधों को क्षमा कर देंगे। 

१५ परन्तु यदि तुम लोगों के अपराधों को क्षमा नहीं करोगे, न ही तुम्हारे पिताश्री तुम्हारे अपराधों को क्षमा करेंगे। 

१६ इसके अतिरिक्त, जब तुम उपवास रखते हो, तो ढोंगियों जैसे मत बनो, उदास मुखाकृति लिए: चूँकि  वो तो अपने चहरे विरूपित कर लेते हैं, ताकि वो लोगों को उपवास करते हुए प्रतीत हों: सच में मैं कहता हूँ तुम से, उनके पास तो उनका फल है। 

१७ परन्तु तुम, जब तुम उपवास रखते हो, अपने सर का तेल से विलेपन करो, और अपने चेहरे को धो लो:

१८ ताकि तुम लोगों को नहीं, बल्कि अपने पिताश्री को जो गोपनीयता में हैं, उपवास करते हुए प्रतीत हो: और तुम्हारे पिताश्री, जो गोपनीयता में देखते हैं, तुम्हें सरे आम फल दे देंगे। 

१९ अपने लिए पृथ्वी पर धन-भण्डारों को मत एकत्रित करो, जहाँ कीड़े और ज़ंग भ्रष्ट कर देते हैं, और जहाँ चोर सेंधते और चुरा लेते हैं:

२० बल्कि अपने लिए स्वर्ग में धन-भण्डारों को एकत्रित करो, जहाँ न ही कीड़े, और न ही ज़ंग भ्रष्ट करते हैं, और जहाँ न ही चोर सेंधते, और न ही चुराते हैं: 

२१ क्योंकि जहाँ तुम्हारा धन-भण्डार है, वहीं तुम्हारा हृदय भी होगा। 

२२ शरीर का प्रकाश उसकी आँख है: तो इसलिए यदि तुम्हारी आँख एकहरी हो, तो तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर प्रकाश से भर जाएगा। 

२३ परन्तु यदि तुम्हारी आँख बुरी हो, तो तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर अन्धकार से भर जाएगा। तो इसलिए यदि तुम्हारे अन्दर वो जो प्रकाश है, अन्धकार हो, तो भई कितना विशाल है वो अन्धकार?

२४ चूँकि भी व्यक्ति दो मालिकों की सेवा नहीं कर सकता है: क्योंकि या तो वो एक से घृणा करेगा, और दूसरे से प्रेम करेगा, अन्यथा वो एक के साथ लगा रहेगा, और दूसरे का तिरस्कार कर देगा। तुम ईश्वर की, और धन-सम्पत्ती की सेवा नहीं कर सकते हो। 

२५ इसलिए मैं कहता हूँ तुम से, कि अपने जीवन की चिंता मत करो, कि तुम क्या खाओगे, या तुम क्या पीयोगे, न ही अपने शरीर की, कि तुम क्या पहनोगे: क्या जीवन भोजन से बढ़कर नहीं है? और शरीर वस्त्र से?

२६ पवन के पक्षीयों को देखो: चूँकि वो तो बोते नहीं हैं, न ही वो फसल की कटाई करते हैं, न ही वो बखारों में एकत्रित करते हैं, तथापि तुम्हारे स्वर्गिक पिताश्री उन्हें भोजन खिलाते हैं। तो फिर क्या तुम उनसे बहुत बेहतर नहीं हो?

२७ चिंता करने से तुम में से कौन, अपने कद में एक भी हाथ जोड़ सकता है?

२८ और तुम क्यों वस्त्रों की चिंता करते रहते हो? खेत के सोसनों का विचार करो, कि वो कैसे उग जाते हैं: वो परिश्रम नहीं करते, न ही वो कातते हैं: 

२९ और तथापि मैं तुम से कहता हूँ, कि यहाँ तक कि सुलेमान भी अपने समस्त वैभव में, इन में से एक के जैसा भी विभूषित नहीं था। 

३० इसलिए यदि ईश्वर खेत की घास को इस प्रकार पहनवाते हैं, जो आज है, और कल तंदूर में फैंक दी गई है: तो फिर क्या ईश्वर तुम्हें और बढ़ चढ़ कर वस्त्र नहीं पहनवाएँगे क्या, ओ तुम अल्पविश्वासियों?

३१ इसलिए चिंता मत करो, केहते हुए, कि भई हम क्या खाएँगे? या हम क्या पीयेंगे? या हम क्या पहनेंगे?

३२ (क्योंकि इन सभी वस्तुओं को अन्यप्रजातियाँ ढूँढती-फिरती हैं:) क्योंकि तुम्हारे स्वर्गिक पिताश्री जानते हैं कि तुम्हें इन सभी वस्तुओं की आवश्यकता है। 

३३ बल्कि तुम पहले ईश्वर के राज्य, और उनकी नेकी को ढूँढो; और यह सभी वस्तुएँ तुम्हें जोड़ दी जाएँगी। 

३४ इसलिए कल की कोई चिंता मत करो: क्योंकि कल अपने स्वयं की बातों की चिंता कर लेगा: आज के कष्ट, आज ही के लिए पर्याप्त हैं। 



सातवाँ अध्याय।  


१ आँको मत, ताकि तुम भी न आँके जाओ। 

२ क्योंकि जिस आँकने से तुम आँकोगे, उसी से तुम भी आँके जाओगे: और जिस माप से तुम मापोगे, उसी से तुम भी पुनः मापे जाओगे।

३ और तुम क्यों उस तिनके को देख रहे हो, जो तुम्हारे भाई की आँख में है, लेकिन तुम उस लट्ठ का विचार नहीं कर रहे, जो तुम्हारी अपनी ही आँख में है?

४ या किस प्रकार, तुम अपने भाई से कहोगे, मैं तुम्हारी आँख में से तिनका बाहर निकालता हूँ, और देखो, तुम्हारी अपनी ही आँख में एक लट्ठ घुसा हुआ है?

५ अरे ढोंगी, पहले अपनी आँख में से उस लट्ठ को बाहर निकाल: और तब तू स्पष्टता से देख सकेगा, अपने भाई की आँख में से उसके तिनके को बाहर निकालने के लिए।   

६ वो जो पवित्र है, कुत्तों को मत डालो, न ही अपने मोतीयों को तुम सूअरों के सामने फेंको: कहिं वो उन्हें अपने पैरों तले कुचल कर, पुनः मुड़ जाएँ, और तुम्हें फाड़ डालें।

७ माँगो, और वो तुम्हें दे दिया जाएगा: ढूँढो, और तुम पा लोगे: खटखटाओ, और वो तुम्हारे लिए खोल दिया जाएगा।

८ क्योंकि प्रत्येक कोई जो माँगता है, ग्रहण कर लेता है: और वो जो ढूँढता है, पा लेता है: और उसे, जो खटखटाता है, वो खोल दिया जाएगा। 

९ अब तुम्हारे बीच वो ऐसा कौन सा व्यक्ति है, जिस से यदि उसका बेटा रोटी माँगता है, तो वो उसे पत्थर देगा?

१० और यदि वो मछली माँगता है, तो वो उसे साँप देगा?

११ तो यदि तुम बुरे होते हुए, जानते हो, कि अपने बच्चों को अच्छे उपहार कैसे दिए जाते हैं; तो तुम्हारे पिताश्री जो स्वर्ग में हैं, कितने और आधिक्य से उन्हें अच्छी वस्तुएँ देंगे, जो उन से माँगते हैं?

१२ इसलिए सभी कार्य, जो कुछ भी तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे लिए करें, तुम भी वही उनके लिए करो: क्योंकि यही नियम और पैगम्बर हैं।  

१३ तंग द्वार में से प्रवेश करो: क्योंकि चौड़ा है वो द्वार, और विवृत है वो पथ, जो विनाश की ओर ले जा रहा है, और कई हैं वो जो उस में से जा रहे हैं। 

१४ क्योंकि तंग है वो द्वार, और संकीर्ण है वो पथ, जो जीवन की ओर ले जा रहा है, और वो कुछ ही हैं जो उसे पाते हैं। 

१५ झूठे पैग़म्बरों से सावधानी बरतो, जो तुम्हारे पास भेड़ों के कपड़ों में आते हैं, परन्तु भीतर से वो फाड़खाऊ भेड़िए हैं।

१६ तुम उन्हें उनके फलों से पहचान जाओगे। क्या लोग अंगूर, काँटों से, और, अंजीर, ऊँट-कटारों से इकट्ठा करते हैं क्या?

१७ इसी प्रकार प्रत्येक अच्छा पेड़, अच्छा फल उत्पन्न करता है: परन्तु भ्रष्ट पेड़, बुरा फल उत्पन्न करता है।  

१८ एक अच्छा पेड़, बुरा फल नहीं उत्पन्न कर सकता है, न ही एक भ्रष्ट पेड़, अच्छा फल। 

१९ प्रत्येक पेड़ जो अच्छा फल नहीं उत्पन्न करता है, काट दिया जाता है नीचे, और झोंक दिया जाता है अग्नि में। 

२० इसलिए तुम उन्हें उनके फलों से पहचान जाओगे। 

२१ अब प्रत्येक कोई जो मुझ से, हे प्रभु! हे प्रभु! कहता है, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा: बल्कि वो जो स्वर्ग में बसने वाले मेरे पिताश्री की इच्छा करता है। 

२२ उस दिन कई मुझ से कहेंगे, प्रभु प्रभु, क्या हमने आपके नाम में प्रेरित-उपदेश नहीं दिए? और क्या आपके नाम में दानवों को बाहर नहीं निकाल फैंका? और क्या आपके नाम में कई अचरज-भरे कार्य नहीं किए?

२३ और तब मैं उनसे स्पष्टता से कहू दूँगा, मैंने तो तुम्हें कभी भी नहीं जाना: दूर चले जाओ मुझ से, तुम अधर्म के कर्ता। 

२४ इसलिए जो कोई भी मेरे इन कथनो को सुनता है, और उन्हें करता है, मैं उसकी समानता एक विद्वान पुरुष से करूँगा, जिसने अपने घर का निर्माण एक चट्टान पर किया:

२५ और वर्षा गिरी, और प्रलय आए, और आँधियाँ चलीं, और इन्होंने उस घर को पीटा; परन्तु वो नीचे नहीं गिरा: चूँकि वो एक चट्टान पर संस्थापित था। 

२६ और प्रत्येक कोई जो मेरे इन कथनो को सुनता है, और उन्हें नहीं करता है, एक मूर्ख पुरुष से समानतानित होगा, जिसने अपने घर का निर्माण रेत पर किया:

२७ और वर्षा गिरी, और प्रलय आए, और आँधियाँ चलीं, और इन्होंने उस घर को पीटा; और वो घर नीचे गिर गया: और विशाल थी उसकी गिरावट। 

२८ और यह हुआ कि जब यीशु ने इन कथनो का अन्त कर दिया था, तो लोग उनकी शिक्षा से आश्चर्यचकित रह गए। 

२९ क्योंकि यीशु ने उन्हें एक प्राधिकारक के जैसे सिखाया, न कि लिपिकों के जैसे। 




आठवाँ अध्याय।  


१ तो जब यीशु पर्वत पर से नीचे आ गए थे, बड़े जनौघ उनके पीछे-पीछे लग लिए। 

२ और देखो तो, वहीं एक कुष्ठरोगी आया, और उसने उनकी आराधना की, कहता हुआ, प्रभु जी, यदि आप चाहें आप मुझे स्वच्छ कर सकते हैं। 

३ और यीशु ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसे छुआ, कहते हुए, मेरी यही इच्छा है, बन जाओ तुम स्वच्छ। और तुरन्त ही उसका कुष्ठ रोग स्वच्छ हो गया। 

४ और यीशु उस से कहते हैं, देख लेना कि तुम यह बात किसी से भी मत कहना, बल्कि अपने पथ पर चले जाओ, और स्वयं को पुरोहित से दिखवा लो, और वही भेंट चढ़ा दो, जिसका मूसा ने आदेश दिया था, उनके प्रति एक साक्ष्य के लिए। 

५ और जब यीशु ने कफरनहूम में प्रवेश कर लिया था, तो उनके पास वहाँ एक शतपती आया, उनसे विनती करता हुआ, 

६ और कहता हुआ, प्रभु, मेरा नौकर लकवे से बीमार पड़ा हुआ है, वो शोचनीयता से उत्पीड़ित है जी। 

७ और यीशु उस से कहते हैं, मैं आऊँगा और उसे स्वस्थ कर दूँगा। 

८ उस शतपती ने उत्तर दिया, और कहा, प्रभु जी, मैं सुयोग्य नहीं हूँ कि आप मेरी छत तले पधारें: बल्कि केवल शब्द ही कह दें, और मेरा नौकर स्वस्थ हो जाएगा। 

९ क्योंकि मैं प्राधिकार के आधीन ही तो एक व्यक्ति हूँ, और सैनिक मेरे आधीन हैं: और मैं इस बंदे से कहता हूँ, चले जा, और वो चला जाता है: और दूसरे से, भई आ जा, और वो आ जाता है, और अपने नौकर से, यह कर दे, और वो उसे कर देता है। 

१० जब यीशु ने यह सुना, तो उन्होंने अचम्भा किया, और उनसे कहा जो उनके पीछे-पीछे आ रहे थे, सच में मैं कहता हूँ तुम से, मैंने इतना विशाल विश्वास नहीं पाया है, नहीं, इस्राएल में नहीं। 

११ और मैं कहता हूँ तुम से, कि पूर्व से, और पश्चिम से कई आएँगे, और अब्राहम के, और इसहाक के, और याकूब के साथ, स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे:

१२ परन्तु राज्य की सन्तानें बाहरी अन्धकार में फैंक दी जाएँगी: वहीं रोना-धोना और दाँत पीसना होगा। 

१३ और यीशु ने उस शतपती से कहा, चले जाओ अपने पथ पर, और जैसा तुमने विश्वास किया है, वैसा ही तुम्हारे लिए कर दिया जाए। और उसका नौकर ठीक उसी घड़ी में स्वस्थ हो गया था। 

१४ और जब यीशु पतरस के घर में पधार गए थे, तो उन्होंने उसकी पत्नी की माँ को ज्वर से बीमार पड़ा हुआ देखा। 

१५ और उन्होंने उसका हाथ छुआ, और उस ज्वर ने उसे छोड़ दिया: और वो उठ गई, और उसने उन सब की सेवा की।  

१६ जब सन्ध्या हो चली थी, तो वो यीशु के पास, दानवों के वश में कई लोगों को ले आए: और उन्होंने उन भावात्माओं को अपने शब्द द्वारा बाहर निकाल फ़ैंका, और उन सभी को स्वस्थ कर दिया जो बीमार थे: 

१७ ताकि उसकी पूर्ति हो जाए जो पैगम्बर यशायाह द्वारा बोला गया था, कहता हुआ, उन्होंने स्वयं ने ले लीं हमारी दुर्बलताएँ, और ढो लीं हमारी बीमारियाँ। 

१८ अब जब यीशु ने अपने आस-पास बड़े जनौघों को देखा, तो उन्होंने उस पार प्रस्थान करने का आदेश दे दिया। 

१९ और एक कोई लिपिक आया, और उसने उनसे कहा, गुरुवर, मैं आपके पीछे-पीछे आऊँगा जहाँ कहीं भी आप जाएँगे। 

२० और यीशु उस से कहते हैं, लोमड़ीयों के पास बिल हैं, और पवन के पंछीयों के पास घौंसले हैं: परन्तु मनुष्य-पुत्र के पास अपना सर रखने के लिए भी कोई स्थान नहीं है। 

२१ और उनके शिष्यों में से एक अन्य ने उनसे कहा, प्रभु जी, मुझे अनुमति दे दें, कि मैं पहले जाकर अपने पिता को दफ़ना दूँ। 

२२ परन्तु यीशु ने उस से कहा, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ; और मृतकों को अपने मृतक दफ़ना लेने दो। 

२३ और जब उन्होंने एक जलयान में प्रवेश कर लिया था, तो उनके शिष्य उनके पीछे-पीछे आ गए। 

२४ और, देखो, वहीं समुद्र में एक इतना विशाल तूफ़ान उठा, कि वो जलयान ही लहरों से ढक गया: परन्तु यीशु सो रहे थे। 

२५ और उनके शिष्य उनके पास आए, और उन्हें जगाया, कहते हुए, प्रभु, हमें बचा लें: हमारा तो नाश हो रहा है जी!

२६ और वो उन से कहते हैं, अरे तुम भयभीत क्यों हो, तुम अल्पविश्वासियों? तब वह उठे, और उन्होंने वायुओं और समुद्र को डाँटा: और वहाँ एक बड़ा प्रशान्त हो गया। 

२७ परन्तु वह व्यक्ति अच्म्भित रह गए, कहते हुए, भई किस प्रकार के व्यक्ति हैं ये, कि वायुएँ और समुद्र भी इनका आज्ञा-पालन करतें हैं!

२८ और जब यीशु उस पार आ गए थे, गरगसेनेस के देश में, तो वहीं उन से दो मिले जो दानवों के वश में थे, मज़ारों में से बाहर आते हुए, अति क्रुद्ध, कि कोई भी व्यक्ति उस पथ पर से नहीं जा सकता था। 

२९ और देखो, वो चीख पड़े, कहते हुए, हमें आपसे क्या वास्ता यीशु, आप ईश्वर के बेटे? क्या आप यहाँ हमें समय से पहले उत्पीड़ित करने आए हैं क्या? 

३० और वहीं उन से अच्छी दूरी पर ही, कई सूअरों का एक पशु समूह चर रहा था। 

३१ तो उन दानवों ने उन से विनती की, कहते हुए, यदि आप हमें बाहर फैंक ही रहे हैं, तो हमें उस पशु समूह के सूअरों में चले जाने की अनुमती दे दें। 

३२ और यीशु ने उनसे कहा, चले जाओ। और जब वो दानव बाहर निकल आए थे, तो वो उस पशु समूह के सूअरों में जाकर समा गए: और देखो तो, वो सूअरों का सम्पूर्ण पशु-समूह तीव्र ढलान पर से नीचे समुद्र में झपट पड़ा, और पानियों में नष्ट हो गया। 

३३ और वो उनके जो रखवाले थे, भाग खड़े हुए, और अपने पथों पर नगर में चले गए, और सब कुछ बतला दिया, और, कि क्या हो गया था, उन दानवों से जकड़े हुए व्यक्तियों के साथ। 

३४ और देखो, वो समस्त नगर यीशु से मिलने बाहर निकल आया: और जब उन्होंने उन्हें देखा, तो उन्होंने उन से विनती की, कि वह उनकी सीमाओं से बाहर निकल जाएँ। 



नवाँ अध्याय।  


१ और यीशु ने एक जलयान में प्रवेश किया, और उस पार निकल चले, और अपने ही नगर में आ पहुँचे। 

२ और देखो, वो उनके पास एक बिस्तर पर लेटा हुआ लकवे से बीमार व्यक्ति ले आए: और उनका भरोसा देखते हुए, यीशु ने लकवे से बीमार व्यक्ति को कहा; बेटे, अच्छे प्रोत्साहित हो जाओ: तुम्हारे पाप तुम्हें क्षमा हों। 

३ और देखो, लिपिकों में से कुछों ने अपने मन ही मन कहा, ये व्यक्ति तो ईश्वर-निंदा कर रहा है भई। 

४ और यीशु ने उनके विचारों को जानते हुए कहा, तुम अपने हृदयों में बुराई क्यों सोच रहे हो?

५ क्योंकि क्या कहना सरल है, तुम्हारे पाप तुम्हें क्षमा हों? या कहना, उठो और चलो?

६ इसलिए ताकि तुम जान जाओ, कि मनुष्य-पुत्र के पास पृथ्वी पर पापों को क्षमा करने की शक्ति है, (तब वो लकवे से बीमार को कहते हैं,) उठ जाओ, अपना बिस्तर ले लो, और अपने घर चले जाओ। 

७ और वो उठा, और अपने घर चला गया। 

८ परन्तु जब जनौघों ने ये देखा, तो उन्होंने अचम्भा किया, और ईश्वर को गौरवान्वित किया, जिन्होंने मनुष्यों को ऐसी शक्ति प्रदान कर दी थी। 

९ और जैसे यीशु वहाँ से गुज़रते जा रहे थे, उन्होंने मत्ती नामक एक व्यक्ति को चुंगी-घर में बैठा हुआ देखा: और वह उस से कहते हैं, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ। और वो उठा, और उनके पीछे-पीछे चल दिया।

१० और यह होने को आया, कि जैसे यीशु घर में भोजन के लिए बैठे, तो देखो, कई चुंगी-कर्मचारी और पापी आए, और वह उनके और उनके शिष्यों के साथ बैठ गए। 

११ और जब फैरिसीयों ने यह देखा, तो उन्होंने उनके शिष्यों से कहा, तुम्हारे गुरुवर चुंगी-कर्मचारीयों और पापियों के साथ क्यों भोजन कर रहे हैं? 

१२ परन्तु जब यीशु ने यह सुना, तो उन्होंने उनसे कहा: वो जो स्वस्थ हैं, उन्हें चिकित्सक की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें, जो अस्वस्थ हैं। 

१३ लेकिन तुम जाओ, और सीखो कि इसका क्या अर्थ है, मैं दया चाहता हूँ, और न कि बलिदान: क्योंकि मैं नेकों को नहीं, बल्कि पापियों को मन-परिवर्तन के लिए बुलाने आया हूँ। 

१४ तब उनके पास योहन के शिष्य आए कहते हुए, जी हम और फैरिसी इतनी बार उपवास क्यों रखते हैं, परन्तु आपके शिष्य उपवास नहीं रखते?

१५ और यीशु ने उनसे कहा, क्या दुल्हन-कक्ष के सखा शोक मना सकते हैं, जब तक दुल्हा उनके साथ हो? परन्तु वो दिन आएँगे, जब दुल्हा उन से ले लिया जाएगा, और तब वो उपवास रखेंगे। 

१६ कोई भी व्यक्ति नए कपड़े का टुकड़ा पुराने वस्त्र में नहीं लगाता है: क्योंकि वो जो उसे भरने के लिए लगाया गया है, वस्त्र में से ले लेता है, और वो चीरा भत्तर बन जाता है। 

१७ न ही लोग नया अंगूर-रस, पुरानी बोतलों में डालते हैं: अन्यथा वो बोतलें टूट जाती हैं, और अंगूर-रस बिखर जाता है, और उन बोतलों का नाश हो जाता है: बल्कि लोग नए अंगूर-रस को नई बोतलों में ही डालते है, और दोनो ही संरक्षित हो जाते हैं।

१८ अब जैसे वो यह बातें उनसे बोल रहे थे, देखो, वहाँ कोई एक अध्यक्ष आया, और उसने उनकी आराधना की, कहता हुआ, मेरी बेटी अभी-अभी मर गई है जी: परन्तु आप आएँ, और अपना हाथ उस पर रख दें, और वो जीवित हो जाएगी। 

१९ और यीशु उठे, और उसके पीछे-पीछे चल दिए, और उनके शिष्यों ने भी ऐसा ही किया। 

२० और देखो, एक स्त्री जो बारह वर्षों से रक्त के स्राव की रोगी थी, यीशु के पीछे-पीछे आई, और उसने उनके वस्त्र का किनारा छू दिया: 

२१ क्योंकि उसने अपने मन-ही-मन कहा, यदि मैं बस उनका वस्त्र ही छू सकूँ, तो मैं बच जाऊँगी। 

२२ परन्तु यीशु मुड़ गए, और जब उन्होंने उसे देखा, तो उन्होंने कहा, बेटी, अच्छी प्रोत्साहित हो जाओ, तुम्हारे भरोसे ने तुम्हें बचा लिया है। और उस स्त्री का उसी घड़ी से बचाव हो चुका था। 

२३ और जब यीशु उस अध्यक्ष के घर के अन्दर आए, और बाँसुरी बजाने वालों को, और लोगों को शोर मचाते हुए देखा,

२४ तो उन्होंने उनसे कहा, स्थान बनाओ, चूँकि बालिका मरी नहीं है, बल्कि सो रही है। परन्तु उन लोगों ने यीशु का उपहास करते हुए उनकी हँसी उड़ाई। 

२५ परन्तु जब उन लोगों को बाहर कर दिया गया था, तो यीशु भीतर चले गए, और उन्होंने उस बालिका को हाथ से पकड़ा, और वो बालिका उठ गई। 

२६ और इस बात की प्रसिद्धी बाहर उस समस्त भूमि में फैल गई।

२७ और जब यीशु ने वहाँ से प्रस्थान किया, तो दो नेत्रहीन व्यक्ति उनके पीछे-पीछे आए चीखते हुए, और कहते हुए, आप दाऊद के बेटे, हम पर दया करें जी। 

२८ और जब यीशु ने घर में प्रवेश कर लिया था, तो वो नेत्रहीन व्यक्ति उनके पास आए: और यीशु उनसे कहते हैं, क्या तुम विश्वास करते हो कि मैं ये करने में सक्षम हूँ? तो वो उन से कहते हैं, जी हाँ, प्रभू जी। 

२९ तब उन्होंने उनके नेत्रों को छूआ, कहते हुए, जैसा तुमने विश्वास किया है, वैसा ही तुम्हारे लिए कर दिया जाए। 

३० और उनके नेत्र खुल गए: और यीशु ने उन्हें कड़ाई से आज्ञा दी, कहते हुए, देख लेना, कि कोई भी व्यक्ति इस बात को जान न सके। 

३१ परन्तु उन्होंने, जब उन्होंने प्रस्थान कर लिया था, यीशु की प्रसिद्धी बाहर उस समस्त देश में फैला दी। 

३२ जैसे वह जन बाहर जा रहे थे, देखो तो, वो यीशु के पास एक दानव के वश में गूँगे व्यक्ति को ले आए।

३३ और जब वो दानव बाहर फैंक दिया गया था, तो वो गूँगा बोल पड़ा, और वो जनौघ अचम्भित थे, कहते हुए, इस प्रकार तो इस्राएल में ये कभी भी नहीं देखा गया है! 

