लूकस की पुस्तक: नया अनुबंध।(Luke)



पहला अध्याय। 


१ चूँकि कईयों ने उन घटनाओं के वर्णन का प्रबंध करना अपने हाथ में ले लिया है, जिन पर हमारे बीच अति-अवश्यता से विश्वास किया जाता है,

२ यहाँ तक कि जैसे उन्होंने उन्हें हमें प्रदान किया, जो आरम्भ से ही शब्द के प्रत्यक्षदर्शी और सेवक थे;

३ यह मुझे भी अच्छा प्रतीत हुआ, सभी घटनाओं की सब से आरम्भ से ही सटीक समझदारी रखते हुए, कि मैं तुम्हें अनुक्रमिकता से लिखूँ अति-उत्कृष्ट थियोफिलूस,

४ ताकि तुम उन घटनाओं की निश्चित्तता जान सको, जिन में तुम अनुदेशित कर दिए गए हो। 

५ यहूदा के राजा हेरोदेस के दिनो में, अबिया के कार्यकाल का एक ज़कर्याह नामक पुरोहित था: और उसकी पत्नी हारुन की बेटियों में से थी, और उसका नाम एलीशेबा था। 

६ और वो दोनो ईश्वर के समक्ष नेक थे, प्रभु के सभी आदेशों और विधानो में वो चलते हुए दोषरहित थे। 

७ परन्तु वो निःसन्तान थे, क्योंकि एलीशेबा बाँझ थी, और वो दोनो बहुत ही बूढ़े थे। 

८ और यह होने को आया, कि जैसे ज़कर्याह ईश्वर के समक्ष पुरोहित-पद का कार्य अपने कार्यकाल की पारी में कर रहा था,

९ पुरोहितों की रीतीनुसार, तो उसके नाम की पर्ची निकली, कि वो प्रभु के मन्दिर में जाकर सुगंधित-धूप जलाए। 

१० और लोगों का पूरा जनौघ सुगंधित-धूप के समय पर बाहर प्रार्थना कर रहा था। 

११ और वहीं उसे सुगंधित-धूप की बलिवेदी के दाएँ हाथ पर, प्रभु का एक दूत खड़ा प्रकट हुआ। 

१२ और जब ज़कर्याह ने उसे देखा, तो वो विचलित हो उठा, और उस पर भय छा गया। 

१३ परन्तु उस दूत ने उस से कहा, डरो मत ज़कर्याह: क्योंकि तुम्हारी प्रार्थना सुन ली गई है; तुम्हारी पत्नी एलीशेबा तुम्हें एक बेटा जनेगी, और तुम उसका नाम योहन पुकारोगे। 

१४ और तुम आनंदित और हर्षित होगे; और बहुत से लोग उसके जन्म पर हर्ष मनाएँगे। 

१५ क्योंकि वो प्रभु की दृष्टि में महान होगा, और वो न ही अंगूर-रस और न ही मदिरा पीएगा; और वो अपनी माँ के गर्भ से ही पवित्र-प्राण से भरा होगा। 

१६ और वो इस्राएल की सन्तानों में से कईयों को प्रभु उनके ईश्वर की ओर वापस मोड़ेगा। 

१७ और वो प्रभु से पहले, एलियस के प्राण और शक्ती में पिताओं के हृदय सन्तानों की ओर, और अवज्ञाकारियों को न्यायीयों की विद्या की ओर, वापस मोड़ने हेतु जाएगा; एक प्रकार के लोगों को उद्यत करने के लिए, जो प्रभु के लिए तैयार हों। 

१८ और ज़कर्याह ने दूत से कहा, मैं यह कैसे जानूँगा जी? क्योंकि मैं तो एक वृद्ध पुरुष हूँ, और मेरी पत्नी भी बहुत ही बूढ़ी है। 

१९ और दूत ने उत्तर देते हुए उस से कहा, मैं गब्रिएल हूँ, जो ईश्वर की उपस्थिति में खड़ा रहता हूँ; और मैं तुम से बोलने के लिए, और तुम्हें इन शुभ समाचारों को बताने के लिए भेजा गया हूँ। 

२० और देखो, तुम उस दिन तक मौन रहोगे, और बोल नहीं पाओगे, जब तक कि यह सभी बातें घट नहीं जातीं, क्योंकि तुम मेरे शब्दों पर विश्वास नहीं कर रहे हो, जो अपने समय में पूर्ण होंगे। 

२१ और लोग ज़कर्याह के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, और वो अचम्भित थे कि वो मन्दिर में इतने समय तक था। 

२२ और जब वो बाहर निकला, तो वो लोगों से बोल ही नहीं पाया: और उन लोगों ने यह आभास किया कि उसने मन्दिर में कोई दृश्य देख लिया था: चूँकि वो मूक रह कर ही उनसे संकेत कर रहा था। 

२३ और यह होने को आया, कि, जैसे ही उसकी परिचर्या के दिवस सम्पूर्ण हुए, तो उसने अपने घर की ओर प्रस्थान कर लिया। 

२४ और उन दिनो के पश्चात उसकी पत्नी एलीशेबा गर्भवती हो गई, और उसने स्वयं को पाँच महीने छुपा कर रखा, कहती हुई,

२५ इन दिनो में प्रभु ने मेरे साथ इस प्रकार व्यवहार किया है, जिन में उन्होंने मुझ पर दृष्टि डाली, मनुष्यों के बीच मेरा धिक्कार मिटाने हेतु। 

२६ और छटे महीने में, ईश्वर द्वारा दूत गब्रिएल को, गलील के नासरत नामक एक नगर में,

२७ एक कुँवारी के पास भेजा गया, जिसकी दाऊद के घराने के एक यूसुफ नामक पुरुष के साथ मंगनी हुई थी; और उस कुँवारी का नाम मरियम था। 

२८ और वो दूत उस कुँवारी के पास अंदर आया, और उसने कहा, जय हो, तुम जो अति-अनुग्रहित हो, प्रभु तुम्हारे साथ हैं: स्त्रीयों के बीच तुम धन्य हो। 

२९ और जब उसने उस दूत को देखा, तो वो उसके कथन से विचलित हो उठी, और वो ये विचार करने लग गई कि यह किस प्रकार का अभिवादन है? 

३० और उस दूत ने उस से कहा, डरो मत मरियम: क्योंकि तुम ने ईश्वर द्वारा अनुग्रह प्राप्त कर लिया है। 

३१ और, देखो, तुम गर्भवती हो जाओगी, और एक पुत्र को उतपन्न करोगी, और उनका नाम यीशु पुकारोगी। 

३२ वो महान होंगे, और वो सबसे उच्चतम के पुत्र कहलाए जाएँगे: और प्रभु ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान कर देंगे:

३३ और वो याकूब के घराने पर सदैवत्वता के लिए राज करेंगे; और उनका राज्य अन्तहीन होगा। 

३४ तब मरियम ने दूत से कहा, यह कैसे होगा जी, यह देखते हुए कि मैं तो किसी भी पुरुष को नहीं जानती?

३५ और दूत ने उत्तर दिया और उस से कहा, पवित्र-प्राण तुम पर आ जाएँगे, और सबसे उच्चतम की शक्ति तुम पर छा जाएगी: इसलिए वो पवित्र भी जिनका तुम में से जन्म होगा, ईश्वर के पुत्र कहलाए जाएँगे। 

३६ और देखो, तुम्हारी नातेदार-बहन एलीशेबा जो बाँझ कहलाई जाती थी, वो भी अपनी वृद्ध आयु में एक बेटे से गर्भवती हो गई है: और यह उसका छटा महीना है। 

३७ क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं होता है। 

३८ और मरियम ने कहा, देखें प्रभु की सेविका को; मेरे साथ आपके शब्दानुसार ही हो। और वो दूत उसके पास से चला गया। 

३९ और उन दिनो में मरियम उठ कर पहाड़ी प्रदेश में फुर्ती से चली गई, यहूदा के एक नगर में; 

४० और उसने ज़कर्याह के घर में प्रवेश किया, और एलीशेबा को प्रणाम किया। 

४१ और यह होने को आया, कि जब एलीशेबा ने मरियम का प्रणाम सुना, तो वो शिशु उसके गर्भ में उछल पड़ा; और एलीशेबा पवित्र-प्राण से भर उठी। 

४२ और वो एक प्रबल वाणी से बोली, और उसने कहा, धन्य हो तुम स्त्रीयों के बीच, और धन्य है तुम्हारे गर्भ का फल। 

४३ और कैसा है यह मेरा सौभाग्य, कि मेरे प्रभु की माँ मेरे पास आए?

४४ चूँकि जैसे ही तुम्हारे प्रणाम की वाणी मेरे कानो पर पड़ी, मेरे गर्भ में शिशु आनंदित हो उछल पड़ा। 

४५ और धन्य है वो जिसने विश्वास किया: क्योंकि उन कथनो की पूर्ती हो कर रहेगी जो उसे प्रभु द्वारा बता दिए गए हैं। 

४६ और मरियम ने कहा, मेरी आत्मा प्रभु का आवर्धन कर रही है, 

४७ और मेरा प्राण ईश्वर मेरे बचाने-वाले में हर्ष मना रहा है। 

४८ चूँकि उन्होंने अपनी दासी की दीनता को देख लिया है: इसलिए देखो, अब से लेकर सभी पीढ़ियाँ मुझे धन्य पुकारेंगी। 

४९ चूँकि वो जो बलशाली हैं, उन्हीं ने मेरे प्रति महान कार्य कर दिए हैं; और पवित्र है उनका नाम। 

५० और उनकी दया उन्हीं पर है जो उन से पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक डरते हैं। 

५१ उन्होंने अपनी बाँह से बल दिखला दिया है; उन्होंने अहंकारियों को उनके हृदयों की कल्पना में बिखेर दिया है। 

५२ उन्होंने बलशालियों को उनके सिंहासनो पर से नीचे उतार दिया है, और दीनो को उन्होंने पदोन्नत कर दिया है। 

५३ उन्होंने भूखों को अच्छाईयों से भर दिया है; और धनवानों को उन्होंने खाली-हाथ भेज दिया है। 

५४ अपनी करुणा के स्मरण में, उन्होंने अपने नौकर इस्राएल की सहायता की है; 

५५ जैसा कि वो हमारे पित्रों, अब्राहम, और उनके बीज से बोले थे, सदैवत्वता के लिए। 

५६ और मरियम ने एलीशेबा के संग लग-भग तीन महीने वास किया, और वो अपने ही घर वापस लौट चली। 

५७ अब एलीशेबा की गर्भावस्था का समय पूर्ण होने को आया कि वो जन्म दे; और उसने एक बेटे को जन्म दे दिया। 

५८ और उसके पड़ौसियों और नातेदार-भाई-बहनो ने सुना, कि प्रभु ने कैसे उस पर अत्यंत दया दिखला दी थी; और उन्होंने उसके साथ हर्ष मनाया। 

५९ और यह होने को आया, कि आठवें दिन वो उस बच्चे का ख़तना करने आए; और उन्होंने उस बच्चे को उसके पिता के नाम पर, ज़कर्याह पुकारा। 

६० और उसकी माँ ने उत्तर दिया, और कहा, ऐसे नहीं; बल्कि यह योहन पुकारा जाएगा। 

६१ और उन्होंने उस से कहा, तुम्हारे कुल में तो कोई भी नहीं है जो इस नाम से पुकारा जाता है। 

६२ और उन्होंने उसके पिता को संकेत किए, कि वो उसे कैसे पुकारना चाहेगा। 

६३ और उसने एक लिखने की पटिया मँगवाई, और लिखा, कहते हुए, इसका नाम योहन है। और उन सभी ने अचम्भा किया। 

६४ और उसका मूँह, और उसकी जीभ, तुरन्त ही खुल गए, और वो बोल पड़ा, और ईश्वर की प्रशंसा की। 

६५ और उन सभी पर जो उनके आस-पास चारों ओर बसते थे, एक भय छा गया: और यह सभी बातें यहूदा के सर्वत्र के पहाड़ी प्रदेश में सुनाई गईं।

६६ और उन सभी ने जिन्होंने इन्हें सुना, इनका अपने मन में विचार करते हुए कहा, यह बच्चा किस प्रकार का होगा! और प्रभु का हाथ उसके साथ था। 

६७ और उसका पिता ज़कर्याह, पवित्र-प्राण से भर उठा, और उसने प्रेरित-उपदेश दिया, कहते हुए,

६८ धन्य हों इस्राएल के प्रभु ईश्वर; क्योंकि उन्होंने अपने लोगों की सुध ले ली है, और उनका मुक्तिभुक्तान कर दिया है, 

६९ और हमारे लिए, अपने नौकर दाऊद के घराने में, एक बचाव का सींघ उठा दिया है;

७० जैसा उन्होंने अपने पवित्र पैग़म्बरों के मूँह से बोला था, जो संसार के प्रारम्भ से होते आए हैं: 

७१ कि हमारा बचाव हमारे शत्रुओं से, और उन सभी के हाथों से हो जाएगा, जो हम से घृणा करते हैं; 

७२ उस दया को क्रियान्वित कर देने हेतु, जिसकी हमारे पित्रों को प्रतिज्ञा प्रदान कर दी गई थी, और ईश्वर के पवित्र प्रतिज्ञापत्र का स्मरण करवा देने हेतु;

७३ वही शपथ, जिसकी उन्होंने हमारे पिता अब्राहम को प्रतिज्ञा प्रदान की थी,

७४ कि वो हमें यह अनुदान प्रदान कर देंगे, कि हम अपने शत्रुओं के हाथों से बाहर बचा लिए गए, उनकी सेवा निर्भयता से करें,

७५ उनके समक्ष पवित्रता और नेकी में, हमारे जीवन के समस्त दिन। 

७६ और तुम, बालक, सबसे उच्चतम के पैग़म्बर कहलाए जाओगे: चूँकि तुम प्रभु के चहरे से पहले उनके पथ तैयार करने हेतु जाओगे;

७७ उनके लोगों को बचाव का ज्ञान देने के लिए, उनके पापों के परिहार द्वारा,

७८ हमारे ईश्वर की कोमल करुणा द्वारा; जिसके द्वारा प्रभात ने उच्चत्व से हम पर अपनी दृष्टि टिका ली है,

७९ उन्हें उजाला प्रदान करने हेतु, जो अन्धेरे की, और मृत्यु की परछाई में बैठे हुए हैं, हमारे पैरों का शान्ति के पथ की ओर मार्गदर्शन कर देने हेतु। 

८० और वो बालक बड़ा हुआ, और प्राण में प्रबल हुआ, और वो इस्राएल के समक्ष अपनी दिखाई के दिन तक जँगली-क्षेत्रों में था। 




दूसरा अध्याय। 


१ और उन दिनो में ऐसा होने को आया, कि रोम के राजा औगुस्तुस द्वारा एक राजाज्ञा भेजी गई, कि समस्त राज्य की जनगणना की जाए। 

२ (और यह जनगणना सर्व प्रथम तब की गई थी जब सायरीनियुस सिरिया का राज्यपाल था।)

३ और सभी जनगणना के लिए चले गए, प्रत्येक अपने ही नगर में। 

४ और यूसुफ भी गलील से, नासरत के नगर में से, ऊपर यहूदा में दाऊद के नगर, जो कि बेतलेहम कहलाया जाता है, चला गया (चूँकि वो दाऊद के घराने और वंशावली में से था:)

५ अपनी मंगनी की हुई अत्यंत-गर्भवती पत्नी मरियम के साथ, जनगणना हेतु। 

६ और ऐसा हुआ, कि, जब वो वहीं थे, कि मरियम की गर्भावस्था के दिन सम्पूर्ण हुए। 

७ और उसने अपने प्रथम जन्मे पुत्र को जन्म दिया, और उन्हें लपेटने वाले वस्त्रों में लपेट दिया, और उन्हें एक चरनी में लिटा दिया; क्योंकि उनके लिए सराय में कोई स्थान नहीं था। 

८ और वहीं उसी देहात में चरवाहे खेत में वास कर रहे थे, रात्रि में अपने झुण्ड पर पहरेदारी करते हुए। 

९ और लो, प्रभु का दूत उनके पास आ खड़ा हुआ, और प्रभु की महिमा उनके चारों-ओर इर्द-गिर्द चमक रही थी: और वो घोरता से भयभीत हो गए।  

१० और उस दूत ने उन से कहा, भई डरो मत: क्योंकि देखो, मैं तुम्हें एक बहुत ही आनंद भरा शुभ-समाचार लाया हूँ, जो सभी लोगों के लिए होगा। 

११ क्योंकि तुम्हारे लिए इस दिन दाऊद के नगर में, एक बचाने-वाले जन्मे हैं, जो मसीहा प्रभु हैं। 

१२ और यह तुम्हारे लिए एक संकेत होगा; तुम उन शिशु को एक चरनी में लेटा हुआ, लपेटने वाले वस्त्रों में लिपटा हुआ पाओगे। 

१३ और अचानक उस दूत के साथ स्वर्गिक सेना का एक जनौघ, ईश्वर की प्रशंसा करता हुआ, और कहता हुआ आ गया,

१४ सर्वोच्चतम में ईश्वर के प्रति महिमा, और पृथ्वी पर शान्ति, लोगों के प्रति अच्छाई-भलाई। 

१५ और यह होने को आया, कि जब वो दूत उनके पास से स्वर्ग में वापस चले गए थे, तो उन चरवाहों ने एक दूसरे से कहा, हम इसी समय बेतलेहम जाते हैं, इस घटना को देखने के लिए जो घटी है, जिसकी जानकारी प्रभु ने हमें प्रदान कर दी है। 

१६ और वो फुर्ती से आए, और उन्होंने मरियम और यूसुफ को, और उन शिशु को चरनी में लेटा हुआ पाया। 

१७ और जब उन्होंने यह देख लिया था, तो उन्होंने इस बात का प्रचार बाहर कर दिया, जिसे उन्हें इन बच्चे समबन्धी बता दिया गया था। 

१८ और उन सभी ने जिन्होंने भी यह सुना, अचरज किया उन बातों पर, जो उन्हें चरवाहों द्वारा बता दी गई थीं।    

१९ परन्तु मरियम ने यह सभी बातें अपने ध्यान में रखीं, और उसने उन पर अपने मन में विवेचन किया। 

२० और वो चरवाहे वापस लौट गए, ईश्वर का महिमामंडन और उनकी प्रशंसा करते हुए, उन सभी बातों हेतु, जिन्हें उन्होंने देखा और सुना था, जैसा कि उन्हें बता दिया गया था। 

२१ और जब उन बालक के ख़तने के लिए आठ दिन सम्पूर्ण हो चुके थे, तब उनका नाम यीशु पुकारा गया, जिन्हें यह नाम उनके गर्भ में गर्भाधान से पहले ही उस दूत ने दे दिया था। 

२२ और जब मरियम के शूद्धीकरण के दिन, मूसा के नियमानुसार सम्पूर्ण हो चुके थे, तो वो यीशु को यरूशलेम ले आए, उन्हें प्रभु को प्रस्तुत करने हेतु;

२३ (जैसा कि प्रभु के नियम में लिखा हुआ है, प्रत्येक नर जो गर्भ खोलेगा, प्रभु के लिए पवित्र कहलाया जाएगा;)

२४ और बलि चढ़ाने हेतु, उसी के अनुसार, जो प्रभु के नियम में कहा गया है, एक जोड़ा कपोतों का, या दो युवा कबूतर। 

२५ और देखो, यरूशलेम में एक व्यक्ति था, जिसका नाम शिमोन था; और वही व्यक्ति न्यायोचित और एक श्रद्धालु-भक्त था, इस्राएल की सांत्वना की प्रतीक्षा करता हुआ: और पवित्र-प्राण उस पर थे। 

२६ और उसे पवित्र-प्राण द्वारा प्रत्यक्ष करवा दिया गया था, कि वो प्रभु के मसीहा को देखे बिना, मृत्यु को नहीं देखेगा। 

२७ और उसने प्राण द्वारा अन्दर मन्दिर में प्रवेश किया: और जब उन बालक यीशु के पिता-माता उन्हें अन्दर लाए, उनके लिए नियम की प्रथानुसार कर देने हेतु,

२८ तब शिमोन ने उन्हें अपनी बाहों में ऊपर ले लिया, और ईश्वर को आशीष दिया, और कहा,

२९ प्रभु, जी आपके शब्दानुसार ही अब आप अपने नौकर को शान्ति से प्रस्थान करने दे रहे हैं:

३० चूँकि मेरी आँखों ने आपका बचाव देख लिया है,

३१ जिसे आपने समस्त लोगों के चेहरों समक्ष तैयार कर दिया है;

३२ अन्यप्रजातियों को उज्ज्वलित कर देने के लिए एक उजाला, और आपके लोगों इस्राएल का वैभव। 

३३ और यूसुफ और उनकी माँ ने उन बातों पर अचम्भा किया जो यीशु के विषय में बोली गई थीं। 

३४ और शिमोन ने उन्हें आशीष दिया, और मरियम उनकी माँ से कहा, देखो, यह शिशु इस्राएल में कईयों के गिरने और उठने के लिए नियुक्त हैं, और एक संकेत के लिए जिसकी आलोचना की जाएगी;

३५ (हाँ, एक तलवार तुम्हारी अपनी ही आत्मा को भी भेद डालेगी,) ताकि कई हृदयों के विचार प्रत्यक्ष हो सकें। 

३६ और वहीं एक एन्नाह थी, एक पैग़म्बरिका, आशेर की जनजाति के फेनुएल की बेटी: वो बहुत ही दीर्घ आयु की थी, और वो अपने कुँवारेपन से सात वर्ष अपने पति के साथ रही थी;

३७ और वो एक विधवा थी, लगभग चौरासी वर्ष की आयु की, जो मन्दिर से नहीं जाती थी, बल्कि वो ईश्वर की सेवा रात-दिन उपवासों और प्रार्थनाओं से करती रहती थी। 

३८ और उसने उसी क्षण में आते हुए, इसी प्रकार प्रभु को धन्यवाद दिया, और उन सभी से उनके विषय में बोली जो यरूशलेम में मुक्तिभुक्तान की प्रतीक्षा में थे।  

३९ और जब उन्होंने प्रभु के नियमानुसार सभी रीतियों का पालन कर लिया था, तो वो गलील में वापस लौट चले, अपने ही नगर नासरत में। 

४० और वो बालक बड़े हुए, और प्राण में प्रबल हुए, विद्या से भरपूर: और ईश्वर की कृपा उन पर थी। 

४१ अब उनके पिता-माता प्रत्येक वर्ष, पार-करने के भोज के अवसर पर यरूशलेम जाया करते थे। 

४२ और जब वो बारह वर्ष के थे, तो वो भोज की रीतीनुसार ऊपर यरूशलेम चले गए। 

४३ और जब उन्होंने उन दिनो को पूर्ण कर लिया था, जैसे वो वापस जा रहे थे, तो बालक यीशु यरूशलेम में ही पीछे रह गए; और यूसुफ और उनकी माँ यह जानते न थे। 

४४ परन्तु वो, यह समझते हुए कि यीशु उन्हीं के समूह में ही थे, एक दिन की यात्रा के पथ पर चलते चले गए; और उन्होंने यीशु को अपने परिजनो और अपने परिचितों के बीच ढूँढा। 

४५ और जब वो उन्हें न पा सके, तो वो पुनः यरूशलेम की ओर मुड़ गए, उन्हें ढूँढते हुए। 

४६ और यह होने को आया, कि तीन दिनो पश्चात उन्होंने उन्हें मन्दिर में शिक्षकों के बीच बैठा हुआ पाया, उन्हें सुनते हुए, और उन से प्रश्न करते हुए।  

४७ और वो सभी जो उन्हें सुन रहे थे, उनकी समझदारी और उनके उत्तरों से आश्चर्यचकित थे। 

४८ और जब उन्होंने यीशु को देखा, तो वो विस्मित रह गए: और उनकी माँ ने उन से कहा, बेटे, तुम ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? देखो, तुम्हारे पिता और मैं तुम्हें दुखित होते हुए ढूँढते आए हैं। 

४९ और उन्होंने उन से कहा, यह कैसे है कि आप मुझे ढूँढ रहे थे? क्या आप यह जानते न थे कि मैं अवश्य ही अपने पिताश्री के काम-काज में लगा हूँगा? 

५० और उन्हें यह बात, जो उन्होंने उन से कही, समझ में नहीं आई। 

५१ और वो उनके साथ नीचे चले गए, और नासरत आ गए, और वो उनके आधीन थे: परन्तु उनकी माँ ने इन सभी कथनों को अपने मन में रख लिया। 

५२ और यीशु विद्या में, और कद में, और ईश्वर और मनुष्य के अनुग्रह में बढ़ते चले गए। 




तीसरा अध्याय। 


१ अब रोम के राजा तिबेरीयुस के राज्य के पन्द्रहवें साल में, पोनतियुस पिलातुस यहूदा का राज्यपाल होता हुआ, और हेरोदेस गलील का चतुरादिदारुक, और उसका भाई फिलिप ईतुरेया और त्रखोनीतिस के क्षेत्र का चतुरादिदारुक, और लुसानियस अबिलेने का चतुरादिदारुक,

२ और हन्ना और काइफ़ा उच्च पुरोहित होते हुए, ईश्वर का शब्द ज़कर्याह के बेटे योहन को जँगली-क्षेत्र में आया। 

३ और वो यर्दन के आस-पास के समस्त प्रदेश में पापों के परिहार के लिए, मन-परिवर्तन के बपतिस्मा का प्रवचन देता हुआ आ पहुँचा;

४ जैसा यह एसायस के शब्दों की पुस्तक में लिखा है, कहते हुए, जँगली-क्षेत्र में एक की वाणी चीखती हुई, प्रभु के पथ को उद्यत कर दो तुम, बना दो उनके पथों को सीधा। 

५ प्रत्येक घाटी भर दी जाएगी, और प्रत्येक पर्वत और पहाड़ी नीचे कर दिए जाएँगे; और टेढ़े-मेड़े सीधे बना दिए जाएँगे, और ऊबड़-खाबड़ पथों को समतल बना दिया जाएगा;

६ और प्रत्येक माँस ईश्वर के बचाव को देखेगा। 

७ तब उसने उस जनौघ से कहा जो उसके द्वारा बपतिस्मित होने आया था, अरे ओ विषैले-सर्पों की पीढ़ियों, तुम्हें आने वाले आक्रोश से भागने के लिए किसने चेतावनी दी है?

८ इसलिए मन-परिवर्तन के योग्य फल उत्पन्न करो: और अपने स्वयं में मत कहना आरम्भ करो, हमारे पास तो पिता के लिए अब्राहम है: क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि ईश्वर इन पत्थरों में से अब्राहम की सन्तानों को खड़ा कर देने में सक्षम हैं। 

९ और अभी ही पेड़ों की जड़ों पर कुल्हाड़ा रख दिया जा चुका है: इसलिए प्रत्येक पेड़ जो अच्छा फल उत्पन्न नहीं करता है, काट दिया जाता है नीचे, और झोंक दिया जाता है अग्नि में। 

१० और लोगों ने उस से पूछा, कहते हुए, तो फिर हम क्या करें जी?

११ वो उन्हें उत्तर देता है, और उन से कहता है, जिस के पास भी दो अंगरखे हैं, उसे उसे दे देने दो, जिस के पास एक भी न हो; और उसे जिस के पास भोजन है, उसे भी ऐसा ही कर लेने दो। 

१२ तब बपतिस्मित होने चुँगी-कर्मचारी भी आ गए, और उस से कहा, शिक्षक जी, हम क्या करें?

