मार्कुस: नया अनुबंध। (Mark)
पहला अध्याय।
१ ईश्वर के पुत्र, यीशु मसीह के शुभ समाचार का प्रारम्भ;
२ जैसा यह पैगम्बरों में लिखा हुआ है, देखें, मैं अपना संदेशवाहक आपके चहरे से पहले भेज रहा हूँ, जो आपका पथ आपके आगे तैयार करेगा।
३ जँगली-क्षेत्र में एक की वाणी चीखती हुई, प्रभु के पथ को उद्यत कर दो तुम, बना दो उनके पथों को सीधा।
४ योहन ने जँगली-क्षेत्र में बपतिस्मित किया, और पापों के परिहार के लिए मन-परिवर्तन के बपतिस्मा का प्रवचन दिया।
५ और समस्त यहूदा की भूमि, और वो जो यरूशलेम से थे, उसके पास वहीं बाहर गए, और वो सभी उसके द्वारा यर्दन नदी में बपतिस्मित हुए, अपने पापों को स्वीकार करते हुए।
६ और योहन पहने हुए था ऊँट के बाल, और अपनी कटि पर एक चमड़े की कमरपेटी; और वो टिड्डियाँ और जँगली शहद खाता था;
७ और उसने प्रवचन दिया, कहते हुए, एक मुझ से अधिक बलशाली मेरे बाद आ रहे हैं, जिनके जूतों का फीता भी मैं नीचे झुक कर ढीला करने के सुयोग्य नहीं हूँ।
८ मैंने तो वास्तव में पानी से तुम्हें बपतिस्मित किया है: लेकिन वो तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र-प्राण से करेंगे।
९ और उन दिनो में यह होने को आया, कि यीशु गलील के नासरत से आए, और वो योहन द्वारा यर्दन में बप्तिसमित हुए।
१० और तुरन्त ही पानी में से बाहर ऊपर आते हुए, उसने स्वर्गों को खुलते हुए, और उन पर प्राण को एक छोटे कबूतर सदृश नीचे उतरते हुए देखा:
११ और एक स्वर्गवाणी आई, कहती हुई, तुम मेरे अतिप्रिय पुत्र हो, जिस में मैं अतिप्रसन्न हूँ।
१२ और तुरन्त ही प्राण ने उन्हें जँगली-क्षेत्र में रवाना कर दिया।
१३ और वह वहाँ जँगली-क्षेत्र में चालीस दिन शैतान द्वारा परीक्षित किए गए; और वह वहीं जँगली जानवरों के साथ थे; और दूतों ने उनकी सेवा की।
१४ अब योहन के कारावास में डाले जाने के पश्चात, यीशु गलील में आ गए, ईश्वर के राज्य के शुभ-समाचार का प्रवचन देते हुए,
१५ और कहते हुए, समय की पूर्ती हो चुकी है, और ईश्वर का राज्य निकट है: मन-परिवर्तन कर लो तुम, और शुभ-समाचार पर विश्वास करो।
१६ अब जैसे वो गलील के समुद्र तट पर चल रहे थे, उन्होंने सिमोन, और उसके भाई अन्द्रेयास को समुद्र में एक जाल फेंकते हुए देखा: क्योंकि वह मछुआरे थे।
१७ और यीशु ने उन से कहा, मेरे पीछे-पीछे लग जाओ, और मैं तुम्हें मनुष्यों का मछुआरा बना दूँगा।
१८ और तुरन्त ही उन्होंने अपने जालों को त्याग दिया, और उनके पीछे-पीछे चल दिए।
१९ और जब वो वहाँ से कुछ ही दूर आगे गए, उन्होंने ज़ब्दी के बेटे याकूब, और उसके भाई योहन को देखा, जो जलयान के अन्दर थे, अपने जालों की मरम्मत करते हुए।
२० और तुरन्त ही उन्होंने उन्हें पुकारा: और वो अपने पिता ज़ब्दी को जलयान में भाड़े के नौकरों के साथ छोड़ कर, उनके पीछे-पीछे चल दिए।
२१ और वो जने कफरनहूम चले गए; और तुरन्त ही सैबथ के दिन पर यीशु ने यहूदी-आराधनालय में प्रवेश किया, और सिखाया।
२२ और वो उनकी शिक्षा से आश्चर्यचकित रह गए थे: चूँकि उन्होंने उन्हें एक प्राधिकारक के जैसे सिखाया, और न कि लिपिकों के जैसे।
२३ और वहीं उनके यहूदी-आराधनालय में एक व्यक्ति, किसी अस्वच्छ प्राण के वश में था; और वो चीख पड़ा,
२४ कहता हुआ, हमें अकेला छोड़ दें; हमें आपसे क्या लेना-देना आप नासरत के यीशु? क्या आप हमें नष्ट करने आएँ हैं? मैं जानता हूँ आप कौन हैं, ईश्वर के वही पवित्र-एक।
२५ और यीशु ने उसे डाँटा, कहते हुए, चुप कर जा, और इस में से बाहर निकल आ।
२६ और जब उस अस्वच्छ प्राण ने उसे झटकीले-दौरे दे दिए थे, तो वो एक प्रबल वाणी से चीख पड़ा, और उस में से बाहर निकल आया।
२७ और वो सभी इतने विस्मित हो गए थे, यहाँ तक कि उन्होंने आपस में यह प्रश्न उठाया, कहते हुए, भई क्या बात है ये? कैसी नवीन शिक्षा है ये? क्योंकि यह तो अस्वच्छ प्राणों को भी प्राधिकारिकता से आदेश देते हैं, और वो भी इनका पालन कर लेते हैं।
२८ और तुरन्त ही उनकी प्रसिद्धी बाहर गलील के चारों ओर के सर्वत्र प्रदेश में फैल गई।
२९ और झट से जब वह जन यहूदी-आराधनालय में से बाहर निकल आए थे, तो उन्होंने याकूब और योहन के साथ, सिमोन और अन्द्रेयास के घर में प्रवेश किया।
३० परन्तु सिमोन की पत्नी की माँ ज्वर से बीमार पड़ी थी, और उन्होंने झट-पट उन्हें उसके विषय में बता दिया।
३१ और वह आए और उन्होंने उसे हाथ से पकड़ा, और उसे ऊपर उठा लिया; और तुरन्त ही उस ज्वर ने उसे छोड़ दिया, और उसने उन जनो की सेवा की।
३२ और सन्ध्या के समय, जब सूर्य ढल चुका था, तो वो उनके पास उन सभी को ले आए जो रोगी थे, और जो दानवों के वश में थे।
३३ और वो समस्त नगर द्वार पर एक साथ एकत्रित हो गया था।
३४ और उन्होंने कईयों को स्वस्थ कर दिया जो विभिन्न रोगों से अस्वस्थ थे, और कई दानवों को बाहर निकाल फैंका; और उन्होंने दानवों को बोलने की अनुमती नहीं दी, क्योंकि वो उनसे परिचित थे।
३५ और सुबह-सुबह दिन चढ़ने से बहुत पहले ही, वह उठ कर बाहर किसी एकान्त स्थान में चले गए, और वहीं वो प्रार्थना कर रहे थे।
३६ और सिमोन और वो जो उनके साथ थे उनके पीछे-पीछे आए।
३७ और जब उन्होंने उन्हें पा लिया था, तो उन्होंने उन से कहा, सभी लोग आपको ढूँढ रहे हैं जी।
३८ और उन्होंने उन से कहा, चलो हम अन्य नगरियों में चले जाते हैं, ताकि मैं वहाँ भी प्रवचन दे सकूँ, क्योंकि इसी कारण वश ही तो मैं पधारा हूँ।
३९ और उन्होंने गलील के सर्वत्र में उनके यहूदी-आराधनालयों में प्रवचन दिए, और दानवों को बाहर निकाल फैंका।
४० और उनके पास एक कुष्ठ रोगी उन से विनती करता हुआ आया, उनकी ओर नीचे अपने घुटनो के बल उनसे कहता हुआ, यदी आप चाहें, आप मुझे विमल बना सकते हैं जी।
४१ और यीशु ने सम्वेदना से भरे हुए, अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसे छुआ, और वो उस से कहते हैं, मेरी यही इच्छा है, बन जाओ तुम विमल।
४२ और उनके बोलते-बोलते ही, तुरन्त ही वो कुष्ठ रोग उस से दूर हो गया, और वो विमल बन गया।
४३ और उन्होंने उसे कड़ाई से आज्ञा दी, और उसे झट से विदा कर दिया;
४४ और वह उस से कहते हैं, भई देख लेना कि तुम किसी से भी कुछ मत कहना: बल्कि अपने पथ पर चले जाओ, स्वयं को पुरोहित से दिखवा लो, और अपने स्वच्छीकरण के लिए उन वस्तुओं को चढ़ा दो जिनका मूसा ने आदेश दिया था, उनके प्रति एक साक्ष्य के लिए।
४५ परन्तु उस व्यक्ति ने बाहर जाकर इस घटना का ऐसा ढिंढोरा पीटना आरम्भ कर दिया, कि यीशु नगर मैं अब सरे आम प्रवेश ही नहीं कर सकते थे, बल्कि वह बाहर निर्जन-क्षेत्रों में ही थे: और लोग उनके पास प्रत्येक क्षेत्र से आया करते थे।
दूसरा अध्याय।
१ और पुनः कुछ दिनो पश्चात, उन्होंने कफरनहूम में प्रवेश किया; और यह सुनने में आया कि वह घर में थे।
२ और तुरन्त ही कई लोग एक साथ एकत्रित हो गए थे, यहाँ तक कि उनके लिए कोई स्थान ही नहीं बचा था कि वो अन्दर आ सकें, नहीं जी, द्वार के आस-पास भी नहीं: और उन्होंने उन्हें शब्द का प्रवचन दिया।
३ और वह उनके पास आते हैं, एक लकवे से बीमार को लाते हुए, जिसे चार व्यक्तियों ने उठाया हुआ था।
४ और जब वो भीड़ के कारण उनके निकट नहीं आ पा रहे थे, तो उन्होंने छत खोल दी, वहीं जहाँ वो थे: और जब उन्होंने छत में छेद बना दिया था, तो उन्होंने उस बिस्तर को नीचे कर दिया, जिस में वो लकवे से बीमार व्यक्ति लेटा हुआ था।
५ जब यीशु ने उनका भरोसा देखा तो उन्होंने उस लकवे से बीमार को कहा, बेटे, तुम्हारे पाप तुम्हें क्षमा हुए।
६ परन्तु वहीं लिपिकों में से कुछ बैठे हुए थे, और वो अपने-अपने हृदयों में सोच-विचार कर रहे थे,
७ ये व्यक्ति इस प्रकार क्यों ईश्वर-निन्दाएँ बोल रहा है? केवल ईश्वर के सिवा, अन्य कौन पाप क्षमा कर सकता है?
८ और तुरन्त ही जब यीशु ने अपने प्राण में यह आभास कर लिया था, कि वो लिपिक इस प्रकार सोच-विचार कर रहे थे, तो उन्होंने उन से कहा, तुम क्यों इन बातों का अपने हृदयों में सोच-विचार कर रहे हो?
९ लकवे से बीमार से क्या कहना सरल है, तुम्हारे पाप तुम्हें क्षमा हों; या यह कहना, उठो, और अपना बिस्तर ले लो, और चलो?
१० इसलिए ताकी तुम जान लो कि मनुष्य-पुत्र के पास पृथ्वी पर पापों को क्षमा करने की शक्ति है, (वो लकवे से बीमार को कहते हैं,)
११ मैं कहता हूँ तुम से, उठो, और अपना बिस्तर ले लो, और अपने पथ पर अपने घर चले जाओ।
१२ और तुरन्त ही वो उठ गया, और उसने अपना बिस्तर लिया, और वो उन सभी के समक्ष बाहर चला गया; यहाँ तक कि उन सभी ने विस्मित होकर ईश्वर को गौरवान्वित किया, कहते हुए, हम ने तो ऐसा कदापि नहीं देखा!
१३ और वह पुनः बाहर समुद्र के किनारे चले गए, और सारे जनौघ का जमाव उनके पास हो गया, और उन्होंने उन्हें सिखाया।
१४ और जैसे वो चलते जा रहे थे, उन्होंने हलफई के बेटे लेवी को चुंगी-घर में बैठा हुआ देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ। और वो उठा, और उनके पीछे-पीछे आ गया।
१५ और यह होने को आया, कि जैसे यीशु उसके घर में भोजन के लिए बैठे थे, कई चुंगी-कर्मचारी और पापी भी एक साथ यीशु के और उनके शिष्यों के साथ बैठ गए: चूँकि वो कई थे, और वो उनके पीछे-पीछे आए थे।
१६ और जब लिपिकों और फैरिसीयों ने उन्हें पापियों और चुंगी-कर्मचारियों के साथ भोजन करते हुए देखा, तो उन्होंने उनके शिष्यों से कहा, यह चुंगी-कर्मचारियों और पापियों के साथ कैसे खा-पी रहे हैं भई?
१७ तो जब यीशु ने यह सुना, तो वो उनसे कहते हैं, वो जो स्वस्थ हैं उन्हें चिकित्सक की कोई आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें जो अस्वस्थ हैं: मैं नेकों को नहीं, बल्कि पापियों को मन-परिवर्तन के लिए बुलाने आया हूँ।
१८ और योहन और फैरिसियों के शिष्य उपवास रखते थे: और वो आकर उनसे कहते हैं, योहन और फैरिसियों के शिष्य उपवास क्यों रखते हैं, परन्तु आपके शिष्य उपवास नहीं रखते?
१९ और यीशु ने उन से कहा, क्या दुल्हन-कक्ष के सखा दूल्हे के उनके साथ रहते-रहते उपवास रखेंगे क्या? जब तक दूल्हा उनके पास है, वो उपवास नहीं रखेंगे।
२० परन्तु वो दिन आएँगे, जब दूल्हा उन से ले लिया जाएगा, और तब वो उन दिनो में उपवास रखेंगे।
२१ कोई भी व्यक्ति नए कपड़े का टुकड़ा पुराने वस्त्र पर नहीं सीता है: अन्यथा वो नया टुकड़ा जिसने उसे भरा था, पुराने में से ले लेता है, और वो चीरा भत्तर बन जाता है।
२२ और कोई भी व्यक्ति नए अंगूर-रस को पुरानी बोतलों में नहीं डालता है: अन्यथा नया अंगूर-रस बोतलों को फोड़ डालता है, और अंगूर-रस बिखर जाता है, और बोतलें नष्ट हो जाती हैं: बल्कि नया अंगूर-रस, नई बोतलों में ही डाला जाना चाहिए।
२३ और यह होने को आया, कि वो सैबथ के दिन अनाज के खेतों में से जा रहे थे; और उनके शिष्यों ने चलते-चलते अनाज की बालियों को तोड़ना आरम्भ कर दिया।
२४ और फैरिसियों ने उनसे कहा, देखो भई, यह सैबथ के दिन पर वो क्यों कर रहें हैं जो न्यायी नहीं है करना?
२५ और उन्होंने उन से कहा, क्या तुम ने कभी पढ़ा नहीं है कि दाऊद ने क्या किया था, जब उसे आवश्यकता पड़ी थी, और वो, और वो जो उसके साथ थे, भूखे थे?
२६ कि कैसे उसने उच्च पुरोहित अबिथर के दिनो में, ईश्वर के घर में प्रवेश कर, भेंट की रोटी खाई थी, जिसका खाना सिवाय केवल पुरोहितों के, औरों के लिए न्यायी नहीं है, और उसने वो भेंट की रोटी उन्हें भी दी जो उसके साथ थे?
२७ और उन्होंने उनसे कहा, सैबथ मनुष्य के लिए बनाया गया था, न कि मनुष्य सैबथ के लिए:
२८ इसलिए मनुष्य-पुत्र सैबथ का भी प्रभु है।
तीसरा अध्याय।
१ और उन्होंने पुनः यहूदी-आराधनालय में प्रवेश किया; और वहाँ एक व्यक्ति था जिसका हाथ सूखा हुआ था।
२ और वो इस ताक में थे, कि यदि वो उसे सैबथ के दिन पर स्वस्थ करते हैं या नहीं; ताकि वो उन पर दोषारोपण लगा सकें।
३ और वो उस व्यक्ति से कहते हैं जिसका हाथ सूखा हुआ था, आगे खड़े हो जाओ।
४ और वो उन से कहते हैं, क्या सैबथ के दिनो में अच्छा करना न्यायी है, या बुरा करना? जीवन बचाना, या जीवन ले लेना? परन्तु वह चुप रहे।
५ और जब उन्होंने उन्हें चारों ओर क्रोधित होते हुए देख लिया था, उनके हृदयों की कठोरता से पीड़ित होते हुए, तो वो उस व्यक्ति से कहते हैं, अपना हाथ आगे बढ़ाओ। और उसने उसे आगे बढ़ा दिया; और उसका हाथ दूसरे के समरूप स्वस्थ पुनःस्थापित हो गया।
६ और वह फैरिसी बाहर चले गए, और उन्होंने तुरन्त ही उनके विरुद्ध हेरोदेस-गण के साथ परामर्श किया, कि वह उन्हें कैसे नष्ट कर सकें।
७ परन्तु यीशु अपने शिष्यों के साथ उनसे अलग होकर समुद्र की ओर चले गए: और गलील से एक बड़ा जनौघ उनके पीछे-पीछे आया, और एक यहूदा से,
८ और यरूशलेम से, और इदुमिया से, और यर्दन पार से; और वो जो टाय्र और सिदोन के आस पास से थे, एक बड़े जनौघ ने, जब उन्होंने सुन लिया था कि उन्होंने कैसे बड़े-बड़े कारनामे किए थे, उनके पास आ गए।
९ और उन्होंने अपने शिष्यों से जनौघ के कारण बोला, कि वो उनके लिए एक छोटा जलयान लगातार तैयार रखें, कहिं जनौघ उनके आस पास भीड़-भाड़ न मचा दे।
१० क्योंकि उन्होंने कईयों को स्वस्थ कर दिया था; यहाँ तक कि वो उन पर धक्का-मुक्की मचा रहे थे उन्हें छूने के लिए, जितनों में भी विपत्तियाँ थीं।
११ और अस्वच्छ प्राणों ने जब उन्हें देखा, तो वो उनके समक्ष नीचे गिर पड़े, और चीखे, कहते हुए, आप ईश्वर के पुत्र हैं।
१२ और उन्होंने उन्हें कड़ाई से आदेश दिया कि वो उन्हें ज्ञात न करवाएँ।
१३ और वह ऊपर एक पर्वत पर चले जाते हैं, और अपने पास उसे बुलाते हैं, जिस किसी को भी उन्होंने चाहा: और वह उनके पास आ गए।
१४ और उन्होंने बारह को विहित-नियुक्त किया, कि वह उनके साथ-साथ रहें, और कि वह उन्हें प्रवचन देने के लिए भेज दें,
१५ और, कि उनके पास बीमारियों को स्वस्थ करने की, और दानवों को बाहर फेंक देने की शक्ति हो:
१६ और उन्होंने सिमोन को पतरस का उपनाम दिया;
१७ और ज़ब्दी के बेटे याकूब, और याकूब के भाई योहन को, उन्होंने बुआनेरगिस का उपनाम दिया, जिसका अर्थ है, गर्जन के बेटे:
१८ और अन्द्रेयास, और फिलिप, और बरतोलोमी, और मत्ती, और थोमस, और हलफई का बेटा याकूब, और थद्दई, और सिमोन कनानवासी,
१९ और यूदस इस्करियोती, जिसने उनके साथ विश्वासघात भी किया: और यह जन एक घर में चले गए।
२० और पुनः जनौघ एक साथ एकत्रित हो रहा था, कि वो रोटी भी नहीं खा सकते थे।
२१ और जब उनके सगे-सम्बन्धियों ने यह सुना, तो वो उन्हें पकड़ने बाहर निकल चले: क्योंकि उन्होंने कहा, भई ये तो बेसुध हो चला है!
