योहन की पुस्तक: नया अनुबंध। (John)


 


पहला अध्याय। 


१ प्रारम्भ में वो शब्द थे, और वो शब्द ईश्वर के साथ थे, और वो शब्द ईश्वर थे। 

२ वही प्रारम्भ में ईश्वर के साथ थे। 

३ समस्त वस्तुएँ उन्हीं के द्वारा बनाई गई थीं; और उनके बिना कुछ भी नहीं बनाया गया था, जो बनाया गया था।  

४ उन्हीं में जीवन था; और वो जीवन मनुष्यों का उजाला था। 

५ और वो उजाला अन्धकार में चमकता रहा; परन्तु अन्धकार ने उन्हें समझा नहीं। 

६ ईश्वर द्वारा एक पुरुष को भेजा गया था, जिसका नाम योहन था। 

७ वही उन उजाले का साक्ष्य देने के लिए, एक साक्षी बनने आया, ताकि सभी लोग उसके द्वारा विश्वास कर लें। 

८ योहन वो उजाला नहीं था, बल्कि वो उन उजाले का साक्ष्य देने के लिए भेजा गया था। 

९ वही थे वो सच्चा उजाला, जो इस संसार में आने वाले प्रत्येक मनुष्य को उज्ज्वलित करते हैं। 

१० वो संसार में थे, और संसार उन्हीं के द्वारा रचनाया गया था, परन्तु संसार ने उन्हें नहीं जाना। 

११ वो अपने ही अपनों के पास आए, और उनके अपनों ने ही उन्हें ग्रहण नहीं किया। 

१२ परन्तु जितनों ने भी उन्हें ग्रहण किया, उन्हीं को उन्होंने ईश्वर के पुत्र बनने की शक्ती प्रदान कर दी, उन्हीं को ही जिन्होंने उनके नाम पर विश्वास किया,

१३ जिनका जन्म न ही रक्त द्वारा, न ही शरीर की इच्छा द्वारा, न ही पुरुष की इच्छा द्वारा, बल्कि ईश्वर द्वारा हुआ था। 

१४ और उन शब्द ने शरीर धारण कर लिया, और वो हमारे बीच बसे, (और हमने उनकी महिमा देखी, वही महिमा, पिताश्री के उन इकलौते जनने जैसी ही,) कृपा और सत्य से परिपूर्ण। 

१५ योहन ने उनका साक्ष्य दिया, और चीखा, कहता हुआ, यह वही थे जिनके विषय में मैं बोला था, वो जो मेरे बाद आ रहे हैं, मुझ से पहले अधिमानता रखते हैं: क्योंकि वही मुझ से पहले थे। 

१६ और उन्हीं की परिपूर्णता में से ही, हम सभी ने कृपा पर कृपा ग्रहण कर ली है। 

१७ क्योंकि नियम तो मूसा द्वारा प्रदान किया गया था, परन्तु कृपा और सत्य यीशु मसीह द्वारा आए। 

१८ किसी भी व्यक्ति ने ईश्वर को कभी नहीं देखा है; वही इकलौते जनने पुत्र, जो पिताश्री से गले लगे हुए हैं, उन्हीं ने उन्हें घोषित किया है। 

१९ और योहन का यही साक्ष्य है, जब यहूदियों ने यरूशलेम से पुरोहितों और उन लेवी-वंशजों को उस से पूछने के लिए भेजा, कि भई कौन हो तुम? 

२० और उसने यह माना, और अस्वीकार नहीं किया, बल्कि यह माना, मैं मसीहा नहीं हूँ। 

२१ और उन्होंने उस से पूछा, तो फिर क्या? क्या तुम एलियाह हो? और योहन कहता है, नहीं। तो क्या तुम वो पैग़म्बर हो? और उसने उत्तर दिया, नहीं। 

२२ तब उन्होंने उस से कहा, तो भई कौन हो तुम? ताकि हम उन्हें उत्तर दे सकें जिन्होंने हमे भेजा है। क्या कहते हो तुम स्वयं के विषय में?  

२३ उसने कहा, मैं हूँ वो वाणी एक की, जँगली-क्षेत्र में चीखती हुई, प्रभु का पथ सीधा बनाओ, जैसा पैग़म्बर यशायाह ने कहा था। 

२४ और उन्हें जिन्हें भेजा गया था, फैरिसियों में से थे। 

२५ और उन्होंने योहन से पूछा, और उस से कहा, तो फिर तुम बपतिस्मा क्यों करते हो, यदि तुम वो मसीहा नहीं हो, न ही एलियाह, न ही वो पैग़म्बर?

२६ योहन ने उन्हें उत्तर दिया, कहते हुए, मैं तो पानी से बपतिस्मा करता हूँ: परन्तु तुम्हारे बीच एक खड़े हैं, जिन्हें तुम जानते नहीं हो;

२७ वही हैं वो, जो मेरे बाद आगमन करते हुए मुझ से पहले अधिमानता रखते हैं, जिनके जूते का फीता भी मैं खोलने के सुयोग्य नहीं हूँ। 

२८ यह कार्य यर्दन पार बेथाबरा में किए गए थे, जहाँ योहन बपतिस्मा कर रहा था। 

२९ अगले दिन योहन यीशु को अपने पास आगमन करते हुए देखता है, और कहता है, देखो ईश्वर के मेमने को, जो इस संसार के पाप हटा ले जा रहे हैं। 

३० यह वही हैं जिनके विषय में मैं बोला था, मेरे बाद एक पुरुष आ रहे हैं जो मुझ से पहले अधिमानता रखते हैं, क्योंकि वही मुझ से पहले से थे। 

३१ और मैं उन्हें नहीं जानता था: परन्तु ताकि वो इस्राएल को प्रत्यक्ष किए जा सकें, इसलिए मैं पानी से बपतिस्मा करता हुआ आया हूँ। 

३२ और योहन ने साक्ष्य दिया, कहता हुआ, मैंने प्राण को स्वर्ग में से एक छोटे कबूतर समान नीचे उतरते हुए देखा, और वह उन पर ठहर गए। 

३३ और मैंने उन्हें नहीं जाना: परन्तु उन्होंने जिन्होंने मुझे पानी से बपतिस्मा करने भेजा, उन्हीं ने मुझ से कहा, जिस पर तुम प्राण को नीचे उतरता हुआ, और ठहरे रहता हुआ देखोगे, वही है वो जो पवित्र-प्राण द्वारा बपतिस्मा करता है। 

३४ और मैंने देखा, और साक्ष्य दिया कि यही ईश्वर के पुत्र हैं। 

३५ पुनः उसके अगले दिन, योहन, और उसके दो शिष्य खड़े थे; 

३६ और यीशु को चलते हुए देख, योहन बोलता है, देखो ईश्वर के मेमने को!

३७ और उन दो शिष्यों ने उसे बोलते हुए सुना, और वो यीशु के पीछे-पीछे चल दिए। 

३८ तो यीशु मुड़े, और उन्होंने उन्हें पीछे-पीछे आते हुए देखा, और वो उनसे कहते हैं, भई क्या ढूँढ रहे हो तुम? उन्होंने उनसे कहा, रैब्बाय (जिसका व्याख्यानुसार अर्थ है, गुरुवर,) जी आपका बसेरा कहाँ है? 

३९ यीशु उनसे कहते हैं, आओ और देख लो। तो वो आए और उन्होंने देखा कि वो कहाँ बसते थे, और वो उस दिन उनके साथ ही ठहर गए: क्योंकि वो लगभग दसवीं घड़ी थी। 

४० अन्द्रेयास, सिमोन पतरस का भाई, उन दोनो में से एक था, जिसने योहन को बोलते हुए सुना, और जो उनके पीछे-पीछे चल दिया था।

४१ उसने पहले अपने ही भाई सिमोन को ढूँढ कर उस से कहा, भई हमने तो अभिषिक्त को ढूँढ लिया है, जो व्याख्यानुसार, मसीहा हैं। 

४२ और वो उसे यीशु के पास ले आया। और जब यीशु ने उसे देखा, तो उन्होने कहा, तुम योना के बेटे सिमोन हो: तुम कैफा कहलाए जाओगे: जो व्याख्यानुसार है, पतरस। 

४३ उसके अगले दिन यीशु आगे गलील जाने के इच्छित थे, और वो फिलिप को पाते हैं, और उस से कहते हैं, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ। 

४४ अब फिलिप, अन्द्रेयास और पतरस के नगर, बेतसैदा से था। 

४५ फिलिप नतनएल को पा कर उस से कहता है, हमने उन्हें ढूँढ लिया है, जिनके विषय में मूसा ने नियम में, और पैग़म्बरों ने लिखा था, नासरत के यीशु, यूसुफ के बेटे। 

४६ और नतनएल ने उस से कहा, क्या नासरत से कुछ भी अच्छा प्रवृत हो सकता है क्या? फिलिप उस से कहता है, आ जाओ और देख लो। 

४७ यीशु ने नतनएल को अपने पास आगमन करते हुए देखा, और वो उसके विषय में कहते हैं, भई वास्तव में देखो तो इस इस्राएली को, जिस में कोई छल-कपट नहीं है! 

४८ नतनएल उन से कहता है, जी आप मुझे कहाँ से जानते हैं? यीशु ने उत्तर दिया और उस से कहा, उस से पहले से जब फिलिप ने तुम्हें बुलाया था, जब तुम अंजीर के पेड़ तले ही थे, मैंने तुम्हें देख लिया था। 

४९ नतनएल ने उत्तर दिया, और वो उन से कहता है, रैब्बाय, आप ही ईश्वर के पुत्र हैं; आप ही इस्राएल के सम्राट हैं। 

५० यीशु ने उत्तर दिया और उस से कहा, क्योंकि मैंने तुम से कहा, मैंने तुम्हें अंजीर के पेड़ तले देख लिया था, क्या तुम विश्वास करते हो? तुम इन से भी महान कार्य देखोगे। 

५१ और वह उस से कहते हैं, मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, आने वाले समय में तुम स्वर्ग को खुला हुआ, और ईश्वर के दूतों को मनुष्य-पुत्र पर आरोहण और अवरोहण करता हुआ देखोगे। 




दूसरा अध्याय। 


१ और तीसरे दिन गलील के काना में एक विवाह समारोह था; और यीशु की माँ वहीं थी:

२ और दोनो यीशु, और उनके शिष्य, विवाह में आमंत्रित थे। 

३ और जब उन्हें अंगूर-रस की कमी पड़ी, तो यीशु की माँ उनसे कहती है, इनके पास अंगूर-रस नहीं है। 

४ यीशु उस से कहते हैं, स्त्री, मुझे तुम से क्या करना-धरना? मेरी घड़ी अभी तक आई नहीं है। 

५ उनकी माँ नौकरों से कहती है, जो कुछ भी यह तुम से कहते हैं, उसे कर दो। 

६ और वहीं पत्थर के छह घड़े रखे हुए थे, यहूदियों की शूद्धीकरण की रीतिनुसार, प्रत्येक में दो या तीन माप की मात्रा थी। 

७ यीशु उनसे कहते हैं, घड़ों को पानी से भर दो। और उन्होंने उन्हें ऊपर तक भर दिया। 

८ फिर वो उनसे कहते हैं, अब बाहर निकाल कर भोज-अध्यक्ष के पास ले जाओ। और वह उसे ले गए। 

९ तो जब भोज-अध्यक्ष ने उस पानी को चख लिया था जिसे अंगूर-रस बना दिया गया था, और वो जानता न था कि वह कहाँ से आया था: (परन्तु वो नौकर जिन्होंने वो पानी निकाला था, यह जानते थे;) तो भोज-अध्यक्ष दुल्हे को बुलाता है,

१० और वो उस से कहता है, प्रत्येक व्यक्ति आरम्भ में ही अच्छा अंगूर-रस प्रस्तुत करता है; और जब लोग भरपेट पी लेते हैं, तो वो जो भत्तर है: परन्तु भई तुम ने तो अच्छा अंगूर-रस अभी तक बचा कर रखा हुआ है।  

११ तो चमत्कारों का यह आरम्भ यीशु ने गलील के काना में किया, और अपनी महिमा प्रत्यक्ष की; और उनके शिष्यों ने उन पर विश्वास किया। 

१२ इसके पश्चात यीशु नीचे कफरनहूम चले गए, वो, और उनकी माँ, और उनके भाई-जन, और उनके शिष्य: और वह जन वहाँ कुछ ही दिन ठहरे रहे। 

१३ और यहूदियों का पार-करना निकट ही था, और यीशु ऊपर यरूशलेम चले गए, 

१४ और उन्होंने मन्दिर में सांडों, और भेड़ों, और छोटे कबूतरों के विक्रेताओं को, और पैसे बदलने वालों को वहीं बैठा हुआ पाया: 

१५ और जब उन्होंने रस्सियों का एक कोड़ा बना लिया था, तो उन्होंने उन सभी को, भेड़ों को और संन्दों को, मन्दिर से बाहर खदेड़ दिया; और पैसे बदलने वालों के पैसे को उन्होंने तितर-बितर कर दिया, और उनकी मेज़ों को उलट-पलट कर डाला;

१६ और उन्होंने छोटे कबूतरों के विक्रेताओं से कहा, ले जाओ इन वस्तुओं को यहाँ से; मेरे पिताश्री के घर को बाज़ार मत बनाओ। 

१७ और उनके शिष्यों ने स्मरण किया कि यह लिखा गया था, आपके घर के जोश ने मुझे खा लिया है। 

१८ तब यहूदियों ने उत्तर दिया, और उन से कहा, भई क्या संकेत दिखाओगे तुम हमें, यह देखते हुए कि तुम इन कार्यों को कर रहे हो?

१९ यीशु ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, इस मन्दिर को नष्ट कर दो, और तीन दिनो में मैं इसे उठा दूँगा। 

२० तो यहूदियों ने कहा, इस मन्दिर का निर्माण तो छियालीस साल चला था, और क्या तुम इसे तीन दिनो में ऊपर खड़ा कर दोगे?

२१ परन्तु यीशु अपने शरीर के मन्दिर के विषय में बोले थे। 

२२ इसलिए जब वो मृतकों में से उठ चुके थे, उनके शिष्यों ने स्मरण किया कि उन्होंने उनसे यह कहा था; और उन्होंने शास्त्र पर, और उस शब्द पर, जिसे यीशु ने बोला था, विश्वास कर लिया। 

२३ अब जब वो पार-करने के अवसर पर भोज के दिन, यरूशलेम में थे, कईयों ने उनके नाम में विश्वास किया, जब उन्होंने उन चमत्कारों को देखा जिन्हें उन्होंने किया था। 

२४ परन्तु यीशु ने स्वयं को उनके प्रति प्रतिबद्ध नहीं किया, क्योंकि वो सभी से परिचित थे,

२५ और उन्हें यह आवश्यकता नहीं थी कि कोई भी उन्हें मनुष्य के विषय में साक्ष्य दे: क्योंकि वो जानते थे कि मनुष्य में क्या है। 





तीसरा अध्याय। 


१ फैरिसियों में से एक निकोदेमूस नामक व्यक्ति था, जो यहूदियों का एक अध्यक्ष था:

२ उसी ने यीशु के पास रात्रि के समय आकर उनसे कहा, रैब्बाय, हम जानते हैं कि आप ईश्वर से पधारे हुए एक शिक्षक हैं: क्योंकि कोई भी व्यक्ति इन चमत्कारों को नहीं कर सकता है, जिन्हें आप करते हैं, सिवाय ईश्वर उसके साथ हों। 

३ यीशु ने उत्तर दिया, और उस से कहा, मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, सिवाय कोई व्यक्ति पुनः जन्म ले, वो ईश्वर के राज्य को नहीं देख सकता है। 

४ निकोदेमूस उन से कहता है, कोई व्यक्ति वृद्ध होता हुआ, कैसे पुनः जन्म ले भई? क्या वो दूसरी बार अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश करके जन्म लेगा क्या? 

५ यीशु ने उत्तर दिया, मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, सिवाय कोई व्यक्ति पानी से और प्राण से जन्म ले, वो ईश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता है। 

६ वो जो शरीर से जन्मा है, शरीर है; और वो जो प्राण से जन्मा है, प्राण है। 

७ अचम्भा मत करो कि मैंने तुम से कहा, तुम्हें अवश्य ही पुनः जन्म लेना होगा। 

८ वायु चलती है जहाँ कहीं भी वो चाहे, और तुम उसकी ध्वनि तो सुनते हो, परन्तु तुम बता नहीं सकते कि वो कहाँ से आ रही है, और वो कहाँ जा रही है: इसी प्रकार ही वो प्रत्येक मनुष्य है जो प्राण से जन्मा है। 

९ निकोदेमूस ने उत्तर दिया और उनसे कहा, ये बातें कैसे सम्भव हो सकती हैं?

१० यीशु ने उत्तर दिया, और उस से कहा, भई तुम तो इस्राएल के एक शिक्षक हो, और क्या तुम्हें इन बातों का ज्ञान नहीं है क्या?

११ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, हम वो बोल रहे हैं जो हम जानते हैं, और यह साक्ष्य दे रहे हैं कि हमने देखा है; और तुम हमारा साक्ष्य ग्रहण नहीं कर रहे हो। 

१२ मैंने यदि तुम्हें पार्थिव बातें बताईं हैं, और तुम विश्वास नहीं करते, तो यदि मैं तुम्हें स्वर्गिक बातें बताऊँगा, तो तुम कैसे विश्वास करोगे भई?

१३ और किसी भी व्यक्ति ने ऊपर स्वर्ग तक आरोहण नहीं किया है, बल्कि उस ने जो स्वर्ग से नीचे आया है, उसी मनुष्य-पुत्र ने ही जो स्वर्ग में है। 

१४ और जैसे मूसा ने जँगली-क्षेत्र में उस साँप को ऊपर उठाया था, इसी प्रकार मनुष्य-पुत्र भी अवश्य ही ऊपर उठा दिया जाएगा:

१५ ताकि जो कोई भी उस में विश्वास करता है नष्ट नहीं होता, बल्कि उसके पास अनन्त जीवन होता है। 

१६ क्योंकि ईश्वर ने संसार के साथ ऐसा प्रेम किया, कि उन्होंने अपना इकलौता जनना पुत्र प्रदान कर दिया, कि जो कोई भी उस में विश्वास करता है नष्ट नहीं होता, बल्कि उसके पास अनन्तकाल का जीवन होता है। 

१७ क्योंकि ईश्वर ने संसार में अपने पुत्र को, संसार को दण्डनीय-घोषित करने नहीं भेजा; बल्कि इसलिए ताकि संसार का उसके द्वारा बचाव हो जाए। 

१८ वो जो उस पर विश्वास करता है, दण्डनीय-घोषित नहीं है: परन्तु वो जो विश्वास नहीं करता, वो तो पहले से ही दण्डनीय घोषित है, क्योंकि उसने ईश्वर के इकलौते जनने पुत्र के नाम में विश्वास नहीं किया। 

१९ और यही है वो दण्डाज्ञा, कि संसार में उजाला आ चुका है, और लोगों ने उजाले की अपेक्षा अंधेरे से प्रेम किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे। 

२० क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जो बुराई करता है, उजाले से घृणा करता है, न ही वो उस उजाले के निकट आता है, कहिं उसके कर्मों की निंदा न कर दी जाए। 

२१ परन्तु वो जो सच्चाई करता है, उजाले के निकट आता है, ताकि उसके कर्म प्रत्यक्ष हो सकें, कि वो ईश्वर में श्रमित हैं। 

२२ इन घटनाओं के पश्चात यीशु और उनके शिष्य यहूदा की भूमी में आ पहुँचे; और वो वहीं उनके साथ ठहरे रहे, और बपतिस्मा किया। 

२३ और योहन भी शालीम के समीप एनोन में बपतिस्मा कर रहा था, क्योंकि वहाँ बहुत सा पानी था: और लोग आए, और बपतिस्मित हुए। 

२४ क्योंकि योहन को अभी कारावास में नहीं डाला गया था। 

२५ फिर शूद्धीकरण की रीति के समबन्ध में, योहन के कुछ शिष्यों और यहूदियों के बीच एक प्रश्न उठा। 

२६ और उन्होंने योहन के पास आकर उस से कहा, रैबाय, वो जो तुम्हारे साथ यर्दन पार थे, जिनका तुमने साक्ष्य दिया था, देखो तो, वही बपतिस्मा कर रहे हैं, और सभी लोग उनके पास आ रहे हैं। 

२७ योहन ने उत्तर दिया, और कहा, कोई व्यक्ति कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता है, सिवाय कि वो उसे स्वर्ग से प्रदान कर दिया गया हो।

२८ तुम स्वयं मेरे साक्षी हो, कि मैंने कहा था, कि मैं मसीहा नहीं हूँ, बल्कि मुझे उनके आगे भेजा गया है। 

२९ वो जिसकी दुल्हन होती है, वही दूल्हा होता है: परन्तु उस दूल्हे का मित्र, जो साथ खड़ा दूल्हे को सुन रहा है, दूल्हे की वाणी के कारण बहुत हर्ष मनाता है: यही मेरा आनंद इस कारण सम्पूर्ण हो चुका है। 

३० उनकी अवश्य ही बढ़ौतरी होनी चाहिए, परन्तु मेरी घटौतरी। 

३१ वो जो ऊपर से आते हैं, सर्वोपरी हैं: वो जो पृथ्वी का है, पार्थिव है, और वो पृथ्वी की ही बातें बोलता है: वो जो स्वर्ग से आते हैं, वही सर्वोपरी हैं। 

३२ और जो कुछ भी उन्होंने देखा, और सुना है, वह उसी का साक्ष्य दे रहे हैं; और कोई भी व्यक्ति उनका साक्ष्य ग्रहण नहीं कर रहा है। 

३३ जिसने उनका साक्ष्य ग्रहण कर लिया है, उसी ने अपनी मुहरबन्दी लगा दी है, कि ईश्वर सत्यमय हैं। 

३४ क्योंकि वो, जिन्हें ईश्वर ने भेजा है, ईश्वर के शब्द बोलते हैं: क्योंकि ईश्वर उन्हें प्राण माप कर नहीं देते हैं। 

३५ पिताश्री अपने पुत्र से प्रेम करते हैं, और उन्होंने समस्त वस्तुएँ उनके हाथ में प्रदान कर दी हैं। 

३६ वो जो पुत्र पर विश्वास करता है उसी के पास अनंतकाल जीवन है: और वो जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता है, जीवन नहीं देखेगा; बल्कि उस पर ईश्वर का क़हर ठहरा रहता है। 



चौथा अध्याय।  


१ तो अब जब प्रभु यह जान गए थे, कि कैसे फैरिसियों ने यह सुन लिया था, कि यीशु योहन से अधिक शिष्य बना रहे थे और उनका बपतिस्मा कर रहे थे,

२ (यद्यपि यीशु स्वयं नहीं, बल्कि उनके शिष्य बपतिस्मा कर रहे थे,)

३ तो उन्होंने यहूदा छोड़ कर, पुनः गलील की ओर प्रस्थान कर लिया। 

४ और यह उनके लिए अनिवार्य था कि वह समैरिया में से होते हुए जाएँ। 

५ तब वो समैरिया के एक नगर पहुँचते हैं, जो साईकर कहलाया जाता है, उस भूमि के खण्ड के समीप ही जिसे याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दे दिया था। 

६ अब याकूब का कूआँ वहीं था। यीशु इसलिए, अपनी यात्रा से थक कर, उस कूएँ पर बैठ गए: और वह लगभग छटी घड़ी थी। 

७ तो वहीं समैरिया की एक स्त्री पानी खींचने आती है: यीशु उस से कहते हैं, मुझे पीने के लिए दे दो। 

८ (क्योंकि उनके शिष्य, भोजन खरीदने नगर में चले गए थे।)

९ तो समैरिया की वो स्त्री उनसे कहती है, यह कैसे है जी कि आप एक यहूदी होते हुए, मुझ से पानी माँग रहे हैं, क्योंकि मैं तो एक समैरिया की स्त्री हूँ? चूँकि यहूदी, समैरियावासियों के साथ तो कोई भी सम्पर्क नहीं रखते। 

१० यीशु ने उत्तर दिया और उस से कहा, यदि तुम ईश्वर के उपहार को पहचानती, और कि वो कौन है जो तुम से कह रहा है, मुझे पीने के लिए दे दो; तो तुम ने उस से माँग लिया होता, और उसने तुम्हें संजीवन जल दे दिया होता। 

११ वो स्त्री उनसे कहती है, श्रीमान जी, आपके पास तो खींचने के लिए कुछ भी नहीं है, और यह कूआँ तो गहरा है: तो फिर भई कहाँ से है आपके पास वो संजीवन जल?