१३ और उसने उन से कहा, वो जो तुम्हें नियुक्त किया गया है उस से अधिक वसूल मत करो।

१४ और इसी प्रकार सैनिकों ने भी उस से पूछा, कहते हुए, जी और हम क्या करें? तो उसने उन से कहा, किसी भी व्यक्ति के साथ हिंसा मत करो, न ही किसी पर झूठा दोषारोप लगाओ; और अपने वेतन से संतुष्ट रहो। 

१५ और जैसे वह लोग अपेक्षा में थे, और सभी योहन के विषय में मन-ही-मन सोच-विचार कर रहे थे, कि यदि वो मसीहा था या नहीं;

१६ योहन ने उत्तर दिया, उन सभी से कहता हुआ, मैं तो वास्तव में ही तुम्हारा बपतिस्मा पानी से करता हूँ: परन्तु एक मुझ से भी अधिक बलशाली आ रहे हैं, जिनके जूतों का फीता भी मैं खोलने के योग्य नहीं हूँ: वही तुम्हारा बपतिस्मा पवित्र-प्राण और अग्नि से करेंगे: 

१७ जिनका सूप उनके हाथ में है, और वो अपने खलिहान का पूर्णता से शुद्धीकरण कर देंगे, और वो गेहूँ का अपनी खत्ती में संग्रहण कर लेंगे: परन्तु वो भूसे को अदमनीय अग्नि से भस्म कर डालेंगे। 

१८ और उसने अपनी अभिप्रेरणा से लोगों को कई अन्य बातों का प्रवचन दिया। 

१९ परन्तु चतुरादिदारुक हेरोदेस ने योहन के द्वारा, हेरोदेस के भाई फिलिप की पत्नी हेरोदियस के समबन्ध में, और उन सभी बुराईयों के समबन्ध में जो हेरोदेस ने की थीं, निन्दित हो,

२० इन सभी से बढ़कर एक और बुराई जोड़ डाली, कि उसने योहन को कारावास में बँद करवा दिया। 

२१ अब जब सभी लोग बपतिस्मित हो चुके थे, तो ऐसा होने को आया, कि यीशु के भी बपतिस्मित होते हुए, और प्रार्थना करते हुए, स्वर्ग खोल दिया गया था,

२२ और पवित्र-प्राण दैहिक रूप में एक छोटे कबूतर के समान उन पर उतर आए, और एक स्वर्गवाणी ने कहा, तुम मेरे अतिप्रिय पुत्र हो जिस में मैं अतिप्रसन्न हूँ। 

२३ और यीशु स्वयं लगभग तीस वर्ष की आयु के होने लगे थे, जो (जैसा अनुमान लगाया जाता था) बेटे थे यूसुफ के, जो बेटा था एली का,

२४ जो बेटा था मत्तात का, जो बेटा था लेवी का, जो बेटा था मलकी का, जो बेटा था यन्नई का, जो बेटा था यूसुफ का, 

२५ जो बेटा था मत्तित्या का, जो बेटा था अमोस का, जो बेटा था नहूम का, जो बेटा था असल्या का, जो बेटा था नग्गई का, 

२६ जो बेटा था मअथ का, जो बेटा था मत्तित्या का, जो बेटा था शिमी का, जो बेटा था यूसुफ़ का, जो बेटा था यूदा का, 

२७ जो बेटा था योअन्ना का, जो बेटा था रेसा का, जो बेटा था ज़रुब्बाबेल का, जो बेटा था शालतिएल का, जो बेटा था नेरी का,

२८ जो बेटा था मलकी का, जो बेटा था अद्दी का, जो बेटा था कोसम का, जो बेटा था एल्मदाम का, जो बेटा था अर का, 

२९ जो बेटा था योशे का, जो बेटा था एलाज़र का, जो बेटा था योरिम का, जो बेटा था मत्तात का, जो बेटा था लेवी का, 

३० जो बेटा था शिमोन का, जो बेटा था यूदा का, जो बेटा था यूसुफ का, जो बेटा था योनन का, जो बेटा था एलयाकिम का, 

३१ जो बेटा था मेलेआ का, जो बेटा था मेनन का, जो बेटा था मतत्ता का, जो बेटा था नेथन का, जो बेटा था दाऊद का, 

३२ जो बेटा था यिशय का, जो बेटा था ओबद का, जो बेटा था बोआज़ का, जो बेटा था सलमोन का, जो बेटा था नस्सोन का, 

३३ जो बेटा था अमीनादब का, जो बेटा था अराम का, जो बेटा था एसरोम का, जो बेटा था फैरेज़ का, जो बेटा था यूदा का,

३४ जो बेटा था याकूब का, जो बेटा था इसहाक का, जो बेटा था अब्राहम का, जो बेटा था थराह का, जो बेटा था नहोर का, 

३५ जो बेटा था सेरक का, जो बेटा था रगाऊ का, जो बेटा था फेलक का, जो बेटा था ईबर का, जो बेटा था सला का, 

३६ जो बेटा था कायनन का, जो बेटा था अर्पक्षद का, जो बेटा था शेम का, जो बेटा था नूह का, जो बेटा था लामेक का,

३७ जो बेटा था मथूसलाह का, जो बेटा था हनोक का, जो बेटा था यारद का, जो बेटा था मल्लेल का, जो बेटा था कायनन का, 

३८ जो बेटा था एनोश का, जो बेटा था शेथ का, जो बेटा था आदम का, जो था बेटा, ईश्वर का। 




चौथा अध्याय।   


१ और यीशु पवित्र-प्राण से परिपूर्ण होते हुए, यर्दन से वापस आ गए, और वो प्राण द्वारा जँगली-क्षेत्र में ले जाए गए। 

२ चालीस दिन वो दानव द्वारा परीक्षित हुए। और उन दिनो में उन्होंने कुछ भी नहीं खाया: और उन दिनो की समाप्ति के पश्चात्, उन्हें भूख लगी।  

३ और दानव ने उन से कहा, यदि तुम ईश्वर के पुत्र हो, तो इस पत्थर को आदेश दे दो कि यह रोटी बन जाए।

४ और यीशु ने उसे उत्तर दिया, कहते हुए, यह लिखा है, कि मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रत्येक शब्द से जिएगा।

५ और वो दानव उन्हें एक ऊँचे पर्वत पर ले जाकर, उन्हें संसार के समस्त राज्य समय के एक ही क्षण में दिखला देता है।

६ और दानव ने उन से कहा, मैं तुम्हें ये सम्पूर्ण शक्ती, और इनका वैभव दे दूँगा: चूँकि ये मुझे प्रदान कर दिया गया है; और जिसे भी मैं चाहूँ मैं उसे ये दे दूँगा। 

७ इसलिए यदि तुम मेरी आराधना करोगे, तो सभी कुछ तुम्हारा हो जाएगा। 

८ और यीशु ने उत्तर दिया, और उस से कहा, मेरे पीछे हट जा शैतान: चूँकि यह लिखा हुआ है, तुम प्रभु अपने ईश्वर की आराधना करोगे, और तुम केवल उन्हीं की ही सेवा करोगे। 

९ और दानव उन्हें यरूशलेम ले आया, और उसने उन्हें मंदिर के एक शिखर पर स्थित कर दिया, और उन से कहा, यदि तुम ईश्वर के पुत्र हो तो स्वयं को यहाँ से नीचे गिरा दो: 

१० क्योंकि यह लिखा हुआ है, वो अपने दूतों को तुम्हारे समबन्ध में आज्ञा देंगे, तुम्हें सुरक्षित रखने के लिए:

११ और वो तुम्हें अपने हाथों में ऊपर उठा लेंगे, कहिं किसी भी समय तुम अपने पैर को पत्थर से ठोकर न मार लो।  

१२ और यीशु ने दानव को उत्तर देते हुए, उस से कहा, यह कहा गया है, कि तुम प्रभु अपने ईश्वर को परखोगे नहीं। 

१३ और जब दानव ने समस्त परीक्षा समाप्त कर दी थी, तो उसने उन से कुछ समय के लिए प्रस्थान कर लिया। 

१४ और यीशु प्राण की शक्ती में गलील वापस आ गए; और उनकी प्रसिद्धी समस्त क्षेत्र में चारों ओर फैल गई। 

१५ और उन्होंने उनके यहूदी-आराधनालयों में शिक्षा प्रदान की, और उन्हें सभी लोगों द्वारा सराहना मिली। 

१६ और वह नासरत आ गए, जहाँ उनका लालन-पालन हुआ था, और जैसी उनकी प्रथा थी, वो सैबथ के दिन यहूदी-आराधनालय में गए, और वो पढ़ने के लिए खड़े हुए। 

१७ और उन्हें पैग़म्बर एसायस की पुस्तक दे दी गई थी। और जब उन्होंने वो पुस्तक खोल ली थी, तो उन्होंने वो स्थान पाया जहाँ यह लिखा हुआ था,

१८ प्रभु का प्राण मुझ पर है, क्योंकि उन्होंने दरिद्रों को शुभ-समाचार का प्रवचन देने के लिए मेरा अभिषेक कर दिया है; उन्होंने भेज दिया है मुझे टूटे-हृदय वालों को स्वस्थ करने के लिए, बन्दियों को छुटकारे का प्रवचन देने के लिए, नेत्रहीनों को दृष्टि की वापसी के लिए, घायलों को स्वतंत्र करने के लिए,

१९ प्रभु के स्वीकारयोग्य वर्ष की घोषणा करने के लिए। 

२० और उन्होंने वो पुस्तक बँद कर दी, और उसे पुनः सेवक को दे दी, और नीचे बैठ गए। और यहूदी-आराधनालय में उपस्थित सभी लोगों की आँखें उन पर गढ़ी हुई थीं। 

२१ और उन्होंने उनसे कहना आरम्भ किया, इस दिन तुम्हारे कानों में यह शास्त्र पूर्ण हो चुका है। 

२२ और सभी ने उन्हें साक्ष्य दिया, और अचरज किया, उन विनीत शब्दों पर जो उनके मुँह से प्रवृत्त हुए थे। और उन्होंने कहा, क्या यही यूसुफ का बेटा नहीं है?

२३ और उन्होंने उनसे कहा, तुम अवश्य ही मुझ से यह नीती-वचन कहोगे, चिकित्सक, स्वयं को स्वस्थ कर लो: जो कुछ भी हम ने सुना है जो कफरनहूम में किया गया था, उसे यहीं अपने देश में भी कर दो। 

२४ और उन्होंने कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कोई भी पैग़म्बर अपने स्वयं के देश में स्वीकृत नहीं होता है। 

२५ परन्तु मैं तुम्हें एक सत्य बताता हूँ, एलियस के दिनो में इस्राएल में कई विधवाएँ थीं, जब गगन तीन साल और छह महीने बँद रहा था, जब एक महा-अकाल भूमी के समस्त सर्वत्र में था;

२६ परन्तु उन में से किसी के पास भी एलियस को नहीं भेजा गया था, सिवाय सिदोन के एक नगर सरेप्टा में, एक स्त्री के पास जो एक विधवा थी। 

२७ और पैगम्बर एलिसायूस के समय इस्राएल में कई कुष्ठरोगी थे; और उन में से कोई भी स्वच्छ नहीं किया गया था, सिवाय नेमन सिरियावासी के। 

२८ और जब यहूदी-आराधनालय में उपस्थित सभी लोगों ने यह बातें सुन ली थीं, तो वो आक्रोश से भर कर,

२९ उठ खड़े हुए, और उन्होंने उन्हें नगर से बाहर खदेड़ दिया, और वो उन्हें उस पहाड़ी के किनारे तक ले गए, जिस पर उस नगर का निर्माण हुआ था, ताकि वो उन्हें सर के बल ढकेल दें।  

३० परन्तु यीशु उन्हीं के बीच में से जाते हुए, अपने पथ पर चलते चले गए,

३१ और नीचे गलील के एक नगर, कफरनहूम आ पहुँचे, और उन्हें सैबथ के दिनो में सिखाया। 

३२ और वह उनके उपदेश से आश्चर्यचकित थे: क्योंकि उनका शब्द शक्तिशाली था। 

३३ और यहूदी-आराधनालय में एक व्यक्ति था, जिस में एक अस्वच्छ दानव का प्राण था; और वो एक प्रबल वाणी से चीख पड़ा,

३४ कहता हुआ, जी हमें अकेला छोड़ दें; हमें आपसे क्या लेना-देना नासरत के यीशु? क्या आप हमें नष्ट करने आएँ हैं? मैं जानता हूँ आप कौन हैं, ईश्वर के वो पवित्र-एक। 

३५ और यीशु ने उसे डाँटा, कहते हुए, भई चुप कर जा, और इस में से बाहर निकल आ। और जब उस दानव ने उस व्यक्ति को बीच में पटक डाला था, तो वो उस में से बाहर निकल आया, और उसने उसे हानि नहीं पहुँचाई।  

३६ और वो सभी विस्मित हो आपस में बोल रहे थे, कहते हुए, भई क्या शब्द है यह! क्योंकि यह तो अस्वच्छ प्राणों को भी प्राधिकारिकता और शक्ती से आदेश देते हैं, और वो बाहर निकल आते हैं। 

३७ और यीशु की प्रसिद्धी बाहर प्रदेश के प्रत्येक स्थान में चारों ओर फैल गई। 

३८ और वह यहूदी-आराधनालय से उठ कर बाहर चले गए, और सिमोन के घर में प्रवेश किया। और सिमोन की पत्नी की माँ एक प्रखर ज्वर से ग्रस्त थी; और उन्होंने उन से उसके लिए विनती की। 

३९ और उन्होंने उसके निकट खड़े हो कर उस ज्वर को डाँटा; और उस ज्वर ने उसे छोड़ दिया: और वो तुरंत ही उठ गई, और उसने उन जनो की सेवा की। 

४० अब जब सूरज ढल रहा था, तो वो सभी जिनके पास विभिन्न रोगों से बीमार लोग थे, उन्हें यीशु के पास ले आए; और उन्होंने अपने हाथों को उन में से प्रत्येक पर रखा, और उन्हें स्वस्थ कर दिया। 

४१ और कईयों में से दानव भी बाहर निकल आए, चीखते हुए, और कहते हुए, आप ही अभिषिक्त ईश्वर के पुत्र हैं। और उन्होंने उन्हें डाँटते हुए बोलने की अनुमती नहीं दी: चूँकि वो दानव जानते थे कि वही मसीहा थे। 

४२ और जब दिन हो चला था, तो यीशु ने प्रस्थान कर लिया, और वो एक निर्जन-क्षेत्र में चले गए: और लोगों ने उन्हें ढूँढा, और उनके पास आ गए, और उन्होंने यीशु को रोक कर रखा, कि वो उन्हें छोड़ कर न चले जाएँ। 

४३ परन्तु उन्होंने उन से कहा, भई मुझे ईश्वर के राज्य का प्रवचन अन्य नगरों में भी देना है, चूँकि इसलिए ही तो मुझे भेजा गया है। 

४४ और उन्होंने गलील के यहूदी-आराधनालयों में प्रवचन दिए। 





पाँचवाँ अध्याय।   


१ और यह होने को आया, कि जैसे लोग ईश्वर के शब्द को सुनने हेतु उनके साथ धक्का-मुक्की मचा रहे थे, तो वो गिनेसरेत की झील के साथ खड़े हो गए,

२ और उन्होंने दो जलयानो को देखा जो झील के साथ ही खड़े थे: परन्तु मछुआरे उन में से बाहर निकल कर जा चुके थे, और अपने जालों को धो रहे थे। 

३ और उन्होंने उन जलयानो में से एक में प्रवेश किया, जो सिमोन का था, और उस से निवेदन किया कि वो जलयान को भूमी से बस थोड़ी ही दूर ले जाए। और वो नीचे बैठ गए, और लोगों को जलयान में से सिखाया। 

४ अब जब वो प्रवचन देना समाप्त कर चुके थे, तो उन्होंने सिमोन से कहा, गहराई में ले जाओ, और अपने जालों को पकड़ने के लिए नीचे कर दो। 

५ और सिमोन ने उत्तर देते हुए उन से कहा, गुरुजी, हम ने तो सारी रात श्रम किया है, और हम कुछ भी नहीं पकड़ पाए: तथापि आपके शब्द पर मैं जाल को नीचे कर दूँगा। 

६ और जब उन्होंने यह कर दिया था, तो उन्होंने मछलियों का एक बड़ा जनौघ घेरे में ले लिया: और उनका जाल टूट गया। 

७ और उन्होंने अपने साथियों को संकेत किया, जो दूसरे जलयान में थे, कि वो आएँ और उनकी सहायता करें। और वो आ गए, और उन्होंने दोनो जलयानो को भर लिया, कि वो तो डूबने लग गए!

८ जब सिमोन पतरस ने यह देखा, तो वो यीशु के घुटनो पर नीचे गिर पड़ा, कहता हुआ, जी मुझ से दूर चले जाएँ; चूँकि मैं तो एक पापी पुरुष हूँ, हे प्रभु। 

९ क्योंकि वो, और वो सभी जो उसके साथ थे, उन मछलियों की पकड़ पर आश्चर्यचकित थे, जिन्हें उन्होंने पकड़ लिया था; 

१० और इसी प्रकार सिमोन के साथी, ज़ब्दी के बेटे, याकूब और योहन भी आश्चर्यचकित थे। और यीशु ने सिमोन से कहा, डरो मत; अब से लेकर तुम मनुष्यों को पकड़ोगे। 

११ और जब वो अपने जलयानो को किनारे पर ले आए थे, तो उन्होंने सभी का त्याग कर दिया, और उनके पीछे-पीछे चल दिए। 

१२ और यह होने को आया, जब यीशु किसी एक नगर में थे, देखो तो, कुष्ठ रोग से भरा एक आदमी: जो यीशु को देख कर अपने मूँह के बल गिर पड़ा, और उन से विनती की, कहते हुए, प्रभु, जी यदी आप चाहें,  तो आप मुझे स्वच्छ कर सकते हैं। 

१३ और उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और उसे छुआ, कहते हुए, मेरी यही इच्छा है: बन जाओ तुम स्वच्छ। और तुरन्त ही उसका कुष्ठ रोग उस से दूर हो गया। 

१४ और उन्होंने उसे आज्ञा दी कि वो किसी भी व्यक्ति को यह न बताए: बल्कि जाओ, और स्वयं को पुरोहित से दिखवा लो, और अपने स्वच्छिकरण के लिए, उसी के अनुसार चढ़ा दो, जैसा मूसा ने आदेश दिया था, उनके प्रति एक साक्ष्य के लिए।

१५ परन्तु तब भी यीशु की कीर्ती अधिकता से बाहर बढ़ती ही चली गई: और विशाल जनौघ उन्हें सुनने, और उनके द्वारा अपनी दुर्बलताओं से स्वस्थ होने के लिए एक साथ आए। 

१६ और यीशु स्वयं जँगली-क्षेत्र में अलग चले गए, और प्रार्थना की। 

१७ और किसी एक दिन ऐसा होने को आया, कि जैसे वो सिखा रहे थे, कि वहीं गलील की प्रत्येक नगरी, और यहूदा, और यरूशलेम में से आए हुए फैरिसी और नियम के धर्म-अध्यापक बैठे थे: और प्रभु की शक्ती उन्हें स्वस्थ करने के लिए उपस्थित थी। 

१८ और देखो, लोग बिस्तर में एक लकवे से पीड़ित आदमी को ले आए: और वो उसे अन्दर लाने के लिए, और उसे यीशु के समक्ष लिटाने के लिए, साधन ढूँढ रहे थे। 

१९ परन्तु जब वो जनौघ के कारण उसे अन्दर लाने के लिए कोई भी साधन न ढूँढ सके, तो उन्होंने उस घर की छत पर ऊपर चढ़ कर, उसे खपरैल में से ही उसके बिस्तर समेत, उसे यीशु के समक्ष बीच में नीचे कर दिया। 

२० और जब यीशु ने उनका विश्वास देखा, तो उन्होंने उस से कहा, भईया तुम्हारे पाप तुम्हें क्षमा हैं। 

२१ और लिपिकों और फैरिसियों ने विचार करना आरम्भ कर दिया, कहते हुए, भई ये कौन है जो ईश्वर-निंदाएँ बोल रहा है? कौन पापों को क्षमा कर सकता है, सिवाय केवल ईश्वर के?

२२ परन्तु जब यीशु ने उनके विचारों का आभास कर लिया था, तो उन्होंने उत्तर देते हुए उन से कहा, अपने हृदयों में तुम क्या विचार कर रहे हो भई? 

२३ क्या सरल है, ये कहना कि तुम्हारे पाप तुम्हें क्षमा हों; या ये कहना, ऊपर उठ जाओ और चलो?

२४ परन्तु ताकि तुम ये जान जाओ कि मनुष्य-पुत्र के पास पृथ्वी पर पापों को क्षमा करने की शक्ति है, (तो उन्होंने उस लकवे से बीमार को कहा,) मैं कहता हूँ तुम से, उठो भई, और अपना बिस्तर लो, और अपने घर चले जाओ।

२५ और तुरन्त ही वो उन जनो के समक्ष उठ गया, और उसने उसे लिया जिस पर वो लेटा हुआ था, और अपने घर ईश्वर को गौरवान्वित करता हुआ चला गया। 

२६ और वो सभी विस्मित रह गए, और उन्होंने ईश्वर को गौरवान्वित किया, और भय से भर गए, कहते हुए, भई आज तो हम ने अनोखी घटनाएँ देखीं हैं!

२७ और इन घटनाओं के पश्चात यीशु आगे गए, और उन्होंने लेवी नामक एक चुंगी-कर्मचारी को चुंगी-घर में बैठा हुआ देखा: और उन्होंने उस से कहा, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ। 

२८ और उसने सब कुछ छोड़ दिया, और वो उठा, और वो यीशु के पीछे-पीछे चल दिया। 

२९ और लेवी ने यीशु के लिए अपने ही घर में एक बड़ा भोज रखा: और वहीं चुंगी-कर्मचारियों का, और, औरों का एक बड़ा समूह था, जो उनके साथ नीचे बैठा हुआ था। 

३० परन्तु उनके लिपिक और फैरिसी यीशु के शिष्यों के विरुद्ध बड़बड़ा रहे थे, कहते हुए, तुम चुंगी-कर्मचारियों और पापियों के साथ क्यों खा-पी रहे हो?

३१ और यीशु ने उत्तर देते हुए उन से कहा, वो जो स्वस्थ हैं, उन्हें चिकित्सक की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें जो अस्वस्थ हैं। 

३२ मैं नेकों को नहीं, बल्कि पापियों को मन-परिवर्तन के लिए बुलाने आया हूँ। 

३३ और उन्होंने यीशु से कहा, योहन के शिष्य, और इसी प्रकार फैरिसियों के शिष्य, इतनी बार उपवास और प्रार्थनाएँ क्यों करते हैं; परन्तु तुम्हारे शिष्य खाते-पीते रहते हैं?

३४ और उन्होंने उन से कहा, क्या तुम दुल्हन-कक्ष के सखाओं को, दूल्हे के उनके साथ-साथ रहते-रहते, उपवास रखवा सकते हो क्या?

३५ परन्तु वो दिन आएँगे, जब दुल्हा उन से ले लिया जाएगा, और तब वो उन दिनो में उपवास रखेंगे। 

३६ और यीशु उन से एक दृष्टान्त भी बोले; कोई भी व्यक्ति नए कपड़े का टुकड़ा पुराने पर नहीं लगाता है; क्योंकि वो नया पुराने में चीरा बना देता है, और वो टुकड़ा भी जो नए में से बाहर निकाला गया था, पुराने से सहमत नहीं होता है। 

३७ और कोई भी व्यक्ति नया अंगूर-रस पुरानी बोतलों में नहीं डालता है: अन्यथा नया अंगूर-रस बोतलों को फोड़ डालता है, और बिखर जाता है, और वो बोतलें नष्ट हो जाती हैं। 

३८ बल्कि नया अंगूर-रस नई बोतलों में ही डाला जाना चाहिए; और दोनो का परिरक्षण हो जाता है।

३९ कोई भी व्यक्ति पुराने अंगूर-रस को पीकर, तुरन्त ही नए अंगूर-रस की इच्छा नहीं करता है, चूँकि वो  कहता है, भई, पुराना ही बेहतर है। 



छटा अध्याय।  


१ और यह होने को आया कि पहले के पश्चात, दूसरे सैबथ के दिन, यीशु अनाज के खेतों में से होते हुए जा रहे थे; और उनके शिष्य अनाज की बालियाँ तोड़-तोड़ कर खा रहे थे, अपने हाथों में उन्हें मसल-मसल कर। 

२ और फैरिसियों में से कुछों ने उन से कहा, तुम सैबथ के दिनो में वो क्यों कर रहे हो जो न्यायी नहीं है करना?

३ और यीशु ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा, क्या तुम ने इतना सा भी नहीं पढ़ा, कि दाऊद ने क्या किया था, जब वो स्वयं और वो जो उसके साथ थे, भूखे थे?

४ कि कैसे उसने ईश्वर के घर में प्रवेश किया, और उसने भेंट की रोटी भी लेकर खाई, और उसने उन्हें भी दी जो उसके साथ थे; जिसका खाना न्यायी नहीं है, सिवाय केवल पुरोहितों के लिए? 

५ और उन्होंने उन से कहा, कि मनुष्य-पुत्र सैबथ का भी प्रभु है। 

६ और यह भी होने को आया कि किसी अन्य सैबथ पर, कि उन्होंने यहूदी-आराधनालय में प्रवेश किया और शिक्षा प्रदान की: और वहीं एक व्यक्ति था जिसका दायाँ हाथ सूखा हुआ था। 

७ और लिपिक और फैरिसी इस ताक में थे, कि यदि वो सैबथ के दिन पर उसे स्वस्थ करते हैं या नहीं; ताकि वो उन पर दोषारोपण लगा सकें।

८ परन्तु यीशु उनके विचारों से परिचित थे, और उन्होंने उस व्यक्ति से कहा जिसका हाथ सूखा हुआ था, उठ जाओ, और बीच में आगे खड़े हो जाओ। और वो उठा और आगे खड़ा हो गया। 

९ तब यीशु ने उनसे कहा, मैं तुम से एक बात पूछूँगा; क्या सैबथ के दिनो में अच्छा करना न्यायी है, या बुरा करना? जीवन बचाना, या उसे नष्ट कर देना?

१० और चारों ओर उन सभी को देखते हुए, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, अपना हाथ आगे बढ़ाओ। और उसने ऐसा ही कर दिया: और उसका हाथ दूसरे जैसा, स्वस्थ पुनःस्थापित हो गया।  

११ और वो तो भई बावलेपन से भर उठे; और उन्होंने एक दूसरे के साथ गोष्ठी की, कि वो यीशु के साथ क्या करें?

१२ और यह होने को आया उन दिनो में, कि वो एक पर्वत में प्रार्थना करने चले गए, और उन्होंने सारी रात लगातार ईश्वर से प्रार्थना की। 

१३ और जब दिन हो चला था, तो उन्होंने अपने शिष्यों को अपने पास बुलाया: और उन में से उन्होंने बारह को चुना, जिन्हें उन्होंने अपौस्ल का नाम भी दिया;

१४ सिमोन, (जिसे उन्होंने पतरस का नाम भी दिया,) और उसका भाई अन्द्रेयास, याकूब और योहन, फिलिप और बरतोलोमी,

१५ मत्ती और थोमस, हलफई का बेटा याकूब, सिमोन जिसका नाम ज़ेलोटीस था,

१६ और याकूब का भाई यहूदा, और यूदस इस्करियोती, जो वही विश्वासघाती भी था। 

१७ और वह उनके साथ नीचे आकर मैदान में खड़े हो गए, और उनके शिष्यों का समूह, और समस्त यहूदा और यरूशलेम में से, और टाय्र और सिदोन के समुद्र तटों में से, लोगों का एक बड़ा जनौघ, जो उन्हें सुनने और अपने रोगों से स्वस्थ होने के लिए आया था,

१८ और वो जो अस्वच्छ प्राणों से व्यग्रित थे: और वो स्वस्थ कर दिए गए थे। 

१९ और वो समस्त जनौघ उन्हें छूना चाहता था: चूँकि उन में से विक्रम बाहर निकल कर, उन सभी को स्वस्थ कर रहा था। 

२० और उन्होंने अपनी आँखें अपने शिष्यों पर उठाईं, और कहा, धन्य हो तुम दरिद्र: चूँकि तुम्हारा ही ईश्वर का राज्य है।  

२१ धन्य हो तुम जो अभी भूखे हो: चूँकि तुम संतुष्ट कर दिए जाओगे। धन्य हो तुम जो अभी रो रहे हो: चूँकि तुम हँसोगे। 

२२ धन्य हो तुम जब लोग तुम से घृणा करेंगे, और जब वो तुम्हारा अपनी संगति से बहिष्कार कर देंगे, और तुम्हें धिक्कारेंगे, और तुम्हारा नाम बुरा समझ कर निष्कासित कर देंगे, मनुष्य-पुत्र के वास्ते।  

२३ उसी दिन हर्ष मना लेना तुम, और आनन्द से उछल जाना: क्योंकि देखो, विशाल है तुम्हारा फल स्वर्ग में: चूँकि इसी ही प्रकार इनके पित्रों ने पैग़म्बरों के साथ किया था। 

२४ परन्तु हाय पड़े तुम पर जो धनवान हो! चूँकि तुम अपना सुख-चैन प्राप्त कर चुके हो।  

२५ हाय पड़े तुम पर जो संतुष्ट हो! क्योंकि तुम्हें भूख लगेगी। हाय पड़े तुम पर जो अभी हँस रहे हो! क्योंकि तुम शोक मनाओगे और रोगे। 

२६ हाय पड़े तुम पर, जब सभी लोग तुम्हारे विषय में भला बोलेंगे! चूँकि इसी प्रकार इनके पित्रों ने झूठे पैग़म्बरों के साथ किया था। 

२७ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से जो सुन रहे हो, अपने शत्रुओं से प्रेम करो, अच्छा करो उनके लिए जो तुम से घृणा करते हैं,

२८ आशीष दो उन्हें जो तुम्हें श्रापित करते हैं, और उनके लिए प्रार्थना करो जो तुम्हारा द्वेषपूर्णता से प्रयोग करते हैं। 

२९ और जो तुम्हें एक गाल पर थप्पड़ मारता है, तो उसे अपना दूसरा गाल भी प्रस्तुत कर दो; और वो जो तुम्हारा चौगा ले जा रहा है, उसे तुम्हारा अंगरखा भी ले जाने से मत रोको। 

३० दे दो प्रत्येक व्यक्ति को जो माँगता है तुम से: और उस से जो तुम्हारा सामान ले जा रहा है, उसे पुनः वापस मत माँगो। 

३१ और जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उसी प्रकार उनके साथ करो। 

३२ चूँकि यदि तुम उन्हीं से प्यार करते हो जो तुम से प्यार करते हैं, तो भई क्या कृतज्ञता रही तुम्हारे पास? चूँकि पापी भी तो उन से प्यार करते हैं, जो उन्हीं से प्यार करते हैं। 

३३ और यदि तुम उनके लिए अच्छा करते हो जो तुम्हारे लिए अच्छा करते हैं, तो भई क्या कृतज्ञता रही तुम्हारे पास? क्योंकि पापी भी तो ऐसा ही करते हैं। 

३४ और यदि तुम उन्हें उधार देते हो, जिन से तुम वापस वसूल करने की आशा रखते हो, तो क्या कृतज्ञता रही तुम्हारे पास? चूँकि पापी भी तो पापियों को उधार देते हैं, उतना ही वापस वसूल करने की इच्छा से। 

३५ परन्तु तुम अपने शत्रुओं से प्रेम करो, और अच्छाई करो, और बिना वसूली की आशा रखे उधार दे दो; और तुम्हारा फल विशाल होगा, और तुम सब से उच्चतम की सन्तानें बन जाओगे: चूँकि वो करुणामई हैं, दोनो कृतघ्नों के प्रति, और बुरों के प्रति। 

३६ इसलिए बन जाओ तुम दयावान, जैसे तुम्हारे पिताश्री भी हैं दयावान। 

३७ आँको मत, और तुम भी नहीं आँके जाओगे; दण्डनीय-घोषित मत करो, और तुम भी दण्डनीय-घोषित नहीं किए जाओगे: क्षमा कर दो, और तुम भी क्षमा कर दिए जाओगे:

३८ दे दो, और वो तुम्हें दे दिया जाएगा; अच्छे माप में, दबा कर, और इकट्ठा झकझोरा हुआ, और बाहर उभरता हुआ, लोग तुम्हें तुम्हारी बाहों में दे देंगे। क्योंकि उसी माप से जिस से तुम औरों को मापते हो उसी से तुम भी पुनः मापे जाओगे।

३९ और उन्होंने उनसे एक दृष्टान्त बोला, क्या अन्धा अन्धे का नेतृत्व कर सकता है? क्या वो दोनो नाले में ही नहीं गिर जाएँगे?

४० शिष्य अपने गुरु से बढ़कर नहीं है: परन्तु वो प्रत्येक जो परिपूर्ण है अपने गुरु समान ही बन जाएगा। 

४१ और तुम क्यों उस तिनके को देख रहे हो जो तुम्हारे भाई की आँख में है, परन्तु तुम उस लट्ठ का आभास नहीं कर रहे हो जो तुम्हारी अपनी ही आँख में है?

४२ या तुम कैसे कह सकते हो अपने भाई से, भाई, मुझे वो तिनका निकाल लेने दो जो तुम्हारी आँख में है, जबकि तुम स्वयं उस लट्ठ को नहीं देख सकते जो तुम्हारी अपनी ही आँख में है? अरे ढोंगी, पहले अपनी आँख में से उस लट्ठ को बाहर फेंक: और तब तू स्पष्टता से देख सकेगा अपने भाई की आँख में से उसके तिनके को बाहर निकालने के लिए।

४३ चूँकि एक अच्छा पेड़ भ्रष्ट फल नहीं उत्पन्न करता है; न ही एक भ्रष्ट पेड़ अच्छा फल उत्पन्न करता है। 

४४ क्योंकि प्रत्येक पेड़ अपने स्वयं के ही फल से जाना जाता है। क्योंकि काँटों में से लोग अंजीरों को नहीं इकट्ठा करते हैं, न ही कँटीली झाड़ियों में से वो अंगूरों को तोड़ते हैं। 

४५ एक अच्छा व्यक्ति अपने हृदय के अच्छे भण्डार में से वो बाहर निकालता है जो अच्छा है: और एक बुरा व्यक्ति अपने हृदय के बुरे भण्डार में से वो जो बुरा है; क्योंकि उसके हृदय की बहुतायत में से ही उसका मूँह बोलता है। 

४६ और तुम मुझे क्यों प्रभु-प्रभु पुकारते रहते हो, और उन बातों को नहीं करते जो मैं कहता हूँ?