२२ और उन लिपिकों ने जो यरूशलेम से नीचे आए थे, कहा, भई इस में तो बअलज़बूल है, और ये तो दानवों के शासक द्वारा ही दानवों को बाहर फेंकता है।
२३ और उन्होंने उन्हें अपने पास बुलाया, और उन से दृष्टांतों में कहा, शैतान कैसे शैतान को बाहर फैंक सकता है भई?
२४ और यदि कोई राज्य अपने ही विरुद्ध विभाजित हो, तो वो राज्य खड़ा नहीं रह सकता।
२५ और यदि कोई घर अपने ही विरुद्ध विभाजित हो, तो वो घर खड़ा नहीं रह सकता।
२६ और यदि शैतान अपने ही विरुद्ध उठ खड़ा हो जाएगा, और विभाजित हो जाता है, तो वो खड़ा नहीं रह सकता, बल्कि उसका अन्त हो जाता है।
२७ कोई भी किसी शक्तिमान व्यक्ति के घर में घुस कर, उसका सामान नहीं लूट सकता है, सिवाय इस के, कि वो पहले उस शक्तिमान व्यक्ति को बाँध दे; और तब वो उसका घर लूट सकेगा।
२८ सच में मैं कहता हूँ तुम से, मनुष्यों के बेटों के प्रति सभी पाप, और निंदाएँ, जैसी भी, जिन से वो निंदा करेंगे, क्षमा कर दी जाएँगी:
२९ परन्तु वो जो पवित्र-प्राण के विरुद्ध ईश्वर-निंदा करेगा, उसे कभी भी क्षमा नहीं मिलेगी, बल्कि वो अनन्त दण्डाज्ञा के संकट में है:
३० क्योंकि उन लोगों ने कहा था, कि उनके पास एक अस्वच्छ प्राण है।
३१ फिर वहीं उनके भाई और उनकी माँ आ गए, और, बाहर खड़े रहकर उन्होंने कहलवा भेजा, उन्हें बुलवाने के लिए।
३२ और वो जनौघ उनके आस-पास बैठा था, और उन लोगों ने उन से कहा, देखें जी, बाहर आपकी माँ और आपके भाई आपको ढूँढ रहे हैं।
३३ और उन्होंने उन्हें उत्तर दिया, कहते हुए, कौन है मेरी माँ, या मेरे भाई-जन?
३४ और उन्होंने आस-पास चारों ओर उन्हें देख कर जो उनके आस-पास बैठे हुए थे, कहा, देखो मेरी माँ और मेरे भाई-जन!
३५ क्योंकि जो कोई भी ईश्वर की इच्छा करेगा, वही मेरा भाई, और मेरी बहन, और मेरी माँ है।
चौथा अध्याय।
१ और उन्होंने पुनः समुद्र के किनारे सिखाना आरम्भ किया: और वहीं उनके पास एक बड़ा जनौघ एकत्रित हो गया था, तो उन्होंने एक जलयान में प्रवेश किया, और समुद्र में बैठ गए; और वो समस्त जनौघ समुद्र के साथ भूमि पर था।
२ और उन्होंने उन्हें दृष्टांतों द्वारा कई बातें सिखाईं, और उन से अपने उपदेश में कहा,
३ भई सुन लो तुम; देखो, एक बोनेवाला बाहर बोने निकला:
४ और यह होने को आया, कि जैसे वो बो रहा था, कुछ पथ के किनारे पर गिर पड़ा, और पवन के पक्षी आए और उन्होंने उसका भुख-भक्षण कर डाला।
५ और कुछ पथरीली धरती पर गिरा, जहाँ उसके पास अधिक मिट्टी नहीं थी; और वो झट से ऊपर उग गया, क्योंकि उसके पास गहरी मिट्टी नहीं थी:
६ परन्तु जब सूर्य ऊपर चढ़ गया था, तो वो भस्म हो चला; और चूँकि उसके पास कोई जड़ नहीं थी, वो मुरझाता चला गया।
७ और कुछ काँटों के बीच गिरा; और वो काँटे उग गए, और उन्होंने उसे घोंट दिया, और उसने कोई भी फल नहीं उपजाया।
८ और कुछ अच्छी धरती पर गिरा, और उसने फल उपजाए, जो ऊपर उग गए और बढ़े; और उत्पन्न किया, कुछ ने तीस, और कुछ ने साठ, और कुछ ने सौ।
९ और उन्होंने उनसे कहा, जिसके पास कान हैं सुनने के लिए, सुन लेने दो उसे।
१० और जब वह अकेले थे, तो वो जो उनके आस-पास उन बारह के साथ थे, उन्होंने उन से इस दृष्टांत के विषय में पूछा।
११ और उन्होंने उन से कहा, तुम्हें यह दिया गया है कि तुम ईश्वर के राज्य के रहस्य को जान लो: परन्तु उनके लिए जो बाहर हैं, यह सभी बातें दृष्टांतों में की जाती हैं:
१२ ताकि देखते हुए वो देखें, और आभास न करें; और सुनते हुए वो सुने, और न समझें; कहिं किसी भी समय वो वापस लौट आएँ, और उनके पाप उन्हें क्षमा कर दिए जाएँ।
१३ और उन्होंने उन से कहा, क्या तुम यह दृष्टांत नहीं जानते? तो फिर तुम अन्य दृष्टांतों को कैसे जान पाओगे भई?
१४ बोनेवाला शब्द को बोता है।
१५ और यह हैं वो जो पथ के किनारे पर हैं, जहाँ शब्द बोया गया है; परन्तु जब वो सुन लेते हैं, तो शैतान तुरन्त ही आकर, इनके हृदयों में से वो बोया गया शब्द उठा ले चला जाता है।
१६ और इस प्रकार वो यह हैं जो पथरीली धरती पर बोए गए हैं; जो, जब वो शब्द सुन लेते हैं, तो तुरन्त ही उसे हर्षितता के साथ ग्रहण कर लेते हैं;
१७ और इनके पास स्वयं में कोई भी जड़ नहीं है; तो यह कुछ ही समय तक झेलते हैं: तत्-पश्चात्, जब पीड़ा या अत्याचार शब्द के वास्ते आ जाते हैं, तो यह तुरन्त ही ठोकर खा जाते हैं।
१८ और यह हैं वो जो काँटों के बीच बोए गए हैं; ऐसे, जो शब्द को तो सुनते हैं,
१९ और इस संसार की चिंताएँ, और धन-धान्यों की धोखाधड़ियाँ, और अन्य वस्तुओं की वासनाएँ भीतर प्रवेश करती हुईं, शब्द को घोंट देती हैं, और वो निष्फल बन जाता है।
२० और यह हैं वो जो अच्छी धरती पर बोए गए हैं; ऐसे जो शब्द को सुनते हैं, और उसे ग्रहण कर लेते हैं, और फल उपजाते हैं, कुछ तीस गुणा, कुछ साठ, और कुछ सौ।
२१ और उन्होंने उन से कहा, क्या दीपक किसी मापने के बर्तन तले, या किसी बिस्तर तले रखे जाने के लिए लाया जाता है क्या? और क्या दीपाधार पर स्थित किए जाने के लिए नहीं?
२२ चूँकि ऐसा कुछ भी छुपा हुआ नहीं है, जो प्रत्यक्ष नहीं किया जाएगा; न ही ऐसी कोई भी बात गोपनीय रखी गई थी, जो स्पष्ट नहीं कर दी जाएगी।
२३ यदि किसी भी व्यक्ति के पास सुनने के लिए कान हैं, सुन लेने दो उसे।
२४ और उन्होंने उन से कहा, ध्यान रखना कि तुम क्या सुनते हो: चूँकि जिस माप से तुम मापोगे, उसी से तुम भी मापे जाओगे: और तुम्हें जो सुन रहे हो, अधिक दिया जाएगा।
२५ क्योंकि जिस के पास है, उसे दे दिया जाएगा: और जिस के पास नहीं है, उस से वही ले लिया जाएगा जो उसके पास है।
२६ और उन्होंने कहा, ऐसा है ईश्वर का राज्य: कि कोई व्यक्ति धरती में बीज फैंक दे;
२७ और सो जाए, और रात-दिन उठे, और वो बीज उग जाए और बढ़ता चला जाए, वो जाने न कैसे!
२८ क्योंकि धरती अपने स्वयं से ही फल उत्पन्न करती है; पहले वो अंकुर, फिर वो बाली, और उसके पश्चात वो सम्पूर्ण अनाज बाली में।
२९ परन्तु जब फल उत्पन्न हो जाता है, तो वो तुरन्त ही हँसिया चला देता है, चूँकि फसल-कटाई का समय आ गया है।
३० और उन्होंने कहा, तो हम फिर किस से ईश्वर के राज्य की समानता करें? या फिर किस तुलना से हम इसकी तुलना करें?
३१ यह एक सरसों के बीज के दाने जैसा है, जिसे जब धरती में बो दिया जाता है, तो वो पृथ्वी के सभी बीजों में छोटा है:
३२ परन्तु जब उसे बो दिया जाता है, तो वो उग कर सभी पौधों में सब से बड़ा बन जाता है, और बड़ी डालियाँ उभारता है; ताकि पवन के पक्षी उसकी छाया तले वास कर सकें।
३३ और कई ऐसे दृष्टांतों द्वारा उन्होंने उन से वो शब्द बोला, जैसे वो उसे सुनने में सक्षम थे।
३४ परन्तु बिना दृष्टांत के वो उन से नहीं बोले: और जब वो अकेले होते थे, तो वो सभी बातों का अपने शिष्यों के साथ अर्थप्रतिपादन कर दिया करते थे।
३५ और उसी दिन जब सन्ध्या हो चली थी, तो वो उनसे कहते हैं, चलें, हम उस पार चले जाते हैं।
३६ और जब उन जनो ने जनौघ को विदा कर दिया था, तो वो उन्हें ले चले, उनके जलयान में ही होते हुए। और उनके साथ और अन्य छोटे जलयान भी थे।
३७ और वहीं वायु का एक बड़ा तूफ़ान उठा, और वो लहरें उस जलयान से टकरा रही थीं कि वो अब पानी से भर उठा था।
३८ और वो जलयान के पिछले भाग में एक तकिए पर सो रहे थे: और वह उन्हें जगाते हैं, और उन से कहते हैं, गुरुवर जी, चिन्ता नहीं है क्या आपको कि हम नष्ट हो रहे हैं?
३९ और वो उठे, और उन्होंने वायु को डाँटा, और समुद्र को कहा, शान्त हो जाओ, ठहर जाओ। तो वो वायु थम गई, और वहाँ एक बड़ा प्रशांत हो गया।
४० और उन्होंने उन से कहा, तुम इतने भयभीत क्यों हो? यह कैसे है कि तुम्हारे पास कोई विश्वास ही नहीं है?
४१ और वो भीषणता से भयभीत हो उठे, और एक ने दूसरे से कहा, भई किस प्रकार के पुरुष हैं यह, कि वायु और समुद्र भी इनका पालन करते हैं?
पाँचवाँ अध्याय।
१ और वो गुट समुद्र के उस पार गदरेनियों के देश में आ गया।
२ और जब यीशु जलयान में से बाहर निकल आए थे, तो तुरन्त ही उन्हें वहाँ मज़ारों में से बाहर, अस्वच्छ प्राण के वश में एक आदमी मिला,
३ जिसका बसेरा मज़ारों के बीच था; और कोई भी व्यक्ति उसे बाँध नहीं सकता था, नहीं जी, बेड़ियों से भी नहीं:
४ क्योंकि उसे कई बार बेड़ियों और ज़ंजीरों से बाँध दिया जाता था, लेकिन वो उन ज़ंजीरों को तोड़ कर उन्हें पृथक कर डालता था, और वो बेड़ियाँ टुकड़ों-टुकड़ों में तोड़ दी जाती थीं: न ही कोई भी व्यक्ति उसे वश में कर पाता था।
५ और वो निरन्तर, रात-दिन, पर्वतों और मज़ारों में चीखता रहता था, और स्वयं को पत्थरों से काटता रहता था।
६ परन्तु जब उसने यीशु को दूर से देख लिया था, तो उसने दौड़ कर उनकी आराधना की,
७ और एक प्रबल वाणी से चीखा, और कहा, जी मुझे आपसे क्या लेना-देना यीशु, आप अति-उच्चतम ईश्वर के बेटे? मैं आपको ईश्वर की सौगंध दिलवाता हूँ, कि आप मुझे उत्पीड़ित न करें।
८ क्योंकि उन्होंने उस से कहा था, इस व्यक्ति में से बाहर निकल आ, तू अस्वच्छ प्राण।
९ और उन्होंने उस से पूछा, तेरा नाम क्या है? और उसने उत्तर दिया, कहते हुए, जी मेरा नाम लशकर है: क्योंकि हम अनेक हैं।
१० और उसने उन से बहुत विनती की, कि वो उन्हें देश से बाहर, परे न भेजें।
११ अब पर्वतों के निकट वहीं सूअरों का एक बड़ा पशु समूह चर रहा था।
१२ और उन सभी दानवों ने उन से विनती की, कहते हुए, हमें इन सूअरों में भेज दें जी, ताकि हम इन में घुस जाएँ।
१३ और झट से यीशु ने उन्हें विदाई दे दी। और वो अस्वच्छ प्राण बाहर निकल आए, और उन सूअरों में घुस गए: और वो पशु समूह तीव्र ढलान पर से नीचे समुद्र में झपट पड़ा (वो लगभग दो हज़ार थे;) और वो समुद्र में घुट गए।
१४ और वो जो सूअरों को चरा रहे थे भाग खड़े हुए, और उन्होंने यह नगर और देश में बता दिया। और वो नगर वासी बाहर निकल आए, यह देखने के लिए कि वो क्या था जो कर दिया गया था।
१५ और वो यीशु के पास आते हैं, और उसे देखते हैं जो दानव के वश में था, और जिस में लशकर था, कि वो तो एक स्वस्थचित्त मन के साथ आवृत्त बैठा हुआ है: और वो भयभीत हो उठे।
१६ और उन्होंने जिन्होंने यह देखा था, उन्हें बता दिया कि यह सब कैसे उसके साथ कर दिया गया था, जो दानवों के वश में था, और उन्होंने उन्हें सूअरों के समबन्ध में भी बताया।
१७ और वो उन से प्रार्थना करने लग गए कि वो उनकी सीमाओं से बाहर निकल जाएँ।
१८ और जब वो जलयान में आ गए थे, तो वो जो दानवों के वश में था, उसी ने उन से प्रार्थना की, कि वो उनके साथ आ सके।
१९ परन्तु यीशु ने उसे अनुमती नहीं दी, बल्कि वो उस से कहते हैं, अपने घर अपने मित्रों के पास चले जाओ, और उन्हें बताओ कि कैसे प्रभु ने तुम्हारे लिए बड़े-बड़े कार्य किए हैं, और तुम्हें सम्वेदना दिखाई है।
२० और वो चला गया, और उसने दिकापोलिस में घोषणा करना आरम्भ कर दिया, कि यीशु ने उसके लिए कैसे बड़े-बड़े कार्य किए थे: और उन सभी लोगों ने अचम्भा किया।
२१ और जब यीशु पुनः जलयान द्वारा उस पार चले गए थे, तो कई लोग उनके पास एकत्रित हो गए: और वो समुद्र के निकट थे।
२२ और देखो, वहीं याईर नामक यहूदी-आराधनालय के अध्यक्षों में से एक आता है; और जब उसने उन्हें देखा, तो वो उनके चरणों में गिर पड़ा,
२३ और उसने उन से बहुत विनती की, कहते हुए, जी मेरी छोटी बेटी पड़ी हुई मरने वाली है: मैं प्रार्थना करता हूँ आपसे, आप आएँ और अपने हाथ उस पर रख दें, ताकि वो स्वस्थ हो जाए; और जी ले।
२४ और यीशु उसके साथ चल दिए; और कई लोग यीशु के पीछे-पीछे लग गए, और वो उनके आस-पास भीड़-भाड़ मचा रहे थे।
२५ और कोई एक स्त्री, जिसे बारह वर्षों से रक्त का स्राव हो रहा था,
२६ जो कई चिकित्सकों द्वारा कई बातें झेल चुकी थी, और अपना सब कुछ खर्च कर चुकी थी जो उसके पास था, और तब भी उस में कोई सुधार नहीं हुआ था, बल्कि वो भत्तर होती चली गई थी,
२७ जब उसने यीशु के विषय में सुना, तो वो पीछे से भीड़ में आई, और उसने उनके वस्त्र का स्पर्श कर दिया।
२८ क्योंकि उसने कहा, यदि मैं बस उनके कपड़ों को ही छू दूँ, तो मैं बच जाऊँगी।
२९ और तुरन्त ही उसके रक्त का वो स्राव सूख गया; और उसने अपने शरीर में अनुभव किया कि वो उस विपत्ती से स्वस्थ हो चुकी थी।
३० और यीशु तुरन्त ही स्वयं में यह आभास करते हुए, कि उन में से विक्रम बाहर चला गया था, भीड़ में मुड़े, और उन्होंने कहा, मेरे वस्त्र किसने छुए?