१२ क्या आप हमारे पिता याकूब से बढ़कर हैं, जिन्होंने हमें यह कूआँ दे दिया, और स्वयं उन्होंने, और उनके बच्चों ने, और उनके मवेशी ने भी इसी में से पिया?

१३ यीशु ने उत्तर दिया और उस से कहा, जो कोई भी इस पानी में से पीता है, उसे पुनः प्यास लगेगी:

१४ परन्तु जो कोई भी उस जल में से पीता है जो मैं उसे दूँगा, उसे कदापि प्यास नहीं लगेगी; बल्कि वो जल जो मैं उसे दूँगा, वही उस में एक जल का कूआँ बन जाएगा, अनन्तकाल जीवन में बहता हुआ। 

१५ वो स्त्री उन से कहती है, श्रीमान जी, मुझे यह जल दे दें, ताकि मुझे प्यास न लगे, न ही मैं यहाँ पानी खींचने आऊँ। 

१६ यीशु उस से कहते हैं, जाओ, और अपने पति को बुला लो, और यहाँ आ जाओ। 

१७ उस स्त्री ने उत्तर दिया और कहा, मेरा कोई पति नहीं है जी। यीशु ने उस से कहा, तुम ने सही कहा, मेरा कोई पति नहीं है:

१८ क्योंकि तुम्हारे पाँच पति रह चुके हैं; और वो जो तुम्हारे साथ अभी है तुम्हारा पति नहीं है: इन बातों में तुम सच कह रही हो। 

१९ वो स्त्री उनसे कहती है, श्रीमान जी, मैं आभास कर रही हूँ कि आप तो एक पैग़म्बर हैं। 

२० हमारे पित्र इस पर्वत पर पूजा करते थे; और आप लोग कहते हैं, कि यरूशलेम में वो स्थान है जहाँ लोगों को आराधना करनी चाहिए। 

२१ यीशु उस से कहते हैं, स्त्री, विश्वास करो मेरा, वो घड़ी आ रही है, जब तुम न ही इस पर्वत में, और न ही यरूशलेम में पिताश्री की पूजा करोगे। 

२२ तुम जानते नहीं हो कि तुम किसे पूजते हो: हम जानते हैं हम क्या पूजते हैं: क्योंकि बचाव यहूदियों में से है। 

२३ परन्तु वो घड़ी आ रही है, और आ भी चुकी है, जब सच्चे पूजक पिताश्री की पूजा प्राण और सत्य में करेंगे: क्योंकि पिताश्री ऐसों को ही ढूँढ रहे हैं अपनी पूजा हेतु। 

२४ ईश्वर एक प्राण हैं: और वो जो उन्हें पूजते हैं, उन्हें उनकी आराधना अवश्य ही प्राण और सत्य में करनी चाहिए। 

२५ वो स्त्री उन से कहती है, मैं जानती हूँ जी कि अभिषिक्त आ रहे हैं, जो मसीहा कहलाए जाते हैं: जब वो आ जाएँगे, वही हमें सभी बातें बता देंगे। 

२६ यीशु उस से कहते हैं, मैं जो तुम से बोल रहा हूँ, मैं वही हूँ। 

२७ और इस पर उनके शिष्य आ पहुँचे, और अचम्भा करने लग गए कि वह उस स्त्री के साथ बात-चीत कर रहे थे: तथापि किसी भी व्यक्ति ने नहीं कहा, आप क्या ढूँढ रहे हैं जी? या फिर, आप क्यों इसके साथ बात-चीत कर रहे हैं?

२८ तो वो स्त्री अपना घड़ा छोड़ कर अपने पथ पर नगर में चली गई, और वो लोगों से कहती है,

२९ आओ भई, देखो तो इन पुरुष को, जिन्होंने मुझे वो सभी बातें बता दीं जो भी मैंने की हैं: क्या यही मसीहा नहीं हैं?

३० तब वह नगर से बाहर निकल आए, और यीशु के पास आ पहुँचे। 

३१ इसी बीच उनके शिष्यों ने उनसे अनुरोध किया, कहते हुए, रैब्बाय, आप भोजन कर लें जी। 

३२ परन्तु उन्होंने उनसे कहा, मेरे पास भोगने के लिए वो भोजन है जिसके विषय में तुम नहीं जानते। 

३३ इसलिए उन शिष्यों ने एक ने दूसरे से कहा, क्या कोई भी इनके खाने के लिए कुछ लाया है क्या? 

३४ यीशु उनसे कहते हैं, जिन्होंने मुझे भेजा है, उन्हीं की इच्छा करना, और उन्हीं के कार्य को समाप्त करना, यही मेरा भोजन है। 

३५ क्या तुम यह कहते नहीं हो, अभी भी चार महीने शेष हैं, और तब फसल-कटाई आईगी? देखो, मैं कहता हूँ तुम से, अपनी आँखें ऊपर उठाओ, और देख लो खेतों को; क्योंकि वो तो फसल-कटाई के लिए श्वेत पक चुके हैं। 

३६ और वो जो कटाई करता है वेतन प्राप्त करता है, और अनन्त जीवन के प्रति फल एकत्रित करता है: ताकि वो दोनो, वो जो बो रहा है और वो जो कटाई कर रहा है, एक ही संग हर्ष मनाएँ। 

३७ और यहीं वो कहावत उचित बैठती है, एक बोता है, और दूसरा कटाई करता है। 

३८ मैंने तुम्हें उसकी कटाई करने भेजा है जिस में तुम ने कोई भी श्रम नहीं किया: अन्य लोगों ने श्रम किया, और तुम उनके श्रमों में प्रविष्ट हो गए हो।

३९ और उस नगर में से अनेक समैरियावासियों ने यीशु पर विश्वास कर लिया उस स्त्री के कथन के कारण, जिसने साक्ष्य दिया, उन्होंने तो मुझे वो सब कुछ बता दिया जो कुछ भी मैंने किया है। 

४० तो जब वो समैरियावासी यीशु के पास पधार चुके थे, तो उन्होंने उनसे विनती की, कि वो उनके साथ ठहर जाएँ: और वो वहीं दो दिन ठहर गए। 

४१ और कई औरों ने भी, स्वयं उन्हीं के शब्द के कारण, विश्वास कर लिया;

४२ और उन्होंने उस स्त्री से कहा, भई हमने तो अब विश्वास कर लिया है; तुम्हारे कथन के कारण नहीं: चूँकि हमने तो इन्हें स्वयं ही सुन लिया है, और हम जानते हैं कि यही वास्तव में मसीहा हैं, इस संसार को बचाने-वाले। 

४३ अब दो दिन पश्चात यीशु ने वहाँ से प्रस्थान कर लिया, और वो गलील चले गए। 

४४ क्योंकि यीशु ने ही स्वयं साक्ष्य दिया, कि किसी भी पैग़म्बर को अपने ही देश में कोई भी आदर नहीं मिलता है। 

४५ तब जब उनका गलील में आगमन हो गया था, तो उन गलील वासियों ने उनका स्वागत किया, उन सभी कार्यों को देख लेने पर जिन्हें यीशु ने यरूशलेम में भोज के अवसर पर किए थे: क्योंकि वो भी भोज के लिए गए थे। 

४६ तो यीशु पुनः गलील के काना आ पहुँचे, जहाँ उन्होंने पानी को अंगूर-रस बना दिया था। और वहीं कोई एक ठाकुर था, जिसका पुत्र कफरनहूम में बीमार पड़ा था। 

४७ जब उसने सुना कि यीशु यहूदा से निकल कर गलील में पधार चुके थे, तो उसने उनके पास जाकर उनसे विनती की, कि वह नीचे आ कर उसके पुत्र को स्वस्थ कर दें: क्योंकि उसकी मृत्यु होने वाली थी। 

४८ तब यीशु ने उस से कहा, सिवाय कि तुम संकेत और अद्धभुत-चमत्कार देखो, तुम विश्वास नहीं करोगे। 

४९ वो ठाकुर उन से कहता है, श्रीमान जी, मेरे बच्चे की मृत्यु से पहले ही आप नीचे आ जाएँ। 

५० यीशु उस से कहते हैं, अपने पथ पर चले जाओ; तुम्हारा बेटा जीवित है। और उस व्यक्ति ने उस शब्द पर विश्वास कर लिया जो यीशु ने उस से बोला था, और अपने पथ पर चला गया।  

५१ और जैसे वो अब नीचे जा ही रहा था, तो उसके नौकर उस से मिले, और उसे बताया, कहते हुए, आपका बेटा तो जीवित है जी। 

५२ फिर उसने उनसे पूछ-ताछ की, कि किस घड़ी उसका बेटा स्वस्थ हुआ था। और उन्होंने उस से कहा, पिछले दिन, सातवीं घड़ी पर वो ज्वर से मुक्त हो गया था। 

५३ तो उसका पिता जान गया कि वो वही घड़ी थी, जिस में यीशु ने उस से कहा था, तुम्हारा बेटा जीवित है: और स्वयं उसने, और उसके सम्पूर्ण घर-बार ने विश्वास कर लिया। 

५४ यही पुनः वो दूसरा चमत्कार है जिसे यीशु ने किया, जब वो यहूदा से बाहर निकल कर गलील पधारे थे। 




पाँचवाँ अध्याय। 


१ इसके पश्चात यहूदियों का एक भोज था; और यीशु ऊपर यरूशलेम चले गए। 

२ अब यरूशलेम में ही भेड़ों के बाज़ार के साथ पाँच बरामदों वाला एक कुण्ड है, जो इब्रानी जीभ में बेथेस्दा कहलाया जाता है।

३ उन्हीं में निर्बल जनों, अन्धों, लंगड़ों, और सूखे हुए अंगों से ग्रस्त लोगों का एक बड़ा जनौघ पड़ा रहता था, पानी में हलचल की प्रतीक्षा करता हुआ। 

४ क्योंकि एक दूत किसी स्पष्ट समय पर उस कुण्ड में नीचे जाकर, उस पानी को विचलित कर दिया करता था: फिर जो कोई भी उस पानी के विचलन के पश्चात सबसे पहले उस में कदम रख देता था, वही प्रत्येक प्रकार के रोग से स्वस्थ हो जाया करता था। 

५ और वहीं कोई एक व्यक्ति था, जो अड़तीस वर्षों से एक दुर्बलता से ग्रस्त था। 

६ जब यीशु ने उसे पड़ा हुआ देखा, और वह जानते थे कि वो इस परिस्तिथि में बहुत समय से था, तो वो उस से कहते हैं, क्या तुम स्वस्थ होना चाहते हो?

७ उस निर्बल पुरुष ने उन्हें उत्तर दिया, श्रीमान जी, मेरे पास कोई भी व्यक्ति नहीं है, जो मुझे इस कुण्ड में इस पानी की हलचल होने पर, डाल सके: बल्कि जैसे ही मैं आता हूँ, कोई और मुझ से पहले इस में अपने कदम नीचे रख देता है जी। 

८ यीशु उस से कहते हैं, उठो, अपना बिस्तर ऊपर उठा लो, और चलो। 

९ और तुरन्त ही वो व्यक्ति स्वस्थ हो गया, और उसने अपना बिस्तर लिया, और चल दिया: और उसी दिन सैबथ था। 

१० इसलिए यहूदियों ने उस रोगमुक्त व्यक्ति से कहा, भई यह तो सैबथ का दिन है: तुम्हारे लिए अपना बिस्तर उठाना न्यायी नहीं है। 

११ उसने उन्हें उत्तर दिया, जिन्होंने मुझे स्वस्थ बनाया, उन्हीं ने मुझ से कहा, अपना बिस्तर ऊपर उठा लो, और चलो। 

१२ तब उन यहूदियों ने उस से पूछा, वो कौन है जिसने तुम से कहा, अपना बिस्तर ऊपर उठा लो और चलो?

१३ परन्तु वो जो स्वस्थ कर दिया गया था, यह जानता नहीं था कि वो कौन थे: क्योंकि यीशु वहाँ से चले जा चुके थे, उस स्थान में एक जनौघ के होते हुए। 

१४ बाद में यीशु उसे मन्दिर में पाते हैं, और वो उस से कहते हैं, देखो, तुम अब स्वस्थ बना दिए गए हो: अब और अधिक पाप मत करो, कहिं तुम्हारे साथ कोई भत्तर घटना न घट जाए। 

१५ तो वो व्यक्ति गया, और उसने उन यहूदियों को बता दिया, कि वो यीशु ही थे, जिन्होंने उसे स्वस्थ कर दिया था। 

१६ और इसलिए ही उन यहूदियों ने यीशु का अत्याचार किया, और वो उन्हें मार डालने की सोच में थे, क्योंकि उन्होंने यह कार्य सैबथ के दिन पर किए थे। 

१७ परन्तु यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, मेरे पिताश्री अब तक काम करते आए हैं, और मैं भी काम करता हूँ। 

१८ इसलिए वो यहूदी, उन्हें मार डालने का और भी अधिक प्रयत्न करने लग गए, क्योंकि उन्होंने न केवल सैबथ का उल्लंघन कर दिया था, बल्कि उन्होंने यह भी कह कर, कि ईश्वर उनके पिताश्री थे, स्वयं को ईश्वर के समान बना दिया था। 

१९ तब यीशु ने उत्तर दिया और उनसे कहा, मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, पुत्र स्वयं से कुछ नहीं कर सकता है, बल्कि वो जो वो पिताश्री को करते हुए देखता है: क्योंकि जो कुछ भी पिताश्री करते हैं, वही पुत्र भी उसी प्रकार करता है। 

२० क्योंकि पिताश्री पुत्र से प्रेम करते हैं, और उसे वो सभी बातें दिखाते हैं जो वो स्वयं करते हैं: और वो उसे इनसे भी महान कार्य दिखाएँगे, ताकि तुम अचम्भित हो जाओ। 

२१ क्योंकि जैसे पिताश्री मृतकों को ऊपर उठाते हैं, और उन्हें सजीवित कर देते हैं; उसी प्रकार पुत्र भी उसे सजीवित कर देता है जिसे भी वो चाहे। 

२२ क्योंकि पिताश्री किसी भी व्यक्ति का न्याय नहीं करते हैं, बल्कि उन्होंने समस्त न्याय-निर्धारण पुत्र को सुपुर्द कर दिया है:

२३ ताकि सभी लोग पुत्र का आदर करें, उसी प्रकार जैसे वो पिताश्री का आदर करते हैं। वो जो पुत्र का आदर नहीं करता है, वही पिताश्री का भी आदर नहीं करता है, जिन्होंने उसे भेजा है। 

२४ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, वो जो मेरा शब्द सुनता है, और उन पर विश्वास करता है जिन्होंने मुझे भेजा है, उसके पास अनंतकाल का जीवन है, और वो कभी भी दण्डाज्ञा में नहीं आएगा; बल्कि वो मृत्यु को पार कर जीवन में जा चुका है। 

२५ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, वो घड़ी आ रही है, और आ भी गई है, जब मृतक ईश्वर के पुत्र की वाणी सुनेंगे: और वो जो उसे सुनेंगे, वही जी लेंगे। 

२६ क्योंकि जिस प्रकार पिताश्री के पास स्वयं में जीवन है; उसी प्रकार उन्होंने पुत्र को भी स्वयं में जीवन प्रदान कर दिया है;

२७ और उन्होंने उसे न्याय क्रियान्वित कर देने का भी प्राधिकार प्रदान कर दिया है, क्योंकि वो मनुष्य-पुत्र है। 

२८ इस पर अचम्भा मत करो: क्योंकि वो घड़ी आ रही है, जिस में वो सभी जो क़ब्रों में हैं, उसकी वाणी सुनेंगे,

२९ और वो बाहर निकल आएँगे; वो जिन्होंने अच्छा किया है, जीवन के पुनरुत्थान में; और वो जिन्होंने बुरा किया है, न्याय-निर्धारण के पुनरुत्थान में। 

३० मैं अपने स्वयं से कुछ भी नहीं कर सकता हूँ: जैसा मैं सुनता हूँ, मैं वैसा ही न्याय करता हूँ: और मेरा न्याय, न्यायपूर्वक है; क्योंकि मैं अपनी ही स्वेच्छा ढूँढता नहीं फिरता, बल्कि पिताश्री की इच्छा, जिन्होंने मुझे भेजा है। 

३१ यदि मैं अपने स्वयं का साक्ष्य देता हूँ, तो मेरा साक्ष्य सच्चा नहीं है। 

३२ कोई अन्य है जो मेरा साक्ष्य दे रहा है; और मैं यह जानता हूँ कि वो साक्ष्य, जो वो मेरा साक्ष्य दे रहा है, सच्चा है। 

३३ तुम ने योहन के पास कहलवा भेजा, और उसने सत्य का साक्ष्य दिया। 

३४ किन्तु मैं मनुष्य से साक्ष्य ग्रहण नहीं करता; परन्तु मैं यह बातें बोल रहा हूँ, ताकि तुम्हारा बचाव हो जाए। 

३५ वो तो एक जलता हुआ चमकदार प्रकाश था: और तुम उसके प्रकाश में कुछ ही समय तक हर्षित होने के इच्छुक थे। 

३६ परन्तु मेरे पास योहन से भी बढ़कर साक्ष्य है: क्योंकि वो कार्य जिन्हें मेरे पिताश्री ने मुझे समाप्त करने के लिए दिए हैं, वही कार्य जो मैं कर रहा हूँ, मेरा साक्ष्य दे रहे हैं, कि पिताश्री ने मुझे भेजा है। 

३७ और स्वयं पिताश्री ने ही, जिन्होंने मुझे भेजा है, मेरा साक्ष्य दिया है। तुमने न ही किसी भी समय उनकी वाणी सुनी है, न ही उनका रूप देखा है।   

३८ और उनका शब्द तुम में वास नहीं कर रहा है: क्योंकि जिसे उन्होंने भेजा है, उस पर तुम विश्वास नहीं करते हो। 

३९ शास्त्रों में ढूँढो; क्योंकि उन्हीं में तुम विचार करते हो कि तुम्हारे पास अनन्त जीवन है: और वही वो शास्त्र हैं जो मेरा साक्ष्य देते हैं। 

४० और तुम मेरे पास नहीं आना चाहते हो, ताकि तुम्हारे पास जीवन हो सके। 

४१ मैं मनुष्यों से सम्मान नहीं लेता। 

४२ परन्तु मैं तुम से परिचित हूँ, कि तुम में ईश्वर का प्रेम नहीं है। 

४३ मैं अपने पिताश्री के नाम में आया हूँ, और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते: यदि कोई अन्य अपने ही स्वयं के नाम में आएगा, उसे तुम ग्रहण कर लोगे। 

४४ तुम कैसे विश्वास कर सकते हो, जो एक दूसरे से तो आदर स्वीकार करते हो, परन्तु तुम उस आदर को नहीं ढूँढते जो केवल ईश्वर से ही आता है?

४५ यह मत सोचो कि मैं पिताश्री से तुम्हारा दोषारोपण करूँगा: एक है जो तुम्हारा दोषारोपण करता है, मूसा ही, जिस में तुम भरोसा रखते हो। 

४६ क्योंकि यदि तुमने मूसा पर विश्वास किया होता, तुमने मुझ पर विश्वास कर लिया होता: क्योंकि उसने मेरे विषय में लिखा था। 

४७ परन्तु यदि तुम उसके लेखों पर विश्वास नहीं करते, तो तुम मेरे शब्दों पर कैसे विश्वास करोगे? 




छटा अध्याय। 


१ इन घटनाओं के पश्चात यीशु गलील के समुद्र, अर्थात् तिबेरीयुस के समुद्र पर से, पार चले गए। 

२ और उनके पीछे-पीछे एक बड़ा जनौघ आ गया, क्योंकि उन्होंने उनके द्वारा रोगियों पर किए गए चमत्कार देख लिए थे। 

३ और यीशु ऊपर एक पर्वत पर चले गए, और वहीं वो अपने शिष्यों के साथ जाकर बैठ गए। 

४ और पार-करना, यहूदियों का एक भोज, निकट था। 

५ तो जब यीशु ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं, और एक विशाल जन-समूह को अपने पास आता हुआ देखा, तो वो फिलिप से कहते हैं, हम इन सब के खाने के लिए रोटी कहाँ से खरीदें भई?

६ और यह उन्होंने उसे परखने के लिए कहा था: क्योंकि वह स्वयं जानते थे कि वह क्या करेंगे। 

७ फिलिप ने उन्हें उत्तर दिया, जी दो सौ चाँदी दीनारों के मूल्य की रोटी भी इन सब के लिए पर्याप्त नहीं होगी, कि इन में से हर एक थोड़ी-थोड़ी ले सके। 

८ उनके शिष्यों में से एक, अन्द्रेयास, सिमोन पतरस का भाई उन से कहता है,

९ यहीं एक किशोर है जी, जिसके पास पाँच जौ की रोटियाँ, और दो छोटी मछलियाँ हैं: परन्तु इतनो में इस से क्या होगा?

१० और यीशु ने कहा, इन पुरुषों को नीचे बैठा दो। अब उस स्थान में बहुत सी घास थी। तो वो पुरुष नीचे बैठ गए, संख्या में लगभग पाँच हज़ार। 

११ और यीशु ने वो रोटियाँ लीं; और जब उन्होंने धन्यवाद दे दिया था, तो उन्होंने उन्हें अपने शिष्यों को बाँट दिया, और शिष्यों ने उन्हें बाँट दिया जो नीचे बैठे हुए थे; और इसी प्रकार वो मछलियाँ भी जितनी भी वो चाहते थे। 

१२ तो जब वो संतुष्ट हो चुके थे, तो उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, बचे कुचे टुकड़ों को एकत्रित कर लो, ताकि कुछ भी नष्ट न हो जाए। 

१३ इसलिए उन्होंने उन्हें एक साथ बटोर लिया, और उन पाँच जौ की रोटियों के टुकड़ों से उन्होंने बारह टोकरियाँ भर लीं, जो उनके पास उनके खा लेने के पश्चात बचे रह गए थे।

१४ तो जब उन लोगों ने वो चमत्कार देख लिया था, जो यीशु ने कर दिया था, तो उन्होंने कहा, भई यही तो सच में वो पैग़म्बर हैं, जिन्होंने इस संसार में आना था। 

१५ इसलिए जब यीशु ने यह आभास किया, कि वो तो आकर उन्हें एक राजा बनाने के लिए बलपूर्वक पकड़ लेंगे, तो वो पुनः स्वयं अकेले ही एक पर्वत पर चले गए।  

१६ और जब सन्ध्या हो चली थी, तो उनके शिष्य नीचे समुद्र तक चले गए,  

१७ और उन्होंने एक जलयान में प्रवेश किया, और वो समुद्र पर से कफरनहूम की ओर चल दिए। और अब अन्धेरा हो चला था, और यीशु उनके साथ नहीं थे। 

१८ और एक बड़ी आँधी चली, और उसके कारण समुद्र सक्रीय हो उठा। 

१९ तो जब उन्होंने लगभग पच्चीस या तीस फरलौंग नौकायानी कर ली थे, उन्होंने यीशु को समुद्र पर चलते हुए, और जलयान के समीप आते हुए देखा: और वो भयभीत हो उठे। 

२० परन्तु वो उनसे कहते हैं, ये तो मैं ही हूँ; भयभीत मत हो भई! 