३४ परन्तु फैरिसीयों ने कहा, भई ये तो दानवों को दानवों के शासक द्वारा बाहर फेंकता है। 

३५ और यीशु सभी नगरों और गाँवों में से चलते गए, उनके यहूदी-आराधनालयों में शिक्षा प्रदान करते हुए, और राज्य के शुभ-समाचार का प्रवचन देते हुए, और लोगों के बीच प्रत्येक बीमारी, और प्रत्येक रोग को स्वस्थ करते हुए। 

३६ और जब उन्होंने जनौघों को देखा, तो यीशु उनके प्रति सम्वेदना से भर उठे, क्योंकि वह निस्सहाय बाहर बिखरे हुए थे, जैसे कि बिन चरवाहे के भेड़। 

३७ तब वह अपने शिष्यों से कहते हैं, फसल-कटाई सचमुच बृहत् है, परन्तु श्रमिक कम हैं; 

३८ इसलिए तुम फसल-कटाई के प्रभु से प्रार्थना करो, कि वो अपनी फसल-कटाई में श्रमिक भेज दें।




दसवाँ अध्याय।  


१ और जब उन्होंने अपने पास अपने बारह शिष्यों को बुला लिया था, तो उन्होंने उन्हें अस्वच्छ भावात्माओं को बाहर निकाल फेंकने की, और हर प्रकार की बीमारी, और हर प्रकार के रोग को स्वस्थ कर देने की शक्ति प्रदान कर दी। 

२ अब यह हैं उन बारह अपौस्लों के नाम: पहला, सिमोन, जो पतरस कहलाया जाता है, और अन्द्रेयास उसका भाई, याकूब, ज़ब्दी का बेटा, और योहन उसका भाई:

३ फिलिप, और बरतोलोमी, थोमस, और मत्ती चुंगी-कर्मचारी, याकूब हलफई का बेटा, और लिब्बई, जिस का उपनाम थद्दई था:

४ सिमोन कनानवासी, और यीशु के साथ विश्वासघात करने वाला यूदस इस्करियोती। 

५ इन बारह को यीशु ने भेजा, और उन्हें आदेश दिया कहते हुए, अन्यप्रजातियों के पास मत जाना, और समैरियावासियों के किसी भी नगर में तुम प्रवेश मत करना:

६ बल्कि तुम इस्राएल के घराने की लुप्त हुई भेड़ों के पास जाना। 

७ और जाते हूए तुम प्रवचन देना, कहते हुए, स्वर्ग का राज्य निकट ही है:

८ बीमारों को स्वस्थ, और कुष्ठ-रोगियों को स्वच्छ कर देना, मृतकों को उठा देना, दानवों को बाहर निकाल फैंकना: निशुल्क ही तुमने लिया है, निशुल्क ही तुम दे देना। 

९ अपनी थैलियों में न ही सोना, न ही चाँदी, न ही पीतल लेना,

१० न ही झोला अपने पथ के लिए, न ही दो अंगरखे, न ही जूते, न ही लट्ठे: चूँकि श्रमिक अपने ही भोजन के सुयोग्य होता है। 

११ और जिस किसी भी नगर, या नगरी में तुम प्रवेश करोगे, पूछ लेना कि उस में कौन सुयोग्य है; और वहीं निवास करना, जब तक तुम वहाँ से चले नहीं जाते। 

१२ और जब तुम किसी घर में प्रवेश करते हो, तो उसे प्रणाम कर देना। 

१३ और यदि वो घर सुयोग्य हो, तो उस पर अपनी शान्ति ठहर जाने देना: परन्तु यदि वो घर सुयोग्य न हो, तो अपनी शान्ति को अपने पास ही वापस आ जाने देना। 

१४ और जो कोई भी तुम्हारा स्वागत नहीं करेगा, न ही तुम्हारे शब्द सुनेगा: जब तुम उस घर या नगर से बाहर प्रस्थान करोगे, तो अपने पैरों पर से उसकी धूल झाड़ लेना। 

१५ सच में, मैं कहता हूँ तुम से, न्याय-निर्धारण के दिवस पर, सदोम और गौमोराह के लिए अधिक सहनीय होगा, उस नगर की अपेक्षा में। 

१६ देखो, मैं तुम्हें भेड़ों समान, भेड़ियों के बीच बाहर भेज रहा हूँ: इसलिए तुम साँपों जैसे विद्वान, और छोटे कबूतरों जैसे हानि-रहित बन जाओ। 

१७ परन्तु लोगों से सावधान रहना: चूँकि वो तुम्हें परिषद-मण्डलियों को प्रदान कर देंगे, और वो तुम्हें  यहूदी-आराधनालयों में कोडों से पीटेंगे। 

१८ और तुम राज्यपालों और राजाओं के समक्ष मेरे वास्ते लाए जाओगे, उनके और अन्यप्रजातियों के विरुद्ध एक साक्ष्य के लिए। 

१९ परन्तु जब वो तुम्हें उनके हाथों में प्रदान कर देंगे, तो सोच-विचार मत करना कि तुम कैसे या क्या बोलोगे, क्योंकि वो तुम्हें उसी घड़ी में प्रदान कर दिया जाएगा, कि तुम क्या बोलोगे।

२० क्योंकि वो तुम नहीं हो जो बोलते हो, बल्कि तुम्हारे पिताश्री का भावात्मा, जो तुम में बोलते हैं। 

२१ और भाई, भाई को मृत्यु के घाट उतरवा देगा, और पिता अपने बच्चे को: और सन्तानें पिता-माता के विरुद्ध उठ खड़ी हो जाएँगी, और उनकी मृत्यु करवा डालेंगी। 

२२ और तुम मेरे नाम वास्ते सभी लोगों द्वारा घर्णित होगे: किन्तु वो जो अन्त तक सहनशील रहेगा, वही बच जाएगा।  

२३ परन्तु जब वो तुम्हारा अत्याचार इस नगर में करेंगे, तुम किसी और में भाग जाना: क्योंकि सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि मनुष्य-पुत्र के आगमन तक, तुम इस्राएल के नगरों को नहीं समाप्त कर पाओगे। 

२४ शिष्य अपने गुरुवर से बढ़कर नहीं है, न ही नौकर अपने मालिक से बढ़कर। 

२५ ये शिष्य के लिए पर्याप्त है, कि वो अपने गुरुवर जैसा ही हो, और नौकर अपने मालिक जैसा। यदि उन्होंने घर के मालिक को बअलज़बूल पुकारा है, तो भई वो और कितना बढ़-चढ़ कर उसके घरबार वालों को पुकारेंगे?

२६ इसलिए उन से मत डरो: क्योंकि कुछ भी ढका हुआ नहीं है, जो प्रत्यक्ष नहीं किया जाएगा; और छुपा हुआ, जो जाना नहीं जाएगा। 

२७ वो जो मैं तुम्हें अन्धकार में बताता हूँ, वही तुम उजाले में बोलो: और वही जो तुम कान में सुनते हो, उसी का प्रवचन तुम घरों की छतों पर से करो। 

२८ और उन से मत डरो जो शरीर की तो हत्या कर देते हैं, परन्तु वो आत्मा की हत्या करने में सक्षम नहीं हैं: बल्कि तुम उन से डरो, जो दोनो आत्मा, और शरीर को नरक में नष्ट कर डालने में सक्षम हैं। 

२९ क्या दो चिड़ियाँ एक कौड़ी के लिए नहीं बेची जातीं क्या? और उन में से एक भी तुम्हारे पिताश्री की इच्छा बिना धरती पर नहीं गिरती भई। 

३० बल्कि तुम्हारे सर के सभी बाल गिने हुए हैं। 

३१ इसलिए तुम डरो मत, तुम कई चिड़ियाओं से अधिक मूल्य के हो। 

३२ इसलिए जो कोई भी मुझे लोगों के समक्ष स्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने पिताश्री के समक्ष, जो स्वर्ग में हैं स्वीकार करूँगा। 

३३ परन्तु जो कोई भी मुझे लोगों के समक्ष अस्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने पिताश्री के समक्ष जो स्वर्ग में हैं, अस्वीकार कर दूँगा। 

३४ यह मत सोचो, कि मैं पृथ्वी पर शान्ति भेजने आया हूँ: मैं शान्ति भेजने नहीं, बल्कि एक तलवार भेजने आया हूँ। 

३५ क्योंकि मैं पुत्र को उसके पिता के विरुद्ध, और पुत्री को उसकी माँ के विरुद्ध, और पुत्र-वधु को उसकी सास के विरुद्ध पृथक करने आया हूँ। 

३६ और एक के बैरी उसके अपने ही घरबार के होंगे। 

३७ वो जो मुझ से अधिक, पिता या माँ से प्रेम करता है, वो मेरे सुयोग्य नहीं है: और वो जो मुझ से अधिक, पुत्र या पुत्री से प्रेम करता है, वो मेरे सुयोग्य नहीं है। 

३८ और वो जो अपना क्रूस लेकर, मेरे पीछे-पीछे नहीं आएगा, वो मेरे सुयोग्य नहीं है। 

३९ वो जो अपना जीवन पा लेता है, वही उसे खो देगा: और वो जो मेरे वास्ते अपना जीवन खो देता है, वही उसे पा लेगा। 

४० वो जो तुम्हें ग्रहण करता है, मुझे ग्रहण करता है, और वो जो मुझे ग्रहण करता है, वो उन्हें ग्रहण करता है जिन्होंने मुझे भेजा है। 

४१ वो जो एक पैगम्बर को पैगम्बर के नाम में ग्रहण करता है, एक पैगम्बर का फल ग्रहण करेगा; और वो जो एक नेक व्यक्ति को एक नेक व्यक्ति के नाम में ग्रहण करता है, एक नेक व्यक्ति का फल ग्रहण करेगा। 

४२ और जो कोई भी इन छोटे नन्हों में से एक को भी, केवल एक शिष्य ही के नाम में ठण्डे पानी का एक प्याला पीने के लिए देगा; सच में, मैं कहता हूँ तुम से, वो किसी भी प्रकार अपना फल नहीं खोएगा।   




ग्यारहवाँ अध्याय।  


१ और यह होने को आया, जब यीशु अपने बारह शिष्यों को आदेश देना समाप्त कर चुके थे, तो उन्होंने वहाँ से उनके नगरों में शिक्षा प्रदान करने, ओर प्रवचन देने हेतु, प्रस्थान कर लिया। 

२ अब जब योहन ने कारावास में मसीहा के कार्यों के विषय में सुना, तो उसने अपने शिष्यों में से दो को भेजा,

३ और उन्होंने उन से कहा, क्या आप वही हैं जिन्होंने आना है, या हम किसी और को ढूँढें? 

४ यीशु ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, जाओ और योहन को पुनः वही बातें बतला दो, जो तुम सुन और देख रहे हो:

५ नेत्रहीन अपनी दृष्टि प्राप्त कर रहे हैं, और लंगड़े चल रहे हैं, कुष्ठ रोगी स्वच्छ हो रहे हैं, और बधीर सुन रहे हैं, मृत उठाए जा रहे हैं, और दरिद्रों को शुभ-समाचार का प्रवचन दिया जा रहा है। 

६ और धन्य है वो, जो कोई भी मुझ में अवरोधित नहीं होगा। 

७ और जैसे वो प्रस्थान कर रहे थे, यीशु योहन के विषय में जनौघों से कहने लगे, तुम बाहर जँगली-क्षेत्र में क्या देखने गए थे भई? हवा से झकझोरा हुआ एक सरकंडा? 

८ परन्तु क्या देखने गए थे तुम बाहर? एक पुरुष सौम्य वस्त्र पहने हुए? देखो भई, वो जो सौम्य वस्त्र पहनते हैं, राजाओं के महलों में होते हैं। 

९ परन्तु क्या देखने गए थे तुम बाहर? एक पैग़म्बर? हाँ, मैं कहता हूँ तुम से, एक पैग़म्बर से बढ़कर। 

१० क्योंकि ये वही है जिसके विषय में लिखा गया है, देखो, मैं अपना संदेशवाहक आपके चहरे से पहले भेज रहा हूँ, जो आपका पथ आपके आगे-आगे तैयार करेगा। 

११ सच में, मैं कहता हूँ तुम से, स्त्रियों से पैदा हुओं के बीच, योहन बपतिस्मादाता से अधिक महान एक भी नहीं उठा है: तब भी, वो जो स्वर्ग के राज्य में सब से न्यूनतम है, उस से महान है ।

१२ और योहन बपतिस्मादाता के दिनो से लेकर अब तक, स्वर्ग के राज्य पर बल डाला जा रहा है, और वो बल डालने वाले, उसे बलपूर्वक्ता से छीन रहे हैं। 

१३ क्योंकि सभी पैग़म्बरों और नियम ने, योहन तक प्रेरित-उपदेश दिए। 

१४ और यदि तुम यह समझने की इच्छा रखते हो, यही एलियाह है, जिसने आना था। 

१५ जिस के पास कान हैं सुनने के लिए, सुन लेने दो उसे। 

१६ परन्तु मैं किस से इस पीढ़ी की समानता करूँ? ये तो बाज़ारों में बैठे हुए बच्चों समान है, जो अपने साथियों को पुकार रही है, 

१७ और कह रही है, हमने तो तुम्हें बन्सी बजाई, और भई तुम नहीं नाचे: हमने तो तुम्हें शोक मनाया, और तुमने विलाप नहीं किया। 

१८ चूँकि योहन, न ही खाता हुआ न ही पीता हुआ आया, और वो कहते हैं, भई इस में तो एक दानव है। 

१९ मनुष्य-पुत्र खाता-पीता हुआ आया है, और वो कहते हैं, देखो तो उस पेटू और मदिराख़ोर को, चुंगी-कर्मचारियों और पापियों का मित्र। परन्तु विद्या अपनी ही सन्तानों द्वारा न्यायी-प्रमाणित होती है।  

२० तब उन्होंने उन नगरों को फटकारना आरम्भ किया, जिन में उनके बलशाली कार्यों में से कई किए गए थे, क्योंकि उन्होंने मन-परिवर्तन नहीं किया:

२१ हाय पड़े तुझ पर ख़ुराज़िन! हाय पड़े तुझ पर बेतसैदा! चूँकि यदि वो बलशाली कार्य जो तुझ में किए गए थे, टाय्र और सिदोन में किए गए होते, तो उन्होंने बहुत समय पूर्व ही टाट-वस्त्र और राख में मन-परिवर्तन कर लिया होता। 

२२ परन्तु मैं कहता हूँ तुझ से, न्याय-निर्धारण के दिन में, टाय्र और सिदोन के लिए अधिक सहनीय होगा, तेरी अपेक्षा में।

२३ और तू कफरनहूम जो स्वर्ग तक पदोन्नत है, नीचे नर्क तक ले आया जाएगा: चूँकि यदि वो बलशाली कार्य जो तुझ में किए गए हैं, सदोम में किए गए होते, तो वो इस दिन तक बना रहा होता। 

२४ परन्तु मैं कहता हूँ तुझ से, कि न्याय-निर्धारण के दिन में, सदोम की भूमि के लिए अधिक सहनीय होगा, तेरी अपेक्षा में।

२५ उस समय यीशु ने उत्तर दिया, और कहा, हे पिताश्री, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, क्योंकि आपने ये बातें विद्वानो और विवेकियों से छिपा दी हैं, और आपने इन्हें शिशुओं को प्रत्यक्ष कर दी हैं। 

२६ जी हाँ पिताश्री: क्योंकि यही आपकी दृष्टि में अच्छा प्रतीत था। 

२७ मुझे मेरे पिताश्री द्वारा सब कुछ प्रदान कर दिया गया है: और कोई भी व्यक्ति पुत्र से परिचित नहीं है, सिवाय पिताश्री के; न ही कोई भी व्यक्ति पिताश्री से परिचित है, सिवाय पुत्र के, और वो जिसे पुत्र पिताश्री को प्रत्यक्ष करवाएगा। 

२८ आ जाओ मेरे पास, तुम सभी जो श्रम कर रहे हो, और भारों तले दबे हो, और मैं तुम्हें विश्राम प्रदान कर दूँगा। 

२९ ले लो मेरा जूआ अपने ऊपर, और सीख लो मेरे विषय में; क्योंकि मैं हृदय में नम्र और दीन हूँ: और तुम अपनी आत्माओं के लिए विश्राम प्राप्त कर लोगे। 

३० क्योंकि सरल है मेरा जूआ, और हल्का है मेरा भार। 




बारहवाँ अध्याय।  


१ उस समय यीशु सैबथ के दिन अनाज के खेतों में से जा रहे थे; और उनके शिष्य भूखे थे, और उन्होंने अनाज की बालियों को तोड़-तोड़ कर खाना शुरू कर दिया। 

२ परन्तु जब फैरिसियों ने यह देखा, तो उन्होंने उन से कहा, देखो तो, तुम्हारे शिष्य वो कर रहें हैं जो सैबथ के दिन में करना न्यायी नहीं है भई। 

३ परन्तु उन्होंने उनसे कहा, क्या तुमने पढ़ा नहीं है, कि दाऊद ने, जब वो भूखा था, और वो जो उसके साथ थे, क्या किया था;

४ कि कैसे उसने ईश्वर के घर में प्रवेश कर कर भेंट की रोटी भी खाई थी, जो न्यायी नहीं था उसके लिए खाना, न ही उनके लिए जो उसके साथ थे, बल्कि केवल पुरोहितों के लिए? 

५ या तुमने क्या नियम में नहीं पढ़ा है, कि कैसे सैबथ के दिनो में मन्दिर में पुरोहित सैबथ को कलुषित करते हैं, और निर्दोष रहते हैं?

६ परन्तु मैं तुम से कहता हूँ कि इस स्थान में एक मन्दिर से बढ़कर है। 

७ परन्तु यदि तुम ने जाना होता, कि इसका क्या अर्थ है, मैं दया की इच्छा रखता हूँ, और न कि बलिदान की; तो तुम ने निर्दोषों को दोषी घोषित नहीं किया होता। 

८ क्योंकि मनुष्य-पुत्र सैबथ के दिन का भी प्रभु है। 

९ और जब यीशु ने वहाँ से प्रस्थान कर लिया था, वह उनके यहूदी-आराधनालय में चले गए:

१० और देखो तो, वहीं एक व्यक्ति था जिसका हाथ सूख गया था। और वो यीशु से पूछते हैं, कहते हुए, क्या सैबथ के दिनो में स्वस्थ करना न्यायी है? ताकि वो उन पर दोषारोप लगा सकें। 

११ और उन्होंने उन से कहा, तुम्हारे बीच वो कौन सा व्यक्ति होगा, जिसके पास एक भेड़ हो, और यदि वो सैबथ के दिन एक गड्ढे में गिर जाए, तो वो उसे पकड़ कर बाहर नहीं खींच लेगा? 

१२ तो फिर एक मनुष्य एक भेड़ से और कितना अधिक बेहतर है भई? इसलिए सैबथ के दिनो में अच्छा करना न्यायी है। 

१३ तब वह उस व्यक्ति से कहते हैं, अपना हाथ आगे बढ़ाओ। और उसने उसे आगे बढ़ा दिया; और वो हाथ दूसरे के सदृश स्वस्थ पुनःस्थापित हो गया। 

१४ तो वो फैरिसी बाहर निकल आए, और उन्होंने उनके विरुद्ध परामर्श किया, कि वो उन्हें कैसे नष्ट करें। 

१५ परन्तु जब यीशु ने यह जान लिया था, तो वो वहाँ से अलग चले गए: और बड़े जनौघ उनके पीछे-पीछे चल दिए, और उन्होंने उन सभी को स्वस्थ कर दिया; 

१६ और उन्हें आज्ञा दी कि वो उन्हें ज्ञात न करवाएँ: 

१७ ताकि उसकी पूर्ति हो जाए, जो पैगम्बर यशायाह द्वारा बोला गया था, कहते हुए,

१८ देखो मेरा सेवक, जिसे मैंने चुना है; मेरा अतिप्रीय, जिस में मेरा आत्मा अति प्रसन्न है: मैं अपना प्राण उस पर डालूँगा, और वो अन्यप्रजातियों को न्याय-सिद्धांत की घोषणा करेगा। 

१९ वो संघर्ष नहीं करेगा, न ही वो चीखेगा; न ही कोई भी व्यक्ति सड़कों पर उसकी वाणी सुनेगा। 

२० एक कुचला हुआ सरकंडा वो नहीं तोड़ेगा, और धुएँधार पटसन की बत्ती को वो नहीं बुझाएगा, जब तक वो न्याय-निर्धारण को विजय तक न भेज दे।

२१ और उस के नाम में अन्यप्रजातियाँ विश्वास करेंगी। 

२२ तब यीशु के पास एक दानव के वश में, नेत्रहीन और गूँगा व्यक्ति लाया गया: और उन्होंने उसे स्वस्थ कर दिया, यहाँ तक कि नेत्रहीन और गूँगे ने बोला, और देखा। 

२३ और सभी लोग विस्मित रह गए, और कहा, क्या ये दाऊद के बेटे नहीं हैं क्या?

२४ परन्तु जब फैरिसियों ने ये सुना, तो उन्होंने कहा, भई यह बंदा तो दानवों को बाहर नहीं निकालता है, बल्कि दानवों के शासक बअलज़बूल द्वारा। 

२५ और यीशु उनके विचार जानते थे, और उन्होंने उनसे कहा, प्रत्येक राज्य जो अपने ही विरुद्ध विभाजित है, उजाड़ बना दिया जाता है; और प्रत्येक नगर या घर, जो अपने ही विरुद्ध विभाजित है, खड़ा नहीं रहेगा:

२६ और यदि शैतान, शैतान को ही बाहर निकाल फैंक देता है, तो वो तो अपने ही विरुद्ध विभाजित है; तो फिर उसका राज्य कैसे खड़ा रहेगा भई? 