३१ और उनके शिष्यों ने उन से कहा, जी आप देख रहें हैं ये जनौघ जो आपके आस-पास भीड़-भाड़ मचा रहा है, और आप कह रहे हैं कि मुझे किसने छुआ?
३२ और यीशु ने चारों ओर अपनी दृष्टि दौड़ाई, उस स्त्री को देखने के लिए जिसने यह कार्य किया था।
३३ और वो स्त्री डरती-डरती, और काँपती हुई, यह जानती हुई कि उस में क्या कर दिया गया था, आई और यीशु के समक्ष नीचे गिर पड़ी, और उन्हें सब कुछ सच-सच बता दिया।
३४ और उन्होंने उस से कहा, बेटी तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें बचा लिया है; शान्ति में जाओ, और अपनी विपत्ती से स्वस्थ रहो।
३५ और उनके बोलते-बोलते ही, उस यहूदी-आराधनालय के अध्यक्ष के घर से कुछ लोग आए, जिन्होंने कहा, भई तुम्हारी बेटी तो मर चुकी है: तुम गुरुवर को और अधिक क्यों सता रहे हो?
३६ अब ज्योंही यीशु ने वो शब्द सुना जो बोला गया था, तो वो उस यहूदी-आराधनालय के अध्यक्ष से कहते हैं, डरो मत, केवल विश्वास करो।
३७ और उन्होंने किसी को भी उनके पीछे-पीछे आने की अनुमती नहीं दी, सिवाय पतरस, और याकूब, और याकूब के भाई, योहन को।
३८ और यीशु यहूदी-आराधनालय के अध्यक्ष के घर में आ जाते हैं, और वो उस कोलाहल को देखते हैं, और उन्हें जो रो-धो रहे थे, और जो ज़ोरों से रो-पीट रहे थे।
३९ और जब वो अन्दर आ गए थे, तो वो उनसे कहते हैं, भई तुम ये रोना-धोना और उपद्रव क्यों मचा रहे हो? किशोरी मरी नहीं है, बल्कि सो रही है।
४० और उन्होंने उनका उपहास करते हुए उनकी हँसी उड़ाई। परन्तु जब उन्होंने उन्हें बाहर कर दिया था, तो वो किशोरी के पिता और माँ को लेते हैं, और उन्हें जो उनके साथ थे, और वो वहीं प्रवेश करते हैं जहाँ वो किशोरी लेटी हुई थी।
४१ और उन्होंने उस किशोरी को हाथ से पकड़ा, और उस से कहा, तलिथा कुमि; जो व्याख्यानुसार है, कुमारी, मैं कहता हूँ तुम से, उठ जाओ।
४२ और तुरन्त ही वो किशोरी उठ गई, और चलने लगी; क्योंकि वो बारह वर्ष की आयु की थी। और वो लोग बड़ी ही आश्चर्यचकितता से आश्चर्यचकित रह गए।
४३ और उन्होंने उन्हें कड़ाई से आज्ञा दी कि कोई भी व्यक्ति यह जान न पाए; और आदेश दिया कि उस किशोरी को कुछ खाने के लिए दे दिया जाए।
छटा अध्याय।
१ और वह वहाँ से बाहर निकल चले गए, और अपने ही देश में आ गए; और उनके शिष्य उनके पीछे-पीछे थे।
२ और जब सैबथ का दिन आ चुका था, तो उन्होंने यहूदी-आराधनालय में सिखाना आरम्भ किया: और कई उन्हें सुनकर आश्चर्यचकित थे, कहते हुए, भई कहाँ से आई हैं इस आदमी के पास यह बातें? और कैसी है ये प्रज्ञा जो इसे प्रदान कर दी गई है, कि इसके हाथों द्वारा इतने बलशाली कार्य भी किए जा रहे हैं?
३ क्या ये वो बढ़ई नहीं है, मरियम का बेटा, याकूब, और योशी, और यूदा, और शिमोन का भाई? और क्या इसकी बहने यहाँ हमारे साथ नहीं हैं? और वो उनके प्रति अवरोधित हो गए।
४ परन्तु यीशु ने उन से कहा, पैगम्बर आदरहीन नहीं होता है, सिवाय अपने ही देश में, और अपने ही कुल के बीच, और अपने ही घर में।
५ और वो वहाँ कोई भी बलशाली कार्य नहीं कर पाए, सिवाय कि उन्होंने अपने हाथ कुछ बीमार जनो पर रखे, और उन्हें स्वस्थ कर दिया।
६ और वो उनके अविश्वास के कारण अचम्भित थे। और वो गावों के चारों ओर, शिक्षा प्रदान करते हुए चलते गए।
७ और उन्होंने उन बारह को अपने पास बुलाया, और उन्हें दो-दो कर बाहर भेजना आरम्भ कर दिया, और उन्होंने उन्हें अस्वच्छ प्राणों पर शक्ती प्रदान कर दी;
८ और उन्हें आदेश दिया कि वो अपने पथ के लिए कुछ भी न ले जाएँ, सिवाय केवल एक लट्ठ के; कोई झोला नहीं, कोई रोटी नहीं, बटुए में कोई पैसा नहीं:
९ बल्कि वो चप्पल तो पहन लें; पर दो अंगरखे न पहने।
१० और उन्होंने उन से कहा, तुम जिस किसी भी स्थान में किसी भी घर में प्रवेश करोगे, वहीं निवास करना जब तक तुम उस स्थान से प्रस्थान नहीं कर लेते हो।
११ और जो कोई भी तुम्हारा स्वागत नहीं करेगा, न ही तुम्हें सुनेगा, जब तुम वहाँ से प्रस्थान करते हो, तो अपने पैरों तले धूल को उनके विरुद्ध एक साक्ष्य के लिए झाड़ लेना। सच में मैं कहता हूँ तुम से, न्याय-निर्धारण के दिन में सदोम और गौमोराह के लिए अधिक सहनीय होगा, उस नगर की अपेक्षा में।
१२ और वो जने बाहर निकल चले, और उन्होंने प्रवचन दिया कि लोगों को मन-परिवर्तन करना चाहिए।
१३ और उन्होंने कई दानवों को बाहर निकाल फैंका, और कई बीमारों का, उन्होंने तेल-विलेपन किया, और उन्हें स्वस्थ कर दिया।
१४ और राजा हेरोदेस ने यीशु के विषय में सुना; (चूँकि उनका नाम प्रसिद्ध हो चला था:) और उसने कहा, भई योहन बपतिस्मादाता मृतकों में से उठ चुका है भई; और इसलिए इस में यह बलशाली कार्य क्रियान्वित हो रहे हैं।
१५ औरों ने कहा, ये तो एलियस है। और कुछ अन्य लोगों ने कहा, कि ये तो कोई पैग़म्बर है, या पैग़म्बरों में से एक के जैसा।
१६ परन्तु जब हेरोदेस ने इस विषय में सुना, तो उसने कहा, ये तो भई योहन है, जिसका सर मैंने बेधड़ करवा दिया है: वो मृतकों में से उठ गया है।
१७ क्योंकि हेरोदेस ने स्वयं भिजवा कर योहन को पकड़वा लिया था, और उसे बाँध कर, हेरोदियस उसके भाई फिलिप की पत्नी के कारण, उसे कारावास में डलवा दिया था: चूँकि हेरोदेस ने उसके साथ विवाह कर लिया था।
१८ क्योंकि योहन ने हेरोदेस से कहा था, तुम्हारे लिए अपने भाई की पत्नी को रखना न्यायी नहीं है।
१९ इसलिए हेरोदियस को योहन बपतिस्मादाता के विरुद्ध विग्रह था, और वो उसकी हत्या कर देने की इच्छित थी, परन्तु वो यह नहीं कर पाई:
२० क्योंकि हेरोदेस योहन से डरता था, यह जानता हुआ कि वो एक न्यायपूर्ण और एक पवित्र पुरुष था, और वो उसे सुरक्षित रखता था; और जब वो उसे सुन लेता था, तो वो कई कार्य करता था, और वो योहन को खुशी-खुशी सुनता था।
२१ और जब एक सामयिक दिवस आ गया था, तो हेरोदेस ने अपने जन्मदिन के अवसर पर अपने प्रमुखों, उच्च कप्तानों, और गलील के श्रेष्ठ-व्यक्तियों के लिए एक रात्रि-भोज रखा;
२२ और जब इस कथित हेरोदियस की बेटी अन्दर आकर नाची, तो उसने हेरोदेस को, और उन्हें जो उसके साथ बैठे हुए थे, प्रसन्न कर दिया, और राजा ने उस किशोरी से कहा, मुझ से जो कुछ भी तुम चाहो माँग लो, और मैं वो तुम्हें दे दूँगा।
२३ और उसने उसे वचन दिया, जो कुछ भी तुम मुझ से माँगोगी, वही मैं तुम्हें दे दूँगा, अपने राज्य के अर्ध भाग तक भी।
२४ और उसने बाहर जाकर अपनी माँ से कहा, मैं क्या माँगूँ? और उसने कहा, योहन बपतिस्मादाता का सर।
२५ और वो तुरन्त ही फुर्ती से राजा के पास अन्दर आई, और माँग की, कहती हुई, जी मैं चाहती हूँ कि आप मुझे यकायक एक थाल में योहन बपतिस्मादाता का सर दे दें।
२६ और राजा को अत्याधिक खेद हुआ; तब भी अपनी शपथ, और उनके वास्ते जो उसके साथ भोज में बैठे थे, उसने उसे नकारा नहीं।
२७ और तुरन्त ही राजा ने एक जल्लाद भिजवाया, और आदेश दिया कि योहन बपतिस्मादाता का सर ले आया जाए: और वो गया और उसने उसका सर कारावास में बेधड़ कर डाला,
२८ और वो उसका सर एक थाल में ले आया, और उसने उसे उस किशोरी को प्रदान कर दिया: और उस किशोरी ने उसे अपनी माँ को दे दिया।
२९ और जब उसके शिष्यों ने ये सुना, तो वो आए और उसका शरीर उठाकर, उसे एक मज़ार में लिटा दिया।
३० और उन अपौस्लों ने स्वयं को एक साथ यीशु के पास एकत्रित कर-कर उन्हें सभी बातें बता दीं, कि उन्होंने क्या-क्या किया था, और कि उन्होंने क्या-क्या सिखाया था।
३१ और उन्होंने उन से कहा, भई आ जाओ तुम स्वयं अलग एक निर्जन-क्षेत्र में, और कुछ समय विश्राम कर लो: क्योंकि वहाँ कई थे जिनका आना-जाना लगा हुआ था, और उन्हें भोजन करने का भी अवसर नहीं मिला था।
३२ और उन्होंने निजी तौर से जलयान द्वारा एक निर्जन-क्षेत्र में प्रस्थान कर लिया।
३३ और लोगों ने उन जनो को प्रस्थान करते हुए देख लिया, और कई यीशु को पहचानते थे, और समस्त नगरों में से बाहर पैदल भाग कर वहीं उन जनो से पहले आ पहुँचे, और एक ही साथ यीशु के पास आ गए।
३४ और जब यीशु बाहर निकल आए थे, तो उन्होंने कई लोगों को देखा, और वो उनके प्रति सम्वेदना से भर उठे, चूँकि वो बिन चरवाहे के भेड़ों समान थे: और उन्होंने उन्हें कई बातें सिखाना आरम्भ कर दिया।
३५ और अब जब दिन बहुत बीत चुका था, तो उनके शिष्य उनके पास आए, और कहा, ये तो एक निर्जन-क्षेत्र है जी, और अब समय बहुत बीत चुका है:
३६ इन्हें भेज दें, ताकि ये चारों ओर आस पास के प्रदेश में, और गावों में जाकर, अपने लिए रोटी खरीद लें: क्योंकि इनके पास तो खाने के लिए कुछ भी नहीं है जी।
३७ उन्होंने उत्तर दिया और उन से कहा, भई इन्हें तुम खाने के लिए दे दो। और उन्होंने उन से कहा, जी क्या हम जाकर दो सौ चाँदी दीनारों के मूल्य की रोटी खरीदें, और इन्हें खाने के लिए दे दें?
३८ वो उन से कहते हैं, तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं? जाओ और देखो। और जब उन शिष्यों ने यह पता लगा लिया था, तो वो कहते हैं, पाँच, और दो मछलियाँ।
३९ और उन्होंने उन्हें आदेश दिया, कि वो सभी को हरी घास पर समूहों में बिठा दें।
४० और वो लोग सौ-सौ, और पचास-पचास के गुटों में बैठ गए।
४१ और जब उन्होंने उन पाँच रोटियों को, और उन दो मछलियों को ले लिया था, तो उन्होंने ऊपर स्वर्ग की ओर देखा, और आशीष दिया, और वो रोटियाँ तोड़ीं, और उन्हें अपने शिष्यों को दे दीं, लोगों के सामने रखने हेतु; और यीशु ने वो दो मछलियाँ उन सभी के बीच विभाजित कर दीं।
४२ और उन सभी ने खाया, और वो संतुष्ट हो गए।
४३ और उन्होंने उन टुकड़ों से, और उन मछलियों से भरी, बारह टोकरियाँ ऊपर उठाईं।
४४ और उन्होंने, जिन्होंने रोटियों में से खाया था, लगभग पाँच हज़ार पुरुष थे।
४५ और तुरन्त ही उन्होंने लोगों को विदा करते हुए, अपने शिष्यों को अपने से पहले ही जलयान में भेजकर, उस पार बेतसैदा जाने के लिए विवश कर दिया।
४६ और जब उन्होंने उन्हें विदा कर दिया था, तो वो एक पर्वत में प्रार्थना करने चले गए।
४७ और जब सन्ध्या हो चली थी, तो वो जलयान समुद्र के बीच था, और वो भूमि पर अकेले थे।
४८ और उन्होंने उन्हें नौकायन में परिश्रम करते हुए देखा; क्योंकि वायु उनके विरुद्ध थी: और लगभग रात्रि के चौथे पहर में वो समुद्र पर चलते-चलते उनके पास आते हैं, और वो उनके पास से चलते जाते रहते,
४९ परन्तु जब शिष्यों ने उन्हें समुद्र पर चलते हुए देखा, तो उन्होंने सोचा कि वो तो कोई प्राण थे, और वो चीख पड़े:
५० क्योंकि उन सभी ने उन्हें देखा, और वो विचलित हो उठे थे! और तुरन्त ही उन्होंने उन से बात की, और वो उनसे कहते हैं, अच्छे प्रोत्साहित हो जाओ भई; यह मैं ही हूँ; डरो मत।
५१ और वो उनके पास जलयान में ऊपर आ गए; और वायु थम गई: और शिष्य असीमितता से विस्मित रह गए, और उन्होंने अचरज किया।
५२ क्योंकि उन्होंने उन रोटियों के चमत्कार का विचार नहीं किया: क्योंकि उनका हृदय कठोर था।
५३ और जब वो जने उस पार चले जा चुके थे, तो वो गिनेसरेत प्रदेश पहुँच गए, और तट के निकट आ रहे थे।
५४ और जब वो जने जलयान में से बाहर निकल आए थे, तो तुरन्त ही लोगों ने यीशु को पहचान लिया,
५५ और जब उन्होंने यह सुन लिया था कि वो कहाँ थे, तो वो आस-पास के समस्त प्रदेश में से भागे, और बिस्तरों में बीमारों को उठाकर लाने लगे।
५६ और जहाँ कहीं भी यीशु ने प्रवेश किया, गावों में, या नगरों में, या प्रदेश में, उन्होंने पथों पर बीमारों को लिटा दिया, और उन से विनती की, कि यदि हो सके, तो वो बस केवल उनके वस्त्र के किनारे का ही स्पर्श कर दें: और जितनो ने भी यीशु का स्पर्श किया, बच गए।
सातवाँ अध्याय।
१ तब उनके पास यरूशलेम से फैरिसी, और लिपिकों में से कुछ, एक साथ आए।
२ और जब उन्होंने उनके कुछ शिष्यों को अस्वच्छ, अर्थात्, बिन-धोए हाथों से रोटी खाते हुए देखा, तो उन्होंने उन पर दोष लगाया।
३ क्योंकि फैरिसी और सभी यहूदी, वृद्धों की परम्पराओं को रखते हुए, बिना कई बार अपने हाथ धोए भोजन नहीं किया करते थे।
४ और जब वो बाज़ार से आते हैं, तो बिना धोए वो खाना नहीं खाया करते थे। और कई और अन्य बातें हैं जिनका वो पालन करते रहते हैं, जैसे कि प्यालों, और पतीलों, पीतल के बरतनों, और मेज़ों का धोना-धुलवाना।
५ तब फैरिसियों और लिपिकों ने उनसे पूछा, भई तुम्हारे शिष्य वृद्धों की परम्परानुसार क्यों नहीं चलते, बल्कि वो बिन-धोए हाथों से क्यों रोटी खाते रहते हैं?