२१ तब उन्होंने उन्हें स्वेच्छानुसार जलयान में ग्रहण कर लिया: और तुरँत ही वो जलयान उस किनारे पहुँच गया जहाँ वो जा रहे थे। 

२२ उसके अगले दिन, जब उन लोगों ने देखा जो समुद्र के उस पार खड़े थे, कि वहाँ तो कोई भी अन्य नाव नहीं थी, सिवाय उस एक के जिस में उनके शिष्यों ने प्रवेश किया था, और कि यीशु अपने शिष्यों के साथ नाव में नहीं गए थे, बल्कि उनके शिष्य नाव में अकेले ही चले गए थे;

२३ (हालाँकि तिबेरीयुस से अन्य नावें उस स्थान के निकट आ पहुँची थीं, जहाँ प्रभु के धन्यवाद दे देने के पश्चात, उन्होंने रोटी खाई थी:)

२४ इसलिए जब उन लोगों ने देखा कि यीशु वहाँ नहीं थे, न ही उनके शिष्य, तो वो भी नावों में सवार हो कफरनहूम आ पहुँचे, यीशु को ढूँढते हुए। 

२५ और जब उन्होंने उन्हें समुद्र के उस पार पा लिया था, तो उन्होंने उनसे कहा, रैबाय, तुम यहाँ कब पधारे भई? 

२६ यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, और कहा, मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, तुम मुझे इसलिए नहीं ढूँढ रहे हो, क्योंकि तुमने वो चमत्कार देखे थे, बल्कि इसलिए, क्योंकि तुमने वो रोटियाँ खाई थीं, और तुम सन्तुष्ट हो गए थे। 

२७ उस भोजन के लिए श्रम मत करो जो नष्ट हो जाता है, बल्कि उस भोजन के लिए श्रम करो जो अनंत जीवन तक बना रहता है, जो मनुष्य-पुत्र तुम्हें दे देगा: क्योंकि उसी पर ईश्वर पिताश्री मुहरबंदी लगा चुके हैं। 

२८ तब उन्होंने उन से कहा, भई हम क्या करें, कि हम ईश्वर के कार्य क्रियान्वित कर सकें?

२९ यीशु ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, यही है ईश्वर का कार्य, कि तुम उस पर विश्वास कर लो जिसे उन्होंने भेजा है। 

३० इसलिए उन्होंने उन से कहा, तो फिर तुम कौन सा संकेत दिखाओगे, कि हम उसे देखें, और तुम पर विश्वास कर लें? कौन सा कारनामा करोगे तुम? 

३१ हमारे पित्रों ने तो निर्जन-क्षेत्र में मन्ना खाया; जैसा कि यह लिखा हुआ है, उन्होंने उन्हें स्वर्ग से रोटी खाने के लिए दी। 

३२ तब यीशु ने उनसे कहा, मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, मूसा ने तुम्हें वो रोटी स्वर्ग से नहीं दी थी; बल्कि मेरे पिताश्री तुम्हें वो सच्ची रोटी स्वर्ग में से देते हैं। 

३३ क्योंकि ईश्वर की रोटी वो है जो स्वर्ग से नीचे आती है, और संसार को जीवन प्रदान करती है। 

३४ तब उन्होंने उन से कहा, प्रभु, जी हमें ये रोटी सदा देते रहो। 

३५ और यीशु ने उन से कहा, मैं हूँ वो जीवन की रोटी: वो जो मेरे पास आता है, उसे कभी भूख नहीं लगेगी; और वो जो मुझ पर विश्वास करता है, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी। 

३६ परन्तु मैंने तुम से कहा, कि तुम मुझे देख भी चुके हो, और विश्वास नहीं करते। 

३७ वो सभी जो पिताश्री मुझे देते हैं मेरे पास आएँगे; और वो जो मेरे पास आता है, मैं उसे कभी भी बाहर नहीं निकालूँगा।  

३८ क्योंकि मैं स्वर्ग से नीचे अपनी इच्छा करने नहीं, बल्कि उनकी इच्छा करने आया हूँ जिन्होंने मुझे भेजा है। 

३९ और यही है पिताश्री की इच्छा जिन्होंने मुझे भेजा है, कि उस सब में से जो उन्होंने मुझे दिया है, मैं कुछ भी न खोऊँ, बल्कि उसे पुनः अन्तिम दिन में ऊपर उठा दूँ। 

४० और यही है उनकी इच्छा जिन्होंने मुझे भेजा है, कि वो प्रत्येक जो पुत्र को देखता है, और उस पर विश्वास कर लेता है, अनंतकाल जीवन प्राप्त कर ले: और मैं उसे अन्तिम दिन में ऊपर उठा दूँगा। 

४१ तो फिर वो यहूदी उन पर बड़बड़ाने लग गए, क्योंकि उन्होंने कहा, मैं हूँ वो रोटी जो स्वर्ग से नीचे आई है। 

४२ और उन्होंने कहा, क्या यह यूसुफ का बेटा यीशु नहीं है, जिसके पिता और माता से हम परिचित हैं? तो फिर यह कैसे कह रहा है, कि मैं स्वर्ग से नीचे आया हूँ?

४३ इसलिए यीशु ने उत्तर दिया और उनसे कहा, अपने बीच मत बड़बड़ाओ। 

४४ कोई भी व्यक्ति मेरे पास नहीं आ सकता है, सिवाय कि पिताश्री जिन्होंने मुझे भेजा है उसे खींचें: और मैं उसे अन्तिम दिन पर ऊपर उठा दूँगा। 

४५ पैग़म्बरों में यह लिखा हुआ है, और वो सभी ईश्वर के सिखाए हुए होंगे। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति जो सुन चुका है, और जो पिताश्री के विषय में सीख चुका है, मेरे पास आ जाता है। 

४६ अब किसी भी व्यक्ति ने पिताश्री को नहीं देखा है, सिवाय उसके जो ईश्वर का है, उसी ने पिताश्री को देखा है। 

४७ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, वो जो मुझ पर विश्वास करता है, उसके पास अनन्त जीवन होता है। 

४८ मैं हूँ वो जीवन की रोटी। 

४९ तुम्हारे पित्रों ने जँगली-क्षेत्र में मन्ना खाया, और वो तो मृत हैं। 

५० यही है वो रोटी जो स्वर्ग से नीचे आती है, जिस में से कोई भी व्यक्ति खाए, तो उसकी मृत्यु न हो। 

५१ मैं हूँ वो संजीवन रोटी जो स्वर्ग से नीचे आई है: यदि कोई भी व्यक्ति इस रोटी में से खाएगा, तो वो सदैवत्वता के लिए जिएगा: और वो रोटी जो मै दूँगा मेरा शरीर है, जिसे मैं इस संसार के जीवन के लिए प्रदान कर दूँगा। 

५२ वो यहूदी इसलिए आपस में झगड़ पड़े, कहते हुए, भई यह व्यक्ति हमें अपना माँस खाने के लिए कैसे दे सकता है? 

५३ तब यीशु ने उन से कहा, मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, सिवाय कि तुम मनुष्य-पुत्र का माँस खाओ, और उसका रक्त पीयो, तुम में कोई जीवन नहीं है।

५४ जो कोई भी मेरा माँस खाता है, और मेरा रक्त पीता है, जीवन अनन्त रखता है; और मैं उसे अन्तिम दिन पर ऊपर उठा दूँगा। 

५५ क्योंकि मेरा शरीर वास्तव में ही भोजन है, और मेरा रक्त वास्तव में ही पेय है। 

५६ वो जो मेरा माँस खाता है, और मेरा रक्त पीता है, मुझ ही में वास करता है, और मैं उसी में। 

५७ जिस प्रकार जीवन्त पिताश्री ने मुझे भेजा है, और मैं पिताश्री द्वारा जीवित हूँ: उसी प्रकार वो जो मुझे खाता है, यहाँ तक कि, वही मेरे ही द्वारा जीएगा। 

५८ यही है वो रोटी जो स्वर्ग से नीचे आई है: तुम्हारे पित्रों जैसे नहीं, जिन्होंने मन्ना खाया, और वो तो मृत हैं: वो जो इस रोटी में से खाता है, सदैवत्वता के लिए जिएगा। 

५९ यह बातें उन्होंने यहूदी-आराधनालय में बोलीं, जैसे वो कफरनहूम में सिखा रहे थे। 

६० इसलिए उनके शिष्यों में से कईयों ने, जब उन्होंने यह सुन लिया था, कहा, भई ये तो एक कठिन कथन है; इसे कौन सुन सकता है? 

६१ जब यीशु ने स्वयं में आभास कर लिया था, कि उनके शिष्य इस पर बड़बड़ा रहे थे, तो उन्होंने उन से कहा, क्या यह तुम्हें अवरोधित कर रहा है? 

६२ क्या हो यदि तुम मनुष्य-पुत्र को वहीं ऊपर आरोहण करता हुआ देख लो, जहाँ वो पहले से ही था? 

६३ वो प्राण है जो जीवन-दायक है; माँस से कोई लाभ नहीं मिलता: वो शब्द जो मैं तुम से बोलता हूँ, वही प्राण हैं, और वही जीवन हैं। 

६४ परन्तु तुम में से कुछ हैं जो विश्वास नहीं करते। क्योंकि यीशु प्रारम्भ से ही उनसे परिचित थे जिन्होंने विश्वास नहीं किया था, और कौन उनके साथ विश्वासघात करेगा। 

६५ और उन्होंने कहा, इसलिए मैंने तुमसे कहा था, कि कोई भी व्यक्ति मेरे पास नहीं आ सकता, सिवाय कि उसे यह मेरे पिताश्री द्वारा प्रदान किया गया हो।

६६ उस समय से उनके कई शिष्य वापस लौट गए, और वो उनके साथ अब और नहीं चले। 

६७ तब यीशु ने उन बारह से कहा, क्या तुम भी चले जाओगे?

६८ तो सिमोन पतरस ने उन्हें उत्तर दिया, प्रभु, जी हम किस के पास जाएँ? आप ही के पास तो अनन्त जीवन के शब्द हैं। 

६९ और हम विश्वास करते हैं, और हम विश्वस्त हैं, कि आप ही वो मसीहा हैं, जीवन्त ईश्वर के पुत्र। 

७० यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, क्या मैंने ही तुम बारह को नहीं चुना है क्या, और एक तुम में से एक दानव है?

७१ वो सिमोन के बेटे यूदस इस्करियोती के विषय में बोले: क्योंकि वो वही था जो उनके साथ विश्वासघात करने वाला था, उन बारह में से एक होता हुआ। 



सातवाँ अध्याय। 


१ इन घटनाओं के पश्चात यीशु का गलील में चलना-फिरना लगा रहा, चूँकि वो यहूदा में चलना-फिरना नहीं चाहते थे, क्योंकि यहूदी उनकी हत्या कर देने की ताक लगाए बैठे थे। 

२ अब यहूदियों का तम्बुओं का भोज निकट था। 

३ इसलिए उनके भाईयों ने उनसे कहा, यहाँ से प्रस्थान कर लो, और यहूदा चले जाओ, ताकि तुम्हारे शिष्य भी वो कार्य देख सकें जो तुम करते रहते हो। 

४ क्योंकि ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जो स्वयं सरे-आम प्रसिद्धि चाहता हुआ, गुप्त रूप से कुछ करता हो। तो यदि तुम यह कार्य कर रहे हो, स्वयं को संसार सम्मुख प्रदर्शित कर दो। 

५ क्योंकि न ही उनके भाईयों ने उन पर विश्वास किया था। 

६ तब यीशु ने उनसे कहा, मेरा समय अभी नहीं आया है: परन्तु तुम्हारा समय सदैव उद्यत रहता है। 

७ यह संसार तुम्हारे साथ घृणा नहीं कर सकता; परन्तु मुझ से वो घृणा करता है, क्योंकि मैं उसका साक्ष्य देता हूँ, कि इसके कर्म बुरे हैं। 

८ तुम चले जाओ ऊपर इस भोज में: मैं अभी इस भोज में ऊपर नहीं जाऊँगा; क्योंकि मेरा समय अभी पूर्ण रूप से नहीं आया है। 

९ जब उन्होंने यह शब्द उनसे कह दिए थे, तो वो अभी गलील में ही रुके रहे। 

१० परन्तु जब उनके भाई ऊपर जा चुके थे, तब वो भी भोज पर ऊपर चले गए, सरे-आम नहीं, बल्कि मानो कि चुपके से ही। 

११ तो यहूदी उन्हें भोज के अवसर पर खोज रहे थे, और उन्होंने कहा, भई कहाँ है वो?

१२ और उनके विषय में लोगों के बीच बहुत बड़बड़ाहट हो रही थी: क्योंकि कुछ कह रहे थे, कि भई वो तो एक अच्छे व्यक्ति हैं: औरों ने कहा, न जी न; बल्कि वो तो लोगों को धोखा दे रहा है। 

१३ तथापि, यहूदियों के भय के कारण, कोई भी व्यक्ति उनके विषय में खुल कर नहीं बोल रहा था। 

१४ अब लगभग भोज के मध्य में, यीशु ऊपर मन्दिर में अन्दर गए, और उन्होंने सिखाया। 

१५ और यहूदी अचम्भे में पड़ गए, कहते हुए, यह व्यक्ति, जिसने कभी शिक्षा ही नहीं प्राप्त की, तो यह आलेख कैसे जानता है भई? 

१६ यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, और कहा, मेरा उपदेश मेरा नहीं है, बल्कि उनका है जिन्होंने मुझे भेजा है। 

१७ यदि कोई भी व्यक्ति उनकी इच्छा करेगा, तो वो उस उपदेश को जान जाएगा, कि यदि वो ईश्वर का है, या मैं अपनी ही ओर से बोल रहा हूँ। 

१८ वो जो अपनी ओर से बोलता है, स्वयं की ही महिमा चाहता है: परन्तु वो जो उनकी महिमा चाहता है जिन्होंने उसे भेजा है, वही सच्चा है, और उस में कोई भी अनैतिकता नहीं है। 

१९ क्या मूसा ने तुम्हें नियम नहीं दिया था क्या, और तब भी तुम में से कोई भी नियम का पालन नहीं करता है? तो तुम मुझे क्यों मार डालने की ताक में लगे रहते हो भई?  

२० उन लोगों ने उत्तर दिया और कहा, तेरे अन्दर तो दानव है: तुझे कौन मार डालने की ताक में लगा रहता है?

२१ यीशु ने उत्तर दिया और उनसे कहा, मैंने एक कार्य किया है, और तुम सब अचम्भा कर रहे हो। 

२२ मूसा ने इसलिए तुम्हें ख़तना-करना दिया था; (इस कारण नहीं कि वो मूसा की ओर से है, बल्कि पित्रों की ओर से;) और तुम सैबथ के दिन पर आदमी का ख़तना करते हो। 

२३ अब यदि कोई आदमी सैबथ के दिन ख़तनित होता है, ताकि मूसा का नियम न तोड़ा जाए; तो क्या तुम मुझ पर क्रोधित हो रहे हो, क्योंकि मैंने एक पुरुष को सैबथ के दिन पर पूर्णतः स्वस्थ कर दिया है? 

२४ रूप-रंगानुसार न्याय मत करो, बल्कि नेकी के न्यायानुसार न्याय करो। 

२५ तब यरूशलेम के कुछ लोगों ने कहा, क्या यह वही नहीं है, जिसे वो मार डालने की ताक में हैं?

२६ परन्तु लो जी लो, ये तो साहस के साथ बोल रहा है, और वो इसे कुछ भी नहीं कह रहे हैं। क्या अध्यक्ष-गण वास्तव में जानते हैं कि यही वो मसीहा है?   

२७ परन्तु हम तो इस आदमी को जानते हैं कि ये कहाँ से है: परन्तु जब मसीहा आता है, कोई भी व्यक्ति नहीं जानता कि वो कहाँ से है। 

२८ तब यीशु, जैसे वो मन्दिर में शिक्षा दे रहे थे, चीख पड़े, कहते हुए, तुम मुझे जानते हो, और तुम जानते हो कि मैं कहाँ से हूँ: और मैं अपनी ओर से नहीं आया हूँ, परन्तु जिन्होंने मुझे भेजा है वही सत्यमय हैं, जिन्हें तुम जानते नहीं हो। 

२९ परन्तु मैं उन्हें जानता हूँ: क्योंकि मैं उन्हीं से हूँ, और उन्होंने ही मुझे भेजा है। 

३० तब वो उन्हें पकड़ लेने की ताक में थे: परन्तु किसी भी व्यक्ति ने उन पर हाथ नहीं डाला, क्योंकि उनकी घड़ी अभी तक आई नहीं थी। 

३१ और कई लोगों ने उन पर विश्वास कर लिया, और कहा, जब मसीहा आता है, क्या वो इन से भी अधिक चमत्कार करेगा, जितने इन पुरुष ने किए हैं?

३२ फैरिसियों ने सुना कि लोग उनके सम्बंध में ऐसी बातें बड़बड़ा रहे थे; और फैरिसियों ने और प्रमुख पुरोहितों ने उन्हें पकड़ लेने के लिए अफ़सर भेजे। 

३३ तब यीशु ने उनसे कहा, बस कुछ ही समय तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, और फिर मैं उनके पास चला जाऊँगा जिन्होंने मुझे भेजा है। 

३४ तुम मुझे ढूँढोगे, और मुझे नहीं पाओगे: और जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते। 

३५ तब यहूदियों ने आपस में कहा, भई कहाँ जाएगा ये, कि हम इसे ढूँढ नहीं पाएँगे? क्या ये बिखरी हुई अन्यप्रजातियों के बीच जाकर, उन अन्यप्रजातियों को सिखाएगा क्या?

३६ यह कैसा कथन है जो इसने कहा है, तुम मुझे ढूँढोगे, और तुम मुझे नहीं पाओगे: और मैं जहाँ हूँ, वहाँ तुम नहीं आ सकते?

३७ उस अन्तिम दिन में, भोज के उस बड़े दिन, यीशु खड़े होकर चीखे कहते हुए, यदि कोई भी व्यक्ति प्यासा है, तो उसे मेरे पास आ जाने दो, और पी लेने दो। 

३८ वो जो मुझ पर विश्वास करता है, जैसा शास्त्र ने कहा है, उसके उदर में से संजीवन जल की नदियाँ बाहर निकल कर बहेंगी। 

३९ (परन्तु उन्होंने यह प्राण के विषय में बोला था, जिन्हें उन पर विश्वास करने वालों ने ग्रहण करना था: क्योंकि पवित्र-प्राण अभी तक प्रदान नहीं किए गए थे: क्योंकि यीशु अभी तक महिमामंडित नहीं हुए थे।)

४० तो लोगों में से कईयों ने, जब उन्होंने यह कथन सुना, कहा, सच में ये वही पैग़म्बर हैं। 

४१ औरों ने कहा, यही मसीहा हैं। परन्तु कुछों ने कहा, क्या मसीहा गलील में से बाहर निकलेगा क्या?

४२ क्या शास्त्र ने कहा नहीं है क्या, कि मसीहा दाऊद के बीज में से, और बेतलेहम नगरी में से आएगा, जहाँ दाऊद था?

४३ अतः यीशु के कारण, लोगों के बीच एक विभाजन हो गया था। 

४४ और कुछों ने उन्हें पकड़ लिया होता; परन्तु किसी भी व्यक्ति ने उन पर हाथ नहीं डाले। 

४५ तब वो अफ़सर, प्रमुख पुरोहितों और फैरिसियों के पास आए; और उन्होंने उनसे कहा, तुम क्यों नहीं लाए उसे भई?

४६ उन अफ़सरों ने उत्तर दिया, कोई भी मानुष कभी भी इस पुरुष के समान नहीं बोला। 

४७ तब उन्हें फैरिसियों ने उत्तर दिया, क्या तुम भी धोखा खा गए हो? 

४८ क्या अध्यक्षों में से, या फैरिसियों में से किसी ने भी उस पर विश्वास किया है क्या?

४९ परन्तु ये लोग जो नियम नहीं जानते, श्रापित हैं। 

५० निकोदेमूस उन से कहता है, (वही जो रात को यीशु के पास आया था, उन्हीं में से एक होता हुआ,)

५१ क्या हमारा नियम किसी भी व्यक्ति का न्याय, उसे सुनने से पहले, और उसकी करनी जानने से पहले, करता है क्या? 

५२ उन्होंने उसे उत्तर दिया और कहा, क्या तुम भी गलील से हो भई? ढूँढ लो, और देख लो, क्योंकि गलील में से कोई भी पैग़म्बर नहीं उठा है। 

५३ और हर व्यक्ति अपने-ही-अपने घर चला गया। 





आठवाँ अध्याय। 


१ यीशु जैतूनों के पहाड़ पर चले गए। 

२ और सुबह-सुबह वह पुनः मन्दिर में पधारे, और सभी लोग उनके पास आए; और यीशु नीचे बैठ गए, और उन्हें सिखाया। 

३ और लिपिक और फैरिसी यीशु के पास एक स्त्री को ले आए, जो व्यभिचार में पकड़ ली गई थी; और जब उन्होंने उसे बीच में खड़ा कर दिया था,

४ तो वो उनसे कहते हैं, गुरुवर, यह स्त्री व्यभिचार में पकड़ ली गई थी, उसी करतूत में। 

५ अब मूसा ने नियम में हमें यह आदेश दिया था, कि ऐसों पर पथराव कर देना चाहिए: परन्तु तुम क्या कहते हो?

६ यह उन्होंने उन्हें परखते हुए कहा, ताकि उनके पास उन पर दोषारोपण लगाने के लिए आधार हो सके। परन्तु यीशु नीचे झुके, और वो अपनी उँगली से धरती पर लिखने लग गए, मानो कि उन्होंने उन्हें सुना ही न हो। 

७ तो फिर जब वो उनसे लगातार पूछते ही रहे, तो उन्होंने स्वयं को ऊपर उठा कर उनसे कहा, वो जो तुम्हारे बीच निष्पाप है, उसी को सबसे पहले इस स्त्री पर पथराव कर देने दो। 

८ और वह पुनः नीचे झुक गए, और धरती पर लिखने लग गए। 

९ और वह जिन्होंने यह सुना अपनी ही अन्तरात्मा द्वारा दोषित हो, एक-एक कर के बाहर चले गए, सबसे वृद्ध से आरम्भ कर के, सबसे अंतिम तक। और यीशु और बीच में खड़ी वो स्त्री, अकेले रह गए। 

१० अब जब यीशु ने स्वयं को ऊपर उठा लिया था, और उन्होंने वहाँ उस स्त्री के सिवा किसी अन्य को नहीं देखा, तो उन्होंने उस से कहा, स्त्री, भई कहाँ हैं वो तुम्हारे दोषारोपी? क्या किसी ने भी तुम्हें दण्डनीय-घोषित नहीं किया क्या?