४७ जो कोई भी मेरे पास आता है, और मेरे कथनो को सुनता है, और उन्हें करता है, मैं बताऊँगा तुम्हें कि वो किसके समान है:

४८ वो उस व्यक्ति के समान है जिसने एक घर का निर्माण किया, और गहरी खुदाई की, और नीव एक चट्टान पर डाल दी: और जब प्रलय उठा, तो उस नदी ने उस घर को उग्रता से पीटा, और वो उसे नहीं हिला सकी: चूँकि वो एक चट्टान पर संस्थापित था। 

४९ लेकिन वो जो सुनता है, और उन्हें नहीं करता है, उस व्यक्ति के समान है जिसने बिना नीव के धरती पर एक घर का निर्माण किया; जिसे नदी ने उग्रता से पीटा, और वो तुरंत ही गिर गया; और उस घर का विनाश, विशाल था। 




सातवाँ अध्याय।   


१ अब जब उन्होंने लोगों की सुनवाई में अपने सभी कथनो का अन्त कर दिया था, तो उन्होंने कफरनहूम में प्रवेश किया। 

२ और किसी एक शतपति का नौकर, जो उसे प्यारा था, बीमार था, और वो मरने ही वाला था। 

३ और जब उसने यीशु के विषय में सुना, तो उसने उनके पास यहूदियों के वृद्धमानों को भेजा, उन से विनती करते हुए कि वो आएँ, और उसके नौकर को स्वस्थ कर दें। 

४ और जब वो यीशु के पास आ गए थे, तो उन्होंने उन से उत्कटता से विनती की, कहते हुए, कि वो योग्य था जिस के लिए वो यह कर दें:

५ क्योंकि वो हमारे राष्ट्र से प्रेम करता है, और उसने हमारे लिए एक यहूदी-आराधनालय बनाया है। 

६ तो यीशु उनके साथ चल दिए। और जब वह अभी उसके घर से बस कुछ ही दूरी पर ही थे, तो उस शतपति ने अपने मित्रों को उनके पास भेजा, उन से कहते हुए, प्रभु, जी आप यह कष्ट न उठाएँ: चूँकि मैं सुयोग्य नहीं हूँ कि आप मेरी छत के तले आएँ: 

७ इसलिए न ही मैंने स्वयं को सुयोग्य समझा आपके पास आने के लिए: बल्कि बस केवल शब्द ही कह दें, और मेरा नौकर स्वस्थ हो जाएगा। 

८ क्योंकि मैं भी तो प्राधिकार तले ही एक व्यक्ति हूँ, सैनिकों को अपने आधीन रखता हुआ: और मैं एक से कहता हूँ, चला जा, और वो चला जाता है: और किसी दूसरे को, आ जा, और वो आ जाता है; और अपने नौकर को, ये कर दे, और वो उसे कर देता है। 

९ जब यीशु ने यह बातें सुनी, तो उन्होंने उस शतपति पर अचम्भा किया, और वो घूम कर मुड़ गए, और उन लोगों से कहा जो उनके पीछे-पीछे आ रहे थे, मैं कहता हूँ तुम से, मैंने इतना विशाल विश्वास नहीं पाया है, नहीं, इस्राएल में नहीं। 

१० और जिन्हें भेजा गया था, उन्होंने घर वापस पहुँच कर, उस अस्वस्थ नौकर को स्वस्थ पाया।

११ और यह होने को आया, कि उसके अगले दिन, वह नाईन नामक एक नगर में गए; और उनके शिष्यों में से कई, और बहुत से लोग उनके साथ गए।  

१२ और जब यीशु उस नगर के दरवाज़े के निकट आ गए थे, देखो तो, एक मृत पुरुष को बाहर उठाकर ले जाया जा रहा था, अपनी माँ का इकलौता ही बेटा, और वो एक विधवा थी: और नगर के कई लोग उस स्त्री के साथ थे। 

१३ और जब प्रभु ने उसे देखा, तो उन्हें उसके प्रति सम्वेदना हुई, और उन्होंने उस से कहा, रो मत। 

१४ और वो आए, और उन्होंने अर्थी को छू दिया: और वो जो उसे ढो रहे थे अचल खड़े हो गए। और उन्होंने कहा, युवक, मैं कहता हूँ तुम से, उठ जाओ। 

१५ और वो जो मृत था उठ कर बैठ गया, और बोलने लग गया। और उन्होंने उसे उसकी माँ को प्रदान कर दिया। 

१६ और सभी लोगों पर एक भय छा गया: और उन्होंने ईश्वर को गौरवान्वित किया, कहते हुए, कि एक महान पैग़म्बर हमारे बीच उठ गए हैं; और, कि ईश्वर ने अपने लोगों पर अपनी दृष्टि टिका दी है। 

१७ और यीशु के विषय में यह उक्ति समस्त यहूदा में, और उसके चारों ओर के समस्त क्षेत्र के सर्वत्र में फैल गई। 

१८ और योहन के शिष्यों ने उसे इन सभी बातों का विवरण दिया। 

१९ और योहन ने अपने शिष्यों में से दो को बुला कर उन्हें यीशु के पास भेजा, कहते हुए, क्या आप वही हैं जिन्होंने आना है? या हम किसी और को ढूँढें?

२० अब जब यह पुरुष उनके पास आ पहुँचे थे, तो उन्होंने कहा, जी योहन बपतिस्मादाता ने हमें आपके पास भेजा है, कहते हुए, क्या आप वही हैं जिन्होंने आना है? या हम किसी और को ढूँढें?

२१ और उसी घड़ी में उन्होंने कईयों को उनकी दुर्बलताओं, और विपत्तियों, और बुरे प्राणों से रोगमुक्त कर दिया; और कईयों को जो नेत्रहीन थे उन्होंने दृष्टि प्रदान कर दी। 

२२ तब यीशु ने उत्तर देते हुए उन से कहा, चले जाओ अपने पथ पर, और योहन को बता दो वो बातें जो तुम ने देखी और सुनी हैं; कि कैसे नेत्रहीन देख रहे हैं, विकलांग चल रहे हैं, कुष्ठ रोगी स्वच्छ कर दिए गए हैं, बधिर सुन रहे हैं, मृत उठाए जा रहे हैं, दरिद्रों को शुभ समाचार का प्रवचन दिया जा रहा है। 

२३ और धन्य है वो, जो कोई भी मुझ में अवरोधित नहीं होगा। 

२४ और जब योहन के संदेशवाहकों ने प्रस्थान कर लिया था, तो यीशु ने योहन के सम्बंध में लोगों से बोलना आरम्भ किया, क्या देखने गए थे तुम बाहर जँगली-क्षेत्र में? वायु से झकझोरा हुआ एक सरकंडा? 

२५ परन्तु क्या देखने गए थे तुम बाहर? एक पुरुष सौम्य वस्त्र पहने हुए? भई देखो, वो जो सजीले वस्त्र पहने हैं, और जो सौम्यता से जीते हैं, राजाओं की सभाओं में होते हैं। 

२६ परन्तु क्या देखने गए थे तुम बाहर? एक पैग़म्बर? हाँ भई, मैं कहता हूँ तुम से, एक पैग़म्बर से बहुत बढ़कर। 

२७ यह वही है, जिसके विषय में लिखा गया है, देखो, मैं अपना संदेशवाहक आपके चहरे से पहले भेज रहा हूँ, जो आपका पथ आपके आगे उद्यत करेगा। 

२८ क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, उनके बीच जो स्त्रियों से पैदा हुए हैं, योहन बपतिस्मादाता से अधिक महान कोई अन्य पैग़म्बर नहीं है: परन्तु वो जो स्वर्ग के राज्य में सब से न्यूनतम है, उस से महान है।

२९ अब उन सभी लोगों ने जिन्होंने उन्हें सुना, और चुँगी-कर्मचारियों ने, ईश्वर को न्यायी-प्रमाणित किया, योहन के बपतिस्मा द्वारा बपतिस्मित हुए हुए। 

३० परन्तु फैरिसियों और न्यायज्ञों ने ईश्वर के परामर्श को अपने ही विरुद्ध नकार दिया, उसके द्वारा बपतिस्मित न होते हुए। 

३१ और प्रभु ने कहा, मैं किस से इस पीढ़ी के लोगों की समानता करूँ? और यह किस के समान हैं?

३२ यह बाज़ारों में बैठे बच्चों जैसे हैं, जो एक दूसरे को पुकार रहे हैं, और कह रहे हैं, हम ने तो तुम्हें बंसी बजाई, और तुम नाचे भी नहीं: हम ने तो तुम्हें शोक मनाया, और तुम रोए भी नहीं!

३३ चूँकि योहन बपतिस्मादाता न ही रोटी खाता हुआ, न ही अंगूर-रस पीता हुआ आया; और तुम कहते हो, इस में तो एक दानव है। 

३४ मनुष्य-पुत्र खाता-पीता हुआ आया है; और तुम कहते हो, देखो तो इस पेटू और मदिराख़ोर को, चुंगी-कर्मचारियों और पापियों का दोस्त! 

३५ परन्तु विद्या अपनी सभी सन्तानों द्वारा ही न्यायी-प्रमाणित होती है।  

३६ और फैरिसियों में से एक ने उन से यह इच्छा व्यक्त की, कि वह उसके साथ भोजन करें। और वो उस फैरिसी के घर चले गए, और भोजन के लिए नीचे बैठ गए। 

३७ और देखो, उस नगर में एक पापी स्त्री थी, जब उसे पता चला कि यीशु भोजन के लिए फैरिसी के घर में बैठे थे, तो वो एक मरहम का सिलखड़ी का डब्बा ले आई,

३८ और वो रोती हुई उनके पीछे उनके चरणों के पास खड़ी हो गई, और उनके चरणों को अपने आँसूओं से धोने लग गई, और उन्हें अपने सर के बालों से पोंछा, और उनके चरणों को चूमा, और उनका मरहम से विलेपन कर दिया।  

३९ अब जब यीशु को आमन्त्रित करने वाले उस फैरिसी ने यह देखा, तो वो अपने मन-ही-मन बोला, कहता हुआ, ये आदमी, यदि ये पैग़म्बर होता, तो ये जान गया होता कि कौन सी और किस प्रकार की स्त्री है ये, जो इसे छू रही है: क्योंकि ये तो एक पापी है। 

४० और यीशु ने उत्तर देते हुए उस से कहा, सिमोन, मुझे तुम से कुछ कहना है। और वो कहता है, गुरुवर, बोलें। 

४१ कोई एक साहूकार था जिसके दो ऋणी थे: एक पर पाँच सौ चाँदी दीनारों का ऋण था, और दूसरे पर पचास का। 

४२ और जब उनके पास चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था, तो उस साहूकार ने दोनो का ऋण क्षमा कर दिया। इसलिए तुम मुझे बताओ, उन में से कौन साहूकार से अधिक प्रेम करेगा? 

४३ सिमोन ने उत्तर दिया और कहा, मेरे अनुमान में, वो जिसे उसने अधिक क्षमा किया है। और उन्होंने उस से कहा, तुम ने सही आँका है। 

४४ और वो उस स्त्री की ओर मुड़े, और उन्होंने सिमोन से कहा, तुम इस स्त्री को देख रहे हो? मैंने तुम्हारे घर में प्रवेश किया, और मेरे पैरों के लिए तुम ने मुझे कोई पानी नहीं दिया: परन्तु इसने मेरे पैरों को अपने आँसूओं से धोया है, और उन्हें अपने सर के बालों से पोंछा है। 

४५ तुम ने मुझे चूमा नहीं: परन्तु जब से मैं अन्दर आया हूँ इस स्त्री ने मेरे पैरों को चूमना समाप्त नहीं किया है। 

४६ मेरे सर का तुमने तेल से विलेपन नहीं किया: परन्तु इस स्त्री ने मेरे पैरों का तेल से विलेपन किया है। 

४७ इस कारण मैं कहता हूँ तुम से, इस के पाप, जो कई हैं, क्षमा हैं; चूँकि इसने अधिक प्रेम किया है। चूँकि जिसका थोड़ा क्षमा होता है, वो थोड़ा ही प्रेम करता है। 

४८ और उन्होंने उस स्त्री से कहा, तुम्हारे पाप क्षमा हैं। 

४९ और वो जो उनके साथ भोजन के लिए बैठे थे अपने स्वयं में कहने लगे, भई ये कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?

५० और यीशु ने उस स्त्री से कहा, तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें बचा लिया है; शान्ति से चली जाओ। 




आठवाँ अध्याय।  


१ और इसके पश्चात ऐसा होने को आया, कि वो प्रत्येक नगर और गाँव में से प्रवचन देते हुए, और ईश्वर के राज्य के शुभ-समाचार की घोषणा करते हुए चलते गए: और वो बारह उन्हीं के साथ थे, 

२ और कुछ स्त्रियाँ भी, जिन्हें बुरे प्राणों और दुर्बलताओं से स्वस्थ कर दिया गया था, मेगदलीन कहलाई जाने वाली मरियम, जिस में से सात दानव बाहर निकले थे,

३ और योअन्ना, हेरोदेस के प्रबन्धक खूज़ा की पत्नी, और सुसैना, और कई अन्य, जो उनकी सेवा अपनी सम्पत्ति से करती थीं। 

४ और जब कई लोग एक साथ एकत्रित हो गए थे, और प्रत्येक नगर से बाहर निकल कर यीशु के पास आ गए थे, तो वो एक दृष्टान्त द्वारा बोले:

५ एक बोनेवाला अपना बीज बोने बाहर गया: और जैसे वो बो रहा था, तो कुछ पथ के किनारे पर गिर गया, और वो नीचे कुचल दिया गया, और पवन के पक्षियों ने उसका भुख-भक्षण कर डाला।

६ और कुछ किसी चट्टान पर गिरा, और ऊपर उगते ही वो मुरझाता चला गया, चूँकि उस में नमी की कमी थी।

७ और कुछ काँटों के बीच गिरा; और वो काँटे उसके साथ ही ऊपर उग गए, और उसे घोंट दिया। 

८ और शेष अच्छी धरती पर गिरा, और ऊपर उग गया, और उसने सौ गुणा फल उत्पन्न किया। और जब उन्होंने यह बातें कह दी थीं, यीशु चीख पड़े, जिस किसी के पास भी कान हैं सुनने के लिए, सुन लेने दो उसे।

९ और उनके शिष्यों ने उन से पूछा, कहते हुए, जी इस दृष्टान्त का क्या अर्थ बनेगा?

१० और उन्होंने कहा, तुम्हें प्रदान कर दिया गया है ईश्वर के राज्य के रहस्यों को जानना: परन्तु औरों को दृष्टांतों में: ताकि देखते हुए, वो देखें न; और सुनते हुए, वो समझें न। 

११ अब वो दृष्टान्त यह है: बीज ईश्वर का शब्द है। 

१२ वो जो पथ के किनारे पर हैं, वो हैं जो सुन तो लेते हैं; फिर वो दानव आता है, और वो उनके हृदयों में से वो शब्द छीन कर बाहर निकाल लेता है, कहिं वो विश्वास कर लें और बच जाएँ। 

१३ वो जो चट्टान पर हैं, यह वो हैं, जो जब वो सुनते हैं, आनंद संग शब्द को ग्रहण कर लेते हैं; और इनके पास कोई जड़ नहीं है, जो कुछ ही समय विश्वास तो करते हैं, परन्तु परीक्षा के समय यह बिखर जाते हैं। 

१४ और वो जो काँटों के बीच गिरा, यह वो हैं, जो जब सुन तो लेते हैं, चले जाते हैं, और इस जीवन की चिंताओं और धन-धान्यों और आनंदों से घुट जाते हैं, और कोई भी परिपूर्ण फल उत्पन्न नहीं करते। 

१५ परन्तु वो जो अच्छी धरती पर हैं, ये वो हैं, जो एक निष्कपट और अच्छे मन से, शब्द को सुन कर, उसे रखते हैं, और धीरज संग फल उत्पन्न करते हैं। 

१६ कोई भी व्यक्ति दीपक जला कर, न ही उसे किसी पात्र से ढकता है, न ही उसे किसी बिस्तर तले रखता है; बल्कि वो उसे दीपाधार पर रख देता है, ताकि वो जो अन्दर प्रवेश करते हैं उसके उजाले को देख सकें। 

१७ चूँकि कुछ भी गुप्त नहीं है, जो प्रत्यक्ष नहीं करवा दिया जाएगा; न ही कुछ भी छुपा हुआ है, जो जाना नहीं जाएगा और प्रत्यक्ष करवा दिया जाएगा। 

१८ ध्यान रखना इसलिए कि तुम कैसे सुनते हो: चूँकि जिस किसी के पास भी है, उसे दे दिया जाएगा; और जिस किसी के पास भी नहीं है, उस से वही ले लिया जाएगा, जो वो सोचता है कि उसके पास है। 

१९ तब उनके पास उनकी माँ और उनके भाई आए, और वो भीड़ के कारण यीशु के निकट नहीं आ पाए। 

२० और यह बात उन्हें कुछों द्वारा बताई गई, जिन्होंने कहा, जी आपकी माँ और आपके भाई बाहर खड़े हैं, आप को देखने की इच्छा कर रहे हैं।

२१ और उन्होंने उत्तर दिया और उनसे कहा, मेरी माँ और मेरे भाई यही हैं जो ईश्वर का शब्द सुनते हैं, और उसे करते हैं। 

२२ अब किसी एक दिन ऐसा होने को आया, कि उन्होंने अपने शिष्यों के साथ एक जलयान में प्रवेश किया: और उन्होंने उन से कहा, चलो हम झील के उस पार चले जाते हैं। और वह निकल पड़े आगे। 

२३ परन्तु जैसे वो जलयात्रा कर रहे थे, यीशु सो गए: और उस झील पर एक वायु की आँधी नीचे आ पड़ी; और वो पानी से भर कर संकट में पड़ गए। 

२४ और शिष्य यीशु के पास आए, और उन्होंने उन्हें जगाया, कहते हुए, मालिक मालिक, हम तो नष्ट हो रहे हैं जी। तब वो उठे, और उन्होंने वायु और पानी के रोष को डाँटा: और वो थम गए, और वहाँ प्रशान्त छा गया। 

२५ और उन्होंने उन से कहा, भई तुम्हारा विश्वास कहाँ है? और उन्होंने डरे हुए अचरज किया, एक दूसरे से कहते हुए, यह किस प्रकार के पुरुष हैं? क्योंकि ये तो वायुओं और पानी को भी आदेश देते हैं, और यह इनका पालन करते हैं। 

२६ और वो गदरेनियों के देश पहुँच गए, जो गलील के विपरीत उस पार है। 

२७ और जब यीशु आगे भूमी पर गए, तो वहाँ उन्हें कोई एक आदमी नगर के बाहर मिला, जिस में बहुत समय से दानव थे, और वो नंगा था, न ही वो किसी भी घर में निवास करता था, बल्कि मज़ारों में। 

२८ जब उसने यीशु को देखा, तो वो चीख पड़ा, और उनके समक्ष नीचे गिर कर उसने एक प्रबल वाणी से कहा, जी मुझे क्या वास्ता आप से यीशु, आप सब से उच्चतम ईश्वर के पुत्र? मैं विनती करता हूँ आपसे, मुझे उत्पीड़ित न करें। 

२९ (चूँकि उन्होंने उस अस्व्छ प्राण को उस व्यक्ति में से बाहर निकल आने का आदेश दे दिया था। क्योंकि कई बार वो उस व्यक्ति को पकड़ लेता था: और उस व्यक्ति को बेड़ियों और ज़ंजीरों से बाँध दिया जाता था; और वो इन बन्धनों को तोड़ कर, दानव द्वारा जँगली-क्षेत्र में खदेड़ दिया जाता था।)

३० और यीशु ने उस से पूछा, कहते हुए, तेरा नाम क्या है? और उसने कहा, जी लशकर: चूँकि कई दानवों ने उस में प्रवेश किया हुआ था। 

३१ और उन्होंने उनसे विनती की, कि वो उन्हें उस तलहीन-गर्त में चले जाने का आदेश न दे दें। 

३२ और वहीं पर्वत पर कई सूअरों का एक पशु समूह चर रहा था: और उन दानवों ने यीशु से विनती की, कि वो उन्हें उन सूअरों में प्रवेश करने की अनुमती दे दें। और उन्होंने उन्हें अनुमती दे दी। 

३३ तब वो दानव उस व्यक्ति में से बाहर निकल कर उन सूअरों में घुस गए: और वो पशु समूह एक तीव्र ढलान पर से नीचे झील में झपट पड़ा, और घुट गया। 

३४ जब उन सूअरों को चराने वालों ने यह देखा कि क्या कर दिया गया था, तो वो भाग खड़े हुए, और उन्होंने जाकर यह नगर और प्रदेश में बता दिया। 

३५ तब वो बाहर निकल आए, वो देखने के लिए जो कर दिया गया था; और यीशु के पास आ पहुँचे, और उन्होंने उस व्यक्ति को, जिस में से दानव बाहर निकल आए थे, यीशु के चरणों में स्वस्थचित्त और आवृत बैठा हुआ पाया: और वो डर गए। 

३६ उन्होंने भी जिन्होंने यह घटना देख ली थी, उन्हें बता दिया कि किस प्रकार वो जो दानवों के वश में था, स्वस्थ बना दिया गया था। 

३७ तब गदरेनियों के देश के चारों ओर के पूरे जनौघ ने यीशु से विनती की, कि वो उन से प्रस्थान कर लें; क्योंकि वो बहुत डर गए थे: और यीशु ऊपर जलयान में चढ़ गए, और वो पुनः वापस लौट गए। 

३८ अब उस पुरुष ने, जिस में से दानव बाहर निकले थे, यीशु से विनती की, कि वो उनके साथ ही रह जाए: परन्तु यीशु ने उसे परे भेज दिया, कहते हुए,

३९ अपने ही घर वापस चले जाओ, और बतला दो कि ईश्वर ने कितने विशाल कार्य तुम्हारे लिए किए हैं। और वो अपने पथ पर चला गया, और उसने उस समस्त नगर के सर्वत्र में यह प्रचारित कर दिया कि यीशु ने कैसे उसके लिए महान कार्य कर दिए थे। 

४० और यह होने को आया, कि, जब यीशु वापस लौट आए थे, तो लोगों ने उनका प्रसन्नता से स्वागत किया: क्योंकि वो सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। 

४१ और देखो, वहीं एक याईर नामक पुरुष आया, और वो यहूदी-आराधनालय का अध्यक्ष था: और वो यीशु के चरणों में गिर पड़ा, और उसने उन से विनती की, कि वो उसके घर पधार जाएँ:

४२ क्योंकि उसके पास केवल एक ही इकलौती बिटिया थी, लगभग बारह वर्ष की आयु की, और वो पड़ी हुई मर रही थी। परन्तु जैसे यीशु जा रहे थे, लोग उनके आस-पास भीड़-भाड़ मचा रहे थे। 

४३ और एक स्त्री, जिसे बारह वर्ष से रक्त का स्राव हो रहा था, जिसने अपनी सम्पूर्ण जीविका चिकित्सकों पर खर्च कर दी थी, न ही वो किसी से भी स्वस्थ हो पाई थी,

४४ उनके पीछे-पीछे आई, और उसने उनके वस्त्र का किनारा छू दिया: और तुरन्त ही उसके रक्त का स्राव थम गया। 

४५ और यीशु ने कहा, किस ने छुआ मुझे? जब सभी ना-ना कर रहे थे, तो पतरस और उन्होंने जो उनके साथ थे कहा, मालिक, यह जनौघ आपके आस-पास भीड़-भाड़ मचा रहा है, और आप को भींच रहा है, और आप कह रहे हैं, मुझे किस ने छुआ?

४६ और यीशु ने कहा, किसी ने मुझे छुआ है: क्योंकि मुझे आभास है कि विक्रम मुझ में से बाहर निकला है। 

४७ और जब उस स्त्री ने देखा कि वो छुपी नहीं रह सकी, तो वो काँपती हुई आई, और यीशु के समक्ष नीचे गिरते हुए उसने उन से सभी लोगों के समक्ष यह घोषणा की, कि किस कारण वश उसने उन्हें छुआ था, और कि वो कैसे तुरन्त ही स्वस्थ हो गई थी। 

४८ और उन्होंने उस से कहा, बेटी अच्छी प्रोत्साहित हो जाओ: तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें बचा लिया है; शान्ति से चली जाओ। 

४९ अब उनके बोलते-बोलते ही, उस यहूदी-आराधनालय के अध्यक्ष के घर में से एक आता है, उस से कहता हुआ, भई तुम्हारी बेटी तो मर चुकी है: गुरुवर को मत सताओ। 

५० परन्तु जब यीशु ने यह सुना, तो उन्होंने उसे उत्तर दिया, कहते हुए, डरो मत: विश्वास करो केवल, और वो बचा ली जाएगी। 

५१ और जब यीशु घर में पधार चुके थे, तो उन्होंने किसी भी व्यक्ति को अन्दर आने की अनुमती नहीं दी, सिवाय पतरस, और याकूब, और योहन के, और बच्ची के पिता और माता के। 

५२ और सभी रो रहे थे, और उस बच्ची के लिए अपनी छाती पीट-पीट कर बिलख रहे थे: परन्तु यीशु ने कहा, रो मत; वो मरी नहीं है, बल्कि सो रही है। 

५३ परन्तु उन्होंने उनका उपहास करते हुए उनकी हँसी उड़ाई, यह जानते हुए कि वो तो मर चुकी थी। 

५४ और यीशु ने उन सभी को बाहर कर दिया, और उस किशोरी को हाथ से पकड़ा, और उसे पुकारा, कहते हुए, बच्ची उठ जाओ। 

५५ और उसका प्राण पुनः लौट आया, और वो तुरँत ही उठ गई: और यीशु ने आदेश दिया कि उसे भोजन दे दिया जाए। 

५६ और उसके पिता-माता आश्चर्यचकित रह गए थे: परन्तु उन्होंने उन्हें आज्ञा दी कि वो किसी भी व्यक्ति को यह न बताएँ कि क्या कर दिया गया था। 




नौवाँ अध्याय।  


१ तब उन्होंने अपने बारह शिष्यों को एक साथ बुला कर, उन्हें सभी दानवों पर, और रोगों को रोगमुक्त कर देने की शक्ती और प्राधिकार प्रदान कर दिए। 

२ और उन्होंने उन्हें ईश्वर के राज्य का प्रवचन देने, और बीमारों को स्वस्थ करने के लिए भेज दिया। 

३ और उन्होंने उन से कहा, अपने पथ के लिए कुछ भी मत ले जाओ, न ही लट्ठे, न झोला, न रोटी, न ही पैसा, न ही दो अंगरखे। 

४ और जिस किसी भी घर में तुम प्रवेश करते हो, वहीं निवास करना, और वहीं से प्रस्थान कर लेना। 

५ और जो कोई भी तुम्हारा स्वागत नहीं करेगा, जब तुम उस नगर से बाहर निकास कर लोगे, उसी की धूल को अपने पैरों पर से झाड़ लेना उनके विरुद्ध एक साक्ष्य के लिए। 

६ और उन्होंने प्रस्थान कर लिया, और नगरीयों में से चलते चले गए, शुभ-समाचार का प्रवचन देते हुए, और प्रत्येक स्थान में आरोग्य करते हुए। 

७ अब हेरोदेस चतुरादिदारुक ने उन सभी कार्यों के विषय में सुना जो यीशु कर रहे थे: और वो दुविधा में पड़ गया, चूँकि कुछों ने कहा था, कि योहन मृतकों में से उठ गया था;

८ और कुछों ने कहा, कि एलियस प्रकट हो गया था; और कुछ अन्यों ने कहा, कि प्राचीनता के पैग़म्बरों में से एक पुनः उठ गया था।

९ और हेरोदेस ने कहा, योहन का सर तो मैंने बेधड़ करवा दिया है: परन्तु ये कौन है भई, जिसके विषय में मैं ये बातें सुन रहा हूँ? और वो यीशु से मिलने का इच्छुक था।  

१० और उन अपौस्लों ने अपनी वापसी पर, उन्हें वो सब-कुछ बताया जो उन्होंने किया था। और वह उन्हें लेकर, बेतसैदा कहलाए जाने वाले एक नगर के निर्जन-क्षेत्र में निजी तौर से परे चले गए। 

११ और लोग, जब वो यह जान गए थे, यीशु के पीछे-पीछे आ गए: और उन्होंने उनका स्वागत किया, और उन से ईश्वर के राज्य के विषय में बोले, और उन्हें आरोग्य कर दिया, जिन्हें भी आरोग्यता की आवश्यकता थी। 

१२ और जब दिन ढलने लगा, तो वो बारह आए और उनसे कहा, इस जनौघ को विदा कर दें जी, ताकि ये आस-पास की नगरीयों और प्रदेश में जाकर रात बिता लें, और खाद्य पदार्थ प्राप्त कर लें: क्योंकि हम तो यहाँ एक निर्जन-क्षेत्र में हैं।  

१३ परन्तु उन्होंने उन से कहा, तुम इन्हें खाने के लिए दे दो। और उन्होंने कहा, जी हमारे पास तो केवल पाँच रोटियों और दो मछलियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं; सिवाय इसके कि हम जाकर इन सभी लोगों के लिए भोजन खरीद लें। 

१४ क्योंकि वो लगभग पाँच हज़ार पुरुष थे। और उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, पचास-पचास के समूहों में इन्हें नीचे बैठा दो। 

१५ और उन्होंने ऐसा ही किया, और उन सभी को नीचे बैठा दिया। 

१६ तब उन्होंने वो पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ लीं, और ऊपर स्वर्ग की ओर देखते हुए, उन्होंने उन्हें आशीष दिया, और तोड़ा, और शिष्यों को दे दिया, जनौघ के समक्ष रख देने के लिए। 

१७ और उन्होंने खाया, और वो सभी संतुष्ट हो गए: और उनके पास बचे कुचे शेष टुकड़ों की बारह टोकरियाँ उठा ली गई थीं। 

१८ और यह होने को आया, कि जैसे वो अकेले प्रार्थना कर रहे थे, तो उनके शिष्य उनके साथ थे: और उन्होंने उनसे पूछा, कहते हुए, लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ? 