६ उन्होंने उत्तर दिया और उनसे कहा, एसायस ने अच्छा प्रेरित-उपदेश दिया है तुम्हारे विषय में, तुम ढ़ोंगीयों, जैसा यह लिखा हुआ है, यह लोग अपने होटों से तो मेरा आदर करते हैं; परन्तु इनका हृदय मुझ से दूर है।
७ यह व्यर्थता में मेरी आराधना करते रहते हैं, मनुष्यों के आदेशों को उपदेश ठहरा कर सिखाते हुए।
८ क्योंकि तुम तो ईश्वर के आदेश को परे हटाते हुए, मनुष्यों की परम्परा को पकड़े रहते हो, जैसे कि पतीलों और प्यालों का धोना-धुलवाना, और कई अन्य इन्हीं के जैसी क्रीयाएँ तुम करते रहते हो।
९ और उन्होंने उनसे कहा, तुम तो बड़ी ही प्रशंसनीयता से ईश्वर का आदेश नकारते रहते हो, ताकि तुम अपनी ही परम्परा बनाए रख सको।
१० क्योंकि मूसा ने कहा था, अपने पिता और अपनी माँ का आदर करो: और, जो कोई भी पिता या माता के साथ गाली-गलौच करता हो, तो उसे मृत्युदण्ड से मर जाने दो:
११ परन्तु तुम कहते हो, कि यदि कोई भी व्यक्ति अपने पिता या माँ से कह देगा, यह कोरबान है, अर्थात्, कोषागार के लिए एक भेंट, जिस किसी से भी तुम्हें मुझ से लाभ हो सके; तो वो मुक्त हो जाएगा।
१२ और तुम उसे अपने पिता या अपनी माँ के लिए और कुछ भी करने की अनुमती नहीं देते हो;
१३ अपनी परम्परा द्वारा, जिसे तुमने प्रदान कर दिया है, तुम ईश्वर के शब्द को प्रभावहीन बनाते रहते हो: और ऐसे ही कई और काम तुम करते रहते हो।
१४ और जब उन्होंने सभी लोगों को अपने पास बुला लिया था, तो उन्होंने उन से कहा, भई तुम में से हर एक मेरा श्रवण कर लो, और समझ लो:
१५ ऐसा कुछ भी नहीं है जो बाहर से मनुष्य में भीतर घुस कर, उसे दूषित कर सके: बल्कि वो बातें जो मनुष्य के भीतर से ही बाहर निकलती हैं, वही हैं वो जो उसे दूषित करती हैं।
१६ यदि किसी भी व्यक्ति के पास सुनने के लिए कान हों, तो सुन लेने दो उसे।
१७ और जब उन्होंने उन लोगों को छोड़ कर घर में प्रवेश कर लिया था, तो उनके शिष्यों ने उन से उस दृष्टान्त के सम्बंध में पूछा।
१८ और वह उन से कहते हैं, भई क्या तुम भी इतने नासमझ हो? क्या तुम आभास नहीं करते, कि जो कोई भी बात बाहर से मनुष्य में प्रवेश करती है, वो उसे दूषित नहीं कर सकती;
१९ क्योंकि वो उसके हृदय में नहीं, बल्कि उसके पेट में प्रवेश करके संडास में बाहर चली जाती है, सभी भोजनों का शुद्धीकरण करती हुई।
२० और उन्होंने कहा, वो बात जो मनुष्य में से बाहर निकलती है, वही उसे दूषित करती है।
२१ क्योंकि अन्दर से ही, मनुष्यों के हृदय में से ही प्रवृत्त होते हैं, बुरे विचार, व्यभिचार, अविवाहित-यौन, हत्याएँ,
२२ चोरियाँ, लोलुप्ता, दुष्टता, धोखाधड़ी, कामुकता, बुरी-नज़र, निंदा, अहंकार, मूर्खता:
२३ यह सभी बुरी बातें भीतर से ही उभरती हैं, और मनुष्य को दूषित कर देती हैं।
२४ और वह वहाँ से उठ कर, टाय्र और सिदोन की सीमाओं में चले गए, और उन्होंने एक घर में प्रवेश किया, और उनकी यह इच्छा थी कि कोई भी यह जान न पाए: लेकिन वो छिपे नहीं रह सके।
२५ चूँकि किसी एक स्त्री ने, जिसकी युवा बेटी में एक अस्वच्छ प्राण था, उनके विषय में सुना, और वो आई, और उनके चरणों में गिर पड़ी:
२६ वो स्त्री एक यूनानी थी, सिरीया-फिनिके राष्ट्र से; और उसने उन से विनती की, कि वो उस दानव को उसकी बेटी में से बाहर निकाल दें।
२७ परन्तु यीशु ने उस से कहा, बच्चों को पहले संतुष्ट हो जाने दे: क्योंकि यह उचित नहीं है कि बच्चों की रोटी लेकर, उसे कुत्तों को डाल दिया जाए।
२८ और उस स्त्री ने उत्तर दिया, और उन से कहा, जी हाँ प्रभु जी: तथापि वो कुत्ते जो मेज़ तले हैं, बच्चों के टुकड़ों में से ही तो खाते हैं।
२९ और उन्होंने उस से कहा, इस कथन के कारण चली जाओ अपने पथ पर; वो दानव तुम्हारी बेटी में से बाहर निकल चुका है।
३० और जब वो स्त्री अपने घर वापस लौट आई थी, तो उसने उस दानव को बाहर निकला हुआ, और अपनी बेटी को बिस्तर पर लेटा हुआ पाया।
३१ और पुनः, टाय्र और सिदोन की सीमाओं से प्रस्थान करते हुए, यीशु दिकापोलिस की सीमाओं के बीच में से होते हुए, गलील के समुद्र तक आ पहुँचे।
३२ और वो उनके पास एक को लाते हैं जो बहरा था, और उसकी बोली में अटकाव था; और वो उन से विनती करते हैं कि वो अपना हाथ उस पर रख दें।
३३ और वो उस व्यक्ति को जनौघ से परे ले गए, और उन्होंने अपनी उँगलियाँ उसके कानो में डालीं, और उन्होंने थूका, और उसकी जीभ को छू दिया;
३४ और स्वर्ग की ओर ऊपर देखते हुए, उन्होंने आह भरी, और वो उस से कहते हैं, एफ़्फ़था, अर्थात्, खुल जाओ।
३५ और तुरन्त ही उसके कर्ण खुल गए, और उसकी जीभ का अटकाव भी खुल गया, और वो ठीक से बोलने लग गया।
३६ और उन्होंने उन्हें आज्ञा दी कि वो किसी को भी यह बात न बताएँ: परन्तु जितनी अधिकता से उन्होंने उन्हें यह आज्ञा दी, उतनी ही अधिकता से लोगों ने इस बात की बढ़-चढ़ कर घोषणा कर दी;
३७ और वो असीमित आश्चर्यचकित रह गए थे, कहते हुए, भई इन्होंने तो सभी कार्य अच्छाई से किए हैं: यह दोनो, बहरों को सुनवाते हैं, और गूँगों से बुलवाते हैं!
आठवाँ अध्याय।
१ उन दिनो जनौघ के बहुत विशाल होते हुए, और खाने के लिए कुछ न होते हुए, यीशु ने अपने शिष्यों को अपने पास बुला कर उनसे कहा,
२ मुझे जनौघ के प्रति सम्वेदना है, क्योंकि यह अब मेरे साथ तीन दिन रह लिए हैं, और इनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है:
३ और यदि मैं इन्हें भूखे पेट इनके अपने घरों में वापस भेज दूँगा, तो ये तो पथ पर ही मूर्छित हो जाएँगे भई: क्योंकि उन में से कुछ लोग दूर-दूर से आए थे।
४ और उनके शिष्यों ने उन्हें उत्तर दिया, जी यहाँ इस जँगली-क्षेत्र में कहाँ से कोई इन लोगों को रोटी से संतुष्ट कर पाएगा?
५ और उन्होंने उनसे पूछा, तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं? और उन्होंने कहा, जी सात।
६ और उन्होंने उन लोगों को धरती पर नीचे बैठ जाने का आदेश दिया: और वो सात रोटियाँ लीं, और धन्यवाद दिया, और उन्हें तोड़ा, और अपने शिष्यों को प्रदान कर दिया, उनके समक्ष रख देने के लिए; और उन्होंने उन्हें लोगों के समक्ष रख दिया।
७ और उन जनो के पास कुछ छोटी मछलियाँ थीं: और यीशु ने आशीष दिया, और यह आदेश, कि वो उन्हें भी उनके समक्ष रख दें।
८ तो उन्होंने खाया, और वो तृप्त हो गए: और उन्होंने तोड़े हुए बचे-कुचे भोजन से भरी सात टोकरियाँ ऊपर उठाईं।
९ और उन्होंने जिन्होंने खाया था, लगभग चार हज़ार थे: और यीशु ने उन्हें विदा कर दिया।
१० और तुरन्त ही उन्होंने अपने शिष्यों के साथ एक जलयान में प्रवेश किया, और दलमनूथा के क्षेत्रों में आ गए।
११ और फैरिसियों ने आगे बढ़ कर उनके साथ प्रश्न करना आरम्भ कर दिया, उनकी परीक्षा लेते हुए, स्वर्ग से उनके द्वारा एक संकेत देखने की इच्छा से।
१२ और उन्होंने अपने प्राण में एक गहरी आह भरी, और वो कहते हैं, यह पीढ़ी क्यों एक संकेत देखना चाहती है? सच में मैं कहता हूँ तुम से, इस पीढ़ी को कोई भी संकेत नहीं दिया जाएगा।
१३ और उन्होंने उन्हें छोड़ दिया, और पुनः जलयान में प्रवेश करते हुए, उन्होंने उस पार प्रस्थान कर लिया।
१४ अब उनके शिष्य रोटी लाना भूल गए थे, न ही उनके पास जलयान में एक से भी अधिक रोटी थी।
१५ और उन्होंने उन्हें आदेश दिया, कहते हुए, ध्यान रखना, और फैरिसीयों के खमीर से, और हेरोदेस के खमीर से सावधान रहना।
१६ और शिष्य आपस में सोच-विचार करने लग गए, कहते हुए, यह इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि हमारे पास रोटी नहीं है।
१७ और जब यीशु यह बात जान गए थे, तो वो उनसे कहते हैं, क्या इसलिए तुम सोच-विचार कर रहे हो, क्योंकि तुम्हारे पास रोटी नहीं है? तुम तो अभी तक न ही आभास कर पाए हो, न ही समझ पाए हो? क्या तुम्हारे हृदय अभी तक भी कठोर हैं?
१८ आँखें रखते हुए, तुम देख नहीं सकते? और कान रखते हुए, तुम सुन नहीं सकते? और क्या तुम्हें स्मरण नहीं है?
१९ जब मैंने पाँच रोटियाँ पाँच हज़ार के बीच तोड़ी थीं, तो तुम ने कितनी टोकरियाँ उन टुकड़ों से भरी ऊपर उठाई थीं? वो उन से कहते हैं, जी बारह।
२० और वो सात, चार हज़ार के बीच? तब तुम ने कितनी टोकरियाँ उन टुकड़ों से भरी ऊपर उठाई थीं? और उन्होंने कहा, जी सात।
२१ और उन्होंने उन से कहा, तुम्हें ये कैसे समझ में नहीं आ रहा है भई?
२२ और यीशु बेतसैदा आ जाते हैं; और वो उनके पास एक नेत्रहीन पुरुष को लाते हैं, और उन से उसे छूने की विनती करते हैं।
२३ और उन्होंने उस नेत्रहीन पुरुष को हाथ से पकड़ा, और वो उसे नगरी के बाहर ले गए; और जब उन्होंने उसकी आँखों पर थूक दिया था, और अपने हाथ उस पर रख दिए थे, तो उन्होंने उस से पूछा, कि यदि वो कुछ भी देख पाया था क्या?
२४ और उस व्यक्ति ने ऊपर देखा, और कहा, जी मैं तो लोगों को चलते हुए पेड़ों समान देख रहा हूँ।
२५ इसके पश्चात उन्होंने पुनः अपने हाथ उसकी आँखों पर रखे, और उसे ऊपर देखने के लिए कहा: और वो पुनःस्थापित हो गया, और वो प्रत्येक व्यक्ति को स्पष्ट रूप से देखने लगा।
२६ और उन्होंने उसे वापस उसके घर भेज दिया, कहते हुए, न ही नगरी में जाना, और न ही यह बात किसी को भी नगरी में बताना।
२७ और यीशु और उनके शिष्य बाहर निकल चले, कैसरिया फिलिप्पी की नगरियों में: और पथ पर उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, उन से कहते हुए, लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?
२८ और उन्होंने उत्तर दिया, जी योहन बपतिस्मादाता: परन्तु कुछ कहते हैं, एलियस; और अन्य, पैग़म्बरों में से एक।
२९ और वह उन से कहते हैं, परन्तु तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ? और पतरस उन्हें उत्तर देता है, और कहता है, जी आप मसीहा हैं।
३० और उन्होंने उन्हें आदेश दिया कि वो किसी को भी उनके विषय में न बताएँ।
३१ और उन्होंने उन्हें सिखाना आरम्भ किया, कि मनुष्य-पुत्र अवश्य ही कई कष्ट झेलेगा, और वृद्ध-गणों, और प्रमुख पुरोहितों, और लिपिकों द्वारा अस्वीकृत होगा, और उसकी हत्या कर दी जाएगी, और तीन दिन पश्चात वो पुनः उठ जाएगा।
३२ और उन्होंने यह बात निर्भीकता से बोली। और पतरस यीशु को पकड़ कर उन्हें परे ले गया, और वो उन्हें डाँटने लग गया।
३३ परन्तु जब उन्होंने घूम कर मुड़ कर अपने शिष्यों को देख लिया था, तो उन्होंने पतरस को डाँटा, कहते हुए, मेरे पीछे हट जा शैतान: क्योंकि तू ईश्वर की बातों में रुचि नहीं, बल्कि मानवता की बातों में रुचि लेता है!
३४ और जब उन्होंने लोगों को अपने पास अपने शिष्यों के साथ बुला लिया था, तो उन्होंने उन से कहा, जो कोई भी मेरे पीछे-पीछे आएगा, उसे अपना परित्याग करना होगा, और अपना क्रूस उठा कर, मेरे पीछे-पीछे आना होगा।
३५ क्योंकि जो कोई भी अपना जीवन बचाने की इच्छा रखेगा, उसे खो देगा: परन्तु जो कोई भी मेरे और शुभ-समाचार के वास्ते अपना जीवन खो देगा, उसे बचा लेगा।
३६ क्योंकि क्या लाभ होगा उस व्यक्ति को इस से, यदि वो सम्पूर्ण संसार को प्राप्त कर ले, और अपनी ही आत्मा को खो बैठे?
३७ या फिर क्या देगा कोई अपनी स्वयं की आत्मा के बदले?
३८ इसलिए जो कोई भी मुझ से या मेरे शब्दों से इस व्यभिचारी और पापी पीढ़ी में लज्जित होगा; उसी से मनुष्य-पुत्र भी लज्जित हो जाएगा, जब वो अपने पिताश्री की महिमा में पवित्र दूतों के साथ आएगा।
नवाँ अध्याय।
१ और उन्होंने उन से कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि इन में से जो यहाँ खड़े हैं, कुछ एसे हैं, जो मृत्यु को नहीं चखेंगे, जब तक वो ईश्वर के राज्य को शक्ती के साथ आता हुआ नहों देख लेंगे।
२ और छह दिनों पश्चात यीशु अपने साथ पतरस, याकूब और योहन को लेकर, उन्हें ऊपर एक ऊँचे पर्वत पर अलग से ले जाते हैं: और यीशु का उनके समक्ष वहीं रूपान्तरण हो गया।
३ और उनका वस्त्र चमकीला बन गया, अत्याधिक श्वेत, हिम समान; कि इस संसार का कोई भी धोभी इतना श्वेत न कर पाए।
४ और वहीं उन्हें एलियस, मूसा के साथ प्रकट हुआ: और वो दोनो यीशु के साथ वार्तालाप कर रहे थे।
५ और पतरस ने उत्तर दिया, और यीशु से कहा, रेब्बाय, जी यह हमारे लिए अच्छा है कि हम यहीं हैं: और हम तीन डेरे बना देते हैं; एक आपके लिए, और एक मूसा के लिए, और एक एलियस के लिए।
६ इसलिए कि वो जानता नहीं था कि वो क्या कहे; चूँकि वो घोरता से भयभीत थे।
७ और एक मेघ उन पर छा गया: और उस मेघ में से एक वाणी बाहर निकली, कहती हुई, यही मेरा अतिप्रिय पुत्र है; सुनो इसे।
८ और अचानक जब शिष्यों ने चारों ओर देखा, तो उन्हें अब और कोई अन्य व्यक्ति नहीं दिखा, सिवाय केवल यीशु के, उनके साथ।
९ और जैसे वो पर्वत से नीचे आ रहे थे, तो उन्होंने उन्हें आज्ञा दी कि वो किसी को भी यह बातें न बताएँ जो उन्होंने देखी थीं, जब तक मनुष्य-पुत्र मृतकों में से उठ नहीं जाता।
१० और इन्होंने इस बात को अपने ही बीच रखा, एक दूसरे से पूछ-ताछ करते हुए कि मृतकों में से उठने का क्या अर्थ बनेगा।
११ और उन्होंने उन से पूछा कहते हुए, जी लिपिक क्यों कहते हैं कि एलियस को अवश्य पहले आना होगा?
१२ और उन्होंने उत्तर दिया और उन्हें बताया, एलियस सच में पहले आ रहा है, और सभी कुछ पुनःस्थापित कर रहा है; और कि कैसे मनुष्य-पुत्र के विषय में यह लिखा गया है, कि वो अवश्य ही कई कष्ट झेलेगा, और अति-तिरस्कृत कर दिया जाएगा।
१३ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि एलियस तो वास्तव में आ चुका है, और उन्होंने उसके साथ वही किया जो कुछ भी उन्होंने चाहा, जैसा उसके विषय में लिखा गया है।
१४ और जब वो अपने शिष्यों के पास आ गए थे, तो उन्होंने उनके आस-पास एक बड़ा जनौघ देखा, और लिपिक उन से पूछ-ताछ करते हुए।
१५ और तुरन्त ही सभी लोग, उन्हें देखते ही, अति विस्मित हो उठे, और उनकी ओर भागते हुए उन्हें प्रणाम कर रहे थे।
१६ और उन्होंने उन लिपिकों से पूछा, भई तुम क्या पूछ-ताछ कर रहे हो इन से?