११ तो उसने कहा, किसी ने भी नहीं, प्रभु जी। और यीशु ने उस से कहा, न ही मैं तुम्हें दण्डनीय-घोषित करता हूँ: चली जाओ, और अब और अधिक पाप मत करना। 

१२ फिर यीशु उन लोगों से पुनः बोले, कहते हुए, मैं संसार का उजाला हूँ: वो जो मेरे पीछे-पीछे आता है अन्धकार में नहीं चलेगा, बल्कि उसके पास जीवन का उजाला होगा। 

१३ इसलिए फैरिसियों ने उनसे कहा, तुम स्वयं ही अपना साक्ष्य दे रहे हो; तुम्हारा साक्ष्य सच्चा नहीं है। 

१४ यीशु ने उत्तर दिया और उनसे कहा, यद्यपि मैं ही अपने स्वयं का साक्ष्य दे रहा हूँ, तद्यपि मेरा साक्ष्य सच्चा है: क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं कहाँ से आया हूँ, और मैं कहाँ जा रहा हूँ; परन्तु तुम नहीं बता सकते कि मैं कहाँ से आया हूँ, और मैं कहाँ जा रहा हूँ। 

१५ तुम दैहिकतानुसार न्याय करते हो; मैं किसी भी व्यक्ति का न्याय नहीं करता। 

१६ और तथापि यदि मैं न्याय करता भी हूँ, तो मेरा न्याय-निर्धारण सच्चा है: क्योंकि मैं अकेला नहीं हूँ, बल्कि मैं और मुझे भेजने वाले वो पिताश्री। 

१७ तुम्हारे नियम में भी यह लिखा है, कि दो व्यक्तियों का साक्ष्य सच्चा होता है। 

१८ मैं वो एक हूँ जो अपने स्वयं का साक्ष्य दे रहा है, और पिताश्री जिन्होंने मुझे भेजा है मेरा साक्ष्य दे रहे हैं। 

१९ तो फिर उन्होंने उनसे कहा, भई कहाँ हैं तुम्हारे पिताश्री? यीशु ने उत्तर दिया, तुम न ही मुझे, न ही मेरे पिताश्री से परिचित हो: यदि तुम मुझ से परिचित होते, तो तुम मेरे पिताश्री से भी परिचित हो गए होते।

२० यह शब्द यीशु ने कोषागार में बोले, जैसे वो मन्दिर में शिक्षा प्रदान कर रहे थे: और किसी भी व्यक्ति ने उन पर हाथ नहीं डाले; क्योंकि उनका समय अभी तक नहीं आया था। 

२१ तब यीशु ने उनसे पुनः कहा, मैं अपने पथ पर जा रहा हूँ, और तुम मुझे ढूँढोगे, और अपने ही पापों में मर जाओगे: जहाँ मैं जा रहा हूँ, तुम नहीं आ सकते। 

२२ तब यहूदियों ने कहा, क्या ये स्वयं को मार डालेगा? क्योंकि ये कह रहा है, जहाँ मैं जा रहा हूँ, तुम नहीं आ सकते।

२३ और उन्होंने उन से कहा, तुम नीचे से हो; मैं ऊपर से हूँ: तुम इस संसार के हो; मैं इस संसार का नहीं हूँ। 

२४ इसलिए मैंने तुम से कहा, कि तुम अपने ही पापों में मर जाओगे: क्योंकि यदि तुम विश्वास नहीं करोगे कि मैं वही हूँ, तुम अपने ही पापों में मर जाओगे। 

२५ तब उन्होंने यीशु से कहा, भई कौन हो तुम? और यीशु उनसे कहते हैं, वही जो मैंने तुम से आरम्भ से कहा है। 

२६ मेरे पास बहुत सी बातें हैं कहने के लिए, और तुम्हारा न्याय करने के लिए: परन्तु वो सत्यमय हैं जिन्होंने मुझे भेजा है; और जो बातें मैंने उनसे सुनी हैं, वही मैं इस संसार से बोलता हूँ। 

२७ उन लोगों को यह समझ में नहीं आया कि वो उनसे पिताश्री के विषय में बोल रहे थे। 

२८ तब यीशु ने उन से कहा, जब तुमने मनुष्य-पुत्र को ऊपर उठा दिया होगा, तब तुम जान जाओगे कि मैं वही हूँ, और कि मैं अपने स्वयं से कुछ भी नहीं करता हूँ; बल्कि जैसे मेरे पिताश्री ने मुझे सिखाया है, मैं यह बातें बोलता हूँ। 

२९ और वो मेरे साथ हैं, जिन्होंने मुझे भेजा है: पिताश्री ने मुझे अकेला नहीं छोड़ा है; क्योंकि मैं सदैव वही कार्य करता हूँ जिनसे वो प्रसन्न होते हैं। 

३० जैसे वो यह शब्द बोल रहे थे, कईयों ने उन पर विश्वास कर लिया। 

३१ तब यीशु ने उन यहूदियों से कहा जिन्होंने उन पर विश्वास कर लिया था, यदि तुम मेरे शब्द में लगातार रहते रहो, तभी तुम वास्तव में मेरे शिष्य हो:

३२ और तुम सत्य जान जाओगे, और वो सत्य तुम्हें स्वतंत्र बना देगा। 

३३ उन्होंने उन्हें उत्तर दिया, भई हम तो अब्राहम का बीज हैं, और हम तो कभी भी किसी की भी बंध्वा-बेगारी में नहीं रहे: तो फिर तू कैसे कह सकता है, तुम स्वतन्त्र बना दिए जाओगे?

३४ यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, जो कोई भी पाप करता है पाप का दास है। 

३५ और वो दास घर में सदैव निवास नहीं करता है: बल्कि पुत्र सदैवत्वता तक घर में निवास करता है। 

३६ इसलिए यदि पुत्र तुम्हें स्वतन्त्र बना देता है, तुम वास्तव में ही स्वतन्त्र बन जाओगे। 

३७ मैं जानता हूँ कि तुम अब्राहम का बीज हो; परन्तु तुम तो मुझे मार डालने की ताक में लगे रहते हो, क्योंकि मेरे शब्द का तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं है। 

३८ मैं वही बोलता हूँ जो मैंने अपने पिताश्री के साथ देखा है: और तुम वही करते रहते हो जो तुमने अपने पिता के साथ देखा है। 

३९ उन्होंने उत्तर दिया, और उन से कहा, अब्राहम हमारा पिता है। यीशु उन से कहते हैं, यदि तुम अब्राहम की सन्तानें होते, तो तुम अब्राहम के कार्य करते।

४० परन्तु तुम तो मुझे अब मार डालने की ताक में हो, उसी आदमी को जिसने तुम्हें सच्चाई बताई है, जिसे मैंने ईश्वर से सुना है: ऐसा अब्राहम ने नहीं किया। 

४१ तुम तो अपने पिता के कर्म करते रहते हो। तब उन्होंने उन से कहा, हम अविवाहित-यौन द्वारा पैदा नहीं हुए हैं; हमारे एक ही पिता हैं, ईश्वर ही। 

४२ तथापि यीशु ने उनसे कहा, यदि ईश्वर तुम्हारे पिता होते, तो तुम मुझ से प्रेम करते: क्योंकि मैं ईश्वर से ही बाहर निकल कर आया हूँ; न ही मैं अपने आप से आया हूँ, बल्कि उन्होंने ही मुझे भेजा है। 

४३ तुम मेरे बोल क्यों नहीं समझ रहे हो? क्योंकि तुम मेरे शब्द ही नहीं सुन सकते हो। 

४४ तुम अपने पिता उस दानव के हो, और तुम अपने पिता की वासनाएँ करने की इच्छा रखते हो। वही प्रारम्भ से एक हत्यारा था, और वो सच्चाई पर स्थिर नहीं रहा, क्योंकि उस में कोई भी सच्चाई नहीं है। जब वो झूठ बोलता है, तो वो अपने स्वयं से ही बोलता है: क्योंकि वो एक झूठा है, और वो झूठ ही का पिता है। 

४५ और चूँकि मैं तुम्हें सच्चाई बता रहा हूँ, तुम मुझ पर विश्वास नहीं कर रहे हो। 

४६ तुम में से कौन मुझे पापी ठहरा सकता है? और यदि मैं सत्य बोलता हूँ, तो तुम मेरा विश्वास क्यों नहीं कर रहे हो?

४७ वो जो ईश्वर का है, ईश्वर के शब्दों को सुनता है: तुम इसलिए उन्हें नहीं सुन रहे हो, क्योंकि तुम ईश्वर के नहीं हो।      

४८ तब यहूदियों ने उत्तर दिया, और उन से कहा, क्या हम सही नहीं कह रहे हैं, कि तू तो एक समैरियावासी है, और तुझ में तो एक दानव है?

४९ यीशु ने उत्तर दिया, मुझ में कोई दानव नहीं है; बल्कि मैं अपने पिताश्री का आदर करता हूँ, और तुम मेरा अनादर करते हो। 

५० और मैं अपनी स्वयं की महिमा नहीं ढूँढ रहा हूँ: एक हैं वो, जो ढूँढते हैं और न्याय-निर्धारण करते हैं। 

५१ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, यदि कोई भी मेरा कथन रखेगा, तो वो मृत्यु कतई नहीं देखेगा।  

५२ तो यहूदियों ने उनसे कहा, अब हम जान गए हैं भई कि तुझ में तो एक दानव है। अब्राहम मृत है, और पैग़म्बर भी; और तू कह रहा है, यदि कोइ व्यक्ति मेरा कथन रखेगा, तो वो मृत्यु कतई नहीं चखेगा! 

५३ क्या तू हमारे पिता अब्राहम से बढ़कर है, जो मृत है? और पैग़म्बर भी मृत हैं: भई कौन बना रहा है तू अपने आप को?

५४ यीशु ने उत्तर दिया, यदि मैं स्वयं को सम्मानित करता हूँ, तो मेरा सम्मान कुछ नहीं है: मेरे पिताश्री हैं वो जो मुझे सम्मानित करते हैं; जिनके विषय में तुम कहते हो, कि वो तुम्हारे ईश्वर हैं:

५५ तथापि तुमने उन्हें नहीं जाना; परन्तु मैं उन्हें जानता हूँ: और यदि मैं कहूँ, कि मैं उन्हें नहीं जानता, तो मैं तुम्हारे जैसा ही एक झूठा बन जाऊँगा: परन्तु मैं उनसे परिचित हूँ, और मैं उनका कथन रखता हूँ। 

५६ तुम्हारा पिता अब्राहम मेरा दिन देख कर हर्षित हुआ: और उसने उसे देखा, और वो प्रसन्नचित्त हुआ। 

५७ तब यहूदियों ने उनसे कहा, तू तो अभी पचास वर्ष की आयु का भी नहीं है, और क्या तूने अब्राहम को देखा है?

५८ यीशु उनसे कहते हैं, मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, उस से पहले जब अब्राहम था, मैं हूँ। 

५९ तब उन्होंने उन पर पथराव करने के लिए पत्थर उठा लिए: परन्तु यीशु ने स्वयं को छिपा लिया, और वो मन्दिर से बाहर चले गए, उन्हीं के बीच में से जाते हुए, और इस प्रकार वो चलते चले गए।





नवाँ अध्याय। 


१ और जैसे यीशु चलते जा रहे थे, उन्होंने एक आदमी को देखा जो जन्म से ही नेत्रहीन था। 

२ और उनके शिष्यों ने उनसे पूछा, कहते हुए, रैबाय जी, किसने पाप किया, इस आदमी ने, या इसके पिता-माता ने, कि यह नेत्रहीन पैदा हुआ था?

३ यीशु ने उत्तर दिया, न ही इस आदमी ने पाप किया है, न ही इसके पिता-माता ने: बल्कि इसलिए, ताकि ईश्वर के कार्य इस में प्रत्यक्ष कर दिए जाएँ। 

४ दिन रहते-रहते ही मुझे अवश्य उनके कार्य करने हैं, जिन्होंने मुझे भेजा है। रात्रि आ रही है, जब कोई भी व्यक्ति काम नहीं कर सकता है। 

५ जब तक मैं संसार में हूँ, मैं इस संसार का उजाला हूँ। 

६ जब उन्होंने ऐसा बोल दिया था, तो उन्होंने धरती पर थूका, और उस थूक से मिट्टी का एक लेप बना लिया, और उन्होंने उस नेत्रहीन आदमी के नेत्रों पर उस मिट्टी के लेप से विलेपन कर दिया,

७ और उन्होंने उस से कहा, जाओ, जाकर सिलोम के कुण्ड में धो लो, (जो व्याख्यानुसार है, भेजा गया।) तो वो व्यक्ति इसलिए अपने पथ पर चला गया, और उसने धोया, और वो देखता हुआ आ गया। 

८ इसलिए पड़ौसियों ने, और वो जो उसे पहले से नेत्रहीन देखते आ रहे थे, उन्होंने कहा, क्या ये वही नहीं है, जो बैठा हुआ भीख माँगा करता था?

९ कुछों ने कहा, भई ये तो वही है: औरों ने कहा, ये तो उसी के सदृश है: परन्तु उसने कहा, मैं वही हूँ।  

१० इसलिए उन्होंने उस से कहा, तो भई कैसे खुल गईं तेरी आँखें?

११ उसने उत्तर दिया और कहा, यीशु कहलाए जाने वाले एक पुरुष ने मिट्टी का एक लेप बना कर, मेरे नेत्रों पर विलेपन कर दिया, और मुझ से कहा, सिलोम के कुण्ड में जाकर धो लो: और मैं गया, और मैंने धो लिया, और मैंने दृष्टि प्राप्त कर ली। 

१२ तब उन्होंने उस से कहा, कहाँ है वो? उसने कहा, मैं नहीं जानता। 

१३ तो वो उसे, जो पहले समय से नेत्रहीन था, फैरिसियों के पास ले आए। 

१४ और वो सैबथ का दिन था, जब यीशु ने वो मिट्टी का लेप बना कर, उस व्यक्ति की आँखें खोल दी थीं। 

१५ तो पुनः उन फैरिसियों ने भी उस से पूछा कि उसने कैसे अपनी दृष्टि प्राप्त कर ली थी। उसने उनसे कहा, उन्होंने मेरी आँखों पर मिट्टी का लेप लगाया, और मैंने धो लिया, और मैं देख सकता हूँ। 

१६ इसलिए फैरिसियों में से कुछों ने कहा, भई यह व्यक्ति तो ईश्वर का नहीं है, क्योंकि यह सैबथ का दिन नहीं रखता है। औरों ने कहा, एक पापी व्यक्ति ऐसे चमत्कार कैसे कर सकता है? तो उनके बीच एक विभाजन हो गया। 

१७ वह पुनः उस नेत्रहीन से कहते हैं, भई क्या कहता है तू उसके विषय में, कि उसने तेरी आँखें खोल दी हैं? उसने कहा, वो एक पैग़म्बर हैं। 

१८ परन्तु उन यहूदियों ने उसके समबन्ध में विश्वास नहीं किया, कि वो नेत्रहीन हुआ करता था, और कि उसने अपनी दृष्टि प्राप्त कर ली थी, जब तक कि उन्होंने उस दृष्टि पा लेने वाले के पिता-माता को नहीं बुला लिया था। 

१९ और उन्होंने उनसे पूछा, कहते हुए, क्या यही तुम्हारा बेटा है, जो तुम कहते हो कि नेत्रहीन पैदा हुआ था? तो भई फिर अब ये देख कैसे रहा है? 

२० उसके पिता-माता ने उन्हें उत्तर दिया और कहा, हम जानते हैं कि यही हमारा बेटा है, और कि ये नेत्रहीन पैदा हुआ था:

२१ परन्तु किस साधन से ये अब देख सकता है, हम नहीं जानते; या किसने इसकी आँखें खोल दी हैं, हम नहीं जानते: ये वयस्क है; इसी से पूछ लो: यही स्वयं अपने लिए बोलेगा। 

२२ उसके पिता-माता ने ऐसे शब्द बोले, क्योंकि वो यहूदियों से डरते थे: क्योंकि यहूदियों ने पहले से ही सहमती कर ली थी, कि यदि कोई भी व्यक्ति स्वीकार करता है कि वही मसीहा थे, उसे यहूदी-आराधनालय से निष्कासित कर दिया जाए। 

२३ इसलिए उसके पिता-माता ने कहा, यह वयस्क है, इसी से पूछ लो। 

२४ तो उन्होंने पुनः उस पुरुष को बुलाया जो नेत्रहीन था, और उस से कहा, भई ईश्वर को प्रशंसा दे दे: हम जानते हैं कि ये व्यक्ति तो एक पापी है। 

२५ उसने उत्तर दिया, और कहा, यदि वो पापी हों या न, मैं नहीं जानता, पर एक बात मैं जानता हूँ, जबकि मैं नेत्रहीन था, अब मैं देख सकता हूँ। 

२६ तब उन्होंने उस से पुनः कहा, क्या किया उसने तेरे साथ? कैसे खोल दीं उसने तेरी आँखें? 

२७ उसने उन्हें उत्तर दिया, भई मैंने तो तुम्हें पहले से ही बता दिया है, और तुम ने नहीं सुना: तो फिर किसलिए तुम वो पुनः सुनोगे? क्या तुम भी उनके शिष्य बनोगे क्या?

२८ तब उन्होंने उसे गाली दी, और कहा, तू है उसका शिष्य; परन्तु हम तो मूसा के शिष्य हैं। 

२९ हम जानते हैं कि ईश्वर मूसा से बोले थे: जहाँ तक इस बन्दे की बात आती है, हम नहीं जानते कि ये कहाँ से है। 

३० उस पुरुष ने उत्तर दिया, और उनसे कहा, क्यों भई, यही तो एक आश्चर्यजनक बात है, कि तुम जानते नहीं हो कि ये कहाँ से हैं, और तब भी उन्होंने मेरी आँखें खोल दी हैं। 

३१ अब हम जानते हैं कि ईश्वर पापियों को नहीं सुनते: परन्तु यदि कोई भी व्यक्ति ईश्वर का आराधक हो, और उनकी इच्छा करता हो, उसी को वो सुनते हैं। 

३२ संसार के प्रारम्भ से लेकर यह सुनने में कभी नहीं आया, कि किसी ने उसकी आँखें खोल दी हों जो नेत्रहीन जन्मा हो। 

३३ यदि यह पुरुष ईश्वर के न होते, तो यह कुछ भी न कर पाते। 

३४ उन्होंने उत्तर दिया और उस से कहा, तू तो सम्पूर्णता से ही पापों में जन्मा है, और तू हमें सिखा रहा है? और उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया। 

३५ यीशु ने सुना कि उन्होंने उसे बाहर निकाल दिया था; और जब उन्होंने उसे ढूँढ लिया था, तो उन्होंने उस से कहा, क्या तुम ईश्वर के पुत्र पर विश्वास करते हो?

३६ उसने उत्तर दिया और कहा, जी वो कौन हैं प्रभु, कि मैं उन पर विश्वास करूँ?

३७ और यीशु ने उस से कहा, तुम ने उसे देख भी लिया है, और वो वही है जो तुम से बात कर रहा है। 

३८ और उसने कहा, प्रभु मैं विश्वास करता हूँ जी। और उसने उनकी आराधना की। 

३९ और यीशु ने कहा, न्याय-निर्धारण हेतु ही मैं इस संसार में आया हूँ, ताकि वो जो देख नहीं सकते, देख सकें; और वो जो देख सकते हैं, नेत्रहीन बना दिए जाएँ। 

४० और उन फैरिसियों में से कुछों ने जो यीशु के साथ थे, यह शब्द सुने, और उनसे कहा, तो क्या हम भी नेत्रहीन हैं?

४१ यीशु ने उनसे कहा, यदि तुम नेत्रहीन होते, तो तुम में कोई पाप न होता: परन्तु अब तुम कह रहे हो, हम देख सकते हैं; इसलिए तुम्हारा पाप बना हुआ है। 



दसवाँ अध्याय। 


१ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, वो जो द्वार में से भेड़-शाला में प्रवेश नहीं करता है, बल्कि किसी दूसरे रस्ते से ऊपर चढ़ कर आता है, वही एक चोर और डकैत है। 

२ परन्तु वो जो द्वार में से अन्दर प्रवेश करता है, वही भेड़ों का चरवाहा है। 

३ उसी के लिए द्वारपाल द्वार खोलता है; और वो भेड़ें उसकी वाणी सुनते हैं: और वो अपने भेड़ों को नाम से पुकारता है, और उन्हें बाहर ले जाता है। 

४ और जब वो अपने भेड़ों को बाहर लाता है, तो वो उनके आगे-आगे जाता है, और उसके भेड़ें उसके पीछे-पीछे चलते हैं: क्योंकि वो उसकी वाणी पहचानते हैं। 

५ वो किसी परदेशी के पीछे-पीछे नहीं जाएँगे, बल्कि वो उस परदेशी से दूर भाग जाएँगे: क्योंकि वो परदेशियों की वाणी नहीं पहचानते। 

६ यीशु ने यह दृष्टान्त उनसे बोला: परन्तु उन्हें समझ में नहीं आया कि वो बातें क्या थीं जो उन्होंने उनसे बोली थीं। 

७ तब यीशु ने पुनः उनसे कहा, मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, मैं ही भेड़ों का द्वार हूँ। 

८ वो सभी जो मुझ से पहले आए चोर और डकैत हैं: परन्तु भेड़ों ने उन्हें नहीं सुना। 

९ मैं ही वो द्वार हूँ: मेरे द्वारा यदि कोई भी व्यक्ति अन्दर प्रवेश करेगा, वही बच जाएगा, और वो अन्दर-बाहर जाएगा, और चरनभूमि पा लेगा। 

१० चोर तो आता है बस केवल चुराने, और मार डालने, और नष्ट करने: मैं आया हूँ ताकि वो जीवन पा लें, और कि वो उसे बृहत्तता से पा लें। 

११ मैं हूँ वो अच्छा चरवाहा: अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिए अपना जीवन अर्पित करता है। 

१२ परन्तु वो जो भाड़े का कामगार है, जो चरवाहा नहीं है, जिसके स्वयं के भेड़ नहीं हैं, वही भेड़िए को आते देख, भेड़ों को छोड़ कर भाग जाता है: और वो भेड़िया भेड़ों को पकड़ लेता है, और उन्हें तितर-बितर कर देता है। 

१३ वो भाड़े का कामगार भाग जाता है, क्योंकि वो भाड़े का है, और वो भेड़ों की चिंता नहीं करता। 

१४ मैं हूँ वो अच्छा चरवाहा, और मैं अपने भेड़ों से परिचय रखता हूँ, और मैं अपनो का परिचित हूँ। 

१५ जिस प्रकार पिताश्री मुझ से परिचित हैं, उसी प्रकार ही मैं पिताश्री से परिचित हूँ: और मैं भेड़ों के लिए अपना जीवन अर्पित करता हूँ। 

१६ और मेरे पास अन्य भेड़ें भी हैं, जो इस भेड़-शाला के नहीं हैं: उन्हें भी मुझे अवश्य लाना है, और वो मेरी वाणी सुनेंगे; और एक ही भेड़-शाला होगी, और एक ही चरवाहा। 

१७ इसलिए मेरे पिताश्री मुझ से प्रेम करते हैं, क्योंकि मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ, ताकि मैं उसे पुनः प्राप्त कर लूँ। 

१८ कोई भी व्यक्ति उसे मुझ से नहीं लेता है, बल्कि मैं ही उसे अपनी ओर से अर्पित कर रहा हूँ। मेरे पास शक्ती है उसे अर्पित करने की, और मेरे पास शक्ती है उसे पुनः प्राप्त कर लेने की। ये आदेश मैंने अपने पिताश्री से ग्रहण किया है। 

१९ इसलिए यहूदियों के बीच पुनः इन कथनों के कारण विभाजन हो गया। 

२० और उन में से कईयों ने कहा, भई इस में तो एक दानव है, और ये तो पागल है; तुम क्यों सुन रहे हो इसे?