२७ और यदि मैं बअलज़बूल द्वारा दानवों को बाहर निकाल फैंकता हूँ, तो तुम्हारी सन्तानें फिर किस के द्वारा उन्हें बाहर निकाल फैंकती हैं? इसलिए वही तुम्हारा न्याय करेंगे। 

२८ परन्तु यदि मैं ईश्वर के प्राण द्वारा दानवों को बाहर निकाल फैंकता हूँ, तो ईश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ चुका है। 

२९ अन्यथा कोई कैसे किसी शक्तिमान के घर में प्रवेश कर कर, उसका सामान लूट सकेगा, सिवाय इस के, कि वो पहले उस शक्तिमान व्यक्ति को बाँध दे? और फिर वो उसका घर लूट पाएगा। 

३० वो जो मेरे साथ नहीं है, मेरे विरुद्ध है; और वो जो मेरे साथ एकत्रण नहीं करता है, बाहर बिखर जाता है। 

३१ इसलिए मैं कहता हूँ तुम से, प्रत्येक प्रकार के पाप और निंदा लोगों के प्रति क्षमा कर दिए जाएँगे: परन्तु पवित्र-प्राण के विरुद्ध निंदा लोगों के प्रति क्षमा नहीं की जाएगी। 

३२ और जो कोई भी मनुष्य-पुत्र के विरुद्ध एक भी शब्द बोलता है, वो उसे क्षमा कर दिया जाएगा: परन्तु जो कोई भी पवित्र-प्राण के विरुद्ध बोलता है, वो उसे क्षमा नहीं किया जाएगा, न ही इस संसार में, न ही आने वाले संसार में। 

३३ या तो पेड़ को अच्छा बना दो, और उसके फल को भी अच्छा; अन्यथा पेड़ को भ्रष्ट बना दो, और उसके फल को भी भ्रष्ट; क्योंकि पेड़ अपने फल से ही जाना जाता है। 

३४ ओ विषैले-सर्पों की पीढ़ियों, तुम बुरे होते हुए, अच्छी बातें कैसे बोल सकते हो? क्योंकि हृदय की बहुतायत में से ही मूँह बोलता है। 

३५ एक अच्छा व्यक्ति अपने हृदय के अच्छे भण्डार में से अच्छी बातें उभारता है: और एक बुरा व्यक्ति अपने बुरे भण्डार में से बुरी बातें। 

३६ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि प्रत्येक निश्क्र्य शब्द जो लोग बोलेंगे, वो उसका लेखा-जोखा न्याय-निर्धारण के दिन में देंगे। 

३७ क्योंकि तुम अपने शब्दों द्वारा ही न्यायी-प्रमाणित किए जाओगे, और अपने शब्दों ही के द्वारा तुम दण्डनीय-घोषित कर दिए जाओगे। 

३८ तब लिपिकों और फैरिसियों में से कुछों ने उत्तर दिया, कहते हुए, गुरुवर, हम आपके द्वारा एक संकेत देखना चाहते हैं। 

३९ परन्तु यीशु ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, एक बुरी और व्यभिचारी पीढ़ी एक संकेत ढूँढ रही है; और इसे कोई भी संकेत नहीं दिया जाएगा, बल्कि पैगम्बर योना का संकेत:

४० क्योंकि जैसे योना तीन दिन, और तीन रात व्हेल-मछली के पेट में था; उसी प्रकार मनुष्य-पुत्र भी, पृथ्वी के हृदय में तीन दिन और तीन रात होगा। 

४१ निनवे के पुरुष इस पीढ़ी के साथ न्याय-निर्धारण में उठेंगे, और इसे दण्डनीय घोषित करेंगे: चूँकि उन्होंने योना के प्रवचन से मन-परिवर्तन कर लिया था; और देखो, एक योना से बढ़कर यहाँ है। 

४२ दक्षिण की रानी इस पीढ़ी के साथ न्याय-निर्धारण में उठेगी, और इसे दण्डनीय घोषित करेगी: क्योंकि वो सुलेमान की विद्या सुनने पृथ्वी के अन्तिम क्षेत्रों में से आई थी; और देखो, एक सुलेमान से बढ़कर यहाँ है। 

४३ जब किसी व्यक्ति में से अस्वच्छ प्राण बाहर निकल आता है, तो वो सूखे स्थानों में विश्राम ढूँडता-फिरता है, और वो उसे नहीं पाता है। 

४४ तब वो कहता है, मैं अपने ही घर, जहाँ से मैं बाहर निकला हूँ, वहीं वापस चला जाऊँगा; और जब वो वहाँ आ जाता है, तो वो उसे रिक्त, स्वच्छ, और सजा-धजा पाता है। 

४५ तब वो जाता है, और अपने साथ सात और प्राणों को, अपने से अधिक दुष्ट, ले आता है, और वो वहीं प्रवेश करके बस जाते हैं: और इस व्यक्ति की ये अन्त की दशा उसकी पहली दशा से भत्तर है। इसी प्रकार इस दुष्ट पीढ़ी के साथ भी यही होगा। 

४६ अब जैसे वो लोगों के साथ बात-चीत कर ही रहे थे, कि देखो, उनकी माँ, और उनके भाई बाहर खड़े थे, उनसे बोलने की इच्छा से। 

४७ तब एक ने उन से कहा, देखें, आपकी माँ और आपके भाई-जन बाहर खड़े हैं, आपसे बोलना चाहते हैं। 

४८ परन्तु यीशु ने उत्तर दिया, और उस से कहा, जिसने उन्हें सूचित किया था: कौन है मेरी माँ? और कौन हैं मेरे भाई-जन?

४९ और उन्होंने अपने शिष्यों की ओर अपना हाथ आगे बढ़ाया, और कहा, देखो मेरी माँ और मेरे भाई-जन!

५० क्योंकि जो कोई भी मेरे स्वर्गिक पिताश्री की इच्छा करेगा, वही मेरा भाई, और बहन, और माँ है। 





तेरहवाँ अध्याय।  


१ उसी दिन यीशु घर से बाहर निकल कर, समुद्र के किनारे जाकर बैठ गए। 

२ और उनके पास बड़े जनौघ एकत्रित हो गए थे, तो वो एक जलयान में जाकर बैठ गए; और वो समस्त जनौघ समुद्र तट पर खड़ा रहा। 

३ और उन्होंने उनसे दृष्टांतों में कई बातें बोलीं, कहते हुए, देखो, एक बोनेवाला बोने गया;

४ और जब उसने बोए, तो कुछ बीज पथ के किनारे पर गिर गए, और पक्षी आए और उन्होंने उन्हें चुग लिया:

५ कुछ पथरीले स्थानो में गिरे, जहाँ उनके पास अधिक मिट्टी नहीं थी: और वो झट से ही ऊपर फूट पड़े, क्योंकि उनके पास गहरी मिट्टी नहीं थी:

६ और जब सूर्य ऊपर चढ़ गया था, तो वो भस्म हो गए; और क्योंकि उनके पास कोई जड़ नहीं थी, वो मुरझाते चले गए। 

७ और कुछ काँटों के बीच गिरे; और वो काँटे फूट पड़े, और उन्होंने उन्हें घोंट दिया:

८ लेकिन कुछ अच्छी धरती में गिरे, और उन्होंने फल उपजाए, कुछ ने सौ गुणा, कुछ ने साठ गुणा, कुछ ने तीस गुणा। 

९ जिस के पास कान हैं सुनने के लिए, सुन लेने दो उसे। 

१० और शिष्य आए, और उन्होंने उन से कहा, आप उन से दृष्टांतों में क्यों बोल रहे हैं जी?

११ उन्होंने उत्तर दिया और उन से कहा, क्योंकि स्वर्ग के राज्य के रहस्यों की जानकारी तुम्हें दी गई है, परन्तु उन्हें यह नहीं दी गई है। 

१२ क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे दिया जाएगा, और उसके पास और बहुतायत होगी: परन्तु जिस किसी के पास नहीं है, उस से वही ले लिया जाएगा जो उसके पास है। 

१३ इसलिए मैं उनसे दृष्टांतों में बोलता हूँ: क्योंकि वो देखते हुए, देख नहीं रहे हैं; और सुनते हुए, वो सुन नहीं रहे हैं, न ही समझ रहे हैं। 

१४ और इन में यशायाह का प्रेरित-उपदेश पूर्ण होता है, जो कहता है, सुनते हुए तुम सुनोगे, और समझोगे नहीं; और देखते हुए तुम देखोगे, और आभास नहीं करोगे:

१५ क्योंकि इन लोगों के हृदय मोटे हुए पड़े हैं, और इनके कान सुनने में मंदे हैं, और इन्होंने अपनी आँखें बँद कर ली हैं; कहिं किसी भी समय यह अपनी आँखों से देख लें, और अपने कानो से सुन लें, और अपने हृदय से समझ लें, और परिवर्तित हो जाएँ, और मैं इन्हें स्वस्थ कर दूँ। 

१६ परन्तु धन्य हैं तुम्हारी आँखें, क्योंकि वो देखती हैं: और तुम्हारे कान, क्योंकि वो सुनते हैं। 

१७ क्योंकि सच में मैं कहता हूँ तुम से: कि कई पैगम्बरों और नेकों ने इन बातों को देखना चाहा है, जिन्हें तुम देख रहे हो, और उन्होंने उन्हें नहीं देखा; और उन बातों को सुनना चाहा है, जो तुम सुन रहे हो, और उन्होंने उन्हें नहीं सुना। 

१८ इसलिए तुम बोनेवाले का दृष्टांत सुनो। 

१९ जब कोई भी राज्य का शब्द सुनता है, और उसे समझता नहीं है, तब वो दुष्ट आ जाता है, और वो जो उसके मन में बोया गया था, वो उसे छीन कर दूर ले जाता है। यह वही है जिसने पथ के किनारे पर बीज ग्रहण किया था। 

२० लेकिन वो, जिसने पथरीले स्थानो में बीज ग्रहण किया था, यह वही है जो शब्द सुनता है, और उसे झट से आनंद के साथ ग्रहण कर लेता है;

२१ मगर उसके पास स्वयं में जड़ नहीं है, तो वो कुछ ही समय तक झेल पाता है: लेकिन जब शब्द के कारण आपत्ति या अत्याचार आते हैं, तो वो यकायक ठोकर खा जाता है। 

२२ वो भी जिसने काँटों के बीच बीज ग्रहण किया था, वही है, जो शब्द तो सुन लेता है, और इस संसार की चिंता, और धन-धान्यों की धोखाधड़ी, शब्द को घोंट देते हैं, और वो निष्फल बन जाता है। 

२३ परन्तु उसने जिसने अच्छी धरती में बीज ग्रहण किया था, वही है जो शब्द सुनता है, और उसे समझ लेता है; जो फल भी उत्पन्न करता है, और उपजाता है, कुछ सौ गुणा, कुछ साठ, कुछ तीस। 

२४ उन्होंने एक अन्य दृष्टांत उनके समक्ष प्रस्तुत किया, कहते हुए, स्वर्ग का राज्य एक व्यक्ति के समान है, जिसने अपने खेत में अच्छा बीज बोया:

२५ परन्तु जब लोग सो रहे थे, उसका शत्रु आया और उसने मोचनी घास गेहूँ के बीच बो दी, और वो अपने पथ पर चलता बना।  

२६ लेकिन जब अँकुर ऊपर फूट पड़ा, और उसने फल उपजाया, तब मोचनी घास भी दिखाई देने लग गई। 

२७ तो घर के मालिक के नौकर आए, और उन्होंने उस से कहा, श्रीमान, क्या आपने अपने खेत में अच्छा बीज नहीं बोया था क्या? तो फिर ये मोचनी घास कहाँ से आ गई है उस में?

२८ उसने उनसे कहा, एक शत्रु ने यह कर दिया है। तो नौकर कहते हैं उस से, क्या फिर आप चाहते हैं कि हम जाएँ, और उन्हें एकत्रित कर लें?

२९ परन्तु उसने कहा, नहीं; कहिं तुम मोचनी घास को एकत्रित करते हुए, गेहूँ को भी उसके साथ न उखाड़ लो। 

३० दोनो को फसल-कटाई के समय तक एक ही साथ उगने दो: और फसल-कटाई के समय, मैं कटाई करने वालों से कहूँगा, पहले तुम मोचनी घास को एक साथ एकत्रित करो, और उसे गंठलों में जलाने के लिए बाँध दो: परन्तु गेहूँ को मेरे खलिहान में एकत्रित कर लो। 

३१ उन्होंने एक अन्य दृष्टांत उनके समक्ष बोला, कहते हुए; स्वर्ग का राज्य सरसों के एक बीज के दाने समान है, जिसे किसी व्यक्ति ने लेकर अपने खेत में बो दिया:

३२ जो वास्तव में सभी बीजों में सब से छोटा है: परन्तु जब वो उग जाता है, तो वो पौधों में सब से बड़ा होता है, और एक पेड़ बन जाता है, ताकि पवन के पंछी आकर उसकी डालियों में बस जाते हैं। 

३३ एक अन्य दृष्टांत उन्होंने उनसे बोला; स्वर्ग का राज्य खमीर के समान है, जिसे एक स्त्री ने लिया, और तीन माप आटे में छिपा दिया, जब तक कि वो पूरा खमीरदार-आटा बन गया। 

३४ यह सभी बातें यीशु ने जनौघ से दृष्टांतों में बोलीं; और बिना दृष्टांत के वो उन से नहीं बोले:

३५ ताकि उसकी पूर्ति हो जाए जो पैगम्बर द्वारा बोला गया था, कहते हुए, मैं खोलूँगा अपना मुँह दृष्टांतों में; मैं अर्णन करूँगा बातों का, जिन्हें संसार की नीव से गुप्त रखा गया है। 

३६ तब यीशु ने जनौघ को विदा कर दिया, और घर के अन्दर चले गए: और उनके शिष्य उनके पास आए, कहते हुए, खेत की मोचनी घास का दृष्टांत हमें स्पष्ट कर दें जी। 

३७ उन्होंने उत्तर दिया, और उनसे कहा, वो जो अच्छा बीज बोता है, मनुष्य-पुत्र है;

३८ खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की सन्तानें हैं; परन्तु वो मोचनी घास उस दुष्ट की सन्तानें हैं;

३९ वो शत्रु जिसने उन्हें बोया है, दानव है; फसल-कटाई संसार का अन्त है; और कटाई करने वाले दूत हैं। 

४० इसलिए जैसे मोचनी घास एकत्रित की जाती है, और अग्नि में जला दी जाती है; इसी प्रकार इस संसार के अन्त में भी होगा। 

४१ मनुष्य-पुत्र अपने दूतों को भेजेगा, और वो उसके राज्य में से बाहर सभी अवरोधक तत्वों, और अधर्मता के कर्ताओं को एकत्रित कर लेंगे;

४२ और उन्हें अग्नि की एक भट्टी में फैंक डालेंगे: वहीं रोना-पीटना और दाँत पीसना होगा। 

४३ तब नेक सूर्य के समान अपने पिताश्री के राज्य में उज्वलित हो जाएँगे। जिस के पास कान हैं सुनने के लिए, सुन लेने दो उसे।

४४ पुनः, स्वर्ग का राज्य एक खेत में छिपे हुए धन-भण्डार के समान है; जिसे जब कोई व्यक्ति पा लेता है, तो वो उसे छुपा देता है, और इस से आनंदित हो, वो जाकर वो सब कुछ जो उसके पास है, बेच कर, उस खेत को खरीद लेता है। 

४५ पुनः, स्वर्ग का राज्य एक व्यापारी के समान है, जो अच्छे मोती ढूँढ रहा है:

४६ जिसने, जब एक बहुमूल्य मोती पा लिया था, जाकर वो सब कुछ बेच दिया जो उसके पास था, और उस मोती को खरीद लिया।

४७ पुनः, स्वर्ग का राज्य एक जाल के समान है, जिसे समुद्र में फैंक दिया गया था, और उसने प्रत्येक भाँति को एकत्रित कर लिया:

४८ जिसे, जब वो भर गया था, उन्होंने तट पर खींच लिया, और नीचे बैठ कर अच्छों को बरतनो में एकत्रित कर लिया, परन्तु बुरों को उन्होंने परे फैंक दिया। 

४९ इसी प्रकार संसार के अन्त में होगा: दूत आएँगे, और वो दुष्टों को न्यायीयों के बीच में से पृथक कर देंगे,

५० और उन दुष्टों को अग्नि की भट्टी में फैंक डालेंगे: वहीं रोना-पीटना और दाँत पीसना होगा। 

५१ यीशु उनसे कहते हैं, तो क्या तुमने यह सभी बातें समझ ली हैं क्या? और वो उन से कहते हैं, जी हाँ प्रभु। 

५२ तब उन्होंने उनसे कहा, इसलिए प्रत्येक लिपिक जो स्वर्ग के राज्य में अनुदेशित है, उस व्यक्ति के जैसा है, जो किसी घर का मालिक है, जो अपने धन-भण्डार में से बातें नई और पुरानी बाहर निकालता है। 

५३ और यह होने को आया, कि जब यीशु ने इन दृष्टांतों को समाप्त कर दिया था, तो उन्होंने वहाँ से प्रस्थान कर लिया। 

५४ और जब वो अपने ही देश में आ गए थे, तो उन्होंने उन्हें उनके यहूदी-आराधनालयों में सिखाया, यहाँ तक कि वो लोग आश्चर्यचकित रह गए, और उन्होंने कहा, भई कहाँ से आई है इसके पास यह विद्या, और यह बलशाली कार्य?

५५ क्या ये उस बढ़ई का बेटा नहीं है? क्या इसकी माँ मरियम नहीं कहलाई जाती है क्या? और इसके भाई, याकूब, और योशी, और शिमोन, और यूदस?

५६ और इसकी बहने, क्या यह सभी हमारे बीच नहीं हैं? तो फिर कहाँ से आए हैं इसके पास यह सभी कारनामे?

५७ और वो यीशु के प्रति अवरोधित हो गए। परन्तु यीशु ने उनसे कहा, पैगम्बर बिना आदर के नहीं होता, सिवाय अपने ही देश में, और अपने ही घर में। 

५८ और उनके अविश्वास के कारण उन्होंने वहाँ अधिक बलशाली कार्य नहीं किए। 




चौदहवाँ अध्याय।  


१ उस समय हेरोदेस चतुरादिदारुक ने यीशु की कीर्ति के विषय में सुना, 

२ और अपने नौकरों से कहा, भई ये तो योहन बपतिस्मादाता है; वो मृतकों में से उठ गया है; और इस कारण इस में यह शक्तिशाली कार्य क्रियान्वित हो रहें हैं। 

३ क्योंकि हेरोदेस ने योहन को पकड़ कर, उसे बंदी बना कर, कारावास में डाल दिया था, उसके भाई फिलिप की पत्नी हेरोदियस के वास्ते। 

४ क्योंकि योहन ने उस से कहा था, तुम्हारे लिए उसे रखना न्यायी नहीं है। 

५ और जब कि हेरोदेस उसे मृत्यु के घाट उतार देना चाहता था, वो जनौघ से डरता था; चूँकि लोग योहन की गिनती पैगम्बरों में करते थे। 

६ परन्तु जब हेरोदेस का जन्मदिन मनाया जा रहा था, तो हेरोदियस की बेटी उनके समक्ष नाची, और उसने हेरोदेस को प्रसन्न कर दिया। 

७ इस बात पर हेरोदेस ने उसे एक शपथ के साथ वचन दे दिया, उसे वही दे देने का, जो कुछ भी वो माँगे। 

८ और उसने, अपनी माँ द्वारा पहले से ही अनुदेशित होते हुए कहा, मुझे यहाँ योहन बपतिस्मादाता का सर एक थाल में दे दें। 

९ और राजा को खेद हुआ: फिर भी अपनी शपथ और उनके वास्ते, जो उसके साथ भोज में बैठे थे, उसने आदेश दे दिया कि वो उसे प्रदान कर दिया जाए। 

१० और हेरोदेस ने भिजवाया, और योहन का सर कारावास में बेधड़ करवा दिया। 

११ और उसका सर एक थाल में लाया गया, और वो उस किशोरी को दे दिया गया: और वो उसे अपनी माँ के पास ले आई। 

१२ और उसके शिष्य आए, और उसका शरीर लेकर उसे दफ़ना दिया, और उन्होंने जाकर यीशु को बता दिया। 

१३ जब यीशु ने यह सुना, तो वो वहाँ से एक जलयान में, दूर किसी निर्जन-क्षेत्र में परे चले गए: और जब लोगों ने इसके विषय में सुन लिया था, तो वो उनके पीछे-पीछे नगरों में से बाहर पैदल आ गए। 

१४ और यीशु आगे चलते गए, और एक बड़ा जनौघ देख कर वह उनके प्रति सम्वेदना से भर उठे, और उन्होंने उनके बीमारों को स्वस्थ कर दिया। 

१५ और जब सन्ध्या हो चली थी, तो उनके शिष्य उनके पास आए, कहते हुए, जी ये तो एक निर्जन-क्षेत्र है, और समय बीत चुका है; जनौघ को विदा कर दें, ताकि वो गाँवों में जाकर अपने लिए भोजन खरीद सकें। 

१६ परन्तु यीशु ने उनसे कहा, इन्हें जाने की आवश्यकता नहीं है; इन्हें तुम खाने के लिए दे दो। 

१७ और उन्होंने उन से कहा, हमारे पास तो यहाँ केवल पाँच रोटियाँ, और दो मछलियाँ ही हैं। 

१८ उन्होंने कहा, उन्हें मेरे पास यहाँ ले आओ। 

१९ और उन्होंने जनौघ को घास पर नीचे बैठ जाने का आदेश दिया, और वो पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ लीं, और स्वर्ग की ओर ऊपर देखते हुए, उन्होंने आशीष दिया, और रोटियाँ तोड़-तोड़कर अपने शिष्यों को दे दीं, और शिष्यों ने जनौघ को दे दीं। 

२० और उन सभी ने खाया, और वो संतुष्ट हो गए: और बचे कुचे टुकड़ों से उन्होंने बारह टोकरियाँ भरी हुई ऊपर उठाईं। 

२१ और जिन्होंने खाया था, स्त्रियों और बच्चों के अतिरिक्त, पाँच हज़ार पुरुष थे। 

२२ और यीशु ने तुरन्त ही जनौघों को विदा करते हुए, अपने शिष्यों को एक जलयान में जाकर, अपने से पहले उस पार जाने के लिए विवश कर दिया। 

२३ और जब यीशु ने जनौघों को विदा कर दिया था, तो वो अलग से एक पर्वत पर प्रार्थना करने चले गए: और जब सन्ध्या हो गई थी, तो वो वहाँ अकेले ही थे। 

२४ परन्तु वो जलयान अब समुद्र के बीच लहरों से डगमगा रहा था: क्योंकि वायु उनके विरुद्ध थी। 

२५ और रात्रि के चौथे पहर में, यीशु समुद्र पर से चलते हुए उनके पास गए। 

२६ और जब शिष्यों ने उन्हें समुद्र पर चलते हुए देखा, तो उन्होंने विचलित होते हुए कहा, भई ये तो कोई प्राण है; और वो डर के मारे चीख पड़े। 

२७ परन्तु यीशु उनसे तुरन्त ही बोले, कहते हुए, अच्छे प्रोत्साहित हो जाओ; यह मैं ही हूँ; डरो मत। 

२८ और पतरस ने उन्हें उत्तर दिया, और कहा, प्रभु, यदि ये आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आ जाने के लिए आदेश दे दें। 

२९ और उन्होंने कहा, आ जाओ। और जब पतरस जलयान में से बाहर नीचे निकल आया था, तो वो यीशु के पास जाने के लिए पानी पर चलने लगा। 

३० परन्तु जब उसने गर्जनकारी वायु को देखा, तो वो डर गया; और डूबते हुए वो चीख पड़ा, कहता हुआ, प्रभु, मुझे बचा लें जी! 

३१ और तुरन्त ही यीशु ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और उसे पकड़ लिया, और उस से कहा, ओ तुम अल्पविश्वासी, तुमने संदेह क्यों किया?

३२ और जब वो दोनो जलयान में आ गए थे, वायु थम गई। 

३३ तब वो जो जलयान में थे, आए और उन्होंने यीशु की आराधना की, कहते हुए, सच-मुच आप ईश्वर के पुत्र हैं। 

३४ और जब वो पार चले गए थे, तो वो गिनेसरेत की भूमि में आ गए। 

३५ और जब उस स्थान के पुरुषों ने यीशु को पहचान लिया था, तो उन्होंने चारों ओर से उस प्रदेश में भिजवा दिया, और उनके पास उन सभी को ले आए जो रोगी थे;

३६ और उनसे विनती की, कि वो बस उनके वस्त्र का किनारा ही छू दें: और जितनो ने भी उसे छुआ, वही पूर्णतः स्वस्थ बना दिए गए। 




पंद्रहवाँ अध्याय।  


१ तब यीशु के पास यरूशलेम से लिपिक और फैरिसी आए, कहते हुए,

२ तुम्हारे शिष्य बुज़ुर्गों की परम्पराओं का अतिक्रमण क्यों करते रहते हैं? चूँकि जब वो रोटी खाते हैं, तो वो अपने हाथ नहीं धोते। 

३ परन्तु उन्होंने उन्हें उत्तर दिया और उनसे कहा, तुम भी क्यों अपनी परम्परा से ईश्वर के आदेशों के प्रति  अतिक्रमण करते रहते हो?