१९ उन्होंने उत्तर देते हुए कहा, जी, योहन वो बपतिस्मादाता; परन्तु कुछ कहते हैं एलियस, और अन्य कहते हैं कि प्राचीनता के पैग़म्बरों में से कोई एक पुनः उठ गया है। 

२० यीशु उनसे कहते हैं, परन्तु तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ? पतरस उत्तर देते हुए कहता है, ईश्वर के मसीहा। 

२१ और उन्होंने उन्हें कड़ाई से आज्ञा दी, और उन्हें आदेश दिया कि वो किसी भी व्यक्ति को यह बात न बताएँ;

२२ कहते हुए, कि मनुष्य-पुत्र अवश्य ही कई कष्ट झेलेगा, और वृद्ध-गणो और प्रमुख पुरोहितों, और लिपिकों द्वारा अस्वीकृत होगा, और मार दिया जाएगा, और तीसरे दिन उठा दिया जाएगा। 

२३ और उन्होंने उन सभी से कहा, यदि कोई भी व्यक्ति मेरे पीछे-पीछे आने की इच्छा रखता है, तो उसे अपना परित्याग करना होगा, और अपना क्रूस दिन-प्रतिदिन उठा कर, मेरे पीछे-पीछे आना होगा। 

२४ क्योंकि जो कोई भी अपना जीवन बचाने की इच्छा रखेगा, उसे खो देगा: परन्तु जो कोई भी मेरे वास्ते अपना जीवन खो देगा, वही उसे बचा लेगा। 

२५ क्योंकि किसी व्यक्ति को क्या लाभ प्राप्त होगा, यदि वो इस सम्पूर्ण संसार को प्राप्त कर ले, और स्वयं को ही खो दे, या परित्यक्त हो जाए?

२६ क्योंकि जो कोई भी मुझ से और मेरे शब्दों से लज्जित होगा; उसी से मनुष्य-पुत्र भी लज्जित होगा, जब वो अपनी स्वयं की, और अपने पिताश्री की, और पवित्र दूतों की महिमा में आएगा।

२७ परन्तु मैं सच में कहता हूँ तुम से, यहाँ कुछ खड़े हैं, जो मृत्यु का स्वाद नहीं चखेंगे, जब तक वो ईश्वर का राज्य नहीं देख लेंगे। 

२८ और यह होने को आया, कि इन कथनो के लगभग आठ दिन पश्चात, उन्होंने पतरस और योहन और याकूब को लिया, और ऊपर एक पर्वत पर प्रार्थना करने चले गए। 

२९ और जैसे वो प्रार्थना कर रहे थे, तो उनके मुखमण्डल का भूषाचार परिवर्तित हो गया, और उनका वस्त्र श्वेत और चमकदार बन गया। 

३० और देखो तो, वहीं उन के साथ दो पुरुष बात-चीत कर रहे थे, जो मूसा और एलियस थे:

३१ जो महिमा में प्रकट हुए थे, और उन के मरण के विषय में बात-चीत कर रहे थे, जिसे उन्होंने यरूशलेम में पूर्ण करना था। 

३२ परन्तु पतरस और वो जो उसके साथ थे, नींद से भरे हुए थे: और जब वो जाग गए थे, तो उन्होंने यीशु की महिमा को, और उन दोनो पुरुषों को देखा जो उनके साथ खड़े थे। 

३३ और यह होने को आया, कि जैसे वो दोनो उन से प्रस्थान कर रहे थे, तो पतरस ने यीशु से कहा, मालिक, जी यह अच्छा है कि हम यहाँ हैं: और हम यहीं तीन डेरे बना देते हैं; एक आपके लिए, और एक मूसा के लिए, और एक एलियस के लिए: न जानते हुए कि वो क्या कह रहा है। 

३४ और जैसे वो ऐसा बोल ही रहा था, तो एक मेघ आ गया, और उन पर छा गया: और वो डर गए, जैसे वो उस मेघ में प्रवेश कर रहे थे। 

३५ और उस मेघ में से बाहर एक वाणी निकली, कहती हुई, यही मेरा अति प्रीय पुत्र है; सुनो इसे। 

३६ और जब वो वाणी समाप्त हो चुकी थी, तो यीशु अकेले पाए गए। और उन्होंने इस बात को गुप्त रखा, और उन दिनो में किसी को भी इन घटनाओं के विषय में नहीं बताया, जिन्हें उन्होंने देखा था। 

३७ और यह होने को आया, कि अगले दिन, जब वो पहाड़ी पर से नीचे आ गए थे, कई लोग यीशु से मिले। 

३८ और देखो तो, समूह में से एक पुरुष चीख पड़ा, कहता हुआ, गुरुवर जी, मैं आपसे विनती करता हूँ, मेरे बेटे को देखें: क्योंकि वही केवल मेरा एक इकलौता बच्चा है। 

३९ और लो, एक प्राण इसे पकड़ लेता है, और यह अचानक चीख पड़ता है; और वो इसे झटकीले दौरे देता है, कि यह फिर से झाग उगलता है, और इसे घायल करता हुआ, इसे कठिनाई से ही छोड़ता है। 

४० और मैंने आपके शिष्यों से विनती की इसे बाहर निकाल फैंकने के लिए; पर वो ये नहीं कर पाए जी! 

४१ और यीशु ने उत्तर देते हुए कहा, ओ अविश्वासी और विकृत पीढ़ी, भई कितने समय तक मैं तुम्हारे साथ रह कर तुम्हें झेलता रहूँ? ले आओ अपने बेटे को यहाँ।

४२ और जैसे वो अभी आ ही रहा था, तो उस दानव ने उसे नीचे पटक डाला, और उसे झटकीले दौरे दे दिए। और यीशु ने उस अस्वच्छ प्राण को डाँटा, और उस बच्चे को स्वस्थ कर दिया, और उसे पुनः उसके पिता को प्रदान कर दिया। 

४३ और वो सभी ईश्वर की बलशाली शक्ती पर विस्मित रह गए। और जैसे उन में से प्रत्येक, यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों पर अचरज कर रहा था, तो उन्होंने अपने शिष्यों से कहा,  

४४ इन कथनो को अपने कानो में घुस जाने दो: क्योंकि मनुष्य-पुत्र लोगों के हाथों में प्रदान कर दिया जाएगा। 

४५ परन्तु उन्हें यह कथन समझ में नहीं आया, और यह उन से छिपा रहा, कि उन्होंने इसका आभास नहीं किया: और वो उनसे उस कथन के विषय में पूछने से डरते थे। 

४६ तब शिष्यों के बीच एक विचार उठा, कि उन में से कौन सब से महान होगा। 

४७ और यीशु ने, उनके मनों की विचारणा का आभास करते हुए, एक बच्चे को लेकर उसे अपने पास स्थित कर दिया,

४८ और उन से कहा, जो कोई भी मेरे नाम में इस बच्चे को ग्रहण करेगा, वही मुझे ग्रहण करता है: और जो कोई भी मुझे ग्रहण करेगा, उन्हें ग्रहण करता है जिन्होंने मुझे भेजा है: चूँकि वो जो तुम सब के बीच न्यूनतम है, वही महान होगा। 

४९ और योहन ने उत्तर दिया, और कहा, मालिक, हमने एक को आपके नाम में दानवों को बाहर फेंकते हुए देखा; और हम ने उसे रोका, क्योंकि वो हमारे साथ पीछे-पीछे नहीं आ रहा है। 

५० और यीशु ने उस से कहा, उसे मत रोको: क्योंकि वो जो हमारे विरुद्ध नहीं है, हमारे ही पक्ष में है।

५१ और यह होने को आया, जब उन्हें ऊपर ग्रहण कर लेने का वो समय आ गया था, तो उन्होंने दृढ़ता से यरूशलेम जाने की मुखाकृति बना ली, 

५२ और अपने चहरे के आगे-आगे संदेशवाहक भेजे: और उन्होंने जाकर, समैरियावासियों के एक गाँव में उन के लिए तैयारी करने हेतु प्रवेश किया। 

५३ परन्तु उन्होंने यीशु को ग्रहण नहीं किया, क्योंकि उनका मुखमण्डल मानो कि यरूशलेम जाने का था। 

५४ और जब याकूब और योहन उनके शिष्यों ने यह देखा, तो उन्होंने कहा, प्रभु, जी क्या आप चाहते हैं कि हम स्वर्ग में से अग्नि को नीचे बरसने का आदेश दे दें, कि इनका विध्वंस हो जाए, जैसा कि एलियस ने किया था?

५५ परन्तु यीशु ने मुड़कर उन्हें डाँटा, और कहा, तुम जानते नहीं हो कि तुम कैसे प्राण के हो। 

५६ क्योंकि मनुष्य-पुत्र लोगों के जीवन नष्ट करने नहीं, बल्कि उन्हें बचाने आया है। और वह किसी अन्य गाँव में चले गए।

५७ और यह होने को आया, कि जैसे वह पथ पर जा रहे थे, किसी एक व्यक्ति ने उन से कहा, प्रभु, जी मैं आपके पीछे-पीछे आऊँगा, जहाँ कहीं भी आप जा रहे हैं। 

५८ और यीशु ने उस से कहा, लोमड़ियों के पास बिल हैं, और पवन के पंछीयों के पास घौंसले हैं: परन्तु मनुष्य-पुत्र के पास सर रखने के लिए भी कोई स्थान नहीं है। 

५९ और उन्होंने किसी अन्य से कहा, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ। परन्तु उसने कहा, प्रभु, जी मुझे पहले जाकर अपने पिता को दफ़नाने की अनुमती दे दें। 

६० यीशु ने उस से कहा, मृतकों को अपने मृतक दफ़ना देने दो: परन्तु तुम जाकर ईश्वर के राज्य का प्रवचन दो। 

६१ और किसी और ने भी कहा, प्रभु, जी मैं आपके पीछे-पीछे आऊँगा; परन्तु मुझे पहले जाकर उन्हें विदाई दे देने दें, जो घर पर हैं मेरे घर में। 

६२ और यीशु ने उस से कहा, कोई भी व्यक्ति, जो हल पर अपना हाथ रख लेने के पश्चात पीछे मुड़कर देखता है, ईश्वर के राज्य के योग्य नहीं है। 





दसवाँ अध्याय।   


१ इन घटनाओं के पश्चात प्रभु ने सत्तर औरों को भी नियुक्त किया, और उन्हें दो-दो कर, अपने चहरे के सम्मुख प्रत्येक नगर और स्थान में भेज दिया, जहाँ वो स्वयं भी आने वाले थे। 

२ इसलिए उन्होंने उन से कहा, फसल-कटाई सच-मुच विशाल है, परन्तु श्रमिक थोड़े हैं: इसलिए तुम फसल-कटाई के प्रभु से प्रार्थना करो, कि वो अपनी फसल-कटाई में श्रमिकों को भेज दें।

३ चले जाओ अपने पथों पर: देखो, मैं तुम्हें बाहर भेड़ियों के बीच मेमेनों के समान भेज रहा हूँ। 

४ न थैला, न झोला, न ही जूते ले जाओ, और पथ पर किसी भी व्यक्ति को प्रणाम मत करना। 

५ और जिस किसी भी घर में तुम प्रवेश करोगे, पहले कहना, शान्ति हो इस घर पर। 

६ और यदि वहाँ शान्ति-पुत्र हो, तो तुम्हारी शान्ति उस पर ठहर जाएगी: और यदि नहीं, तो वो मुड़ कर पुनः तुम्हारे पास वापस लौट जाएगी।

७ और वहीं उसी घर में ठहरे रहना, उन वस्तुओं को खाते-पीते जो वो तुम्हें देंगे: क्योंकि श्रमिक अपने वेतन के सुयोग्य होता है। घर-घर मत फिरते जाना। 

८ और जिस किसी भी नगर में तुम प्रवेश करते हो, और वो तुम्हें ग्रहण कर लेते हैं, वही वस्तुएँ खा लेना जो तुम्हारे सामने रखी जाएँगी:

९ और वहाँ अन्दर जो बीमार हैं, उन्हें स्वस्थ कर देना, और उन से कहना, ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ गया है। 

१० परन्तु जिस किसी भी नगर में तुम प्रवेश करते हो, और वो तुम्हें ग्रहण नहीं करते, चले जाना अपने पथों पर बाहर उसी की सड़कों पर, और कहना,

११ यहाँ तक कि तुम्हारे नगर की ये धूल भी जो हम पर चिपट रही है, हम उसे तुम्हारे विरुद्ध पौंछ रहे हैं: तथापि तुम इस बात से विश्वस्त हो जाओ, कि ईश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ चुका है। 

१२ परन्तु मैं कहता हूँ तुम से, कि उस दिन सदोम और गौमोराह के लिए अधिक सहनीय होगा, उस नगर की अपेक्षा में।

१३ हाय पड़े तुझ पर ख़ुराज़िन! हाय पड़े तुझ पर बेतसैदा! चूँकि यदि वो बलशाली कार्य जो तुम में किए गए थे, टाय्र और सिदोन में किए गए होते, तो उन्होंने बहुत समय पहले ही मन-परिवर्तन कर लिया होता, टाट-वस्त्र और राख में बैठ कर। 

१४ बल्कि न्याय-निर्धारण पर टाय्र और सिदोन के लिए अधिक सहनीय होगा, तुम्हारी अपेक्षा में।

१५ और तू कफरनहूम, जो स्वर्ग तक पदोन्नत है, नीचे नर्क तक खदेड़ दिया जाएगा। 

१६ वो जो तुम्हें सुनता है, मुझे सुनता है; और वो जो तुम्हारा तिरस्कार करता है, मेरा तिरस्कार करता है; और वो जो मेरा तिरस्कार करता है, उनका तिरस्कार करता है जिन्होंने मुझे भेजा है। 

१७ और वो सत्तर पुनः आनंद मनाते हुए वापस आए, कहते हुए, प्रभु जी, यहाँ तक कि दानव भी आपके नाम द्वारा हमारे आधीन हैं। 

१८ और उन्होंने उन से कहा, मैंने शैतान को बिजली समान स्वर्ग से गिरते हुए देखा है। 

१९ देखो, मैं तुम्हें सर्पों और बिच्छुओं को, और शत्रु की समस्त शक्ती को कुचलने की शक्ती दे रहा हूँ, और कुछ भी किसी भी प्रकार से तुम्हें हानि नहीं पहुँचाएगा। 

२० तथापि इस में हर्ष मत मनाओ कि प्राण तुम्हारे आधीन हैं; बल्कि इस में हर्ष मनाओ, चूँकि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं। 

२१ उसी घड़ी में यीशु ने प्राण में हर्ष मनाया, और कहा, हे पिताश्री, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, जी मैं धन्यवाद देता हूँ आपको, कि आपने यह बातें विद्वानो और विवेकियों से छुपा दी हैं, और इन्हें शिशुओं को प्रत्यक्ष करवा दी हैं। जी हाँ पिताश्री: क्योंकि यही आपकी दृष्टि में अच्छा प्रतीत था जी। 

२२ मुझे मेरे पिताश्री द्वारा सब कुछ प्रदान कर दिया गया है: और कोई भी व्यक्ति नहीं जानता कि पुत्र कौन है, सिवाय पिताश्री के; और कौन पिताश्री हैं, सिवाय पुत्र के, और वही जिसे पुत्र उन्हें प्रत्यक्ष करेगा। 

२३ और उन्होंने स्वयं को अपने शिष्यों की ओर मोड़ा, और निजी तौर से कहा, धन्य हैं वो आँखें जो यह बातें देख रही हैं जिन्हें तुम देख रहे हो:

२४ क्योंकि मैं बता रहा हूँ तुम्हें, कि कई पैगम्बरों और राजाओं ने इन बातों को देखना चाहा है, जिन्हें तुम देख रहे हो, और उन्होंने उन्हें नहीं देखा; और सुनना उन बातों को, जिन्हें तुम सुन रहे हो, और उन्होंने उन्हें नहीं सुना। 

२५ और देखो, किसी एक न्यायज्ञ ने उठ खड़े होकर उन्हें परखा, कहते हुए, गुरुवर, मैं अनन्त जीवन को विरासत में लेने के लिए क्या करूँ जी?

२६ उन्होंने उस से कहा, नियम में क्या लिखा हुआ है? कैसे पढ़ते हो तुम?

२७ और उसने उत्तर देते हुए कहा, तुम प्रभु अपने ईश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय से, और अपनी सम्पूर्ण आत्मा से, और अपनी सम्पूर्ण शक्ति से, और अपने सम्पूर्ण मन से प्रेम करोगे, और तुम अपने पड़ौसी से स्वयं समान प्रेम करोगे। 

२८ और उन्होंने उस से कहा, तुम ने सही उत्तर दिया है: यही करो, और तुम जी लोगे। 

२९ परन्तु उसने, स्वयं को न्यायी-प्रमाणित करने की इच्छा से, यीशु से कहा, और मेरा पड़ौसी कौन है जी? 

३० और यीशु ने उत्तर देते हुए कहा, कोई एक व्यक्ति यरूशलेम से नीचे यरीहो जा रहा था, और वो चोरों के बीच पड़ गया, जिन्होंने उस पर से उसके वस्त्र उतार लिए, और वो उसे घायल और अधमरा छोड़ कर चलते बने। 

३१ अब अकस्मात् वहीं उस पथ पर एक पुरोहित नीचे आ रहा था, और जब उसने उसे देखा, तो वो दूसरे किनारे पर से चलता चला गया। 

३२ और इसी प्रकार एक लेवी-वंशज, जब वो उस स्थान पर था, आया और उसे देखा, और दूसरे किनारे पर से चलता चला गया। 

३३ परन्तु कोई एक समैरियावासी, अपनी यात्रा करता हुआ, वहीं पहुँचा, जहाँ वो अधमरा व्यक्ति था: और जब उसने उसे देखा, तो उसने उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त की,

३४ और वो उसके पास गया, और उसने तेल और अंगूर-रस उँडेल कर, उसके घावों पर पट्टी बाँध दी, और उसे अपने ही जानवर पर बैठा कर वो उसे एक सराय में ले आया, और उसकी देख-भाल की।  

३५ और अगले दिन जब वो प्रस्थान कर रहा था, तो उसने दो चाँदी के दीनार बाहर निकाल कर सराय के प्रबन्धक को दे दिए, और उस से कहा, इसकी देख-भाल करना; और जो कुछ भी तुम अधिक खर्च करोगे, जब मैं पुनः आऊँगा, तो मैं तुम्हें वो चुका दूँगा। 

३६ तो अब इन तीनों में से, कौन सोचते हो तुम उसका पड़ौसी था, जो चोरों के बीच पड़ गया था? 

३७ और उसने कहा, जी वो जिसने उसके प्रति दया दिखाई। तब यीशु ने उस से कहा, जाओ, और तुम भी इसी प्रकार करो। 

३८ अब ऐसा होने को आया, कि जैसे वो जने जा रहे थे, कि यीशु ने किसी एक गाँव में प्रवेश किया: और मार्था नामक किसी एक स्त्री ने यीशु का अपने घर में स्वागत किया। 

३९ और उसकी एक बहन थी जिसका नाम मरियम था, जो यीशु के चरणों में भी बैठी हुई थी, और उनका शब्द सुन रही थी। 

४० परन्तु मार्था बहुत सेवा-सत्कार के बोझ तले थी, और उनके पास आकर कहा, प्रभु जी, क्या आपको कोई चिंता नहीं है कि मेरी बहन ने मुझे सेवा-सत्कार के लिए अकेला छोड़ दिया है? इसलिए आप बोलें इस से कि ये मेरी सहायता करे। 

४१ और यीशु ने उत्तर दिया, और उस से कहा, मार्था मार्था, भई तुम तो कई बातों के लिए चिन्तित और विचलित हो:

४२ परन्तु एक ही बात आवश्यक है: और मरियम ने वो अच्छा भाग चुन लिया है, जो उस से नहीं छीना जाएगा। 



ग्यारहवाँ अध्याय।  


१ और यह होने को आया, कि, जैसे वो किसी एक स्थान में प्रार्थना कर रहे थे, जब उन्होंने प्रार्थना समाप्त कर ली थी, तो उनके शिष्यों में से एक ने उन से कहा, प्रभु, जी हमें प्रार्थना करना सिखाएँ, जैसे योहन ने भी अपने शिष्यों को सिखाया है। 

२ और उन्होंने उन से कहा, जब तुम प्रार्थना करते हो, कहो, हमारे पिताश्री, जो स्वर्ग में हैं, पवित्र हो आपका नाम, आपका राज्य आए। आपकी इच्छा पूर्ण की जाए, जैसे स्वर्ग में, वैसे ही पृथ्वी में। 

३ हमें प्रत्येक दिन प्रदान कर दें, हमारी दिन प्रति-दिन की रोटी। 

४ और क्षमा कर दें हमारे पापों को; चूँकि हम भी प्रत्येक को क्षमा करते हैं जो हमारा ऋणी है। और ले न जाएँ हमें परीक्षा में, बल्कि उद्धार कर दें हमारा बुराई से। 

५ और उन्होंने उन से कहा, तुम में से किस के पास एक मित्र होगा, और तुम मध्य रात्रि के समय उसके पास जा कर उस से कहोगे, मित्र, मुझे तीन रोटियाँ दे दो;

६ क्योंकि मेरा एक मित्र अपनी यात्रा पर मेरे पास आ गया है, और मेरे पास कुछ भी नहीं है उसके समक्ष रखने के लिए?

७ और वो भीतर से उत्तर देगा और कहेगा, भई मत सताओ मुझे: द्वार अब बन्द है, और मेरे बच्चे मेरे साथ मेरे बिस्तर में हैं; मैं तुम्हें देने के लिए नहीं उठ सकता। 

८ मैं कहता हूँ तुम से, जबकि वो नहीं उठेगा उसे देने के लिए, परन्तु, चूँकि वो उसका मित्र है, उसके हठीले आग्रह के कारण, वो उठेगा, और वो उसे जितनी वो चाहे उतनी ही रोटियाँ दे देगा। 

९ और मैं तुम से कहता हूँ, माँगो, और तुम्हें दे दिया जाएगा: ढूँढो, और तुम पा लोगे: खटखटाओ, और तुम्हारे लिए खोल दिया जाएगा।

१० क्योंकि प्रत्येक कोई जो माँगता है, ग्रहण करता है: और वो जो ढूँढता है, पा लेता है: और उसे, जो खटखटाता है, खोल दिया जाएगा। 

११ यदि कोई बेटा, तुम में से किसी से भी जो पिता है, रोटी माँगता है, क्या वो उसे एक पत्थर देगा क्या? या यदि वो एक मछली माँगता है, क्या वो उसे मछली के स्थान में एक साँप देगा?

१२ या यदि वो एक अण्डा माँगता है, तो क्या वो उसे एक बिच्छू देगा?

१३ अब यदि तुम बुरे होते हुए, जानते हो कि अपने बच्चों को अच्छे उपहार कैसे दिए जाएँ; तो तुम्हारे स्वर्गिक पिताश्री कितनी और अधिकता से उन्हें पवित्र प्राण दे देंगे, जो उन से माँगते हैं?

१४ और वो एक दानव को बाहर निकाल रहे थे, और वो गूँगा था। और यह होने को आया, कि जब वो दानव बाहर निकल आया था, तो वो गूँगा बोल पड़ा; और लोगों ने अचरज किया। 

१५ परन्तु उन में से कुछों ने कहा, भई ये तो दानवों को दानवों के प्रमुख, बअलज़बूल द्वारा बाहर निकालता है। 

१६ और अन्य लोग, उन्हें परखते हुए, उनके द्वारा स्वर्ग से एक संकेत देखना चाहते थे। 

१७ परन्तु उन्होंने, उनके विचारों को जानते हुए, उन से कहा, प्रत्येक राज्य जो अपने ही विरुद्ध विभाजित है, उजाड़ दिया जाता है; और एक घर जो अपने ही विरुद्ध विभाजित है, गिर जाता है। 

१८ यदि शैतान भी अपने ही विरुद्ध विभाजित हो; तो उसका राज्य कैसे खड़ा रहेगा? क्योंकि तुम कहते हो कि मैं दानवों को बअलज़बूल द्वारा बाहर निकाल फैंकता हूँ।

१९ और यदि मैं बअलज़बूल द्वारा दानवों को बाहर निकाल फैंकता हूँ, तो तुम्हारे बेटे फिर किस के द्वारा दानवों को बाहर निकाल फैंकते हैं भई? इसलिए वही तुम्हारे न्यायाधीष होंगे। 

२० परन्तु यदि मैं ईश्वर की उँगली से दानवों को बाहर निकाल फैंकता हूँ, निस्सन्देह ईश्वर का राज्य तुम पर आ पड़ा है। 

२१ जब एक सशस्त्रित शक्तिमान व्यक्ति अपने राज-भवन की पहरेदारी करता है, तो उसकी सम्पत्तियाँ शान्ति में रहती हैं:

२२ परन्तु जब कोई उस से अधिक शक्तिशाली उस पर आ पड़ता है, और उसे परास्त कर डालता है, तो वो उस से उसके समस्त अस्त्र-शस्त्र ले लेता है, जिन पर वो विश्वास किया करता था, और उसकी लूट को विभाजित कर देता है। 

२३ वो जो मेरे साथ नहीं है, मेरे विरुद्ध है; और वो जो मेरे साथ एकत्रण नहीं करता है, बिखर जाता है। 

२४ जब किसी व्यक्ति में से कोई अस्वच्छ प्राण बाहर निकल आता है, तो वो सूखे स्थानो में से होता हुआ चलता-जाता है, विश्राम ढूँढता हुआ, और कोई न पाता हुआ, वो कहता है, मैं तो भई अपने ही घर, जहाँ से मैं बाहर निकला हूँ, वहीं वापस चला जाऊँगा। 

२५ और जब वो वहाँ आ पहुँचता है, तो वो उसे स्वच्छ और सजा-धजा पाता है। 

२६ तब वो जाकर अपने साथ सात अन्य प्राणों को, अपने से भी अधिक दुष्ट ले लेता है; और वो वहीं प्रवेश करके बस जाते हैं: और इस व्यक्ति की यह अन्त की दशा उसकी पहली दशा से भत्तर है।

२७ और यह होने को आया, कि जैसे वो यह बातें बोल रहे थे, लोगों के समूह में से किसी एक स्त्री ने अपनी वाणी ऊपर उठा कर यीशु से कहा, धन्य है वो गर्भ जिसने तुम्हें जना है, और वो स्तन जिन से तुमने दूध पीया है। 

२८ परन्तु उन्होंने कहा, हाँ बल्कि धन्य हैं वो, जो ईश्वर का शब्द सुनते हैं, और उसको रखते हैं। 

२९ और जब लोगों का एक साथ जमघट एकत्रित हो चुका था, तो वो कहने लगे, यह तो एक बुरी पीढ़ी है: यह संकेत ढूँढ रहे हैं; और इसे कोई भी संकेत नहीं दिया जाएगा, बल्कि पैगम्बर योना का संकेत। 

३० क्योंकि जैसे योना नीनवे के लोगों के प्रति एक संकेत था, उसी प्रकार मनुष्य-पुत्र भी इस पीढ़ी के लिए एक संकेत होगा। 

३१ दक्षिण की रानी इस पीढ़ी के आदमियों के साथ न्याय-निर्धारण में उठेगी, और वो इन्हें दण्डनीय घोषित करेगी: क्योंकि वो सुलेमान की विद्या सुनने पृथ्वी के अन्तिम क्षेत्रों में से आई थी; और देख लो भई, एक सुलेमान से भी बढ़कर यहाँ है। 

३२ नीनवे के पुरुष इस पीढ़ी के साथ न्याय-निर्धारण में उठेंगे, और वो इसे दण्डनीय घोषित करेंगे: चूँकि उन्होंने योना के प्रवचन से मन-परिवर्तन कर लिया था; और, देखो तो, एक योना से भी बढ़कर यहाँ है। 

३३ कोई भी व्यक्ति, दीपक जला कर, उसे किसी गुप्त स्थान में, या किसी मापने के बर्तन तले नहीं रखता है, बल्कि एक दीपाधार पर, ताकि वो जो अन्दर प्रवेश करते हैं उसका प्रकाश देख सकें। 

३४ शरीर का प्रकाश उसकी आँख है: इसलिए जब तुम्हारी आँख एकहरी होती है, तो तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर भी प्रकाश से भरा होता है; परन्तु जब तुम्हारी आँख बुरी होती है, तो तुम्हारा शरीर भी अन्धकार से भरा होता है। 

३५ ध्यान रखना इसलिए, कि वो प्रकाश जो तुम में है, अन्धकार न हो। 

३६ इसलिए यदि तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर प्रकाश से भरा हो, बिना किसी अन्धेरे भाग के, तो वो सम्पूर्णता से प्रकाश से भरा हुआ होगा, जैसे जब एक दीपक की उज्ज्वल चमक तुम्हें प्रकाश प्रदान करती है। 

३७ और जैसे वो बोल रहे थे, किसी एक फैरिसी ने उन से उनके साथ भोज करने की विनती की: तो यीशु अन्दर चले गए, और भोजन करने बैठ गए। 

३८ और जब उस फैरिसी ने यह देखा, उसने अचम्भा किया कि वो भोजन से पहले धुले हुए नहीं थे। 

३९ और प्रभु ने उस से कहा, अब तुम फैरिसी प्याले और थाली को बाहर से तो स्वच्छ बनाते हो; परन्तु तुम्हारा भीतर का भाग डकैती और दुष्टता से भरा हुआ है। 

४० अरे मूर्खों, क्या वो जो बाहर है, उसे बनाने वाले ने, वो जो अन्दर है नहीं बनाया क्या? 

४१ बल्कि अपेक्षाकृत उन वस्तुओं में से दान दो जो तुम्हारे पास हैं; और, देखो, सभी कुछ तुम्हारे प्रति स्वच्छ हो जाएगा। 

४२ बल्कि हाय पड़े तुम पर फैरिसियों! क्योंकि तुम पुदीने और अरुदेका का, और प्रत्येक प्रकार के पौधे का तो दसवाँ भाग भरते रहते हो, और न्याय और ईश्वर के प्रेम को पार कर जाते हो: इन्हें तो तुम्हें करना ही चाहिए, इन दूसरी बातों को अधूरा न छोड़ते हुए।

४३ हाय पड़े तुम पर फैरिसियों! क्योंकि तुम यहूदी-आराधनालयों में उच्च स्थानों, और बाज़ारों में अभिवादनों से प्रेम करते हो। 

४४ हाय पड़े तुम पर लिपिकों, और फैरिसियों, ढ़ोंगीयों! क्योंकि तुम उन कब्रों जैसे हो जो दिखाई नहीं देतीं, और वो लोग जो उन पर से चलते जाते हैं उन कब्रों से अनभिज्ञ हैं। 

४५ तब उन न्यायज्ञों में से एक ने उत्तर दिया, और उन से कहा, गुरुवर, ऐसा कह कर तो आप हमारे साथ भी अपमानजनक दुर्व्यवहार कर रहे हैं!