२१ औरों ने कहा, ये शब्द उसके नहीं हैं जिस में दानव हो? क्या कोई दानव नेत्रहीन के नेत्र खोल सकता है क्या?

२२ और यरूशलेम में समर्पण-भोज का अवसर था, और शीत ऋतु थी। 

२३ और यीशु मन्दिर में सुलेमान के बराम्दे में चल रहे थे। 

२४ तब यहूदियों ने आकर उन्हें घेर लिया, और उनसे कहा, तुम हमें और कितने समय तक दुविधा में रखोगे भई? यदि तुम मसीहा हो, तो हमें स्पष्टता से बता दो। 

२५ यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, मैंने तुम्हें बता दिया है, और तुम ने विश्वास नहीं किया: वो कार्य जो मैं अपने पिताश्री के नाम में कर रहा हूँ, वही मेरा साक्ष्य देते हैं। 

२६ परन्तु तुम विश्वास नहीं करते, क्योंकि तुम मेरे भेड़ों में से नहीं हो, जैसा कि मैंने तुम से कहा है। 

२७ मेरे भेड़ मेरी वाणी सुनते हैं, और मैं उनसे परिचित हूँ, और वो मेरे पीछे-पीछे आते हैं:

२८ और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ; और उनका कभी भी नाश नहीं होगा, न ही कोई भी उन्हें मेरे हाथ में से बाहर छीनेगा।  

२९ मेरे पिताश्री, जिन्होंने मुझे इन्हें दिया है, सभी से महान हैं; और न ही कोई भी इन्हें मेरे पिताश्री के हाथ में से बाहर छीनने में सक्षम है। 

३० मैं और मेरे पिताश्री एक हैं। 

३१ तब उन यहूदियों ने यीशु पर पथराव करने के लिए पुनः पत्थर उठा लिए। 

३२ तो यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, मैंने तुम्हें अपने पिताश्री द्वारा कई अच्छे कार्य दिखाए हैं; उन में से कौन से कार्यों के लिए तुम मुझ पर पथराव कर रहे हो?

३३ तो उन यहूदियों ने उन्हें उत्तर दिया कहते हुए, किसी अच्छे कार्य के लिए हम तुझ पर पथराव नहीं कर रहे हैं; बल्कि ईश्वर-निंदा के लिए; और चूँकि तू मनुष्य होता हुआ स्वयं को ईश्वर बना रहा है। 

३४ यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, क्या ये तुम्हारे नियम में नहीं लिखा हुआ है, मैंने कहा, तुम ईश्वर-गण हो?

३५ तो अब यदि उसने उन्हें ईश्वर-गण पुकारा, जिसे ईश्वर का शब्द आया, और शास्त्र अमान्य नहीं ठहराया जा सकता;

३६ तो तुम उसके विषय में कह रहे हो, कि तू ईश्वर-निंदा कर रहा है, जिसे पिताश्री ने पुनीत ठहरा कर संसार में भेज दिया है; क्योंकि मैंने कहा, मैं ईश्वर का पुत्र हूँ?

३७ यदि मैं अपने पिताश्री के कार्य नहीं कर रहा हूँ, तो मुझ पर विश्वास मत करो। 

३८ परन्तु यदि मैं उन्हें कर रहा हूँ, भले ही तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते हो, उन कार्यों पर तो विश्वास कर लो: ताकि तुम जान लो, और विश्वास कर लो, कि पिताश्री मुझ ही में हैं, और मैं उन्हीं में। 

३९ इसलिए वो पुनः उन्हें पकड़ लेना चाहते थे: परन्तु वो उनके हाथों से बच निकले,

४० और वह पुनः यर्दन पार उसी स्थान चले गए जहाँ योहन सबसे पहले बपतिस्मा किया करता था; और वो वहीं ठहरे रहे। 

४१ और कई लोग उनके पास एकत्रित हुए, और उन्होंने कहा, भई योहन ने तो कोई भी चमत्कार नहीं किया: परन्तु वो सभी बातें जो योहन ने इन पुरुष के विषय में बोली थीं, सच्ची थीं। 

४२ और कईयों ने वहीं यीशु पर विश्वास कर लिया। 




ग्यारहवाँ अध्याय। 


१ अब मरियम और उसकी बहन मार्था के नगर बेतनियाह का एक कोई लाज़र नामक व्यक्ति बीमार था। 

२ (यह वही मरियम थी जिसने प्रभु का विलेपन मरहम से किया था, और उसने उनके चरण अपने बालों से पोंछे थे, जिसका भाई लाज़र बीमार था।)

३ इसलिए उन बहनों ने उन्हें कहलवा भेजा, प्रभु देख लीजिए, जिस से आप प्रेम करते हैं वो तो बीमार है। 

४ जब यीशु ने यह सुना, तो उन्होंने कहा, यह बीमारी मृत्यु पर्यत नहीं है, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिए, ताकि ईश्वर का पुत्र इस से गौरव प्राप्त करे। 

५ अब यीशु, मार्था, और उसकी बहन, और लाज़र से प्रेम करते थे। 

६ इसलिए जब उन्होंने सुना कि वो बीमार था, उन्होंने दो दिन और उसी स्थान में निवास किया, वहीं, जहाँ वो थे। 

७ तब उसके उपरान्त वो अपने शिष्यों से कहते हैं, हम पुनः यहूदा चले जाते हैं। 

८ उनके शिष्य उनसे कहते हैं, रैबाय जी, अभी-अभी तो यहूदी आप पर पथराव कर देने की सोच में थे, और आप पुनः वहीं जा रहे हैं?

९ यीशु ने उत्तर दिया, क्या दिन में बारह घण्टे नहीं होते क्या? यदि कोई व्यक्ति दिन में चलता है, तो वो ठोकर नहीं खाता, क्योंकि वो इस संसार के उजाले को देखता है। 

१० परन्तु यदि कोई रात में चलता है, तो वो ठोकर खा जाता है, क्योंकि उस में कोई उजाला नहीं है। 

११ यह बातें उन्होंने कहीं: और उसके उपरान्त वो उनसे कहते हैं, हमारा मित्र लाज़र सो रहा है; परन्तु मैं जा रहा हूँ, ताकि मैं  उसे नींद से जगा दूँ। 

१२ तब उनके शिष्यों ने कहा, प्रभु जी, यदि वो सो रहा है, तो वो तो भला-चंगा हो जाएगा जी। 

१३ किन्तु यीशु उसकी मृत्यु के विषय में बोल रहे थे: परन्तु उन्होंने सोचा कि उन्होंने नींद के विश्राम के विषय में बोला था। 

१४ तब यीशु ने उनसे स्पष्टता से कहा, लाज़र मर चुका है। 

१५ और मैं तुम्हारे वास्ते प्रसन्न हूँ कि मैं वहाँ नहीं था, इस आशय से, कि तुम विश्वास कर सको; तथापि हमें उसके पास चले जाना चाहिए। 

१६ तब थोमस ने, जो दिदिमुस कहलाया जाता है, उसने अपने साथी शिष्यों से कहा, हम भी जाते हैं, ताकि हम इनके साथ ही मर जाएँ। 

१७ तो जब यीशु आ पहुँचे थे, तो उन्हें पता चला कि लाज़र को तो अब कब्र में लेटे हुए चार दिन बीत चुके थे। 

१८ अब बेतनियाह यरूशलेम के निकट था, लगभग पन्द्रह फरलौंग दूर;

१९ और यहूदियों में से कई मार्था और मरियम के पास आए हुए थे, उन्हें उनके भाई के समबन्ध में सान्त्वना देने। 

२० तब यीशु के आगमन के विषय में सुनते ही, मार्था गई और उनसे मिली: परन्तु मरियम अभी घर में ही बैठी रही। 

२१ तब मार्था ने यीशु से कहा, प्रभु जी, यदि आप यहाँ होते, तो मेरे भाई की मृत्यु न हुई होती। 

२२ परन्तु मैं जानती हूँ, यहाँ तक कि अभी भी, जो कुछ भी आप ईश्वर से माँगेंगे, ईश्वर उसे आपको प्रदान कर देंगे। 

२३ यीशु उस से कहते हैं, तुम्हारा भाई पुनः उठेगा। 

२४ मार्था उनसे कहती है, मैं जानती हूँ कि वो अन्तिम दिन पर पुनरुत्थान में पुनः उठेगा जी। 

२५ यीशु उस से कहते हैं, मैं ही वो पुनरुत्थान हूँ, और वो जीवन: वो जो मुझ में विश्वास करता है, भले ही वो मृत हो, तब भी वो जिएगा:

२६ और जो कोई भी जीता है, और मुझ में विश्वास करता है, कभी भी नहीं मरेगा। क्या तुम यह विश्वास करती हो?

२७ वो उनसे कहती है, जी हाँ, प्रभु जी: मैं विश्वास करती हूँ कि आप ही मसीहा हैं, ईश्वर के पुत्र, जिन्हें संसार में आना है। 

२८ और ऐसा कह कर, वो अपने पथ पर चली गई, और उसने मरियम अपनी बहन को चुपके से बुलाया, कहते हुए, गुरुवर पधार गए हैं, और तुम्हें बुला रहे हैं। 

२९ अब यह सुनते ही मरियम शीघ्रता से उठी, और उनके पास आ गई। 

३० अब यीशु ने अभी तक उस नगर में प्रवेश नहीं किया था, बल्कि वह उसी स्थान में थे जहाँ मार्था उनसे मिली थी। 

३१ अब वो यहूदी जो उसके साथ घर में ही थे, और उसे सांत्वना दे रहे थे, जब उन्होंने मरियम को देखा, कि वो शीघ्रता से उठ कर बाहर चली गई थी, तो वो भी उसी के पीछे-पीछे चल दिए, कहते हुए, ये तो कब्र पर रोने जा रही है। 

३२ तब जब मरियम वहाँ पहुँच गई थी, जहाँ यीशु थे, तो उसने उन्हें देखा, और वो उनके चरणों में गिर पड़ी, उनसे कहती हुई, प्रभु जी, यदि आप यहाँ होते, तो मेरे भाई की मृत्यु न हुई होती।

३३ इसलिए जब यीशु ने उसे रोता हुआ, और उसके साथ पधारे यहूदियों को भी रोते हुए देखा, तो वो अपने प्राण में कराह उठे, और व्याकुल हो गए,

३४ और उन्होंने कहा, कहाँ लिटाया है तुम ने उसे? उन्होंने उनसे कहा, प्रभु, आएँ और देख लें जी। 

३५ यीशु रो पड़े। 

३६ तब यहूदियों ने कहा, देखो तो, यह कैसे उस से प्रेम करता था!

३७ और उन में से कुछों ने कहा, क्या ये व्यक्ति, जिसने उस नेत्रहीन की आँखे खोल दी थीं, ये नहीं कर सकता था, कि ये व्यक्ति मरता नहीं?

३८ इसलिए पुनः स्वयं में कराहते हुए, यीशु कब्र पर आ जाते हैं। वो एक गुफा थी, और उस पर एक पत्थर लिटाया हुआ था। 

३९ यीशु ने कहा, इस पत्थर को हटा दो, मार्था उस मृत की बहन उनसे कहती है, प्रभु जी, अब तक तो उस में से दुर्गंध आती होगी: क्योंकि उसे तो मरे हुए चार दिन बीत चुके हैं!

४० यीशु उस से कहते हैं, कहा नहीं था क्या मैंने तुमसे, कि, यदि तुम विश्वास करोगी, तुम ईश्वर की महिमा देख लोगी?

४१ तब उन जनो ने उस पत्थर को वहाँ से हटा दिया जहाँ वो मृत लेटा हुआ था। और यीशु ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं, और कहा, हे पिताश्री, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे सुन लिया है। 

४२ और मैं जानता था कि आप मुझे सदैव सुनते हैं: परन्तु इन लोगों के कारण जो आस-पास खड़े हैं, मैंने यह बोला, ताकि यह विश्वास कर लें कि आप ही ने मुझे भेजा है। 

४३ और जब उन्होंने ऐसा बोल दिया था, तो वो एक प्रबल वाणी से चीखे, लाज़र, बाहर आ जाओ। 

४४ और वो जो मृत था बाहर निकल आया, उसके हाथ और पैर दफ़्न के कपड़ों में बँधे हुए: और उसका चेहरा एक रूमाल से लिपटा हुआ। यीशु उनसे कहते हैं, इसे खोल दो, और इसे जाने दो। 

४५ तब मरियम के पास आए हुए उन यहूदियों में से कईयों ने उन पर विश्वास कर लिया, उन कार्यों को देख लेने पर, जो यीशु ने किए थे। 

४६ परन्तु उन में से कुछ अपने पथों पर फैरिसियों के पास चले गए, और उन्हें बताया कि यीशु ने क्या-क्या कार्य किए थे। 

४७ तब प्रमुख पुरोहितों और फैरिसियों ने एक परिषद-मण्डली एकत्रित की, और कहा, अब हम क्या करें भई? क्योंकि ये आदमी तो कई चमत्कार कर रहा है। 

४८ यदि हम इसे इसी प्रकार अकेला छोड़ देंगे, तो सभी लोग इस पर विश्वास कर लेंगे: और रोम-गण आएँगे, और दोनो हमारा स्थान, और हमारा राष्ट्र ले लेंगे। 

४९ और उन में से काइफा नामक एक ने, जो उसी वर्ष उच्च पुरोहित था, उनसे कहा, भई तुम तो कुछ भी नहीं जानते हो,

५० न ही यह विचार कर रहे हो, कि हमारे लिए यह लाभकारी है, कि एक ही व्यक्ति लोगों के वास्ते मरे, और न कि सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश हो।  

५१ और यह उसने अपनी ओर से नहीं बोला: परन्तु उस वर्ष उच्च पुरोहित होता हुआ, उसने प्रेरित-उपदेश दिया कि यीशु को उस राष्ट्र के वास्ते मरना होगा; 

५२ और न केवल उस राष्ट्र के लिए ही, बल्कि वो बाहर बिखरी हुई ईश्वर की सन्तानों का भी एक ही गुट में एक साथ संग्रहण कर लेंगे। 

५३ तब उस दिन से लेकर उन्होंने यीशु को मृत्युदण्ड दिलवा देने का एक साथ परामर्श किया। 

५४ इसलिए यीशु यहूदियों के बीच सरे आम नहीं चल-फिर रहे थे; बल्कि वो वहाँ से जँगली-क्षेत्र के निकट के प्रदेश में चले गए, एक नगर में जो एफ्रैम कहलाया जाता है, और वो वहीं अपने शिष्यों के साथ रहे। 

५५ और यहूदियों का पार-करना निकट ही था: और कई प्रदेश से बाहर निकल कर पार-करने से पहले ऊपर यरूशलेम जा रहे थे, स्वयं का शूद्धीकरण करने। 

५६ तब वो यीशु को ढूँढने लगे, और मन्दिर में खड़े होकर आपस में बोल रहे थे, भई क्या सोचते हो तुम, क्या वो भोज के अवसर पर नहीं आएँगे क्या?

५७ अब दोनो, प्रमुख पुरोहितों ने, और फैरिसियों ने एक आदेश दे दिया था, कि यदि कोई भी ये जानता हो, कि यीशु कहाँ थे, तो उसे ये बता देना था, ताकि वो उन्हें पकड़ लें।  




बारहवाँ अध्याय। 


१ तब पार-करने के भोज से छह दिन पूर्व, यीशु बेतनियाह चले आए, जहाँ लाज़र था, जो मर गया था, जिसे उन्होंने मृतकों में से उठा दिया था। 

२ वहीं उन्होंने उनके लिए एक रात्रि-भोज बनाया; और मार्था परोस रही थी: परन्तु लाज़र उन में से एक था जो उनके साथ मेज़ पर बैठा हुआ था। 

३ तब मरियम ने अति मूल्यवान शुद्ध जटामांसी की मरहम का एक लितरा लिया, और उसने यीशु के चरण उस से विलेपित कर दिए, और अपने बालों से उनके चरण पोंछ दिए: और वो घर उस मरहम की सुगन्ध से भर उठा था। 

४ तब उनके शिष्यों में से एक, सिमोन का बेटा यूदस इस्करियोती, जो उन्हें पकड़वाने पर था, कहने लगा, 

५ भई ये मरहम तीन सौ चाँदी दीनारों के लिए बेच कर, दरिद्रों को क्यों नहीं दे दी गई?

६ यह उसने इसलिए नहीं कहा, क्योंकि वो दरिद्रों की चिंता करता था; बल्कि इसलिए क्योंकि वो एक चोर था, और उसके पास थैली रहती थी, और वो उसे सम्भालता था, जो कुछ भी उस में डाला जाता था। 

७ तब यीशु ने कहा, इस स्त्री को अकेला छोड़ दो: इसने यह मेरे दफ़्न के दिन को रखने के लिए किया है। 

८ क्योंकि दरिद्र तो तुम्हारे साथ सर्वदा रहते हैं; परन्तु मैं तुम्हारे साथ सर्वदा नहीं रहूँगा।

९ इसलिए यहूदियों में से कई लोग यह जान गए थे कि वो वहीं थे: और वो न केवल यीशु के वास्ते ही आए थे, बल्कि इसलिए भी ताकि वो लाज़र को भी देख सकें, जिसे उन्होंने मृतकों में से उठा दिया था।  

१० परन्तु प्रमुख पुरोहितों ने परामर्श किया कि वो लाज़र को भी मृतुदण्ड दिलवा दें;

११ क्योंकि उसके कारण कई यहूदियों ने परे हटकर, यीशु पर विश्वास कर लिया था। 

१२ अगले दिन जब भोज के लिए पधारे कई लोगों ने सुना कि यीशु यरूशलेम में पधार रहे थे,

१३ तो उन्होंने खजूर के पेड़ों की डालियाँ ले लीं, और वो उनसे मिलने बाहर निकल पड़े, और चीखे, होसैना: धन्य हैं इस्राएल के राजा जो प्रभु के नाम में आ रहे हैं। 

१४ और जब यीशु ने एक युवा-गधा ढूँढ लिया था, तो वो उस पर सवार हो गए; जैसा कि लिखा हुआ है,

१५ डरो मत सियोन की बेटी: देखो, तुम्हारा राजा आ रहा है, एक गधे के शावक पर सवार। 

१६ यह बातें उनके शिष्यों को पहले समझ में नहीं आईं: परन्तु जब यीशु का महिमामण्डन हो चुका था, तब उन्होंने स्मरण किया कि यह बातें उन्हीं के विषय में लिखी गई थीं, और कि यह कार्य उन्होंने उनके प्रति किए थे। 

१७ तब उन लोगों ने, जो यीशु के साथ थे जब उन्होंने लाज़र को कब्र में से बाहर बुलाया था, और उसे मृतकों में से उठा दिया था, साक्ष्य दिया,

१८ तो इस कारण भी लोग यीशु से मिले, क्योंकि उन्होंने सुना कि उन्होंने यह चमत्कार किया था।

१९ इसलिए फैरिसियों ने आपस में कहा, आभास नहीं कर पा रहे हो तुम, कि तुम कुछ भी लाभकारी नहीं कर पाए हो? देख लो भई, सारा जगत इस के पीछे-पीछे चल दिया है!

२० और उनके बीच कुछ यूनानी लोग थे जो भोज के अवसर पर उपासना करने आए थे:

२१ वही इसलिए फिलिप के पास आए, जो गलील के बेतसैदा से था, और उन्होंने उस से इच्छा व्यक्त की यह कहते हुए, श्रीमान, हम यीशु से मिलना चाहते हैं। 

२२ फिलिप आकर अन्द्रेयास को बताता है: और पुनः अन्द्रेयास और फिलिप यीशु को बताते हैं। 

२३ और यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कहते हुए, वो घड़ी आ गई है, कि मनुष्य-पुत्र का महिमामण्डन किया जाएगा।

२४ मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, सिवाय कि गेहूँ का एक दाना धरती में गिर कर मरे, वो अकेला ही रहता है; परन्तु यदि वो मर जाता है, तो वो बहुत सारा फल उत्पन्न करता है। 

२५ वो जो अपने जीवन से प्रेम करता है, वही उसे खो देगा; और वो जो इस संसार में अपने जीवन से घृणा करता है, वही उसे जीवन अनन्त तक सुरक्षित रख लेगा। 

२६ यदि कोई भी व्यक्ति मेरी सेवा करता है, उसे मेरा अनुयायी बन जाने दो; और जहाँ मैं हूँ, वहीं मेरा नौकर भी होगा: यदि कोई भी व्यक्ति मेरी सेवा करता है, उसी का मेरे पिताश्री आदर करेंगे। 

२७ अब मेरा आत्मा विचलित है; और मैं क्या कहूँ? पिताश्री, मुझे इस घड़ी से बचा लें: परन्तु इसी कारण वश ही तो मैं इस घड़ी तक आया हूँ। 

२८ पिताश्री, आप अपने नाम को महिमामण्डित कर दें। तब स्वर्ग से एक आकाशवाणी आई, कहती हुई, मैंने उसे महिमामण्डित कर दिया है, और मैं उसे पुनः महिमामण्डित करूँगा। 

२९ वहीं खड़े लोगों ने यह सुन कर कहा, कि गर्जन हुई: औरों ने कहा, कि कोई दूत यीशु से बोला। 

३० यीशु ने उत्तर दिया और कहा, यह वाणी मेरे कारण नहीं, बल्कि तुम्हारे वास्ते आई है। 

३१ अब है इस संसार का न्याय-निर्धारण: अब इस संसार का शासक बाहर फैंक दिया जाएगा। 

३२ और मैं, यदि मैं पृथ्वी पर से ऊपर उठा दिया जाऊँ, मैं समस्त लोगों को अपने पास खींचूँगा। 

३३ उन्होंने यह कह कर संकेत दिया, कि वो किस प्रकार की मृत्यु से मरेंगे। 

३४ उन लोगों ने उन्हें उत्तर दिया, हमने नियम में से सुना है कि मसीहा सदैवत्व के लिए रहेंगे: फिर तुम कैसे कह रहे हो कि मनुष्य-पुत्र को अवश्य ही ऊपर उठाया जाना होगा? कौन है यह मनुष्य-पुत्र?

३५ तब यीशु ने उनसे कहा, बस थोड़े से ही समय तक यह उजाला तुम्हारे साथ है। चलो जब तक यह उजाला तुम्हारे पास है, कहिं अन्धेरा तुम पर आ पड़े: क्योंकि वो जो अन्धेरे में चलता है, जानता नहीं है कि वो कहाँ जा रहा है। 

३६ जब तक तुम्हारे पास उजाला है, विश्वास कर लो इस उजाले में, ताकि तुम इस उजाले की सन्तानें बन सको। यह बातें यीशु ने बोलीं, और प्रस्थान कर लिया, और स्वयं को उनसे छुपा लिया। 

३७ परन्तु यद्यपि उन्होंने उनके समक्ष इतने सारे चमत्कार कर दिए थे, तब भी उन लोगों ने उन पर विश्वास नहीं किया:

३८ ताकि पैग़म्बर यशायाह का कथन पूर्ण हो जाए, जो उसने बोला था, प्रभु जी, हमारी आख्या पर किसने विश्वास किया है? और प्रभु का बाहुबल किसे प्रत्यक्षित किया गया है?