४ क्योंकि ईश्वर ने आदेश दिया, कहते हुए, अपने पिता और माता का आदर करो: और, वो जो पिता या माता के साथ गाली-गलौच करता हो, तो उसे मृत्युदण्ड से मर जाने दो। 

५ परन्तु तुम कहते हो, कि जो कोई भी अपने पिता या अपनी माता से कहेगा, यह एक भेंट है, जिस किसी से भी तुम्हें मुझ से लाभ हो सके;

६ और वो अपने पिता या अपनी माता का आदर न करे, तो वो मुक्त हो जाएगा। इस प्रकार तुमने ईश्वर के आदेश को अपनी परम्परा से निरर्थक बना दिया है। 

७ अरे ढ़ोंगियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में अच्छा प्रेरित-उपदेश दिया, कहते हुए,

८ यह लोग अपने मुँह से तो मेरे निकट आते हैं, और अपने होटों से मेरा आदर करते हैं; परन्तु इनका हृदय मुझ से दूर है। 

९ व्यर्थता में ये मेरी आराधना करते हैं, मनुष्यों के आदेशों को उपदेश ठहरा कर सिखाते हुए। 

१० और उन्होंने जनौघ को बुलाया, और उनसे कहा, सुन लो, और समझ लो:

११ वो जो मनुष्य के मुँह में प्रवेश करता है, उसे दूषित नहीं करता है; बल्कि वो जो उसके मुँह से बाहर निकलता है, यही मनुष्य को दूषित करता है। 

१२ तब उनके शिष्य आए, और उन से कहा, जी आप जानते हैं कि फैरिसी इस कथन को सुन कर अवरोधित हो गए थे? 

१३ परन्तु उन्होंने उत्तर देते हुए कहा, प्रत्येक पौधा, जिसे मेरे स्वर्गिक पिताश्री ने नहीं रोपा है, उखाड़ दिया जाएगा। 

१४ अकेला छोड़ दो इन्हें: यह तो अन्धों के अन्धे नेता हैं। और यदि अन्धे, अन्धों का नेतृत्व करेंगे, तो दोनो ही नाले में गिर जाएँगे। 

१५ तब पतरस ने उत्तर दिया, और उन से कहा, जी हमें यह दृष्टांत स्पष्ट कर दें। 

१६ और यीशु ने कहा, क्या तुम भी अभी तक नासमझ हो?

१७ क्या तुम ने अभी तक समझा नहीं है, कि जो कुछ भी मुँह के अन्दर प्रवेश करता है, पेट में चला जाता है, और संडास में बाहर फैंक दिया जाता है?

१८ परन्तु वो बातें जो मुँह में से बाहर निकलती हैं हृदय में से प्रवृत होती हैं; और वही मनुष्य को दूषित करती हैं। 

१९ चूँकि हृदय में से ही प्रवृत होते हैं, बुरे विचार, हत्याएँ, व्यभिचार, अविवाहित-यौन, चोरियाँ, झूठी-गवाही, और निंदाएँ: 

२० यही हैं वो बातें जो मनुष्य को दूषित करती हैं: परन्तु बिना हाथ धोए भोजन करने से मनुष्य दूषित नहीं होता है। 

२१ तब यीशु ने वहाँ से बाहर निकल कर टाय्र और सिदोन की सीमाओं की ओर प्रस्थान कर लिया। 

२२ और देखो तो, कनान की एक स्त्री, उन्हीं सीमाओं में से बाहर निकल कर यीशु की ओर चीख पड़ी, कहती हुई, दया करें मुझ पर, हे प्रभु, आप दाऊद के बेटे; मेरी बेटी एक दानव से बड़ी ही शोचनीयता से व्यग्रित है जी। 

२३ परन्तु उन्होंने उसे एक भी शब्द उत्तर में नहीं दिया। और उनके शिष्य आए, और उन से विनती की, कहते हुए, जी इसे भेज दें; क्योंकि ये तो हमारी ओर चीखती जा रही है। 

२४ परन्तु उन्होंने उत्तर दिया और कहा, मुझे केवल इस्राएल के घराने की लुप्त भेड़ों के पास ही भेजा गया है। 

२५ तब वो आई, और उसने यीशु की आराधना की, कहती हुई, प्रभु, मेरी सहायता करें जी। 

२६ परन्तु उन्होंने उत्तर दिया और कहा, यह सुयोग्य नहीं है कि बच्चों की रोटी लेकर, उसे कुत्तों को डाल दिया जाए। 

२७ और उसने कहा, जी प्रभु जी: तब भी कुत्ते उन्हीं टुकड़ों में से ही तो खाते हैं, जो उनके मालिकों की मेज़ पर से गिरते हैं। 

२८ तब यीशु ने उसे उत्तर दिया, और कहा, हे स्त्री, तुम्हारा भरोसा महान है: जैसा तुम चाहती हो, वैसा ही तुम्हारे साथ हो जाए। और उसकी बेटी ठीक उसी घड़ी से स्वस्थ बना दी गई थी। 

२९ और यीशु ने वहाँ से प्रस्थान कर लिया, और वो गलील के समुद्र के निकट आ गए; और ऊपर एक पर्वत पर जाकर, वहीं नीचे बैठ गए। 

३० और बड़े जनौघ उनके पास आए, लंगड़ों, अन्धों, गूँगों, अपंगों, और कई औरों को अपने साथ लिए, और उन्होंने उन्हें यीशु के चरणों में डाल दिया; और उन्होंने उन्हें स्वस्थ कर दिया;  

३१ यहाँ तक कि जनौघ अचम्भित हो उठा, जब उन्होंने देखा कि गूँगा बोल रहा है, अपंग स्वस्थ हो रहा है, लंगड़ा चल रहा है, और अन्धा देख रहा है: और उन्होंने इस्राएल के ईश्वर का महिमामण्डन किया। 

३२ तब यीशु ने अपने शिष्यों को अपने पास बुलाकर कहा, मुझे जनौघ के प्रति सम्वेदना है, क्योंकि यह अब तीन दिन से मेरे साथ रहे हैं, और इनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है: और मैं नहीं चाहता कि मैं इन्हें भूखे पेट विदा करूँ, कहिं यह पथ पर मूर्छित न हो जाएँ। 

३३ और उनके शिष्य उन से कहते हैं, जी हम इतने बड़े जनौघ की भरपाई के लिए, इस जँगली-क्षेत्र में कहाँ से इतनी सारी रोटी लाएँ?

३४ और यीशु उन से कहते हैं, तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं? और उन्होंने कहा, सात, और कुछ छोटी मछलियाँ।

३५ और उन्होंने जनौघ को धरती पर नीचे बैठ जाने का आदेश दे दिया। 

३६ और उन्होंने वो सात रोटियाँ और वो मछलियाँ लीं, और धन्यवाद दिया, और उन्हें तोड़-तोड़कर अपने शिष्यों को दे दिया, और शिष्यों ने उन्हें जनौघ को दे दिया। 

३७ और उन सभी ने खाया, और वो संतुष्ट हो गए: और उन्होंने तोड़े हुए बचे-कुचे भोजन से सात भरी हुई टोकरियाँ ऊपर उठाईं। 

३८ और उन्होंने जिन्होंने खाया था, स्त्रियों और बच्चों के अतिरिक्त, चार हज़ार पुरुष थे।

३९ और यीशु ने जनौघ को विदा कर दिया, और वो जलयान द्वारा मगदला की सीमाओं में आ गए। 







सोलहवाँ अध्याय।  


१ फैरिसी भी सदूकीयों के साथ आए, और वो परखते हुए उन से वाँछा कर रहे थे, कि वो उन्हें स्वर्ग से कोई संकेत दिखला दें। 

२ उन्होंने उत्तर दिया, और उनसे कहा, भई जब सन्ध्या होती है, तो तुम कहते हो, मौसम अच्छा होगा: क्योंकि आकाश लाल है। 

३ और प्रातः में तुम कहते हो, भई आज तो मौसम बुरा होगा: क्योंकि आकाश लाल और गमगीन है। अरे ढ़ोंगीयों, तुम आकाश के लक्षण तो पहचान सकते हो; परन्तु क्या तुम इन समयों के लक्षणों को नहीं पहचान सकते क्या?

४ एक दुष्ट और व्यभिचारी पीढ़ी एक संकेत के पीछे पड़ी है; और इसे कोई भी संकेत नहीं दिया जाएगा, बल्कि पैगम्बर योना का संकेत। और उन्होंने उन्हें छोड़ कर प्रस्थान कर लिया। 

५ और जब उनके शिष्य उस पार आ गए थे, तो वो रोटी लाना भूल गए थे। 

६ तब यीशु ने उनसे कहा, ध्यान रखना, और फैरिसीयों और सदूकीयों के खमीर से सावधान रहना। 

७ और शिष्यों ने आपस में सोच-विचार किया, कहते हुए, चूँकि हम कोई रोटी नहीं लाए। 

८ जिसका जब यीशु ने आभास कर लिया था, तो उन्होंने उनसे कहा, ओ तुम अल्पविश्वासियों, तुम क्यों अपने बीच सोच-विचार कर रहे हो, चूँकि तुम कोई रोटी नहीं लाए?

९ क्या तुम्हें अभी तक समझ में नहीं आया, न ही तुम्हें स्मरण है उन पाँच हज़ार के लिए पाँच रोटियाँ, और कि तुमने कितनी टोकरियाँ उठाई थीं ऊपर?

१० न ही उन चार हज़ार के लिए सात रोटियाँ, और कि कितनी टोकरियाँ उठाई थीं तुमने ऊपर?

११ भई तुम्हें ये कैसे समझ में नहीं आ रहा है, कि मैंने तुमसे वो रोटी के सम्बंध में नहीं कहा था, कि तुम ध्यान रखो और फैरिसीयों और सदूकीयों के खमीर से सावधान रहो?

१२ तब उन्हें समझ आया कि यीशु ने रोटी के खमीर से नहीं, बल्कि फैरिसीयों और सदूकीयों की शिक्षा से सावधान रहने के लिए बोला था।

१३ जब यीशु कैसरिया फिलिप्पाय की सीमाओं में पधार चुके थे, तो उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, कहते हुए, लोग क्या कहते हैं, कि मैं मनुष्य-पुत्र, मैं कौन हूँ? 

१४ और उन्होंने कहा, जी कुछ तो कहते हैं कि आप योहन बपतिस्मादाता हैं: कुछ, एलियाह; और जी अन्य लोग कहते हैं, यिर्मियाह, या पैग़म्बरों में से कोई एक। 

१५ वो उनसे कहते हैं, परन्तु तुम क्या कहते हो, कि मैं कौन हूँ?

१६ और सिमोन पतरस ने उत्तर दिया, और कहा, जी आप मसीहा हैं, जीवन्त ईश्वर के पुत्र। 

१७ और यीशु ने उत्तर दिया, और उस से कहा, धन्य हो तुम योना के बेटे सिमोन: क्योंकि माँस और रक्त ने तुम्हें यह नहीं प्रत्यक्ष करवाया है, बल्कि मेरे पिताश्री ने, जो स्वर्ग में हैं। 

१८ और मैं तुम से यह भी कहता हूँ, कि तुम पतरस हो, और इस चट्टान पर मैं अपने कलिसिए का निर्माण करूँगा; और नरक के द्वार इसके विरुद्ध अभिभावी नहीं ठहरेंगे। 

१९ और मैं तुम्हें स्वर्ग के राज्य की चाबियाँ दे दूँगा: और जो कुछ भी तुम पृथ्वी पर बाँधोगे, वही स्वर्ग में बाँध दिया जाएगा: और जो कुछ भी तुम पृथ्वी पर खोल दोगे, वही स्वर्ग में खोल दिया जाएगा। 

२० तब उन्होंने अपने शिष्यों को आज्ञा दी, कि वो किसी को भी न बताएँ कि वही यीशु वो मसीहा थे। 

२१ उस समय से यीशु ने अपने शिष्यों को दिखलाना आरम्भ किया, कि वह कैसे अवश्य ही यरूशलेम जाएँगे, और वृद्ध-गणों, और प्रमुख पुरोहितों, और लिपिकों के हाथों कई कष्ट झेलेंगे, और मार दिए जाएँगे, और तीसरे दिन पुनः उठा दिए जाएँगे। 

२२ तब पतरस ने यीशु को लेकर, उन्हें डाँटना आरम्भ कर दिया, कहते हुए, प्रभु, यह परे हो आपसे: ऐसा नहीं होगा आपके साथ। 

२३ परन्तु यीशु ने मुड़ कर पतरस से कहा, मेरे पीछे हट जा शैतान: तू मेरे प्रति एक अवरोधक है: क्योंकि तू ईश्वर की बातों में रुचि नहीं, बल्कि मानवता की बातों में रुचि लेता है! 

२४ तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, यदि कोई भी व्यक्ति मेरे पीछे-पीछे आने की इच्छा रखता है, तो उसे अपना परित्याग करना होगा, और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे-पीछे आना होगा। 

२५ क्योंकि जो कोई भी अपना जीवन बचाने की इच्छा रखेगा, उसे खो देगा: और जो कोई भी मेरे वास्ते अपने जीवन को खो देने की इच्छा रखेगा, उसे पा लेगा। 

२६ क्योंकि क्या लाभ होगा उस व्यक्ति को, यदि वो इस सम्पूर्ण संसार को प्राप्त कर ले, और अपनी ही आत्मा को खो दे? या कोई क्या देगा, अपनी ही आत्मा के बदले?

२७ क्योंकि मनुष्य-पुत्र अपने दूतों के साथ अपने पिताश्री की महिमा में आएगा; और तब वो प्रत्येक व्यक्ति को उसके कार्यानुसार फल दे देगा। 

२८ सच में मैं कहता हूँ तुम से, यहाँ कुछ खड़े हैं, जो मृत्यु का स्वाद नहीं चखेंगे, जब तक वो मनुष्य-पुत्र को अपने राज्य में आगमन करता हुआ नहीं देख लेंगे। 





सत्रहवाँ अध्याय।  


१ और छह दिन पश्चात यीशु, पतरस, याकूब, और उसके भाई योहन को लेकर, उन्हें एक ऊँचे पर्वत पर अलग से ले आते हैं, 

२ और उनका उनके समक्ष रूपान्तरण हो गया: और उनका चेहरा सूर्य के सदृश चमक उठा, और उनका वस्त्र उजाले जैसा श्वेत हो गया। 

३ और देखो, वहीं उन्हें मूसा और एलियाह, यीशु के साथ बात-चीत करते हुए प्रकट हुए। 

४ तब पतरस ने उत्तर दिया, और यीशु से कहा, प्रभु, जी यह अच्छा है कि हम यहीं हैं: यदि आप चाहें, तो हम यहाँ तीन डेरे बना देते हैं; एक आपके लिए, और एक मूसा के लिए, और एक एलियाह के लिए। 

५ और जैसे वो बोल ही रहा था, देखो, एक उज्ज्वल बादल उन पर छा गया: और देखो मेघ में से एक वाणी बाहर निकली, जिन्होंने कहा, यही मेरा अतिप्रिय पुत्र है, जिस में मैं अतिप्रसन्न हूँ; सुनो तुम इसे। 

६ और जब शिष्यों ने यह सुना, तो वो अपने चहरे के बल गिर पड़े, और घोरता से भयभीत हो उठे। 

७ और यीशु आए, और उन्हें छुआ, और कहा, उठो, और डरो मत। 

८ और जब उन्होंने अपनी आँखें ऊपर उठा ली थीं, उन्होंने कोई भी अन्य व्यक्ति नहीं देखा, सिवाय केवल यीशु के। 

९ और जैसे वो पर्वत से नीचे आ रहे थे, तो यीशु ने उन्हें आज्ञा दी, कहते हुए, यह दृश्य किसी को भी मत बताना, जब तक मनुष्य-पुत्र पुनः मृतकों में से नहीं उठ जाता है। 

१० और उनके शिष्यों ने उन से पूछा, कहते हुए, लिपिक फिर क्यों कहते हैं, कि एलियाह को अवश्य ही पहले आना होगा?

११ और यीशु ने उत्तर दिया, और उन से कहा, एलियाह सच में पहले आएगा, और सब कुछ पुनःस्थापित कर देगा। 

१२ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि एलियाह तो आ चुका है, और उन्होंने उसे नहीं पहचाना, बल्कि जो कुछ भी उन्होंने चाहा, वही उन्होंने उसके साथ कर डाला। इसी प्रकार मनुष्य-पुत्र भी इनके द्वारा कष्ट झेलेगा। 

१३ तब शिष्यों को समझ आया कि वो उनसे योहन बपतिस्मादाता के विषय में बोले थे। 

१४ और जब वो जनौघ के पास आ पहुँचे थे, तो यीशु के पास कोई एक पुरुष नीचे घुटनो के बल कहता हुआ आया,

१५ प्रभु, मेरे बेटे पर दया करें जी: क्योंकि वो तो पगला गया है, और घोरता से व्यग्रित है: क्योंकि वो अग्नि में और पानी में बार-बार जा गिरता है। 

१६ और मैं उसे आपके शिष्यों के पास लाया, परन्तु वो उसे रोगमुक्त नहीं कर पाए। 

१७ तब यीशु ने उत्तर दिया, और कहा, ओ बिन-भरोसे वाली और विकृत पीढ़ी, कितने समय तक मैं तुम्हारे साथ रहूँ? कितने समय तक मैं तुम्हें झेलूँ? ले आओ उसे तुम यहाँ मेरे पास। 

१८ और यीशु ने उस दानव को डाँटा; और वो उस बच्चे में से बाहर निकल आया: और वो बच्चा ठीक उसी घड़ी से रोगमुक्त हो गया। 

१९ तब शिष्य यीशु के पास अलग से आए, और कहा, हम उसे बाहर क्यों नहीं निकाल पाए जी? 

२० और यीशु ने उनसे कहा, तुम्हारे अविश्वास के कारण: चूँकि सच में मै कहता हूँ तुम से, यदि तुम्हारे पास सरसों के बीज के दाने समान ही विश्वास हो, तो तुम इस पर्वत से कहोगे, अपना स्थान यहाँ से उस स्थान बदल ले; और वो बदल लेगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं होगा। 

२१ लेकिन इसके जैसा, बस केवल प्रार्थना और उपवास द्वारा ही बाहर निकलता है। 

२२ और जैसे वह गलील में निवास कर रहे थे, यीशु ने उनसे कहा, मनुष्य-पुत्र को लोगों के हाथों में पकड़वा दिया जाएगा। 

२३ और वो उसकी हत्या कर देंगे, और तीसरे दिन वो पुनः उठा दिया जाएगा। और वो जने अत्याधिकता से दुखी हो उठे। 

२४ और जब वो जने कफरनहूम आ पहुँचे थे, तो कर-संग्राहक पतरस के पास आए, और उस से कहा, क्या तुम्हारे गुरु कर नहीं भरते क्या?

२५ वो कहता है, हाँ। और जब वो घर में आ गया था, तो यीशु उस से पहले ही बोल उठे, क्या सोचते हो तुम सिमोन? पृथ्वी के राजा किन से चुंगी या कर लेते हैं? अपने बच्चों से या परदेशियों से? 

२६ पतरस उनसे कहता है, परदेशियों से जी। यीशु कहते हैं उस से, तब तो बच्चे मुक्त हैं। 

२७ तब भी, कहिं हम इन्हें अवरोधित न कर दें, तुम समुद्र तक चले जाओ, और एक कंटिया फेंको, और जो मछली पहले ऊपर आती है, उसे पकड़ लो; और जब तुम उसका मूँह खोल लोगे, तुम पैसे का एक सिक्का पाओगे: उसे लेकर, उन्हें मेरे और अपने लिए दे दो। 




अठारहवाँ अध्याय।  


१ उसी समय शिष्य यीशु के पास आए, कहते हुए, स्वर्ग के राज्य में सब से महान कौन है जी? 

२ और यीशु ने अपने पास एक छोटे से बच्चे को बुला कर उसे उन जनो के बीच स्थित कर दिया,

३ और कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, सिवाय तुम मुड़ कर नन्हें बच्चों जैसे न बन जाओ, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। 

४ इसलिए जो कोई भी स्वयं को इस छोटे से बच्चे समान निर-अहंकारी बना देगा, वही स्वर्ग के राज्य में सब से महान है। 

५ और जो कोई भी मेरे नाम में इस एक छोटे से बच्चे जैसे को ग्रहण करेगा, वही मुझे ग्रहण करता है। 

६ परन्तु जो कोई भी मुझ पर विश्वास करने वाले इन छोटे नन्हों में से एक को भी अवरोधित करेगा, उसके लिए यह बेहतर हुआ होता कि उसकी गर्दन पर चक्की का पत्थर टाँग दिया गया होता, और कि वो समुद्र की गहराई में डुबो दिया गया होता।

७ हाय पड़े संसार पर अवरोधों के कारण! क्योंकि अवरोधों का आना अनिवार्य है; परन्तु हाय पड़े उस व्यक्ति पर जिस से अवरोध आता है!

८ इस कारण, यदि तुम्हारा हाथ, या तुम्हारा पैर तुम्हें अवरोधित करता है, तो उन्हें काट डालो, और उन्हें फैंक दो अपने पास से: ये बेहतर है तुम्हारे लिए कि तुम जीवन में लंगड़े या अपंग प्रवेश करो, बजाय इस के, कि तुम दो हाथ या दो पैर लिए, अनंतकालिक अग्नि में फैंक दिए जाओ।

९ और यदि तुम्हारी आँख तुम्हें अवरोधित करती है, तो उसे उखाड़ दो बाहर, और फैंक दो उसे अपने पास से: ये बेहतर है तुम्हारे लिए, कि तुम जीवन में एक ही आँख के साथ प्रवेश करो, बजाय इस के, कि तुम दो आँखें लिए नरक की अग्नि में फैंक दिए जाओ।

१० ध्यान रखना कि तुम इन छोटे नन्हों में से एक का भी तिरस्कार न करना; क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि स्वर्ग में इनके दूत सर्वदा मेरे पिताश्री का चेहरा देखते हैं, जो स्वर्ग में हैं। 

११ चूँकि मनुष्य-पुत्र, वो जो लुप्त हो गया था उसे बचाने आया है। 

१२ कैसे सोचते हो तुम? यदि किसी के पास सौ भेडें हों, और उन में से एक भटक जाए, तो क्या वो उन नब्बे और नौ को छोड़ कर, पहाड़ों में नहीं चला जाता है, उसे ढूँढने जो भटक गया है?

१३ और यदि ऐसा हो, कि वो उसे पा ले, सच में मैं कहता हूँ तुम से, वो उस एक भेड़ के लिए अधिक आनंद मनाता है, उन नौ और नब्बे की अपेक्षा में जो भटके नहीं थे।  

१४ इसी प्रकार तुम्हारे पिताश्री की, जो स्वर्ग में हैं, यह इच्छा नहीं है कि इन छोटे नन्हों में से एक का भी नाश हो।  

१५ इसके अतिरिक्त यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे विरुद्ध पाप करता है, तो जाकर उसे उसका पाप अपने और उसके बीच अकेले में बताओ: अब यदि वो तुम्हारी बात सुन लेता है, तो तुमने अपने भाई को जीत लिया है। 

१६ परन्तु यदि वो तुम्हारी बात नहीं सुनता है, तब अपने साथ एक या दो औरों को ले लो, ताकि दो या तीन साक्षियों के मुँहों से प्रत्येक शब्द प्रमाणित हो सके। 

१७ और यदि वो उनकी बात सुनने में लापरवाही करता है, तो ये कलिसिए को बताओ: परन्तु यदि वो कलिसिए को सुनने में लापरवाही करता है, तो तुम उसे अपने प्रति एक अन्यप्रजाती-वाले, या चुंगी-कर्मचारी जैसा ही रहने दो। 

१८ सच में मैं कहता हूँ तुम से, जो कुछ भी तुम पृथ्वी पर बाँधोगे, वही स्वर्ग में बाँध दिया जाएगा: और जो कुछ भी तुम पृथ्वी पर खोल दोगे, वही स्वर्ग में खोल दिया जाएगा। 

१९ मैं पुनः कहता हूँ तुम से, कि यदि तुम में से दो, किसी भी बात को लेकर, जो कुछ भी तुम माँगोगे, पृथ्वी पर सहमत हो जाओगे, वही उनके लिए मेरे स्वर्ग में निवासित पिताश्री द्वारा कर दिया जाएगा। 

२० चूँकि जहाँ कहीं भी दो या तीन मेरे नाम में एक साथ एकत्रित हैं, मैं वहीं उनके बीच उपस्थित हूँ। 

२१ तब पतरस यीशु के पास आया, और उसने कहा, प्रभु, मेरा भाई मेरे साथ कितनी बार पाप करे, कि मैं उसे क्षमा कर दूँ? सात बार? 