४६ और उन्होंने कहा, हाय पड़े तुम पर भी, तुम न्यायज्ञों! क्योंकि तुम लोगों पर कठिन भार ढोने के लिए लाद देते हो, और तुम स्वयं उन भारों को अपनी एक भी उँगली से नहीं छूते हो। 

४७ हाय पड़े तुम पर! क्योंकि तुम पैग़म्बरों के मक़बरों का तो निर्माण करते रहते हो, और तुम्हारे पित्रों ने ही उन्हें मार डाला।

४८ सच में तुम ही साक्षी हो, कि तुम अपने पित्रों के कर्मों को सम्मति देते हो: चूँकि उन्होंने ही वास्तव में उनकी हत्या कर डाली थी, और तुम उन्हीं के मक़बरों का निर्माण करते रहते हो। 

४९ इसलिए ईश्वर की विद्या ने भी कहा है, मैं उन्हें पैग़म्बर और अपौस्ल भेजूँगा, और उन में से कुछों का वो संहार और अत्याचार कर डालेंगे:

५० ताकि सभी पैग़म्बरों के रक्त की जाँच-पड़ताल, जो इस संसार की नीव से बहाया गया था, इसी पीढ़ी से की जा सके;

५१ हाबिल के रक्त से लेकर, ज़कर्याह के रक्त तक, जो बलिवेदी और मन्दिर के बीच नष्ट हो गया था: सच में मैं कहता हूँ तुम से, इसकी जाँच-पड़ताल इसी पीढ़ी से ही की जाएगी।  

५२ हाय पड़े तुम पर न्यायज्ञों! चूँकि तुमने ज्ञान की चाबी को दूर कर दिया है: स्वयं तो तुम ने प्रवेश किया नहीं, और वो जो भीतर प्रवेश कर रहे थे, तुमने उन्हें भी रोक दिया। 

५३ और जैसे वो उनसे यह बातें बोल रहे थे, उन लिपिकों और फैरिसीयों ने यीशु को भीषणता से उलझाना, और उन से कई बातें बुलवाने के लिए उन्हें उकसाना आरम्भ कर दिया:

५४ उनके मूँह से कोई बात पकड़ लेने की ताक में रहते हुए, ताकि वो उन पर दोष लगा सकें। 




बारहवाँ अध्याय।  


१ इसी बीच, जब लोगों का एक अनगिनत जनौघ एक साथ एकत्रित हो गया था, यहाँ तक कि वो एक-दूसरे पर गिर-पड़ रहे थे, उन्होंने अपने शिष्यों से यह कहना आरम्भ किया सर्व प्रथम, तुम फैरिसियों के खमीर से सावधान रहना, जो कि ढोंगीपना है। 

२ क्योंकि कुछ भी ढका हुआ नहीं है, जो प्रत्यक्ष नहीं कर दिया जाएगा; न ही कुछ भी छुपा हुआ है, जो जाना नहीं जाएगा। 

३ इसलिए जो कुछ भी तुमने अन्धकार में बोला है, उजाले में सुन लिया जाएगा; और वो जो तुमने कोठरी में कानो में बोला है, घरों की छतों पर से घोषित कर दिया जाएगा। 

४ और मैं कहता हूँ तुम से मेरे मित्रों, उन से मत डरो जो शरीर को तो मार डालते हैं, और उसके पश्चात और कुछ भी नहीं है जो वो कर सकते हैं। 

५ परन्तु मैं तुम्हें पहले से ही चेतावनी दे रहा हूँ कि तुम किन से डरोगे: उन से डरो, जो मार डालने के पश्चात नर्क में फैंक देने की शक्ती रखते हैं; हाँ भई, मैं कहता हूँ तुम से, उन से डरो। 

६ क्या पाँच चिड़ियाँ दो कौड़ियों के लिए नहीं बेची जाती हैं क्या, और उन में से एक को भी ईश्वर भूलते नहीं हैं.

७ बल्कि तुम्हारे सर के सभी बाल गिने जा चुके हैं। इसलिए डरो मत: तुम अनेक चिड़ियाँओं से अधिक मूल्य के हो।

८ मैं तुम से भी कहता हूँ, जो कोई भी मुझे लोगों के समक्ष स्वीकार करेगा, उसे मनुष्य-पुत्र भी ईश्वर के दूतों के समक्ष स्वीकार करेगा:

९ परन्तु वो जो मुझे लोगों के समक्ष अस्वीकार करेगा, ईश्वर के दूतों समक्ष अस्वीकार कर दिया जाएगा। 

१० और जो कोई भी मनुष्य-पुत्र के विरुद्ध एक भी शब्द बोलेगा, वो उसे क्षमा कर दिया जाएगा: परन्तु उसके प्रति जो पवित्र-प्राण के विरुद्ध ईश्वर-निंदा करता है, यह क्षमा नहीं किया जाएगा। 

११ और जब वो तुम्हें यहूदी-आराधनालयों में, और न्याय-अध्यक्षों, और शक्तियों के पास ले आएँगे, कोई सोच-विचार मत करना कि तुम कैसे, या क्या बात उत्तर में बोलोगे, या तुम क्या कहोगे:

१२ चूँकि पवित्र-प्राण तुम्हें उसी घड़ी में सिखा देगा, जो तुम्हें बोलना होगा। 

१३ और लोगों के समूह में से एक ने उन से कहा, गुरुवर, जी मेरे भाई से बात कर लें, कि वो मेरे साथ विरासत का विभाजन कर ले। 

१४ और उन्होंने उस से कहा, अरे भाई, मुझे किसने तुम पर न्यायाधीष या विभाजन-कर्ता बना दिया है?

१५ और उन्होंने उन से कहा, ध्यान रखना और लोलुप्ता से सावधान रहना: चूँकि मनुष्य का जीवन उसकी वस्तुओं की बहुतायत से नहीं होता जो उसके पास हैं।

१६ और उन्होंने उन से एक दृष्टान्त बोला, कहते हुए, किसी एक धनवान व्यक्ति की धरती ने बहुत उपज दी:

१७ और उसने मन-ही-मन विचार किया, कहते हुए, भई मैं क्या करूँ, चूँकि मेरे पास तो अब कोई स्थान ही नहीं बचा है अपने फलों को एक साथ इकट्ठा रखने के लिए?

१८ और उसने कहा, मैं यह करूँगा: मैं अपने खलिहानों को तोड़ कर, और भी बड़ों का निर्माण करूँगा; और वहीं मैं अपने समस्त फलों को और अपनी सामग्री को एक साथ इकट्ठा रख दूँगा। 

१९ और मैं अपनी आत्मा से कहूँगा, आत्मा, तुम्हारे पास तो बहुत सी सामग्री कई सालों के लिए रखी हुई है; तो विश्राम कर लो, खाओ-पियो, और मगन रहो। 

२० परन्तु ईश्वर ने उस से कहा, अरे मूर्ख, तेरी आत्मा इसी रात तुझ से वापस माँग ली जाएगी: तो फिर किस की होंगी वो वस्तुएँ जिन्हें तूने तैयार करे रखा है? 

२१ तो ऐसा ही है वो व्यक्ति, जो अपने स्वयं के लिए तो धन-भण्डार इकट्ठा करता रहता है, और वो ईश्वर के प्रति धनवान नहीं है। 

२२ और उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, इसलिए मैं कहता हूँ तुम से, कोई चिंता मत करो अपने जीवन की, कि तुम क्या खाओगे; न ही अपने शरीर के लिए चिंता करो, कि तुम क्या पहनोगे। 

२३ जीवन भोजन से बढ़कर है, और शरीर वस्त्र से बढ़कर है। 

२४ बड़े-कव्वों का विचार करो: क्योंकि वो न ही बोते हैं, और न ही वो फसल काटते हैं; जिनके पास न ही भंडार-घर, और न ही खलिहान हैं; और ईश्वर उन्हें भोजन खिलाते हैं: तो तुम पक्षियों से और कितने अधिक बेहतर हो भई?

२५ और तुम में से कौन चिंता करने से अपने कद में एक हाथ भी जोड़ सकता है?

२६ तो यदि तुम वो जो न्यूनतम है, तुम उसे भी नहीं कर सकते, तो फिर तुम अन्य बातों की क्यों चिंता करते रहते हो भई?

२७ खेत के सोसनों का विचार करो, वो कैसे उग जाते हैं: वो श्रम नहीं करते, न ही वो कातते हैं: और तब भी मैं तुम से कहता हूँ, कि सुलेमान भी अपने सारे वैभव में इन में से एक के समान भी विभूषित नहीं था। 

२८ तो अब यदि ईश्वर घास को इस प्रकार पहनवाते हैं, जो आज खेत में है, और कल चूल्हे में फैंक दी गई है: तो फिर वो तुम्हें और कितना बढ़ चढ़ कर पहनवाएँगे, ओ तुम अल्पविश्वासियों? 

२९ और तुम ढूँढते मत फिरो कि तुम क्या खाओगे या तुम क्या पियोगे, न ही तुम अपने मन में शंका करो। 

३० चूँकि इन सभी वस्तुओं को तो इस संसार के राष्ट्र ढूँढते फिरते हैं; और तुम्हारे पिताश्री जानते हैं कि तुम्हें इन सभी वस्तुओं की आवश्यकता है। 

३१ बल्कि अपेक्षाकृत तुम ईश्वर के राज्य को ढूँढो; और यह सभी वस्तुएँ तुम्हें जोड़ दी जाएँगी। 

३२ डरो मत, छोटे-झुंड; क्योंकि तुम्हें राज्य दे देना, तुम्हारे पिताश्री के लिए भली प्रसन्नता है। 

३३ बेच दो वो जो तुम्हारे पास है, और दान दे दो; प्रबन्ध करो अपने लिए ऐसे थैलों का जो जीर्ण नहीं होते, स्वर्गों में एक धन-भण्डार का, जो अक्षय रहता है, जहाँ कोई भी चोर निकट नहीं आता, न ही कीड़े भ्रष्ट करते हैं। 

३४ क्योंकि जहाँ तुम्हारा धन-कोष है, वहीं तुम्हारा हृदय भी होगा।

३५ अपनी कटियों को कस लो, और अपने दीपकों को उज्ज्वलित रहने दो;

३६ और तुम स्वयं उन व्यक्तियों के समान, जो अपने प्रभु की प्रतीक्षा में हैं, कि वो कब विवाह से वापस लौटेगा; ताकि जब वो आता है और खटखटाता है, तो वो तुरँत ही उसके लिए द्वार खोल दें। 

३७ धन्य हैं वो नौकर, जिन्हें जब उनका प्रभु आता है उन्हें सचेत पाता है: सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि वो स्वयं अपनी कमर कस कर, उन्हें भोजन के लिए नीचे बिठाएगा, और आगे आकर उनकी सेवा करेगा। 

३८ और यदि वो दूसरे, या तीसरे पहर में आता है, और उन्हें इसी प्रकार पाता है, धन्य हैं वो नौकर।  

३९ और यह जान लो, कि यदि घर का मालिक परिचित हुआ होता कि चोर किस घड़ी में आएगा, तो वो सचेत रहा होता, और अपने घर पर सेंध लगने की अनुमती नहीं दी होती। 

४० तुम भी इसलिए तैयार रहो: क्योंकि मनुष्य-पुत्र ऐसी घड़ी में आ रहा है जिसके समबन्ध में तुम सोच नहीं रहे हो। 

४१ तब पतरस ने उन से कहा, प्रभु जी, यह दृष्टान्त आप हमारे लिए ही बोल रहें हैं, या फिर सभी के लिए?

४२ और प्रभु ने कहा, तो फिर कौन है वो विश्वसनीय और विद्वान प्रबन्धक, जिसे उसका प्रभु अपने घरबार का अध्यक्ष बनाएगा, उन्हें निर्धारित ऋतु पर उनके भोजन का भाग देने के लिए?

४३ धन्य है वो नौकर, जिसका प्रभु, जब वो आता है उसे यही करता हुआ पाता है।

४४ सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि वो उसे उस सभी का अध्यक्ष बना देगा, जो कुछ भी उसके पास है। 

४५ परन्तु और यदि वो नौकर अपने मन में कहेगा, भई मेरे प्रभु तो अपने आगमन में विलम्ब कर रहे हैं; और वो अपने साथी नौकरों और नौकरानियों को मारना-पीटना, और खाने-पीने में, और मदिरा के नशे में लग जाएगा;

४६ तो इस नौकर का प्रभु उसी दिन आ जाएगा जब वो उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा होगा, और ऐसी घड़ी में, जिस से वो परिचित नहीं है, और वो उसे काट कर दो टुकड़ों में कर देगा, और वो उसका भाग अविश्वासियों के साथ नियुक्त कर देगा। 

४७ और वो नौकर, जो अपने प्रभु की इच्छा से परिचित था, और उसने स्वयं को तैयार नहीं रखा, न ही उसने अपने प्रभु की इच्छानुसार किया, कई बार कोडों से पीटा जाएगा। 

४८ परन्तु वो जो अपरिचित था, और उसने कोडों की पिटाई के योग्य कार्य किए, उसे कम कोडों से पीटा जाएगा। चूँकि जिस किसी को भी बहुत दिया गया है, उसी से बहुत चाहा जाएगा: और जिसे लोगों ने बहुत कुछ सुपुर्द किया है, उसी से वो बहुत कुछ की माँग करेंगे। 

४९ मैं पृथ्वी पर अग्नि भेजने आया हूँ; परन्तु मैं क्या चाहूँ, कि यदि वो पहले से ही सुलग उठी हो?

५० परन्तु एक बपतिस्मा है, जिस से मुझे बपतिस्मित होना है; और मैं कैसे भींचा हुआ हूँ जब तक कि वो सम्पूर्ण नहीं हो जाता है!

५१ क्या तुम यह अनुमान लगा रहे हो कि मैं पृथ्वी पर शान्ति भेजने आया हूँ? मैं बताता हूँ तुम्हें, नहीं; बल्कि विभाजन:

५२ क्योंकि अब से एक घर में पाँच विभाजित हो जाएँगे, तीन दो के विरुद्ध, और दो तीन के विरुद्ध। 

५३ पिता अपने पुत्र के विरुद्ध विभाजित हो जाएगा, और पुत्र अपने पिता के विरुद्ध; माँ अपनी पुत्री के विरुद्ध, और पुत्री अपनी माँ के विरुद्ध; सास अपनी बहू के विरुद्ध, और बहू अपनी सास के विरुद्ध। 

५४ और उन्होंने लोगों से यह भी कहा, जब तुम किसी मेघ को पश्चिम से उठता हुआ देखते हो, तो तुरँत ही तुम कहते हो, भई वर्षा होने वाली है; और वैसा ही हो जाता है। 

५५ और जब तुम दक्षिणी-वायु चलती हुई देखते हो, तो तुम कहते हो, भई गर्मी होगी; और वैसा ही हो जाता है। 

५६ अरे तुम ढ़ोंगीयों, तुम आकाश के और धरती के चहरे की पहचान तो कर सकते हो; परन्तु यह कैसे है कि तुम इस समय की पहचान नहीं कर रहे हो?

५७ हाँ भई, और तुम अपने ही स्वयं से क्यों नहीं आँक सकते कि क्या सही है?

५८ जब तुम अपने विपक्षी के संग न्याय-अध्यक्ष के पास जाते हो, तो पथ पर होते हुए ही यह प्रयत्न करो कि तुम्हारा तुम्हारे विपक्षी से उद्धार हो जाए; कहिं वो तुम्हें घसीट कर न्यायाधीष के पास ले जाए, और वो न्यायाधीष तुम्हें अफ़सर को प्रदान कर दे, और वो अफ़सर तुम्हें कारावास में फिंकवा दे। 

५९ मैं बताता हूँ तुम्हें, कि तुम वहाँ से तब तक नहीं निकल पाओगे, जब तक तुम सब से अन्तिम पाई नहीं चुका दोगे। 





तेरहवाँ अध्याय।  


१ वहीं उस समय कुछ उपस्थित थे, जिन्होंने उन्हें गलीलवासियों के विषय में बताया, जिनके रक्त का पिलातुस ने उनकी बलियों के साथ मिश्रण कर दिया था। 

२ और यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, क्या तुम ये अनुमान लगा रहे हो कि ये गलील-वासी, सभी गलील-वासियों से बड़े पापी थे, चूँकि इन्होंने यह घटनाएँ सहीं?

३ मैं बताता हूँ तुम्हें, नहीं: परन्तु, सिवाय तुम मन-परिवर्तन करो, तुम सब भी इसी प्रकार नष्ट हो जाओगे। 

४ या फिर वो अट्ठारह, जिन पर सिलोम की उस मीनार ने गिर कर उन्हें मार डाला था, क्या तुम ये सोचते हो कि वो यरूशलेम में बसने वाले सभी लोगों से बड़े पापी थे? 

५ मैं बताता हूँ तुम्हें, नहीं: परन्तु सिवाय तुम मन-परिवर्तन करो, तुम सब भी इसी प्रकार नष्ट हो जाओगे। 

६ उन्होंने यह दृष्टान्त भी बोला: किसी एक व्यक्ति ने अपने अंगूर-खेत में एक अंजीर का पेड़ रोपा; और वो आया और उस पर फल ढूँढे, और उसने कोई न पाया। 

७ तब उसने अंगूर-खेत के रखवाले से कहा, भई देखो, इन तीन साल मैं इस अंजीर के पेड़ पर फल ढूँढता हुआ आया हूँ, और मैंने कोई नहीं पाया: इसे नीचे काट डालो; ये धरती पर क्यों बोझ बन रहा है भई?

८ और उस रखवाले ने उत्तर देते हुए उस से कहा, प्रभु, जी इसे इस साल भी अकेला छोड़ दें, जब तक मैं इसके आस-पास खुदाई कर देता हूँ, और इस में खाद डाल देता हूँ:

९ और यदि ये फल देगा तो अच्छा: और यदि नहीं, तब उसके उपरान्त आप इसे नीचे काट दीजिएगा। 

१० और वह सैबथ पर यहूदी-आराधनालयों में से एक में सिखा रहे थे। 

११ और, देखो, वहाँ एक स्त्री थी जिस में अट्ठारह वर्षों से एक दुर्बलता का प्राण था, और वो बहुत ही कुबड़ी हुई थी, और स्वयं को किसी भी प्रकार से सीधा नहीं उठा सकती थी। 

१२ और जब यीशु ने उसे देखा, तो उन्होंने उसे अपने पास बुला कर उस से कहा, हे स्त्री, तुम अपनी दुर्बलता से मुक्त हो चुकी हो। 

१३ और उन्होंने अपने हाथ उस पर रखे: और तुरँत ही वो सीधी कर दी गई थी, और उसने ईश्वर को गौरवान्वित किया। 

१४ और यहूदी-आराधनालय के अध्यक्ष ने क्षोभित होते हुए उत्तर दिया, चूँकि यीशु ने सैबथ के दिन पर उसे स्वस्थ कर दिया था, और उसने लोगों से कहा, छह दिन हैं जिन में लोगों को काम करना चाहिए: इसलिए उन दिनो में आओ और स्वस्थ हो जाओ, लेकिन सैबथ के दिन में नहीं। 

१५ प्रभु ने तब उसे उत्तर दिया, और कहा, अरे ढोंगी, तुम में से प्रत्येक क्या सैबथ पर अपने बैल या गधे को थान की खूँटी पर से खोल कर, पानी पिलाने नहीं ले जाता है क्या?

१६ और क्या फिर इस स्त्री को, अब्राहम की एक बेटी होते हुए, जिसे शैतान ने इन अट्ठारह वर्ष बाँध कर रखा है, सैबथ के दिन पर इस बन्धन से मुक्त नहीं करा दिया जाना चाहिए था क्या?  

१७ और जब उन्होंने यह बातें कह दी थीं, तो उनके सभी विपक्षी लज्जित हो उठे: और सभी लोगों ने हर्ष मनाया उन सभी महिमामई कार्यों हेतु जिन्हें उनके द्वारा कर दिया गया था। 

१८ तब वो बोले, ईश्वर का राज्य किसके समान है? और मैं इसकी तुलना किसके साथ करूँ? 

१९ वो तो सरसों के एक बीज के दाने के सदृश है, जिसे किसी व्यक्ति ने लेकर अपने उद्यान में फैंक दिया; और वो उग कर एक विशाल वृक्ष बन गया; और पवन के पक्षियों ने उसकी डालियों में वास किया। 

२० और पुनः उन्होंने कहा, मैं किस से ईश्वर के राज्य की समानता करूँ? 

२१ वो तो खमीर के सदृश है, जिसे एक स्त्री ने लेकर तीन माप आटे में छिपा दिया, जब तक कि वो सम्पूर्ण खमीरदार-आटा बन गया। 

२२ और वो नगरों और गाँवों में सिखाते हुए, यरूशलेम की ओर यात्रा करते हुए चलते गए। 

२३ तब किसी एक ने उन से कहा, मालिक क्या कुछ ही हैं जो बचते हैं जी? और उन्होंने उन से कहा, 

२४ तंग द्वार में से प्रवेश करने का यत्न करो: क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि कई प्रवेश करना चाहेंगे, और वो प्रवेश नहीं कर पाएँगे। 

२५ एक बार जब घर के मालिक ने उठ कर, द्वार बंद कर दिया हो, और तुम बाहर खड़े होने लग जाते हो, और द्वार को दस्तक देने लगते हो, कहते हुए, प्रभु प्रभु, हमारे लिए द्वार खोल दें जी; और वो तुम्हें उत्तर देगा और कहेगा, भई मैं जानता नहीं कि तुम कहाँ से हो:

२६ तब तुम कहने लग जाओगे, जी हमने तो आपकी उपस्थिति में खाया और पिया है, और आपने हमारी गलियों में सिखाया है। 

२७ परन्तु वो कहेगा, मैं बताता हूँ तुम्हें, मैं जानता नहीं कि तुम कहाँ से हो; दूर चले जाओ मुझ से, तुम सभी अधर्म कर्ता। 

२८ रोना-धोना और दाँत पीसना होगा, जब तुम अब्राहम, और इसहाक, और याकूब, और सभी पैग़म्बरों को ईश्वर के राज्य में देखोगे, और तुम स्वयं बाहर खदेड़ दिए जाओगे। 

२९ और वो पूर्व से, और पश्चिम से, और उत्तर से, और दक्षिण से आएँगे, और ईश्वर के राज्य में नीचे बैठेंगे। 

३० और, देखो, वो जो अन्तिम हैं, प्रथम होंगे, और वो जो प्रथम हैं, अन्तिम होंगे। 

३१ उसी दिन फैरिसियों में से कुछ आए, उन से कहते हुए, जी आप बाहर निकल चले जाएँ, और यहाँ से विदा हो लें: चूँकि हेरोदेस आपको मार डालेगा। 

३२ और उन्होंने उन से कहा, चले जाओ तुम, और उस लोमड़ी को बता दो, देख ले, मैं दानवों को बाहर निकाल कर फैंक रहा हूँ, और मैं आज और कल रोगमुक्तियाँ कर रहा हूँ, और तीसरे दिन मैं परिपूर्ण बना दिया जाऊँगा। 

३३ तथापि, मुझे अवश्य आज, और कल, और परसों चलना है: क्योंकि यह नहीं हो सकता कि कोई पैग़म्बर यरूशलेम के बाहर नष्ट हो जाए। 

३४ ओ यरूशलेम यरूशलेम, जो पैग़म्बरों को मार डालती है, और उन पर पथराव कर देती है जो तुम्हें भेजे जाते हैं; कितनी बार मैंने तुम्हारे बच्चों को एक साथ एकत्रित कर लिया होता, जैसे एक मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों तले एकत्रित करती है, और तुम ने यह नहीं चाहा!

३५ देखो, तुम्हारा घर तुम्हारे लिए उजाड़ छोड़ दिया गया है: और सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि तुम मुझे तब तक नहीं देखोगी, जब तक वो समय नहीं आ जाता जब तुम कहोगी, धन्य हैं वो जो प्रभु के नाम में आ रहे हैं।



चौदहवाँ अध्याय।  


१ और सैबथ के दिन पर यह होने को आया, कि जैसे वो प्रमुख फैरिसियों में से किसी एक के घर में रोटी खाने गए, कि वो उन पर ताक लगाए बैठे थे। 

२ और देखो, वहीं यीशु के समक्ष एक व्यक्ति था, जिसे जलोदर था। 

३ और यीशु उत्तर देते हुए, उन न्यायज्ञों और फैरिसियों से बोले, कहते हुए, क्या सैबथ के दिन पर स्वस्थ करना न्यायी है?

४ और वो चुप रहे। और उन्होंने उस रोगी को लिया, और उसे आरोग्य कर दिया, और उसे जाने दिया;

५ और उन्हें उत्तर दिया, कहते हुए, तुम में से किस के पास एक गधा या बैल एक गड्ढे में गिरा हुआ होगा, जो तुरँत ही उसे सैबथ के दिन बाहर नहीं खींच निकालेगा?

६ और वो पुनः उन्हें इन बातों का उत्तर न दे सके। 

७ और उन्होंने उनकी ओर, जिन्हें आमन्त्रित किया गया था, एक दृष्टान्त बोला, जब उन्होंने ध्यान से देख लिया था कि वो कैसे प्रमुख स्थानों को चुन रहे थे, उनसे कहते हुए,

८ जब तुम किसी भी व्यक्ति द्वारा विवाह में आमन्त्रित होते हो, तो सब से उच्च स्थान पर जाकर मत बैठो; कहिं उसके द्वारा वहाँ, तुम से अधिक प्रतिष्ठित कोई अन्य व्यक्ति आमन्त्रित हो;

९ और वो, जिसने तुम्हें और उसे आमन्त्रित किया है, आए और तुम से कहे, इस व्यक्ति को स्थान दे दो; और तुम लज्जित होते हुए निचले स्थान पर बैठने लगो। 

१० परन्तु जब तुम आमन्त्रित होते हो, तो जाओ और सब से निचले स्थान में जाकर नीचे बैठो; ताकि जब वो जिसने तुम्हें आमन्त्रित किया है आए, तो वो तुम से कहे, मित्र, ऊँचे स्थान में जाकर बैठ जाओ: तब तुम्हें उनकी उपस्थिति में सम्मान मिलेगा जो भोजन पर तुम्हारे साथ बैठे हैं। 

११ क्योंकि जो कोई भी स्वयं को पदोन्नत करेगा, पदावनत कर दिया जाएगा; और वो जो स्वयं को पदावनत करेगा, पदोन्नत कर दिया जाएगा।

१२ फिर उन्होंने उस से भी कहा जिसने उन्हें आमन्त्रित किया था, जब तुम सुबह या रात्रि का भोज रखते हो, न ही अपने मित्रों को, न ही अपने भाई-जनो को, न ही अपने कुल-वालों को, और न ही अपने धनवान पड़ौसियों को आमन्त्रित करो; कहिं वो भी तुम्हें पुनः आमन्त्रित कर दें, और तुम्हारे प्रति ऋण चुका दिया जाए। 

१३ बल्कि जब तुम कोई भोज रखते हो, तो दरिद्रों को, अपंगों को, विकलांगों को, और नेत्रहीनों को, आमन्त्रित करो: 

१४ और तुम आशीषित हो जाओगे; क्योंकि वो तुम्हारा भुगतान नहीं कर सकते: क्योंकि तुम्हारा भुगतान न्यायीयों के पुनरुत्थान पर कर दिया जाएगा। 

१५ और जब यीशु के साथ भोजन पर बैठे हुओं में से एक ने यह बातें सुन ली थीं, तो उसने उन से कहा, धन्य है वो जो ईश्वर के राज्य में रोटी खाएगा। 

१६ तब उन्होंने उस से कहा, किसी एक व्यक्ति ने एक बड़ा रात्रि-भोज रखा, और कईयों को आमन्त्रित किया:

१७ और रात्रि-भोज के समय पर उसने अपने नौकर को भेजा, उनसे कहने के लिए जिन्हें आमन्त्रित किया गया था, कि भई आ जाओ; क्योंकि सब कुछ अब तैयार है। 

१८ और उन सभी ने एक-सम्मत हो, बहाने बनाना आरम्भ कर दिया। पहले ने उस से कहा, मैंने तो धरती का एक खण्ड खरीदा है, और मुझे अवश्य ही जाकर उसे देखना है: मैं प्रार्थना करता हूँ तुम से, मुझे क्षमा कर दो। 

१९ और दूसरे ने कहा, मैंने तो बैलों के पाँच जोड़े ख़रीदे हैं, और मैं उन्हें परखने जा रहा हूँ: मैं प्रार्थना करता हूँ तुम से मुझे क्षमा कर दो। 

२० और अगले ने कहा, मैंने एक पत्नी से विवाह कर लिया है, और इसलिए मैं नहीं आ सकता। 

२१ तो वो नौकर आया, और उसने यह बातें अपने प्रभु से कहीं। तब उस घर का मालिक क्रोधित हो अपने नौकर से कहता है, शीघ्रता से बाहर नगर की सड़कों पर, और गली-कूचों में चले जाओ, और गरीबों को, और अपंगों को, और लूलों को, और अन्धों को भीतर यहाँ ले आओ। 

२२ और उस नौकर ने कहा, प्रभु, जैसा आपने आदेश दिया है वैसा ही कर दिया गया है, और अभी भी स्थान शेष है। 

२३ और उस प्रभु ने उस नौकर से कहा, तो चले जाओ तुम बाहर सड़कों पर, और बाड़ों में, और उन्हें अन्दर आने के लिए विवश कर दो, ताकि मेरा घर भर सके। 

२४ क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि आमन्त्रित किए गए उन पुरुषों में से कोई भी मेरे रात्रि-भोज को नहीं चखेगा। 

२५ और यीशु के साथ बड़े जनौघ जा रहे थे: और वो मुड़े, और उन से कहा, 

२६ यदि कोई भी मेरे पास आता है, और अपने पिता, और माँ, और अपनी पत्नी, और बच्चों, और भाईयों, और बहनो, हाँ, और अपने स्वयं के जीवन से भी घृणा नहीं करता है, तो वो मेरा शिष्य नहीं बन सकता है। 

२७ और जो कोई भी अपना क्रूस नहीं ढोएगा, और मेरे पीछे-पीछे नहीं आएगा, मेरा शिष्य नहीं बन सकता है। 

२८ क्योंकि तुम में से कौन एक मीनार का निर्माण करने का प्रयोजन करता हुआ, पहले नीचे बैठ कर उसका मूल्य नहीं गिनेगा, कि यदि उसके पास उसकी समाप्ति के लिए पर्याप्त है या नहीं?

२९ कहीं ऐसा न हो, कि नीव बिछाने के पश्चात वो उसे समाप्त ही न कर पाए, और वो सब जो उसे देखेंगे, उस व्यक्ति की हँसी उड़ाने लग जाएँगे,

३० कहते हुए, इस व्यक्ति ने निर्माण करना तो आरम्भ कर दिया है, परन्तु यह उसे समाप्त ही नहीं कर पाया! 

३१ या कौन सा वो राजा, किसी दूसरे राजा के विरुद्ध युद्ध करने से पहले, नीचे बैठ कर परामर्श नहीं करता है, कि यदि वो दस हज़ार के साथ उसके विरुद्ध लड़ सकता है, जो बीस हज़ार लिए युद्ध करने आ रहा है?

३२ और यदि नहीं, तो उस दूसरे के अभी बहुत दूर होते हुए ही, वो एक राजदूत भेज कर शान्ति-प्रस्ताव की कामना करता है। 

३३ तो इसी प्रकार, जो कोई भी वो तुम में से हो, जो उस सभी का त्याग नहीं करता है जो उसके पास है, वो मेरा शिष्य नहीं बन सकता है। 

३४ नमक अच्छा है: परन्तु यदि नमक ने अपना स्वाद ही खो दिया हो, तो फिर वो किस से स्वादिष्ट बनाया जाएगा?