१७ और जनौघ में से एक ने उत्तर दिया और कहा, गुरुवर जी, मैं आपके पास अपना बेटा लाया हूँ, जिस में एक गूँगा प्राण है;
१८ और जहाँ-कहीं भी वो इसे पकड़ लेता है, वो इसे झटकीले-दौरे देता है: और यह झाग उगलता है, और अपने दाँत पीसता है, और अकड़ता चला जाता है: और मैं आपके शिष्यों से बोला कि वो इस भावातमा को बाहर निकाल कर फैंक दें; पर वो यह नहीं कर पाए।
१९ तो वो उसे उत्तर देते हैं, और कहते हैं, ओ बिन-भरोसे वाली पीढ़ी, कितने समय तक मैं तुम्हारे साथ रहूँ भई? कितने समय तक मैं तुम्हें सहूँ? ले आओ उसे मेरे पास।
२० और वो उसके बेटे को उनके पास ले आए: और जब उसने उन्हें देखा, तो तुरन्त ही प्राण ने उसे झटकीले-दौरे दिए; और वो धरती पर गिर पड़ा, और वो झाग उगलता हुआ लोटने लगा।
२१ और उन्होंने उसके पिता से पूछा, कितने समय से ये इस में घुसा हुआ है? और उसने कहा, जी बचपन से।
२२ और कई बार इसने इसे नष्ट कर देने के लिए अग्नि में, और पानियों में पटक डाला है जी: परन्तु यदि आप कुछ कर सकते हैं, तो हम पर दया करें, और हमारी सहायता कर दें।
२३ यीशु ने उस से कहा, यदि तुम विश्वास कर सकते हो, कि उसके लिए सभी कुछ सम्भव है जो विश्वास करता है।
२४ और तुरन्त ही उस बच्चे का पिता चीख पड़ा, और उसने आँसुओं के साथ कहा, प्रभु जी, मैं विश्वास करता हूँ; आप मेरे अविश्वास की सहायता करें।
२५ जब यीशु ने देखा कि लोग एक साथ भागते हुए आ रहे थे, तो उन्होंने उस अस्वच्छ प्राण को डाँटा, उसे कहते हुए, तू गूँगे और बहरे प्राण, मैं आदेश देता हूँ तुझे, इस में से बाहर निकल जा, और इस में पुनः प्रवेश मत करना।
२६ और वो प्राण चीख पड़ा, और उसने उसे घोरता से झटकीले-दौरे दिए, और वो उस में से बाहर निकल आया: और वो बच्चा एक मृत जैसा हो गया था, यहाँ तक कि कईयों ने कहा, भई यह तो मर गया है!
२७ परन्तु यीशु ने उसे हाथ से पकड़ कर उसे ऊपर उठा लिया; और वो उठ गया।
२८ और जब वो घर में आ गए थे, तो उनके शिष्यों ने उन से एकांत में पूछा, जी हम उस दानव को बाहर क्यों नहीं निकाल पाए?
२९ और उन्होंने उन्हें उत्तर दिया, इसके समान और किसी भी प्रकार से बाहर नहीं निकल सकता है, बल्कि केवल प्रार्थना और उपवास द्वारा ही।
३० और उन जनो ने वहाँ से प्रस्थान कर लिया, और गलील में से होते हुए चले गए; और यीशु की यह इच्छा थी कि कोई भी यह जान न पाए।
३१ क्योंकि वो अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान कर रहे थे, और उन्होंने उनसे कहा, मनुष्य-पुत्र लोगों के हाथों पकड़वा दिया गया है, और वो उसे मार डालेंगे; और उसके मार-डाल दिए जाने के पश्चात, वो तीसरे दिन उठ जाएगा।
३२ परन्तु उनके शिष्यों को यह कथन समझ में नहीं आया, और वो उनसे पूछने से डरते थे।
३३ और वह कफरनहूम आ पहुँचे: और घर में होते हुए उन्होंने उन से पूछा, वो क्या था जिस के विषय में तुम अपने बीच पथ पर वाद-विवाद कर रहे थे?
३४ परन्तु वो चुप रहे: क्योंकि पथ पर शिष्य आपस में वाद-विवाद कर रहे थे कि उन में से कौन सब से महान होगा।
३५ और वो नीचे बैठ गए, और उन्होंने उन बारह को बुलाया, और वो उनसे कहते हैं, यदि कोई भी पुरुष प्रथम होना चाहता है, तो वही सभी में अन्तिम होगा, और सभी का नौकर होगा।
३६ और उन्होंने एक बच्चे को लेकर उसे उनके बीच स्थित कर दिया: और जब उन्होंने उसे अपनी बाहों में ले लिया था, तो उन्होंने उन से कहा,
३७ जो कोई भी मेरे नाम में ऐसे बच्चों में से एक को भी ग्रहण करेगा, वही मुझे ग्रहण करता है: और जो कोई भी मुझे ग्रहण करेगा, मुझे नहीं, बल्कि उन्हें ग्रहण करता है जिन्होंने मुझे भेजा है।
३८ और योहन ने उन्हें उत्तर दिया, कहते हुए, गुरुवर, जी हमने एक को आपके नाम में दानवों को बाहर फेंकते हुए देखा, और वो हमारे पीछे-पीछे नहीं आ रहा है: और हमने उसे रोका, क्योंकि वो हमारे पीछे-पीछे नहीं आ रहा है।
३९ परन्तु यीशु ने कहा, उसे मत रोको: चूँकि ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो मेरे नाम में कोई चमत्कार करे, और झट से मेरी निंदा कर दे।
४० क्योंकि वो जो हमारे विरुद्ध नहीं है, हमारे ही पक्ष में है।
४१ चूँकि जो कोई भी तुम्हें मेरे नाम में पानी का एक प्याला पीने के लिए देगा, क्योंकि तुम मसीहा के हो, सच में मैं कहता हूँ तुम से, वो अपना फल नहीं खोएगा।
४२ और जो कोई भी मुझ पर विश्वास करने वाले इन छोटे नन्हों में से एक को भी अवरोधित करेगा, उसके लिए यह बेहतर हुआ होता कि उसकी गर्दन पर चक्की का पत्थर टाँग दिया गया होता, और कि वो समुद्र में फैंक दिया गया होता।
४३ और यदि तुम्हारा हाथ तुम्हें अवरोधित करता है, तो उसे काट डालो: यह बेहतर है तुम्हारे लिए कि तुम जीवन में अपंग प्रवेश करो, न कि तुम दो हाथ लिए नरक में चले जाओ, उस अग्नि में जो कभी भी नहीं बुझाई जाएगी:
४४ जहाँ उनका कीड़ा नहीं मरता, और वो अग्नि नहीं बुझाई जाती।
४५ और यदि तुम्हारा पैर तुम्हें अवरोधित करता है, तो उसे काट डालो: यह बेहतर है तुम्हारे लिए कि तुम जीवन में लंगड़े प्रवेश करो, न कि तुम दो पैर लिए नरक में फैंक दिए जाओ, उस अग्नि में जो कभी भी नहीं बुझाई जाएगी:
४६ जहाँ उनका कीड़ा नहीं मरता, और वो अग्नि नहीं बुझाई जाती।
४७ और यदि तुम्हारी आँख तुम्हें अवरोधित करती है, तो उसे उखाड़ दो बाहर: यह बेहतर है तुम्हारे लिए कि तुम ईश्वर के राज्य में एक ही आँख लिए प्रवेश करो, न कि तुम दो आँखें लिए नरक की अग्नि में फैंक दिए जाओ:
४८ जहाँ उनका कीड़ा नहीं मरता, और वो अग्नि नहीं बुझाई जाती।
४९ चूँकि प्रत्येक व्यक्ति अग्नि से नमकीन कर दिया जाएगा, और प्रत्येक आहुति नमक से नमकीन कर दी जाएगी।
५० नमक अच्छा है: परन्तु यदि नमक ने अपना नमकीन-पन ही खो दिया हो, तो फिर किस से तुम उसे स्वादिष्ट बनाओगे भई? स्वयं में नमक बनाए रखो, और एक दूसरे के साथ शान्ति रखो।
दसवाँ अध्याय।
१ और वो वहाँ से उठकर यर्दन के उस पार से यहूदा की सीमाओं में आ जाते हैं: और पुनः लोगों का जमाव उनके आस-पास हो गया; और उन्होंने उन्हें पुनः अपनी रीतिनुसार सिखाया।
२ और फैरिसी उनके पास आए, और उन्होंने उन से पूछा, उनकी परीक्षा लेते हुए, क्या यह न्यायी है किसी पुरुष के लिए अपनी पत्नी का त्याग कर देना?
३ और उन्होंने उत्तर दिया, और उन से कहा, मूसा ने तुम्हें क्या आदेश दिया था?
४ और उन्होंने कहा, मूसा ने विवाह-विच्छेद पत्र लिख कर, उसे त्यागने की अनुमती दे दी थी।
५ और यीशु ने उत्तर दिया, और उन से कहा, तुम्हारे हृदयों की कठोरता के कारण उसने ये निर्देश लिखा था।
६ परन्तु सृष्टि के प्रारम्भ से ईश्वर ने उन्हें नर और नारी बनाया है।
७ इसी कारण वश एक पुरुष अपने पिता और माँ को छोड़ कर, अपनी पत्नी से चिपट जाएगा;
८ और वो दोनो एक माँस बन जाएँगे: तो अब वो दो नहीं, बल्कि एक ही माँस हैं।
९ इसलिए जो ईश्वर ने एक साथ जोड़ दिया है, उसे मनुष्य पृथक न करे।
१० और घर में उनके शिष्यों ने उनसे इसी विषय में पुनः पूछा।
११ और वो उनसे कहते हैं, जो कोई भी अपनी पत्नी को त्यागेगा, और किसी अन्य से विवाह करेगा, उसके साथ व्यभिचार करता है।
१२ और यदि कोई स्त्री अपने पती का त्याग करती है, और किसी अन्य से विवाह करती है, व्यभिचार करती है।
१३ और वो उनके पास छोटे बच्चे ले आए, ताकि वो उन्हें छू सकें: और उनके शिष्यों ने उन्हें डाँटा जो उन्हें लाए थे।
१४ परन्तु जब यीशु ने यह देखा, तो वो बहुत ही अप्रसन्न हो उठे, और उन्होंने उन से कहा, नन्हें बच्चों को मेरे पास आने की अनुमति दो, और उन्हें मत रोको: चूँकि ईश्वर का राज्य ऐसों का ही है।
१५ सच में मैं कहता हूँ तुम से, जो कोई भी ईश्वर के राज्य को एक छोटे बच्चे समान ग्रहण नहीं करेगा, वो उस में प्रवेश नहीं करेगा।
१६ और उन्होंने उन बच्चों को अपनी बाहों में ऊपर लेकर, अपने हाथ उन पर रखे, और उन्हें आशीष दिया।
१७ और जब वो पथ पर आगे चले गए थे, तो कोई एक दौड़ता हुआ आया, और उनके समक्ष घुटनो के बल था, और उसने उनसे पूछा, अच्छे गुरुवर, मैं क्या करूँ जी ताकि मैं अनन्त जीवन विरासत में प्राप्त कर सकूँ?
१८ और यीशु ने उस से कहा, तुम मुझे अच्छा क्यों पुकार रहे हो? कोई भी अच्छा नहीं है, सिवाय एक के, जो ईश्वर है।
१९ तुम आदेशों को जानते हो, व्यभिचार मत करो, हत्या मत करो, चोरी मत करो, झूठी गवाही मत दो, ठगो मत, अपने पिता और माँ का आदर करो।
२० और उसने उत्तर दिया, और उन से कहा, गुरुवर, जी इन सभी बातें का तो मैंने अपने युवाकाल से ही लेकर पालन किया है।
२१ तब यीशु ने उसे देखते हुए, उस से प्रेम किया, और उस से कहा, भई तुम में एक बात की कमी है: अपने पथ पर चले जाओ, जो कुछ भी तुम्हारे पास है उसे बेच कर दरिद्रों को दे दो, और तुम्हारे पास स्वर्ग में धन-भण्डार होगा: और आ जाओ, क्रूस उठा लो, और मेरे पीछे-पीछे चल दो।
२२ और वो व्यक्ति इस कथन से उदास हो कर पीड़ित होता हुआ चला गया: क्योंकि उसके पास बहुत सी धन-सम्पत्तियाँ थीं।
२३ और यीशु चारों-ओर देखते हुए अपने शिष्यों से कहते हैं, वो जिनके पास धन-धान्य हैं, कितनी ही कठिनाई से ईश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे!
२४ और शिष्य उनके शब्दों से आश्चर्यचकित रह गए। परन्तु यीशु उन्हें पुनः उत्तर देते हैं, और उनसे कहते हैं, बच्चों, उनके लिए कितना कठिन है ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना, जिनका विश्वास धन-धान्यों में है!
२५ सुई की आँख में से ऊँट का निकलना सरल है, न कि किसी धनवान व्यक्ति का ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना।
२६ और वह असीमितता से आश्चर्यचकित रह गए थे, आपस में कहते हुए, तो फिर किस का बचाव हो सकता है भई?
२७ और यीशु उन्हें देखते हुए कहते हैं, मनुष्यों के लिए यह असम्भव है, परन्तु ईश्वर के लिए नहीं: चूँकि ईश्वर के लिए सभी बातें सम्भव हैं।
२८ तब पतरस यीशु से कहने लगा, लो जी, हम ने तो सब कुछ छोड़ दिया है, और आपके पीछे-पीछे आ गए हैं।
२९ और यीशु ने उत्तर दिया, और कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसने घर, या भाई, या बहने, या पिता, या माँ, या पत्नी, या बच्चे, या भूमियाँ, मेरे, और शुभ-समाचार के वास्ते छोड़ दिए हैं,
३० जो अभी इसी समय में सौ गुणा घर, और भाई, और बहने, और माँएँ, और बच्चे, और भूमियाँ, अत्याचार के साथ ग्रहण नहीं कर लेगा; और आने वाले संसार में अनन्त जीवन।
३१ परन्तु कई जो प्रथम हैं अन्तिम होंगे; और जो अन्तिम हैं प्रथम होंगे।
३२ और वो पथ पर ऊपर यरूशलेम जा रहे थे, और यीशु उनके आगे-आगे जा रहे थे, और शिष्य विस्मित थे; और जैसे वह उनके पीछे-पीछे चल रहे थे, वो डर रहे थे। और उन्होंने पुनः उन बारह को लेकर उन्हें बताना आरम्भ कर दिया कि उनके साथ क्या-क्या बीतेगी
३३ कहते हुए, देखो, हम ऊपर यरूशलेम जा रहे हैं; और मनुष्य-पुत्र को प्रमुख पुरोहितों, और लिपिकों को प्रदान कर दिया जाएगा; और वो उसे मृत्युदण्ड की दण्डाज्ञा दे देंगे, और उसे अन्यप्रजातियों को प्रदान कर देंगे:
३४ और वो उसकी हँसी उड़ाएँगे, और उसका कशाताड़न करेंगे, और उस पर थूकेंगे, और उसे मार डालेंगे: और तीसरे दिन वो पुनः उठ जाएगा।
३५ और ज़ब्दी के बेटे याकूब और योहन, उनके पास कहते हुए आते हैं, गुरुवर, जी हम चाहते हैं कि हम जो कुछ भी चाहें आप वही हमारे लिए कर दें।
३६ और उन्होंने उनसे कहा, भई क्या चाहते हो तुम जो मैं तुम्हारे लिए कर दूँ?
३७ उन्होंने उन से कहा, जी हमें यह अनुदान दे दें, कि हम दोनो आपकी महिमा में, एक आपके दाएँ हाथ पर, और दूसरा आपके बाएँ हाथ पर बैठ जाए।
३८ परन्तु यीशु ने उनसे कहा, तुम जानते नहीं हो कि तुम क्या माँग रहे हो: क्या तुम उस प्याले में से पी सकते हो जिस से मैं पीता हूँ? और क्या तुम उस बपतिस्मा से बपतिस्मित हो सकते हो जिस से मैं बपतिस्मित हूँ?
३९ और वो उन से कहते हैं, जी हाँ। और यीशु ने उनसे कहा, तुम वास्तव में ही उसी प्याले से पियोगे जिस से मैं पीता हूँ, और जिस बपतिस्मा से मैं बपतिस्मित हूँ, तुम भी उसी से बपतिस्मित होगे:
४० परन्तु मेरे दाएँ हाथ पर, या मेरे बाएँ हाथ पर बैठना, मेरे हाथ में नहीं है; बल्कि यह उन्हें दिया जाएगा जिनके लिए यह तैयार किया गया है।
४१ और जब यह बात उन दसों ने सुनी, तो वो याकूब और योहन के प्रति अति-अप्रसन्न होने लग गए।
४२ परन्तु यीशु उन्हें अपने पास बुलाकर उनसे कहते हैं, तुम जानते हो कि वो जो अन्यप्रजातियों पर शासक माने जाते हैं, उन पर प्रभुत्व जमाते हैं; और वो जो उन से ऊपर हैं, वही उन पर प्राधिकार जमाते हैं।
४३ परन्तु तुम्हारे बीच यह ऐसा नहीं होगा: बल्कि जो कोई भी तुम्हारे बीच महान बनना चाहेगा, वही तुम्हारा सेवक होगा:
४४ और जो कोई भी तुम में से सब से प्रमुख बनना चाहेगा, वही सभी का नौकर होगा।
४५ क्योंकि मनुष्य-पुत्र भी अपनी सेवा करवाने नहीं, बल्कि सेवा करने, और कईयों के लिए अपना जीवन फिरौती में देने आया है।
४६ और वो यरीहो आ गए: और जैसे वो अपने शिष्यों, और अनेक लोगों के साथ यरीहो से बाहर जा रहे थे, तिमाई का बेटा अन्धा बरतिमाई, मुख्य-पथ के किनारे पर बैठा भीख माँग रहा था।
४७ और जब उसने सुना कि वो नासरत के यीशु थे, तो वो चीखने-पुकारने लग गया, यीशु, आप दाऊद के बेटे, मुझ पर दया करें जी।
४८ और कईयों ने उसे डाँटा कि वो शान्त रहे: परन्तु वो और भी अधिक चीखने लग गया, आप दाऊद के बेटे, मुझ पर दया कर दें जी।
४९ और यीशु अचल खड़े हो गए, और उन्होंने आदेश दिया कि उसे बुलाया जाए। और वो उस नेत्रहीन को बुलाते हैं, उस से कहते हुए, अच्छे प्रोत्साहित हो जाओ भई, उठो, वो तुम्हें बुला रहे हैं।
५० और वो, अपने वस्त्र को फैंकता हुआ, उठा, और यीशु के पास आ गया।
५१ और यीशु ने उत्तर दिया, और उस से कहा, क्या चाहते हो तुम कि मैं तुम्हारे लिए करूँ? उस नेत्रहीन पुरुष ने उन से कहा, प्रभु जी, कि मैं अपनी दृष्टि पा सकूँ।
५२ और यीशु ने उस से कहा, चले जाओ अपने पथ पर; तुम्हारे भरोसे ने तुम्हें बचा लिया है। और तुरन्त ही उसने अपनी दृष्टि ग्रहण कर ली, और वो यीशु के पीछे-पीछे पथ पर चल दिया।
ग्यारहवाँ अध्याय।
१ और जब वो यरूशलेम के निकट आ गए थे, बेतफगे और बेतनियाह तक, जैतूनों के पहाड़ पर, तो वो अपने शिष्यों में से दो को भेजते हैं,
२ और उनसे कहते हैं, अपने पथ पर उस गाँव में चले जाओ जो तुम्हारे विपरीत है, और ज्योंही तुम उस में प्रवेश करोगे, तुम एक युवा-गधा बन्धा हुआ पाओगे, जिस पर कोई भी व्यक्ति कभी नहीं बैठा; उसे खोल कर ले आओ।
३ और यदि कोई भी व्यक्ति तुम से कहता है, भई तुम ये क्यों कर रहे हो? तो तुम कहना कि प्रभु को इसकी आवश्यकता है; और वो तुरन्त ही उसे यहाँ भेज देगा।
४ और वो अपने पथ पर चले गए, और उन्होंने वो युवा-गधा द्वार से बन्धा हुआ पाया, बाहर एक स्थान में जहाँ दो पथ मिलते थे; और उन्होंने उसे खोल दिया।
५ और उन में से कुछ जो वहीं खड़े थे, उन्होंने उन से कहा, भई तुम ये क्या कर रहे हो, इस युवा-गधे को खोल कर?