२२ यीशु उस से कहते हैं, मैं बताता हूँ तुम्हें, सात बार नहीं: बल्कि सत्तर गुणा सात बार। 

२३ इसलिए स्वर्ग का राज्य किसी एक राजा के समान है, जो अपने नौकरों का लेखा-जोखा लेना चाहता था। 

२४ और जब उसने संगणन करना आरम्भ किया, तो उसके पास एक लाया गया, जिस पर उसके दस हज़ार तलनतन-भारों का ऋण था। 

२५ परन्तु चूँकि उसके पास ऋण चुकाने के लिए कुछ भी न था, तो उसके प्रभु ने उसे, और उसकी पत्नी को, और उसके बच्चों को, और उस सब को, जो उसके पास था, बेच कर, भुक्तान करने का आदेश दे दिया। 

२६ इसलिए वो नौकर नीचे गिर पड़ा, और उसने उस राजा की आराधना की, कहता हुआ, प्रभु जी, मेरे साथ धीरज रखें, मैं आपको सब कुछ चुका दूँगा।

२७ तब उस नौकर का प्रभु उसके प्रति सम्वेदना से भर उठा, और उसने उसे छोड़ दिया, और उसका ऋण क्षमा कर दिया। 

२८ परन्तु उसी नौकर ने बाहर जाकर अपने साथी-नौकरों में से एक को ढूँढा, जिस पर उसके सौ चाँदी दीनारों का ऋण था: और उसने उस पर अपने हाथ डाल कर उसकी गर्दन घोंटते हुए कहा, तुझ पर जो मेरा ऋण है उसे चुकादे भई। 

२९ और उसका साथी-नौकर उसके पैरों पर नीचे गिर पड़ा, और उसने उस से विनती की, कहता हुआ, मेरे साथ धीरज रखो, और मैं तुम्हें सब कुछ चुका दूँगा।

३० परन्तु उसने उसके साथ धीरज नहीं चाहा: बल्कि वो गया, और उसने उसे कारावास में डलवा दिया, जब तक वो ऋण चुका सके। 

३१ तो जब उसके साथी-नौकरों ने देखा कि क्या किया गया था, तो उन्हें बहुत दुःख हुआ, और वो आए और उन्होंने अपने प्रभु को वो सब कुछ बता दिया जो किया गया था। 

३२ तब उसके प्रभु ने उसे बुलवा लेने के पश्चात, उस से कहा, अरे तू दुष्ट नौकर, मैंने तेरा सम्पूर्ण ऋण क्षमा कर दिया था, क्योंकि तूने मुझ से वही चाहा था:

३३ तुझे भी क्या अपने साथी-नौकर के प्रति सम्वेदना नहीं दिखानी चाहिए थी, जैसे मैंने तेरे साथ तरस खाया था?

३४ और उसका प्रभु आक्रोशित था, और उसने उसे उत्पीड़कों को प्रदान कर दिया, जब तक कि वो सब कुछ चुका न दे, जो कुछ भी उस पर बकाया था। 

३५ तो इसी प्रकार मेरे स्वर्गिक पिताश्री भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेंगे, यदि तुम अपने हृदयों से, प्रत्येक व्यक्ति, अपने भाईयों के अपराधों को क्षमा नहीं कर दोगे। 




उन्नीसवाँ अध्याय।  


१ और यह होने को आया, कि जब यीशु ने इन कथनो को समाप्त कर दिया था, तो वो गलील से प्रस्थान कर चले, और वह यर्दन पार, यहूदा की सीमाओं में आ गए। 

२ और बड़े जनौघ उनके पीछे-पीछे चले थे; और उन्होंने उन्हें वहीं स्वस्थ कर दिया। 

३ उनके पास फैरिसी भी आ गए उन्हें परखते हुए, और उन से कहते हुए, क्या यह न्यायी है किसी पुरुष के लिए अपनी पत्नी का किसी भी कारण त्याग कर देना? 

४ और उन्होंने उत्तर दिया, और उन से कहा, क्या तुम ने पढ़ा नहीं है: कि जिन्होंने उन्हें आरम्भ में बनाया था, उन्होंने उन्हें नर और नारी बनाया था,

५ और कहा था, इसी कारण वश एक पुरुष अपने पिता और माँ को छोड़ देगा, और अपनी पत्नी से चिपट जाएगा: और वो दोनो एक माँस बन जाएँगे? 

६ इसलिए वो अब दो नहीं, बल्कि एक माँस हैं। इसलिए जो ईश्वर ने एक साथ जोड़ दिया है, उसे मनुष्य पृथक न करे: 

७ तो वो उनसे कहते हैं, मूसा ने फिर क्यों विवाह-विच्छेद पत्र दे कर उसे त्यागने का आदेश दिया?

८ वह उनसे कहते हैं, तुम्हारे हृदयों की कठोरता के कारण मूसा ने तुम्हें अपनी पत्नियों को त्यागने की अनुमति दी थी: परन्तु प्रारम्भ से यह ऐसा नहीं था। 

९ और मैं कहता हूँ तुम से, जो कोई भी अपनी पत्नी को सिवाय अविवाहित-यौन के कारण त्यागेगा, और किसी अन्य से विवाह करेगा, व्यभिचार करता है: और जो कोई भी उस से विवाह करता है, जो त्यागी हुई है, व्यभिचार करता है।  

१० उनके शिष्य उन से कहते हैं, तो यदि पुरुष की अपनी पत्नी के साथ ऐसी ही परिस्थिति हो, तो विवाह करना अच्छा नहीं है। 

११ परन्तु उन्होंने उन से कहा, सभी पुरुष इस कथन को ग्रहण नहीं कर सकते, सिवाय उनके जिन्हें यह दिया गया है। 

१२ चूँकि कुछ ऐसे नपुंसक हैं, जो अपनी माँ के गर्भ से ही ऐसे पैदा हुए हैं: और कुछ ऐसे नपुंसक हैं, जिन्हें लोगों द्वारा नपुंसक बना दिया गया है: और ऐसे भी नपुंसक हैं, जिन्होंने स्वर्ग के राज्य के वास्ते स्वयं को नपुंसक बना दिया है। वो जो यह ग्रहण करने में सक्षम है, उसे यह ग्रहण कर लेने दो। 

१३ तब यीशु के पास छोटे बच्चे लाए गए, ताकि वह उन पर अपने हाथ रखें, और प्रार्थना करें: और शिष्यों ने उन्हें डाँटा। 

१४ परन्तु यीशु ने कहा, छोटे बच्चों को अनुमति दो, और उन्हें मेरे पास आने से मत रोको भई: क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों का ही है। 

१५ और उन्होंने उन पर अपने हाथ रखे, और वहाँ से प्रस्थान कर चले। 

१६ और देखो, एक आकर यीशु से कहता है, अच्छे गुरुवर, जी मैं अनन्त जीवन पाने के लिए वो कौन सा अच्छा कार्य करूँ?

१७ और उन्होंने उस से कहा, तुम मुझे अच्छा क्यों पुकार रहे हो? कोई भी अच्छा नहीं है, सिवाय एक के, जो ईश्वर है: परन्तु यदि तुम जीवन में प्रवेश करना चाहते हो, तो आदेशों को रखो। 

१८ वो उन से कहता है, कौन से जी? यीशु ने कहा, तुम कोई भी हत्या नहीं करोगे, तुम व्यभिचार नहीं करोगे, तुम चोरी नहीं करोगे, तुम झूठी गवाही नहीं दोगे,

१९ अपने पिता और अपनी माँ का सम्मान करो: और तुम अपने पड़ौसी से स्वयं समान प्रेम करोगे। 

२० तो वो युवा पुरुष उन से कहता है, इन सभी बातों का तो मैंने अपने युवाकाल से लेकर पालन किया है: तो फिर क्या कमी है मुझ में?

२१ यीशु उस से कहते हैं, तो यदि तुम परिपूर्ण बनना चाहते हो, जाओ, और उसे बेच दो जो तुम्हारे पास है, और उसे दरिद्रों को दे दो, और तुम्हारे पास स्वर्ग में धन-भण्डार होगा: और आओ और मेरे पीछे-पीछे चल दो। 

२२ परन्तु जब उस युवा पुरुष ने यह कथन सुना, तो वो शोकार्तित होता हुआ चला गया: चूँकि उसके पास बहुत सारी सम्पत्तियाँ थीं।

२३ तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि कोई धनवान व्यक्ति कठिनाई से ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेगा। 

२४ और मैं पुनः कहता हूँ तुम से, सुई की आँख में से ऊँट का निकलना सरल है, न कि किसी धनवान व्यक्ति का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना। 

२५ जब उनके शिष्यों ने यह सुना, तो वो अत्याधिक विस्मित हो उठे, कहते हुए, तो फिर किस का बचाव हो सकता है जी?

२६ परन्तु यीशु ने उन्हें देखते हुए, उनसे कहा, मनुष्यों के लिए यह असम्भव है; परन्तु ईश्वर के लिए सभी कुछ सम्भव है। 

२७ तब पतरस ने उत्तर दिया, और उन से कहा, देखें जी, हम ने तो सभी का त्याग कर दिया है, और आपके पीछे-पीछे आ गए हैं; तो फिर हमारे पास क्या होगा? 

२८ और यीशु ने उन से कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि तुम जो मेरे पीछे-पीछे आए हो, पुनरसृजन में, जब मनुष्य-पुत्र अपनी महिमा के सिंहासन पर विराजमान होगा, तो तुम भी बारह सिंहासनों पर बैठोगे, इस्राएल की बारह प्रजातियों का न्याय करते हुए। 

२९ और उस प्रत्येक ने जिसने घरों का, या भाईयों का, या बहनो का, या पिता का, या माँ का, या पत्नी का, या बच्चों का, या भूमियों का, मेरे नाम वास्ते त्याग किया है, सौ गुणा ग्रहण करेगा, और अनंतकाल का जीवन विरासत में प्राप्त करेगा। 

३० परन्तु कई जो प्रथम हैं, अन्तिम होंगे; और वो जो अन्तिम हैं, प्रथम होंगे।




बीसवाँ अध्याय।  


१ क्योंकि स्वर्ग का राज्य उस व्यक्ति के समान है, जो किसी घर का मालिक है, जो सुबह-सुबह अपने अंगूर-खेत के लिए श्रमिकों को भाड़े पर लेने गया। 

२ और जब वो श्रमिकों के साथ एक चाँदी के दीनार की दिहाड़ी पर सहमत हो गया था, तो उसने उन्हें अपने अंगूर-खेत में भेज दिया। 

३ और वो मालिक पुनः लगभग तीसरी घड़ी में गया, और उसने कुछ अन्य लोगों को बाज़ार में निश्क्र्य खड़े देखा,

४ और उसने उनसे कहा; भई तुम भी अंगूर-खेत में चले जाओ, और जो कुछ भी सही है मैं वो तुम्हें दे दूँगा। और वो अपने पथ पर चले गए। 

५ और उस मालिक ने लगभग छटी और नवी घड़ी में पुनः जाकर इसी प्रकार किया। 

६ और लगभग ग्यारहवीं घड़ी में भी वो गया, और कुछ अन्य लोगों को निश्क्र्य खड़े पाया, और वो उनसे कहता है, तुम क्यों यहाँ सारे दिन निश्क्र्य खड़े हो?

७ वो उस से कहते हैं, चूँकि हमें किसी ने भी भाड़े पर नहीं लिया है। तो वो उन से कहता है, तुम भी अंगूर-खेत में चले जाओ; और जो कुछ भी सही है वही तुम्हें मिल जाएगा। 

८ तो जब सन्ध्या हो गई थी, अंगूर-खेत का प्रभु अपने प्रबन्धक से कहता है, श्रमिकों को बुला लो, और उन्हें उनकी दिहाड़ी दे दो, अन्तिम श्रमिक से आरम्भ करके पहले वाले तक। 

९ और जब वो जिन्हें ग्यारहवीं घड़ी में भाड़े पर लिया गया था, आए, तो उन्हें प्रत्येक व्यक्ति को एक चाँदी का दीनार मिला। 

१० परन्तु जब पहले वाले आए, तो उन्होंने सोचा कि उन्हें अधिक मिलना चाहिए था: और उन्हें भी इसी प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति को एक ही चाँदी का दीनार मिला। 

११ और जब उन्हें वो मिल गया था, तो वो घर के मालिक के विरुद्ध बड़बड़ाने लग गए, 

१२ कहते हुए, भई इन अन्तिम वालों ने तो बस एक ही घंटा काम किया है, और तुमने इन्हें हमारे ही समान बना दिया, जिन्होंने सारे दिन का भार और धूप सहे हैं? 

१३ परन्तु उस मालिक ने उन में से एक को उत्तर दिया, और कहा, मित्र, मैं तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं कर रहा हूँ: क्या तुम मेरे साथ एक ही चाँदी के दीनार के लिए सहमत नहीं हुए थे क्या? 

१४ ले लो वो जो तुम्हारा है, और अपने पथ पर चलते बनो: मैं इस अन्तिम वाले को भी, जैसा मैंने तुम्हें दिया है, वैसा ही देना चाहता हूँ। 

१५ क्या यह मेरे लिए न्यायी नहीं है, कि मैं जो चाहूँ, मैं उसके साथ वही करूँ, जो मेरा अपना है? क्या तुम्हारी आँखों में मेरी अच्छाई खटक रही है क्या?

१६ तो जो अन्तिम हैं, प्रथम होंगे, और प्रथम, अन्तिम: चूँकि कई बुलाए हुए हैं, परन्तु कुछों को ही चुना हुआ है।  

१७ और यरूशलेम तक ऊपर जाते हुए, यीशु ने पथ पर उन बारह शिष्यों को अलग लेकर उन से कहा, 

१८ देखो, हम ऊपर यरूशलेम जा रहे हैं; और मनुष्य-पुत्र प्रमुख पुरोहितों को और लिपिकों को पकड़वा दिया जाएगा, और वो उसे मृत्युदण्ड की दण्डाज्ञा दे देंगे,

१९ और वो उसे अन्यप्रजातियों को उसका उपहास करने के लिए, और उसका कशाताड़न करने के लिए, और उसे क्रूस पर चढ़ा देने के लिए प्रदान कर देंगे: और तीसरे दिन वो पुनः उठ जाएगा।

२० तब यीशु के पास, ज़ब्दी के बच्चों की माँ अपने बेटों के साथ आई, उनकी अर्चना करती हुई, किसी एक बात की उनसे वांछा करती हुई। 

२१ और उन्होंने उस से कहा, क्या चाहती हो तुम? तो वो कहती है उन से, जी ये अनुदान दे दें कि आपके राज्य में, ये मेरे बेटे, एक आपके दाएँ हाथ पर, और दूसरा आपके बाएँ हाथ पर बैठ जाए।  

२२ परन्तु यीशु ने उत्तर दिया और कहा, तुम जानते नहीं हो कि तुम क्या माँग रहे हो। क्या तुम उस प्याले से पीने में सक्षम हो, जिस से मैं पीयूँगा, और उस बपतिस्मा से बपतिस्मित होने में, जिस से मैं बपतिस्मित हूँ? तो वो उन से कहते हैं, हम सक्षम हैं जी।  

२३ और वह उन से कहते हैं, तुम वास्तव में ही मेरे प्याले से पियोगे, और जिस बपतिस्मा से मैं बपतिस्मित हूँ, तुम भी बपतिस्मित होगे: परन्तु मेरे दाएँ, या मेरे बाएँ हाथ पर बैठना, मेरे हाथ में नहीं है, बल्कि यह उन्हें दिया जाएगा जिनके लिए यह मेरे पिताश्री द्वारा तैयार कर दिया गया है। 

२४ और जब यह बात उन दस शिष्यों ने सुनी, तो वो उन दोनो भाईयों के विरुद्ध रोष से भर उठे। 

२५ परन्तु यीशु ने उन्हें अपने पास बुलाया, और कहा, तुम जानते हो कि अन्यप्रजातियों के शासक उन पर अधिराज्य जमाते हैं, और वो जो उन से बड़े हैं, वो उन पर प्राधिकार जमाते हैं। 

२६ परन्तु ये तुम्हारे बीच ऐसा नहीं होगा: बल्कि जो कोई भी तुम्हारे बीच महान बनना चाहता है, उसे तुम्हारा सेवक बन जाने दो; 

२७ और जो कोई भी तुम्हारे बीच प्रमुख बनना चाहता है, उसे तुम्हारा नौकर बन जाने दो:

२८ उसी प्रकार जैसे मनुष्य-पुत्र भी अपनी सेवा करवाने नहीं, बल्कि सेवा करने, और कईयों के लिए अपना जीवन फिरौती में देने आया है। 

२९ और जैसे वो यरीहो से प्रस्थान कर रहे थे, एक बड़ा जनौघ यीशु के पीछे-पीछे गया। 

३० और देखो तो, दो नेत्रहीन पुरुष पथ के किनारे पर बैठे हुए, जब उन्होंने सुना कि यीशु वहाँ से चलते  जा रहे थे, तो वो चीख पड़े, कहते हुए, हम पर दया करें, हे प्रभु, आप दाऊद के बेटे। 

३१ और उस जनौघ ने उन्हें डाँटा, कि वो शान्त रहें, परन्तु वो और भी अधिक चीखे, कहते हुए, हम पर दया करें, हे प्रभु, दाऊद के बेटे। 

३२ और यीशु अचल खड़े हो गए, और उन्हें बुलाया, और कहा, क्या चाहते हो तुम कि मैं तुम्हारे लिए कर दूँ?

३३ वो उन से कहते हैं, प्रभु, कि हमारी आँखें खुल जाएँ जी। 

३४ तो यीशु को उन पर सम्वेदना हूई, और उन्होंने उनकी आँखें छू दीं: और तुरन्त ही उनकी आँखों ने दृष्टि ग्रहण कर ली, और वो यीशु के पीछे-पीछे चल दिए।   




इक्कीसवाँ अध्याय। 


१ और जब वो जन यरूशलेम के निकट आ रहे थे, और बेतफगे पहुँच गए थे, जैतूनों के पहाड़ तक, तब यीशु ने दो शिष्यों को भेजा,

२ उनसे कहते हुए, उस गाँव में जो तुम्हारे विपरीत है, वहाँ चले जाओ: और तुरन्त ही तुम एक गधी बन्धी हुई, और एक युवा-गधा उसके साथ पाओगे: उन्हें खोल कर मेरे पास ले आओ।

३ और यदि कोई भी व्यक्ति तुम से कुछ भी कहता है, तो तुम कहना, प्रभु को इनकी आवश्यकता है; और वो तुरन्त ही उन्हें भेज देगा। 

४ यह सब कुछ किया गया था, ताकि उसकी पूर्ति हो जाए, जो पैगम्बर द्वारा बोला गया था, कहते हुए,

५ बता दो तुम सियोन की बेटी को, देखो, तुम्हारा राजा तुम्हारे पास आ रहा है, नम्र, एक गधे पर सवार, और एक युवा-गधे के बच्चे पर। 

६ और वह शिष्य चले गए, और वैसा ही किया, जैसा यीशु ने उन्हें आदेश दिया था,

७ और वो गधी और युवा-गधा ले आए, और उन्होंने उन पर अपने कपड़े लगा कर, उन्हें ऊपर बिठा दिया।

८ और पथ पर एक बहुत ही विशाल जनौघ ने अपने वस्त्र फैला दिए; औरों ने पेड़ों पर से डालें काट ली थीं, और उन्हें पथ में बिच्छा दिया था।  

९ और वो जनौघ जो आगे और पीछे आ रहे थे, चीखे, कहते हुए, दाऊद के बेटे को होसैना: धन्य हैं वो जो प्रभु के नाम में आ रहे हैं; सर्वोचतम में होसैना। 

१० और जब वह यरूशलेम आ पहुँचे थे, तो भई सारे नगर में तहलका मच गया, कहता हुआ, कौन है ये?

११ और जनौघ ने कहा, ये यीशु हैं, गलील के नासरत के पैगम्बर। 

१२ और यीशु ने ईश्वर के मन्दिर में अन्दर जाकर, उन सभी को बाहर निकाल फैंका, जो मन्दिर में खरीद-बेच रहे थे, और पैसे-बदलनेवालों की मेज़ों को, और छोटे कबूतरों के विक्रेताओं की कुर्सियों को, उन्होंने उलट-पलट कर डाला,

१३ और उन से कहा, यह लिखा है, मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाया जाएगा; परन्तु तुम ने तो इसे एक चोरों का अड्डा बना दिया है। 

१४ और उनके पास, मन्दिर में नेत्रहीन और लंगड़े आए; और उन्होंने उन्हें स्वस्थ कर दिया। 

१५ अब जब प्रमुख पुरोहितों और लिपिकों ने वो अचरज-भरे कार्य देखे जो उन्होंने किए, और बच्चे मन्दिर में चीखते हुए, और कहते हुए, दाऊद के बेटे को होसैना; तो वो घोरता से अप्रसन्न हो उठे, 

१६ और उन्होंने उन से कहा, सुन रहे हो तुम, कि यह क्या कह रहे हैं? और यीशु उन से कहते हैं, हाँ; क्या तुम ने कभी पढ़ा नहीं है, शिशुओं और स्तन से दूध पीते हुए मुँहों से आपने अपनी प्रशन्सा करवाई? 

१७ और यीशु ने उन्हें छोड़ दिया, और वो नगर से बाहर बेतनियाह तक आ पहुँचे; और उन्होंने वहीं वास किया। 

१८ अब सुबह, जैसे वो नगर में वापस जा रहे थे, तो उन्हें भूख लगी। 

१९ और जब उन्होंने पथ पर एक अंजीर का पेड़ देखा, तो वो उसके पास आए, और उस पर पत्तों के सिवा और कुछ भी नहीं पाया। और उन्होंने उस पेड़ को कहा, अब से लेकर सदा तक तुझ पर कोई भी फल न उगे। और तभी-तभी वो अंजीर का पेड़ मुरझा गया। 

२० और जब शिष्यों ने यह देखा, तो उन्होंने अचम्भा किया, कहते हुए, कितनी ही शीघ्रता से ये अंजीर का पेड़ मुरझा गया भई!

२१ यीशु ने उत्तर दिया, और उन से कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, यदि तुम भरोसा करोगे, और संदेह नहीं करोगे, तुम भी न केवल यही कर सकते हो जो इस अंजीर के पेड़ के साथ किया गया है, बल्कि यदि तुम इस पर्वत से कहोगे, परे हट जा, और तू समुद्र में गिर जा; तो ये भी कर दिया जाएगा। 

२२ और सभी वस्तुएँ, जो कुछ भी तुम प्रार्थना में विश्वास करते हुए माँगोगे, तुम प्राप्त कर लोगे। 

२३ और जब यीशु मन्दिर में आ गए थे, तो लोगों के प्रमुख पुरोहित और वृद्ध-गण उनके पास आए, जैसे वो शिक्षा प्रदान कर रहे थे, और उन्होंने कहा, भई तुम किस प्राधिकार से ये कार्य कर रहे हो? और किसने तुम्हें ये प्राधिकार दिया है?

२४ और यीशु ने उत्तर दिया और उन से कहा, मैं भी तुम से एक बात पूछूँगा, जिसे यदि तुम मुझे बता दोगे,  तो मैं भी इसी प्रकार तुम्हें बता दूँगा कि किस प्राधिकार से मैं यह कार्य करता हूँ। 

२५ योहन का बपतिस्मा, कहाँ से आया? स्वर्ग से, या मनुष्यों से? और उन्होंने अपने ही बीच सोच-विचार किया, कहते हुए, यदि हम कहते हैं, स्वर्ग से; तो ये हम से कहेगा, भई फिर तुम ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया?