३५ वो न ही भूमी के, और न ही खाद के योग्य है; बल्कि लोग उसे बाहर फैंक देते हैं। जिस के पास भी कान हैं सुनने के लिए, सुन लेने दो उसे। 




पंद्रहवाँ अध्याय।  


१ तब उन्हें सुनने के लिए सभी चुंगी-कर्मचारी और पापी उनके निकट आ गए। 

२ और फैरिसी और लिपिक बड़बड़ाने लग गए, कहते हुए, ये व्यक्ति तो पापियों को ग्रहण करता है, और उनके साथ भोजन करता है। 

३ और उन्होंने यह दृष्टान्त उन से बोला, कहते हुए,

४ तुम में से कौन सा वो व्यक्ति होगा, जिसके पास सौ भेडें हों, और यदि वो उन में से एक को खो दे, तो वो उन नब्बे और नौ को जँगली-क्षेत्र में छोड़ कर, उस एक के पीछे नहीं जाएगा, जो खो गई है, जब तक वो उसे पा न ले? 

५ और जब वो उसे पा लेता है, तो वो हर्षित होकर उसे अपने कन्धों पर रखता है। 

६ और जब वो घर पहुँच जाता है, तो वो अपने मित्रों और पड़ौसियों को एक साथ बुलाता है, उनसे कहता हुआ, हर्ष मनाओ मेरे साथ; क्योंकि मैंने वो अपनी भेड़ पा ली है जो खो गई थी। 

७ मैं कहता हूँ तुम से, कि इसी प्रकार स्वर्ग में हर्ष मनाया जाएगा उस एक पापी पर जो मन-परिवर्तन करता है, उन नब्बे और नौ न्यायी व्यक्तियों से अधिक, जिन्हें मन-परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है। 

८ या कौन सी वो स्त्री होगी, जिसके पास दस चाँदी के सिक्के हों, यदि वो एक सिक्का खो दे, तो वो दीपक जला कर, घर में झाड़ू फेर कर, उसे ध्यान से ढूँढती है, जब तक वो उसे पा नहीं लेती?

९ और जब वो उसे पा लेती है, तो वो अपनी सहेलियों और पड़ौसियों को एक साथ बुलाती है, कहती हुई, खुशी मनाओ मेरे साथ; क्योंकि मैंने वो सिक्का ढूँढ लिया है जो खो गया था!

१० इसी प्रकार, मैं कहता हूँ तुम से, ईश्वर के दूतों की उपस्थिति में हर्ष मनाया जाता है, उस एक पापी पर जो मन-परिवर्तन करता है।

११ और उन्होंने कहा, किसी एक पुरुष के दो बेटे थे:

१२ और उन में से छोटे ने अपने पिता से कहा, पिता जी, मुझे अपनी सम्पत्ति में से मेरा भाग दे दें। तो उसने उनके बीच अपनी सम्पत्ति का बँटवारा कर दिया। 

१३ और थोड़े ही दिनों पश्चात उस छोटे बेटे ने सब कुछ एक साथ इकट्ठा किया, और एक दूर देश की यात्रा पर निकल पड़ा, और वहीं उसने अपनी सम्पत्ति को भोग-विलास में उड़ा डाला। 

१४ और जब उसने सब कुछ खर्च कर दिया था, तो उस भूमी में एक घोर अकाल आ पड़ा; और उसे कमी लगी। 

१५ और वो गया, और उस देश के एक नागरिक से जा मिला; और उसने उसे अपने खेतों में सूअरों को चराने के लिए भेज दिया।  

१६ और वो अपना पेट भूसे से ही भर लेने के लिए तरसता था, जो वो सूअर चरते थे: और उसे किसी ने भी कुछ नहीं दिया। 

१७ और जब उसका मन ठिकाने लगा, तो उसने कहा, मेरे पिता के कितने ही भाड़े के नौकरों के पास समुचित रोटी खाने के लिए है, और वो बच भी जाती है, और भई मैं तो भूख से नष्ट हो रहा हूँ। 

१८ मैं अब उठ कर अपने पिता के पास जाऊँगा, और उनसे कहूँगा, पिता जी, मैंने स्वर्ग के विरुद्ध, और आपके समक्ष पाप कर डाला है जी,

१९ मैं अब और आपका बेटा कहलाए जाने के योग्य नहीं हूँ: मुझे अपने भाड़े के नौकरों के जैसा ही एक बना दें। 

२० और वो उठा, और अपने पिता के पास आ गया। अब जब वो अभी बहुत दूरी पर ही था, तो उसके पिता ने उसे देखा, और उसे उस पर समवेदना हुई, और वो भागकर गया, और अपने बेटे को गले लगा लिया, और उसे चूमा। 

२१ और उसके बेटे ने उस से कहा, पिता जी, मैंने स्वर्ग के विरुद्ध, और आपकी दृष्टि में पाप कर डाला है जी, और मैं अब और आपका बेटा कहलाए जाने के योग्य नहीं हूँ। 

२२ परन्तु उस पिता ने अपने नौकरों से कहा, सब से बढ़िया चौगा ले आओ, और इसे पहना दो; और इसके हाथ में अँगूठी, और इसके पैरों में जूते पहना दो:

२३ और उस मोटे-ताज़े बछड़े को यहाँ ले आओ, और उसे मार दो; और हम भोजन करेंगे, और मगन हो जाएँगे:

२४ चूँकि ये मेरा बेटा तो मृत था, और ये पुनः जीवित है; ये तो खो गया था, और अब ये पा लिया गया है। और वो मगन होने लग गए। 

२५ अब उसका बड़ा बेटा खेत में था: और जैसे वो आ रहा था, और घर के निकट पहुँच रहा था, तो उसने संगीत और नृत्य सुना। 

२६ और उसने नौकरों में से एक को बुलाया, और पूछा कि इन बातों का क्या अर्थ है। 

२७ और उसने उस से कहा, आपका भाई आ गया है जी; और आपके पिता ने मोटा-ताज़ा बछड़ा मार दिया है, क्योंकि उन्होंने उसे अच्छा-भला पा लिया है। 

२८ और वो क्रोधित हो उठा, और उसने अन्दर जाना नहीं चाहा: इसलिए उसका पिता बाहर आया, और उसने उस से निवेदन किया। 

२९ परन्तु उसने उत्तर देते हुए अपने पिता से कहा, लो जी, इतने वर्षों से तो मैं आपकी सेवा में लगा हुआ हूँ, मैंने किसी भी समय आपके आदेश को नहीं तोड़ा: और तब भी आपने मुझे एक भी हलवान नहीं दिया, कि मैं अपने मित्रों के साथ मगन हो सकूँ:

३० परन्तु आपके इस बेटे के आते ही, जिसने आपकी सम्पत्ति राँडों के साथ उड़ा दी है, आपने इसके लिए वो मोटा-ताज़ा बछड़ा मार डाला है। 

३१ और उसके पिता ने उस से कहा, बेटे, तुम तो मेरे साथ सदैव हो, और वो सब कुछ जो मेरे पास है तुम्हारा ही है। 

३२ यह उचित था कि हम मगन और प्रसन्न हों: चूकी ये तुम्हारा भाई तो मृत था, और ये पुनः जीवित है; ये तो खो गया था, और ये पा लिया गया है। 




सोलहवाँ अध्याय।  


१ और उन्होंने अपने शिष्यों से यह भी कहा, कोई एक धनवान व्यक्ति था, जिसके पास एक प्रबन्धक था; और वही उसके समक्ष दोषारोपित था, कि उसने उसकी सामग्री को व्यर्थ कर दिया था। 

२ और उसने उसे बुलाकर उस से कहा, मैं तुम्हारे विषय में ये सब क्यों सुन रहा हूँ भई? अपने प्रबन्धक-पद के कार्य का लेखा-जोखा दे दो; क्योंकि तुम अब से प्रबन्धक नहीं रह सकते। 

३ तब उस प्रबन्धक ने स्वयं मन-ही-मन सोचा, भई मैं अब क्या करूँ? क्योंकि मेरे प्रभु तो मुझे प्रबन्धक-पद से हटा रहे हैं: मैं खोद नहीं सकता; और भीख माँगने में मुझे लज्जा आती है। 

४ मैं जानता हूँ कि मैं क्या करूँगा, ताकि, जब मुझे प्रबन्धक-पद से हटा दिया जाएगा, तो वो मुझे अपने घरों में ग्रहण कर लें। 

५ इसलिए उसने अपने प्रभु के सभी ऋणियों को अपने पास बुलाया, और उसने पहले से कहा, तुम पर मेरे मालिक का कितना ऋण है?

६ और उसने कहा, तेल के सौ माप। तो उसने उस से कहा, अपना ऋण-पत्र लो, और फुर्ती से नीचे बैठ कर पचास लिख दो। 

७ फिर उसने दूसरे से कहा, और तुम पर कितना ऋण है भई? और उसने कहा, सौ माप गेहूँ का। तो उसने उस से कहा, अपना ऋण-पत्र लो, और अस्सी लिख दो। 

८ और उस मालिक ने उस अन्यायी प्रबन्धक की प्रशन्सा की, क्योंकि उसने विद्वता दिखाई थी: क्योंकि इस संसार की सन्तानें अपनी पीढ़ी में प्रकाश की सन्तानों से अधिक विद्वान होते हैं। 

९ और मैं कहता हूँ तुम से, अनैतिकता की धन-सम्पत्ती से अपनी मित्रता कर लो; ताकि, जब तुम विफल होते हो, तो वो तुम्हारा स्वागत अनन्त निवास-स्थानों में कर लें। 

१० वो जो सब से न्यूनतम में विश्वसनीय होता है, वही बहुतायत में भी विश्वसनीय होता है: और वो जो सबसे न्यूनतम में अन्यायी होता है, वही बहुतायत में भी अन्यायी होता है। 

११ इसलिए यदि तुम दुराचारी धन-सम्पत्ती के साथ भरोसेमन्द नहीं रहे हो, तो तुम्हारे दायित्व में सत्यमई धन-धान्यों को कौन सुपुर्द करेगा भई?    

१२ और यदि तुम उस में भरोसेमन्द नहीं रहे हो, जो किसी और का है, तो कौन तुम्हें वो देगा जो तुम्हारा अपना है?

१३ कोई भी नौकर दो मालिकों की सेवा नहीं कर सकता है: क्योंकि या तो वो एक से घृणा करेगा, और दूसरे से प्रेम करेगा, अन्यथा वो एक के साथ लगा रहेगा, और दूसरे का तिरस्कार कर देगा। तुम ईश्वर की, और धन-सम्पत्ती की सेवा नहीं कर सकते हो। 

१४ और लोलुप फैरिसीयों ने भी ये सभी बातें सुनी: और उन्होंने उनकी हँसी उड़ाई। 

१५ और यीशु ने उन से कहा, तुम वो हो जो स्वयं को लोगों के सामने न्यायीप्रमाणित करते रहते हो: परन्तु ईश्वर तुम्हारे हृदयों से परिचित हैं: क्योंकि वो जो लोगों के बीच बड़ी मान्यता रखता है, वही ईश्वर की दृष्टि में अति-घ्रणितता है। 

१६ नियम और पैग़म्बर योहन तक थे: उसी समय से लेकर ईश्वर के राज्य का प्रवचन दिया जा रहा है, और हर व्यक्ति उस में बलपूर्वक्ता से प्रवेश कर रहा है। 

१७ और स्वर्ग और पृथ्वी का चलते चले जाना सरल है, न कि नियम की एक भी मात्रा का विफल होना।

१८ जो कोई भी अपनी पत्नी को त्यागता है, और किसी अन्य से विवाह करता है, व्यभिचार करता है: और जो कोई भी उस से विवाह करता है, जो अपने पति द्वारा त्यागी हुई हो, व्यभिचार करता है। 

१९ कोई एक धनवान व्यक्ति था, जो जामुनी रँग, और महीन छालटी के वस्त्र पहना करता था, और वो प्रत्येक दिन अपने वैभव में मगन रहा करता था: 

२० और कोई एक लाज़र नामक भिखारी था, जो घावों से भरा, उस धनवान व्यक्ति के दरवाज़े पर पड़ा रहता था, 

२१ जो यह इच्छा करता था कि उस धनवान व्यक्ति की मेज़ पर से गिरे टुकड़ों में से उसका पोषण हो सके: और इसके अतिरिक्त, कुत्ते आ कर उसके घावों को चाटा करते थे। 

२२ और यह होने को आया, कि उस भिखारी की मृत्यु हो गई, और वो दूतों द्वारा उठा कर ले जाया गया, और वो अब्राहम से गले लग गया: वो धनवान व्यक्ति भी मर गया, और उसे दफ़ना दिया गया;

२३ और नरक में उसने उत्पीड़ित होते हुए अपनी आँखें ऊपर उठाईं, और वो दूर अब्राहम को देखता है, और लाज़र उस से गले लगा हुआ। 

२४ और वो धनवान व्यक्ति चीख पड़ा, और उसने कहा, पिता अब्राहम, मुझ पर दया करें जी, और लाज़र को भेज दें, ताकि वो अपनी उँगली की नोक को पानी में डुबो कर मेरी जीभ को ठण्डा कर दे; क्योंकि मैं तो इस अग्नि-लपट में उत्पीड़ित हो रहा हूँ जी। 

२५ परन्तु अब्राहम ने कहा, बेटे, अपने स्मरण में लाओ कि तुमने अपने जीवन में अपनी अच्छी-अच्छी बातों का अनुभव किया है, और इसी प्रकार लाज़र ने बुरी बातों का: परन्तु अब वो सांत्वनित है, और तुम उत्पीड़ित हो। 

२६ और इस सभी के अतिरिक्त, हमारे और तुम्हारे बीच एक विशाल खाड़ी अचल-स्थित है: ताकि वो वहाँ नहीं पहुँच सकते, जो यहाँ से तुम्हारे पास पहुँचना चाहते हैं; न ही वो हमारे पास आ सकते हैं, जो वहाँ से यहाँ आना चाहते हैं। 

२७ तब उस धनवान ने कहा, इसलिए पिता जी, मैं आप से प्रार्थना करता हूँ कि आप लाज़र को मेरे पिता के घर भेज दें:

२८ क्योंकि मेरे पाँच भाई हैं; ताकि वो जाकर उन्हें साक्ष्य दे दे, कहिं वो भी इस उत्पीड़ना के स्थान में न आ जाएँ। 

२९ अब्राहम उस से कहता है, उनके पास मूसा और पैग़म्बर हैं; सुन लेने दो उन्हें उनको। 

३० और उसने कहा, नहीं अब्राहम पिताजी: यदि मृतकों में से कोई एक उनके पास जाएगा, तब वो मन-परिवर्तन कर लेंगे। 

३१ और अब्राहम ने उस से कहा, यदि वो मूसा और पैग़म्बरों को नहीं सुनेंगे, न ही वो मृतकों में से उठे हुए किसी भी व्यक्ति द्वारा मनवाए जाएँगे। 



सत्रहवाँ अध्याय। 


१ तब उन्होंने शिष्यों से कहा, अवरोधों का न आना असम्भव है: परन्तु हाय पड़े उस पर, जिसके द्वारा वो आते हैं!

२ उसके लिए यह बेहतर हुआ होता कि उसकी गर्दन पर चक्की का पत्थर टाँग दिया गया होता, और कि वो समुद्र में फैंक दिया गया होता, इसके बजाय, कि वो इन छोटे नन्हों में से एक को भी अवरोधित करे।

३ अपने समबन्ध में सावधान रहो: यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे विरुद्ध अपराध करता है, तो उसे डाँटो; और यदि वो मन-परिवर्तन कर लेता है, तो उसे क्षमा कर दो। 

४ और यदि वो तुम्हारे विरुद्ध दिन में सात बार पाप करता है, और दिन में सात बार तुम्हारी ओर पुनः मुड़कर, कहता है, मेरा मन-परिवर्तित है; तो तुम उसे क्षमा कर दोगे। 

५ और अपौस्लों ने प्रभु से कहा, हमारा विश्वास बढ़ाएँ। 

६ और प्रभु ने कहा, यदि तुम्हारे पास एक सरसों के बीज के दाने समान ही विश्वास हो, तो तुम इस काले-शहतूत के पेड़ से कहोगे, तू जड़ से उखड़ जा, और तू समुद्र में लग जा; तो वो तुम्हारा पालन कर लेगा। 

७ परन्तु तुम में से कौन, जिसका नौकर हल चला रहा हो, या मवेशी को चारा डाल रहा हो, जब वो खेत से आ जाता है, उस से यकायक कहेगा, जा और भोजन करने बैठ जा भई? 

८ और क्या वो बल्कि उस नौकर से यह नहीं कहेगा, उसे तैयार कर दे जो मैं रात्रि-भोज में खाऊँगा, और अपनी कमर कस कर मेरी सेवा कर, जब तक मैं खा-पी नहीं लेता; और उसके बाद तू खाएगा और पीएगा?

९ क्या वो उस नौकर को धन्यवाद देगा, क्योंकि उसने उन कार्यों को किया, जिनका उसे आदेश दिया गया था? मुझे तो नहीं लगता। 

१० इसी प्रकार तुम भी, जब तुम उन सभी कार्यों को कर चुकोगे, जिन्हें करने का तुम्हें आदेश दिया गया है, कहना, जी हम तो अलाभकारी नौकर हैं: हमने वही कर दिया है, जो करना हमारा कर्तव्य था। 

११ और यह होने को आया, कि जैसे यीशु यरूशलेम जा रहे थे, कि वो समैरिया और गलील के बीच में से होते हुए गए।  

१२ और जैसे उन्होंने किसी एक गाँव में प्रवेश किया, वहीं उन्हें दस आदमी मिले जो कुष्ठ रोगी थे, जो दूर खड़े थे:

१३ और उन्होंने अपनी वाणियाँ उठाईं, और कहा, यीशु, मालिक हम पर दया करें। 

१४ और जब उन्होंने उन्हें देखा, तो उन्होंने उनसे कहा, चले जाओ, स्वयं को पुरोहितों से दिखवा लो। और यह होने को आया, कि जैसे वो जा रहे थे, वो स्वच्छ हो गए। 

१५ और उन में से एक ने, जब उसने देखा कि वो आरोग्य हो चुका था, वापस मुड़ा, और एक प्रबल वाणी से उसने ईश्वर का महिमामंडन किया, 

१६ और वो अपने मूँह के बल उनके चरणों में गिर पड़ा, उन्हें धन्यवाद देता हुआ: और वो एक समैरियावासी था। 

१७ और यीशु ने उत्तर देते हुए कहा, क्या दस व्यक्तियों का स्वच्छीकरण नहीं हुआ था क्या? तो फिर वो नौ कहाँ हैं?

१८ इस परदेशी के सिवा, वो नहीं दिखाई दे रहे जो ईश्वर का महिमामंडन करने वापस आएँ हों?

१९ और उन्होंने उस से कहा, उठो, चले जाओ अपने पथ पर: तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें बचा लिया है। 

२० और जब फैरिसियों ने उन से पूछा, कि ईश्वर का राज्य कब आएगा, तो उन्होंने उन्हें उत्तर दिया और कहा, ईश्वर का राज्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं आता है:

२१ न ही वो कहेंगे, लो जी यहाँ! या, लो जी वहाँ! क्योंकि देखो, ईश्वर का राज्य तुम्हीं में है।  

२२ और उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, वो दिन आएँगे जब तुम मनुष्य-पुत्र के दिनो में से एक को देखना चाहोगे, परन्तु तुम उसे नहीं देख पाओगे। 

२३ और वो तुम से कहेंगे, इधर देखो; या उधर देखो: परन्तु तुम उनके साथ मत लग जाना, न ही उनके पीछे-पीछे चल देना। 

२४ क्योंकि जैसे बिजली, जो स्वर्ग के तले एक भाग को उज्ज्वलित करती हुई, स्वर्ग के तले दूसरे भाग तक भी चमकती है; इसी प्रकार मनुष्य-पुत्र भी अपने दिन में होगा। 

२५ परन्तु उसे पहले कई कष्ट झेलने होंगे, और इस पीढ़ी द्वारा अस्वीकृत होना होगा। 

२६ और जैसे नूह के दिनो में था, उसी प्रकार मनुष्य-पुत्र के दिनो में भी होगा। 

२७ वो खाते थे, पीते थे, उन्होंने पत्नियों से विवाह किए, और उन्हें विवाह में दिया गया, उस दिन तक जब नूह ने सँदूक में प्रवेश कर लिया था, और वो प्रलय आया, और उसने उन सभी को नष्ट कर डाला। 

२८ इसी प्रकार लोट के दिनो में भी था; वो खाते थे, पीते थे, वो खरीदते थे, वो बेचते थे, वो रोपते थे, वो निर्माण करते थे;

२९ परन्तु उसी दिन जब लोट सदोम से बाहर निकल आया था, तो स्वर्ग में से अग्नि और गन्धक बरस पड़े थे, और उन्होंने उन सभी को नष्ट कर डाला। 

३० ऐसा ही उस दिन होगा जब मनुष्य-पुत्र प्रत्यक्ष होगा। 

३१ उस दिन, वो जो अपने घर की छत पर होगा, और उसका सामान घर के अन्दर, उसे अपना सामान लेने नीचे मत आने देना: और वो जो खेत में है, उसे इसी प्रकार वापस मत आने देना। 

३२ लोट की पत्नी याद है? 

३३ जो कोई भी अपने जीवन को बचाने की इच्छा रखेगा, उसे खो देगा; और जो कोई भी अपने जीवन को खो देगा, उसका परिरक्षण कर लेगा। 

३४ मैं बता रहा हूँ तुम्हें, उस रात दो व्यक्ति एक बिस्तर में होंगे; एक को ले लिया जाएगा, और दूसरे को छोड़ दिया जाएगा। 

३५ दो स्त्रियाँ एक साथ पीस रही होंगी; एक को ले लिया जाएगा, और दूसरी को छोड़ दिया जाएगा। 

३६ दो पुरुष खेत में होंगे; एक को ले लिया जाएगा, और दूसरे को छोड़ दिया जाएगा।  

३७ और उन्होंने उत्तर दिया और उन से कहा, कहाँ प्रभु? और उन्होंने उनसे कहा, जहाँ कहीं भी देह है, वहीं गरुड़ एक साथ एकत्रित हो जाएँगे। 




अट्ठारहवाँ अध्याय। 


१ और इस उद्देश्य से कि लोग सदैव प्रार्थना करें, और थकें न, उन्होंने उन से एक दृष्टान्त बोला;

२ कहते हुए, किसी नगर में एक न्यायाधीष था, जो न तो ईश्वर से डरता था, न ही वो मानवता को महत्व देता था: 

३ और उसी नगर में एक विधवा थी; और वो उस न्यायाधीष के पास आई, कहती हुई, मुझे मेरे विपक्षी से प्रतिषोध दिलवा दें जी। 

४ और कुछ समय तक उसने यह नहीं चाहा: परन्तु बाद में उसने अपने मन-ही-मन कहा, जब कि मैं ईश्वर से नहीं डरता, न ही मैं मानवता को महत्व देता हूँ;

५ फिर भी चूँकी ये विधवा मुझे विचलित कर रही है, मैं इसे प्रतिषोध दिलवाऊँगा, कहीं ये बार-बार आकर मुझे थका न दे।  

६ और प्रभु ने कहा, भई सुन लो वो जो ये अन्यायी न्यायाधीष कह रहा है!

७ और क्या ईश्वर अपने स्वयं के निर्वाचितों को प्रतिषोध नहीं दिलवाएँगे क्या, जो दिन-रात उनकी ओर चीखते रहते हैं, जब कि वो उनके साथ धीरज रखते हैं?

८ मैं बताता हूँ तुम्हें कि वो उन्हें शीघ्रता से प्रतिषोध दिलवाएँगे। तथापि जब मनुष्य-पुत्र आता है, क्या वो पृथ्वी पर विश्वास पाएगा क्या? 

९ और उन्होंने यह दृष्टान्त उन में से कुछों से बोला, जो अपने ही मन में विश्वस्त थे कि वो न्यायी थे, और वो दूसरों का तिरस्कार करते थे: 

१० दो व्यक्ति ऊपर मन्दिर में प्रार्थना करने गए; एक फैरिसी था, और दूसरा एक चुँगी-कर्मचारी। 

११ उस फैरिसी ने खड़े हो कर अपने ही स्वयं से इस प्रकार प्रार्थना की, ईश्वर, मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, कि मैं वैसा नहीं हूँ जैसे अन्य लोग हैं, बलादग्रहण करने वाले, अन्यायी, व्यभिचारी, या इस चुँगी-कर्मचारी जैसा ही। 

१२ मैं तो सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूँ, और जो भी मेरे अधिकार में है, मैं उसका दसवाँ भाग दे देता हूँ। 

१३ और दूर खड़ा वो चुँगी-कर्मचारी, अपनी आँखें भी स्वर्ग की ओर नहीं उठा रहा था, बल्कि अपनी छाती पीटता हुआ, वो कह रहा था, हे ईश्वर, मैं तो पापी हूँ, मुझ पर दया करें जी।

१४ मैं कहता हूँ तुम से, यह व्यक्ति अपने घर न्यायी-प्रमाणित हो कर चला गया, उस दूसरे की अपेक्षा: क्योंकि हर कोई जो स्वयं को पदोन्नत करेगा, पदावनत कर दिया जाएगा; और वो जो स्वयं को पदावनत करेगा, पदोन्नत कर दिया जाएगा।

१५ और वो उनके पास नवजात शिशुओं को भी लाए, ताकि वो उनका स्पर्श कर सकें: परन्तु जब उनके शिष्यों ने यह देखा, तो उन्होंने उन्हें डाँट लगा दी। 

१६ परन्तु यीशु ने उन्हें अपने पास बुलाया, और कहा, नन्हें बच्चों को मेरे पास आने की अनुमति दो, और उन्हें मत रोको: क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों का ही है। 

१७ सच में मैं कहता हूँ तुम से, जो कोई भी ईश्वर के राज्य को एक छोटे बच्चे के समान ग्रहण नहीं करेगा, वो उस में किसी भी प्रकार से प्रवेश नहीं करेगा। 

१८ और किसी एक अध्यक्ष ने उन से पूछा, कहते हुए, अच्छे गुरुवर, जी मैं अनन्त जीवन विरासत में पाने के लिए क्या करूँ?

१९ और यीशु ने उस से कहा, तुम क्यों मुझे अच्छा पुकार रहे हो? सिवाय एक ईश्वर के, अन्य कोई भी अच्छा नहीं है। 

२० तुम आदेशों से परिचित हो, तुम व्यभिचार मत करो, हत्या मत करो, चोरी मत करो, झूठी गवाही मत दो, अपने पिता और अपनी माता का आदर करो। 

२१ और उसने कहा, जी इन सभी बातों का तो मैंने अपने युवाकाल से लेकर पालन किया है। 

२२ अब जब यीशु ने यह बातें सुनी, तो उन्होंने उस से कहा, तथापि तुम में एक बात की कमी है: वो सब कुछ बेच दो जो तुम्हारे पास है, और उसे दरिद्रों को बाँट दो, और तुम्हारे पास स्वर्ग में धन-भण्डार होगा: और आओ, मेरे अनुयायी बन जाओ। 

२३ और जब उसने यह सुना, तो वो बहुत शोक से भर उठा: क्योंकि वो बहुत ही धनवान था।

२४ और जब यीशु ने देखा कि वो तो बहुत ही शोकार्तित हो उठा था, तो उन्होंने कहा, कितनी ही कठिनाई से वो जिनके पास धन-धान्य हैं, ईश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे! 

२५ चूँकि ऊँट का सुई की आँख में से निकलना सरल है, न कि किसी धनवान व्यक्ति का ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना। 

२६ और उन्होंने जिन्होंने यह सुना, कहा, तो फिर किस का बचाव हो सकता है जी?