६ और उन्होंने उनसे वैसा ही कहा, जैसा यीशु ने उन्हें आदेश दिया था: और उन्होंने उन्हें जाने दिया।
७ और वो उस युवा-गधे को यीशु के पास ले आए, और उस पर अपने कपड़े लगा दिए; और वह उस पर बैठ गए।
८ और पथ पर कईयों ने अपने वस्त्र फैला डाले; और अन्यों ने पेड़ों पर से डालों को काट कर, उन्हें पथ पर बिच्छा दिया।
९ और वो जो आगे-पीछे जा रहे थे, चीखे, कहते हुए, होसैना; धन्य हैं वो जो प्रभु के नाम में आ रहे हैं;
१० धन्य हो हमारे पिता दाऊद का राज्य, जो प्रभु के नाम में आ रहा है: सर्वोचतम में होसैना!
११ और यीशु ने यरूशलेम में, और मन्दिर में प्रवेश किया: और जब उन्होंने चारों-ओर सब कुछ देख लिया था, और अब जब संध्या हो चली थी, तो वो उन बारह के साथ बाहर बेतनियाह चले गए।
१२ और आगामी दिन, जब वो जने बेतनियाह से आ रहे थे, तो यीशु को भूख लगी:
१३ और दूर एक पत्तेदार अंजीर के पेड़ को देखते हुए, वो आए, कि कहिं वो उस पर कुछ पा सकें: और जब वो उसके पास आ पहुँचे थे, तो उन्होंने पत्तों के सिवा कुछ भी नहीं पाया; क्योंकि अंजीरों की ऋतु अभी आई नहीं थी।
१४ और यीशु ने उत्तर दिया, और उस पेड़ से कहा, अब से लेकर सदा के लिए कोई भी व्यक्ति तेरा फल न खाए। और उनके शिष्यों ने यह सुना।
१५ और वह जन यरूशलेम आ गए: और यीशु मन्दिर में गए, और उन्हें जो मन्दिर में खरीद-बेच रहे थे, उन्होंने बाहर निकालना आरम्भ कर दिया, और पैसे-बदलनेवालों की मेज़ों को, और छोटे कबूतरों के विक्रेताओं की कुर्सियों को, उन्होंने उलट-पलट कर डाला;
१६ और अनुमती नहीं दी कि कोई भी व्यक्ति, कोई भी पात्र-आदी, मन्दिर में आर-पार ले जाए।
१७ और उन्होंने सिखाया, उन से कहते हुए, क्या यह लिखा हुआ नहीं है, मेरा घर सभी राष्ट्रों द्वारा प्रार्थना का घर कहलाया जाएगा? परन्तु तुम ने तो इसे एक चोरों का अड्डा बना डाला है।
१८ और लिपिकों और प्रमुख पुरोहितों ने यह सुना, और विचार किया कि वो उन्हें कैसे नष्ट करें: चूँकि वो उन से डरते थे, चूँकि सभी लोग उनके उपदेश से आश्चर्यचकित थे।
१९ और जब सन्ध्या हो चली थी, तो यीशु नगर से बाहर चले गए।
२० और सुबह, जैसे वो चलते जा रहे थे, उन्होंने देखा कि वो अंजीर का पेड़ तो अपनी जड़ों से ही सूख चुका था!
२१ और पतरस स्मरण करता हुआ उन से कहता है, रेब्बाय, जी देखें, वो अंजीर का पेड़ जिसे आपने श्राप दे दिया था, वो तो मुरझा गया है।
२२ और यीशु उत्तर देते हुए उन से कहते हैं, ईश्वर में भरोसा रखो।
२३ चूँकि सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि जो कोई भी इस पर्वत से कहेगा, उठ जा, और समुद्र में गिर जा; और वो अपने मन में संदेह नहीं करेगा, बल्कि विश्वास करेगा कि वो बातें जो वो कह रहा है हो कर रहेंगी; तो जो कुछ भी वो कहता है, वही वो प्राप्त कर लेगा।
२४ इसलिए मैं कहता हूँ तुम से, जिन भी वस्तुओं की तुम इच्छा करते हो, जब तुम प्रार्थना करते हो, विश्वास करो कि तुम उन्हें ग्रहण करते हो, और तुम उन्हें प्राप्त कर लोगे।
२५ और जब तुम खड़े प्रार्थना करते हो, क्षमा कर दो, यदि तुम्हें किसी के भी विरुद्ध गिला-शिकवा हो: ताकि तुम्हारे पिताश्री भी जो स्वर्ग में हैं तुम्हारे अपराधों को क्षमा कर दें।
२६ परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, न ही तुम्हारे पिताश्री जो स्वर्ग में हैं, तुम्हारे अपराधों को क्षमा करेंगे।
२७ और वो जने पुनः यरूशलेम आ जाते हैं: और जैसे यीशु मन्दिर में चल रहे थे, तो उनके पास मुख्य-पुरोहित, और लिपिक, और वृद्ध-गण आ जाते हैं,
२८ और उन से कहते हैं, तुम किस प्राधिकार से यह कार्य कर रहो हो भई? और तुम्हें किसने इन कार्यों को करने का प्राधिकार प्रदान किया है?
२९ और यीशु ने उत्तर दिया, और उन से कहा, मैं भी तुम से एक प्रश्न पूछूँगा, और मुझे उत्तर दे दो, और मैं तुम्हें बता दूँगा कि मैं किस प्राधिकार से यह कार्य कर रहा हूँ।
३० योहन का बपतिस्मा, क्या वो स्वर्ग से आया था, या मनुष्यों से आया था? उत्तर दो मुझे।
३१ और उन्होंने अपने बीच सोच-विचार किया, कहते हुए, यदि हम कहते हैं, स्वर्ग से; तो ये कहेगा, तो फिर तुम ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया?
३२ परन्तु यदि हम कहते हैं, कि वो तो मनुष्यों से आया था; वो लोगों से डरते थे: क्योंकि सभी लोग योहन को मानते थे, कि वो वास्तव में ही एक पैग़म्बर था।
३३ और उन्होंने उत्तर दिया, और यीशु से कहा, हम ये नहीं बता सकते। और यीशु ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा, न ही मैं तुम्हें बताऊँगा कि मैं किस प्राधिकार से यह कार्य करता हूँ।
बारहवाँ अध्याय।
१ और उन्होंने उनके साथ दृष्टान्तों में बोलना आरम्भ किया। किन्ही एक व्यक्ति ने एक अंगूर-खेत रोपा, और उसके चारों ओर एक बाड़ लगा दी, और उन्होंने अंगूर के रस के लिए एक कुण्ड की खुदाई की, और एक मीनार का निर्माण किया, और उसे खेतीहरों को भाड़े पर चढ़ा दिया, और वह स्वयं एक दूर देश चले गए।
२ और ऋतु के आने पर उन्होंने उन खेतीहरों के पास एक नौकर को भेजा, ताकि वो उन खेतीहरों से अंगूर-खेत का फल ग्रहण कर सकें।
३ और उन्होंने उसे पकड़ कर उसे पीट डाला, और उसे खाली हाथ भेज दिया।
४ और पुनः उन्होंने उनके पास एक अन्य नौकर को भेजा; और उस पर उन्होंने पत्थर फैंके, और उसे सर पर घायल कर दिया, और उसे अपमानित कर भेज दिया।
५ और पुनः उन्होंने एक अन्य को भेजा; और उन्होंने उसकी हत्या कर डाली, और कई औरों की; कुछों को उन्होंने पीट डाला, और कुछों की उन्होंने हत्या कर दी ।
६ अब उन व्यक्ति के पास उनका इकलौता अतिप्रीय पुत्र था, और उन्होंने उसे भी अन्त में उनके पास भेज दिया, कहते हुए, वो मेरे पुत्र की श्रद्धा करेंगे।
७ परन्तु उन खेतीहरों ने आपस में कहा, यह तो वारिस है; आओ, हम इसकी हत्या कर देते हैं, और इसकी विरासत हमारी बन जाएगी।
८ और उन्होंने उसे लिया, और उसकी हत्या कर दी, और उसे अंगूर-खेत के बाहर फैंक डाला।
९ तो भई अब अंगूर-खेत के प्रभु क्या करेंगे? वो आएँगे और उन खेतीहरों को नष्ट कर देंगे, और उस अंगूर-खेत को औरों को दे देंगे।
१० और क्या तुमने यह शास्त्र नहीं पढ़ा है क्या? वो पत्थर जिसे राजगीरों ने अस्वीकार कर दिया, कोने का सिरा बन गया है:
११ यह प्रभु की करनी थी, और यह हमारी आँखो में आश्चर्यजनक है?
१२ और वो लोग उन्हें पकड़ लेने की सोच में थे, परन्तु वो लोगों से डरते थे: क्योंकि वो जानते थे कि उन्होंने यह दृष्टांत उन्हीं के विरूद्ध बोला था: और उन्होंने उन्हें छोड़ दिया, और अपने-अपने पथों पर चलते बने।
१३ और उन्होंने उनके पास फैरिसियों में से, और हेरोदेस-गण में से कुछों को भेजा, उन्हें उनके शब्दों में फँसाने के लिए।
१४ और जब वो आ गए थे, तो वो उनसे कहते हैं, गुरुवर, जी हम जानते हैं कि आप सच्चे हैं, और आप किसी भी व्यक्ति की परवाह नहीं करते: चूँकि आप लोगों के चेहरों को मान्यता नहीं देते, बल्कि आप सच्चाई में ईश्वर का पथ सिखाते हैं: क्या रोम के राजा को कर देना न्यायी है, या नहीं?
१५ क्या हम कर भरें, या हम कर न भरें? परन्तु उन्होंने उनके ढोंग को जानते हुए, उन से कहा, तुम क्यों मेरी परीक्षा ले रहे हो भई? लाओ मेरे पास एक चाँदी का दीनार, ताकि मैं उसे देख सकूँ।
१६ और वो उसे ले आए। और यीशु उनसे कहते हैं, यह प्रतिमा और अभिलेख किसके हैं? और उन्होंने उनसे कहा, रोम के राजा के।
१७ और यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, रोम के राजा को वो वस्तुएँ चुकाओ जो रोम के राजा की हैं; और ईश्वर को वो वस्तुएँ जो ईश्वर की हैं। और वो यीशु से अचम्भित रह गए।
१८ तब उनके पास सदूकी आते हैं, जो कहते हैं कि पुनरुत्थान नहीं होता; और वो उन से पूछते हैं, कहते हुए,
१९ गुरुवर, मूसा ने हमें लिखा था, कि यदि किसी पुरुष का भाई मर जाता है, और अपनी पत्नी को सन्तानहीन पीछे छोड़ जाता है, तो उसका भाई उसकी पत्नी ले ले, और अपने भाई के लिए बीज उत्पन्न करे।
२० अब सात भाई थे: और पहले ने एक पत्नी ली, और वो बिना बीज छोड़े ही मर गया।
२१ और दूसरे ने उसे ले लिया, और वो भी मर गया, न ही उसने कोई बीज छोड़ा: और इसी प्रकार तीसरे ने।
२२ और उन सातों ने उसे पत्नी के लिए लिया, और कोई भी बीज नहीं छोड़ा: और सब से अन्त में वो स्त्री भी मर गई।
२३ जी अब पुनरुत्थान में इसलिए, जब वो उठेंगे, तो वो उन में से किस की पत्नी बनेगी? क्योंकि उन सातों ने उसे पत्नी लिया था।
२४ और यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, तुम इसलिए क्या भटक नहीं रहे हो, क्योंकि न ही तुम शास्त्रों से परिचित हो, न ही ईश्वर की शक्ति से?
२५ क्योंकि जब वो मृतकों में से उठेंगे, वो न ही विवाह करते हैं, न ही वो विवाह में दिए जाते हैं, बल्कि वो दूतों समान होते हैं जो स्वर्ग में हैं।
२६ और जहाँ तक मृतकों की बात आती है, कि वो उठते हैं: क्या तुमने मूसा की पुस्तक में नहीं पढ़ा है, कि कैसे ईश्वर ने उस से झाड़ी में बोला था, कहते हुए, मैं हूँ ईश्वर अब्राहम का, और ईश्वर इसहाक का, और ईश्वर याकूब का?
२७ वो मृतकों के ईश्वर नहीं हैं, बल्कि जीवितों के ईश्वर हैं: इसलिए तुम बहुत दूर भटक रहे हो।
२८ और लिपिकों में से एक आया, और उनके एक साथ सोचने-विचारने को सुन, और आभासित हो कि यीशु ने उन्हें सुयोग्य उत्तर दे दिया था, उसने उनसे पूछा, सभी आदेशों में से सब से प्रथम आदेश कौन सा है जी?
२९ और यीशु ने उसे उत्तर दिया, सुन लो ओ इस्राएल, सभी आदेशों में से प्रथम है, कि प्रभु हमारे ईश्वर एक ही प्रभु हैं:
३० और तुम प्रभु अपने ईश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय से, और अपनी सम्पूर्ण आत्मा से, और अपने सम्पूर्ण मन से, और अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रेम करोगे: यही है प्रथम आदेश।
३१ और दूसरा यह है, कि तुम अपने पड़ौसी से स्वयं-समान प्रेम करोगे। इन से महान और कोई भी अन्य आदेश नहीं है।
३२ और उस लिपिक ने उन से कहा, जी बहुत अच्छा, गुरुवर, आप ने तो सत्य कह दिया है: क्योंकि एक ही ईश्वर हैं; और कोई अन्य नहीं बस वही:
३३ और उन से सम्पूर्ण हृदय से, और सम्पूर्ण प्रज्ञा से, और सम्पूर्ण आत्मा से, और सम्पूर्ण शक्ति से प्रेम करना, और अपने पड़ौसी से स्वयं-समान प्रेम करना, जली हुई पूर्ण आहुतियों और बलियों से अधिक है।
३४ और जब यीशु ने देखा कि उस व्यक्ति ने विचारशीलता से उत्तर दिया, तो उन्होंने उस से कहा, तुम ईश्वर के राज्य से दूर नहीं हो। और इसके पश्चात किसी भी व्यक्ति ने उन से कोई भी अन्य प्रश्न पूछने का साहस नहीं किया।
३५ अब जैसे वह मन्दिर में सिखा रहे थे, यीशु ने उत्तर दिया, और कहा, कैसे कहते हैं लिपिक कि मसीहा दाऊद का पुत्र है?
३६ क्योंकि दाऊद ने स्वयं ही पवित्र-प्राण द्वारा कहा, प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, विराजमान हो जाओ तुम मेरे दाएँ हाथ पर, जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारा पायदान नहीं बना देता।
३७ दाऊद इसलिए स्वयं उसे प्रभु पुकार रहा है; तो फिर वो उसका पुत्र कहाँ से है भई? और आम जनता उन्हें प्रसन्नता से सुना करती थी।
३८ और उन्होंने उन से अपने उपदेश में कहा, लिपिकों से सावधान रहना, जो लम्बे-लम्बे वस्त्रों में आना-जाना पसंद करते हैं, और बाज़ारों में प्रणामों को,
३९ और यहूदी-आराधनालयों में प्रमुख कुर्सियों को, और भोजों में उच्चतम स्थानो को पसंद करते हैं:
४० जो विधवाओं के घरों का भुख-भक्षण करते हैं, और झूठे दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करते हैं: यही बृहत्तर दण्डाज्ञा ग्रहण करेंगे।
४१ और यीशु कोषागार के विपरीत बैठे हुए थे, और उन्होंने देखा कि लोग कैसे कोषागार में पैसा डाल रहे थे: और कई जो धनवान थे बहुत सारा पैसा डाल रहे थे।
४२ और वहीं कोई एक दरिद्र विधवा आई, और उसने दो पाई, जो एक कौड़ी बनाती हैं, कोषागार में फैंक दीं।
४३ और उन्होंने अपने पास अपने शिष्यों को बुलाया, और वो उनसे कहते हैं, सच मे मैं कहता हूँ तुम से, कि इस दरिद्र विधवा ने कोषागार में डालने वाले इन सभी की तुलना में अधिक डाल दिया है:
४४ क्योंकि इन सब ने तो अपने आधिक्य में से डाला है; परन्तु इसने अपनी दरिद्रता में से, जो कुछ भी उसके पास था, वो सभी कुछ डाल दिया है, यहाँ तक कि अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति भी।
तेरहवाँ अध्याय।
१ और जैसे वो मन्दिर से निकास कर रहे थे, उनके शिष्यों में से एक उन से कहता है, गुरुवर, जी देखें, किस प्रकार के पत्थर, और किस प्रकार की इमारतें हैं यहाँ!