२६ परन्तु यदि हम कहते हैं, मनुष्यों से; तो हम तो लोगों से डरते हैं; क्योंकि सभी योहन को एक पैगम्बर मानते हैं। 

२७ और उन्होंने यीशु को उत्तर दिया, और कहा, हम नहीं बता सकते। और उन्होंने उनसे कहा, न ही मैं तुम्हें बताऊँगा कि किस प्राधिकार से मैं यह कार्य करता हूँ। 

२८ परन्तु क्या सोचते हो तुम? किसी एक व्यक्ति के पास दो बेटे थे; और वो पहले के पास आया, और उसने कहा, बेटे जाओ, आज मेरे अंगूर-खेत में काम करो। 

२९ उसने उत्तर दिया और कहा, मैं नहीं जाना चाहता: परन्तु तत्-पश्चात् उसे पछतावा हुआ, और वो चला गया। 

३० और वो दूसरे के पास आया, और उसने इसी प्रकार कहा। और उसने उत्तर दिया और कहा, जी मैं जाता हूँ श्रीमान: परन्तु वो नहीं गया। 

३१ तो इन दोनो में से किसने अपने पिता की इच्छा पूर्ण की? वो उनसे कहते हैं, पहले ने। और यीशु उन से कहते हैं, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि चुँगी-कर्मचारी और वेश्याएँ तुम से पहले ईश्वर के राज्य में जा रहे हैं। 

३२ क्योंकि योहन तुम्हारे पास नेकी के पथ में आया, और तुमने उस पर विश्वास नहीं किया: परन्तु चुँगी-कर्मचारियों और वेश्याओं ने उस पर विश्वास कर लिया: और तुम ने, जब तुम ने ये देख लिया था, तो तुम ने तत्-पश्चात् पछतावा नहीं किया, ताकी तुम उस पर विश्वास कर लो। 

३३ एक और दृष्टांत सुनो: कोई एक घर के मालिक थे, जिन्होंने एक अंगूर का खेत रोपा, और उन्होंने उसके चारों ओर एक बाड़ लगा दी, और उस में एक अंगूर-रस का कोल्हू गाड़ा, और एक मीनार का निर्माण किया, और उसे खेतीहरों को भाड़े पर चढ़ा दिया, और वो एक दूर देश चले गए: 

३४ और जब फल का समय निकट आ रहा था, तो उन्होंने अपने नौकरों को खेतीहरों के पास भेजा, ताकि वो उसके फल ग्रहण कर सकें। 

३५ परन्तु उन खेतीहरों ने उनके नौकरों को लिया, और एक को उन्होंने पीट डाला, और एक की उन्होंने हत्या कर दी, और एक पर उन्होंने पथराव कर डाला। 

३६ तो उन्होंने पुनः पहले से अधिक, अन्य नौकरों को भेजा: और उन्होंने उनके साथ भी इसी प्रकार किया। 

३७ परन्तु अन्त में उन्होंने उनके पास अपना पुत्र भेजा, कहते हुए, वो मेरे पुत्र की श्रद्धा करेंगे। 

३८ परन्तु जब उन खेतीहरों ने उस पुत्र को देखा, तो उन्होंने आपस में कहा, भई यही उत्तराधिकारी है; आओ हम इसे मार डालते हैं, और हम इसका उत्तराधिकार हथिया लेते हैं। 

३९ और उन्होंने उसे पकड़ कर, उसे अंगूर-खेत के बाहर निकाल फैंका, और उसे मार डाला। 

४० अब जब अंगूर-खेत के प्रभु आते हैं, तो वो उन खेतीहरों के साथ क्या करेंगे?

४१ वो यीशु से कहते हैं, भई वो तो उन दुष्ट व्यक्तियों को बुरी तरह से नष्ट कर डालेंगे, और अपने अंगूर-खेत को दूसरे खेतीहरों को भाड़े पर दे देंगे, जो उन्हें उसके फल, उनकी ऋतुओं में प्रदान कर देंगे। 

४२ यीशु उन से कहते हैं, क्या तुमने शास्त्रों में कभी पढ़ा नहीं है क्या, वो पत्थर जिसे राजगीरों ने अस्वीकार कर दिया, वही कोने का सिरा बन गया है: यह प्रभु की करनी है, और यह हमारी आँखो में आश्चर्यजनक है?

४३ इसलिए मैं कहता हूँ तुम से, कि ईश्वर का राज्य तुम से ले लिया जाएगा, और उस राष्ट्र को दे दिया जाएगा जो उसके फल उत्पन्न करता है। 

४४ और जो कोई भी इस पत्थर पर गिरेगा, तोड़ दिया जाएगा: परन्तु जिस किसी पर भी यह पत्थर गिरेगा, वो उसे चूरे-चूरे में पीस डालेगा। 

४५ और जब प्रमुख पुरोहितों और फैरिसियों ने उनके दृष्टांत सुन लिए थे, तो उन्हें आभास हो गया कि यीशु उन्हीं के विषय में बोल रहे थे। 

४६ परन्तु जब वो उन्हें पकड़ लेने कि सोच में थे, वो जनौघ से डर गए, क्योंकि वो उन्हें एक पैगम्बर मानते थे। 




बाईसवाँ अध्याय।  


१ और यीशु ने उत्तर दिया, और वह पुनः उन से दृष्टांतों में बोले, और कहा,

२ स्वर्ग का राज्य किसी एक राजा के समान है, जिन्होंने अपने पुत्र के लिए एक विवाह रचाया,

३ और अपने सेवकों को उन्हें बुलाने के लिए भेजा, जिन्हें विवाह में आमन्त्रित किया गया था: और वह नहीं आना चाहते थे। 

४ पुनः, उन्होंने अन्य सेवकों को भेजा, कहते हुए, बोलो उनसे जिन्हें आमन्त्रित किया गया है, देखो भई, मैंने अपना रात्रि-भोज तैयार कर दिया है, मेरे साँड और मेरे मोटे पशु मार दिए जा चुके हैं, और सभी वस्तुएँ तैयार हैं: विवाह में आ जाओ। 

५ परन्तु उन्होंने इस बात को कोई तोल नहीं दिया, और वो अपने-अपने पथों पर चलते बने, एक अपनी कृषि-भूमि की ओर, और दूसरा अपने व्यापार की ओर:

६ और उन शेष जनो ने उनके सेवकों को पकड़ कर, उनके साथ अपमानजनक दुर्व्यवहार कर कर उन्हें मार डाला। 

७ परन्तु जब उन राजा ने इस विषय में सुना, तो वो आक्रोशित हो उठे! और उन्होंने अपनी सेनाओं को भेजा, और उन हत्यारों को नष्ट कर डाला, और उनके नगर को जला डाला। 

८ तब वो अपने सेवकों से कहते हैं, भई विवाह तो तैयार है, परन्तु वो जिन्हें आमन्त्रित किया गया था सुयोग्य नहीं थे। 

९ इसलिए तुम मुख्य-पथों पर चले जाओ, और जितनो को भी तुम पा सको, विवाह में बुला लो। 

१० तो वो सेवक उन मुख्य-पथों पर चले गए, और जितनो को भी उन्होंने पाया, उन्होंने उन सभी को एक साथ एकत्रित कर लिया, दोनो बुरों को और अच्छों को: और वो विवाह अतिथियों से सुसज्जित हो गया। 

११ और जब वो राजा उन अतिथियों से मिलने अन्दर आए, तो उन्होंने वहाँ एक व्यक्ति को देखा जिसने विवाह के वस्त्र नहीं पहने हुए थे:

१२ और राजा उस से कहते हैं, मित्र, तुम यहाँ बिना विवाह के वस्त्र पहने, कैसे अन्दर घुस आए भई? और उसकी बोलती बंद हो गई। 

१३ तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, इसके हाथ और पैर बाँधकर इसे परे ले जाओ, और इसे निकाल कर बाहरी अन्धकार में फैंक डालो; वहीं रोना-धोना और दाँत पीसना होगा। 

१४ चूँकि कईयों को बुलाया हुआ है, परन्तु कुछों को ही चुना हुआ है। 

१५ तब फैरिसीयों ने जाकर परामर्श किया कि वो यीशु को कैसे उनकी बात-चीत में उलझा दें। 

१६ और उन्होंने उनके पास अपने शिष्यों को हेरोदेस-गण के साथ भेजा, कहते हुए, गुरुवर जी, हम जानते हैं कि आप सत्यमय हैं, और आप सच्चाई में ईश्वर का पथ सिखाते हैं, न ही आप किसी भी व्यक्ति की परवाह करते हैं: क्योंकि आप लोगों के चेहरों को मान्यता नहीं देते। 

१७ इसलिए हमें बताएँ, क्या सोचते हैं आप? क्या रोम के राजा को कर देना न्यायी है, या नहीं?

१८ परन्तु यीशु ने उनकी दुष्टता का आभास कर लिया, और कहा, तुम मुझे क्यों परख रहे हो, तुम ढोंगीयों?

१९ दिखाओ मुझे कर का पैसा। और वो उनके पास एक दीनार ले आए। 

२० और वह उन से कहते हैं, यह प्रतिमा और अभिलेख किस के हैं?

२१ वो कहते हैं उन से, रोम के राजा के। तो यीशु उन से कहते हैं, इसलिए रोम के राजा को वो वस्तुएँ चुका दो जो रोम के राजा की हैं; और ईश्वर को वो वस्तुएँ जो ईश्वर की हैं। 

२२ जब उन्होंने यह शब्द सुन लिए थे, तो वो अचम्भित रह गए, और यीशु को छोड़ कर वह अपने-अपने पथ पर चलते बने। 

२३ उसी दिन उनके पास सदूकी आए, जो कहते हैं कि कोई पुनरुत्थान नहीं होता, और उन्होंने उन से पूछा, 

२४ कहते हुए, गुरुवर मूसा ने कहा था, कि यदि कोई पुरुष सन्तानहीन मर जाए, तो उसका भाई उसकी पत्नी से विवाह करेगा, और वो अपने भाई के लिए बीज उपजाएगा। 

२५ अब हमारे साथ सात भाई थे: और पहला, एक पत्नी के साथ विवाह करने के पश्चात चल बसा, और उसका कोई वंशज न होता हुआ, वो अपनी पत्नी को अपने भाई के लिए छोड़ चला। 

२६ इसी प्रकार दूसरा भी, और तीसरा भी, सातवें तक। 

२७ और अन्त में वो स्त्री भी मर गई। 

२८ इसलिए अब पुनरुत्थान में, उन सातों में से वो किसकी पत्नी बनेगी? चूँकि वो सभी उसके साथ रहे थे। 

२९ यीशु ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, तुम भटक रहे हो, न ही तुम शास्त्रों से परिचित हो, न ही ईश्वर की शक्ति से। 

३० क्योंकि पुनरुत्थान में वो न ही विवाह करते हैं, न ही वो विवाह में दिए जाते हैं, बल्कि वो स्वर्ग में ईश्वर के दूतों समान होते हैं। 

३१ परन्तु मृतकों के पुनरुत्थान के विषय में क्या तुम ने वो पढ़ा नहीं है, जो तुम्हें ईश्वर द्वारा बोला गया था, कहते हुए,

३२ मैं हूँ ईश्वर अब्राहम का, और ईश्वर इसहाक का, और ईश्वर याकूब का? ईश्वर मृतकों के ईश्वर नहीं हैं, बल्कि जीवितों के ईश्वर हैं।  

३३ और जब जनौघ ने यह सुना, तो वो उनके उपदेश से आश्चर्यचकित रह गए। 

३४ परन्तु जब फैरिसियों ने यह सुना कि यीशु ने सदूकीयों का मूँह बंद कर दिया था, तो वो फैरिसी एक साथ एकत्रित हो गए। 

३५ तब उन में से एक ने, जो एक न्यायज्ञ था, उसी ने उन से एक प्रश्न पूछा उन्हें परखते हुए, और कहते हुए,

३६ गुरुवर, नियम में वो महान आदेश कौन सा है?

३७ यीशु ने उस से कहा, तुम प्रभु अपने ईश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय से, और अपनी सम्पूर्ण आत्मा से, और अपने सम्पूर्ण मन से प्रेम करोगे। 

३८ यही है वो प्रथम और महान आदेश। 

३९ और दूसरा उसी के समान है, तुम अपने पड़ौसी से स्वयं-समान प्रेम करोगे। 

४० इन्हीं दो आदेशों पर समस्त नियम, और पैगम्बर टँगे हुए हैं। 

४१ अब जैसे वो फैरिसी एक साथ एकत्रित थे, यीशु ने उन से पूछा, 

४२ कहते हुए, भई क्या सोचते हो तुम मसीहा के विषय में? किस का पुत्र है वो? वह उन से कहते हैं, मसीहा दाऊद का बेटा है। 

४३ यीशु उन से कहते हैं, तो फिर दाऊद उसे कैसे प्राण में प्रभु पुकारता है, कहता हुआ,

४४ प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, विराजमान हो जाओ तुम मेरे दाएँ हाथ पर, जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारा पायदान नहीं बना देता?

४५ अब यदि दाऊद उसे प्रभु पुकारता है, तो फिर वो उसका पुत्र कैसे है?

४६ और कोई भी व्यक्ति उन्हें एक भी शब्द उत्तर देने में सक्षम न था, न ही किसी ने भी उस दिन से उनसे कोई भी अन्य प्रश्न पूछने का साहस किया। 




तेईसवाँ अध्याय।  


१ तब यीशु जनौघ और अपने शिष्यों से बोले,

२ कहते हुए, लिपिक और फैरिसी मूसा के आसन पर बैठते है:

३ इसलिए वो सब कुछ जो वो तुम से अनुपालन करने के लिए कहते हैं, उसका अनुपालन करो और उसे करो; परन्तु उनके कर्मोंनुसार तुम मत करो; चूँकि वो कहते तो हैं, परन्तु करते नहीं हैं। 

४ क्योंकि वो भारी कठिन-भार ढोने हेतु बाँध कर उन्हें लोगों के कंधों पर लाद देते हैं; परन्तु वो स्वयं उन्हें अपनी एक भी उँगली से नहीं हिलाना चाहते हैं। 

५ बल्कि वो अपने सभी कार्य लोगों से ताके जाने के लिए करते हैं: वो अपने तावीज़ों को चौड़ा बनाते हैं, और अपने वस्त्रों के किनारों को बड़ा करते हैं,

६ और वो भोजों में सब से उच्च स्थानों को, और यहूदी-आराधनालयों में प्रमुख आसनों को,

७ और बाज़ारों में अभिवादनो को, और लोगों से रैबाय-रैबाय पुकारा जाना, पसंद करते हैं। 

८ परन्तु तुम स्वयं को रैबाय मत पुकारा जाने दो: चूँकि तुम्हारा गुरुवर एक ही है, मसीहा ही; और तुम सभी भाई-जन हो। 

९ और पृथ्वी पर किसी भी व्यक्ति को अपना पिता मत पुकारो: चूँकि तुम्हारे पिताश्री केवल एक ही हैं, जो स्वर्ग में हैं। 

१० न ही तुम गुरुवर पुकारे जाओ: चूँकि तुम्हारा गुरुवर एक ही है, मसीहा ही। 

११ परन्तु वो जो तुम्हारे बीच सब से महान है, तुम्हारा नौकर होगा। 

१२ और जो कोई भी स्वयं को पदोन्नत करेगा, पदावनत कर दिया जाएगा; और वो जो स्वयं को पदावनत करेगा, पदोन्नत कर दिया जाएगा।  

१३ परन्तु हाय पड़े तुम पर, लिपिकों और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! चूँकि तुम स्वर्ग का राज्य लोगों के समक्ष बंद कर देते हो: चूँकि न ही तुम स्वयं अन्दर जा रहे हो, न ही तुम उन्हें अनुमती दे रहे हो जो अन्दर जाने के लिए प्रवेश कर रहे हैं। 

१४ हाय पड़े तुम पर लिपिकों और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! क्योंकि तुम विधवाओं के घरों का भुख-भक्षण कर डालते हो, और झूठे दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करते हो: इसलिए तुम बृहत्तर दण्डाज्ञा प्राप्त करोगे। 

१५ हाय पड़े तुम पर, लिपिकों और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! क्योंकि तुम एक व्यक्ति को धर्मान्तरित बनाने के लिए जल-थल एक कर देते हो, और जब उसका धर्मान्तरण हो जाता है, तो तुम उसे अपने से दो-गुना बढ़कर नरक की सन्तान बना डालते हो। 

१६ हाय पड़े तुम अन्धे मार्गदर्शकों पर, जो कहते हो, जो कोई भी मन्दिर से वचन देता है, वो कुछ नहीं है; लेकिन जो कोई भी मन्दिर के सोने से वचन देता है, वही ऋणी है!

१७ तुम मूर्खों और अन्धों: क्या अधिक महान है, वो सोना, या वो मन्दिर जो उस सोने को पुनीत ठहराता है?

१८ और, जो कोई भी बलिवेदी से वचन देगा, वो कुछ नहीं है; परन्तु जो कोई भी उस पर रखी भेंट से वचन देगा, वही दोषी है!

१९ तुम मूर्खों और अन्धों: क्या अधिक महान है, वो भेंट, या वो बलिवेदी जो उस भेंट को पुनीत ठहराती है? 

२० इसलिए जो कोई भी बलिवेदी से वचन देगा, उसी बलिवेदी से ही, और उस पर रखी उन सभी वस्तुओं से वचन देता है। 

२१ और जो कोई भी मन्दिर से वचन देगा, वो मन्दिर से, और उन्हीं से ही वचन देता है, जो वहीं उस में वास करते हैं। 

२२ और वो जो स्वर्ग से वचन देगा, ईश्वर के सिंहासन से, और उन्हीं से वचन देता है, जो उस पर विराजमान हैं। 

२३ हाय पड़े तुम पर लिपिकों और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! क्योंकि तुम पुदीने, और सौंफ, और ज़ीरे का तो दसवाँ भाग भरते हो, परन्तु तुमने नियम के गम्भीर पहलूँओं, न्याय, दया और विश्वास का त्याग कर दिया है: ये तो तुम्हें करने ही चाहिए थे, दूसरों को अधूरा न छोड़ते हुए। 

२४ तुम अन्धे मार्गदर्शकों, जो मच्छर को तो छानते हो, परन्तु ऊँट को निगल लेते हो। 

२५ हाय पड़े तुम पर लिपिकों और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! क्योंकि तुम प्याले और थाली को बाहर से तो साफ़ करते रहते हो, लेकिन भीतर से वो डकैती और अतिक्रम से भरे हुए हैं। 

२६ ओ अन्धे फैरिसी, पहले जो प्याले और थाली के अन्दर है, उसे साफ़ कर दे, ताकि वो बाहर से भी साफ़ बन जाएँ! 

२७ हाय पड़े तुम पर लिपिकों और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! क्योंकि तुम सफ़ेदी से पुते हुए मक़बरों के समान हो, जो वास्तव में बाहर से तो सुन्दर दिखते हैं, परन्तु भीतर से वो मृत लोगों की हड्डियों, और समस्त गंदगियों से भरे हुए हैं। 

२८ इसी प्रकार ही, तुम भी बाहर से तो लोगों को नेक प्रतीत होते हो, परन्तु भीतर से तुम ढोंग और अधर्मता से भरे हुए हो। 

२९ हाय पड़े तुम पर लिपिकों और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! क्योंकि तुम पैग़म्बरों की मज़ारों का निर्माण करते हो, और नेकों के मक़बरों को सजाते हो,

३० और कहते हो, यदि हम अपने पित्रों के दिनो में होते, तो हम उनके साथ पैग़म्बरों के रक्त के भागीदार नहीं बने होते। 

३१ इसलिए तुम स्वयं अपने आप के ही गवाह बनते हो, कि तुम उन्हीं की सन्तानें हो जिन्होंने पैग़म्बरों को मार डाला। 

३२ तो इसलिए तुम अपने पित्रों की कसर पूरी कर लो। 

३३ अरे साँपों, तुम विषैले-सर्पों की पीढ़ियों, तुम नरक की दण्डाज्ञा से कैसे बच पाओगे? 

३४ इस कारण वश, देख लो, मैं तुम्हारे पास पैगम्बरों को, और विद्वानों को, और लिपिकों को भेज रहा हूँ: और इन में से कुछों को तुम मार डालोगे, और क्रूस पर चढ़ा दोगे; और कुछों को तुम अपने यहूदी-आराधनालयों में कोडों से पीटोगे, और इनका नगर-नगर अत्याचार करोगे:

३५ ताकि तुम पर ही वो समस्त नेक रक्त आ पड़े, जो पृथ्वी पर बहाया गया है, नेक हाबिल के रक्त से लेकर, बरकिया के बेटे ज़कर्याह के रक्त तक, जिसे तुम ने मन्दिर और बलिवेदी के बीच मार डाला। 

३६ सच में मैं कहता हूँ तुम से, यह सभी कुछ इसी पीढ़ी पर आ पड़ेगा। 

३७ ओ यरूशलेम-यरूशलेम, तुम जो पैगम्बरों को मार डालती हो, और उन पर, जिन्हें तुम्हारे पास भेजा जाता है, तुम पथराव कर देती हो, कितनी बार मैंने तुम्हारी सन्तानों को इकट्ठा कर लिया होता, जैसे एक मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंख तले इकट्ठा करती है, लेकिन तुमने ये नहीं चाहा!

३८ देखो, तुम्हारा घर तुम्हारे लिए उजाड़ छोड़ दिया गया है। 

३९ क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि अब से लेकर तुम मुझे तब तक नहीं देखोगी, जब तक तुम नहीं कहो दोगी, धन्य है वो जो प्रभु के नाम में आता है। 





चौबीसवाँ अध्याय।  


१ और यीशु बाहर चले गए, और मन्दिर से प्रस्थान कर लिया: और उनके शिष्य उनके पास उन्हें मन्दिर की इमारतें दिखाने आए। 

२ और यीशु ने उन से कहा, तुम ये सभी कुछ देख नहीं रहे हो? सच में मैं कहता हूँ तुम से, यहाँ एक के ऊपर एक भी पत्थर बचा नहीं रहेगा, जो नीचे नहीं गिरा दिया जाएगा। 

३ और जैसे वो जैतूनों के पहाड़ पर बैठे हुए थे, उनके शिष्य उनके पास निजी तौर से आए, कहते हुए, जी हमें बताएँ, कि ये सब बातें कब घटेंगी? और आपके आगमन का, और संसार के अन्त का क्या संकेत होगा?

४ और यीशु ने उत्तर दिया, और उन से कहा, ध्यान रखना कि कोई भी व्यक्ति तुम्हें धोखा न दे दे। 

५ क्योंकि मेरे नाम में कई आएँगे, कहते हुए, मैं मसीहा हूँ; और वो कईयों को धोखा दे देंगे। 

६ और तुम युद्धों, और युद्धों की अफ़वाहों के विषय में सुनोगे: देख लेना कि तुम विचलित मत होना: क्योंकि इन सभी बातों का घटना अनिवार्य है, परन्तु अन्त अभी नहीं है। 

७ क्योंकि राष्ट्र, राष्ट्र के विरुद्ध, और राज्य, राज्य के विरुद्ध उठ खड़ा होगा: और अकाल, महामारीयाँ, और भूकम्प विभिन्न स्थानो में आएँगे। 

८ यह सभी प्रसव-पीड़ा के आरम्भ हैं। 

९ तब वो तुम्हें पीड़ित करने के लिए प्रदान कर देंगे, और तुम्हें मार डालेंगे: और सभी राष्ट्र मेरे नाम वास्ते तुम से घृणा करेंगे। 

१० और तब कई अवरोधित हो जाएँगे, और एक दूसरे के साथ विश्वासघात कर देंगे, और एक दूसरे से घृणा करेंगे,

११ और कई झूठे पैगम्बर उठ खड़े होंगे, और कईयों को धोखा दे देंगे। 

१२ और चूँकि अधर्मता प्रचुर हो जाएगी, कईयों का प्रेम ठण्डा पड़ जाएगा। 

१३ परन्तु वो जो अन्त तक सहनशील रहेगा, उसी का बचाव हो जाएगा।  

१४ और समस्त संसार में इस राज्य के शुभ-समाचार का प्रवचन दिया जाएगा, सभी राष्ट्रों के प्रति एक साक्ष्य हेतु; और तब अन्त आ जाएगा। 

१५ इसलिए जब तुम दानिएल पैगम्बर द्वारा बोली गई, अति-घृणितता की उजाड़ता को पवित्र स्थान में खड़ा देखोगे, (जो कोई भी पढ़ रहा है, समझ लेने दो उसे:) 

१६ तब वो जो यहूदा में हैं, उन्हें पर्वतों में भाग जाने देना:

१७ वो जो घर की छत पर है, उसे नीचे मत आने देना, अपने घर में से कोई भी वस्तु लेने के लिए:

१८ न ही उसे जो खेत में है, अपने कपड़े लेने के लिए वापस मुड़ जाने देना। 

१९ और हाय पड़ेगी उन पर जो पेट से हैं, और जो दूध पिला रही हैं उन दिनो में!