२७ और उन्होंने कहा, वो बातें जो मनुष्यों के लिए असम्भव हैं, ईश्वर के लिए सम्भव हैं। 

२८ तब पतरस ने कहा, लो भई, हम ने तो सब कुछ छोड़ दिया, और आपके पीछे-पीछे आ चले हैं। 

२९ और उन्होंने उन से कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जिसने घर, या पिता-माता, या भाई-जन, या पत्नी, या बच्चे, ईश्वर के राज्य के वास्ते छोड़ें हैं,

३० जो कई गुणा अधिक इस समय में ग्रहण नहीं कर लेगा, और आने वाले संसार में जीवन अनन्त। 

३१ तब उन्होंने अपने साथ उन बारह को लेकर उनसे कहा, देखो, हम ऊपर यरूशलेम जा रहे हैं, और वो सभी बातें जो पैग़म्बरों द्वारा मनुष्य-पुत्र के सम्बन्ध में लिखी गई हैं, पूर्ण हो जाएँगी। 

३२ क्योंकि उसे अन्यप्रजातियों को प्रदान कर दिया जाएगा, और उसकी हँसी उड़ाई जाएगी, और उसके साथ धृष्टता से दुर्व्यवहार किया जाएगा, और उस पर थूका जाएगा:

३३ और वो उसे कोड़ों से पीटेंगे, और उसे मृत्यु के घाट उतार डालेंगे: और तीसरे दिन वो पुनः उठ जाएगा। 

३४ और उन्हें इन बातों में से कोई भी समझ में नहीं आई: और यह बात उन से छुपी थी, न ही वो यह बातें जान पाए, जो बोली गई थीं। 

३५ और यह होने को आया, कि जैसे वो यरीहो के निकट आ गए थे, कोई एक नेत्रहीन व्यक्ति पथ के किनारे पर बैठा भीख माँग रहा था:

३६ और जनौघ को अपने पास से चलते-जाते सुन कर, उसने पूछा कि इसका क्या अर्थ है। 

३७ और उन्होंने उसे बताया कि नासरत के यीशु जा रहे हैं। 

३८ और वो चीख पड़ा, कहता हुआ, यीशु, आप दाऊद के पुत्र, मुझ पर दया करें जी। 

३९ और उन्होंने, जो सामने से जा रहे थे, उसे डाँटा कि वो शान्त हो जाए: परन्तु वो और भी अधिकता से चीखने लग गया, आप दाऊद के पुत्र, मुझ पर दया करें जी।

४० तो यीशु खड़े हो गए, और उन्होंने आदेश दिया कि उसे उनके पास लाया जाए: और जब वो निकट आ गया था, तो उन्होंने उस से पूछा,

४१ कहते हुए, तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए करूँ? और उसने कहा, प्रभु, कि मैं अपनी दृष्टि पा लूँ जी। 

४२ और यीशु ने उस से कहा, ग्रहण कर लो अपनी दृष्टि: तुम्हारे भरोसे ने तुम्हें बचा लिया है। 

४३ और तुरंत ही उसने अपनी दृष्टि ग्रहण कर ली, और वो यीशु के पीछे-पीछे ईश्वर को गौरवान्वित करता हुआ चल दिया: और सभी लोगों ने यह देख कर ईश्वर की प्रशंसा की। 




उन्नीसवाँ अध्याय। 


१ और यरीहो में प्रवेश कर कर यीशु चलते जा रहे थे। 

२ और देखो तो, वहीं ज़क्कई नामक एक पुरुष था, जो चुँगी-कर्मचारियों का मुखिया था, और वो धनवान था।

३ और वो यीशु को देखना चाहता था कि वो कौन थे; परन्तु भीड़ के कारण वो उन्हें देख न सका, क्योंकि उसका कद छोटा था। 

४ और वो आगे दौड़कर उन्हें देखने के लिए, एक गूलर के पेड़ पर ऊपर चढ़ गया: क्योंकि उन्हें उसी पथ पर से जाना था। 

५ और जब यीशु उस स्थान पधार गए थे, तो उन्होंने दृष्टि ऊपर उठाई, और उसे देखा, और उस से कहा, ज़क्कई, भई फुर्ती से नीचे उतर आओ; क्योंकि आज मुझे अवश्य ही तुम्हारे घर में वास करना है। 

६ और वो फुर्ती से नीचे उतर आया, और उसने उनका आनंद सहित स्वागत किया। 

७ और जब उन्होंने यह देखा, तो वो सभी बड़बड़ाने लग गए, कहते हुए, कि ये तो एक पापी आदमी के पास जाकर उसका अतिथी बन गया है। 

८ और ज़क्कई ने खड़े हो कर प्रभु से कहा; देखें प्रभु जी, मैं अपनी सम्पत्ती का अर्ध भाग दरिद्रों को दे देता हूँ; और यदि मैंने किसी भी व्यक्ति से कुछ भी झूठे दोषारोपण से ले लिया हो, तो मैं उसे चार गुणा वापस लौटा देता हूँ।  

९ और यीशु ने उस से कहा, इस दिन बचाव इस घर में आ गया है, क्योंकि यह भी तो अब्राहम का ही एक बेटा है। 

१० क्योंकि मनुष्य-पुत्र उसे ढूँढने और बचाने आया है जो घुम हो गया था। 

११ और जैसे वो यह बातें सुन रहे थे, यीशु कहते गए और एक दृष्टान्त बोले, क्योंकि वो यरूशलेम के निकट थे, और क्योंकि वो जन सोच रहे थे कि ईश्वर का राज्य तुरन्त ही प्रकट होने वाला है। 

१२ इसलिए उन्होंने कहा, कोई एक ठाकुर अपने लिए एक राज्य ग्रहण कर, वापस लौटने के विचार से एक दूर देश चला गया। 

१३ और उसने अपने दस नौकरों को बुलाया, और उसने उन्हें दस सिक्के प्रदान कर दिए, और उनसे कहा, मेरे वापस आने तक व्यापार करो। 

१४ परन्तु उसके नागरिक उस से घृणा करते थे, और उन्होंने उसके चले जाने के पश्चात एक संदेश भिजवाया, कहता हुआ, भई हम तो इस व्यक्ति को अपने ऊपर राज नहीं करने देंगे। 

१५ और यह होने को आया, कि जब वो अपने राज्य को ग्रहण कर लेने पर वापस लौटा, तो उसने आदेश दिया कि इन नौकरों को उसके पास बुला लिया जाए, जिन्हें उसने वो पैसा दिया था, ताकि वो जान ले कि प्रत्येक व्यक्ति ने व्यापार द्वारा कितना लाभ कमाया। 

१६ तब पहला आया, कहता हुआ, प्रभु, आपके सिक्के ने दस सिक्कों का लाभ कमा लिया है जी। 

१७ और उसने उस से कहा, बढ़िया मेरे अच्छे नौकर: क्योंकि तुम बहुत कम में भरोसेमन्द रहे हो, तुम दस नगरों पर प्राधिकार रखो। 

१८ और फिर वो दूसरा आया, कहता हुआ, प्रभु, आपके सिक्के ने पाँच सिक्कों का लाभ कमा लिया है जी। 

१९ और उसने इसी प्रकार उस से कहा, तुम भी पाँच नगरों पर शासन करो।

२० और फिर अगला आया, कहता हुआ, प्रभु देख लें जी, ये रहा आपका सिक्का, जिसे मैंने एक रूमाल में लेकर रखा हुआ है:

२१ क्योंकि मुझे आप का डर था, क्योंकि आप एक कठोर व्यक्ति हैं: आप वो ऊपर उठाते हैं जो आप नीचे नहीं रखते, और आप उसकी कटाई करते हैं जिसे आपने बोया नहीं हैं। 

२२ और वो उस से कहता है, तू दुष्ट नौकर, तेरे अपने ही मूँह से मैं तेरा न्याय करूँगा। तू जानता था कि मैं एक कठोर व्यक्ति था, वो उठाता हुआ जिसे मैंने नीचे नहीं रखा, और उसकी कटाई करता हुआ जिसे मैंने नहीं बोया:

२३ इस कारण फिर तूने मेरा पैसा साहूकार के पास क्यों नहीं जमा करवाया, ताकि मेरे आगमन पर मैंने वो जो मेरा अपना है, ब्याज़ समेत ग्रहण कर लिया होता?  

२४ और उसने उस से कहा जो उसके पास खड़ा था, इस से वो सिक्का ले लो, और उसे दे दो जिसके पास दस सिक्के हैं। 

२५ (और उन्होंने उस से कहा, प्रभु, इसके पास दस सिक्के हैं जी।)

२६ क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि प्रत्येक को जिसके पास है उसे दिया जाएगा: और उस से जिसके पास नहीं है, उस से वो ही ले लिया जाएगा, जो कुछ भी उसके पास है। 

२७ परन्तु उन मेरे शत्रुओं को, जिन्होंने नहीं चाहा कि मैं उन पर राज करूँ, यहाँ ले आओ, और उन्हें मेरे सामने मार डालो। 

२८ और जब यीशु ऐसा बोल चुके थे, तो वो आगे यरूशलेम की ओर आरोहण करते हुए चले गए। 

२९ और यह होने को आया, कि जब वो बेतफगे और बेतनियाह के निकट आ गए थे, उस पहाड़ पर जो कि जैतूनों का पहाड़ कहलाया जाता है, तो उन्होंने अपने शिष्यों में से दो को भेजा,

३० कहते हुए, तुम्हारे विपरीत उस गाँव में चले जाओ: जिस में प्रवेश करने पर, तुम एक युवा-गधा बन्धा हुआ पाओगे, जिस पर कोई भी आदमी कभी नहीं बैठा, उसे खोल कर, यहाँ ले आओ। 

३१ और यदि कोई भी व्यक्ति तुम से पूछता है, भई तुम इसे क्यों खोल रहे हो? तो तुम उस से इस प्रकार कहोगे, क्योंकि प्रभु को इसकी आवश्यकता है। 

३२ और वो जिन्हें भेजा गया था, अपने पथ पर चले गए, और उन्होंने वैसा ही पाया जैसा यीशु ने उनसे कहा था। 

३३ और जैसे वो उस युवा-गधे को खोल रहे थे, तो उसके मालिकों ने उन से कहा, तुम क्यों इस युवा-गधे को खोल रहे हो भई?

३४ और उन्होंने कहा, प्रभु को इसकी आवश्यकता है। 

३५ और वो उसे यीशु के पास ले आए: और उन्होंने अपने वस्त्र उस युवा-गधे पर फैंक दिए, और उन्होंने यीशु को उस पर बैठा दिया। 

३६ और जैसे यीशु जा रहे थे, उन लोगों ने अपने वस्त्र पथ पर फैला डाले। 

३७ और जब यीशु निकट आ गए थे, यहाँ तक कि जैतूनों के पहाड़ की ढलान तक भी, शिष्यों का पूरा जनौघ हर्ष के मारे ईश्वर की प्रशन्सा एक प्रबल वाणी के साथ करने लग गया, उन सभी बलशाली कार्यों के लिए जिन्हें उन्होंने देखा था, 

३८ कहते हुए, धन्य हैं वो राजा जो प्रभु के नाम में आ रहे हैं; स्वर्ग में शान्ति, और उच्चतम में महिमा। 

३९ और जनौघ के बीच में से कुछ फैरिसियों ने उन से कहा, गुरुवर, अपने शिष्यों को डाँटो भई! 

४० और उन्होंने उत्तर दिया, और उन से कहा, मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि यह शान्त हो जाएँ, तो यह पत्थर ही तुरन्त चीख पड़ेंगे!

४१ और जब वो समीप आ गए थे, तो उन्होंने उस नगर को देखा, और उसके लिए रो पड़े,

४२ कहते हुए, यदि तुम ने, हाँ तुम्हीं ने यह समझ लिया होता, कम से कम इसी तुम्हारे दिवस पर, वो बातें जो तुम्हारी शान्ति के लिए हैं! परन्तु अब वो तुम्हारी आँखों से छिप चुकी हैं। 

४३ क्योंकि तुम पर वो दिन आ पड़ेंगे, कि तुम्हारे शत्रु तुम्हारे आस-पास मोर्चा-बन्दी कर डालेंगे, और तुम्हें चारों ओर से घेर लेंगे, और वो तुम्हें प्रत्येक दिशा से दबोच देंगे,

४४ और वो तुम्हें, और तुम्हारे भीतर तुम्हारे बच्चों को धरती समान समतल कर डालेंगे; और वो तुम में एक भी पत्थर एक के ऊपर एक नहीं रख छोड़ेंगे, चूँकि तुम ने अपने निरीक्षण का समय नहीं पहचाना।  

४५ और वो मन्दिर के अन्दर चले गए, और उन्होंने उन्हें बाहर फैंकना आरम्भ कर दिया, जो वहीं खरीद-बेच रहे थे;

४६ उन से कहते हुए, यह लिखा है, मेरा घर प्रार्थना का घर है; परन्तु तुम ने तो इसे चोरों का एक अड्डा बना डाला है!

४७ और वह दिन प्रति-दिन मन्दिर में सिखाते थे। परन्तु प्रमुख पुरोहित, और लिपिक, और लोगों के प्रमुख उन्हें नष्ट करने की ताक में लगे रहते थे, 

४८ और उन्हें सूझता न था कि वो क्या करें: क्योंकि सभी लोग यीशु को बड़ी ही सतर्कता से सुना करते थे। 





बीसवाँ अध्याय। 


१ और यह होने को आया, कि उन में से किसी एक दिन, जैसे वो लोगों को मन्दिर में सिखा रहे थे, और शुभ-समाचार का प्रवचन दे रहे थे, कि प्रमुख पुरोहित और लिपिक उन पर वृद्ध-गणों के साथ आ धमके,

२ और वो उन से बोले, कहते हुए, हमें बताओ, कि किस प्राधिकार से तुम यह कार्य कर रहे हो? या वो कौन है जिसने तुम्हें यह प्राधिकार दिया है?

३ और उन्होंने उत्तर दिया और उनसे कहा, मैं भी तुम से एक बात पूछूँगा, उत्तर दो मुझे:

४ क्या योहन का बपतिस्मा स्वर्ग से आया था, या वो मनुष्यों से आया था?

५ और उन्होंने स्वयं से सोच-विचार किया, कहते हुए, भई यदि हम कहते हैं, स्वर्ग से; तो ये कहेगा, फिर तुम ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया?

६ परन्तु यदि हम कहते हैं, मनुष्यों से; तो सभी लोग हम पर पथराव कर देंगे: क्योंकि ये लोग विश्वस्त हैं कि योहन एक पैग़म्बर था। 

७ और उन्होंने उत्तर दिया, कि वो यह नहीं बता सकते कि वो कहाँ से था। 

८ और यीशु ने उनसे कहा, न ही मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि मैं किस प्राधिकार से यह कार्य करता हूँ। 

९ तब उन्होंने लोगों से यह दृष्टान्त बोलना आरम्भ किया; किन्ही एक व्यक्ति ने एक अंगूर-खेत रोप कर उसे खेतीहरों को भाड़े पर चढ़ा दिया, और एक दीर्घ-काल के लिए किसी दूर देश चले गए: 

१० और ऋतु के समय पर उन्होंने उन खेतीहरों के पास एक नौकर को भेजा, ताकि वो उसे अंगूर-खेत का फल प्रदान कर दें: परन्तु उन खेतीहरों ने उसे पीट कर उसे खाली हाथ वापस भेज दिया। 

११ और पुनः उन्होंने एक अन्य नौकर को भेजा: और उन्होंने उसे भी पीट डाला, और उसे अपमानित कर, खाली हाथ भेज दिया। 

१२ और पुनः उन्होंने एक तीसरे को भेजा: और उन्होंने उसे भी घायल कर दिया, और उसे निकाल कर बाहर फैंक डाला। 

१३ तब उन अंगूर-खेत के प्रभु ने कहा, भई अब मैं क्या करूँ? मैं अपने अतिप्रीय पुत्र को भेजूँगा: यह हो सकता है कि वो उस की श्रद्धा कर लें, जब वो उसे देखेंगे। 

१४ परन्तु जब उन खेतीहरों ने उसे देखा, तो उन्होंने आपस में सोच-विचार किया, कहते हुए, भई यही वो वारिस है; आओ, हम इसकी हत्या कर डालते हैं, ताकि विरासत हमारी बन जाए। 

१५ तो उन्होंने उसे अंगूर-खेत से निकाल कर बाहर फैंक दिया, और उसकी हत्या कर डाली। इसलिए अब अंगूर-खेत के प्रभु उनके साथ क्या करेंगे?

१६ वो आएँगे, और इन खेतीहरों को नष्ट कर डालेंगे, और वो उस अंगूर-खेत को औरों को दे देंगे। और जब उन्होंने यह सुना, तो उन्होंने कहा, भई ऐसा न हो! 

१७ और यीशु ने उन्हें देखते हुए कहा, तो फिर यह क्या है जो लिखा हुआ है, वो पत्थर जिसे राजगीरों ने अस्वीकार कर दिया, वही कोने का सिरा बन गया है?

१८ जो कोई भी उस पत्थर पर गिरेगा, वो तोड़ दिया जाएगा: परन्तु जिस किसी पर भी यह गिरेगा, वो उसे चूरे-चूरे में पीस डालेगा!

१९ और उसी घड़ी प्रमुख पुरोहित और लिपिक यीशु को पकड़ लेना चाहते थे; और वो लोगों से डरते थे: क्योंकि उन्हें आभास हो गया था कि उन्होंने यह दृष्टान्त उन्हीं के विरुद्ध बोला था; 

२० और वो उन पर ताक लगाए बैठे थे, और उन्होंने गुप्तचर भेजे, जो स्वयं न्यायी पुरुष होने का दिखावा करें, ताकि वो उन्हें उनके शब्दों में फँसा कर, उन्हें राज्यपाल की शक्ती और उसके प्राधिकार को प्रदान कर दें।

२१ और उन्होंने उन से पूछा, कहते हुए, गुरुवर, हम जानते हैं कि तुम यथार्थता से बोलते और सिखाते हो, न ही तुम किसी के भी चहरे को मान्यता देते हो, बल्कि ईश्वर का पथ सच्चाई से सिखाते हो:

२२ क्या हमारे लिए रोम के राजा को कर भरना न्यायी है, या नहीं? 

२३ परन्तु उन्होंने उनकी कपटता का आभास कर लिया, और उनसे कहा, तुम मुझे क्यों परख रहे हो?

२४ दिखाओ मुझे एक दीनार। इस पर किस की प्रतिमा और अभिलेख हैं? उन्होंने उत्तर दिया और कहा, रोम के राजा के।

२५ और उन्होंने उन से कहा, इसलिए रोम के राजा को वो वस्तुएँ चुकाओ जो रोम के राजा की हैं, और ईश्वर को वो वस्तुएँ जो ईश्वर की हैं। 

२६ और वो लोगों के समक्ष उन्हें उनके शब्दों में फँसा न सके: और वो उनके उत्तर पर अचम्भित रह गए थे, और वो चुप कर गए। 

२७ तब उनके पास सदूकीयों में से कुछ आए, जो नकारते हैं कि कोई भी पुनरुत्थान होता है; और उन्होंने उन से पूछा, 

२८ कहते हुए, गुरुवर जी, मूसा ने हमें लिखा था, यदि किसी भी पुरुष का भाई मर जाता है, जिसके पास एक पत्नी हो, और वो सन्तानहीन मर जाता है, तो उसका भाई उसकी पत्नी ले ले, और वो अपने भाई के लिए बीज उत्पन्न करे। 

२९ इसलिए अब सात भाई थे: और पहले ने एक पत्नी ली, और वो सन्तानहीन मर गया। 

३० और दूसरे ने उसे पत्नी के लिए ले लिया, और वो भी बिन बच्चों के चल बसा।

३१ और तीसरे ने भी उसे पत्नी के लिए ले लिया; और इसी प्रकार उन सातों ने भी, और उन्होंने कोई बच्चे नहीं छोड़े, और मर गए। 

३२ सबसे अन्त में वो स्त्री भी मर गई। 

३३ इसलिए पुनरुत्थान में वो उन में से किस की पत्नी होगी? क्योंकि उन सातों ने उसे पत्नी लिया था। 

३४ और यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, इस संसार की सन्तानें विवाह करते हैं, और विवाह में दिए जाते हैं:

३५ परन्तु वो जो उस संसार को, और मृतकों में से पुनरुत्थान को प्राप्त करने के योग्य गिने जाएँगे, न ही विवाह करते हैं, न ही विवाह में दिए जाते हैं:

३६ न ही उनकी पुनः मृत्यु होती है: क्योंकि वो दूतों के समान होते हैं; और पुनरुत्थान की सन्तानें होते हुए, वो ईश्वर की सन्तानें होते हैं। 

३७ और कि मृतक उठा दिए जाते हैं, यहाँ तक कि मूसा ने भी झाड़ी के साथ बताया, जब वो प्रभु को, अब्राहम के ईश्वर, और इसहाक के ईश्वर, और याकूब के ईश्वर, कहता है। 

३८  क्योंकि वो मृतकों के नहीं, बल्कि जीवितों के ईश्वर हैं: क्योंकि सभी उन्हीं के प्रति जीवित हैं। 

३९ तब लिपिकों में से कुछों ने उत्तर देते हुए कहा, गुरुवर, आपने सही कहा है। 

४० और उसके पश्चात उन्होंने उन से कोई भी अन्य प्रश्न पूछने का साहस नहीं किया। 

४१ और यीशु ने उनसे कहा, वो कैसे कहते हैं कि मसीहा दाऊद का बेटा है?

४२ और दाऊद ही स्वयं भजनों की पुस्तक में कहता है, प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, विराजमान हो जाओ तुम मेरे दाएँ हाथ पर, 

४३ जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारा पायदान नहीं बना देता?

४४ इसलिए दाऊद उसे प्रभु पुकार रहा है, तो फिर वो उसका पुत्र कैसे है भई?

४५ तब सभी लोगों की सुनवाई में उन्होंने अपने शिष्यों से कहा,

४६ लिपिकों से सावधान रहना, जो लम्बे-लम्बे चौगों में चलने-फिरने की वांछा करते हैं, और बाज़ारों में प्रणामों से, और यहूदी-आराधनालयों में सब से उच्चतम कुर्सियों से, और भोजों में सब से उच्च स्थानो से प्रेम करते हैं;

४७ जो विधवाओं के घरों का भुख-भक्षण करते रहते हैं, और झूठे दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करते रहते हैं: यही बृहत्तर दण्डाज्ञा प्राप्त करेंगे। 




इक्कीसवाँ अध्याय। 


१ और उन्होंने ऊपर देखा, कि धनवान व्यक्ति कोषागार में अपनी भेंटें डाल रहे थे। 

२ और उन्होंने किसी एक दरिद्र विधवा को भी कोषागार में दो पाई डालते हुए देखा, 

३ और उन्होंने कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, कि इस दरिद्र विधवा ने उन सभी से अधिक भेंट डाली है:

४ क्योंकि इन सब ने तो अपनी बहुतायतता में से ईश्वर की भेंटों में डाला है; परन्तु इस दरिद्र विधवा ने अपनी निर्धनता में से अपनी समस्त आजीविका, जो उसके पास थी, डाल दी है। 

५ और जैसे कुछ मन्दिर के विषय में बोल रहे थे, कि वो कैसे सुंदर पत्थरों और उपहारों से सुसज्जित था, यीशु ने कहा,

६ इन वस्तुओं के समबंध में जिन्हें तुम देख रहे हो, वो दिन आएँगे, जिन में एक के ऊपर एक भी पत्थर बचा नहीं रहेगा, जो नीचे नहीं गिरा दिया जाएगा। 

७ और उन्होंने उन से पूछा कहते हुए, गुरुवर, परन्तु यह बातें कब घटेंगी जी? और क्या संकेत होगा जब इन बातों की होनी घटेगी?

८ और उन्होंने कहा, ध्यान रखना कि तुम धोखे में न पड़ जाना: क्योंकि मेरे नाम में कई आएँगे, कहते हुए, मैं मसीहा हूँ; और वो समय निकट आ रहा है: इसलिए तुम उनके पीछे-पीछे मत चल देना। 

९ और जब तुम युद्धों और उपद्रवों के विषय में सुनोगे, तो आतंकित मत हो जाना: चूँकि इन बातों का पहले घटना अनिवार्य है; परन्तु अन्त अभी यकायक नहीं है। 

१० फिर उन्होंने उन से कहा, राष्ट्र, राष्ट्र के विरुद्ध, और राज्य राज्य के विरुद्ध उठ खड़ा होगा:

११ और बड़े भूकम्प विभिन्न स्थानो में आएँगे, और अकाल, और महामारियाँ; और भयानक दृश्य, और बड़े संकेत स्वर्ग में से आएँगे। 

१२ परन्तु इन सब से पहले, वो तुम्हें पकड़ कर तुम्हारा अत्याचार करेंगे, यहूदी-आराधनालयों और कारावासों में तुम्हें प्रदान करते हुए, राजाओं और शासकों के समक्ष तुम्हें मेरे नाम वास्ते लाया जाएगा। 

१३ और इसका परिणाम तुम्हारा साक्ष्य होगा। 

१४ इसलिए अपने मनो में निश्चय कर लो, कि पहले से तुम मनन-चिंतन नहीं करोगे कि तुम क्या उत्तर दोगे: 

१५ क्योंकि मैं तुम्हें एक मूँह और विद्या दूँगा, जिसका खण्डन या विरोध तुम्हारे समस्त विपक्षी नहीं कर पाएँगे। 

१६ और तुम, दोनो पिता-माताओं, और भाई-जनों द्वारा, और सगे-सम्बन्धियों, और मित्रों द्वारा, विश्वासघातित कर दिए जाओगे; और तुम में से कुछों को वो मृत्यु के घाट उतरवा देंगे। 

१७ और तुम मेरे नाम वास्ते सभी लोगों द्वारा घृणित होगे।  

१८ परन्तु तुम्हारे सर का एक भी बाल नष्ट नहीं होगा। 

१९ अपने धैर्य में तुम अपनी आत्माएँ रखना। 

२० और जब तुम यरूशलेम को सेनाओं से घिरा हुआ देखोगे, तब जान लेना कि उसकी उजाड़ता निकट ही है। 

२१ तब उन्हें जो यहूदा में हैं, पर्वतों में भाग जाने देना; और उन्हें जो उसके बीचों-बीच हैं, उस में से बाहर निकल जाने देना; और उन्हें जो प्रदेशों में हैं, उस में प्रवेश मत करने देना। 

२२ क्योंकि यह प्रतिशोध के दिन हैं, ताकि वो सभी बातें जो लिखी हुई हैं पूर्ण हो सकें। 

२३ और हाय पड़ेगी उन पर जो पेट से हैं, और जो दूध पिला रही हैं उन दिनो में! क्योंकि भूमी पर एक महा आपदा आ पड़ेगी, और इन लोगों पर आक्रोश। 

२४ और वो तलवार की धार से नीचे गिर जाएँगे, और उन्हें सभी राष्ट्रों में बन्दी ले जाया जाएगा: और यरूशलेम अन्यप्रजातियों द्वारा रौंद दिया जाएगा, जब तक कि अन्यप्रजातियों के समय पूर्ण नहीं हो जाते हैं। 

२५ और सूर्य में, और चन्द्रमा में, और सितारों में, संकेत दिखेंगे; और पृथ्वी पर राष्ट्रों का व्याकुलता सहित क्लेश; समुद्र और लहरें दहाड़ती हुईं;

२६ लोगों के मन भय के मारे शिथिल होते हुए, और उन घटाओं को देखते हुए जिनका पृथ्वी पर आगमन हो रहा है; क्योंकि स्वर्ग की शक्तियाँ झकझोर दी जाएँगी। 

२७ और तब वो मनुष्य-पुत्र का एक मेघ में आगमन होता हुआ देखेंगे, शक्ती और विशाल महिमा के साथ। 

२८ और जब यह घटनाएँ घटने लगेंगी, तब तुम ऊपर देखना, और अपने सिरों को ऊपर उठा लेना; क्योंकि तुम्हारा मुक्तिभुक्तान निकट आ रहा है। 

२९ और उन्होंने उनसे एक दृष्टान्त बोला; अंजीर के पेड़ को, और अन्य सभी पेड़ों को देखो;

३० जब इनके अंकुर फूट कर उग जाते हैं, तो तुम देख कर स्वयं में जान जाते हो, कि ग्रीष्म ऋतु तो अब निकट ही है। 

३१ इसी प्रकार तुम, जब तुम इन घटनाओं को घटते हुए देखते हो, तो जान लेना तुम कि ईश्वर का राज्य निकट ही है। 

३२ सच में मैं कहता हूँ तुम से, यह पीढ़ी नहीं गुज़रेगी, जब तक कि सभी पूर्ण नहीं हो जाता है। 

३३ स्वर्ग और पृथ्वी गुज़रते चले जाएँगे: परन्तु मेरे शब्द गुज़रते नहीं चले जाएँगे। 

३४ अपने स्वयं का ध्यान रखना, कहिं किसी भी समय तुम्हारे हृदय, आधिक्य, और मदिराखोरी, और इस जीवन की चिंताओं के बोझ तले न दब जाएँ, कि वो दिन तुम पर अचानक से आ धमके। 

३५ चूँकि वो एक फंदे समान उन सभी पर धमक पड़ेगा, जो समस्त पृथ्वी के चहरे पर बसते हैं। 

३६ इसलिए तुम सचेत रहो, और सदैव प्रार्थना करो, कि तुम इन सभी आने वाली घटनाओं से बचने के, और मनुष्य-पुत्र के समक्ष खड़े होने के योग्य गिने जा सको।   

३७ और दिन के समय यीशु मन्दिर में सिखाया करते थे; और रात को वो बाहर चले जाते थे, और जैतूनों के पहाड़ कहलाए जाने वाले एक पहाड़ में वास किया करते थे। 

३८ और सभी लोग उनके पास उन्हें सुनने के लिए, सुबह-सुबह मन्दिर में आ जाते थे। 







बाईसवाँ अध्याय। 


१ अब बेख़मीरी रोटी का भोज, जो पार-करना कहलाया जाता है, निकट आ रहा था। 

२ और मुख्य पुरोहित और लिपिक इस ताक में थे, कि वो यीशु की हत्या कैसे करें; क्योंकि वो लोगों से डरते थे। 

३ तब शैतान ने यूदस उपनामित इस्करियोती के अन्दर प्रवेश कर लिया, जिसकी गिनती उन बारह में की जाती थी। 

४ और वो अपने पथ पर गया, और उसने प्रमुख पुरोहितों और कप्तानों के साथ गोष्ठी की, कि वो कैसे उन्हें उनके हाथ विश्वासघातित कर दे। 

५ और वो प्रसन्न हो उठे, और वो उसे पैसे देने हेतु सम्मत हो गए,

६ और उसने उन्हें वचन दे दिया, और वो यीशु के साथ जनौघ की अनुपस्तिथि में विश्वासघात करने का अवसर ढूँढने लग गया। 

७ तब बेख़मीरी रोटी का दिवस आया, जब पार-करने के मेमने की बलि चढ़ाई जाती है। 

८ और यीशु ने पतरस और योहन को कहते हुए भेजा, जाओ और हमारे लिए पार-करना तैयार कर दो, ताकि हम खा सकें। 

९ और उन्होंने उन से कहा, जी कहाँ चाहते हैं आप कि हम उसे तैयार करें?

१० और उन्होंने उन से कहा, देखो, जब तुम नगर में प्रवेश कर लोगे, वहीं तुम से एक व्यक्ति मिलेगा, पानी का एक घड़ा ढोता हुआ; उसी के पीछे-पीछे तुम उस घर में चले जाना, जहाँ वो प्रवेश करता है। 

११ और तुम उस घर के मालिक से कहोगे, गुरुवर तुम से कह रहे हैं, कि भोज-कक्ष कहाँ है, जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ पार-करना खाऊँगा?

१२ और वो तुम्हें एक सुसज्जित, ऊपर का बड़ा कमरा दिखला देगा: वहीं तैयारी करना। 

१३ और वो चले गए, और उन्होंने वैसा ही पाया जैसा उन्होंने उन से कह दिया था: और वो पार-करने की तैयारी करने लग गए। 

१४ और जब वो घड़ी आ गई थी, तो वो नीचे बैठ गए, और वो बारह शिष्य उनके साथ। 

१५ और उन्होंने उनसे कहा, मेरे कष्ट झेलने से पहले, इच्छा के साथ मैंने यह मंशा की है, कि मैं तुम्हारे साथ यह पार-करना खाऊँ:

१६ इसलिए मैं कह रहा हूँ तुम से, कि मैं इस में से अब और नहीं खाऊँगा, जब तक कि ये ईश्वर के राज्य में पूर्ण नहीं हो जाता है। 

१७ और उन्होंने वो प्याला लिया, और धन्यवाद दिया, और कहा, ले लो इसे, और इसे अपने बीच बाँट लो:

१८ क्योंकि मैं कह रहा हूँ तुम से, कि मैं लता के फल में से तब तक नहीं पीयूँगा, जब तक कि ईश्वर का राज्य नहीं आ जाता है। 

१९ और उन्होंने रोटी ली, और धन्यवाद दिया, और उसे तोड़ कर उन्हें दे दिया, कहते हुए, यह मेरा शरीर है जो तुम्हारे लिए प्रदान कर दिया गया है: मेरे स्मरण में यही करना। 

२० इसी प्रकार भोज के पश्चात वो प्याला भी, कहते हुए, यह प्याला मेरे रक्त में नया अनुबन्ध है, जो तुम्हारे लिए बहा है।  

२१ परन्तु देखो, उसका हाथ जो मेरे साथ विश्वासघात कर रहा है, मेरे साथ इसी मेज़ पर है। 

२२ और सच्चाई में, मनुष्य-पुत्र जा रहा है, जैसा निर्धारित किया जा चुका था: परन्तु हाय पड़े उस आदमी पर, जिसके द्वारा वो विश्वासघातित है! 