३९ इसलिए वो विश्वास नहीं कर सके, क्योंकि यशायाह ने पुनः कहा,

४० उन्होंने उनके नेत्र नेत्रहीन बना दिए हैं, और उनका हृदय कठोर कर दिया है; ताकि वो अपने नेत्रों से देखें न, न ही अपने हृदय से समझें, और वापस लौट आएँ, और मैं उन्हें स्वस्थ कर दूँ। 

४१ यह बातें यशायाह ने तब कही थीं, जब उसने उनकी महिमा देखी थी, और वो उनके विषय में बोला था।  

४२ तब भी प्रमुख अध्यक्षों के बीच कईयों ने उन पर विश्वास कर लिया था; परन्तु फैरिसियों के कारण इन्होंने उन्हें स्वीकृति नहीं दी, कहिं उन्हें यहूदी-आराधनालय से निष्कासित न कर दिया जाए:

४३ क्योंकि यह लोग ईश्वर की प्रशंसा की बजाय लोगों की प्रशंसा से अधिक प्रेम करते थे। 

४४ यीशु चीखे और कहा, वो जो मुझ पर विश्वास करता है, मुझ पर नहीं, बल्कि उन पर विश्वास करता है जिन्होंने मुझे भेजा है। 

४५ और वो जो मुझे देखता है, उन्हें देखता है जिन्होंने मुझे भेजा है। 

४६ मैं इस संसार में एक उजाला आया हूँ, ताकि जो कोई भी मुझ पर विश्वास करता है, अन्धकार में निवास नहीं करेगा। 

४७ और यदि कोई भी व्यक्ति मेरे शब्दों को सुन कर विश्वास नहीं करता है, मैं उसका न्याय नहीं करता: क्योंकि मैं इस संसार का न्याय करने नहीं, बल्कि इस संसार को बचाने आया हूँ। 

४८ वो जो मुझे अस्वीकार करता है, और मेरे शब्दों को ग्रहण नहीं करता है, उसके पास एक है जो उसका न्याय-निर्धारण करता है: वो शब्द ही जो मैंने बोला है, वही उसका अन्तिम दिन में न्याय कर देगा। 

४९ क्योंकि मैंने अपनी ओर से नहीं बोला है; बल्कि पिताश्री जिन्होंने मुझे भेजा है, उन्हीं ने मुझे एक आदेश दिया था कि मैं क्या कहूँ, और कि मैं क्या बोलूँ। 

५० और मैं जानता हूँ कि उनका आदेश अनंतकाल जीवन है: इसलिए मैं जो कुछ भी कहता हूँ, जैसा मेरे पिताश्री ने मुझ से कहा है, मैं वैसा ही कहता हूँ। 




तेरहवाँ अध्याय। 



१ अब पार-करने के भोज से पहले, जब यीशु जानते थे कि उनकी इस संसार से विदाई लेकर पिताश्री तक पहुँचने की घड़ी आ चुकी थी, अपने ही अपनों से प्रेम कर जो संसार में थे, उन्होंने उन से अन्त तक प्रेम किया। 

२ और दानव द्वारा, सिमोन के बेटे यूदस इस्करियोती के हृदय में, उनके साथ विश्वासघात करने के विचार को डाले जाने के पश्चात, जब रात्रि-भोज समाप्त हो चुका था,

३ यीशु यह जानते हुए कि पिताश्री ने सब कुछ उनके हाथों में प्रदान कर दिया था, और कि वो ईश्वर से आए थे, और ईश्वर के पास ही जा रहे थे; 

४ तो वो रात्रि-भोज से उठते हैं, और अपने वस्त्र परे लिटा कर; एक तौलिया लेते हैं, और अपनी कमर कस लेते हैं। 

५ इसके पश्चात वो एक पात्र में पानी उँडेलते हैं, और शिष्यों के पैरों को धोना, और उन्हें उस तौलिए से पौंछना आरम्भ कर देते हैं, जिस से उन्होंने अपनी कमर को कसा हुआ था। 

६ तब वो सिमोन पतरस के पास आते हैं: और पतरस उन से कहता है, प्रभु जी, क्या आप मेरे पैर धोएँगे? 

७ यीशु ने उसे उत्तर दिया और कहा, जो मैं कर रहा हूँ, तुम उसे अभी नहीं समझ पा रहे हो; परन्तु तुम इसके पश्चात समझ जाओगे। 

८ पतरस उन से कहता है, आप मेरे पैर कभी नहीं धोएँगे जी। यीशु ने उसे उत्तर दिया, यदि मैं तुम्हें नहीं धोता हूँ, तो मेरे साथ तुम्हारा कोइ भाग नहीं है। 

९ सिमोन पतरस उनसे कहता है, प्रभु, मेरे पैर ही नहीं, बल्कि मेरे हाथ और मेरा सर भी धो दें जी। 

१० यीशु उस से कहते हैं, वो जो धुल चुका है, उसे अपने पैरों के सिवा और कुछ भी धोने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वो पूर्णतः स्वच्छ है: और तुम स्वच्छ हो, परन्तु तुम सब-के-सब नहीं। 

११ क्योंकि वह जानते थे कि कौन उनके साथ विश्वासघात करेगा; इसलिए उन्होंने कहा, तुम सब-के-सब स्वच्छ नहीं हो। 

१२ तो उनके पैरों को धो लेने के पश्चात, और जब उन्होंने अपने वस्त्र ले लिए थे, और वो पुनः नीचे बैठ गए थे, तो उन्होंने उन से कहा, तुम जानते हो कि मैंने तुम्हारे साथ क्या किया है?

१३ तुम मुझे गुरुवर और प्रभु पुकारते हो: और तुम भला कहते हो; क्योंकि मैं वही हूँ। 

१४ तो फिर यदि मैंने, तुम्हारे प्रभु और गुरुवर ने, तुम्हारे पैर धो दिए हैं; तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैरों को धोना चाहिए। 

१५ क्योंकि मैंने तुम्हें एक उदाहरण दिया है, कि तुम भी वैसा ही करो जैसा मैंने तुम्हारे साथ किया है। 

१६ मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि नौकर अपने प्रभु से बढ़कर नहीं है; न ही जो भेजा गया है भेजने वाले से बढ़कर है। 

१७ यदि तुम यह बातें जानते हो, तो खुश हो तुम यदि तुम इन्हें करते हो।  

१८ मैं तुम सभी के विषय में नहीं बोल रहा हूँ: मुझे पता है मैंने किसे चुना है: बल्कि ताकि शास्त्र पूर्ण हो जाए, वो जो मेरे साथ रोटी खा रहा है, उसी ने मेरे विरुद्ध अपनी एड़ी उठा ली है। 

१९ अब मैं तुम्हें उसकी होनी से पहले ही बता रहा हूँ, ताकि जब उसकी होनी घट चुकेगी, तुम विश्वास कर लो कि मैं वही हूँ। 

२० मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, वो जो मेरे द्वारा भेजे हुए किसी भी व्यक्ति को ग्रहण करता है, मुझे ग्रहण करता है; और वो जो मुझे ग्रहण करता है, उन्हें ग्रहण करता है जिन्होंने मुझे भेजा है। 

२१ जब यीशु ने ऐसा कह दिया था, तो वो प्राण में व्याकुल हो उठे, और साक्ष्य दिया, और कहा, मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, कि तुम में से एक मेरे साथ विश्वासघात करेगा। 

२२ तब उन शिष्यों ने एक दूसरे को यह शंका करते हुए देखा, कि यीशु ने यह किस के विषय में बोला था। 

२३ अब उनके शिष्यों में से एक यीशु की छाती की ओर झुका हुआ था, जिस से यीशु प्रेम करते थे। 

२४ सिमोन पतरस ने इसलिए उसकी ओर संकेत किया, ताकि वो उनसे पूछ ले कि वो कौन होगा, जिसके विषय में उन्होंने यह बोला था। 

२५ तो वो यीशु की छाती की ओर झुकता हुआ उनसे कहता है, प्रभु जी, कौन है वो?

२६ यीशु ने उत्तर दिया, वो वही है, जिसे मैं रोटी का एक टुकड़ा डुबो कर दूँगा। और जब उन्होंने वो रोटी का टुकड़ा डुबो दिया था, तो उन्होंने उसे सिमोन के बेटे यूदस इस्करियोती को दे दिया। 

२७ और उस रोटी के टुकड़े के पश्चात शैतान ने उस में प्रवेश कर लिया। तब यीशु ने उस से कहा, वो जो तुम कर रहे हो, शीघ्रता से कर दो। 

२८ अब उस मेज़ पर किसी भी व्यक्ति को नहीं पता था कि उन्होंने यह उस से किस आशय से बोला था। 

२९ क्योंकि यूदस के पास थैली रहती थी, इसलिए उन में से कुछों ने सोचा कि यीशु ने उस से कहा था, उन वस्तुओं को खरीद लो जिनकी हमें भोज के लिए आवश्यकता है; या, कि वो कुछ दरिद्रों को प्रदान कर दे। 

३० तो वो उस रोटी के टुकड़े को ग्रहण कर लेने पर तुरँत ही बाहर चला गया: और रात्रि का समय था। 

३१ इसलिए, जब वो बाहर चला जा चुका था, तो यीशु ने कहा, अब मनुष्य-पुत्र महिमामण्डित है, और ईश्वर उसी में महिमामण्डित हैं। 

३२ यदि ईश्वर उस में महिमामण्डित हैं, तो ईश्वर उसे अपने स्वयं में ही महिमामण्डित कर देंगे, और वो उसे तुरन्त ही महिमामण्डित कर देंगे। 

३३ नन्हें बच्चों, बस कुछ ही समय तक मैं तुम्हारे साथ हूँ। तुम मुझे ढूँढोगे: और जैसा मैंने यहूदियों से कहा था, जहाँ मैं जा रहा हूँ, तुम वहाँ नहीं आ सकते; यही अब मैं तुम से कहता हूँ। 

३४ एक नवीन आदेश मैं देता हूँ तुम्हें, कि तुम एक दूसरे से प्रेम करो; जैसे मैंने तुम्हारे साथ प्रेम किया है, कि तुम भी एक दूसरे से प्रेम करो। 

३५ इस से सभी लोग जान जाएँगे कि तुम मेरे शिष्य हो, यदि तुम एक दूसरे के प्रति प्रेम रखोगे।  

३६ सिमोन पतरस ने उन से कहा, प्रभु, आप कहाँ जा रहे हैं जी? यीशु ने उसे उत्तर दिया, जहाँ मैं जा रहा हूँ, तुम अभी मेरे पीछे-पीछे नहीं आ सकते; परन्तु बाद में तुम मेरे पीछे-पीछे आ जाओगे। 

३७ पतरस ने उन से कहा, प्रभु जी, मैं आपके पीछे-पीछे अभी क्यों नहीं आ सकता? मैं तो आपके वास्ते अपना जीवन तक भी अर्पित कर दूँगा। 

३८ यीशु ने उसे उत्तर दिया, क्या तुम मेरे वास्ते अपना जीवन अर्पित कर दोगे? मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, मुर्ग़ा तब तक बाँग नहीं देगा, जब तक कि तुम मुझे तीन बार अस्वीकार नहीं कर दोगे। 





चौदहवाँ अध्याय। 



१ अपने हृदय को विचलित मत होने दो: तुम ईश्वर में विश्वास करते हो, मुझ में भी विश्वास करो। 

२ मेरे पिताश्री के घर में कई निवास-स्थान हैं: यदि ऐसा न होता, तो मैंने तुम्हें बता दिया होता। मैं तुम्हारे लिए एक स्थान उद्यत करने जा रहा हूँ।

३ और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिए एक स्थान उद्यत करूँगा, तो मैं पुनः आऊँगा, और तुम्हें अपने ही पास ग्रहण कर लूँगा; ताकि जहाँ मैं हूँ, तुम भी वहीं हो।  

४ और जहाँ मैं जा रहा हूँ तुम जानते हो, और वो पथ तुम जानते हो। 

५ थोमस उन से कहता है, प्रभु जी, हम जानते नहीं हैं कि आप कहाँ जा रहे हैं; तो हम उस पथ को कैसे जान सकते हैं? 

६ यीशु उस से कहते हैं, मैं हूँ वो पथ, वो सत्य, और वो जीवन: कोई भी व्यक्ति सिवाय मेरे द्वारा, पिताश्री के पास नहीं पहुँच सकता है। 

७ यदि तुम मुझ से परिचित होते, तुमने मेरे पिताश्री से भी परिचय कर लिया होता: और अब से लेकर तुम उन से परिचित हो, और तुमने उन्हें देख लिया है। 

८ फिलिप उन से कहता है, प्रभु जी, हमें पिताश्री दिखला दें, और यही हमारे लिए पर्याप्त होगा। 

९ यीशु उस से कहते हैं, मैं इतने समय से तुम्हारे साथ हूँ, और तब भी तुमने मुझे नहीं जाना फिलिप? जिसने मुझे देख लिया है उसी ने पिताश्री को देख लिया है; और फिर तुम कैसे कह रहे हो, हमें पिताश्री दिखला दें?

१० क्या तुम विश्वास नहीं करते हो कि मैं पिताश्री में हूँ, और पिताश्री मुझ में हैं? वो शब्द जो मैं तुम से कहता हूँ, मैं अपनी ओर से नहीं कहता: बल्कि पिताश्री जो मुझ में निवास करते हैं, वही इन कार्यों को करते हैं। 

११ विश्वास करो मेरा कि मैं पिताश्री में हूँ, और पिताश्री मुझ में हैं: अन्यथा उन्हीं कार्यों ही के वास्ते मुझ पर विश्वास कर लो!

१२ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, वो जो मुझ पर विश्वास करता है, जिन कार्यों को मैं करता हूँ वो भी उन्हें करेगा; और वो इनसे भी महान कार्य करेगा; क्योंकि मैं अपने पिताश्री के पास जा रहा हूँ। 

१३ और जो कुछ भी तुम मेरे नाम में माँगोगे, मैं वही कर दूँगा, ताकि पिताश्री पुत्र में महिमामण्डित हो जाएँ।  

१४ यदि तुम मेरे नाम में कुछ भी माँगोगे, मैं उसे कर दूँगा। 

१५ यदि तुम मुझ से प्रेम करते हो, तो मेरे आदेशों का पालन करो। 

१६ और मैं पिताश्री से प्रार्थना करूँगा, और वो तुम्हें एक अन्य सांत्वना-दाता दे देंगे, ताकि वो तुम्हारे साथ सदैवता तक वास करता रहे;

१७ यहाँ तक कि सत्य का ही प्राण; जिसे यह संसार ग्रहण नहीं कर सकता है, क्योंकि वो उसे देख नहीं रहा है, न ही वो उस से परिचित है: परन्तु तुम उस से परिचित हो: क्योंकि वो तुम्हारे ही साथ बसता है, और तुम्हारे ही अन्दर होगा। 

१८ मैं तुम्हें सांत्वना-रहित नहीं छोड़ूँगा: मैं तुम्हारे पास आऊँगा। 

१९ बस थोड़ी सी ही देर, और संसार मुझे अब और नहीं देखता रहेगा; परन्तु तुम मुझे देखते रहोगे: क्योंकि मैं जीता हूँ, तुम भी जीयोगे। 

२० उस दिन तुम जान जाओगे कि मैं अपने पिताश्री में हूँ, और तुम मुझ में, और मैं तुम में। 

२१ जिसके पास मेरे आदेश हैं, और वो उनका पालन करता है, वही है वो जो मुझ से प्रेम करता है: और वो जो मुझ से प्रेम करता है, उसी से मेरे पिताश्री प्रेम करेंगे, और मैं उस से प्रेम करूँगा, और मैं स्वयं को उसके प्रति प्रत्यक्ष करूँगा। 

२२ वो यूदस जो इस्करियोती नहीं था, कहता है उन से, प्रभु जी, यह कैसे है कि आप स्वयं को हमारे प्रति प्रत्यक्ष कर देंगे, परन्तु संसार के प्रति नहीं?

२३ यीशु ने उत्तर दिया और उस से कहा, यदि कोई व्यक्ति मुझ से प्रेम करेगा, वो मेरे शब्दों का पालन करेगा: और मेरे पिताश्री उस से प्रेम करेंगे, और हम उसके पास आ जाएँगे, और उसके साथ अपना बसेरा बना लेंगे। 

२४ वो जो मुझ से प्रेम नहीं करता है, मेरे कथनों का पालन नहीं करता है: और वो शब्द जो तुम सुनते हो मेरा नहीं है, बल्कि पिताश्री का है जिन्होंने मुझे भेजा है। 

२५ तुम्हारे साथ रहते-रहते मैंने यह बातें तुम से बोल दी हैं। 

२६ परन्तु वो सांत्वना-दाता, जो पवित्र-प्राण है, जिसे पिताश्री मेरे नाम में भेजेंगे, वही तुम्हें सभी बातें सिखाएगा, और सभी बातें तुम्हारी स्मृति में लाएगा, जो कुछ भी मैंने तुम से कही हैं। 

२७ तुम्हारे साथ मैं शान्ति छोड़ रहा हूँ, अपनी शान्ति मैं तुम्हें प्रदान कर रहा हूँ: जैसे संसार प्रदान करता है, वैसे नहीं मैं तुम्हें प्रदान कर रहा हूँ। अपने हृदय को व्याकुल मत होने दो, न ही उसे भयभीत होने दो। 

२८ तुमने सुन लिया है कि मैंने कैसे तुम से कहा, मैं तो जा रहा हूँ, और पुनः तुम्हारे पास आगमन कर रहा हूँ। यदि तुम मुझ से प्रेम करते, तुम हर्ष मनाते, क्योंकि मैंने कहा, मैं पिताश्री के पास जा रहा हूँ: क्योंकि मेरे पिताश्री मुझ से भी महान हैं। 

२९ और अब मैंने तुम्हें यह उसकी घटनी से पहले ही बता दिया है, ताकि जब उसकी होनी घटेगी, तो तुम विश्वास कर लो। 

३० अब से लेकर मैं तुम्हारे साथ और अधिक नहीं बोलूँगा: क्योंकि इस संसार का शासक आ रहा है, और मुझ में उसका कोई भी अन्श नहीं है। 

३१ बस ताकि संसार जान सके कि मैं पिताश्री से प्रेम करता हूँ; और जिस प्रकार पिताश्री ने मुझे आदेश दिया, उसी प्रकार मैं करता हूँ। उठो, हम चलते हैं यहाँ से। 




पंद्रहवाँ अध्याय। 


१ मैं ही वो सच्ची लता हूँ, और मेरे पिताश्री कृषक हैं। 

२ मुझ में वो प्रत्येक डाल जो फल नहीं उपजाती है, वो उसे हटा देते हैं: और वो प्रत्येक डाल जो फल उपजाती है, वो उसे छाँट कर स्वच्छ कर देते हैं, ताकि वो और भी अधिक फल उत्पन्न करे। 

३ अब तुम उस शब्द द्वारा स्वच्छ हो जो मैंने तुम से बोल दिया है। 

४ मुझ में वास करो, और मैं तुम में। जैसे डाल अपने स्वयं से फल नहीं उत्पन्न कर सकती है, सिवाय इसके कि वो लता में वास करे; न ही तुम फल उत्पन्न कर सकोगे, सिवाय कि तुम मुझ में वास करो। 

५ मैं वो लता हूँ, तुम डालें हो: वो जो मुझ में वास करता है, और मैं उस में, वही बहुत सारा फल उत्पन्न करता है: क्योंकि मेरे बिना तुम कुछ भी नहीं कर सकते हो। 

६ यदि कोई मुझ में वास नहीं करता है, तो वो एक डाली समान बाहर फैंक दिया जाता है, और सूख जाता है; और लोग उन्हें इकट्ठा कर-कर, उन्हें अग्नि में झोंक देते हैं, और वो जल जाते हैं। 

७ यदि तुम मुझ में वास करोगे, और मेरे शब्द तुम में वास करेंगे, तुम अपनी इच्छानुसार कुछ भी माँगोगे, और वही तुम्हारे लिए कर दिया जाएगा। 

८ इसी में मेरे पिताश्री महिमामण्डित हैं, कि तुम ढेर सारा फल उत्पन्न करो; इस प्रकार तुम मेरे शिष्य बनोगे। 

९ जैसे मेरे पिताश्री ने मुझ से प्रेम किया है, उसी प्रकार मैंने तुम से प्रेम किया है: बने रहो तुम मेरे प्रेम में। 

१० यदि तुम मेरे आदेशों का पालन करोगे, तो तुम मेरे प्रेम में वास करते रहोगे; जैसे मैंने अपने पिताश्री के आदेशों का पालन किया है, और मैं उनके प्रेम में वास करता हूँ। 

११ यह बातें मैंने तुम से बोली हैं, ताकि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और कि तुम्हारा आनन्द परिपूर्ण बन जाए। 

१२ यही है मेरा आदेश, कि तुम एक दूसरे से प्रेम करो, जैसे मैंने तुम से प्रेम किया है। 

१३ इस से बढ़कर प्रेम किसी के पास भी नहीं है, कि कोई अपना जीवन अपने मित्रों के लिए अर्पित कर दे। 

१४ तुम मेरे मित्र हो, यदि तुम वही करो जो कुछ भी आदेश मैं तुम्हें देता हूँ। 

१५ अब से लेकर मैं तुम्हें नौकर नहीं पुकारूँगा; क्योंकि नौकर वो नहीं जानता है जो उसका मालिक करता है: परन्तु मैंने तुम्हें मित्र पुकारा है; क्योंकि वो सभी बातें जो मैंने अपने पिताश्री से सुनी हैं, मैंने तुम्हें वो ज्ञात करा दी हैं।

१६ तुम ने मुझे नहीं चुना है, बल्कि मैंने तुम्हें चुना है, और तुम्हें विहित-नियुक्त किया है, ताकि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, और कि तुम्हारा फल बना रहे: ताकि जो कुछ भी तुम पिताश्री से मेरे नाम में माँगो, वो उसे तुम्हें प्रदान कर दें। 

१७ इन बातों का मैं तुम्हें आदेश देता हूँ, कि तुम एक दूसरे से प्रेम करो। 

१८ यदि संसार तुम से घृणा करता है, तो तुम जानते हो कि उसने तुम से पहले मुझ से घृणा की है। 

१९ यदि तुम संसार के होते, संसार अपने अपनों से प्रेम करता: परन्तु क्योंकि तुम संसार के नहीं हो, बल्कि मैंने तुम्हें संसार से बाहर चुन लिया है, इसलिए संसार तुम से घृणा करता है। 

२० वो शब्द स्मरण में लाओ जो मैंने तुम से बोला था, नौकर अपने प्रभु से बढ़कर नहीं है। यदि उन्होंने मेरा अत्याचार किया है, तो वो तुम्हारा भी अत्याचार करेंगे; यदि उन्होंने मेरा कथन रखा है, तो वो तुम्हारा भी कथन रखेंगे। 

२१ परन्तु यह सभी कार्य वो तुम्हारे साथ मेरे नाम के वास्ते करेंगे, क्योंकि वो उनसे परिचित नहीं हैं जिन्होंने मुझे भेजा है। 

२२ यदि मैं आया न होता और उनसे बोला न होता, तो उन में पाप न रहा होता: परन्तु अब उनके पास उनके पाप के लिए कोई भी बहाना नहीं है। 

२३ वो जो मुझ से घृणा करता है मेरे पिताश्री से भी घृणा करता है।  

२४ यदि मैंने उनके बीच वो कार्य नहीं किए होते जो किसी भी अन्य व्यक्ति ने नहीं किए, उन में पाप न रहा होता: परन्तु अब उन्होंने देख भी लिया है, और दोनो मुझ से और मेरे पिताश्री से घृणा भी कर ली है। 

२५ परन्तु यह होने को आया है, ताकि वो शब्द पूर्ण हो जाए जो उनके नियम में लिखा है, उन्होंने मुझ से बिन कारण घृणा की है। 

२६ परन्तु जब वो सांत्वना-दाता आ जाएगा, जिसे मैं तुम्हारे पास पिताश्री से भेजूँगा, वही सत्य का प्राण जो पिताश्री से प्रवृत होता है, वही मेरा साक्ष्य देगा:

२७ और तुम भी साक्ष्य दोगे, क्योंकि तुम मेरे साथ आरम्भ से रहे हो। 




सोलहवाँ अध्याय। 


१ यह बातें मैंने तुम से बोल दी हैं, ताकि तुम ठोकर न खाओ। 

२ वो तुम्हें यहूदी-आराधनालयों में से निष्कासित कर देंगे: हाँ भई, वो समय आ रहा है, कि जो कोई भी तुम्हें मार डालता है, सोचेगा कि वो ईश्वर की सेवा कर रहा है। 

३ और यह कार्य वो तुम्हारे साथ करेंगे, क्योंकि वो न ही पिताश्री से, और न ही मुझ से परिचित हैं।

४ परन्तु यह बातें मैंने तुम्हें बता दी हैं, ताकि जब समय आएगा, तुम स्मरण में ला सको कि मैंने इन्हें तुम्हें बता दिया था। और यह बातें मैंने तुम से आरम्भ में नहीं कही थीं, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ था। 

५ परन्तु अब मैं अपने पथ पर उनके पास जा रहा हूँ जिन्होंने मुझे भेजा है; और तुम में से कोई भी मुझ से पूछ नहीं रहा है, कहाँ जा रहें हैं आप?