२० परन्तु प्रार्थना करना कि तुम्हारा भागना न ही शीत-ऋतु में हो, न ही सैबथ के दिन पर:

२१ क्योंकि तब ऐसी महा-आपत्ती आएगी, जैसी संसार के आरम्भ से लेकर इस समय तक नहीं आई है, नहीं, न ही कभी आएगी। 

२२ और सिवाय इसके कि वो दिन घटा दिए जाएँ, कोई भी प्राणी बच नहीं पाएगा: परन्तु निर्वाचितों के वास्ते वो दिन घटा दिए जाएँगे।

२३ तब यदि कोई भी तुम से कहे, लो जी, मसीहा तो यहाँ है, या वहाँ; विश्वास मत कर लेना। 

२४ क्योंकि झूठे मसीहा, और झूठे पैगम्बर उठ खड़े होंगे, और वो बड़े संकेत और अद्धभुत चमत्कार दिखाएँगे; यहाँ तक कि यदि ये सम्भव हो सके, वो निर्वाचितों ही को धोखा दे देंगे। 

२५ देखो, मैंने तुम्हें यह पहले से ही बता दिया है। 

२६ इसलिए यदि वो तुम से कहते हैं, देखो तो, वो तो निर्जन-क्षेत्र में है; तो तुम वहाँ मत चले जाना: देखो, वो तो गुप्त कोठरियों में है; तो तुम विश्वास मत कर लेना। 

२७ क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकल कर, पश्चिम तक भी चमकती है; इसी प्रकार मनुष्य-पुत्र का भी आगमन होगा। 

२८ क्योंकि जहाँ कहिं भी शव है, वहीं गरुड़ एक साथ एकत्रित हो जाएँगे। 

२९ उन दिनो की आपत्ती के तुरन्त पश्चात ही सूर्य अन्धकार-मय हो जाएगा, और चंद्रमा अपना उजाला नहीं प्रदान करेगा, और स्वर्ग में से सितारे गिर जाएँगे, और स्वर्गों की शक्तियाँ झकझोर दी जाएँगी:

३० और तब स्वर्ग में मनुष्य-पुत्र का संकेत प्रकट होगा: और तब पृथ्वी की समस्त प्रजातियाँ शोक मनाएँगी, और वो स्वर्ग के मेघों में मनुष्य-पुत्र का शक्ति, और महा-महिमा के साथ आगमन होता हुआ देखेंगी। 

३१ और वो अपने दूतों को चिंघाड़े की एक बड़ी चिंघाड़ के साथ भेजेगा, और वो अपने निर्वाचितों का चारों वायुओं में से एक साथ संग्रहण कर लेंगे, स्वर्ग के एक छोर से लेकर दूसरे तक भी। 

३२ अब अंजीर के पेड़ का एक दृष्टांत सीख लो; जब उसकी डाल अभी कोमल ही होती है, और पत्ते उपजाती है, तो तुम जान जाते हो कि ग्रीष्म ऋतु निकट ही है:

३३ इसी प्रकार तुम, जब तुम यह सभी घटनाएँ देख लोगे, तो जान जाना कि वो निकट ही है, यहाँ तक कि द्वारों तक भी। 

३४ सच में मैं कहता हूँ तुम से, यह पीढ़ी तब तक समाप्त नहीं होगी, जब तक यह सभी बातें पूर्ण नहीं हो जाती हैं। 

३५ स्वर्ग और पृथ्वी गुज़रते चले जाएँगे, परन्तु मेरे शब्द गुज़रेंगे नहीं।

३६ लेकिन उस दिन, और उस घड़ी के विषय से कोई भी परिचित नहीं है, नहीं, स्वर्ग के दूत भी नहीं, बस केवल मेरे पिताश्री ही। 

३७ परन्तु जैसे नूह के दिन थे, वैसे ही मनुष्य-पुत्र का भी आगमन होगा। 

३८ क्योंकि जैसे उन दिनो में जो प्रलय से पहले थे, वो खाते और पीते, विवाह करते और विवाह में देते हुए थे, उसी दिन तक जब नूह ने संदूक में प्रवेश कर लिया था, 

३९ और वो जानते नहीं थे जब तक वो प्रलय आ चुका था, और उन सब को ले जा चुका था; इसी प्रकार ही मनुष्य-पुत्र का भी आगमन होगा। 

४० तब खेत में दो होंगे; एक को ले लिया जाएगा, और दूसरे को छोड़ दिया जाएगा। 

४१ दो स्त्रियाँ चक्की पर पीस रही होंगी; एक को ले लिया जाएगा, और दूसरी को छोड़ दिया जाएगा। 

४२ इसलिए सचेत रहो: क्योंकि तुम जानते नहीं हो कि किस घड़ी में तुम्हारे प्रभु आगमन कर रहे हैं। 

४३ परन्तु यह जान लो, कि यदि घर का मालिक यह जानता होता कि चोर किस पहर में आएगा, तो वो सचेत रहा होता, और उसने अपने घर पर सेंध नहीं लगने दी होती। 

४४ इसलिए तुम भी तैयार रहो: क्योंकि ऐसी घड़ी में, जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते, उसी में मनुष्य-पुत्र आ रहा है। 

४५ तो फिर वो विश्वसनीय और विद्वान सेवक कौन है, जिसे उसके प्रभु ने अपने घरबार का अध्यक्ष बना दिया है, उन्हें निर्धारित समय पर भोजन प्रदान करने हेतु? 

४६ धन्य है वो सेवक, जिसे उसका प्रभु, जब वो आता है, उसे यही करता हुआ पाता है। 

४७ सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि वो उसे अपनी समस्त सम्पत्ति का अध्यक्ष बना देगा। 

४८ परन्तु और यदि वो दुष्ट नौकर अपने मन में कहता है, मेरे प्रभु तो अपने आगमन में विलम्ब कर रहे हैं;

४९ और वो अपने साथी-सेवकों को मारना-पीटना, और पियक्कड़ों के साथ खाना और पीना आरम्भ कर देता है;

५० तो इस नौकर का प्रभु उसी दिन आ जाएगा, जब वो उसकी राह नहीं देख रहा होगा, और उसी घड़ी में, जिस से वो परिचित नहीं है,

५१ और उसे काट कर दो टुकड़ों में कर देगा, और वो उसका भाग ढ़ोंगीयों के साथ नियुक्त कर देगा: वहीं रोना-धोना और दाँत पीसना होगा। 



पच्चीसवाँ अध्याय।  


१ तब स्वर्ग का राज्य दस कुँवारियों से समानतानित होगा, जो अपने दीपक लेकर दुल्हे से मिलने निकल पड़ीं। 

२ और उन में से पाँच विद्वान थीं, और पाँच मूर्ख: 

३ अब वो जो मूर्ख थीं, उन्होंने अपने दीपक तो ले लिए, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया:

४ परन्तु उन विद्वान कुँवारियों ने अपने पात्रों में तेल रख लिया, अपने दीपकों के साथ। 

५ अब जैसे दुल्हा विलम्बन कर रहा था, तो वो सभी झपकियाँ लेने लग गईं, और सो गईं। 

६ और मध्य रात्रि में एक चीख पुकारी गई, भई देखो, दुल्हा आ रहा है! बाहर चली जाओ तुम उस से मिलने। 

७ तब वो सभी कुँवारियाँ उठ गईं, और अपने दीपकों को तैयार करने लग गईं। 

८ और उन मूर्खों ने उन विद्वानो से कहा, अपने तेल में से हमें दे दो; क्योंकि हमारे दीपक तो बुझ गए हैं। 

९ परन्तु उन विद्वानो ने उत्तर दिया, कहती हुईं, ऐसे नहीं; कहिं हमारे और तुम्हारे लिए समुचित न रहे: बल्कि तुम तेल बेचने वालों के पास चली जाओ, और अपने लिए तेल खरीद लो। 

१० और उनके तेल खरीदने हेतु विदा होते-होते ही, वो दुल्हा आ पहुँचा; और वो जो तैयार थीं, उसके साथ विवाह में अंदर चली गईं: और द्वार बंद कर दिया गया। 

११ तत्-पश्चात् वो अन्य कुँवारियाँ भी आईं, कहती हुईं, प्रभु जी-प्रभु जी, हमारे लिए द्वार खोल दें जी! 

१२ परन्तु उसने उत्तर दिया और कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, मैं तुम्हें नहीं जानता। 

१३ इसलिए जागते रहो, चूँकि न ही तुम उस दिन से परिचित हो, न ही उस घड़ी से, जिस में मनुष्य-पुत्र आगमन कर रहा है। 

१४ क्योंकि स्वर्ग का राज्य उस व्यक्ति के समान है, जो किसी दूर देश में यात्रा पर जा रहा है, जिसने अपने नौकरों को बुलाया, और उन्हें अपनी सम्पत्ती प्रदान कर दी। 

१५ और एक को उसने पाँच तलनतन-भार दे दिए, दूसरे को दो, और तीसरे को एक; प्रत्येक व्यक्ति को उसी के अपने ही सामर्थ्यानुसार; और तुरन्त ही वो अपनी यात्रा पर चला गया। 

१६ तब वो जिसने पाँच तलनतन-भार ग्रहण किए थे, गया और उसने उन से व्यापार किया, और पाँच अन्य तलनतन-भार प्राप्त कर लिए । 

१७ इसी प्रकार उसने, जिसने दो तलनतन-भार ग्रहण किए थे, उसने भी दो और प्राप्त कर लिए। 

१८ परन्तु जिसने एक तलनतन-भार ग्रहण किया था, उसने जाकर अपने प्रभु के तलनतन-भार को धरती खोद कर, उस में छुपा दिया। 

१९ अब एक दीर्घ-काल पश्चात उन नौकरों का प्रभु पधार कर उनके साथ संगणन करने लगता है। 

२० और वो जिसने पाँच तलनतन-भार ग्रहण किए थे आया, और वो अन्य पाँच तलनतन-भार भी ले आया, कहता हुआ, प्रभु, जी आपने मुझे पाँच तलनतन-भार प्रदान किए थे: देखें मैंने उनके अतिरिक्त पाँच अन्य तलनतन-भार प्राप्त कर लिए हैं। 

२१ तो उसके प्रभु ने उस से कहा, बहुत बढ़िया किया तुमने, तुम अच्छे और भरोसेमंद नौकर: तुम कुछ ही वस्तुओं में भरोसेमंद रहे हो, मैं तुम्हें कई वस्तुओं पर अध्यक्ष बनाऊँगा: सम्मिलित हो जाओ तुम अपने प्रभु के आनंद में। 

२२ वो भी जिसने दो तलनतन-भार ग्रहण किए थे आया, और उसने कहा, आपने मुझे दो तलनतन-भार प्रदान किए थे: देखें जी, मैंने उनके अतिरिक्त दो अन्य तलनतन-भार प्राप्त कर लिए हैं।

२३ उसके प्रभु ने उस से भी कहा, बहुत बढ़िया किया तुमने, तुम अच्छे और भरोसेमंद नौकर: तुम कुछ ही वस्तुओं में भरोसेमंद रहे हो, मैं तुम्हें कई वस्तुओं पर अध्यक्ष बनाऊँगा: सम्मिलित हो जाओ तुम अपने प्रभु के आनंद में। 

२४ तो फिर वो आया जिसने एक तलनतन-भार ग्रहण किया था, और उसने कहा, प्रभु जी, मैं जानता था कि आप तो कठोर हैं, आप वहाँ कटाई करते हैं, जहाँ आपने बोया नहीं है, और आप वहाँ एकत्रित करते हैं, जहाँ आपने पछोरा नहीं है:

२५ और मैं डर गया था, और मैंने जाकर आपका तलनतन-भार घरती में छुपा दिया: लो जी, ये रहा आपका, जो है आपका। 

२६ तब उसके प्रभु ने उसे उत्तर दिया, और उस से कहा, तुम दुष्ट और आलसी नौकर, तुम जानते थे कि मैं वहाँ कटाई करता हूँ, जहाँ मैंने बोया नहीं है, और मैं एकत्रित करता हूँ जहाँ मैंने पछोरा नहीं है:

२७ इसलिए तुम्हें मेरा पैसा महाजनो के पास जमा करा देना चाहिए था, ताकि मेरे आगमन पर मैंने वो जो मेरा है, ब्याज़ समेत ग्रहण कर लिया होता। 

२८ इसलिए ले लो वो तलनतन-भार इस से, और उसे दे दो जिस के पास दस तलनतन-भार हैं। 

२९ क्योंकि प्रत्येक को जिसके पास है, उसे दे दिया जाएगा, और उसके पास बहुतायत होगी: परन्तु उसके पास से, जिसके पास नहीं है, उस से वही ले लिया जाएगा जो उसके पास है। 

३० और तुम इस अलाभकारी नौकर को बाहरी अन्धकार में फैंक डालो; वहीं रोना-धोना और दाँत पीसना होगा। 

३१ जब मनुष्य-पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सभी पवित्र दूत उसके संग होंगे, तब वो अपनी महिमा के सिंहासन पर विराजमान होगा:

३२ और उसके समक्ष सभी राष्ट्र एकत्रित होंगे: और वो उन्हें एक को दूसरे से पृथक कर देगा, जैसे एक चरवाहा अपनी भेड़ों को बकरों से विभाजित कर देता है। 

३३ और वो उन भेड़ों को अपने दाएँ हाथ पर स्थित कर देगा, परन्तु बकरों को वो अपने बाएँ हाथ पर। 

३४ तब वो राजा उनसे कहेगा जो उसके दाएँ हाथ पर हैं, आ जाओ तुम मेरे पिताश्री द्वारा आशीषित, वो राज्य विरासत में ले लो, जिसे संसार की नीव से तुम्हारे लिए उद्यत कर दिया गया है:

३५ क्योंकि मैं भूखा था, और तुमने मुझे भोजन दिया: मैं प्यासा था, और तुमने मुझे पेय दिया: मैं एक परदेशी था, और तुमने मुझे शरण दी:

३६ मैं नग्न था, और तुमने मुझे आवृत्त किया: मैं बीमार था, और तुमने मेरी सुध ली: मैं कारावास में था, और तुम मेरे पास आए। 

३७ तब वो नेक उसे उत्तर देंगे कहते हुए, प्रभु, हमने आपको कब भूखा देखा, और भोजन दिया? या प्यासा, और आपको पेय दिया?

३८ हमने आपको कब एक परदेशी देखा, और आपको शरण दी? या नग्न, और आपको आवृत्त किया?

३९ या हमने आपको कब बीमार देखा, या अन्दर कारावास में, और हम आपके पास आए?

४० और वो राजा उन्हें उत्तर देगा, और उनसे कहेगा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, चूँकी तुमने मेरे इन भाईयों में से सब से न्यूनतम में से एक ही के साथ यह किया है, तुम ने ये मेरे साथ कर दिया है। 

४१ तब वो राजा उन से भी कहेगा जो उसके बाएँ हाथ पर हैं, मुझ से दूर चले जाओ उस अनंतकालिक अग्नि में तुम शापितों, जो दानव और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है:

४२ क्योंकि मैं भूखा था, और तुमने मुझे भोजन नहीं दिया: मैं प्यासा था, और तुमने मुझे पेय नहीं दिया:

४३ मैं एक परदेशी था, और तुमने मुझे शरण नहीं दी: मैं नग्न था, और तुमने मुझे आवृत्त नहीं किया: मैं बीमार था, और मैं अन्दर कारावास में था, और तुमने मेरी सुध नहीं ली। 

४४ तब वो भी उसे उत्तर देंगे, कहते हुए, प्रभु, हमने आपको कब भूखा देखा, या प्यासा, या एक परदेशी, या नग्न, या बीमार, या कारावास के अन्दर, और आपकी सेवा नहीं की?

४५ तब वो राजा उन्हें उत्तर देगा कहता हुआ, सच में मैं कहता हूँ तुमसे, चूँकि तुमने इन में से सब से न्यूनतम में से एक के साथ भी ये नहीं किया, तुमने ये मेरे साथ नहीं किया।

४६ और यह अनंतकालिक दण्ड भोगने चले जाएँगे: परन्तु वो नेक अन्तहीन जीवन में। 



छब्बीसवाँ अध्याय।  


१ और यह होने को आया, कि जब यीशु ने इन सभी कथनो को समाप्त कर दिया था, तो उन्होंने अपने शिष्यों से कहा,

२ तुम जानते हो कि दो दिन पश्चात पार-करने का भोज है, और मनुष्य-पुत्र क्रूस पर चढ़ा देने के लिए पकड़वा दिया जाएगा। 

३ तब प्रमुख पुरोहित, और लिपिक, और लोगों के वृद्ध-गण, काइफा नामक उच्च पुरोहित के राज-भवन में एक साथ एकत्रित हुए,

४ और परामर्श किया, कि वो यीशु को चालाकी से पकड़ कर उनकी हत्या कर दें। 

५ परन्तु उन्होंने कहा, भोज के दिवस पर नहीं, कहिं लोगों के बीच उत्पात न मच जाए। 

६ अब जब यीशु बेतनियाह में, सिमोन कुष्ठ-रोगी के घर में थे,

७ तो उनके पास एक स्त्री आई, जिसके पास एक सिलखड़ी के डब्बे में एक अति अन्मोल मरहम थी, और उसने उसे उनके सर पर उंडेल दिया, जैसे वो भोजन करने बैठे थे। 

८ परन्तु जब उनके शिष्यों ने ये देखा, तो वो क्षोभित हो उठे, कहते हुए, यह मरहम किस उद्देश्य से व्यर्थ की जा रही है?

९ क्योंकि यह मरहम तो बहुत मोल के लिए बेच कर, दरिद्रों को प्रदान कर दी जा सकती थी। 

१० जब यीशु ने यह समझ लिया था, तो उन्होंने उनसे कहा, तुम क्यों इस स्त्री को सता रहे हो भई? क्योंकि इसने तो मुझ पर एक अच्छा कार्य किया है। 

११ क्योंकि दरिद्र तो तुम्हारे साथ सर्वदा रहते हैं; परन्तु मैं तुम्हारे साथ सर्वदा नहीं रहूँगा। 

१२ चूँकी इसने यह मरहम मेरे देह पर उँडेल दी है, इसने यह मेरे दफ़्न हेतु कर दिया है। 

१३ सच में मैं कहता हूँ तुम से, जहाँ कहीं भी इस समस्त संसार में इस शुभ-समाचार का प्रवचन दिया जाएगा, यह भी प्रचारित कर दिया जाएगा जो इस स्त्री ने किया है, इसकी स्मृति में। 

१४ तब उन बारह में से एक, यूदस इस्करियोती कहलाया जाने वाला, प्रमुख पुरोहितों के पास चला गया,  

१५ और उसने उनसे कहा, तुम मुझे क्या दोगे, और मैं उसे तुम्हारे हाथ पकड़वा दूँ? और उन्होंने उसके साथ चाँदी के तीस टुकड़ों का एक प्रतिज्ञापत्र बना लिया। 

१६ और उसी समय से यूदस यीशु के साथ विश्वासघात करने का अवसर ढूँढने लग गया। 

१७ अब बेख़मीरी रोटी के भोज के पहले दिन, शिष्य यीशु के पास आए उन से कहते हुए, जी आपकी क्या इच्छा है कि हम आपके पार-करने को खाने की कहाँ तैयारी करें जी?

१८ और उन्होंने कहा, नगर में उस एक व्यक्ति के पास चले जाओ, और उस से कहो, गुरुवर कह रहे हैं, मेरा समय निकट आ गया है; मैं तुम्हारे ही घर में अपने शिष्यों के साथ पार-करना रखूँगा। 

१९ और शिष्यों ने वैसा ही किया जैसा यीशु ने उन्हें निर्धारित कर दिया था; और उन्होंने पार-करना तैयार कर दिया। 

२० तो अब जब सन्ध्या हो चली थी, तो वो उन बारह के साथ बैठ गए। 

२१ और जैसे वो भोजन कर रहे थे, तो उन्होंने कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि तुम में से एक मेरे साथ विश्वासघात करेगा। 

२२ और वो अत्याधिकता से शोकार्तित हो गए, और उन में से प्रत्येक उन से कहने लगा, प्रभु क्या वो मैं हूँ?

२३ और उन्होंने उत्तर दिया और कहा, वो जो अपना हाथ मेरे साथ इस थाली में डाल रहा है, वही मेरे साथ विश्वासघात करेगा। 

२४ मनुष्य-पुत्र जा रहा है, जैसा उसके विषय में लिखा हुआ है: परन्तु हाय पड़े उस व्यक्ति पर, जिस से मनुष्य-पुत्र विश्वासघातित है! उस व्यक्ति के लिए यह अच्छा होता कि उसका जन्म ही नहीं हुआ होता। 

२५ तब यूदस ने, जिसने उनके साथ विश्वासघात किया था, उत्तर दिया और कहा, रैबाय क्या वो मैं हूँ? वह उस से कहते हैं, तुम्हीं ने कह दिया है। 

२६ और जैसे वह खा रहे थे, यीशु ने रोटी ली, और उसे आशीष दिया, और उसे तोड़कर अपने शिष्यों को दे दिया, और कहा, लो खा लो; यही मेरा शरीर है। 

२७ और उन्होंने वो प्याला लिया, और धन्यवाद दिया, और उसे उन्हें दे दिया, कहते हुए, पी लो तुम सभी इस से;

२८ चूँकि यह नए अनुबंध का मेरा रक्त है, जो कईयों के लिए बहा है, पापों को मिटा देने हेतु। 

२९ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि अब से लेकर मैं उस दिन तक, इस लता के फल में से नहीं पीयूँगा, जब तक मैं इसे तुम्हारे साथ अपने पिताश्री के राज्य में नया नहीं पी लूँगा। 

३० और जब उन्होंने एक स्तोत्र गा लिया था, तो वो बाहर जैतूनों के पहाड़ पर चले गए।  

३१ तब यीशु उन से कहते हैं, तुम सभी इस रात मेरे कारण अवरोधित हो जाओगे: चूँकि यह लिखा है, मैं चरवाहे को मार डालूँगा, और झुण्ड के भेड़ बाहर बिखर जाएँगे। 

३२ परन्तु मेरे पुनः उठ जाने के पश्चात, मैं तुम से पहले गलील चला जाऊँगा। 

३३ पतरस ने उत्तर दिया, और उन से कहा, चाहे सभी लोग आपके कारण अवरोधित हो जाएँ, तथापि मैं तो कभी भी अवरोधित नहीं हूँगा जी। 

३४ यीशु उस से कहते हैं, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि इसी रात, मुर्गे के बाँग देने से पहले ही, तुम मुझे तीन बार अस्वीकार कर दोगे। 

३५ पतरस ने उन से कहा, चाहे मैं आपके साथ मर भी क्यों न जाऊँ, तथापि मैं आपको अस्वीकार नहीं करूँगा। इसी प्रकार उन सभी शिष्यों ने भी कहा। 

३६ तब यीशु उनके साथ गतसमनी नामक एक स्थान में आ जाते हैं, और वो शिष्यों से कहते हैं, तुम यहीं बैठ जाओ, जैसे मैं उधर वहाँ जाकर प्रार्थना करता हूँ। 

३७ और उन्होंने पतरस और ज़ब्दी के दो बेटों को अपने साथ लिया, और यीशु शोकार्तित और अति यातनित होने लग गए। 

३८ तब वह उन से कहते हैं, मेरी आत्मा अत्याधिक शोकार्तित है, मृत्यु तक भी: ठहरो तुम यहीं, और मेरे साथ जागते रहो। 

३९ और यीशु थोड़ी ही दूर गए, और वो अपने चहरे के बल गिर पड़े, और प्रार्थना की, कहते हुए, हे मेरे पिताश्री, जी यदि यह सम्भव हो सके, तो इस प्याले को मुझ से परे चले जाने दें: तथापि मेरी इच्छानुसार नहीं, बल्कि जैसी आप की इच्छा हो। 

४० और वो शिष्यों के पास आते हैं, और उन्हें सोता हुआ पाते हैं, और पतरस से कहते हैं, यह क्या! तुम मेरे साथ एक घंटा भी नहीं सचेत रह सके?

४१ जागते रहो और प्रार्थना करो, कि तुम प्रलोभन में न पड़ जाओ: प्राण तो वास्तव में इच्छुक है, परन्तु शरीर दुर्बल है। 

४२ यीशु पुनः दूसरी बार चले गए, और उन्होंने प्रार्थना की, कहते हुए, हे मेरे पिताश्री, जी यदि यह प्याला मुझ से परे न चला जाए, सिवाय इसके कि मैं इसे पीयूँ, आप ही की इच्छा पूर्ण हो। 

४३ और वह वापस आए, और पुनः उन्हें सोता हुआ पाया: क्योंकि उन शिष्यों की आँखें भारी थीं। 

४४ और यीशु उन्हें छोड़कर, पुनः चले गए, और उन्होंने तीसरी बार उन्हीं शब्दों को दोहराते हुए प्रार्थना की। 

४५ तो फिर वो अपने शिष्यों के पास आकर, उनसे कहते हैं, सोते रहो अब, और अपना विश्राम कर लो: देखो, वो घड़ी निकट है, और मनुष्य-पुत्र पापियों के हाथों में विश्वासघातित है। 

४६ उठो, हम चले जाते हैं: देखो, वो निकट ही है जो मेरे साथ विश्वासघात कर रहा है!