२ और यीशु ने उत्तर देते हुए उस से कहा, देख रहे हो तुम इन विशाल इमारतों को? एक के ऊपर एक भी पत्थर बचा नहीं रहेगा, जो नीचे नहीं गिरा दिया जाएगा।
३ और जैसे यीशु जैतूनों के पहाड़ पर मन्दिर के विपरीत बैठे हुए थे, तो पतरस, याकूब, योहन और अन्द्रेयास ने उन से निजी तौर से पूछा,
४ प्रभु हमें बताएँ जी कि यह बातें कब घटेंगी? और क्या संकेत होगा जब यह सभी बातें पूर्ण हो जाएँगी?
५ और उन्हें उत्तर देते हुए यीशु ने बोलना आरम्भ किया, ध्यान रखना कहिं कोई भी तुम्हें धोखा न दे दे।
६ क्योंकि मेरे नाम में कई आएँगे, कहते हुए, मैं मसीहा हूँ; और वो कईयों को धोखा दे देंगे।
७ और जब तुम युद्धों और युद्धों की अफ़वाहों के विषय में सुनोगे: तो विचलित मत होना: क्योंकि इन बातों का घटना अनिवार्य है, परन्तु अन्त अभी नहीं होगा।
८ क्योंकि राष्ट्र राष्ट्र के विरुद्ध, और राज्य राज्य के विरुद्ध उठ खड़ा होगा: और विभिन्न स्थानो में भूकम्प आएँगे, और अकाल और अशान्ति आएँगे: यह प्रसव-पीड़ा के आरम्भ हैं।
९ परन्तु तुम अपना ध्यान रखना: क्योंकि वो तुम्हें परिषदों को प्रदान कर देंगे; और यहूदी-आराधनालयों में तुम्हें पीटा जाएगा: और मेरे नाम वास्ते तुम्हें शासकों और राजाओं के समक्ष लाया जाएगा, उनके विरुद्ध एक साक्ष्य के लिए।
१० और पहले शुभ-समाचार की घोषणा सभी राष्ट्रों के बीच होना आवश्यक है।
११ परन्तु जब वो तुम्हें ले जाएँगे, और तुम्हें प्रदान कर देंगे, तो तुम पहले से न ही सोच-विचार करना, और न ही पूर्वचिंतन करना, कि तुम क्या बोलोगे: बल्कि जो कुछ भी तुम्हें उसी घड़ी में दिया जाएगा, वही तुम बोलना: क्योंकि वो तुम नहीं हो जो बोलता है, बल्कि पवित्र-प्राण।
१२ अब भाई भाई को, और पिता पुत्र को मृत्यु के घाट उतरवाने के लिए, उसके साथ विश्वासघात कर देगा; और बच्चे अपने पिता-माता के विरुद्ध उठ खड़े हो जाएँगे, और उनकी मृत्यु करवा डालेंगे।
१३ और तुम मेरे नाम वास्ते सभी लोगों द्वारा घर्णित होगे: परन्तु वो जो अन्त तक सहनशील रहेगा, उसी का बचाव हो जाएगा।
१४ परन्तु जब तुम दानिएल पैगम्बर द्वारा बोली गई, अति-घृणितता की उजाड़ता वहाँ देखोगे, जहाँ उसे नहीं होना चाहिए, (वो जो पढ़ रहा है, उसे समझ लेने दो,) तब उन्हें जो यहूदा में हैं, उन्हें पर्वतों में भाग जाने देना:
१५ और उसे, जो घर की छत पर है, नीचे घर में मत जाने देना, न ही उस में प्रवेश कर लेने देना, अपने घर में से कोई भी वस्तु लेने के लिए:
१६ और उसे जो खेत में है, पुनः अपने वस्त्र उठा लेने के लिए वापस मत मुड़ जाने देना।
१७ बल्कि हाय पड़ेगी उन पर जो बच्चे से गर्भवती हैं, और उन पर जो दूध पिला रही हैं उन दिनो में!
१८ और प्रार्थना करना कि तुम्हारा भागना शीत-ऋतु में न हो।
१९ क्योंकि उन दिनो में ऐसी पीड़ा आएगी, जैसी ईश्वर द्वारा सृजनित इस सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर, इस समय तक नहीं आई है, न ही आएगी।
२० और सिवाय इसके कि प्रभु ने उन दिनो को घटा दिया होता, कोई भी प्राणी बच नहीं पाएगा: परन्तु निर्वाचितों के वास्ते, जिन्हें उन्होंने चुना है, उन्होंने उन दिनो को घटा दिया है।
२१ और तब यदि कोई भी तुम से कहे, लो मसीहा तो यहाँ है; या, लो भई, वो तो वहाँ है; तो उस पर विश्वास मत करना:
२२ क्योंकि झूठे मसीहा और झूठे पैगम्बर उठ खड़े होंगे, और संकेत और अद्धबुत चमत्कार दिखाएँगे; कि यदि सम्भव हो सके, वो निर्वाचितों ही को बहका दें।
२३ परन्तु तुम ध्यान रखना: देखो, मैंने तुम्हें पहले से ही सभी बातें बता दी हैं।
२४ परन्तु उन दिनो में, उस आपत्ती के पश्चात, सूर्य अन्धकार-मय हो जाएगा, और चंद्रमा अपना उजाला नहीं देगा,
२५ और स्वर्ग के सितारे गिर जाएँगे, और वो शक्तियाँ जो स्वर्ग में हैं, झकझोर दी जाएँगी।
२६ और तब वो मेघों में मनुष्य-पुत्र का महा-शक्ती, और महिमा के साथ आगमन देखेंगे।
२७ और तब वो अपने दूतों को भेजेगा, और अपने निर्वाचितों को चारों वायुओं में से एक साथ एकत्रित कर लेगा, पृथ्वी के अन्तिम छोर से लेकर, स्वर्ग के अन्तिम छोर तक।
२८ अब अंजीर के पेड़ का दृष्टान्त सीख लो; जब उसकी डाल अभी कोमल ही होती है, और पत्ते उपजाती है, तो तुम जान जाते हो कि भई ग्रीष्म ऋतु निकट है:
२९ तो इसी प्रकार तुम भी, जब तुम इन घटनाओं का घटना देख लोगे, तो जान जाना कि वो निकट है, यहाँ तक कि द्वारों तक भी।
३० सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि ये पीढ़ी तब तक नहीं चलती चली जाएगी, जब तक यह सभी बातें घट नहीं जातीं।
३१ स्वर्ग और पृथ्वी चलते चले जाएँगे: परन्तु मेरे शब्द कदापि चलते चले नहीं जाएँगे।
३२ परन्तु उस दिन और उस घड़ी के विषय से कोई भी परिचित नहीं है, नहीं, वो दूत भी नहीं जो स्वर्ग में हैं, न ही पुत्र, बस केवल पिताश्री ही।
३३ तुम ध्यान रखो, सचेत रहो और प्रार्थना करो, क्योंकि तुम जानते नहीं हो कि वो समय कब आएगा।
३४ क्योंकि मनुष्य-पुत्र एक ऐसे व्यक्ति के समान है, जो किसी विदेश-यात्रा पर है, जिसने अपना घर छोड़ कर, अपने नौकरों को प्राधिकार, और प्रत्येक व्यक्ति को उसका कार्य-भार सौंप दिया है, और उसने द्वारपाल को चौकस रहने का आदेश दे दिया है।
३५ इसलिए चौकस रहो तुम: क्योंकि तुम जानते नहीं हो कि घर का मालिक कब आ रहा है, सन्ध्या के समय, या मध्य-रात्रि में, या मुर्गे की बाँग देने पर, या सुबह:
३६ कहिं अचानक आ जाने पर वो तुम्हें सोता हुआ पाए।
३७ और जो मैं तुम से कह रहा हूँ, मैं वो सभी से कह रहा हूँ, सचेत रहो।
चौदहवाँ अध्याय।
१ दो दिन पश्चात पार-करने का, और बेख़मीरी रोटी का भोज था: और प्रमुख पुरोहित और लिपिक इस सोच में थे कि वो कैसे चालाकी से उन्हें पकड़ कर, उन्हें मृत्युदण्ड दिलवा दें।
२ परन्तु उन लोगों ने कहा, भोज के दिन पर नहीं, कहीं लोग कोलाहल न मचा दें।
३ और बेतनियाह में होते हुए, सिमोन कुष्ठ-रोगी के घर में, जैसे वो भोजन के लिए बैठे हुए थे, एक स्त्री आई जिस के पास एक सिलखड़ी के डब्बे में अति अन्मोल जटामांसी की मरहम थी; और उसने उस डब्बे को तोड़ कर उसे उनके सर पर उंडेल दिया।
४ और वहाँ कुछ थे जिन्हें अपने आप में क्षोभ हुआ, और उन्होंने कहा, इस मरहम को व्यर्थ क्यों किया जा रहा है?
५ क्योंकि इसे तो तीन सौ चाँदी दीनारों से भी अधिक के लिए बेच कर, दरिद्रों को दे दिया जा सकता था। और वो उस स्त्री के विरुद्ध बड़बड़ाने लग गए।
६ और यीशु ने कहा, भई अकेला छोड़ दो इसे; तुम क्यों इस स्त्री को सता रहे हो? इसने तो मुझ पर एक अच्छा कार्य किया है।
७ क्योंकि दरिद्र तो तुम्हारे साथ सर्वदा रहते हैं; और जब भी तुम चाहो तुम उनके साथ अच्छा कर सकते हो, परन्तु मैं तुम्हारे पास सर्वदा नहीं रहूँगा।
८ इसने वो कर दिया है, जो वो कर सकती थी: इसने तो पहले से ही आकर मेरे दफ़न के लिए मेरे देह का तेल-विलेपन कर दिया है।
९ सच में मैं कहता हूँ तुम से, जहाँ कहीं भी इस समस्त संसार के सर्वत्र में इस शुभ-समाचार का प्रवचन दिया जाएगा, यह भी बता दिया जाएगा जो इस स्त्री ने किया है, इसकी स्मृति में।
१० और उन बारह में से एक, यूदस इस्करियोती, प्रमुख पुरोहितों के पास चला गया, उन्हें उनके हाथ में विश्वासघातित करवाने के लिए।
११ और जब उन लोगों ने यह सुना, तो वो तो प्रसन्न हो उठे, और उन्होंने उसे पैसे देने का वचन दे दिया। और यूदस उनके साथ विश्वासघात करने का सामयिक अवसर ढूँढने लग गया।
१२ और बेख़मीरी रोटी के भोज के पहले दिन, जब वो पार-करने के मेमने की बली चढ़ाते हैं, तो उनके शिष्यों ने उन से कहा, जी कहाँ है आपकी इच्छा कि हम जाकर आपके पार-करने को खाने के लिए तैयार कर दें?
१३ और वो अपने दो शिष्यों को बाहर भेजते हैं, और उनसे कहते हैं, तुम नगर में चले जाओ, और वहीं तुम्हें एक आदमी पानी का एक घड़ा ढोता हुआ मिलेगा: उसी के पीछे-पीछे चले जाना।
१४ और जहाँ कहिं भी वो अन्दर घुसेगा, तुम उसी घर के सरदार से कहना, गुरुवर कह रहे हैं, वो भोज-कक्ष कहाँ है, जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ पार-करना खाऊँगा?
१५ और वो तुम्हें एक सुसज्जित और तैयार ऊपर का बड़ा कमरा दिखा देगा: वहीं हमारे लिए तैयारी कर देना।
१६ और उनके शिष्य बाहर चले गए, और नगर में जाकर उन्होंने उनके कथनानुसार ही पाया: और उन्होंने पार-करना तैयार कर दिया।
१७ और सन्ध्या के समय वो उन बारह के साथ आ जाते हैं।
१८ और जैसे वो बैठ कर खा रहे थे, यीशु ने कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, तुम में से एक जो मेरे साथ खा रहा है, मेरे साथ विश्वासघात करेगा।
१९ और वो शोकार्तित होने लग गए, और एक-एक करके उन से कहने लग गए, क्या वो मैं हूँ जी? और दूसरे ने कहा, जी क्या वो मैं हूँ?
२० और उन्होंने उत्तर दिया, और उन से कहा, वो तुम बारह में से एक है, जो मेरे साथ इस थाली में डुबो रहा है।
२१ मनुष्य-पुत्र वास्तव में जा रहा है, जैसा उसके विषय में लिखा गया है: लेकिन हाय पड़े उस आदमी पर जिसके द्वारा मनुष्य-पुत्र विश्वासघातित है! उस आदमी के लिए अच्छा हुआ होता कि उसका जन्म ही कभी नहीं हुआ होता।
२२ और जैसे वो खा रहे थे, यीशु ने रोटी ली, और उसे आशीष दिया, और उसे तोड़ा, और उन्हें दिया, और कहा, लो खा लो; यह मेरा शरीर है।
२३ और उन्होंने वो प्याला लिया, और जब उन्होंने धन्यवाद दे दिया था, तो उन्होंने उसे उन्हें दे दिया: और उन सभी ने उस में से पिया।
२४ और उन्होंने उन से कहा, ये नए अनुबंध का मेरा रक्त है, जो कईयों के लिए बहा है।
२५ सच में मैं कहता हूँ तुम से, मैं लता के फल में से अब और नहीं पीयूँगा, उस दिन तक, जब मैं इसे ईश्वर के राज्य में नया पीयूँगा।
२६ और जब उन्होंने एक स्तोत्र गा लिया था, तो वो बाहर निकल कर जैतूनों के पहाड़ पर चले गए।
२७ और यीशु उनसे कहते हैं, तुम सभी इस रात मेरे कारण अवरोधित हो जाओगे: चूँकि यह लिखा गया है, मैं चरवाहे को मार डालूँगा, और भेड़ बिखर जाएँगे।
२८ परन्तु मेरे उठ जाने के पश्चात, मैं तुम से पहले गलील में चला जाऊँगा।
२९ परन्तु पतरस ने उन से कहा, जी चाहे सभी अवरोधित हो जाएँ, तथापि मैं नहीं अवरोधित हूँगा।
३० और यीशु उस से कहते हैं, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि इस दिन, यहाँ तक कि इसी रात, मुर्गे के दो बार बाँग देने से पहले ही, तुम मुझे तीन बार अस्वीकार कर दोगे।
३१ परन्तु पतरस और भी बलपूर्वक्ता से बोला, यदि मैं आपके साथ मर भी क्यों न जाऊँ, मैं आपको किसी भी प्रकार अस्वीकार नहीं करूँगा। इसी प्रकार उन सब ने भी कहा।
३२ और वो गतसमनी कहलाए जाने वाले एक स्थान में आ गए; और वो अपने शिष्यों से कहते हैं, तुम यहीं बैठ जाओ, जैसे मैं प्रार्थना करता हूँ।
३३ और वो अपने साथ पतरस और याकूब और योहन को लेते हैं, और वो घोरता से विस्मित होने लग गए, और वो अति यातनित हो गए;
३४ और वो उन से कहते हैं, मेरी आत्मा मृत्यु तक अत्याधिक शोकार्तित है: ठहरे रहो तुम यहीं, और जागते रहो।
३५ और वो कुछ ही दूर आगे गए, और धरती पर गिर पड़े, और उन्होंने प्रार्थना की, कि यदि यह सम्भव हो सके, तो वो घड़ी उनसे परे चली जाए।
३६ और उन्होंने कहा, अब्बा पिताश्री, जी आपके लिए सभी बातें सम्भव हैं; इस प्याले को मुझ से दूर ले जाएँ: तथापि मेरी इच्छानुसार नहीं, बल्कि जैसी आप की इच्छा हो।
३७ और वो आते हैं और उन्हें सोता हुआ पाते हैं, और पतरस से कहते हैं, सिमोन, सो रहे हो तुम? क्या तुम एक घंटा भी जागते नहीं रह सके?
३८ सचेत रहो और प्रार्थना करो, कहिं तुम प्रलोभन में न पड़ जाओ: प्राण तो वास्तव में ही उद्यत है, परन्तु शरीर दुर्बल है।
३९ और वह पुनः चले गए, और उन्होंने प्रार्थना की, और वही शब्द बोले।
४० और जब वो वापस आए, तो उन्होंने उन्हें पुनः सोता हुआ पाया, (क्योंकि उनकी आँखें भारी थीं,) न ही वह समझ पाए कि वो उन्हें क्या उत्तर दें।
४१ और वह तीसरी बार आते हैं, और उनसे कहते हैं, सोते रहो अब, और अपना विश्राम कर लो: बस बहुत हो गया, वो घड़ी आ गई है; देखो, मनुष्य-पुत्र पापियों के हाथों में विश्वासघातित है।
४२ उठो, हमें चलना चाहिए; लो, वो जो मेरे साथ विश्वासघात कर रहा है निकट ही है।
४३ और तुरँत ही, जैसे वह बोल ही रहे थे, यूदस आ जाता है, उन बारह में से एक, और उसके साथ प्रमुख पुरोहितों और लिपिकों और वृद्धों के पास से एक बड़ा जनौघ, तलवारों और लट्ठों के साथ।
४४ और उसने जिसने उनके साथ विश्वासघात किया था, उन्हें एक संकेत दे दिया था, कहते हुए, जिस किसी को भी मैं चूमूँगा, वही है वो; पकड़ लेना उसे, और उसे सावधानी से ले जाना।
४५ और जैसे ही वो आ पहुँचा था, वो तुरन्त ही उनके पास जाकर कहता है, रेब्बाय रेब्बाय; और उसने उन्हें चूम लिया।
४६ और उन्होंने उन पर अपने हाथ डाल कर, उन्हें पकड़ लिया।
४७ और उन में से एक ने जो वहीं खड़े थे, तलवार खींच कर, उच्च पुरोहित के एक नौकर पर वार कर कर, उसका कान काट डाला।
४८ और यीशु ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, क्या तुम मुझे तलवारों और लट्ठों के साथ, ऐसे पकड़ने निकले हो जैसे कि किसी चोर को?