६ परन्तु क्योंकि मैने यह बातें तुम से कह दी हैं, तुम्हारा हृदय शोक से भर गया है। 

७ तब भी मैं तुम से सत्य कहता हूँ; यह तुम्हारे लिए लाभदायक है कि मैं चला जाऊँ: क्योंकि यदि मैं चला नहीं जाऊँगा, तो उस सांत्वना-दाता का तुम्हारे पास आगमन नहीं होगा; परन्तु यदि मैं प्रस्थान कर लेता हूँ, तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूँगा। 

८ और जब वो आ जाएगा, तो वो संसार की पाप के विषय में, और नेकी के विषय में, और न्याय-निर्धारण के विषय में, निंदा करेगा:

९ पाप के विषय में, क्योंकि वो मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं;

१० नेकी के विषय में, क्योंकि मैं अपने पिताश्री के पास जा रहा हूँ, और तुम मुझे अब और नहीं देखोगे;

११ न्याय-निर्धारण के विषय में, क्योंकि इस संसार के शासक का न्याय-निर्धारण हो रहा है। 

१२ मेरे पास तुम से कहने के लिए अभी बहुत सी बातें हैं, परन्तु तुम उनका भार अभी नहीं उठा पाओगे। 

१३ परन्तु जब वही, वो सत्य का प्राण आ जाएगा, वही तुम्हारा समस्त सत्य में मार्गदर्शन करेगा: क्योंकि वो अपनी ओर से नहीं बोलेगा; बल्कि जो कुछ भी वो सुनेगा, वही वो बोलेगा: और वो तुम्हें आने वाली बातें बता देगा। 

१४ वही मेरा महिमामण्डन करेगा: क्योंकि वो मुझ से ग्रहण कर कर, तुम्हें वो बता देगा। 

१५ वो सभी कुछ जो पिताश्री का है, वही मेरा है: इसलिए मैंने कहा, कि वो मुझ से लेकर, तुम्हें वो बता देगा। 

१६ थोड़ी सी ही देर, और तुम मुझे नहीं देखोगे: और पुनः, थोड़ी सी ही देर, और तुम मुझे देखोगे, क्योंकि मैं पिताश्री के पास जा रहा हूँ। 

१७ तब उनके शिष्यों में से कुछों ने आपस में कहा, भई यह क्या है जो यह हम से कह रहे हैं, थोड़ी सी ही देर, और तुम मुझे नहीं देखोगे: और पुनः, थोड़ी सी ही देर, और तुम मुझे देखोगे: और, क्योंकि मैं पिताश्री के पास जा रहा हूँ?

१८ उन्होंने इसलिए कहा, यह क्या है जो यह कह रहे हैं, थोड़ी सी ही देर? हम नहीं समझ पा रहे हैं कि यह क्या कह रहे हैं?

१९ अब यीशु यह जानते थे कि वो उनसे पूछने के इच्छुक थे, और उन्होंने उनसे कहा, क्या तुम आपस में उसके विषय में पूछ-ताछ कर रहे हो कि मैंने कहा, थोड़ी सी ही देर, और तुम मुझे नहीं देखोगे: और पुनः, थोड़ी सी ही देर, और तुम मुझे देखोगे?

२० मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि तुम रोगे और शोक मनाओगे, परन्तु यह संसार हर्ष मनाएगा: और तुम शोकार्तित होने लगोगे, परन्तु तुम्हारा शोक प्रसन्नता में परिवर्तित हो जाएगा। 

२१ एक स्त्री, जब वो प्रसव में होती है, शोक मनाती है, क्योंकि उसकी घड़ी आ गई है: परन्तु जैसे ही वो बच्चे को जन्म दे देती है, वो अब और उस वेदना का स्मरण नहीं करती है, उस हर्ष के कारण कि एक मनुष्य संसार में पैदा हो गया है। 

२२ और इसलिए अब तुम शोक मना रहे हो: परन्तु मैं तुम्हें पुनः देखूँगा, और तुम्हारा मन हर्ष मनाएगा, और तुम्हारा आनंद कोई भी व्यक्ति तुम से नहीं छीनेगा। 

२३ और उस दिन में तुम मुझ से कुछ भी नहीं पूछोगे। मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, जो कुछ भी तुम पिताश्री से मेरे नाम में माँगोगे, वो उसे तुम्हें दे देंगे। 

२४ अब तक तुम ने मेरे नाम में कुछ भी नहीं माँगा है: माँगो, और तुम ग्रहण कर लोगे, ताकि तुम्हारा आनंद सम्पूर्ण बन जाए। 

२५ यह बातें मैंने तुम से नीती-वचनों में कही हैं: परन्तु वो समय आ रहा है, जब मैं तुम्हारे साथ नीती-वचनों में बातें नहीं करूँगा, बल्कि मैं तुम्हें पिताश्री के विषय में स्पष्टता से बता दूँगा। 

२६ उस दिन तुम मेरे नाम में माँगोगे: और मैं यह नहीं कह रहा हूँ तुम से, कि मैं तुम्हारे लिए पिताश्री से प्रार्थना करूँगा:

२७ क्योंकि पिताश्री स्वयं ही तुम से प्रेम करते हैं, क्योंकि तुम ने मुझ से प्रेम किया है, और विश्वास किया है कि मैं ईश्वर से ही आया हूँ। 

२८ मैं पिताश्री से आकर, संसार में आ गया हूँ: पुनः, मैं संसार को छोड़कर, पिताश्री के पास जा रहा हूँ। 

२९ उनके शिष्यों ने उन से कहा, लो, अब आप स्पष्टता से बोल रहे हैं जी, और नीती-वचनों में नहीं। 

३० अब हम विश्वस्त हैं कि आप ही सर्व-ज्ञाता हैं, और आपको आवश्यकता नहीं है कि कोई भी आप से प्रश्न करे: इसके द्वारा हम विश्वास करते हैं कि आप ईश्वर से ही बाहर पधारे हैं। 

३१ यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, क्या तुम अब विश्वास करते हो?

३२ देखो, वो घड़ी आ रही है, हाँ भई, वो तो आ भी चुकी है, कि तुम तितर-बितर हो जाओगे, प्रत्येक व्यक्ति अपने अपनों की ओर, और मुझे अकेला छोड़ दोगे: और तब भी मैं अकेला नहीं हूँ, क्योंकि पिताश्री मेरे साथ हैं। 

३३ यह बातें मैंने तुम से बोल दी हैं, ताकि मुझ में तुम्हारे पास शान्ति हो। संसार में तुम्हारे पास आपत्तियाँ होंगी: परन्तु अच्छे प्रोत्साहित हो जाओ; मैं इस संसार को परास्त कर चुका हूँ। 




सत्रहवाँ अध्याय। 


१ यह शब्द यीशु ने बोले, और अपने नेत्र स्वर्ग की ओर ऊपर उठाए, और कहा, पिताश्री जी, वो घड़ी आ गई है; अपने पुत्र का महिमामण्डन कर दें, ताकि आपका पुत्र भी आपका महिमामण्डन कर दे:

२ जैसे आपने उसे समस्त प्राणियों पर शक्ती प्रदान कर दी है, ताकि वो उन्हें अनन्त जीवन प्रदान कर दे, जितनों को भी आपने उसे प्रदान किया है।

३ और यही है जीवन अनन्त, कि वो आपसे, वही केवल सच्चे ईश्वर से, और यीशु मसीह से परिचित हो जाएँ, जिसे आपने भेजा है। 

४ मैंने आपका महिमामण्डन पृथ्वी पर कर दिया है: मैंने वो कार्य समाप्त कर दिया है जो आपने मुझे करने के लिए प्रदान किया था। 

५ और अब, हे पिताश्री, आप मेरा महिमामण्डन स्वयं से उसी महिमा से कर दें, जो मेरे पास आपके साथ इस संसार के होने से पहले थी। 

६ मैंने आपका नाम उन लोगों को प्रत्यक्ष कर दिया, जिन्हें आपने मुझे इस संसार में से प्रदान किया: वो आप ही के थे, और आप ही ने उन्हें मुझे प्रदान किया: और इन्हीं ने आपके शब्द का पालन किया है। 

७ अब यह जान गए हैं कि वो सब कुछ, जो कुछ भी आपने मुझे प्रदान किया है, आप ही का है। 

८ क्योंकि मैंने इन्हें वो शब्द प्रदान कर दिए हैं जो आपने मुझे प्रदान किए थे: और इन्होंने उन्हें ग्रहण कर लिया है, और यह विश्वस्तता से जान गए हैं कि मैं आप से आया हूँ, और इन्होंने विश्वास कर लिया है कि आप ही ने मुझे भेजा है। 

९ मैं इनके लिए प्रार्थना कर रहा हूँ: मैं इस संसार के लिए प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ, बल्कि इनके लिए जिन्हें आपने मुझे प्रदान किया है; क्योंकि यह आप ही के हैं। 

१० और मेरे सभी आपके हैं, और आपके मेरे हैं; और मैं इन्हीं में महिमामण्डित हूँ। 

११ और मैं अब इस संसार में और नहीं रहूँगा, परन्तु यह इस संसार में हैं, और मैं आपके पास आ रहा हूँ। पवित्र पिताश्री, अपने ही नाम द्वारा इन्हें रखें जिन्हें आपने मुझे प्रदान किया है, ताकि यह एक हो सकें, जैसे हम एक हैं। 

१२ जब मैं इनके साथ संसार में था, मैंने इन्हें आपके नाम में रखा: जिन्हें आपने मुझे प्रदान किया, मैंने उन्हें सुरक्षित रखा, और इन में से कोई भी नष्ट नहीं हुआ, बस केवल वो विनाश-पुत्र; ताकि शास्त्र की पूर्ती हो जाए। 

१३ और मैं अब आपके पास आ रहा हूँ; और मैं यह बातें संसार में कह रहा हूँ, ताकि यह मेरा आनंद स्वयं में सम्पूर्ण पा लें। 

१४ मैंने इन्हें आपका शब्द प्रदान कर दिया है; और संसार ने इनके साथ घृणा की है, क्योंकि यह इस संसार के नहीं हैं, जिस प्रकार मैं इस संसार का नहीं हूँ। 

१५ मैं यह प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ कि आप इन्हें संसार में से बाहर निकाल लें, बल्कि आप इन्हें बुराई से बचा कर रखें।  

१६ यह इस संसार के नहीं हैं, जिस प्रकार मैं इस संसार का नहीं हूँ। 

१७ अपने सत्य द्वारा इन्हें पुनीत कर दें: आपका शब्द सत्य है जी। 

१८ जैसे आपने मुझे संसार में भेजा है, उसी प्रकार मैंने भी इन्हें संसार में भेज दिया है। 

१९ और इन्हीं के वास्ते मैं स्वयं को पुनीत करता हूँ, ताकि यह भी सत्य द्वारा पुनीत हो जाएँ। 

२० न ही मैं बस केवल इन्हीं के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ, बल्कि उनके लिए भी जो मुझ पर इनके शब्द द्वारा विश्वास करेंगे;

२१ ताकि यह सभी एक हों; जैसे आप, मेरे पिताश्री, मुझ में हैं, और मैं आप में, ताकि यह भी हम में एक बन जाएँ: ताकि यह संसार विश्वास करे कि आप ही ने मुझे भेजा है। 

२२ और वो महिमा जो आपने मुझे प्रदान की थी, मैंने इन्हें प्रदान कर दी है; ताकि यह एक हो सकें, जैसे हम एक हैं:

२३ मैं इन में, और आप मुझ में, ताकि यह एक ही में परिशुद्धता-पूर्ण बन जाएँ; और कि संसार यह जान सके कि आप ही ने मुझे भेजा, और इन से प्रेम किया, जिस प्रकार आपने मुझ से प्रेम किया। 

२४ पिताश्री जी, मेरी यह इच्छा है कि यह भी, जिन्हें आपने मुझे प्रदान किया है, मेरे साथ ही हों जहाँ मैं हूँ; ताकि यह मेरी महिमा देख लें, जो आपने मुझे प्रदान कर दी है: क्योंकि इस संसार की नीव से पहले से ही आपने मुझ से प्रेम किया है। 

२५ हे नेक पिताश्री, संसार ने आपको नहीं जाना: परन्तु मैंने आपको जाना है, और इन्होंने जाना है कि आपने मुझे भेजा है। 

२६ और मैंने इन्हें आपके नाम का परिचय दे दिया है, और मैं उसका परिचय देता रहूँगा: ताकि वो प्रेम जिस से आपने मुझ से प्रेम किया है, इन में रह सके, और मैं इन में। 




अट्ठारहवाँ अध्याय। 


१ जब यीशु ने यह शब्द बोल दिए थे, तो वो अपने शिष्यों के साथ केद्रोन नदी के पार चले गए, जहाँ एक उद्यान था, जिस में उन्होंने और उनके शिष्यों ने प्रवेश किया। 

२ और यूदस भी, जिसने उन्हें पकड़वा दिया था, इस स्थान से अवगत था: क्योंकि यीशु कई बार वहीं अपने शिष्यों के साथ एकत्रित हुआ करते थे। 

३ यूदस तभी, प्रमुख पुरोहितों और फैरिसियों द्वारा आदमियों और अफ़सरों की एक पलटन लेकर, लालटेनों, और मशालों, और शस्त्रों के साथ, वहीं आ जाता है। 

४ इसलिए यीशु उन सभी बातों को जानते हुए कि उन पर क्या-क्या बीतेगी, आगे बढ़े, और उन्होंने उन से कहा, किसे ढूँढ रहे हो तुम?

५ उन्होंने उन्हें उत्तर दिया, नासरत के यीशु को। तो यीशु उनसे कहते हैं, मैं वही हूँ। और यूदस भी, जिसने उन्हें पकड़वा दिया था, उन जनो के साथ ही खड़ा था। 

६ अब जैसे ही उन्होंने उनसे कहा, मैं वही हूँ, वो पीछे की ओर हट कर धरती पर गिर पड़े। 

७ तो यीशु ने पुनः उनसे पूछा, भई किसे ढूँढ रहे हो तुम? और उन्होंने कहा, नासरत के यीशु को। 

८ यीशु ने उत्तर दिया, मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि मैं वही हूँ: यदि इसलिए तुम मुझे ढूँढ रहे हो, तो इन्हें चले जाने दो:

९ ताकि वो कहनी पूर्ण हो जाए, जो उन्होंने बोली थी, उन में से जिन्हें आपने मुझे प्रदान किया मैंने कोई भी नहीं खोया। 

१० तब सिमोन पतरस ने अपने पास से एक तलवार खींच कर उच्च पुरोहित के नौकर पर वार कर दिया, और उसका दायाँ कान काट डाला। उस नौकर का नाम मेलकस था। 

११ तब यीशु ने पतरस से कहा, अपनी तलवार को म्यान में डाल दो: वो प्याला जो मेरे पिताश्री ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे पियूँगा नहीं? 

१२ तब उस पलटन ने, और कप्तान ने, और यहूदियों के अफ़सरों ने, यीशु को पकड कर, उन्हें बाँध दिया, 

१३ और वो उन्हें पहले हन्ना के पास ले चले; क्योंकि वही काइफा का ससुर था, जो उसी वर्ष उच्च पुरोहित था। 

१४ अब वो काइफा ही था, जिसने यहूदियों को परामर्श दिया था, कि यह लाभकारी था कि एक ही व्यक्ति लोगों के वास्ते मर जाए। 

१५ और सिमोन पतरस यीशु के पीछे-पीछे गया, और एक दूसरे शिष्य ने भी यही किया: वो शिष्य उच्च पुरोहित का एक परिचित था, और उसने उच्च पुरोहित के राज-भवन में यीशु के साथ अन्दर प्रवेश कर लिया। 

१६ परन्तु पतरस बाहर द्वार पर ही खड़ा था। तो फिर वो दूसरा शिष्य बाहर आया, जो उच्च पुरोहित का एक परिचित था, और उसने उस से बात की जो द्वार-पालिका थी, और वो पतरस को भीतर ले आया। 

१७ तब उस किशोरी ने जो द्वार-पालिका थी, पतरस से कहा, क्या तू भी इस व्यक्ति के शिष्यों में से एक नहीं है क्या? वो कहता है, मैं नहीं हूँ भई। 

१८ और नौकर और अफ़सर वहीं खड़े थे, जिन्होंने कोयलों की आग जलाई हुई थी; क्योंकि ठण्ड थी: और वो अपने आप को ताप रहे थे: और पतरस उन्हीं के साथ खड़ा हो कर, स्वयं को तापने लगा। 

१९ उच्च पुरोहित ने फिर यीशु से उनके शिष्यों के, और उनके उपदेश के विषय में पूछा। 

२० यीशु ने उसे उत्तर दिया, मैं संसार से सरे आम बोला; मैंने सदैव यहूदी-आराधनालय और मन्दिर में, जहाँ यहूदी सदैव एकत्रित होते हैं, शिक्षा प्रदान की; और गोपनीयता में मैंने कुछ भी नहीं बोला। 

२१ तो तुम मुझ से क्यों पूछ रहे हो? उनसे पूछो जिन्होंने मुझे सुना है, मैंने उनसे क्या कहा: देखो, वो जानते हैं मैंने क्या कहा। 

२२ और जब उन्होंने इस प्रकार बोल दिया था, अफ़सरों में से एक ने जो वहीं खड़ा था, यीशु को अपनी हथेली से थप्पड़ मारा, कहते हुए, क्या तू उच्च पुरोहित को इस प्रकार उत्तर देगा? 

२३ यीशु ने उसे उत्तर दिया, यदि मैंने बुरा बोला हो, तो उस बुरे का साक्ष्य दो: परन्तु यदि भला, तो तुम मुझे क्यों मार रहे हो भई?

२४ अब हन्ना ने उन्हें बन्धा हुआ, उच्च पुरोहित काइफा के पास भेज दिया था। 

२५ और सिमोन पतरस खड़ा हुआ स्वयं को ताप लगा रहा था। उन्होंने इसलिए उस से कहा, क्या तू भी उसके शिष्यों में से एक नहीं है क्या? तो उसने यह अस्वीकार किया, और कहा, भई मैं नहीं हूँ। 

२६ उच्च पुरोहित के नौकरों में से एक जो उसका नातेदार था, जिसका कान पतरस ने काट डाला था, बोला, क्या मैंने तुझे उसके साथ उसी उद्यान में नहीं देखा था क्या? 

२७ पतरस ने पुनः यह अस्वीकार कर दिया: और तुरँत ही मुर्गे ने बाँग दे दी। 

२८ तब फिर वो यीशु को काइफा के पास से न्याय-भवन में ले गए: और सुबह-सुबह का समय था; परन्तु उन यहूदियों ने स्वयं न्याय-भवन में प्रवेश नहीं किया, कहीं वो दूषित न हो जाएँ; ताकि वो पार-करने का भोज खा सकें। 

२९ तो पिलातुस ने उनके पास बाहर जाकर कहा, तुम कौन सा दोषारोप लगा रहे हो इस आदमी पर?

३० उन्होंने उत्तर दिया और उस से कहा, यदि यह दुष्कर्मी न होता, हमने इसे तुम्हें प्रदान नहीं किया होता। 

३१ तब पिलातुस ने उनसे कहा, तुम ले जाओ इसे और अपने ही नियमानुसार इसका न्याय करो। इसलिए उन यहूदियों ने उस से कहा, हमारे लिए किसी भी व्यक्ति को मृत्यु-दण्ड दे देना न्यायी नहीं है:

३२ ताकि यीशु का कथन पूर्ण हो जाए, जो उन्होंने बोला था, सूचित करते हुए कि वो कैसी मृत्यु मरेंगे। 

३३ तब पिलातुस ने पुनः न्याय-भवन में प्रवेश किया, और यीशु को बुलवा कर कहा, क्या तू यहूदियों का सम्राट है?

३४ यीशु ने उसे उत्तर दिया, क्या तुम यह बात अपनी ही ओर से बोल रहे हो, या औरों ने तुम्हें यह बात मेरे विषय में बताई है? 

३५ पिलातुस ने उत्तर दिया, क्या मैं कोई यहूदी हूँ? तेरे अपने ही राष्ट्र ने और प्रमुख पुरोहितों ने तुझे मुझे प्रदान कर दिया है: क्या किया है तूने?

३६ यीशु ने उत्तर दिया, मेरा राज्य इस संसार का नहीं है: यदि मेरा राज्य इस संसार का होता, तो मेरे नौकर लड़ाई कर बैठते, कि मैं यहूदियों के हाथों में प्रदान नहीं किया गया होता: परन्तु इस समय मेरा राज्य यहाँ का नहीं है। 

३७ पिलातुस ने इसलिए उन से कहा, तो क्या फिर तू कोई सम्राट है? यीशु ने उत्तर दिया, तुम कह रहे हो यह कि मैं कोई सम्राट हूँ। इसी उद्देश्य के लिए मेरा जन्म हुआ था, और इसी कारण वश मैं संसार में आया हूँ, कि मैं सत्य के प्रति साक्ष्य दूँ। प्रत्येक व्यक्ति जो सत्य का है मेरी वाणी सुनता है। 

३८ पिलातुस उन से कहता है, सत्य क्या है? और जब उसने यह कह दिया था, उसने पुनः यहूदियों के पास बाहर जाकर उन लोगों से कहा, भई मैं तो इस में कोई भी दोष नहीं पा रहा। 

३९ परन्तु तुम्हारी एक रीति है, कि मैं तुम्हें कोई एक पार-करने के अवसर पर रिहा कर दूँ: तो भई क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें यहूदियों के सम्राट को रिहा कर दूँ?

४० तो वो सभी पुनः चीख पड़े, कहते हुए, इस आदमी को नहीं, बल्कि बरअब्बा को। अब बरअब्बा एक डकैत था। 




उन्नीसवाँ अध्याय। 


१ तब पिलातुस ने यीशु को लेकर उन पर कोड़े पड़वा दिए। 

२ और उन सैनिकों ने काँटों का एक मुकुट गूँथ कर, उसे उनके सर पर लगा दिया, और उन्होंने उन्हें एक जामुनी चौगा पहना दिया,  

३ और कहा, जय हो यहूदियों के सम्राट! और उन्होंने उन्हें अपने हाथों से थपेड़ा। 

४ पिलातुस इसलिए पुनः बाहर गया, और वो उनसे कहता है, देखो भई, मैं इसे तुम्हारे पास बाहर ला रहा हूँ, ताकि तुम यह जान जाओ कि मैं इस में कोई भी दोष नहीं पा रहा हूँ। 

५ तब यीशु बाहर आ गए, काँटों का वो मुकुट, और वो जामुनी चौगा पहने हुए। और पिलातुस उन लोगों से कहता है, भई देख लो इस आदमी को!