४७ और जैसे वो बोल ही रहे थे, लो, प्रमुख पुरोहितों और लोगों के वृद्धों के पास से, उन बारह में से एक, यूदस आ धमका, और उसके साथ एक बड़ा जनौघ था, तलवारें और लट्ठे लिए। 

४८ अब उसने जिसने यीशु के साथ विश्वासघात किया था, उसने एक संकेत दिया था, कहते हुए, जिस किसी को भी मैं चूमूँगा, वही है वो: कस कर पकड़ लेना उसे। 

४९ और वो झट से यीशु के पास आ गया, और उसने कहा, जय हो मालिक; और उसने उन्हें चूम लिया। 

५० और यीशु ने उस से कहा, मित्र, किसलिए आए हो तुम? तब वो आ गए, और उन्होंने यीशु पर अपने हाथ डाल कर उन्हें पकड़ लिया। 

५१ और देखो, यीशु के साथ जो थे, उन में से एक ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर, अपनी तलवार खींची, और उच्च पुरोहित के एक नौकर पर वार कर दिया, और उसका कान काट डाला। 

५२ तब यीशु ने उस से कहा, अपनी तलवार को पुनः उसके स्थान में डाल दो: क्योंकि वो सभी जो तलवार उठाते हैं तलवार से ही नष्ट हो जाते हैं। 

५३ तुम सोचते हो कि मैं इसी समय अपने पिताश्री से प्रार्थना नहीं कर सकता, और वो मुझे इसी समय दूतों के बारह लशकरों से भी अधिक नहीं दे देंगे क्या?

५४ परन्तु फिर शास्त्रों की पूर्ती कैसे हो सकेगी, कि इसे ऐसा ही होना है? 

५५ उसी घड़ी में यीशु ने उन भीड़ों से कहा, क्या तुम मुझे तलवारों और लट्ठों के साथ ऐसे पकड़ने निकले हो, जैसे किसी चोर को? मैं दिन-प्रतिदिन तुम्हारे साथ मन्दिर में बैठता था सिखाता हुआ, और तुम ने मुझे नहीं पकड़ा। 

५६ परन्तु यह सब किया गया था, ताकि पैगम्बरों के शास्त्रों की पूर्ती हो जाए। तब सभी शिष्य उन्हें त्याग कर, भाग खड़े हुए। 

५७ और जिन्होंने यीशु को पकड़ लिया था, वही उन्हें उच्च पुरोहित काइफा के पास ले गए, जहाँ लिपिक और वृद्ध-गण एकत्रित थे। 

५८ परन्तु पतरस यीशु का दूर से पीछा करता हुआ, उच्च पुरोहित के राज-भवन तक आ गया, और उसने अन्दर प्रवेश कर लिया, और वो उन नौकरों के साथ बैठ गया, अन्त देखने के लिए। 

५९ तो अब वो प्रमुख पुरोहित, और वृद्ध-गण, और समस्त परिषद, यीशु के विरुद्ध झूठी गवाही ढूँढ रहे थे, उन्हें मृत्युदण्ड दिलवा देने के लिए; 

६० परन्तु वो कोई भी न पा सके: हाँ, जब कि कई झूठे गवाह आए, तब भी वो कोई भी झूठी गवाही न पा सके। तो फिर अन्त में दो झूठे गवाह आए,

६१ और उन्होंने कहा, इस बंदे ने कहा था, मैं ईश्वर के मन्दिर को नष्ट करने में, और उसका तीन दिनों में निर्माण करने में सक्षम हूँ। 

६२ और उच्च पुरोहित उठ गया, और उसने यीशु से कहा, भई तू तो कोई भी उत्तर नहीं दे रहा है? क्या है ये, जो ये तेरे विरुद्ध गवाही दे रहे हैं?

६३ परन्तु यीशु चुप रहे। और उस उच्च पुरोहित ने उत्तर दिया, और उन से कहा, तुझे जीवन्त ईश्वर की सौगंध, कि तू हमें बता दे, यदि तू ईश्वर का बेटा मसीहा है या नहीं। 

६४ यीशु उस से कहते हैं, तुम्हीं ने कह दिया है: तथापि मैं कहता हूँ तुम से, अब से लेकर तुम मनुष्य-पुत्र को शक्ति के दाएँ हाथ पर विराजमान, और स्वर्ग के मेघों में आगमन करता हुआ देखोगे। 

६५ तब उच्च पुरोहित ने अपने कपड़े फाड़ डाले, कहते हुए, भई इसने तो ईश्वर-निंदा कर दी है; अब हमें गवाहों की और क्या आवश्यकता है? देखो, अब तुम ने ही इसकी ईश्वर-निंदा सुन ली है। 

६६ क्या सोचते हो तुम? और उन्होंने उत्तर दिया और कहा, भई ये तो मृत्युदण्ड का दोषी है। 

६७ तब उन्होंने यीशु के चेहरे पर थूका, और उन्हें घूँसे मारे; और औरों ने उन्हें हाथों की हथेलियों से थपेड़ा,

६८ कहते हुए, मसीहा अपने प्रेरित-उपदेश से हमें बता दे, भई कौन है वो जो तुझे मार रहा है?

६९ तो अब पतरस, राज-भवन में बाहर बैठा हुआ था: और एक किशोरी उसके पास आई, कहती हुई, तू भी तो गलील के यीशु के साथ ही था। 

७० परन्तु उसने उन सब के समक्ष यह अस्वीकार किया, कहते हुए, मैं नहीं जानता तुम क्या कह रही हो। 

७१ और जब पतरस बाहर बरामदे में चला गया था, एक और ने उसे देखा, और वो उनसे कहती है जो वहीं थे, यह बंदा भी नासरत के यीशु के साथ ही था। 

७२ और पुनः पतरस ने सौगन्ध खाकर यह अस्वीकार कर दिया, मैं इस आदमी को नहीं जानता भई।

७३ और इसके थोड़े से ही समय पश्चात, वो जो आस पास खड़े थे, उसके पास आ गए, और उन्होंने पतरस से कहा, अवश्य ही तू भी उन्हीं में से एक ही है: क्योंकि तेरी बोली तुझे दिखला रही है। 

७४ तब पतरस ने कोसना और सौगन्ध खाना आरम्भ कर दिया, कहता हुआ, भई मैं इस व्यक्ति को नहीं जानता! और तुरन्त ही मुर्गे ने बाँग दे दी। 

७५ और पतरस को यीशु का शब्द स्मरण में आया, जिन्होंने उस से कहा था, मुर्गे के बाँग देने से पहले ही तुम मुझे तीन बार अस्वीकार कर दोगे। और वो बाहर निकल चला, और कड़वाहट से रो पड़ा। 



सत्ताईसवाँ अध्याय।  


१ अब जब सुबह हो गई थी, तो सभी प्रमुख पुरोहितों और लोगों के वृद्ध-गणों ने यीशु के विरुद्ध उन्हें मृत्युदण्ड दिलवा देने हेतु परामर्श किया:

२ और जब उन्होंने उन्हें बाँध दिया था, तो वो उन्हें ले चले, और उन्हें राज्यपाल पोनतियुस पिलातुस को प्रदान कर दिया। 

३ तब यूदस ने, जिसने उनके साथ विश्वासघात किया था, जब उसने देखा कि उन्हें दण्डनीय घोषित कर दिया गया था, तो उसी ने स्वयं पछतावा किया, और वो पुनः उन चाँदी के तीस टुकड़ों को प्रमुख पुरोहितों और वृद्ध-गणों के पास ले आया,

४ कहता हुआ, मैंने तो पाप कर दिया है, कि मैंने निर्दोष रक्त के साथ विश्वासघात कर डाला है। और उन्होंने कहा, हमें इस से क्या लेना-देना? यह सब तो तुम जानो। 

५ और उसने वो चाँदी के टुकड़े मन्दिर में नीचे फैंक दिए, और प्रस्थान कर लिया, और जाकर स्वयं को फाँसी लगा ली। 

६ और उन प्रमुख पुरोहितों ने उन चाँदी के उन टुकड़ों को लेकर कहा, इन्हें कोषागार में रखना न्यायी नहीं है, चूँकि ये तो रक्त का मूल्य है। 

७ और उन्होंने परामर्श किया, और उन से कुम्हार का खेत खरीद लिया, उस में परदेशियों को दफ़नाने के लिए। 

८ इसलिए वो खेत इस दिन तक, रक्त का खेत, कहलाया जाता था। 

९ तब उसकी पूर्ति हुई थी, जो पैगम्बर यिर्मियाह द्वारा बोला गया था, कहते हुए, और उन्होंने वो चाँदी के तीस टुकड़े ले लिए, उनका मूल्य जिनका मूल्यांकन कर दिया गया था, जिनका मूल्यांकन उन्होंने किया जो इस्राएल की सन्तानों में से थे; 

१० और उन्होंने उन्हें कुम्हार के खेत के लिए दे दिया, जैसा प्रभु ने मुझे निर्धारित किया था। 

११ और यीशु राज्यपाल के समक्ष खड़े थे: और राज्यपाल ने उन से पूछा, कहते हुए, क्या तू यहूदियों का सम्राट है? और यीशु ने उस से कहा, तुम्हीं कह रहे हो। 

१२ और जब प्रमुख पुरोहित और वृद्ध-गण उन्हें दोषारोपित कर रहे थे, तो उन्होंने कोई भी उत्तर नहीं दिया। 

१३ तब पिलातुस ने उन से कहा, क्या तू सुन नहीं रहा है कि ये कितनी बातों की गवाही तेरे विरुद्ध दे रहे हैं?

१४ और उन्होंने उसे एक शब्द भी उत्तर में नहीं दिया; यहाँ तक कि राज्यपाल अति अचम्भित हो उठा। 

१५ अब उस भोज के अवसर पर, राज्यपाल की ये रीति थी, कि वो एक बंदी को लोगों की इच्छानुसार, रिहा कर दिया करता था। 

१६ और उनके पास उस समय एक कुख्यात बंदी था, जो बरअब्बा कहलाया जाता था। 

१७ इसलिए जब वो एक साथ एकत्रित हो गए थे, तो पिलातुस ने उन से कहा, किसे चाहते हो तुम, कि मैं तुम्हें रिहा कर दूँ? बरअब्बा को, या यीशु को, जो मसीहा कहलाया जाता है?

१८ चूँकि वो जानता था कि ईर्षा की जलन के कारण ही उन्होंने उसे प्रदान कर दिया था। 

१९ तो जब वो न्यायासन पर बैठ गया था, उसकी पत्नी ने उसे कहलवा भेजा, उन न्यायी पुरुष के साथ कुछ भी मत करना: चूँकि मैंने इस दिन एक स्वप्न में उनके कारण कई कष्ट झेले हैं। 

२० परन्तु उन प्रमुख पुरोहितों और वृद्धों ने जनौघ को विश्वस्त करवा दिया था, कि वो बरअब्बा की ही माँग करें, और यीशु को नष्ट कर डालें। 

२१ राज्यपाल ने उत्तर दिया और उन से कहा, भई क्या है तुम्हारी इच्छा, कि मैं इन दोनो में से किसे तुम्हें रिहा कर दूँ? उन्होंने कहा, बरअब्बा को। 

२२ पिलातुस उन से कहता है, फिर मैं यीशु के साथ क्या करूँ जो मसीहा कहलाया जाता है? वो सभी उस से कहते हैं, इसे क्रूस पर चढ़ जाने दो। 

२३ और राज्यपाल ने कहा, क्यों भई, क्या बुराई की है इसने? लेकिन वो तो और भी अधिक चीख पड़े, कहते हुए, इसे क्रूस पर चढ़ जाने दो। 

२४ जब पिलातुस ने देखा कि वो कुछ भी लाभकारी नहीं कर पा रहा था, बल्कि एक कोलाहल मचता जा रहा था, तो उसने पानी लिया, और जनौघ के समक्ष अपने हाथ धो डाले, कहते हुए, मैं निर्दोष हूँ इस न्यायोचित पुरुष के रक्त से: देख लेना तुम इसे। 

२५ तब सभी लोगों ने उत्तर दिया, और कहा, इसके रक्त का दोष हम पर, और हमारी सन्तानों पर पड़ने दो। 

२६ तब उसने बरअब्बा को उन्हें रिहा कर दिया: और जब उसने यीशु पर कोड़े पड़वा दिए थे, तो उसने उन्हें क्रूस पर चढ़वा देने के लिए प्रदान कर दिया। 

२७ तब राज्यपाल के सैनिक यीशु को प्रांतपति-निवास में ले आए, और उन्होंने सैनिकों की एक पूरी पलटन को उनके आस-पास एकत्रित कर लिया। 

२८ और उन्होंने उन्हें निर्वस्त्र कर दिया, और एक सुर्ख चौगा पहनवा दिया। 

२९ और जब उन्होंने एक काँटों का मुकुट गूँथ लिया था, तो उन्होंने उसे उनके सर पर पहना दिया, और एक सरकंडा उनके दाएँ हाथ में थमा दिया: और उन्होंने उनके समक्ष अपने घुटने टेके, और उनकी हँसी उड़ाई कहते हुए, जय हो, यहूदियों के सम्राट!

३० और उन्होंने उन पर थूका, और वो सरकंडा लिया, और उन्हें सर पर पीटा। 

३१ और उनकी हँसी उड़ा लेने के बाद, उन्होंने वो चौगा उन पर से उतार लिया, और उनके अपने ही वस्त्र उन्हें पहना दिए, और उन्हें क्रूस पर चढ़ाने ले चले। 

३२ और जैसे वो बाहर निकल रहे थे, उन्हें कुरेने का एक सिमोन नामक व्यक्ति मिला: उसे उन्होंने उनका क्रूस ढोने के लिए विवश कर दिया। 

३३ और जब वह गुलगुता कहलाए जाने वाले एक स्थान आ पहुँचे थे, अर्थात खोपड़ी का एक स्थान,

३४ तो उन्होंने उन्हें पीने के लिए सिरके के साथ पित्त मिला हुआ दिया: और जब उन्होंने उस से चख लिया था, तो उन्होंने उसे नहीं पिया। 

३५ और उन्होंने उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया, और पर्चियाँ डाल कर उनके वस्त्र बाँट लिए: ताकि उसकी पूर्ति हो जाए जो पैगम्बर द्वारा बोला गया था, उन्होंने अपने बीच मेरे वस्त्र बाँटे, और मेरे वस्त्रों पर उन्होंने पर्चियाँ डालीं। 

३६ और नीचे बैठ कर उन जनो ने उन पर पहरा दिया;

३७ और उनके शीर्ष के ऊपर उनका लिखित दोषारोपण स्थित कर दिया था, यह है यीशु, यहूदियों का सम्राट। 

३८ तब वहीं उनके साथ दो चोर क्रूस पर चढ़े हुए थे, एक दाएँ हाथ पर, और दूसरा बाएँ पर। 

३९ और वो जो गुज़रते चले जा रहे थे, अपने सर हिलाते हुए उन्हें गाली दे रहे थे, 

४० और कह रहे थे, तू जो मंदिर को नष्ट करता है, और उसका तीन दिनो में निर्माण कर देता है, बचाले अपने आप को। यदि तू ईश्वर का बेटा है, क्रूस पर से नीचे उतर आ। 

४१ इसी प्रकार प्रमुख पुरोहितों ने भी उनकी हँसी उड़ाते हुए, लिपिकों और वृद्धों के साथ कहा, 

४२ इसने तो औरों को बचाया है; अपने आप को ये नहीं बचा सकता। यदि यही इस्राएल का सम्राट है, तो इसे अभी ही क्रूस पर से नीचे उतर आने दो, और हम इस पर विश्वास कर लेंगे। 

४३ इसने ईश्वर पर भरोसा किया; उन्हें इसका इसी समय उद्धार कर लेने दें, यदि वो ये चाहें: क्योंकि यीशु ने कहा था, मैं ईश्वर का पुत्र हूँ। 

४४ उन चोरों ने भी, जो उनके साथ क्रूस पर चढ़े हुए थे, वही बकवाद किया। 

४५ अब छटी घड़ी से लेकर नौवीं घड़ी तक समस्त भूमि पर अन्धकार छा गया था,

४६ और लगभग नौवीं घड़ी में यीशु एक प्रबल वाणी से चीखे, कहते हुए, एलाय, एलाय, लामा साबाखथनाय? अर्थात, मेरे ईश्वर, मेरे ईश्वर, आपने मुझे क्यों त्याग दिया है?

४७ कुछों ने जो वहीं खड़े थे, जब उन्होंने ये सुना, कहा, ये आदमी तो एलियाह को पुकार रहा है। 

४८ और तुरन्त ही उन में से एक भागा, और उसने एक पानिसोख लेकर, उसे सिरके से भर दिया, और उसे एक सरकंडे पर लगाकर, उन्हें पीने के लिए दे दिया। 

४९ शेष लोगों ने कहा, भई रहने दो, देखते हैं हम कि यदि एलियाह इसे बचाने आता है या नहीं। 

५० और जब यीशु पुनः एक प्रबल वाणी से चीख लिए थे, तो उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। 

५१ और देखो तो, मन्दिर का पर्दा ऊपर से नीचे तक फट कर दो में हो गया; और पृथ्वी काँप उठी थी, और चट्टाने फट गई थीं;

५२ और कब्रें खुल गई थीं; और कई सोते हुए संतों के शरीर उठे,

५३ और उनके पुनरुत्थान के पश्चात, कब्रों में से ऊपर बाहर निकल आए, और पवित्र नगर में गए, और कईयों को प्रकट हुए। 

५४ अब जब उस शतपती ने, और उन्होंने जो उसके साथ यीशु पर पहरा दे रहे थे, उस भूकम्प और उन घटनाओं को देख लिया था, जो कर दी गई थीं, तो वो भीषणता से भयभीत हो उठे, कहते हुए, सच मुच यही ईश्वर के पुत्र थे!

५५ और वहीं कई स्त्रियाँ थीं जो दूर से देख रही थीं, जो गलील से यीशु के पीछे-पीछे चली थीं, उनकी सेवा करती हुई: 

५६ जिन में थी मरियम मेगदलीन, और मरियम, याकूब और योशी की माँ, और ज़ब्दी के बच्चों की माँ। 

५७ अब जब सन्ध्या हो चली थी, तो यूसुफ कहलाया जाने वाला, एरमथिया का एक धनवान व्यक्ति आया, जो स्वयं भी यीशु का शिष्य था:

५८ वो पिलातुस के पास गया, और उसने यीशु के शव के लिए याचना की। तब पिलातुस ने उसे शव प्रदान कर देने का आदेश दे दिया। 

५९ और जब यूसुफ ने शव ले लिया था, तो उसने उन्हें एक विमल छालटी के कपड़े से लपेट दिया,

६० और उन्हें अपनी नई मज़ार में लिटा दिया, जिसे उसने चट्टान में से कटवाया था: और उसने एक विशाल पत्थर उस मक़बरे के द्वार पर लुढ़का दिया, और वो चला गया। 

६१ और वहीं मरियम मेगदलीन, और वो दूसरी मरियम भी थी, मक़बरे के विपरीत बैठी हुईं। 

६२ अब अगले दिन, जो तैयारी के दिन के पश्चात था, प्रमुख पुरोहित और फैरिसी एक साथ पिलातुस के पास आए,

६३ कहते हुए, श्रीमान जी हमें स्मरण है कि उस कपटी ने कहा था, जब वो अभी भी जीवित ही था, तीन दिनो पश्चात मैं पुनः उठ जाऊँगा।

६४  इसलिए आदेश दे दें कि वो मक़बरा तीसरे दिन तक सुरक्षित कर दिया जाए, कहिं उसके शिष्य रात को आकर, उसे चुरा कर न ले जाएँ, और लोगों से कहें, भई वो तो मृतकों में से उठ गए हैं जी: इस प्रकार यह अन्तिम भूल पहली से भत्तर होगी। 

६५ पिलातुस ने उन से कहा, तुम्हें संतरी दे दिए जाते हैं: चले जाओ अपने पथ पर, और उसे जितना सुरक्षित कर सकते हो कर दो। 

६६ तो वो चले गए, और उन्होंने उस मक़बरे को सुरक्षित कर दिया, पत्थर पर मुहरबंदी लगा कर, और संतरी तैनात कर-कर। 




अट्ठाईसवाँ अध्याय।  


१ सैबथ के अन्त में, जैसे सप्ताह के प्रथम दिवस का प्रभात हो रहा था, मरियम मेगदलीन, और वो दूसरी मरियम मक़बरे को देखने आ गईं। 

२ और देखो, एक बड़ा भूकम्प हुआ: चूँकि प्रभु का दूत स्वर्ग से नीचे उतरा, और वो आया और उसने द्वार पर से उस पत्थर को परे लुढ़का दिया, और उस पर बैठ गया। 

३ उसका मुखमण्डल बिजली के जैसा था, और उसका वस्त्र हिम समरूप श्वेत था:

४ और उसके डर के मारे वो संत्री थर-थराने लग गए, और मृत-पुरुषों जैसे बन गए। 

५ और उस दूत ने उत्तर दिया और उन स्त्रियों से कहा, डरो मत तुम: क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम यीशु को ढूँढ रही हो, जिन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया गया था। 

६ वो यहाँ नहीं हैं: क्योंकि वो उठ चुके हैं, जैसा उन्होंने कहा था। आओ, देखो वो स्थान जहाँ प्रभु लेटे हुए थे। 

७ और शीघ्रता से चली जाओ, और उनके शिष्यों को बता दो कि वो मृतकों में से उठ चुके हैं; और देखो, वो तुम से पहले गलील जा रहे हैं; वहीं तुम उन्हें देखोगे: लो, मैंने तुम्हें बता दिया है। 

८ और उन्होंने शीघ्रता से, भय और बड़े ही आनंद सहित, मक़बरे से प्रस्थान कर लिया; और वो उनके शिष्यों को यह शब्द बताने के लिए दौड़ पड़ीं। 

९ और जैसे वो उनके शिष्यों को बताने जा ही रही थीं, कि देखो, यीशु उन से मिले, कहते हुए, सर्व जय हो। और वो आईं और उन्होंने उन्हें उनके चरणों से पकड़ लिया, और उनकी अर्चना की। 

१० तब यीशु ने उन से कहा, डरो मत: चली जाओ और बता दो मेरे भाईयों को, कि वो गलील चले जाएँ, और वहीं वो मुझे देखेंगे। 

११ अब जब वो प्रस्थान कर रही थीं, देखो, उन पहरेदारों में से कुछ नगर में आ गए, और उन्होंने प्रमुख पुरोहितों को उन सभी घटनाओं का समाचार दिया जो घट चुकी थीं। 

१२ और जब वो वृद्ध-गणों के साथ एकत्रित हो गए थे, और उन्होंने परामर्श कर लिया था, तो उन्होंने उन सैनिकों को ढेर सारा पैसा दे दिया, 

१३ कहते हुए, कि तुम कह देना, उसके शिष्य रात को आए थे, और हमारे सोते-सोते ही वो उसे चुरा कर ले गए। 

१४ और यदि यह बात राज्यपाल के कानो तक पहुँचती है, तो हम उसे मनवा लेंगे, और तुम्हें सुरक्षित करवा लेंगे। 

१५ तो उन्होंने वो पैसा ले लिया, और वैसा ही किया जैसा उन्हें सिखाया गया था: और इस बात का यहूदियों के बीच इस दिन तक आम प्रचलन है। 

१६ तब वह ग्यारह शिष्य गलील चले गए, उस पर्वत में जहाँ यीशु ने उन्हें नियुक्त किया था। 

१७ और जब उन्होंने उन्हें देखा, तो उन्होंने उनकी आराधना की: परन्तु कुछों ने संदेह किया। 

१८ और यीशु आए, और उन से बोले, कहते हुए, मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी में सम्पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिया गया है। 

१९ इसलिए जाओ तुम, और सभी राष्ट्रों को सिखाओ, उन्हें पिताश्री के नाम में, और पुत्र के नाम में, और पवित्र-प्राण के नाम में बपतिस्मित करते हुए:

२० उन्हें उन सभी बातें का अनुपालन सिखाते हुए जो कुछ भी मैंने तुम्हें आदेश दिए हैं: और लो, मैं तुम्हारे साथ सदैव हूँ, संसार के अन्त तक भी। तथास्तु। 



०८/१२/२०२१; 








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