४९ मैं तुम्हारे साथ दिन-प्रतिदिन मन्दिर में था सिखाता हुआ, और तुमने मुझे नहीं पकड़ा: परन्तु शास्त्रों की पूर्ती होना आवश्यक है।
५० और उन सभी ने उनका त्याग कर दिया, और भाग खड़े हुए।
५१ और वहीं उनके पीछे-पीछे एक कोई युवक चल रहा था, एक छालटी का कपड़ा अपने नग्न शरीर पर लपेटे हुआ; और उन युवकों ने उसे पकड़ लिया:
५२ और वो उस छालटी के कपड़े को छोड़ कर, उन से नग्न ही भाग खड़ा हुआ।
५३ और वह यीशु को उच्च पुरोहित के पास ले चले: और उसके साथ सभी प्रमुख पुरोहित और वृद्ध और लिपिक एकत्रित थे।
५४ और पतरस यीशु का दूर से पीछा करता हुआ, उच्च पुरोहित के राज-भवन तक भी आ पहुँचा: और वो नौकरों के साथ बैठ गया, और अग्नि में स्वयं को ताप रहा था।
५५ और प्रमुख पुरोहित, और वो समस्त परिषद, यीशु के विरुद्ध झूठी गवाही ढूँढ रहे थे, उन्हें मृत्युदण्ड दिलवा देने हेतु, लेकिन वो कोई भी झूठी गवाही न पा सके।
५६ क्योंकि कईयों ने उनके विरुद्ध झूठी गवाही दी, परन्तु उनकी गवाही एक साथ मेल न खा सकी।
५७ और वहीं कुछ उठ खड़े हुए, और उन्होंने उनके विरुद्ध झूठी गवाही दी, कहते हुए,
५८ भई हम ने तो इसे कहते हुए सुना, कि मैं इस हाथों से बने हुए मन्दिर को तो नष्ट कर डालूँगा, और मैं तीन दिनो में बिन-हाथों के किसी अन्य मन्दिर का निर्माण कर दूँगा।
५९ परन्तु न ही इनकी गवाही ने एक साथ मेल खाया।
६० और उच्च पुरोहित बीच में उठ खड़ा हुआ, और उसने यीशु से पूछा, कहते हुए, भई तू तो कोई भी उत्तर नहीं दे रहा है? यह क्या है जो यह तेरे विरुद्ध गवाही दे रहे हैं?
६१ परन्तु वह चुप रहे, और उन्होंने कोई भी उत्तर नहीं दिया। तो उच्च पुरोहित ने उन से पुनः पूछा, और उन से कहा, क्या तू वही मसीहा है, उन्हीं आशीषित का वही बेटा?
६२ और यीशु ने कहा, मैं हूँ: और तुम मनुष्य-पुत्र को शक्ति के दाएँ हाथ पर विराजमान, और स्वर्ग के मेघों में आगमन करता हुआ देखोगे।
६३ तब उच्च पुरोहित ने अपने कपड़े फाड़ डाले, और वो कहता है, हमें गवाहों की अब और क्या आवश्यकता है भई?
६४ तुमने ये ईश्वर-निंदा सुन ली है: तो क्या सोचते हो तुम? और उन सभी ने उन्हें दण्डनीय घोषित कर दिया, मृत्युदण्ड का कसूरवार।
६५ और कुछों ने उन पर थूकना, और उनके चहरे को ढक कर घूँसे मारना, और उन से कहना आरम्भ कर दिया, भई प्रेरित-उपदेश दे दे अब: और नौकरों ने उन्हें अपने हाथों की हथेलियों से भी थपेड़ा।
६६ और जैसे पतरस नीचे राज-भवन में था, उसके पास उच्च पुरोहित की दासियों में से एक आती है:
६७ और जब उसने पतरस को स्वयं सेक लगाते हुए देखा, तो उसने उस पर अपनी दृष्टि टिकाई, और कहा, भई तू भी तो नासरत के यीशु के साथ ही था।
६८ परन्तु उसने यह अस्वीकार कर दिया, कहते हुए, भई मैं ये नहीं जानता, न ही मुझे समझ आ रहा है कि तुम ये क्या कह रही हो। और वो बाहर बरामदे में चला गया; और मुर्गे ने बाँग दे दी।
६९ और एक दासी ने उसे पुनः देखा, और वो उनसे कहने लग गई जो वहीं खड़े थे, ये तो उन्हीं में से एक है।
७० और पतरस ने यह पुनः अस्वीकार किया। और थोड़े से ही समय पश्चात, उन्होंने जो वहीं खड़े थे, पतरस से पुनः कहा, भई अवश्य ही तू भी उन्हीं में से एक है: क्योंकि तू गलील का निवासी है, और तेरी बोली वहीं से मिलती-जुलती है।
७१ परन्तु पतरस ने कोसना और सौगन्ध खाना आरम्भ कर दिया, कहते हुए, भई मैं इस व्यक्ति को नहीं जानता जिसके विषय में तुम बोल रहे हो।
७२ और दूसरी बार मुर्गे ने बाँग दे दी। और पतरस ने अपने मन में यीशु के शब्द का स्मरण किया, जो उन्होंने उस से कहा था, मुर्गे के दो बार बाँग देने से पहले ही, तुम मुझे तीन बार अस्वीकार कर दोगे। और जब उसने इस बात पर विचार किया, तो वो रो पड़ा।
पंद्रहवाँ अध्याय।
१ और तुरन्त ही सुबह, प्रमुख पुरोहितों ने वृद्ध-गणों, और लिपिकों, और सम्पूर्ण परिषद के साथ एक परामर्श-सभा बिठाई, और यीशु को बाँध कर उन्हें उठा ले जाकर, उन्हें पिलातुस को प्रदान कर दिया।
२ और पिलातुस ने उन से पूछा, क्या तू यहूदियों का सम्राट है? और उन्होंने उत्तर देते हुए उस से कहा, तुम कह रहे हो यह।
३ और प्रमुख पुरोहितों ने उनका कई बातों के विषय में दोषारोपण किया: परन्तु उन्होंने कोई भी उत्तर नहीं दिया।
४ और पिलातुस ने उनसे पुनः पूछा, कहते हुए, भई तू तो कोई भी उत्तर नहीं दे रहा है? देख ले, यह तेरे विरुद्ध कितनी बातों की गवाही दे रहे हैं?
५ परन्तु तब भी यीशु ने कोई भी उत्तर नहीं दिया; कि पिलातुस अचम्भित हो उठा।
६ अब उस भोज के अवसर पर, वो उन्हें एक बन्दी को रिहा कर दिया करता था, जिस किसी की भी उन्होंने याचना की।
७ और एक कोई बरअब्बा नामक आदमी था, जो उन्हीं के साथ बन्दी पड़ा था, जिन्होंने उसके साथ राजविद्रोह किया था, जिसने उस राजविद्रोह में हत्या भी कर दी थी।
८ और जनौघ प्रबलता से चीखता हुआ पिलातुस से माँग करने लग गया, कि वो उनके लिए वैसा ही करे, जैसा कि वो किया करता था।
९ परन्तु पिलातुस ने उन्हें उत्तर दिया, कहते हुए, क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें यहूदियों के सम्राट को रिहा कर दूँ?
१० क्योंकि वो जानता था, कि ईर्षा से जलन के कारण ही प्रमुख पुरोहितों ने उन्हें उसे प्रदान कर दिया था।
११ परन्तु प्रमुख पुरोहितों ने लोगों को भड़का दिया, कि वह अपेक्षाकृत उन्हें बरअब्बा को ही रिहा कर दे।
१२ और पिलातुस ने उत्तर दिया, और उनसे पुनः कहा, तो फिर क्या चाहते हो तुम, मैं इसके साथ क्या करूँ जिसे तुम यहूदियों का सम्राट पुकारते हो?
१३ और वो पुनः चीख पड़े, क्रूस पर चढ़ा दो इसे।
१४ तब पिलातुस ने उनसे कहा, क्यों भई, क्या बुराई की है इस ने? और वो और भी अधिक अत्याधिकता से चीख पड़े, क्रूस पर चढ़ा दो इसे।
१५ और लोगों को संतुष्ट करने की इच्छा से, पिलातुस ने बरअब्बा को उन्हें रिहा कर दिया, और जब उसने यीशु को कोड़ों से पिटवा दिया था, तो उसने उन्हें क्रूस पर चढ़ा देने के लिए प्रदान कर दिया।
१६ और वह सैनिक यीशु को प्रांतपति-निवास में ले चले, जो कि प्रेटोरियम कहलाया जाता है; और उन्होंने पूरी पलटन को एक साथ बुला लिया।
१७ और उन्होंने उन्हें एक जामुनी वस्त्र पहनवाया, और एक काँटों का मुकुट गूँथ कर, उसे उनके सर पर लगा दिया।
१८ और वो उनका अभिवादन करने लग गए, जय हो यहूदियों के सम्राट!
१९ और उन्होंने उन्हें सर पर एक सरकंडे से मारा, और उन पर थूका भी, और अपने घुटने टेकते हुए उनकी आराधना की।
२० और जब उन्होंने उनकी हँसी उड़ा ली थी, तो उन्होंने उन पर से वो जामुनी वस्त्र उतार लिया, और उनके अपने ही वस्त्र पहना दिए, और वो उन्हें क्रूस पर चढ़ाने के लिए बाहर ले चले।
२१ और वो देहात में से बाहर आगमन करते हुए एक सिमोन नामक कुरेने-निवासी को, जो वहीं से जा रहा था, सिकन्दर और रूफस का पिता, वो उसे विवश कर देते हैं उनका क्रूस ढोने के लिए।
२२ और वो उन्हें गुलगुता के स्थान में ले आते हैं, जो व्याख्यानुसार है, खोपड़ी का एक स्थान।
२३ और उन्होंने उन्हें अंगूर रस के साथ गन्धरस मिला हुआ पीने के लिए दिया; परन्तु उन्होंने उसे ग्रहण नहीं किया।
२४ और जब उन्होंने उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया था, तो उन्होंने उनके वस्त्र बाँट लिए, उन पर पर्चियाँ डाल कर, कि प्रत्येक व्यक्ति कौन सा वस्त्र ले।
२५ और वो तीसरी घड़ी थी, और उन्होंने उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया।
२६ और उनके दोषारोपण के अभिलेख पर लिखा था, यहूदियों का सम्राट।
२७ और उनके साथ वो दो चोरों को भी क्रूस पर चढ़ा देते हैं; एक उनके दाएँ हाथ पर, और दूसरा उनके बाएँ पर।
२८ और उस शास्त्र की पूर्ती हो गई थी, जो कहता है, और उत्क्रमिकों के साथ उनकी गिनती की गई थी।
२९ और वो जो वहाँ से गुज़र रहे थे, उन्होंने अपने सर हिलाते हुए, उन्हें धिक्कारा कहते हुए, अरे, तू जो मन्दिर को नष्ट करता है, और उसका तीन दिनो में निर्माण कर देता है,
३० बचाले स्वयं को भई, और क्रूस पर से नीचे उतर आ।
३१ इसी प्रकार प्रमुख पुरोहितों ने भी खिल्ली उड़ाते हुए, लिपिकों के साथ, आपस में कहा, इसने तो औरों को बचाया; ये स्वयं को नहीं बचा सकता।
३२ मसीहा, इस्राएल के सम्राट को अभी ही क्रूस पर से नीचे उतर जाने दो, ताकि हम देख सकें और विश्वास कर लें। और उन्होंने जो उनके साथ क्रूस पर चढ़े हुए थे, उन्हें गाली दी।
३३ और जब छटी घड़ी आ चुकी थी, तो समस्त भूमि पर नौवीं घड़ी तक अन्धकार छा गया था।
३४ और नौवीं घड़ी में यीशु प्रबल वाणी से चीख पड़े, कहते हुए, एलोय, एलोय, लामा साबाखथनाय? जो व्याख्यानुसार है, मेरे ईश्वर, मेरे ईश्वर, आपने मुझे क्यों त्याग दिया है?
३५ और उन में से कुछों ने जो साथ ही खड़े थे, जब उन्होंने यह सुना, तो कहा, देखो भई, ये तो एलियस को पुकार रहा है।
३६ और एक भागा, और उसने एक पानिसोख को सिरके से भर दिया, और उसे एक सरकंडे पर लगा कर उन्हें पीने के लिए दे दिया, कहते हुए, रहने दो भई; हम देखते हैं यदि एलियस इसे उतारने नीचे आता है या नहीं।
३७ और यीशु एक प्रबल वाणी से चीखे, और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
३८ और मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फट कर दो में हो गया।
३९ और जब उनके विपरीत खड़े हुए उस शतपती ने देखा कि उन्होंने किस प्रकार चीख कर अपने प्राण त्याग दिए थे, तो उस ने कहा, सच-मुच यह पुरुष ईश्वर के पुत्र थे।
४० वहीं स्त्रियाँ भी थीं जो दूर से देख रही थीं: जिन में थी मरियम मेगदलीन, और मरियम, छोटे याकूब और योशी की माँ, और सलोमी;
४१ (जो, जब वह गलील में थे, उनके पीछे-पीछे चली थीं, और उनकी सेवा की थी;) और कई अन्य स्त्रियाँ जो यीशु के साथ यरूशलेम तक ऊपर आई थीं।
४२ और अब जब सन्ध्या हो चली थी, चूँकि वो तैयारी का दिन था, अर्थात्, सैबथ से पहले का दिन,
४३ एरमथिया का यूसुफ, एक प्रतिष्ठित परामर्शदाता, जो ईश्वर के राज्य की भी प्रतीक्षा करता था, आया, और वो पिलातुस के पास साहस के साथ गया, और उसने यीशु के शव के लिए याचना की।
४४ और पिलातुस अचम्भित था कि वो मर चुके थे: और अपने पास शतपती को बुलाकर, उसने उस से पूछा, कि यदि उन्हें मरे हुए कुछ समय बीत चुका था क्या?
४५ और जब उसे यह शतपती द्वारा ज्ञात हो गया था, तो उसने वो शव यूसुफ को प्रदान कर दिया।
४६ और उसने महीन छालटी खरीदी, और उन्हें नीचे उतारा, और उन्हें उस छालटी में लपेट दिया, और उन्हें एक मक़बरे में लिटा दिया, जो एक चट्टान में से काटा गया था, और एक पत्थर को उस मक़बरे के द्वार पर लुढ़का दिया।
४७ और मरियम मेगदलीन, और योशी की माँ मरियम ने देखा, जहाँ उन्हें लिटा दिया गया था।
सोलहवाँ अध्याय।
१ और जब सैबथ बीत चुका था, तो मरियम मेगदलीन, और मरियम याकूब की माँ, और सलोमी ने, सुगन्धित इत्र खरीद लिए थे, ताकि वो आकर उनका विलेपन कर सकें।
२ और सप्ताह के प्रथम दिन, बहुत ही सुबह-सुबह, वो सूर्य के उदय होने पर मक़बरे पर आईं।
३ और उन्होंने आपस में कहा, भई हमारे लिए मक़बरे के द्वार पर से ये पत्थर कौन लुढ़काएगा?
४ और जब उन्होंने अपनी दृष्टि टिकाई, तो उन्होंने देखा कि वो पत्थर तो लुढ़का दिया जा चुका था: क्योंकि वो बहुत ही विशाल था।
५ और मक़बरे में प्रवेश करती हुईं, उन्होंने एक युवा पुरुष को दाएँ हाथ पर बैठा हुआ देखा, एक लम्बा श्वेत वस्त्र पहने हुए; और वो बहुत ही आश्चर्यचकित हो गईं।
६ और वो उन से कहता है, इतनी आश्चर्यचकित मत हो भई: तुम नासरत के यीशु को ढूँढ रही हो न, जिन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया गया था: भई वो तो उठ चुके हैं; वो यहाँ नहीं हैं: देखो वो स्थान जहाँ उन्होंने उन्हें लिटाया था।
७ परन्तु अपने पथ पर चली जाओ, और उनके शिष्यों को, और पतरस को बता दो, कि वो तुम से पहले गलील जा रहे हैं; वहीं तुम उन्हें देखोगे, जैसा उन्होंने तुम से कहा था।
८ और वो शीघ्रता से बाहर निकल आईं, और मक़बरे से भाग पड़ीं; चूँकि वो काँप रही थीं, और विस्मित थीं: न ही उन्होंने कुछ भी किसी अन्य व्यक्ति से कहा; क्योंकि वो डरी हुई थीं।
९ अब जब यीशु सप्ताह के पहले दिन सुबह-सुबह उठ चुके थे, तो वो सर्व प्रथम मरियम मेगदलीन को प्रकट हुए, जिस में से उन्होंने सात दानवों को बाहर निकाल फ़ैंका था।
१० और वो गई, और उन्हें बताया जो उनके साथ रहे थे, उनके शोक मनाते हुए और रोते-रोते।
११ और उन्होंने, जब उन्होंने सुन लिया था कि वो जीवित थे, और उसके द्वारा देख लिए गए थे, तो उन्होंने विश्वास नहीं किया।
१२ इसके पश्चात वो एक दूसरे रूप में, उन में से दो को प्रकट हुए, जैसे वो दोनो चलते हुए प्रदेश में जा रहे थे।
१३ और उन्होंने जाकर उन शेष को यह बताया: न ही उन्होंने इन पर विश्वास किया।
१४ इसके पश्चात् वो उन ग्यारह को प्रकट हुए जैसे वो भोजन के लिए बैठे थे, और उन्होंने उन्हें उनके अविश्वास और हृदय की कठोरता के कारण फटकारा, क्योंकि उन्होंने उन पर विश्वास नहीं किया, जिन्होंने उन्हें उनके उठ चुकने के पश्चात देख लिया था।
१५ और उन्होंने उन से कहा, चले जाओ तुम इस समस्त संसार में, और प्रत्येक प्राणी को शुभ-समाचार का प्रवचन दे दो।
१६ वो जो विश्वास करता है, और बपतिस्मित है, बच जाएगा; परन्तु वो जो विश्वास नहीं करता है, दण्डित हो जाएगा।
१७ और वो जो विश्वासी हैं, उनके पीछे-पीछे यह संकेत आएँगे; वो मेरे नाम में दानवों को बाहर निकाल फैंकेंगे; वो नई जीभों के साथ बोलेंगे;
१८ वो सर्पों को उठा लेंगे, और यदि वो कोई भी घातक पदार्थ पीएँगे, तो वो उन्हें हानि नहीं पहुँचाएगा; वो बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वो स्वस्थ हो जाएँगे।
१९ तो फिर प्रभु के उन से बोल लेने के पश्चात, उन्हें ऊपर स्वर्ग में ग्रहण कर लिया गया था, और वह ईश्वर के दाएँ हाथ पर विराजमान हो गए।
२० और वो बाहर निकल चले गए, और सभी स्थानो में प्रवचन दिया, प्रभु उनके साथ-साथ श्रम करते हुए, और बाद में घटते हुए संकेतों द्वारा शब्द को सुदृढ़ करते हुए। तथास्तु।
०१/१३/२०२२:
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