६ जब प्रमुख पुरोहितों और अफ़सरों ने उन्हें देखा, तो वो चीख पड़े, कहते हुए, इसे क्रूस पर चढ़ा दो, इसे क्रूस पर चढ़ा दो। पिलातुस उनसे कहता है, भई तुम इसे ले जाओ, और क्रूस पर चढ़ा दो: क्योंकि मैं तो इस में कोई भी दोष नहीं पा रहा हूँ। 

७ यहूदियों ने उसे उत्तर दिया, हमारा एक नियम है, और हमारे नियमानुसार इसे मरना है, क्योंकि इसने स्वयं को ईश्वर का बेटा बना दिया है। 

८ अब जब पिलातुस ने यह कथन सुना, तो वो तो और भी डर गया;

९ और वो पुनः न्याय-भवन में जाकर यीशु से कहता है, कहाँ से है तू? परन्तु यीशु ने उसे कोई भी उत्तर नहीं दिया।  

१० तब पिलातुस उन से कहता है, बोलेगा नहीं क्या तू मुझ से? क्या जानता नहीं है तू कि मेरे पास तुझे क्रूस पर चढ़वा देने की शक्ती, और तुझे रिहा कर देने की शक्ती है?

११ यीशु ने उत्तर दिया, तुम्हारे पास मेरे विरुद्ध कोई भी शक्ती न होती, सिवाय कि वो तुम्हें ऊपर से प्रदान न की गई होती:

इसलिए जिसने मुझे तुम्हें प्रदान किया है, उसका पाप बृहत्तर है।   

१२ और उस समय से लेकर पिलातुस उन्हें रिहा करने का प्रयत्न करने लग गया: परन्तु यहूदी चीख पड़े, कहते हुए, यदि तुम इस आदमी को रिहा कर दोगे, तो तुम रोम के राजा के मित्र नहीं हो: जो कोई भी स्वयं को राजा घोषित करता है रोम के राजा के विरुद्ध बोलता है। 

१३ इसलिए जब पिलातुस ने यह कथन सुना, तो वो यीशु को बाहर लाकर न्यायासन पर बैठ गया, उस स्थान में जो पत्थर की पटरी कहलाता है, परन्तु इब्रानी में गैब्बथा। 

१४ और वो पार-करने की तैयारी का दिवस था, और लग-भग छटी घड़ी: और पिलातुस उन यहूदियों से कहता है, भई देख लो अपने राजा को!

१५ परन्तु वो चीख पड़े, ले जाओ इसे, ले जाओ इसे, क्रूस पर चढ़ा दो इसे। तो पिलातुस उनसे कहता है, क्या मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढ़ा दूँ? प्रमुख पुरोहितों ने उत्तर दिया, रोम के राजा के सिवा हमारा कोई भी अन्य राजा नहीं है। 

१६ तब उसने उन्हें यीशु को क्रूस पर चढ़ा देने के लिए प्रदान कर दिया। और वो यीशु को लेकर, उन्हें ले चले गए। 

१७ और वो अपना क्रूस ढोते हुए उस स्थान की ओर चलते गए, जो खोपड़ी का स्थान कहलाया जाता है, जो इब्रानी में गुलगुथा कहलाया जाता है: 

१८ जहाँ उन्होंने उन्हें, और दो औरों को उनके साथ क्रूस पर चढ़ा दिया, दोनों ओर एक को, और यीशु उनके बीच। 

१९ और पिलातुस ने एक शीर्षक लिखवाया, और उसे क्रूस पर लगवा दिया। और उस पर लिखा था: नासरत का यीशु, यहूदियों का सम्राट। 

२० तो इस शीर्षक को यहूदियों में से कईयों ने पढ़ा: क्योंकि वो स्थान जहाँ यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था नगर के निकट ही था: और वो इब्रानी, यूनानी और लातीनी में लिखा था। 

२१ तब यहूदियों के प्रमुख पुरोहितों ने पिलातुस से कहा, यह मत लिखो, यहूदियों का सम्राट; बल्कि यह, कि इसने कहा, कि मैं यहूदियों का सम्राट हूँ। 

२२ पिलातुस ने उत्तर दिया, मैंने जो लिख दिया है, सो मैंने लिख दिया है। 

२३ तब सैनिकों ने, जब उन्होंने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया था, उनके वस्त्र ले कर उनके चार भाग कर दिए, प्रत्येक सैनिक के लिए एक भाग; और उनका अंगरखा भी: अब वो अंगरखा बिना सिलाई के जोड़ से बना था, ऊपर से लेकर उसका प्रत्येक भाग बुना हुआ था।  

२४ इसलिए उन्होंने आपस में कहा, हमें इसे फाड़ना नहीं चाहिए, बल्कि हम इसके लिए पर्चियाँ डालते हैं, कि यह किस का होगा: ताकि शास्त्र की पूर्ती हो जाए, जो कहता है, उन्होंने अपने बीच मेरे वस्त्र बाँटे, और मेरे वस्त्र के लिए उन्होंने पर्चियाँ डालीं। इसलिए उन सैनिकों ने यह कार्य किए। 

२५ अब यीशु के क्रूस के साथ उनकी माँ, और उनकी माँ की बहन, मरियम क्लीयोपस की पत्नी, और मरियम मेगदलीन खड़ी थीं। 

२६ इसलिए जब यीशु ने अपनी माँ, और उस शिष्य को जिस से वो प्रेम करते थे, पास खड़े देखा, तो वो अपनी माँ से कहते हैं, स्त्री, अपने बेटे को देख लो!

२७ फिर वो अपने शिष्य से कहते हैं, अपनी माँ को देख लो! और उसी घड़ी से उस शिष्य ने मरियम को अपने ही घर में ले लिया। 

२८ इसके पश्चात, यीशु जानते हुए कि अब सभी बातें पूर्ण हो चुकी थीं, ताकि शास्त्र की पूर्ती हो जाए, उन्होंने कहा, मैं प्यासा हूँ। 

२९ अब वहीं एक सिरके से भरा हुआ पात्र रखा था: और उन्होंने एक पानिसोख को उस सिरके से भर लिया, और उसे एक जूफे पर लगा कर, उसे उनके मूँह पर लगा दिया। 

३० इसलिए जब यीशु ने वो सिरका ले लिया था, तो उन्होंने कहा, समाप्ति हो गई है: और उन्होंने अपना शीर्ष झुकाया, और अपने प्राण त्याग दिए। 

३१ अब चूँकि वो तैयारी का दिवस था, और ताकि वो शव सैबथ के दिन क्रूस पर न रहें, (क्योंकि वो सैबथ का दिन एक बड़ा दिन था,) इसलिए उन यहूदियों ने पिलातुस से याचना की, कि शवों की टाँगें तोड़ कर उन्हें हटा दिया जाए। 

३२ तब सैनिक आए, और उन्होंने पहले की टाँगें तोड़ दीं, और उस दूसरे की भी जो उसके साथ क्रूस पर था। 

३३ परन्तु जब वो यीशु के पास आए, और उन्होंने देखा कि उनकी तो पहले से ही मृत्यु हो चुकी थी, तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोड़ीं:

३४ परन्तु सैनिकों में से एक ने, एक भाले से उनकी छाती भेद दी, और तुरँत ही रक्त और पानी बाहर निकल आए। 

३५ और उसने जिसने यह देखा, साक्ष्य दिया, और उसका साक्ष्य सत्य है: और वो जानता है कि वो सत्य कह रहा है, ताकि तुम विश्वास कर लो। 

३६ इसलिए यह कार्य किए गए थे, ताकि वो शास्त्र पूर्ण हो जाए, उनकी एक भी हड्डी नहीं तोड़ी जाएगी। 

३७ और पुनः एक दूसरा शास्त्र कहता है, वह उन्हें देखेंगे, जिन्हें उन्होंने भेदा। 

३८ और इसके पश्चात, यीशु के एक शिष्य एरमथिया के यूसुफ ने, यहूदियों के डर के मारे, गोपनीयता में पिलातुस से याचना की, कि वो यीशु का शव ले जा सके: और पिलातुस ने उसे अनुमती दे दी। इसलिए वो आया, और यीशु का शव ले गया। 

३९ और निकोदेमूस भी वहाँ आया, जो पहले, रात्रि के समय यीशु के पास आया था, और वो एक सौ लितरा भार का एक गन्धरस और घृतकुमारी का मिश्रण ले आया। 

४० तब उन्होंने यीशु के शव को लेकर उसे छालटी के वस्त्रों में सुगन्धित इत्र के साथ बाँध दिया, यहूदियों की दफ़नाने की रीतीनुसार। 

४१ अब उस स्थान में जहाँ उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया था, एक उद्यान था; और उस उद्यान में एक नया मक़बरा था, जिस में अभी तक कोई भी व्यक्ति लिटाया नहीं गया था। 

४२ इसलिए वहीं उन्होंने यीशु को लिटा दिया, क्योंकि वो यहूदियों का तैयारी का दिवस था; क्योंकि वो मक़बरा निकट ही था। 




बीसवाँ अध्याय। 


१ अब सप्ताह के पहले दिन, मरियम मेगदलीन सुबह-सुबह मक़बरे पर आती है, जब अभी अन्धेरा ही था, और उसने देखा कि मक़बरे पर से पत्थर हटा हुआ था। 

२ तब वो दौड़ कर सिमोन पतरस, और उस दूसरे शिष्य के पास आ जाती है, जिस से यीशु प्रेम करते थे, और उन से कहती है, भई वो तो प्रभु को मक़बरे में से बाहर निकाल कर ले गए हैं, और हम नहीं जानती कि उन्होंने उन्हें कहाँ लिटाया हुआ है। 

३ इसलिए पतरस और वो दूसरा शिष्य बाहर निकल चले, और उस मक़बरे पर जा पहुँचे। 

४ तो वो दोनो एक साथ भागे: और वो दूसरा शिष्य पतरस से आगे निकल कर, उस मक़बरे पर पहले जा पहुँचा। 

५ और उसने नीचे झुक कर उन छालटी के वस्त्रों को पड़े हुए देखा; तथापि उसने मक़बरे में प्रवेश नहीं किया। 

६ तब सिमोन पतरस उसके पीछे-पीछे पहूँच कर मक़बरे के भीतर जाता है, और वो उन छालटी के वस्त्रों को पड़े हुए देखता है,

७ और उनके सर को लपेटे हुए उस रुमाल को जो उन छालटी के वस्त्रों के साथ नहीं था, बल्कि वो तह किया हुआ अकेला ही एक स्थान पर था।  

८ तब उस दूसरे शिष्य ने भी, जो मक़बरे पर पहले पहुँचा था, अन्दर प्रवेश किया, और उसने देखा, और विश्वास कर लिया। 

९ क्योंकि अभी तक वह उस शास्त्र से परिचित नहीं थे, कि यीशु को अवश्य ही मृतकों में से पुनः उठना होगा। 

१० तब वह शिष्य पुनः अपने ही घर चले गए। 

११ परन्तु मरियम मक़बरे के बाहर खड़ी रो रही थी: और उसके रोते-रोते, वो नीचे झुकी, और उसने मक़बरे के भीतर देखा,

१२ और वो दो दूतों को श्वेत वस्त्रों में बैठा हुआ देखती है, एक सिरे पर, और दूसरा पद पर, जहाँ यीशु का शव लेटा हुआ करता था। 

१३ और वो दूत उस से कहते हैं, स्त्री, तुम रो क्यूँ रही हो? वो उनसे कहती है, क्योंकि वो मेरे प्रभु को ले गए हैं, और मैं नहीं जानती कि उन्होंने उन्हें कहाँ लिटा दिया है। 

१४ और जब उसने ऐसा कह दिया था, तो उसने स्वयं को पीछे मोड़ा, और यीशु को खड़े देखा, और वो यह जानती नहीं थी कि वो यीशु ही थे। 

१५ यीशु उस से कहते हैं, स्त्री तुम रो क्यूँ रही हो? तुम किसे ढूँढ रही हो? मरियम यह समझते हुए कि वह माली थे, उन से कहती है, श्रीमान, यदि आप उन्हें यहाँ से उठा कर ले गए हैं, तो बता दें मुझे कि आपने उन्हें कहाँ लिटाया है, और मैं उन्हें वहाँ से ले जाऊँगी। 

१६ यीशु उस से कहते हैं, मरियम। और मरियम स्वयं मुड़ी, और उन से कहती है, रैबोनाय; जिसका अर्थ है, गुरुवर। 

१७ यीशु उस से कहते हैं, मुझे मत छुओ; क्योंकि मैं अभी तक अपने पिताश्री के पास आरोहित नहीं हुआ हूँ: परन्तु मेरे भाईयों के पास जाकर उन्हें बता दो, कि मैं अपने पिताश्री, और तुम्हारे पिताश्री के पास, और अपने ईश्वर, और तुम्हारे ईश्वर के पास आरोहण कर रहा हूँ।

१८ तो मरियम मेगदलीन ने आकर उन शिष्यों को यह बताया कि उसने प्रभु को देख लिया था, और कि उन्होंने उस से यह बातें कही थीं। 

१९ तब उसी दिन सप्ताह के पहले दिन ही, संध्या के समय, जब यहूदियों के डर के मारे एकत्रित हुए शिष्यों ने द्वार बन्द कर रखे थे, यीशु आकर उनके बीच में खड़े हो गए, और वह उनसे कहते हैं, शान्ति हो तुम पर। 

२० और जब उन्होंने ऐसा कह दिया था, तो उन्होंने उन्हें अपने हाथ और अपनी छाती दिखाई। तब शिष्य प्रभु को देख कर हर्षित हो उठे। 

२१ तब यीशु ने उन से पुनः कहा, शान्ति हो तुम पर: जैसे मेरे पिताश्री ने मुझे भेजा है, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेज रहा हूँ। 

२२ और जब उन्होंने यह कह दिया था, तो उन्होंने उन पर फूँका, और वह उनसे कहते हैं, पवित्र-प्राण को ग्रहण कर लो:

२३ जिस किसी के भी पाप तुम रद्द कर दोगे, वही उनके प्रति रद्द कर दिए जाएँगे; और जिस किसी के भी पाप तुम रख लोगे, वही रख लिए जाएँगे। 

२४ परन्तु उन बारह में से एक, थोमस, जो दिदिमुस कहलाया जाता था, उनके साथ उपस्थित नहीं था, जब यीशु पधारे थे। 

२५ इसलिए उन अन्य शिष्यों ने उस से कहा, हमने प्रभु को देख लिया है। परन्तु उसने उन से कहा, सिवाय इसके कि मैं उनके हाथों में उन खूँटों की छाप न देख लूँ, और अपनी उँगली उन खूँटों के गड्ढों में न डाल लूँ, और अपना हाथ उनकी छाती में न घोंप लूँ, मैं विश्वास नहीं करूँगा। 

२६ और आठ दिन पश्चात, पुनः उनके शिष्य भीतर थे, और थोमस उनके साथ था: तब यीशु पधारे, द्वारों के बँद होते हुए, और वह उनके बीच खड़े हो गए, और उन्होंने कहा, शान्ति हो तुम पर। 

२७ तब वो थोमस से कहते हैं, यहाँ ले आओ अपनी उँगली, और देख लो मेरे हाथों को; और यहाँ ले आओ अपने हाथ को, और घोंप लो उसे मेरी छाती में: और बिन-भरोसे मत रहो, बल्कि विश्वास करने वाले बनो। 

२८ और थोमस ने उत्तर दिया, और उन से कहा, मेरे प्रभु और मेरे ईश्वर। 

२९ यीशु उस से कहते हैं, थोमस, क्योंकि तुमने मुझे देख लिया है, तुमने विश्वास किया है: धन्य हैं वो जिन्होंने मुझे नहीं देखा है, और तब भी विश्वास कर लिया है।  

३० और सच में यीशु ने अपने शिष्यों की उपस्थिति में कई और संकेत किए, जो इस पुस्तक में नहीं लिखे गए हैं:

३१ परन्तु यह लिखे गए हैं, ताकि तुम विश्वास कर सको कि यीशु मसीहा हैं, ईश्वर के पुत्र; और कि विश्वास करके तुम उनके नाम द्वारा जीवन पा लो। 



इक्कीसवाँ अध्याय। 


१ इन घटनाओं के पश्चात, यीशु स्वयं अपने शिष्यों को पुनः तिबेरीयुस के समुद्र तट पर प्रकट हुए; और इस प्रकार वह स्वयं प्रकट हुए। 

२ वहीं सिमोन पतरस, और थोमस जो दिदिमुस कहलाया जाता है, और गलील के काना का नतनएल, और ज़ब्दी के बेटे, और दो अन्य शिष्य, एक साथ थे। 

३ सिमोन पतरस उन से कहता है, मैं मछलियाँ पकड़ने जा रहा हूँ। वो उस से कहते हैं, हम भी तुम्हारे साथ जाते हैं। तो वो चले गए, और तुरन्त ही उन्होंने एक जलयान में प्रवेश किया; और उस रात उन्होंने कुछ भी नहीं पकड़ा। 

४ परन्तु जब सुबह हो चली थी, यीशु तट पर खड़े थे: परन्तु वह शिष्य नहीं जानते थे कि वही यीशु थे। 

५ तो यीशु उनसे कहते हैं, बच्चों, भई क्या तुम्हारे पास कुछ खाने के लिए है क्या? उन्होंने उन्हें उत्तर दिया, नहीं जी। 

६ और उन्होंने उनसे कहा, अपने जाल को जलयान के दाहिने ओर फैंक दो, और तुम पा लोगे। तो उन्होंने जाल को फैंका, और अब वो उसे खींच ही नहीं पाए, उन बहुत सी मछलियों के कारण। 

७ तो वो शिष्य, जिस से यीशु प्रेम करते थे, पतरस से कहता है, यह प्रभु ही हैं। अब जब पतरस ने यह सुना कि वह प्रभु ही थे, तो उसने अपना मछुआरों का अंगरखा अपनी कमर पर कस लिया, (क्योंकि वो नंगा था,) और उसने स्वयं समुद्र में छलाँग लगा ली। 

८ और वह अन्य शिष्य भी एक छोटे जलयान में आ गए; (क्योंकि वो तट से बहुत दूर नहीं थे, बस लगभग दो सौ हाथ की दूरी पर ही,) उस जाल को मछलियों के साथ खींचते हुए।   

९ अब उनके तट पर पहुँचते ही, उन्होंने वहीं कोयलों की अग्नि पर मछलियाँ और रोटी रखी हुई देखीं। 

१० यीशु उनसे कहते हैं, उन मछलियों में से ले आओ जिन्हें तुम ने अभी पकड़ा है। 

११ सिमोन पतरस जाता है, और वो उस बड़ी-बड़ी मछलियों से भरे जाल को तट पर खींच लाता है, एक सौ तरेपन: अब जब कि वो मछलियाँ इतनी मात्रा में थीं, तब भी वो जाल टूटा नहीं। 

१२ यीशु उनसे कहते हैं, आ जाओ और भोजन कर लो। और उन शिष्यों ने उन से पूछने का साहस नहीं किया, कि भई आप कौन हैं जी? क्योंकि वो यह जानते थे कि वही प्रभु थे। 

१३ यीशु तब आते हैं, और रोटी लेते हैं, और उन्हें दे देते हैं, और मछली भी इसी प्रकार। 

१४ यह अब तीसरी बार है कि यीशु मृतकों में से उठ जाने के पश्चात, अपने शिष्यों के समक्ष स्वयं प्रकट हुए। 

१५ तो जब उन्होंने भोजन कर लिया था, यीशु सिमोन पतरस से कहते हैं, योना के बेटे सिमोन, क्या तुम मुझ से इन सब से अधिक प्रेम करते हो क्या? वो उन से कहता है, जी हाँ प्रभु: आप जानते हैं कि मैं आपसे प्रेम करता हूँ। वह उस से कहते हैं, मेरे मेमनों को चराओ। 

१६ यीशु उस से पुनः दूसरी बार कहते हैं, योना के बेटे सिमोन, क्या तुम मुझ से प्रेम करते हो क्या? तो वो उन से कहता है, जी हाँ प्रभु: आप जानते हैं जी कि मैं आपसे प्रेम करता हूँ। वह उस से कहते हैं, मेरे भेड़ों को चराओ। 

१७ वह उस से पुनः तीसरी बार कहते हैं, योना के बेटे सिमोन, क्या तुम मुझ से प्रेम करते हो? पतरस दुःखी हो उठा, क्योंकि उन्होंने उस से तीसरी बार कहा, क्या तुम मुझ से प्रेम करते हो? और उसने उन से कहा, प्रभु जी आप सर्व-ज्ञाता हैं; आप जानते हैं कि मैं आपसे प्रेम करता हूँ। यीशु उस से कहते हैं, मेरे भेड़ों को चराओ। 

१८ मैं सच-सच कहता हूँ तुम से, जब तुम एक युवक थे, तुम स्वयं ही अपनी कमर कसते थे, और जहाँ तुम ने चाहा तुम वहीं चलते-फिरते थे: परन्तु जब तुम वृद्ध हो जाओगे, तुम अपने हाथ फैलाओगे, और कोई और तुम्हारी कमर कसेगा, और तुम्हें वहाँ उठा ले जाएगा जहाँ तुम नहीं जाना चाहोगे। 

१९ उन्होंने यह बोलते हुए, संकेत दिया कि पतरस किस प्रकार की मृत्यु से ईश्वर का महिमामण्डन करेगा। और जब उन्होंने यह बोल दिया था, तो वो उस से कहते हैं, मेरे पीछे-पीछे लग जाओ।

२० तब मुड़ते हुए पतरस उस शिष्य को पीछे आता हुआ देखता है, जिस से यीशु प्रेम करते थे; जिसने रात्रि-भोज के समय उनकी छाती की ओर झुकते हुए कहा था, प्रभु जी, वो कौन है जो आपके साथ विश्वासघात कर रहा है?

२१ उसी को देखते हुए पतरस यीशु से कहता है, प्रभु जी, और यह व्यक्ति क्या करेगा?

२२ यीशु उस से कहते हैं, यदि मैं चाहूँ कि यह मेरे आने तक ठहरा रहे, तो तुम्हें इस से क्या? तुम मेरे पीछे-पीछे लगे रहो। 

२३ तब यह कथन भाई-जनों के बीच बाहर प्रचलित हुआ, कि उस शिष्य की मृत्यु नहीं होगी: तथापि यीशु ने उस से नहीं कहा था, कि उसकी मृत्यु नहीं होगी; बल्कि यदि मैं चाहूँ कि यह मेरे आने तक ठहरा रहे, तो तुम्हें इस से क्या?

२४ यही वो शिष्य है जो इन बातों का साक्ष्य देता है, और जिसने इन बातों को लिखा है: और हम जानते हैं कि इसका साक्ष्य सत्य है। 

२५ और कई अन्य कार्य भी हैं जिन्हें यीशु ने किए, जिन्हें, यदि उन में से प्रत्येक एक को भी लिख दिया जाए, तो मेरे अनुमान में स्वयं यह संसार भी उन लिखी जाने वाली पुस्तकों से भर नहीं पाएगा। तथास्तु। 


०८/२३/२०२२: 



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