२३ और वह आपस में पूछताछ करने लग गए, कि उन में से वो कौन था जो यह कार्य करेगा। 

२४ और उनके बीच एक विग्रह भी उठा, कि उन में से कौन सब से महान समझा जाएगा।

२५ और यीशु ने उनसे कहा, अन्यप्रजातियों के राजा उन पर प्रभुत्व जमाते हैं; और वो जो उन पर प्राधिकार जमाते हैं, उपकारी कहलाए जाते हैं। 

२६ परन्तु तुम इनके जैसे नहीं बनोगे: बल्कि वो जो तुम्हारे बीच सब से अग्रज है, उसे अनुज जैसा बन जाने दो; और वो जो प्रमुख है, उसे एक सेवक के जैसा। 

२७ क्योंकि कौन अधिक महान है, वो जो भोजन करने बैठा है, या वो जो परोस रहा है? वही जो भोजन करने बैठा है न? परन्तु मैं तुम्हारे बीच उस परोसने वाले के समान हूँ। 

२८ तुम वो हो जो मेरे साथ मेरी परीक्षाओं में लगातार रहे हो। 

२९ और मैं तुम्हें एक राज्य नियुक्त करता हूँ, जैसा मेरे पिताश्री ने मुझे नियुक्त किया है;

३० ताकि तुम मेरे राज्य में मेरी मेज़ पर खा-पी सको, और सिंहासनों पर बैठ कर, तुम इस्राएल की बारह प्रजातियों का न्याय कर सको। 

३१ और प्रभु ने कहा, सिमोन, सिमोन, देखो, शैतान ने तुम्हें पाना चाहा है, ताकि वो तुम्हें गेहूँ समान छान सके:

३२ परन्तु मैंने तुम्हारे लिए प्रार्थना कर ली है, कि तुम्हारा विश्वास विफल न हो: और जब तुम मुड़ कर लौट आओगे, तो अपने भाई-जनों को प्रबल कर देना। 

३३ और उसने उन से कहा, प्रभु जी, मैं तो आपके साथ कारावास में, और मृत्यु तक भी जाने के लिए तैयार हूँ। 

३४ और यीशु ने कहा, मैं बताता हूँ तुम्हें पतरस, इस दिन मुर्गे के बाँग देने से पहले ही तुम मुझे तीन बार अस्वीकार कर दोगे कि तुम मेरे परिचित हो। 

३५ और उन्होंने उनसे कहा, जब मैंने तुम्हें बटुए, और झोले, और जूतों के बिना भेजा था, क्या तुम्हें किसी भी वस्तु की कमी पड़ी थी? और उन्होंने कहा, नहीं जी। 

३६ फिर उन्होंने उन से कहा, परन्तु अब, जिसके पास भी बटुआ है, उसे वो ले लेने दो, और इसी प्रकार उसका झोला: और जिसके पास कोई भी तलवार न हो, तो उसे अपना वस्त्र बेच कर एक खरीद लेने दो। 

३७ क्योंकि मैं कहता हूँ तुम से, कि यह जो लिखा है, निश्च्य से ही यह मुझ ही में पूर्ण होगा: और उनकी गिनती उत्क्रमिकों में की गई थी; क्योंकि मेरे सम्बन्ध की बातों का अन्त है। 

३८ और उन्होंने कहा, प्रभु जी देखें, यह रहीं दो तलवारें। और उन्होंने उनसे कहा, यह पर्याप्त है। 

३९ और वो बाहर निकल आए, और जैसी उनकी प्रथा थी, वो जैतूनों के पहाड़ पर चले गए; और उनके शिष्य भी उनके पीछे-पीछे आ गए। 

४० और जब वह उस स्थान तक पहुँच गए थे, तो उन्होंने उनसे कहा, प्रार्थना करो कि तुम प्रलोभन में न पड़ जाओ।  

४१ और यीशु उनसे एक पत्थर के फेंके जाने की दूरी तक अलग हो गए, और उन्होंने नीचे अपने घुटनो के बल प्रार्थना की,

४२ कहते हुए, पिताश्री जी, यदि आप चाहें, तो इस प्याले को मुझ से परे ले जाएँ: तथापि मेरी इच्छा नहीं, बल्कि आप ही की इच्छा पूर्ण हो। 

४३ और स्वर्ग में से एक दूत उन्हें प्रकट हुआ, उन्हें प्रबल करता हुआ। 

४४ और यीशु संतापित हो, और भी आग्रहपूर्वक्ता से प्रार्थना करने लग गए: और उनका पसीना ऐसा था मानो कि रक्त की बड़ी-बड़ी बूँदें धरती पर नीचे टपक रही हों। 

४५ और जब वो प्रार्थना से उठ कर अपने शिष्यों के पास आ गए थे, तो उन्होंने उन्हें शोक के मारे सोता हुआ पाया,

४६ और उनसे कहा, भई तुम क्यों सो रहे हो? उठो और प्रार्थना करो, कहिं तुम प्रलोभनों में न पड़ जाओ। 

४७ और जैसे वो बोल ही रहे थे, देखो एक समूह, और वो जो यूदस कहलाया जाता था, उन बारह में से एक, वही उनके आगे-आगे आ रहा था, और वो यीशु के समीप आ गया उन्हें चूमने के लिए। 

४८ परन्तु यीशु ने उस से कहा, यूदस, तुम मनुष्य-पुत्र के साथ एक चुम्बन से विश्वासघात कर रहे हो?

४९ जब उन्होंने जो उन के आस-पास थे, देखा कि क्या होने वाला है, तो उन्होंने उन से कहा, प्रभु, क्या हम तलवार से प्रहार कर दें?

५० और उन में से एक ने प्रमुख पुरोहित के नौकर पर प्रहार कर दिया, और उसका दायाँ कान काट डाला। 

५१ और यीशु ने उत्तर दिया, और कहा, बस करो तुम अब! और उन्होंने उसका कान छुआ, और उसे स्वस्थ कर दिया। 

५२ तब यीशु ने उन मुख्य पुरोहितों, और मंदिर के उन कप्तानों, और उन वृद्धों से कहा, जो उनके पास आए थे, क्या तुम मुझे तलवारों और लट्ठों के साथ ऐसे लेने निकले हो, जैसे किसी चोर को?

५३ जब मैं दिन-प्रतिदिन तुम्हारे साथ मन्दिर में ही था, तुमने मेरे विरुद्ध कोई हाथ नहीं बढ़ाए: परन्तु यह तुम्हारी घड़ी है, और अन्धकार की शक्ती।  

५४ तब उन्होंने उन्हें पकड़ लिया, और वो उन्हें ले चले, और उन्हें उच्च पुरोहित के भवन में ले आए। और पतरस उनका दूर से पीछा कर रहा था। 

५५ और जब उन्होंने आँगन के बीच एक अग्नि सुलगा ली थी, और एक साथ नीचे बैठे हुए थे, तो पतरस भी उन्हीं के बीच बैठ गया। 

५६ परन्तु किसी एक दासी ने उसे देखा, जैसे वो अग्नि के साथ बैठा हुआ था, और उसने उस पर अपनी दृष्टि गढ़ाई, और कहा, ये आदमी भी तो उसी के साथ ही था। 

५७ और उसने यह अस्वीकार कर दिया, कहता हुआ, स्त्री, मैं उन्हें नहीं जानता भई। 

५८ और थोड़े ही समय पश्चात किसी और ने उसे देखा, और कहा, तू भी तो उन्हीं में से ही है। और पतरस ने कहा, नहीं भाई, मैं उन में से नहीं हूँ। 

५९ और लगभग एक घण्टे पश्चात, किसी और ने असंशय के साथ पुष्टि की कहते हुए, सच में ये बन्दा भी उसी के साथ था: क्योंकि ये एक गलील-वासी है। 

६० और पतरस ने कहा, यार, मैं नहीं जानता कि तुम क्या कह रहे हो। और तुरन्त ही, जैसे वो यह बोल ही रहा था, मुर्गे ने बाँग दे दी। 

६१ और प्रभु मुड़े, और उन्होंने पतरस पर अपनी दृष्टि टिकाई। और पतरस को प्रभु का शब्द स्मरण में आया, कि कैसे उन्होंने उस से कहा था, मुर्गे के बाँग देने से पहले ही तुम मुझे तीन बार अस्वीकार कर दोगे। 

६२ और पतरस बाहर निकल आया, और कड़वाहट से रो पड़ा।

६३ और उन आदमियों ने, जिन्होंने यीशु को पकड़ रखा था, उनकी हँसी उड़ाई, और उन्हें पीटा। 

६४ और जब उन्होंने उनकी आँखों पर पट्टी बाँध दी थी, तो उन्होंने उन्हें चहरे पर मारा, और उनसे पूछा कहते हुए, भई प्रेरित-उपदेश दे दे, कि कौन है वो जिसने तुझे मारा?

६५ और कई अन्य बातें उन्होंने ईश्वर-निंदा करते हुए उनके विरुद्ध बोलीं। 

६६ और जैसे ही दिन हो चला था, तो लोगों के वरिष्ठ और प्रमुख पुरोहित और लिपिक एक साथ आए, और वो यीशु को अपनी परिषद-मण्डली में ले आए, कहते हुए,

६७ क्या तू वो मसीहा है भई? बता दे हमें। और उन्होंने उनसे कहा, यदि मैं तुम्हें बताऊँगा, तो तुम विश्वास नहीं करोगे:

६८ और यदि मैं भी तुम से पूछूँगा, तो तुम मुझे उत्तर नहीं दोगे, न ही मुझे जाने दोगे। 

६९ अब से लेकर मनुष्य-पुत्र ईश्वर की शक्ती के दाएँ हाथ पर विराजमान होगा। 

७० तब उन सभी ने कहा, तो क्या तू ईश्वर का पुत्र है? और उन्होंने उनसे कहा, तुम कहते हो कि मैं हूँ। 

७१ और उन्होंने कहा, भई हमें अन्य गवाहों कि अब क्या आवश्यकता रही? चूँकि हम ने तो स्वयं ही इसी के मूँह से सुन लिया है। 



तेईसवाँ अध्याय। 


१ और उनका पूरा जनौघ उठा, और वो यीशु को पिलातुस के पास ले गए। 

२ और उन्होंने उनका दोषारोपण करना आरम्भ कर दिया, कहते हुए, हमने इस बंदे को राष्ट्र का पथ-भ्रष्ट करते हुए, और रोम के राजा को कर देने से मना करते हुए पाया, कहते हुए, कि ये स्वयं ही मसीहा, एक सम्राट है। 

३ और पिलातुस ने यीशु से पूछा, कहते हुए, क्या तू यहूदियों का सम्राट है? और उन्होंने उसे उत्तर दिया और कहा, तुम कह रहे हो यह। 

४ तब पिलातुस ने मुख्य पुरोहितों और लोगों से कहा, भई मैं तो इस आदमी में कोई भी दोष नहीं पा रहा हूँ। 

५ और वो और भी क्रुद्ध हो उठे, कहते हुए, ये तो लोगों को भड़काता रहता है, गलील से आरम्भ करके यहाँ तक भी, यहूदियों के समस्त सर्वत्र में सिखाता हुआ। 

६ जब पिलातुस ने गलील के विषय में सुना, तो उसने पूछा कि यदि वो पुरुष एक गलील-वासी थे क्या? 

७ और यह जानते ही कि यीशु हेरोदेस के क्षेत्राधिकार में से थे, तो उसने उन्हें हेरोदेस के पास भेज दिया, जो स्वयं उस समय यरूशलेम में ही था। 

८ और जब हेरोदेस ने यीशु को देखा, तो वो अति प्रसन्न हो उठा: क्योंकि वो बहुत समय से ही उन्हें देखने की वांछा में था, क्योंकि उसने उनके विषय में बहुत सी बातें सुनीं थीं; और वो उनके द्वारा किए गए किसी चमत्कार को देखने की आशा में था। 

९ तब उसने उन से कई शब्दों में पूछ-ताछ की; परन्तु उन्होंने उसे कोई भी उत्तर नहीं दिया। 

१० और प्रमुख पुरोहित और लिपिक खड़े हो कर उनका उद्दंडता से दोषारोपण कर रहे थे। 

११ और हेरोदेस ने अपने सैनिकों के साथ उनका अत्याधिक अपमान किया, और उनकी हँसी उड़ाई, और उन्होंने उन्हें एक चमकीला चौगा पहना दिया, और उन्हें पुनः पिलातुस के पास वापस भेज दिया। 

१२ और उसी दिन पिलातुस और हेरोदेस मित्र बन गए: क्योंकि इस से पहले उन दोनो के बीच शत्रुता थी। 

१३ और जब पिलातुस ने प्रमुख पुरोहितों, और शासकों को, और लोगों को, एक साथ बुला लिया था,

१४ तो उसने उनसे कहा, भई तुम तो मेरे पास इस आदमी को ले आए हो, ऐसा एक जो लोगों को भ्रष्ट कर रहा हो: और देखो, मैंने इसकी जाँच-पड़ताल तुम्हारे समक्ष कर ली है, और मैंने इस आदमी में कोई भी दोष उन बातों सम्बन्धी नहीं पाया है, जिनके विषय में तुम इस पर दोषारोप लगा रहे हो:

१५ नहीं भई, हेरोदेस ने भी नहीं: क्योंकि मैंने तुम्हें उसके पास भी भेजा; और लो, इसके प्रति मृत्युदण्ड के योग्य कुछ भी नहीं किया गया है। 

१६ इसलिए मैं इसे पीट कर, इसे रिहा कर दूँगा। 

१७ (क्योंकि यह अनिवार्य था कि वो किसी एक को भोज के अवसर पर उन्हें रिहा कर दे।)

१८ और वो सभी झट से एक साथ चीख पड़े, कहते हुए, दूर कर दो इसे, और हमें बरअब्बा को रिहा कर दो:

१९ (जो नगर में किए गए किसी राजद्रोह, और हत्या के कारण, कारावास में डाल दिया गया था।)

२० इसलिए पिलातुस यीशु को रिहा करने की इच्छा से, उन से पुनः बोला। 

२१ परन्तु वो चीख पड़े, कहते हुए, क्रूस पर चढ़ा दो इसे, क्रूस पर चढ़ा दो इसे। 

२२ और उसने उन से तीसरी बार कहा, क्यों भई, क्या बुराई की है इसने? मैंने तो इस में मृत्युदण्ड का कोई भी कारण नहीं पाया है: इसलिए मैं इसे पीट कर इसे रिहा कर दूँगा। 

२३ और वो उसी पल ऊँची वाणियों से माँग करने लग गए, कि यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया जाए। और उनकी और प्रमुख पुरोहितों की वाणियाँ प्रबल ठहरीं। 

२४ और पिलातुस ने न्यायनिर्णय दे दिया, कि वैसा ही हो, जैसी वो माँग कर रहे थे।   

२५ और उसने उनके प्रति उसे रिहा कर दिया, जो राजद्रोह और हत्या के कारण कारावास में डाल दिया गया था, जिसकी उन्होंने माँग की थी; परन्तु उसने यीशु को उन्हीं की इच्छा के प्रति प्रदान कर दिया। 

२६ और जैसे वो उन्हें ले जा रहे थे, तो उन्होंने किसी एक कुरेने-निवासी सिमोन को पकड़ लिया, जो देहात में से बाहर आगमन कर रहा था, और उन्होंने उस पर क्रूस लाद दिया, ताकि वो उसे यीशु के पीछे-पीछे ढो ले। 

२७ और वहीं यीशु के पीछे-पीछे लोगों का, और स्त्रीयों का, एक बड़ा समूह था, जो अपनी छाती पीट-पीट कर बिलख रहा था, और उनके लिए विलाप मना रहा था। 

२८ परन्तु यीशु ने उनकी ओर मुड़ते हुए कहा, यरूशलेम की बेटियों, मेरे लिए मत रो, बल्कि अपने स्वयं के लिए, और अपनी सन्तानों के लिए रो। 

२९ क्योंकि देख लेना, वो दिन आ रहे हैं, जिन में वो कहेंगे, धन्य हैं वो बाँझ, और वो गर्भ जिन्होंने कभी जना नहीं, और वो स्तन जिन्होंने कभी पिलाया नहीं। 

३० तब वो पर्वतों से कहने लगेंगे, गिर जाओ हम पर; और पहाड़ियों से, ढक लो हमें। 

३१ क्योंकि यदि वो यह कार्य एक हरे-भरे पेड़ में कर रहे हैं, तो रूखे-सूखे में क्या किया जाएगा?

३२ और दो अन्य दुष्कर्मी भी थे, जो उनके साथ मृत्युदण्ड के लिए ले जाए जा रहे थे। 

३३ और जब वो जन उस स्थान पर पहुँच गए थे, जो कपाल कहलाया जाता है, तो वहीं उन्होंने उन्हें, और उन दुष्कर्मियों को, क्रूस पर चढ़ा दिया, एक को उनके दाएँ हाथ पर, और दूसरे को उनके बाएँ पर। 

३४ फिर यीशु ने कहा, पिताश्री इन्हें क्षमा कर दें जी; चूँकि यह जानते नहीं हैं कि यह क्या कर रहे हैं। और उन्होंने यीशु के वस्त्र बाँट लिए, और पर्चियाँ डालीं। 

३५ और लोग खड़े होकर यह दृश्य देख रहे थे। और अध्यक्षों ने भी उनके साथ यीशु की हँसी उड़ाई, कहते हुए, भई इसने औरों को तो बचाया है; अब इसे स्वयं को बचा लेने दो, यदि यही मसीहा है, ईश्वर का चुना हुआ। 

३६ और उन सैनिकों ने भी उनकी हँसी उड़ाई, उनके पास आकर, उन्हें सिरका देते हुए,

३७ और कहते हुए, यदि तू यहूदियों का सम्राट है, तो बचा ले अपने आप को भई। 

३८ और उनके ऊपर एक अभिलेख भी लिखा हुआ था, यूनानी, और लातीनी, और इब्रानी अक्षरों में, ये है यहूदियों का सम्राट। 

३९ और उन दुष्कर्मियों में से एक ने, जो लटका हुआ था, उन्हें धिक्कारा कहते हुए, यदि तू मसीहा है, बचा ले अपने आप को और हमें भी। 

४० परन्तु दूसरे ने उत्तर देते हुए उसे डाँटा, कहते हुए, क्या तू ईश्वर से डरता नहीं है, ये देखते हुए कि तुझे भी वही दण्डाज्ञा दे दी गई है?

४१ अब हमें तो वास्तव में न्यायपूर्वकता में ये दण्डाज्ञा मिली है; क्योंकि हम अपने ही कार्यों का योग्य फल भोग रहे हैं: परन्तु इन व्यक्ति ने तो कुछ भी अनुचित नहीं किया है। 

४२ और उसने यीशु से कहा, प्रभु, जी मुझे अपने स्मरण में रखिएगा जब आप अपने राज्य में आ जाते हैं। 

४३ और यीशु ने उस से कहा, सच में मैं कहता हूँ तुम से, आज ही तुम मेरे साथ स्वर्गलोक में होगे। 

४४ अब लगभग छटी घड़ी का समय हो गया था, और नवीं घड़ी तक समस्त धरती पर अन्धकार छा गया था। 

४५ और सूर्य अन्धकारमय हो गया था, और मन्दिर का पर्दा बीच में से फट गया था। 

४६ और जब यीशु एक प्रबल वाणी से चीख लिए थे, तो उन्होंने कहा, पिताश्री आपके हाथों में मैं अपना प्राण सौंपता हूँ जी: और ऐसा कह कर, उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। 

४७ अब जब उस शतपती ने देखा कि क्या किया गया था, तो उसने ईश्वर को गौरवान्वित किया, कहता हुआ, निश्चित्ता से यह एक नेक पुरुष थे। 

४८ और वो सभी लोग जो इस दृश्य पर एक साथ प्रस्तुत थे, उन कार्यों को देख कर जो किए गए थे, अपनी छातियाँ पीटते-पीटते वापस चले गए। 

४९ और उनके सभी परिचित, और वो स्त्रियाँ भी जो गलील से उनके पीछे-पीछे आई थीं, दूर खड़े यह घटनाएँ देख रहे थे। 

५० और, देखो तो, एक यूसुफ नामक पुरुष था, एक परामर्शदाता; और वो एक अच्छा और न्यायोचित पुरुष था:

५१ (इसी व्यक्ति ने उनके परामर्श और कार्य को सहमति नहीं दी थी;) वो यहूदियों के एक नगर एरमथिया से था: जो स्वयं भी ईश्वर के राज्य की प्रतीक्षा में था।  

५२ यही व्यक्ति पिलातुस के पास गया, और उसने यीशु के शव के लिए विनती की। 

५३ और उसने उन्हें नीचे उतारा, और उन्हें छालटी में लपेट कर, उन्हें एक मक़बरे में लिटा दिया, जो पत्थर में से काटा गया था, जिस में कोई भी व्यक्ति कभी भी लिटाया नहीं गया था।   

५४ और वो दिन तैयारी का था, और सैबथ निकट आ रहा था। 

५५ और वो स्त्रियाँ भी, जो उनके साथ गलील से आई थीं, पीछे-पीछे आईं, और उन्होंने वो मक़बरा देखा, और कि कैसे उनका शव लिटा दिया गया था। 

५६ और वो वापस लौट चलीं, और उन्होंने सुगन्धित इत्र और मरहमें तैयार कीं; और आदेशानुसार सैबथ के दिन उन्होंने विश्राम किया। 




चौबीसवाँ अध्याय। 


१ अब सप्ताह के पहले दिन, बहुत ही सुबह-सुबह, वो और कुछ अन्य उनके साथ, मक़बरे पर आ पहुँचीं, सुगन्धित इत्र लाती हुईं जिन्हें उन्होंने तैयार किया था। 

२ और उन्होंने मक़बरे पर से वो पत्थर परे लुढ़काया हुआ पाया। 

३ और उन्होंने अन्दर प्रवेश किया, परन्तु उन्होंने प्रभु यीशु का शव नहीं पाया। 

४ और यह होने को आया, कि जैसे वो वहीं बहुत दुविधा में पड़ी हुई थीं, कि देखो, दो पुरुष चमकदार वस्त्रों में उनके साथ खड़े थे: 

५ और चूँकि वो डरी हुई थीं, और उन्होंने अपने चहरे धरती की ओर झुका लिए थे, उन्होंने उनसे कहा, तुम क्यों उन जीवित को मृतकों के बीच ढूँढ रही हो भई?

६ वो यहाँ नहीं हैं, बल्कि उठ चुके हैं: स्मरण करो कि कैसे उन्होंने तुम से बोला था जब वो अभी गलील में ही थे,

७ कहते हुए, मनुष्य-पुत्र अवश्य ही पापियों के हाथों प्रदान कर दिया जाएगा, और वो क्रूस पर चढ़ा दिया जाएगा, और तीसरे दिन पुनः उठ जाएगा। 

८ और उन्होंने उनके शब्दों का स्मरण किया,

९ और वो मक़बरे से लौट आईं, और उन्होंने यह सभी बातें उन ग्यारह को, और अन्य सभी को बता दीं। 

१० यही बातें अपौस्लों को, मरियम मेगदलीन, और योअन्ना, और याकूब की माँ मरियम, और उन अन्य स्त्रियों ने, जो उनके साथ थीं, बताईं। 

११ परन्तु उन्हें उनके शब्द निरर्थक प्रतीत हुए, और उन्होंने उन पर विश्वास नहीं किया। 

१२ तब पतरस उठा, और वो भाग कर मक़बरे पर जा पहुँचा; और नीचे झुकता हुआ, उसने वो छालटी के कपड़े अकेले रखे हुए देखे, और वो वापस चला गया, स्वयं में उस बात पर अचरज करता हुआ, जो घट चुकी थी। 

१३ और देखो, उन में से दो उसी दिन इम्माउस नामक एक गाँव जा रहे थे, जो यरूशलेम से लगभग साठ फरलाँगों की दूरी पर था।  

१४ और वो एक साथ उन सभी घटनाओं के विषय में बात-चीत कर रहे थे जो घट चुकी थीं। 

१५ और यह होने को आया, कि जैसे वो एक साथ वार्तालाप और सोच-विचार में लगे हुए थे, स्वयं यीशु ही उनके समीप आकर उनके साथ हो लिए। 

१६ परन्तु उनकी आँखें ऐसी पकड़ में थीं, कि वो उन्हें पहचान ही नहीं पाए। 

१७ और उन्होंने उनसे कहा, यह किस प्रकार के संचार हैं जो तुम चलते-चलते एक दूसरे के साथ कर रहे हो, दुखी होते हुए? 

१८ और उन में से एक ने, जिसका नाम क्लियूपस था, उत्तर देते हुए यीशु से कहा, भई क्या तुम ही यरूशलेम में केवल एक परदेशी हो, जो नहीं जानते इन घटनाओं के विषय में जो वहाँ इन दिनों में घटी हैं? 

१९ और उन्होंने उनसे कहा, कौन सी घटनाएँ भई? और उन्होंने उन से कहा, नासरत के यीशु के सम्बन्ध में, जो एक पैग़म्बर थे, ईश्वर और सभी लोगों के समक्ष, कर्म और शब्द में बलशाली:

२० और कैसे प्रमुख पुरोहितों ने, और हमारे अध्यक्षों ने उन्हें मृत्युदण्ड की दण्डाज्ञा के लिए प्रदान कर दिया, और उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया। 

२१ परन्तु हमें भरोसा था कि वो वही थे जिन्होंने इस्राएल का मुक्तिभुक्तान कर देना था: और इस सब के अतिरिक्त, आज तीसरा दिन है जब से यह घटनाएँ घटी हैं। 

२२ हाँ, और हमारे समूह की कुछ स्त्रियों ने भी हमें आश्चर्यचकित कर दिया, जो मक़बरे पर सुबह-सुबह थीं;

२३ और जब उन्होंने उनका शरीर नहीं पाया, तो वो आईं, कहती हुईं, कि उन्होंने दूतों का भी एक दृश्य देखा था, जिन्होंने कहा कि वो जीवित हैं। 

२४ और उन में से कुछ जो हमारे साथ थे, मक़बरे तक गए, और उसे वैसा ही पाया जैसा उन स्त्रियों ने बताया था: परन्तु उन्हें उन्होंने नहीं देखा। 

२५ तब यीशु ने उन से कहा, अरे मूर्खों, और मन्दबुद्ध उन सभी बोलों का विश्वास करने में जो पैग़म्बरों ने बोले हैं:

२६ क्या मसीहा को इन घटनाओं को सहना, और अपनी महिमा में प्रवेश करना नहीं था क्या? 

२७ और मूसा और सभी पैग़म्बरों से आरम्भ कर के, उन्होंने उन्हें समस्त शास्त्रों में से अपने सम्बन्ध की घटनाएँ अर्थप्रतिपादित कर दीं। 

२८ और यह जन उस गाँव के निकट पहुँच रहे थे, जहाँ वो जा रहे थे: और यीशु ऐसे थे मानो कि वो और आगे ही चलते चले जाते। 

२९ परन्तु उन दोनों ने उन्हें विवश किया, कहते हुए, हमारे साथ निवास कर लो भई: क्योंकि सन्ध्या निकट है, और दिन बहुत बीत चुका है। और वह अन्दर चले गए उनके साथ ठहरने के लिए। 

३० और यह होने को आया, कि जैसे वह उनके साथ भोजन पर बैठे, उन्होंने रोटी ली, और उसे आशीष दिया, और उसे तोड़ा, और उसे उन्हें दे दिया। 

३१ और उनकी आँखें खुल गईं, और वो उन्हें पहचान गए; और वो उनकी आँखों से ओझल हो गए। 

३२ और उन्होंने एक ने दूसरे से कहा, क्या हमारा हृदय हमारे भीतर प्रज्ज्वलित नहीं हो रहा था, जैसे-जैसे वो हमारे साथ पथ पर बात-चीत कर रहे थे, और जैसे-जैसे वो हमें शास्त्रों का खुलासा कर रहे थे?

३३ और वो उसी घड़ी उठ गए, और यरूशलेम वापस आ गए, और उन्होंने उन ग्यारह को और उन्हें जो उनके साथ थे, एक साथ एकत्रित पाया, 

३४ कहते हुए, भई प्रभु तो वास्तव में उठ चुके हैं, और वो सिमोन को प्रकट हुए हैं!

३५ और उन्होंने बताया कि पथ पर क्या-क्या घटनाएँ घटी थीं, और कि कैसे उन्होंने यीशु को रोटी के तोड़ने के समय पहचान लिया था। 

३६ और जैसे वो इस प्रकार बोल ही रहे थे, तो स्वयं यीशु ही उनके बीच खड़े हो गए, और वह उनसे कहते हैं, शान्ति हो तुम पर। 

३७ परन्तु वह आतंकित और भयभीत हो उठे, और उन्होंने सोचा कि उन्होंने कोई प्राण देख लिया था। 

३८ और यीशु ने उनसे कहा, तुम विचलित क्यों हो रहे हो भई? और तुम्हारे हृदयों में विचार क्यों उठ रहे हैं?

३९ देख लो मेरे हाथों को और मेरे पैरों को, कि यह स्वयं मैं ही हूँ: छूओ मुझे, और देखो; चूँकि किसी प्राण के पास माँस या हड्डियाँ नहीं होते, जैसे तुम मुझ में देख रहे हो। 

४० और जब उन्होंने इस प्रकार बोल दिया था, तो उन्होंने उन्हें अपने हाथ और अपने पैर प्रदर्शित किए। 

४१ और जब कि उन्होंने अभी तक भी प्रसन्नता के कारण विश्वास नहीं किया था, और वो अचरज ही कर रहे थे, कि यीशु ने उनसे कहा, क्या तुम्हारे पास यहाँ कुछ खाने के लिए है? 

४२ और उन्होंने उन्हें एक भुनी हुई मछली का, और शहद के छत्ते का, एक टुकड़ा दे दिया। 

४३ और उन्होंने उसे लिया, और उनके समक्ष खा भी लिया। 

४४ और उन्होंने उनसे कहा, यह हैं वो शब्द जो मैंने तुम से बोले थे, जब मैं तुम्हारे साथ ही था, कि मेरे सम्बन्ध में वो समस्त बातें जो मूसा के नियम में, और पैग़म्बरों में, और भजनों में लिखी हुई थीं, निश्चित्ता से पूर्ण होंगी।

४५ तब उन्होंने उनकी समझदारी खोल दी, ताकि वो शास्त्रों को समझ सकें, 

४६ और उन्होंने उनसे कहा, इसलिए ही यह लिखा हुआ है, और इसलिए ही यह मसीहा के लिए अनिवार्य था कि वो कष्ट सहे, और तीसरे दिन मृतकों में से उठ जाए:

४७ और कि उसके नाम में मन-परिवर्तन और पापों के परिहार का प्रवचन, यरूशलेम से आरम्भ कर के, समस्त राष्ट्रों के बीच किया जाए। 

४८ और तुम इन बातों के साक्षी हो। 

४९ और देखो, मैं अपने पिताश्री की प्रतिज्ञा तुम पर भेज रहा हूँ: परन्तु तुम यरूशलेम में ही ठहरे रहना, जब तक तुम उच्चत्व से शक्ती के साथ आवृत नहीं हो जाते हो।

५० और यीशु उन्हें बाहर बेतनियाह की दूरी तक ले गए, और उन्होंने अपने हाथ ऊपर उठाए और उन्हें आशीष दिया। 

५१ और यह होने को आया, कि जैसे वो उन्हें आशीष दे रहे थे, उन्हें उन से अलग कर लिया गया, और उन्हें ऊपर स्वर्ग में उठा ले जाया गया। 

५२ और उन्होंने उनकी आराधना की, और वह अत्यन्त आनंद सहित वापस यरूशलेम लौट आए:

५३ और निरन्तर मन्दिर में ईश्वर की प्रशंसा, और उन्हें आशीर्वाद देते रहे। तथास्तु। 



०६/०१/२०२२; 

Comments

Popular posts from this blog